Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 291–300
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 291–300
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सप्तमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 249 इस तरह से देखनेवाले, सोचनेवाले, समझनेवाले के आत्मा से प्राण उत्पन्न से आशा, आत्मा से स्मरण, आत्मा से आकाश, आत्मा से तेज, आत्मा से जल, आत्माहोता हैसे, आत्मा,,,,, और नाश आत्मा से अन्न आत्मा से बल आत्मा से विज्ञान आत्मा से ध्यान आत्मा उत्पत्ति से संकल्प, आत्मा से मन, आत्मा से वाणी, आत्मा से नाम, आत्मा से मंत्र, आत्मासेसेचित्तकर्म, जन्मतेआत्मा हैं । अतः आत्मा ही यह सब कुछ है । तदेष श्लोको न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताः सर्वश् पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति । स एकधा भवति त्रिधाह भवतिपश्यः पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकश्च सहस्राणि च विशतिराहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसस्पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारस्तः स्कन्द इत्याचक्षते तः स्कन्द इत्या- चक्षते ॥2 ॥
इति षड्विंशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि सप्तमोऽध्यायः ॥7 ॥
इस विषय में यह मन्त्र है- "ऐसा ज्ञानी मनुष्य मरण, रोग या दुःख को नहीं देखता । ज्ञानी सबको आत्मस्वरूप ही देखता है । अतः वह सबको प्राप्त कर लेता है । आत्मा एक, तीन, पाँच, सात, नौ और ग्यारह प्रकार का हो जाता है और एक सौ दस और इक्कीस हजार प्रकार का होता है । आहार की शुद्धि से अन्त: करण की शुद्धि होती है । अन्तःकरण की शुद्धि से निश्चल स्मृति उत्पन्न होती है । उस स्मृति से सब बन्धन छूट जाते हैं । जिसके रागद्वेष नष्ट हुए हैं ऐसे नारद को भगवान् सनत्कुमार ने ऐसे अज्ञान को दूर करने का मार्ग बताया । भगवान् सनत्कुमार को स्कन्द कहते हैं । ( यहाँ छब्बीसवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् में सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
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250 उपनिषत्सञ्चयनम् अथाष्टमोऽध्यायः प्रथमः खण्डः ॐ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराका- शस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥1 ॥
ॐ अब इस ब्रह्मपुर ( शरीर ) में जो यह सूक्ष्म कमल जैसा स्थान है, उसमें जो सूक्ष्म अंतर जैसा आकाश है, उसके भी भीतर जो वस्तु है, उसकी खोज करनी चाहिए और उसी की जिज्ञासा करनी चाहिए । तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥2 ॥
उन गुरु से यदि शिष्य पूछे कि-इस ब्रह्मपुर ( शरीर) में जो सूक्ष्म कमल जैसा घर है, इसमें सूक्ष्म अंतराकाश है, इसमें कौन- सी वह वस्तु है कि जिसकी खोज करनी चाहिए और जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिए? तो आचार्य को उसे इस प्रकार कहना चाहिए । यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावा- पृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन्समाहित- मिति ॥3 ॥
जितना यह बाहर का आकाश है, इतना ही यह हृदय के भीतर का आकाश है । द्युलोक और पृथ्वी ( दोनों ) इसके भीतर ही अच्छी तरह से अवस्थित है । अग्नि और वायु — दोनों तथा सूर्य और चन्द्र– ये दोनों एवं विद्युत्, नक्षत्र ( सब कुछ ) जो इस आत्मा का है या जो कुछ नहीं है, वह सब भी इस अन्तरात्मा में समा जाता है । तं चेद्ब्रूयुरस्मिश्श्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्व समाहितः सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनज्जरामाप्नोति प्रध्वसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥4 ॥
उन आचार्य से यदि शिष्य ऐसा पूछे कि– “इस ब्रह्मपुर ( शरीर ) में जो यह सब कुछ अर्थात् सब प्राणी और सभी कामनाएँ अवस्थित हैं, तो जब यह ब्रह्मपुर नामक शरीर वृद्ध होता है तब, अथवा नष्ट होता है तब, उसमें से क्या शेष रह जाता है? " स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुर- मस्मिन्कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वा- विशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥5 ॥
तब आचार्य कहे कि— “ इस देह के वृद्धत्व से वह आकाशनामक ब्रह्मपुर जीर्ण देह के वध से वह (ब्रह्मपुर) नष्ट नहीं होता । यह ब्रह्मपुर सत्य है, इसमें कामनाएँ सुव्यवस्थितनहीं होता,रहतीइस हैं । यह आत्मा पापशून्य, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, बुभुक्षारहित, पिपासारहित वाला, सत्य संकल्पवाला है । जिस प्रकार इस लोक में प्रजा अपने राजा की आज्ञानुसार, व्यवहारसत्य कामना-करती
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अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 251 है तब वह अपने जिस जनपद की या क्षेत्र की कामना करती है, वह उसे मिलता है । और उसमें रहकर वह जीवन धारण करती है (इसी तरह ब्रह्मपुर में सभी इच्छाएँ समा जाती हैं । ) तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताश्च सत्यान् कामास्तेषाः सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताञ्श्च सत्यान् कामास्तेषाः सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥6 ॥
इति प्रथमः खण्डः ॥ जिस प्रकार यहाँ (इस लोक में ) कर्म द्वारा प्राप्त लोक क्षीण हो जाता है, वैसे ही परलोक में पुण्यों से उपार्जित लोक भी क्षीण हो जाता है । इसलिए इस लोक में जो मनुष्य आत्मा को और सत्य ( वास्तविक ) कामनाओं को बिना जाने ही परलोक में चले जाते हैं, उनकी सभी लोकों में यथेच्छ गति नहीं होती । और जो लोग इस लोक में आत्मा को और वास्तविक कामनाओं को जानकर ही परलोकगमन करते हैं, उनकी सभी लोकों में यथेच्छ गति होती है । ( यहाँ पहला खण्ड पूरा हुआ ) * द्वितीयः खण्डः स यदि पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥1 ॥
उस आत्मसाक्षात्कारी को यदि पितृलोक देखने की इच्छा हुई हो, तो पितृलोग उसके सोचते ही उससे आ मिलते हैं और पितरों को प्राप्त करके वह सुखी होता है । अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥2 ॥
वह ज्ञानी यदि मातृलोक को देखने की इच्छा करता है, तो उसके संकल्पमात्र से माताएँ उससे आ मिलती हैं और माताओं को प्राप्त करके वह सुखी होता है । अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥3 ॥
यदि वह ज्ञानी भ्रातृलोक को देखने की इच्छा करता है तो संकल्पमात्र से ही भाईलोग उससे आ मिलते हैं और इस तरह भ्रातृलोक को प्राप्त करके वह सुखी होता है । अथ यदि स्वसृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥4 ॥
आ, यदि वह भगिनीलोक को देखने की इच्छा रखता हो तो हैसंकल्पमात्र। से ही बहनें उससेमिलती हैं, इस तरह भगिनियों से मिलकर वह आनन्दित होता अथ यदि सखिलोककामो भवति संकल्पादेवास्य सखायः ॥ समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥5
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252 उपनिषत्सञ्चयनम् वह ज्ञानी यदि मित्रलोक को देखने की इच्छा करता है, तो उसके संकल्पमात्र से ही मित्र उससे आ मिलते हैं, और इस तरह मित्रों से मिलकर वह आनन्दित होता है । अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥6 ॥
उस आत्मज्ञानी को यदि सुगन्ध और पुष्पमालाओं की कामना होती है, तो उसके संकल्पमात्र से ही वे दोनों उससे आ मिलते हैं और इस तरह सुगन्ध और पुष्पलताएँ पाकर वह आनन्दित होता है । अथ यद्यन्नपानलोककामो भवति संकल्पादेवास्यान्नपाने समुत्तिष्ठत- स्तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥7 ॥
वह ज्ञानी यदि अन्न और पान की कामना करता है, तो संकल्पमात्र से ही उसे खाना- पीना आ मिलता है और इस तरह खाने - पीने को पाकर वह आनन्द करता है । अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति संकल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतस्तेन गीतवादित्रलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥8 ॥
यदि वह गीत और वाद्य की कामना करता है, तो संकल्पमात्र से ही गीत और वाद्य उससे आ मिलते हैं । इस तरह गीत और वाद्य की प्राप्ति होने से वह आनन्द करता है । अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति संकल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥9 ॥
वह ज्ञानी यदि स्त्री- लोक की कामना करता है, तो संकल्पमात्र से ही उससे स्त्रियाँ आ मिलती हैं । इस तरह स्त्रियों को प्राप्त कर वह आनन्दित होता है । यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥10 ॥
इति द्वितीयः खण्डः ॥ वह ज्ञानी जिस- जिस लोक की कामना करता है, जिस-जिस वस्तु की सब उसे संकल्पमात्र से ही आ मिलता है । इस तरह उस-उससे मिलकर वहकामनाआनन्दितकरता है, वह होता है । (यहाँ दूसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * तृतीयः खण्डः त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषा सत्याना यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥1 ॥ सतामनृतमपिधानं
वे सत्य कामनाएँ अनृत ( असत्य) से ढँकी हुई हैं । उन ( ) ( ) पर असत्य अनृत का आवरण ढक्कन है । इसलिए कामनाओं के सत्य होते हुए भी उन है (मर जाता है ) वह इस लोक में फिर से देखने को नहींजो- जो उसका सम्बन्धी यहाँ से चला जाता से ही ऐसा होता है । अज्ञान के हट जाने से आत्मा की सर्वव्यापकतामिलता । ( अज्ञान के आवरण की वजह )अवस्था में कुछ भी अदृश्य नहीं रहता । प्रकाशित हो जाती है । इस
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अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 253 अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापिलभते सर्वं तदत्र हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेनहि प्रत्यूढाः ॥2 ॥
और अब वह यहाँ जिन जीवित या हुए मनुष्यों ( सम्बन्धियों को ) को देखना चाहता है, और कुछ वस्तुओं को भी देखना चाहता है, वह कुछ उसे मिलता नहीं है । वह सब तो उसी सकता है जो अपने हृदयाकाश के आत्मा को समझता हो । क्योंकि इस जगत् में वास्तविककोइच्छाएँमिल अनृत ( असत्य) से ढँकी हुई हैं । अतः जैसे धरती में गाड़े गए सोने के खजाने वाली भूमि पर चलकर भी उससे अनजान आदमी को वह प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार सुषुप्ति काल में हृदयाकाश ब्रह्म के स्थान में अज्ञानी लोग रोज ही आते- जाते हैं, फिर भी उस आत्मा को वे समझ नहीं नामकपाते । क्योंकि वे सभी अनृत ( असत्य ) के माध्यम से हरण कर लिए गए हैं । स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्त हृद्यमिति तस्माद्धृदय- महरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥3 ॥
ऐसा वह आत्मा हृदय में है । इसीलिए उसे ' हृद्यम्' (हृदि+ अयम् ) ऐसा व्युत्पत्तिलभ्य नाम दिया गया है । इसीलिए आत्मा हृदय में है - ऐसा समझना चाहिए । ऐसा समझनेवाला मनुष्य प्रति दिन आत्मा के पास जाता है । अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥4 ॥
जो यह शुद्ध बना हुआ आत्मा है ( सम्प्रसाद है ), वह इस शरीर में से ममता छोड़कर परम ज्योति को प्राप्त करके अपने मूल स्वरूप | अवस्थित हो जाता है । वह आत्मा है, वह अमृत है, वह अभय है, वही ब्रह्म है— ऐसा कहा जाता है और उसी ब्रह्म का नाम ‘ सत्य' है । तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्ग लोकमेति ॥ 5 ॥
इति तृतीयः खण्डः ॥। ‘ सत्य' ( सत्+ ती+ यम्) ये तीन अक्षर हैं । इनमें जो ' सत्' है वह अमर है, जो 'त् ( ती ) है वह नाश प्राप्त करनेवाला है और जो 'यम् है वह पूर्व के दोनों अक्षरों को अपने वश में लाता है । इसलिए उसको ‘ यम्' संज्ञा दी गई है । ऐसा समझनेवाला व्यक्ति प्रतिदिन आत्मा में जाता है ( अर्थात् प्रतिदिन हृदयस्थ आत्मा को प्राप्त करता है अथवा निःस्वप्न सुषुप्ति में वह प्रतिदिन आत्मानुभव करता है ) । ( यहाँ तीसरा खण्ड पूरा हुआ । ) * चतुर्थः खण्डः अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्भेदाय नैतः सेतुमहोरात्रे
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254 उपनिषत्सञ्चयनम् तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दृष्कृतः सर्वे पाप्मानोऽतो- निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥1 ॥
यह जो आत्मा है वह पृथ्वी आदि लोकों का संघर्ष ( विनाश) न हो, इसलिए उनको धारण करनेवाला सेतु है । इस सेतुरूप आत्मा को रात- दिन का समय अतिक्रमण नहीं कर सकता । उसको बुढ़ापा या मरण नहीं आ सकता । उसे शोक नहीं होता, पाप- पुण्य उसे स्पर्श नहीं कर सकते । सभी पाप उसे बिना स्पर्श किए ही वापिस लौट जाते हैं क्योंकि आत्मा निष्पाप और ब्रह्मरूप है । तस्माद्वा एत्र सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्यु- पतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतः सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभि- निष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥2 ॥
इसीलिए इस सेतुरूप आत्मा को पाकर अन्धा अन्धा नहीं रहता, घायल भी अच्छा हो जाता है, दुःखी भी सुखी हो जाता है, रोगी नीरोगी हो जाता है, इस आत्मा को पाकर विद्वान् के लिए रात भी दिन- सी हो जाती है । क्योंकि वह आत्मा सदैव प्रकाशमय है । तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषा सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥3 ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ तो जो लोग ब्रह्मचर्य से अर्थात् शास्त्र और आचार्य के अनुशासन से इस ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं, उन्हीं का यह ब्रह्मलोक है । ऐसे लोग अपनी इच्छानुसार सभी लोकों में जा सकते हैं । ( यहाँ चौथा खण्ड पूरा हुआ । ) * पञ्चमः खण्डः अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मान- मनुविन्दते ॥1 ॥
अब जो ' यज्ञ' कहा जाता है, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से जो आत्मा को जानता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है । जो ' इष्ट' कहा जाता है वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही आत्मा को जानने की इच्छा करके आत्मा को प्राप्त करते हैं । अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्म- नस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते ॥2 ॥
अब जो ‘ सत्रायण' ( साधु - संन्यासियों का पोषण) कहा जाता है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही ‘ सत्’ रूप आत्मा का त्राण (रक्षण ) होता है । जो 'मौन' कहा जाता है, ही है क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही आत्मा को समझकर मनुष्य उसका मनन करता है । वह भी ब्रह्मचर्य अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यतियं ब्रह्मचर्येणानुविन्दतेऽथयदरण्यायनमित्याचक्षतेब्रह्मवर्यमेवतत्तदरश्च ह
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अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 255 वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरंमदीय सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्बह्मणः प्रभुविमितश् हिरण्यम् ॥3 ॥
और जिसे ‘ अनाशकायन' (अनशन ) कहते हैं वह भी तो ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि साधक जिसे ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त करता है, उस आत्मा का नाश नहीं होता । और जिसे ' अरण्यायन' कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि उस ब्रह्मलोक में ' अर' और ' ण्य' ये दोनों प्रसिद्ध समुद्र हैं । यहाँ से तीसरे द्युलोक में वह “ ऐरंमदीयम्' नाम का एक सरोवर है । वहाँ ' सोमसवन' नाम का एक अश्वत्थ (पिप्पल ) का वृक्ष है । वहाँ ब्रह्मा की अपराजिता नाम की एक पुरी ( नगरी ) है । और वहाँ प्रभु के द्वारा बाँधा गया एक सोने का मण्डप है । तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाः सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥4 ॥
इति पञ्चमः खण्डः ॥ इस ब्रह्मलोक में जो लोग ' अर' और ' ण्य' नाम के दो सरोवरों को ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त करते हैं, उन्हीं का यह ब्रह्मलोक हो जाता है और सभी लोकों में उनका मुक्त आना- जाना हो जाता है । ( यहाँ पाँचवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * षष्ठः खण्डः अथ था एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥1 ॥
जो हृदय की ये नाड़ियाँ हैं, वे पिंगल वर्ण के सूक्ष्म रसवाली हैं । वे सफेद, नीले, पीले और लोहित वर्ण के सूक्ष्म रस से युक्त हैं । सूर्य में भी पिंगल, सफेद, नीला और लाल वर्ण होते ही हैं | तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥2 ॥
जैसे दो गाँवों के बीच से निकला हुआ एक बड़ा रास्ता उन दोनों गाँवों को जोड़ता है, उसी तरह सूर्य की किरणें भी सूर्यलोक को इस लोक के साथ जोड़ती हैं । सूर्य में से जो किरणें निकलतीसूर्य हैं, वे हृदय की इन नाड़ियों में समा जाती हैं और इन नाड़ियों में से जो किरणें निकलती हैं, वे में समा जाती हैं । यद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो ॥3 ॥ भवति तन्न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति
नहीं देखता, इस अवस्था में जब यह जीव सम्यक् प्रकार से निद्रा में पड़ जाता है और स्वप्न भी सूर्य के तेज तब उसे कोई भी पाप स्पर्श नहीं कर सकता क्योंकि उस समय वह नाड़ियों में स्थित के साथ मिला हुआ होता है ।
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256 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जा- नाति ॥4 ॥
(रोग आदि से ) जब मनुष्य दुर्बल हो जाता है, तब उसके आस- पास बैठे हुए सगे- सम्बन्धी उससे पूछते हैं कि— “ मुझे पहचानते हो क्या? मुझे जानते हो क्या? " जब तक इस शरीर से जीव निकल गया नहीं होता, तब तक तो वह सभी को पहचानता है । अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥5 ॥
परन्तु जब जीव इस शरीर में से निकल जाता है, तब सूर्य की इन किरणों के द्वारा ही वह ऊर्ध्व की ओर जाता है और ‘ ओम्' बोलते हुए ऊर्ध्व गति को प्राप्त करता है अथवा अधोलोक में जाता है । जितने समय में मन पहुँचता है, उतने समय में वह आदित्यलोक ( सूर्य ) में जा पहुँचता है । यह सूर्य ब्रह्मलोक का प्रवेशद्वार है । उसमें विद्वान् और ज्ञानी ही प्रवेश कर सकते हैं । अज्ञानी लोग वहाँ नहीं जा सकते । तदेष श्लोकः-
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिः सृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमेण भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥6 ॥
इति षष्ठः खण्डः ॥
यहाँ यह श्लोक है— “हृदय में एक सौ और एक नाड़ियाँ हैं उनमें से ( सुषुम्णा नाम की ) एक नाड़ी मस्तक की ओर जाती है । ज्ञानी आत्मा उस नाड़ी से ऊपर आरूढ़ होकर अमरत्व को प्राप्त होता है । हृदय में से चारों ओर निकलती हुई अन्य नाड़ियाँ तो केवल शरीर से बाहर निकलने के लिए ही हैं । ( अर्थात् इन नाड़ियों से यदि जीव बाहर जाता है, तो उसे मोक्ष नहीं मिलता । ) ( यहाँ छठा खण्ड पूरा हुआ ।) * सप्तमः खण्डः य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥1 ॥
जो यह आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युरहित, शोकरहित, क्षुधापिपासारहित वाला और सत्यसंकल्पवाला है, उसे खोजना चाहिए, उसे ठीक तरह से जानने, सत्यकामना-चाहिए । कुछ लोग इस आत्मा को समझकर उसका अनुभव करते हैं, वे सभी लोकोंकी मेंइच्छा करनीहैं और उसकी सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं- ऐसा प्रजापति ने कहा । जा सकते तद्धोभये देवाऽसुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामानितीन्द्रोहैव
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अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 257 देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥2 ॥
उनकी यह बात देवताओं और असुरों ने परम्परा से जान लीं । फिर उन्होंने सोचा कि जिसे समझने से सभी लोकों में जाया जा सकता है, सभी कामनाएँ पूरी की जा सकती हैं, उस आत्मा को हमें खोजना चाहिए | बाद में देवों में से इन्द्र और असुरों में से विरोचन– ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए ही अलग- अलग हाथ में समिध लेकर प्रजापति के पास गए । तौ ह द्वात्रिशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छ- न्ताववास्तमिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशो- कोsविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान्यस्त- मात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ता- ववास्तमिति ॥3 ॥
उन दोनों ने बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वहाँ वास किया । तब प्रजापति ने उनसे पूछा-— “तुम यहाँ किस इच्छा से रहे हो? ” तब उन दोनों ने कहा कि–“ आत्मा पापरहित, जरारहित, शोकरहित, क्षुधारहित, प्यासरहित, सत्य कामनाओं वाला, सत्य संकल्पवाला है अत: उसे खोजना चाहिए, उसे ठीक तरह से जानने की इच्छा करनी चाहिए । जो कोई भी मनुष्य इस आत्मा को ठीक तरह से समझ लेता है, वह सभी लोकों को प्राप्त कर लेता है, अपनी सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकता है । आपके ऐसे वचन को विद्वज्जन श्रेष्ठ कहते हैं । तो उस आत्मा को समझने के लिए हमने यहाँ वास किया हैं । तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवा- चैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चाय- मादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यात इति होवाच ॥4 ॥
इति सप्तमः खण्डः ॥ तब प्रजापति ने उनसे कहा- "आँख में जो यह पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है । ” और आगे भी कहा कि— ‘“ यह अमर है, निर्भय है, और वही ब्रह्म है । " तब वे दोनों अज्ञानी होने से ऐसा समझे कि आँख में सामनेवाले मनुष्य का जो मुख ( मुँह) दिखाई पड़ता है, वही आत्मा है । इसलिएहै, उन्होंने पूछा कि— “ हे भगवन्! पानी में देखने से जो दिखाई पड़ता है, जो दर्पण में दिखाई देता उनमें से आपका कहा हुआ आत्मा किसमें है? कौन है? " तब प्रजापति ने कहा– “ वही आत्मा सभी लोगों में सर्वरूप से ( समरूप से) रहता है । " ( यहाँ सातवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * अष्टमः खण्डः तौ उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमितितौ होचतुः होदशरावेऽवेक्षांचक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथेतिआनखेभ्यः प्रति- सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आलोमभ्य रूपमिति ॥1 ॥
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258 उपनिषत्सञ्चयनम् प्रजापति ने कहा— “जल से भरे हुए शराव में अपने को देखकर, आत्मा के बारे में जो कुछ तुम न जान सको, वह मुझे कह दिखाओ ।” अतः दोनों ने जल से भरे शराव में देखा तब प्रजापति ने उनसे पूछा— ‘“तुम क्या देखते हो तुम? तब वे दोनों बोले– “हे भगवन् । हम पूरे आत्मा को इसमें देखते हैं— सर के बाल से पैर के नखों तक पूर्ण आत्मा को देखते हैं । " तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽ- क्षेथामिति तौ ह साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षां- चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ 2 ॥
प्रजापति बोले— “ तुम अच्छे गहने पहनकर, अच्छे कपड़े पहनकर सज- धजकर पानी से भरे. शराव में अपने को देखो । ” तब वे अच्छे गहने पहनकर, अच्छे कपड़े पहनककर सज- धजकर पानी से भरे शराव में स्वयं को देखने लगे । तब प्रजापति ने उनसे पूछा- " क्या देखते हो? ” तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ च एवमेवेमौ भगवः साध्वलंकृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥3 ॥
तब उन दोनों ने कहा— “ हे भगवन्! जैसे ही हम अच्छे गहने पहने हुए, अच्छे वस्त्र पहने हुए सजे - धजे हैं, वैसे ही अच्छी तरह से अलंकृत, अच्छे वस्त्र पहने हुए सजे- धजे इसमें भी दिखाई देते हैं । " तब प्रजापति बोले- " वही आत्मा है, वही निर्भय है, वही अमर है और वही ब्रह्म है । " तब शान्त हृदय होकर वे दोनों चले गये । तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एत- दुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्त- हृदय एव विरोचनोऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाव- वाप्नोतीमं चामुं चेति ॥4 ॥
उन दोनों को जाते हुए देखकर प्रजापति कहने लगे– “ आत्मा को बिना जाने और बिना समझे ही ये दोनों जा रहे हैं । इनमें से जो ( शरीर ही आत्मा है ) ऐसा निश्चयवाले होंगे वे देव या असुर-कोई भी पराभव को प्राप्त करेंगे । ” विरोचन तो सन्तुष्ट होकर असुरों के पास चला गया और उसने सबको इस प्रकार ज्ञान का उपदेश किया— “देह ही आत्मा है इसलिए उसी को पूजना चाहिए, उसी ( देहरूप ) आत्मा की सेवा करनी चाहिए । इस जगत् में देहात्मा की पूजा- सेवा करके ही "लोक को और परलोक को प्राप्त कर सकता है । मनुष्य इस तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषो- पनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालंकारेणेति सस्कुर्वन्त्येतेन लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥5 ॥ ह्यमुं
इत्यष्टमः खण्डः ॥ इसीलिए आज भी इस जगत् में दान न करनेवाले को, श्रद्धा से रहित वाले को लोग कहते हैं कि “ यह असुर है । ” क्योंकि असुरों का ज्ञान ऐसा ही कोहोताऔरहै यज्ञ न करने । वे लोग मरे