Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 301–310
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 301–310
पृष्ठ 301
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 259 हुओं के शरीर को ( सुगन्ध- पुष्पमाला- अन्नादि) भिक्षा से और गहनों से सजाते हैं और मानते हैं कि इससे वे स्वर्गलोक को प्राप्त करेंगे । ( यहाँ आठवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * नवमः खण्डः अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श यथैव खल्वयस्मिञ्छरीरे साध्व- लंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमे- वायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति त्रामे स्वामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥1 ॥
परन्तु, इन्द्र को तो देवताओं के पास जाने से पहले ही यह भय दिखाई दिया अर्थात् यह शंका हुई कि—जिस तरह इस शरीर को अच्छी तरह से अलंकृत ( शोभायमान ) करने से यह छायात्मा अच्छी तरह से शोभित होता है, उसे अच्छे कपड़े पहनाने से अच्छे वस्त्रवाला दिखाई पड़ता है, सजाने से सजा हुआ दीखता है, ठीक इसी प्रकार यह देह अन्धा होने पर इस छाया में भी ( छायात्मा भी ) अन्धा ही दिखाई देता है । देह के क्षीण होने से छायात्मा भी क्षीण दीखता है, कटे हुए हाथ - पैर से छायात्मा के हाथ - पैर भी कटे हुए दिखाई देते हैं । और इस शरीर के नाश होने से छायात्मा का भी नाश हो जाता है । इसलिए शरीररूप आत्मा के ऐसे छायारूप ज्ञान से कोई फल मिलेगा, ऐसा मुझे नहीं लगता । स समित्पाणिः पुनरेयाय त ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते साध्वलंकृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्त्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥2 ॥
वह इन्द्र हाथ में समिधा लेकर फिर प्रजापति के पास आया । प्रजापति ने उससे पूछा— “हे इन्द्र! विरोचन के साथ शान्तचित्त होकर के ही तुम गए थे । अब किस इच्छा से तुम फिर से यहाँ आए हो? ” तब वह (इन्द्र) बोला- “ हे भगवन्! जिस प्रकार यह छायात्मा इस शरीर को अच्छी तरह से विभूषित करने से अच्छी तरह से वह छायात्मा भी विभूषित हो जाता है, शरीर को अच्छे वस्त्र पहनाने से वह छायात्मा भी अच्छे वस्त्रों वाला हो जाता है और शरीर को सजाने - धजाने से वह सजा- धजा हो जाता है ठीक उसी प्रकार शरीर के अन्ध होने से वह छायात्मा भी अन्ध हो जाता है, शरीरभी के क्षीण होने पर वह छायात्मा भी क्षीण हो जाता है, शरीर के हाथ- पैर कट जाने से छायात्माहै । मैं कटे हाथ- पैर वाला हो जाता है, और शरीर के नाश होने पर यह छायात्मा भी नष्ट हो जाता तो उसमें कोई फल नहीं देखता । " एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणितस्मै द्वात्रिश्शतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिशतं वर्षाण्युवास होवाच ॥3 ॥
इति नवमः खण्डः ॥
पृष्ठ 302
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
260 उपनिषत्सञ्चयनम् तब प्रजापति ने कहा— “हे इन्द्र! वह ऐसा ही है । मैं तुम्हें फिर से समझाऊँगा । तुम बत्तीस वर्ष यहाँ रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करो । उसने और भी बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वहाँ वास किया फिर प्रजापति ने उससे कहा— ( यहाँ नौवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * दशमः खण्डः यएष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श तद्यद्यपीद शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्त्राममस्त्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥1 ॥
“ जो यह स्वप्न में महिमावान होकर विचरण करता है, वह आत्मा है " प्रजापति ने ऐसा कहकर और आगे कहा— “वही अमृत है, वही अभय है, वही ब्रह्म है ।" तब वह शान्तचित्त होकर चला गया, पर देवों के पास जाने से पहले ही उसको भय दिखाई दिया ( मन में शंका हुई कि- ) यह शरीर अन्धा होने पर भी स्वप्न पुरुष तो सब देखने वाला होता है! शरीर के क्षीण होने पर भी स्वप्नस्थ आत्मा तो क्षीण नहीं दीखता । शरीर के दोषों से स्वरूपस्थ आत्मा दूषित नहीं होता । न वधेनास्य हन्यते नास्य स्राम्येण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्ती- वाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ 2 ॥
“ इस देह के वध से उसका वध नहीं होता । शरीर की पंगुता से उसकी पंगुता नहीं होती । फिर भी मानो उसे कोई मारता हो, मानो कोई चीरता हो, मानो कोई उसका नाश कर रहा हो, मानो किसी अप्रिय का अनुभव कर रहा हो, मानो रो रहा हो ऐसा लगता है । ऐसे आत्मा के ज्ञान से मैं कोई फल नहीं देख रहा हूँ । ” स समित्पाणिः पुनरेयाय । त ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्त्राममस्त्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥3 ॥
फिर वह इन्द्र हाथ में समिधा लेकर प्रजापति के पास आया । तब प्रजापति ने उससे “हे इन्द्र! पहले जो तुम शान्तचित्त से सन्तुष्ट होकर गए थे, तो किस इच्छा से फिर आए पूछा- ( ) - "!,? ”तब उसने इन्द्र ने कहा हे भगवन् यद्यपि यह शरीर अन्ध होता है तो होनहीं होता । यद्यपि यह देह पंगु होता है तो भी वह (आत्मा) पंगु नहीं होता । भीइसवहशरीर( आत्माके )दोषअन्धसे आत्मा दूषित होता ही नहीं । और— न वधेनास्य हन्यते नास्य स्त्राम्येण स्त्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं वाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं विच्छादयन्ती- मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामिपश्यामीत्येवमेवैष द्वात्रिशतं वर्षाणीति स हाऽपराणि द्वात्रिंशतं वसाऽपराणि होवाच ॥4 ॥ वर्षाण्युवास तस्मै
इति दशमः खण्डः ॥
पृष्ठ 303
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 261 देह के वध से भी वह नष्ट नहीं होता । इस ( देह ) की पंगुता से वह पंगु नहीं हो जाता भी मानो उस आत्मा को कोई मारता हो, कोई पीटता हो, मानो वह अप्रिय का अनुभव करता। फिर मानो वह रोता हो, ऐसा लगता है । मैं तो ऐसे आत्मज्ञान में कोई फल नहीं देख रहा हूँ । ” इन्द्रहोके, ऐसा कहने पर प्रजापति ने कहा- "हे इन्द्र! वह ऐसा ही है । मैं तुम्हें फिर उपदेश दूँगा । और बत्तीस वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए यहाँ रहो । अत: वह (इन्द्र) और बत्तीस वर्ष वहाँ रहा । बाद में प्रजापति बोले- ( यहाँ दसवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) * एकादश: खण्ड: तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाहं खल्वयमेवः सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमह- मस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥1 ॥
“ उस अवस्था में जब यह सुप्तिमय जीव सोया हुआ होता है, दर्शनरहित, बहुत आनन्दित होकर स्वप्न भी नहीं देखता, वही आत्मा है, वही अमृत है, वही अभय है, वही ब्रह्म है । ” प्रजापति के ऐसा कहने पर इन्द्र शान्तहृदय होकर चला गया । परन्तु, देवों के पास जाने के पहले ही उसके मन में भय ( शंका ) उत्पन्न हुआ कि सुषुप्ति में रहा हुआ यह आत्मा भी इस अवस्था में अपने को “ मैं हूँ" इस प्रकार नहीं जानता है । और अन्य प्राणियों एवं पदार्थों को भी नहीं जानता है । मानो वह विनाश को ही प्राप्त हो जाता है । ऐसे आत्मा के ज्ञान से मैं कोई लाभ नहीं देखता । स समित्पाणिः पुररेयाय । तः ह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिञ्छन्पुनरागम इति स होवाच नाहं खल्वयं भगव एवञ् सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्तीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवा- पीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥2 ॥
फिर से वह ( इन्द्र ) हाथ में समिधा लिए आया । प्रजापति ने उससे पूछा– “ हे इन्द्र, पहले यहीं से तुम सन्तुष्ट- हृदय होकर गए थे, अब कौन -सी इच्छा से फिर से आए हो? ” तब इन्द्र बोला— “हे भगवन्! सुषुप्ति में रहा हुआ आत्मा इस अवस्था में अपने आपको इस तरह नहीं जानता कि ‘ यह मैं हूँ । ' और इन प्राणियों एवं पदार्थों को भी नहीं जानता । मानो वह नाश प्राप्त करता हुआ मालूम पड़ रहा है । ऐसे आत्मा के ज्ञान से मैं कोई लाभ नहीं देखता । " एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवा- न्यत्रैतस्माद्वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास । तान्येकशतं संपेदुरेतत्तद्यदाहुरेकशतः ह वै वर्षाणि मघवान्प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै होवाच ॥3 ॥
इत्येकादशः खण्डः ॥ अधिक प्रजापति बोले— “हे इन्द्र! यह ऐसी ही बात है । इस आत्मा के विषय में मैं तुम्हें फिर रहो । ” उपदेश दूँगा । उस आत्मा से भिन्न कोई दूसरा आत्मा नहीं है । तुम और भी पाँच वर्ष तक यहाँ
पृष्ठ 304
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
262 उपनिषत्सञ्चयनम् इन्द्र और भी पाँच वर्ष तक यहाँ रहे । इस प्रकार सब मिलकर एक सौ और एक वर्ष तक इन्द्र प्रजापति के यहाँ ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रहे । तब प्रजापति बोले— ( यहाँ ग्यारहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) * द्वादश: खण्ड: मघवन्मर्त्यं वा इद’शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्यात्मनो- ऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥1 ॥
“हे इन्द्र! यह शरीर मरणशील ही है, मृत्यु से ग्रसित ही है । यह शरीर अमर और अशरीरी आत्मा का अधिष्ठान है (निवासस्थान है ) । सशरीर आत्मा तो अवश्य प्रिय और अप्रिय से ग्रस्त जहाँ तक आत्मा शरीर में रहता है, वहाँ तक तो उसके प्रिय और अप्रिय का नाश नहीं हो सकता 1। पर जब वह शरीररहित होता है, तब प्रिय या अप्रिय उसका स्पर्श नहीं कर सकते । अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथैतान्यमुष्मादा- काशात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥2 ॥
पवन देहरहित है । बादल, बिजली गड़गड़ाहट - सभी शरीररहित हैं । जिस प्रकार ये सब आकाश में से निकल कर परम तेज को पाकर अपने- अपने रूप में दिखाई पड़ते हैं- एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते । स उत्तमः पुरुषः स तत्र पर्येति जक्षत्क्रीडन्रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनः स्मरन्निदः शरीर स यथा प्रयोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥३ ॥
उसी प्रकार सुप्रसन्न ज्ञानी जीव, इस शरीर से उठकर परंज्योति (विश्वात्मा ) को प्राप्त करके अपने रूप में प्रकाशित हो उठता है । वह उत्तम पुरुष है । वह उस अवस्था में हँसता, खाता, खेलता,, - -, के साथ वाहनों के साथ सगे सम्बन्धियों के साथ आनन्द प्रमोद करता हुआ भी परम स्त्रियों होजैसेजाताबैल हैया। अपनेघोड़े जोड़ेसाथ जातेउत्पन्नहैंहुए, इसीशरीरतरहकाइसतो उसेशरीरस्मरणके साथतकप्राणनहीं होताजुड़े हुए। रथ को खींचनेआत्मा केमें लिएलीन, ओर विचरण करता है । हैं जिससे वह चारों अथ यत्रैतदाकाशमनुविषष्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहरा-दर्शनाय चक्षुरथ णीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदः श्रवणाय श्रोत्रम् ॥4 ॥ शृणवानीति स आत्मा
अब जिस नेत्रगोलक में नेत्रेन्द्रिय है उस इन्द्रियस्थ आत्मा ( ' 'उसे देखने के लिए आँख है चक्षु के अधिष्ठाता देव को चाक्षुष आत्मा कहा जाता है । है ) और जो “मैं सूँघता हूँ” – ऐसा जानता है, वह आत्मरूपआत्मा है, उसे देखने के उपकरणरूप आँख सूँघता है, वह गन्ध का उपकरण घ्राणेन्द्रिय है । इसी तरह है, और जिस उपकरण के द्वारा आत्मा " ” हूँ आत्मा” वहहै आत्माऔर जिसहै, उपकरणऔर जिससे उपकरणवह आत्मासे बोलतावह सुनताहै, वहहै वागिन्द्रियजो कहताहै है। जोकि कहतामैं बोलताहै कि "हूँमैं। सुनतावह वह श्रोत्रेन्द्रिय है ।
पृष्ठ 305
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः ] छान्दोग्योपनिषत् ( 9 ) 263 अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते य एते ब्रह्मलोके ॥5 ॥
“ मैं सोचता हूँ” – ऐसा जो कहता ( मानता) है, वह आत्मा है । उसके सोचने के उपकरण को मन कहा जाता है | मन आत्मा का दिव्य नेत्र है । ज्ञानी आत्मा मनरूपी दैवी आँख से सब सुखों को जो कि ब्रह्मलोक में होते हैं, समझकर आनन्द लेता है । तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात्तेषाः सर्वे च लोका आत्ताः सर्वे च कामाः स सर्वाश्च लोकानाप्नोति सर्वाश्च कामान्यस्तमात्मान- मनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥6 ॥
इति द्वादश: खण्ड: ॥ “ जो भोग ब्रह्मलोक में हैं, उन्हें देखते- खेलते हुए इस आत्मा की देवलोग भी उपासना करते हैं । इसीलिए इस आत्मा को सभी लोक और सभी भोग प्राप्त ही हैं । जो मनुष्य आत्मा को शास्त्र और आचार्य के उपदेश द्वारा अच्छी तरह से जान लेता है अर्थात् अनुभव कर लेता है, वह सभी लोकों को प्राप्त कर लेता है । उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं " - ऐसा प्रजापति ने कहा, ऐसा प्रजापति ने कहा । ( यहाँ बारहवाँ खण्ड पूरा हुआ) * त्रयोदशः खण्डः श्यामच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात्प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभि- सम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥1 ॥
इति त्रयोदशः खण्डः ॥ श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्म से मैं शबल ब्रह्म (ब्रह्मलोक ) को प्राप्त होऊँ, और शबलब्रह्म रोंगटों( ब्रह्मलोकऔर) से मैं श्याम ( हृदयस्थ) ब्रह्म को प्राप्त होऊँ । जिस तरह अश्व अपने शरीर को कँपाकर धूल को झाड़ देता है, वैसे ही मैं ज्ञान से सभी पापों को झाड़ दूँ । जैसे चन्द्र राहु के मुख से छूटता है, वैसे ही मैं शरीर से छूटकर कृतकृत्य होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करूँ । (यहाँ तेरहवाँ खण्ड पूरा हुआ । ) चतुर्दशः खण्डः आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता । ते यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतः स यशो आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्येतमदत्क- मदत्कः श्येतं लिन्दु माभिगां लिन्दु माभिगाम् ॥1 ॥
इति चतुर्दशः खण्डः ॥ जिसके अन्तर्गत हैं, वह आकाश नामक आत्मा नाम और रूप का निर्वाहक है । नामको औरप्राप्तरूपकरता हूँ । मैं यशोनामधारी ब्रह्म है, वही अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापति के सभागृह
पृष्ठ 306
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
264 उपनिषत्सञ्चयनम् आत्मा हूँ । मैं ब्राह्मणों के यशोरूप, क्षत्रियों के यशोरूप, वैश्यों के यशोरूप आत्मा को प्राप्त होना चाहता हूँ । वह मैं यशों का भी यश हूँ । पक्व बेर जैसे लाल, दाँत न होने पर भी खाने वाले दन्तरहित चिकने 'स्त्रीचिह्न को ( स्त्री के गर्भ को ) मैं कभी प्राप्त न होऊँ । ( यहाँ चौदहवाँ खण्ड पूरा हुआ) * पञ्चदश: खण्ड: तद्वैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्य आचार्य- कुलाद्वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषेणाभिसमावृत्य कुटुम्बे शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान्विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिःसन् त्सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन्या- वदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥1 ॥
इति पञ्चदशः खण्डः ॥ इति छान्दोग्योपनिषदि अष्टमोऽध्यायः ॥8 ॥
इति छान्दोग्योपनिषत्समाप्ता ॥ I यह आत्मज्ञान ब्रह्मा ने प्रजापति को सुनाया । प्रजापति ने मनु को और मनु ने प्रजाओं को सुनाया । आचार्य से वेद का अध्ययन करके, नियमानुसार गुरु के काम करके शेष समय में करके, गुरुकुल से निवृत्त होकर, समावर्तन संस्कार प्राप्त करके, कुटुम्ब में स्थिर होकर, स्वाध्यायमें स्वाध्याय करते रहकर, पुत्रों-शिष्यों को धार्मिक बनाकर, सभी इन्द्रियों को अन्त: पवित्र स्थान,,करकेब्रह्मलोकशास्त्राज्ञाको प्राप्तसे करताअतिरिक्तहै । औरहिंसाफिरन करकेसे वह जहाँ(यहाँतकजगत्आयुष्यमें) वापिसहो वहाँनहींतकआताइसी करणप्रकार मेंसेस्थापितरहकरवापस नहीं लौटता ॥ वह बाद में कभी ( यहाँ पंद्रहवाँ खण्ड पूरा हुआ ।) यहाँ छान्दोग्योपनिषद् में आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ । इस प्रकार छान्दोग्योपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो सर्वाणिनिराकरणमस्त्वनिराकरणंसर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहंमेऽस्तुब्रह्म तदात्मनिनिराकुर्यां मा माबलमिन्द्रियाणिब्रह्म निराकरोद-च धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः निरते य उपनिषत्सु शान्तिः शान्तिः ॥
पृष्ठ 307
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( 10 ) बृहदारण्यकोपनिषत् ( उपनिषत्परिचय ) बृहदारण्यकोपनिषद् अपने नाम से ही सूचित करती है कि यह उपनिषद् एक बड़ी ( बृहद् = बड़ी लंबी ) उपनिषद् है । यह उपनिषद् शुक्लयजुर्वेद के अन्तर्गत सुप्रसिद्ध शतपथ ब्राह्मण का ही एक भाग है । शतपथब्राह्मण की दो वाचनाएँ हैं । एक काण्वशाखीय वाचना है और दूसरी माध्यन्दिन शाखीय वाचना है । कण्वशाखा की वाचना के सत्रह काण्ड हैं और माध्यन्दिन शाखा के केवल चौदह हैं । शतपथब्राह्मण की सत्रह काण्डोंवाली काण्वशाखीय वाचना के तीन से आठ अध्याय - कुल छः अध्याय ही यह ' बृहदारण्यक उपनिषद्' है और शतपथब्राह्मण की चौदह काण्ड वाली माध्यन्दिन शाखा वाली वाचना के चार से नौ काण्ड (कुल छः काण्ड ) ही यह बृहदारण्यक उपनिषद् है । अतः इस उपनिषद् के छ: अध्याय हैं । अध्यायों को 'खण्डों' या 'ब्राह्मणों' में विभाजित किया गया है । और उन खण्डों या ब्राह्मणों को भी ' कण्डिकाओं' में विभाजित किया गया है । कण्डिकाओं की समानता मन्त्रों से की जा सकती है । इस उपनिषद् में ऐसी 435 कण्डिकाएँ हैं, 47 ब्राह्मण या खण्ड हैं और छ: अध्याय हैं । इस उपनिषद् के विभागीकरण का एक दूसरा भी प्रकार है । पहले दो अध्यायों वाले एक विभाग को ‘ मधुकाण्ड' कहा गया है । बीच के दो अध्यायों ( 3 और 4 अध्यायों) को ‘ मुनिकाण्ड ’ कहा जाता है । 'मुनिकाण्ड ' को ' याज्ञवल्क्य काण्ड' भी कहते हैं । अन्तिम दो अध्यायों को ( 5 और 6 को ) 'खिलकाण्ड' कहा गया है । ये तीन काण्ड क्रमशः उपदेश, उपपत्ति और उपासना के तीन विषयों का विश्लेषण करते हैं । इन तीनों काण्डों में मुनिकाण्ड अथवा याज्ञवल्क्यकाण्ड अत्यंत महत्त्व का है । उसमें इस उपनिषद् की कण्डिकाओं में से आधी संख्या में कण्डिकाएँ शामिल हो जाती हैं । ऋषि याज्ञवल्क्य इस काण्ड के प्रधान वक्ता हैं । इन्होंने इसमें आत्मा का (ब्रह्म का ) तत्त्वज्ञान बड़ी ही ओजस्विता से निरूपित किया है । और ब्रह्म या आत्मा सम्बन्धी अनेकानेक आनुषंगिक विषयों पर भी अपने उपदेशों में उनका सूक्ष्म निरूपण किया है | किसी भी युग के विश्व के महान् चिन्तकों में मुनि याज्ञवल्क्य को सहज ही उच्च आसन प्राप्त है । यज्ञीय अश्व के अवयवों प्रथम अध्याय में छ: ब्राह्मण हैं । आरंभ के अश्वमेध ब्राह्मण में में विराट् के अवयवों की ृष्ट बताई है । आगे जाकर प्रजापति के दोनों पुत्रोंका–रोचकदेवों औररूपकअसुरोंहै । का विग्रह बताया है । ये देव और असुर इन्द्रियों की शुभाशुभ वृत्तियों उदात्त चित्तवालों की दूसरे अध्याय के गर्विष्ठ बालाकि और तत्त्वज्ञानी अजातशत्रु के देतीसंवादहै द्वारा। इसी अध्याय के चौथे ब्राह्मणगुणग्राहितामें याज्ञवल्क्यबताई है । औरइसमेंमैत्रेयीब्रह्मज्ञानका संवादकी महत्ताहै । यहभी दिखाईसंवाद सुप्रसिद्ध। हैउसने। ब्रह्मवादिनीअपनी पूरीमैत्रेयीपूँजीने याज्ञवल्क्य की भौतिक पूँजी छोड़कर आत्मज्ञानी बनना चाहा
पृष्ठ 308
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
266 उपनिषत्सञ्चयनम् याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी कात्यायनी को दे दी । इसके बाद आने वाला मधुब्राह्मण है । यहाँ ‘मधु’ का अर्थ, ‘ उपकार्य = उपकारकभाव ' होता है । इस ब्राह्मण में अधिष्ठान- दृष्टि से संपूर्ण प्रपंच ब्रह्मरूपता निरूपित है । आत्मतत्त्व अपनी एक ही मायाशक्ति से अनेक रूप धारण करके क्रीड़ा करता है — यह बात 'इन्द्रो मायाभि: ' इत्यादि श्रुति से कही गई है । इसके बाद के दो अध्याय मुनिकाण्ड या याज्ञवल्क्य काण्ड के हैं । आरंभ के तीसरे अध्याय में जनक के यज्ञ का प्रसंग है । "यज्ञ में आए हुए विद्वानों में से सबसे बड़ा ज्ञानी ही गोशाला से सुवर्णमण्डित गायों को ले जाए” –जनक की ऐसी घोषणा थी, तब उपस्थित विद्वानों में से कोई भी अपने आपको सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी न मान सका । अतः याज्ञवल्क्य ने उन गायों को अपने आश्रम में शिष्य के द्वारा ले जाने का आदेश दिया । इस पर अन्य ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे । उन्होंने याज्ञवल्क्य से अनेकानेक ब्रह्मपरक प्रश्न पूछे और याज्ञवल्क्य ने उनका परितोषजनक उत्तर भी दिया । अन्त में ब्रह्मवादिनी गार्गी ने कारणमाला पूछी । जब गार्गी ने ब्रह्म का कारण पूछा, तब याज्ञवल्क्य बोले – यह अतिप्रश्न है । निःसंदिग्ध वस्तु में सन्देह तो अपराध ही है । ऐसा अपराध करने से शाकल्य का सिर कट गया था । फिर याज्ञवल्क्य ने भी ब्राह्मणों से अनेक प्रश्न पूछे, पर कोई किसी भी प्रश्न का उत्तर न दे सका । याज्ञवल्क्य की विजय के साथ यह अध्याय समाप्त होता है । चौथा अध्याय जनक - याज्ञवल्क्य संवाद से शुरू होता है । इसमें याज्ञवल्क्य वाक्, प्राण आदि के स्थान को बताकर उनकी उपासना और उपासना का फल बताते हैं । उन उपासनाओं को ही जीवन का परमलक्ष्य समझकर जनक ने याज्ञवल्क्य को हजार गायें दान में देना चाहा । पर शिष्य का श्रेय चाहनेवाले याज्ञवल्क्य ने बाद के ब्राह्मण में परमात्मा स्वरूप का उपदेश दिया और विराट् स्वरूप की सर्वव्यापी निर्गुण के साथ एकरूपताकेबताईविराट्। तब कृतकृत्य जनक ने अपने आपको तथा समस्त राज्य को गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर दिया । इस अध्याय के तीसरे और चौथे ब्राह्मण में प्रश्नोत्तर के रूप में वर्णन है । आत्मा के ज्योतिरूप का निर्णय किया गया है । पाँचवें ब्राह्मणआत्मतत्त्व का विस्तृत संवाद है और छठे ब्राह्मण में आचार्य परंपरा के उल्लेख के बाद मुनिकाण्डमें याज्ञवल्क्यसमाप्त - मैत्रेयी होता है । पाँचवें अध्याय से खिलकाण्ड का प्रारंभ होता है । इसमें कई (, वर्णित हैं । प्रजापति की तीन सन्तानें देव असुर और मनुष्य प्रकार की उपासनाएँ करने के लिए जाते हैं । प्रजापति तीनों को एक वर्ण ' द' का ) प्रजापति के पास ज्ञान प्राप्त अक्षर से तीनों को अपने- अपने योग्य उपदेश मिल जाता है उपदेश देते हैं । इस एक ही इन्द्रियदमन समझ लेते हैं, क्रूर प्रकृति वाले असुर 'द' का अर्थ। भोगप्रधान देव 'द' का अर्थ अर्थलोलुप मनुष्य द का अर्थ लेते हैं । तीनों समझ लेते हैं और अतिरिक्त और कई' प्रकार' की उपासनाएँ' दान' समझदी गई हैं । कृतकृत्य' दया' हो जाते हैं । इसके छठें अध्याय के प्रथम ब्राह्मण में इन्द्रियों के विवाद बताई गई है । दूसरे में श्वेतकेतु तथा उसके के माध्यम से प्राण की श्रेष्ठता की दी हुई पंचाग्निविद्या का वर्णन है ( छान्दोग्योपनिषद्पिता आरुणि को पांचाल देश के राजा प्रवाहण में भी यह वर्णन आता है ) । बाद के
पृष्ठ 309
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 267 तीसरे और चौथे ब्राह्मण में श्रीमन्थ और पुत्रमन्थ कर्मों का वर्णन है । ये दोनों कर्म परस्पर जुड़े हु हैं । और पाँचवें ब्राह्मण में आचार्यपरंपरा है । यहाँ उपनिषद् की समाप्ति होती है । शान्तिपाठः
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
वह ( परमात्मा ) पूर्ण है, और यह ( कार्य ब्रह्म - जगत्) भी पूर्ण ही है । क्योंकि पूर्ण में से ही •पूर्ण की उत्पत्ति होती है । तथा (प्रलयकाल में ) पूर्ण का अर्थात् कार्यब्रह्मरूप जगत् का पूर्णत्व लेकर केवल परब्रह्म ( कारण ब्रह्म) ही शेष रहता है । ॐ त्रिविध तापों की शान्ति हो । अथ प्रथमोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् [ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृभ्यो वंश ऋषिभ्यो नमो गुरुभ्यः ॥ ] ब्रह्मविद्या- सम्प्रदाय के प्रवर्तक वंश ब्राह्मणोक्त गुरुपरम्परा ब्रह्मादि गुरुजनों को नमस्कार हो । ॐ उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्नि- र्वैश्वानरः संवत्सर आत्माश्वस्य मेध्यस्य । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यम् । दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्ध-। मासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो मासानि ऊवध्य:सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमानि उद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचञ्जघनार्धो तद्विजृम्भते यद्वि- द्योतते यद्विधनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥1 ॥
उषा (ब्राह्म मुहूर्त्त) ही मेध्य अश्व ( यज्ञीय मेधार्ह अश्व ) का मस्तक है । सूर्य, द्युलोकनेत्र है,उसकीवायु प्राणपीठ है, वैश्वानर अग्नि उसका खुला हुआ मुख है, संवत्सर ही मेध्य अश्व का आत्मा है ( अवान्तर) दिशाएँ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथ्वी पैर रखने का स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, ईशानादि- रात उसके पैर हैं, नक्षत्र उसकी पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अवयव हैं, मास और अर्धमास सन्धियाँपचाहैं,हुआदिन) अन्न है, नदियाँ नाडियाँ हड्डियाँ हैं, आकाशस्थ मेघ मांस है, रेती उसका उदरस्थ ( आधाहुए दो मांसखण्ड) हैं, औषधियाँ और, ( - हैं पर्वत यकृत और क्लोम हृदय की दाँई बाँई ओर आए का पूर्वार्धं उसका नाभि के ऊपर वनस्पतियाँ उसके केश और रोंगटे हैं, सूर्योदय से लेकर मध्याह्नकातकउत्तरभाग उसकी कमर के नीचे का का भाग है, मध्याह्न के बाद अस्त की ओर जाता हुआ दिनउसके शरीर की हलचल है, वर्षा उसका भाग है, बिजली का चमकना उसकी जम्भाई है, मेघगर्जना मूत्रत्याग है, शब्द -घोष ही उसकी वाणी है ।
पृष्ठ 310
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
268 उपनिषत्सञ्चयनम् अहर्वा अश्वं पुरस्तान्महिमान्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमान्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः । हयो भूत्वा देवानवहद्वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनि ॥2 ॥
इति प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ इस घोड़े के सामने दिवस ( दिन ) 'महिमा' स्वरूप सुवर्णपात्र होकर उदित हुआ । इस दिवस का पूर्व समुद्र में जन्म हुआ । इस घोड़े के पिछले भाग में रात्रि, ' महिमा' स्वरूप रजतपात्र होकर उगी । उस रात का पश्चिम समुद्र में जन्म हुआ । 'महिमा' नामवाले सोने के और चाँदी के दो पात्र अश्वरूपी जगत् की दोनों ओर रखे हुए थे । वह घोड़ा हय बनकर देवों का वहन कर गया, 'वाजी ' बन कर गन्धर्वों को और अश्व बनकर मनुष्यों को वहन कर ले गया । सागर ही उसका जन्मस्थान और उसका बन्धु है । ( यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * द्वितीयं ब्राह्मणम् नैवेह किंचनाग्र आसीन्मृत्युनैवेदमावृतमासीत् । अशनाययाशनाया मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत्तस्यार्चत आपो- ऽजायन्तार्चते वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वम् क ह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥1 ॥
यहाँ पहले कुछ भी नहीं था । यह सब कुछ मृत्यु से ही ढँका हुआ था । अथवा हुआ था । क्योंकि भूख ही मृत्यु है । (मृत्यु ने सोचा- ) “ मैं आत्मावाला बनूँ । ” फिर उसनेभूख‘ मनसे 'ढँका ( ) बनाया । वह मृत्यु विचाररूप पूजा करता हुआ घूमने लगा । पूजारूप विचार को जल पैदा हुआ मृत्यु ने माना कि पूजा उसमें ( ' । (’ = ' '-= ) ) करते- करते मुझमें से जल पैदा करते- करते‘ ' अर्कत्व है । अर् पूजा और क जल इसीलिए अग्नि का नाम हुआ है । वही अर्क कासे ‘ अर्क’ का ‘ अर्कत्व’ जानता है उसको अवश्य 'क' ( सुख ) मिलता ' अर्क' पड़ा । जो कोई इस तरह है । आपो वा अर्कस्तद्यदपाश् शर आसीत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्याम- श्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥2 ॥
के उत्पन्नअथवाहोने जलके बादही अर्कउस प्रजापतिहै । जल अर्थात्का जो स्थूलमृत्यु कोभागश्रमथाहुआवह इकट्ठा। हो गया । वह पृथ्वी बनी । पृथ्वी ( ) के साररूप रसरूप अग्नि निकल आया । श्रमित और तप्त प्रजापति में से तेज स त्रेधात्मानं व्याकुरुतादित्यं तृतीयं वायुं विहितः । तस्य प्राची दिक्छिरोऽसौ चासौ तृतीयः स एष प्राणस्त्रेधा पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ । दक्षिणा चेर्मों । अथास्य प्रतीची दिक् रिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्रचोदीचीक्व चैतिच पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्त- विद्वान् ॥3 ॥ तदेव प्रतितिष्ठत्येवं
उस प्रजापति ने अपने तीन भाग किए-बनाया और अग्नि और वायु की अपेक्षा वायु को आदित्यतीसरा को अग्नि और वायु की अपेक्षा तीसरा भाग भाग बनाया । फिर प्राण भी तीन भागों में बँट