Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 311–320

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 311–320

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प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 269 गया । पूर्व दिशा अग्नि का मस्तक है, ईशान और आग्नेय कोण उसके दो हाथ हैं । पश्चिम दिशा उसका पुच्छ है, वायव्य और नैर्ऋत्य कोण उसकी दो जाँघें हैं । दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं । आकाश पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, यह पृथ्वी हृदय है । यह प्रजापतिरूप अग्नि जल में रहा है | जो इस विराट् को इस प्रकार जानता है, वह जहाँ जाता है, प्रतिष्ठित हो जाता है । सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनः समभ- वदशनाया मृत्युस्तद्यद्रेत आसीत्स संवत्सरोऽभवत्। न ह पुरा ततः संवत्सर आस । तमेतावन्तं कालमबिभः । यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात्स भाणकरोत्सैव वाग- भवत् ॥4 ॥

फिर मृत्यु ने चाहा कि- “ मेरा दूसरा आत्मा पैदा हो ।' उस अशनायारूप मृत्यु ने मन से वेदरूप वाणी की द्वन्द्वभाव से भावना की ( मन को वाणी के साथ जोड़ा) । उससे जो रेत ( बीज) हुआ, वह संवत्सर हुआ | यह सच है कि इससे पहले संवत्सर था ही नहीं । उस संवत्सर को प्रजापति ने इतने समय तक गर्भ में धारण किया (एक संवत्सर तक धारण किया) । एक संवत्सर परिमित काल के बाद उसने उसको जन्म दिया | उस उत्पन्न हुए कुमार को खा जाने की इच्छा से मृत्यु ने उसकी ओर मुँह फाड़ा । तब उसने ( कुमार ने ) 'भाण्' ऐसी चीख की । यह चीख ही वाणी हुई । स ऐक्षत यदि वा इममभिमस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति । स तया वाचा तेनात्मनेदः सर्वमसृजत यदिदं किंचर्चे यजूंषि सामानि छन्दासि यज्ञान्प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वः सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमे- तददितेरदितित्वं वेद || 5 || मृत्यु ने सोचा— “ मैं यदि इसको खा जाऊँगा तो अत्यल्प अन्न ही ग्रहण करूँगा । ” बाद में उसने उस वाणी और उस आत्मा से ( दोनों के संयोग से ) ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, छन्द, यज्ञ, मनुष्यों और पशुओं को उत्पन्न किया । फिर उसने जो-जो उत्पन्न किया उसको खा जाने का निश्चय कर वह सबको खा जाता है, इसलिए उसका नाम 'अदिति' पड़ा । वह इस सारे जगत् को खा जाता है सब कुछ उसका अन्न होता है । जो इस अदिति का अदितित्व ( सच्चा स्वरूप ) जान लेता है, उसके लिए सारा जगत् अन्नरूप बनता है । सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत्स तयोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणे- षूत्क्रान्तेषु शरीरश्वयितुमधियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥6 ॥

मृत्यु ने सोचा— “मैं फिर से बड़े यज्ञ से यजन करूँ ।" उसको श्रम हुआ । उसने कठिन तप किया | थके हुए और तपे हुए उसके यश और वीर्य-बल उसमें से निकल आए (होनेचले लगागए )) प्राणफिर हीभी तो यश और वीर्य है । प्राणों के निकल जाने के बाद शरीर फूलने लगा ( विकृत उसका मन तो शरीर में ही था । सोऽकामयत मेध्यं म इदःस्यादात्मन्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्चः समभ- वद्यदश्वत्तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं

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270 उपनिषत्सञ्चयनम् वेद धं एनमेवं वेद । तमनवरुध्यैवामन्यत । तः संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत पशून्देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात्सर्वदेवत्यं प्रोक्षितं प्राजापत्य- मालभन्ते । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽय- मग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानस्तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेवाप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्यात्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ 7 ॥

इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ उस ( मृत्यु) ने कामना की कि– “ मेरा यह शरीर मेध्य- यज्ञ के लिए योग्य ( पवित्र ) हो और इस शरीर से मैं आत्मा वाला होऊँ । " तब यह शरीर अश्वत् ( अर्थात् फैलकर बड़ा) हो गया । वह शरीर मेध्य ( यज्ञयोग्य पवित्र ) था । यही तो ' अश्वमेध' का ' अश्वमेधत्व' ( सच्चा स्वरूप) है । जो इसे इस प्रकार जानता है, वही अश्वमेध को जानता है । उस घोड़े को उसने मुक्त माना (किया ) । एक वर्ष के बाद उस घोड़े का मृत्युरूप प्रजापति ने अपने लिए ही वध किया और अन्य पशुओं को भी देवताओं के पास पहुँचाया । इसलिए ( याज्ञिक लोग) सब देवताओं के लिए अभिषिक्त ऐसे प्रजापति सम्बन्धी अश्व को धरने के लिए पशु का वध करते हैं । जो तपता अर्थात् प्रकाशित होता है ( सूर्य ), वह अश्वमेध है, संवत्सर ( वर्ष) उसका शरीर है, अग्नि उसका अर्क है, समस्त लोक ही उसका आत्मा है । इस प्रकार अर्क और आदित्य के रूप समझने चाहिए । और वे दोनों भी एक ही मृत्युरूप प्रजापति देवता हैं । ऐसा जो जानता है, वह मृत्यु को जीत लेता है । इस प्रकार जाननेवाले को मृत्यु प्राप्त नहीं होता । मृत्यु तो उसकी आत्मा ही हो जाता है । ऐसा जाननेवाला देवताओं में से एक हो जाता है । ( यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * तृतीयं ब्राह्मणम् द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त । ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथे- नात्ययामेति ॥1 ॥

प्रजापति के दो प्रकार के पुत्र थे – देव और असुर । उनमें देव कम थे और असुर वे दोनों इन लोकों में परस्पर स्पर्धा करने लगे । उनमें से देवों ने कहा- " अरे, हम यज्ञ अधिक थे । ” ( ) के द्वारा असुरों से आगे बढ़ जाएँ । असुरों को हटा दें । में उद्गीथ ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत् कल्याणं वदति तदात्मने । ते । यो वाचि यः स पाप्मा यदे- न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स विदुरनेन वै वेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ 2 ॥

उन्होंने ( देवों ने ) वाणी से कहा- “तुम हमारे लिए उद्गीथ “ ” "उसनेठीकदेवोंहै ।के फिरलिए देवोंगाई के। किन्तुलिएवाणीवाणीजोने हितवचनउद्गीथ काबोलतीगान हैकिया, वह । तोवाणीका गानमें करोजो भोग्य। वाणीवस्तु बोली—थी, वह अपने ही उपयोग के लिए किया

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प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 271 हुआ वचन था । असुरों ने यह जाना कि इस गाने वाली की सहाय से ही देव हमें वे दौड़कर वाणी के पास गए और उसको पाप से बींध डाला । वाणी जो अयोग्य बोलतीहरा देंगेहै, । वहीइसलिएपाप है । अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं जिघ्नति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेद- मप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥3 ॥

इसके बाद देवों ने प्राण से (श्वास से) कहा कि– “तुम हमारे लिए उद्गीथ का गान करो । ” प्राण बोला– “ ठीक है । " फिर देवों के लिए श्वास ने उद्गीथ का गान किया । प्राण में जो भोग्य वस्तु थी, वह उसने देवों के लिए गाई । पर श्वास जो शुद्ध वस्तु सूँघता है, वह उसके अपने उपयोग के लिए था । असुरों ने यह जाना कि इस उद्गाता की सहाय से देव हमें हरा देंगे । तब उन्होंने दौड़कर श्वास के पास जाकर उसे पाप से बींध डाला । श्वास जो खराब चीज सूँघता है, वही पाप है । अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेद- प्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥4 ॥

आँख से कहा--""तुम हमारे ” इसके बाद उन्होंने लिए उद्गीथ का गान करो । आँख बोली— “ठीक है । ” फिर देवों के लिए आँख ने उद्गीथ का गान किया । आँख में जो भोग्य वस्तु थी, वह उसने देवों के लिए गाई । पर जो कल्याण-प्रदर्शन होता है, वह तो उसने अपने लिए ही किया । असुरों ने यह जाना कि इस उद्गाता की सहाय से देव हमें हरा देंगे, तब उन्होंने दौड़कर आँख के पास जाकर उसे पाप से बींध डाला । आँख जिस न देखने लायक वस्तु को देखती है, वही तो पाप है । अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यः श्रोत्रमुदगायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेद- मप्रतिरूपः शृणोति स एव स पाप्मा ॥5 ॥

तब देवों ने श्रोत्र से कहा– “तुम हमारे लिए उद्गीथ का गान करो । ” श्रोत्र बोला— “ ठीक है । ” फिर श्रोत्र ने जो भोग्य वस्तु थी वह देवों के लिए गाई । परन्तु जो श्रेयस्कर वस्तु का श्रवण था वह अपने लिए ही रखा । असुरों ने जब यह जाना कि इस उद्गाता की सहाय से देव हमें हरा देंगे, तब वे दौड़ कर श्रोत्र के पास गए और उसे पाप से बींध डाला । श्रोत्र जो खराब सुनता है, वही यह पाप है । मनसि अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो तदात्मनेमन उदगायद्यो। ते विदुरनेन वैभोगस्तंन उद्गात्रात्येष्यन्तीतिदेवेभ्य आगायद्यत्तमभिद्रुत्यकल्याणं संकल्पयतिपाप्मनाऽविध्यन्सखल्वेतायः स देवताःपाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति स एव स पाप्मैवमु पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥6 ॥

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272 उपनिषत्सञ्चयनम् तब देवों ने मन से कहा--'"तुम हमारे लिए उद्गीथ का गान करो । ” मन बोला- “ठीक है । ” मन ने उन देवों के लिए जो भोग्य वस्तु थी वही गाई । परन्तु जो कल्याणकारी संकल्प थे उन्हें तो अपने लिए ही रख लिया । असुरों ने जब जाना कि इस उद्गाता की सहाय से देव हमें हरा देंगे, तो वे दौड़कर मन के पास पहुँचे और मन को पाप से बींध डाला । मन जो ये बुरे संकल्प करता है वही पाप है । इस प्रकार सभी इन्द्रियों के अधिदेव पाप से विद्ध हो गये । इस प्रकार ये इन्द्रियाँ पाप से आविष्ट हो गईं । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत्ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तदभिद्रुत्य पाप्मना- विव्यत्सन् स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वसे तैव हैव विध्वसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुराः भवत्यात्मना परास्य द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ 7 ॥

फिर देवों ने मुखस्थ प्राण से कहा– “तुम हमारे लिए उद्गीथ का गान करो ।” मुखस्थ प्राण बोला— “ठीक है । ” ऐसा कह कर उस प्राण ने उनके लिए उद्गीथ का गान किया । असुरों ले जाना कि इस उद्गाता की सहायता से देव हमें हरा देंगे, तो वे एकदम दौड़कर उसे पाप से बींध डालने का विचार किया, परन्तु जिस तरह मिट्टी का टुकड़ा पत्थर से टकराकर चूर होकर नष्ट हो जाता है, उसी तरह वे अनेक प्रकार से नष्ट हो गए । इसके बाद देवलोग अपने मूल स्वरूप (स्वभाव) को प्राप्त हुए । असुर हार गए । जो इस तरह जानता है, वह प्रजापतिरूप में स्थिर होता है और उसके साथ द्वेष करनेवाले सौतेले भाई का पराजय हो जाता है । ते होचुः क्व नु सोऽभूद्यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गाना हि रसः ॥8 ॥

इन्द्रियों के अधिदेव बोले- “जिसने (प्राण ने ) हमें इस प्रकार आत्मभाव से देवत्व को पहुँचाया है, वह कहाँ है भला? उसे ' अयास्य' कहते हैं, उसे ' आंगिरस' भी कहते हैं क्योंकि वह अंगों का रस है । सा वा एषा देवता दूर्नाम दूर ह्यस्या मृत्युर्दूर ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥१ ॥

वह यह देवता ‘ दूर्’ नामवाला है । क्योंकि इससे मृत्यु दूर है । जो इस प्रकार जानता है उससे मृत्यु दूर हो जाता है । सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्रासां दिशा- मन्तस्तद्गमयांचकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्त- मियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥10 ॥

इस प्राणदेवता ने उन वागादि देवताओं के पापमय मृत्यु को दूर करके, जहाँ इन दिशाओं, | अन्त है वहाँ पहुँचा दिया वहाँ उन देवताओं के पापों को उसने तिरस्कारपूर्वक का ‘ मैं पापरूप मृत्यु से कदाचित् मिल तो नहीं जाऊँगा न!” इस भय से किसी स्थापित कर दिया | नहीं चाहिए ( अन्य = अन्त्य = बाहर के लोकों के पास नहीं जाना चाहिए) और अन्यदिशाओंजन केके पास जाना अन्त में भी नहीं जाना चाहिए ।

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प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 273 सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैनां मृत्युमत्य- वहत् ॥11 ॥

उस प्राण देवता ने इन देवताओं के पापरूप मृत्यु को दूर करके बाद में इन यागादि देवताओं को उनके पापरूप मृत्यु से दूर करके अग्नि आदि को उनके मूल देवत्व को प्राप्त करवाया । स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभ- वत्सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥12 ॥

उस प्रसिद्ध प्राण ने प्रधान वाग्देवता को पहले मृत्यु से पार किया । वह वाक् जब मृत्यु को पार कर गई, तो वह अग्नि हो गई । वह मृत्यु को अतिक्रान्त करनेवाला अग्नि मृत्यु से परे रहता हुआ देदीप्यमान है | अथ ह प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥13 ॥

फिर उस प्राण ने श्वास को मृत्यु से रहित कर दिया । वह श्वास जब मृत्यु से रहित हो गया, तब वह वायु हो गया । वह मृत्यु से अतिक्रान्त हुआ वायु मृत्यु से ऊपर उठकर बहता है । अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽभवत्सोऽसावा- दित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति ॥14 ॥

फिर उस प्राण ने चक्षु को मृत्युरहित बनाया । वह चक्षु जब मृत्यु से रहित हो गया, तब वह आदित्य ( सूर्य ) बन गया । मृत्यु को पार कर जानेवाला वह सूर्य, मृत्यु से ऊपर उठकर तप रहा है अर्थात् प्रकाशित हो रहा है I अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥15 ॥

बाद में उसने कान को मृत्युरहित किया । कान मृत्यु के पास से छूट गया, तब वह दिशाएँ बन गया । मृत्यु से ऊपर उठी हुई दिशाएँ मृत्यु का अतिक्रमण कर चुकी हैं । अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमाऽभवत्सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भात्येव ह वा एनमेषा देवता मृत्यमतिवहति य एवं वेद ॥16 ॥

· बाद में उस प्राण ने मन को मृत्यु से छुटकारा दिलाया । मन जब मृत्यु को पार कर गया, तब वह चन्द्रमा हो गया । वह पार हुआ चन्द्रमा, मृत्यु से ऊपर उठकर प्रकाशित हो देतारहा हैहै ॥ जो इस प्राण को ऐसा ( पंचदेवविशिष्ट) मानता है, उसको भी यह प्राण मृत्यु से ऊपर उठा प्रति- अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किंचनामन्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह तिष्ठति ॥17 ॥

। क्योंकि जो कुछ तब अपने लिए उस प्राण ने अन्नाद्य का गान किया अर्थात्से वहअन्नादिटिका प्राप्तरहताकियाहै । भी अन्न खाया जाता है, वह प्राण ही खाता है और उसी 18 उ० प्र०

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274 उपनिषत्सञ्चयनम् ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा इदः सर्वं यदन्नं तदात्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै माभिसंविशतेति तथेति तः समन्तं परिण्यविशन्त तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येव ह वा एन स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाः श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवं- विदः स्वेषु प्रतिप्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य एवैतमनु- भवति यो वै तमनुभार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥18 ॥

वे वागादि देव प्राण से कहने लगे- "(जगत् में ) अन्न तो इतना ही था वह ( सब ) तो आपने गाकर ले लिया । अब हमें भी उस अन्न में से थोड़ा भाग दीजिए । " तब प्राण ने कहा– “तुम ( सब) मुझमें प्रविष्ट हो जाओ । ” इन्द्रियों ने "ठीक है " । ऐसा कहकर चारों ओर से प्राण में प्रवेश कर लिया । इसीलिए प्राण जो कुछ अन्न खाता है, इससे सभी इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं । जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, उसके स्वजन (सगे- सम्बन्धी) उसका आश्रय लेते हैं । जो मनुष्य आश्रितों का रक्षण करता है, वह श्रेष्ठ बनता है । वह अग्रगण्य होता है, वह खाने - पीने में सुखी होता है, वह सबका स्वामी ( अधिपति ) होता है | उसके स्वजनों में से यदि कोई उसके साथ स्पर्धा करना चाहे, तो वह स्पर्धक अपने आश्रितों का भरणपोषण नहीं कर सकता । परन्तु जो मनुष्य ऐसे ज्ञानी का अनुसरण करके अपने आश्रितों का भरणपोषण करना चाहता है, वह सचमुच आश्रितों को पाल सकता है । सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गाना हि रसः प्राणो वा अङ्गाना रसः प्राणो हि वा अङ्गाना रसस्तस्माद्यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छु- ष्यत्येष हि वा अङ्गानां रसः ॥19 ॥

वह ‘ अयास्य' ( मुखस्थ प्राण) ' आंगिरस' भी कहा जाता है । क्योंकि वह अंगों का रस है । वास्तव में प्राण अंगों का रस है । प्राण अंगों का रस है इसीलिए किसी अंग से जब प्राण निकल जाते

हैं, तब वह अंग सूख जाता है, क्योंकि वह अंगों का ही तो रस है ।

एष उ एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥20 ॥

यह प्राण ही बृहस्पति है, क्योंकि वाणी ही ' बृहती' है, उस वाणी का यह प्राण पति ( )है इसलिए वह बृहस्पति है । स्वामी एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु स्पतिः ॥21 ॥ ब्रह्मण- यह प्राण ही ब्रह्मणस्पति भी है, क्योंकि वाणी ही ब्रह्म ( वैदिक प्रार्थना) है, ' ',है इसलिए प्राण ही ब्राह्मणस्पति है । प्राण वाणी का पति

एष उ एव साम वाग्वै सामेष सा चामश्चेति प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम तत्साम्नः सामत्वं यद्वेव समः सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्नः सायुज्यःएभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन एवमेतत्साम वेद ॥22 ॥ सलोकतां जयति य

यह प्राण ही साम है । वाणी ‘ साही साम है । यही साम का सामत्व (वास्तविक’ (स्त्री) है, और वह प्राण 'अम' ( पुरुष ) है । 'सा' और ' अम' है, मच्छर जैसा है, हाथी के शरीर जैसा है, तीनोंरूप)लोकोंहै । क्योंकि प्राण एक छोटी मक्खी के शरीर जैसा के समान है, सारे विश्व के समान है, इसलिए

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प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 275 वह साम ( वेद ) कहा जाता है । जो (मनुष्य ) साम को इस तरह जानता है, वह साम में मिल जाता है और जिस लोक में साम रहता है, उस लोक को पा लेता है । एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीद सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्च- गीथा चेति स उद्गीथः ॥23 ॥

यह प्राण ही उद्गीथ है । प्राण ही 'उत्' है, प्राण से ही यह सब धारण किया हुआ है 1। और वाक् ही ‘गीथा ' है । ‘ उत्' भी है और ' गीथा' भी है, इसलिए वह उद्गीथ है । तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोद्गायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥24 ॥

इस विषय में यह ( आख्यायिका ) भी है । चैकितानेय ब्रह्मदत्त ने ( यज्ञ में ) राजा का ( सोम का ) भक्षण करते हुए कहा— “ यदि मेरे अयास्य अंगिरस नामक मुख्य प्राण ने वाणी और प्राण के सिवा किसी अन्य रीति से उद्गीथ गान किया हो, तो यह सोमदेव मेरा सिर नीचे गिरा दे अर्थात् मेरा अपमान कर दे । ” उसने वाणी और प्राण से ही उद्गीथ का गान किया था, ऐसा निश्चय होता है । तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन्वाचि स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसंपन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एवाथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥25 ॥

जो इस साम के 'स्वर' को यथार्थ रूप में जानता है, वह अवश्य धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न होता है । उसका स्वर ही उसका धन है । इसलिए ऋत्विक्- कर्म करनेवाले को वाणी में स्वर की इच्छा करनी चाहिए । उस स्वरयुक्त वाणी से ऋत्विक् - कर्म करना चाहिए । जैसे लोग धनवाले को देखने की ( सदा) इच्छा करते हैं, वैसे ही यज्ञ में अच्छे स्वरवाले को देखने की इच्छा करते हैं । जो कोई भी इस तरह साम के तत्त्व को जानता है, उसे वह धन ( मधुर स्वर ) मिल जाता है । तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥26 ॥

इस साम के उस सुवर्ण ( मधुर स्वर ) को जो जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है । स्वर ही उसका सुवर्ण है । इस प्रकार जो साम के सुवर्ण को जानता है, उसे सुवर्ण मिलता है । तस्य हैतस्य साम्नोः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥27 ॥

जो इस साम की प्रतिष्ठा को जानता है, वह प्रतिष्ठित होता है । वाणी ही उसकी प्रतिष्ठा है । वास्तव में वाणी में ही प्रतिष्ठित यह प्राण गाया जाता है ( गीतिभाव को प्राप्त होता है ) । कुछ लोग कहते हैं कि साम अन्न में रहता है ( अर्थात् अन्नस्थ साम ही गाया जाता है । ) अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तुयात्तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यो- र्माऽमृतं गमयेति । स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं

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276 उपनिषत्सञ्चयनम् मृत्योर्मा मृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह मृत्योर्माऽमृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति । अथ यानीतराणि स्तो- त्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तश् स एष एवंविदुद्गातात्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयेत तमा- गायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम aa 112811 इति तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ अब पवमान मन्त्रों ( शुद्धिमन्त्रों ) के जप की विधि बताई गई है । यज्ञ में उद्गाता ऋत्विज् साम की स्तुति करता है । उस स्तुति में उसे इन मंत्रों का जप करना चाहिए - "मुझे असत् से सत् की ओर ले जाओ, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाओ, मृत्यु से अमृत की ओर ले जाओ । ” स्तुतिकर्ता कहता है— “मुझे असत् में से सत् की ओर ले जाओ ।" यहाँ ' असत्' मृत्यु है और ' सत्’ अमृत है । इसलिए वह यही कहता है कि "मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले जाओ ।" वह और आगे कहता है कि— “ मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर जाओ । " यहाँ भी अन्धकार मृत्यु ही है और प्रकाश अमृत है । तो इसका अर्थ भी यही हुआ कि “ मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले जाओ” । उद्गाता और आगे कहता है कि— “मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर बना दो ।” इसमें तो कुछ भी अस्पष्ट है ही नहीं । इसके बाद जो अन्य स्तोत्र बाकी रहे, उन्हें गाकर उद्गाता अपने लिए खाद्यान्न प्राप्त करता है । अत: इन ( शेष ) स्तोत्रों को गाकर उद्गाता भले ही अपनी इच्छित वस्तु माँग । यज्ञ में उद्गाता का काम करनेवाला अध्वर्यु इस प्रकार अपने लिए अथवा यजमान के लिए जो कुछ चाहता है, वह ऐसा स्तुतिगान करके प्राप्त कर सकता है । यह ज्ञान (उपर्युक्त साम का ज्ञान ) जगत् को जीत सकता है । जो मनुष्य इस प्रकार से साम को जानता है, वह किसी भी लोक में जाने के योग्य बन जाता है । उसे किसी भी लोक में न जाने की निराशा नहीं होती । ( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ ।) * चतुर्थं ब्राह्मणम् आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सो- ऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत्ततोऽहंनामाभवत्तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्ये- वाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात्सर्वस्मा- त्सर्वान्पाप्मन औषत् तस्मात्पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात्पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥1 ॥

पहले यह पुरुषाकार आत्मा (प्रजापति ) ही था । उसने विचार करने के बाद अपने “ " “मैं ” ऐसे नामवाला ( अहंनामा) हुआको नहीं। इसलिएदेखा । अबप्रारंभभी मेंकिसीउसनेको मैंबुलाएहूँ जानेऐसापरकहापहले। इसीलिए" वह से भिन्न किसी, " - जो नाम होता है वह यह मनुष्य बोलता है । और यह मैं हूँ ऐसा कहकर ही बाद में अपना दिया था इसीलिए तो वह पुरुष हुआ था । जो मनुष्यक्योंकिइससबसेप्रकारपहले सभी पापों को प्रजापति ने जला ( ) अपने प्रतिस्पर्धी को जला देता है । जानता है उपासना करता है वह

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277प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) सोऽबिभेत्तस्मादेकाकी बिभेति स हायमीक्षांचक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभेष्यद्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ 2 ॥

उस आत्मा को डर लगा इसलिए आज भी अकेला मनुष्य डरता है । उस आत्मा ने सोचा कि, “ मुझसे दूसरा तो कोई है नहीं तो मैं किससे डरता हूँ? ” ऐसा विचार करने से उसका डर चला गया । वास्तव में वह किससे डर रहा था? यदि उसके सिवा कोई होता तभी तो डर लगता! दूसरे से ही भय होता है । सवै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमासौ संपरिष्वक्तौ स इममेवात्मानं द्वेधाऽपातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मा- दयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताः समभवत्ततो मनुष्या अजायन्त ॥३ ॥

उस प्रजापति ( आत्मा) को कुछ भी चैन न पड़ा । इसीलिए आज भी अकेले मनुष्य को चैन नहीं पड़ता । उसने दूसरे की कामना की । तो जैसे स्त्री-पुरुष परस्पर आश्लिष्ट हों, ऐसा वह हो गया ( ऐसा उसका स्वरूप = परिमाण हो गया) । फिर उसने अपने शरीर को दो भागों में बाँट दिया । इससे पति और पत्नी— दो हुए । इसीलिए याज्ञवल्क्य ने कहा है कि जैसे द्विदल का एक भाग पूरे बीज का आधा भाग होता है वैसे ही यह पुरुष अपने वास्तविक स्वरूप का आधा भाग मात्र ही है । उसकी जो कमी थी, वह स्त्री से पूरी हो गई । इसी से यह पुरुषार्धरूप आकाश स्त्री से पूर्ण होता है । उस स्त्री के साथ वह मैथुनकर्म में प्रवृत्त हुआ । उसमें से मनुष्य पैदा हुआ । सो हेयमीक्षांचक्रे कथं नु मात्मन एव जनयित्वा संभवति हन्त तिरोऽ- सानीति सा गौरभवदृषभ इतरस्ताः समेवाभवत्ततो गावोऽजायन्त वडवेतराभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताः समेवाभवत्तत एकशफमजायताऽजेतराभवद्बस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्तासमेवा- भवतत्ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किंच मिथुनमापिपीलिकाभ्य- स्तत्सर्वमसृजत ॥4 ॥

फिर उस स्त्री ने ( शतरूपा ने सोचाकि- "मुझे अपने ही शरीर में से उत्पन्न करके वह मेरे साथ क्यों संभोग करता है? वह तो बड़े खेद का विषय है, इसलिए मैं चलो छिप जाऊँ । ” — ऐसा सोचकर वह गाय बनी, तो दूसरा ( मनु ) साँड़ बना और उसके साथ संभोग किया । इससे गायें, बैल आदि उत्पन्न हुए । फिर वह दूसरी ( शतरूपा) घोड़ी बनी, तो दूसरा (मनु ) अश्वश्रेष्ठ बना । जब दूसरी ( शतरूपा ) गधी बनी तो वह दूसरा ( मनु ) गधा हुआ और उसके साथ संभोग किया तो उससे एक खुरवाले प्राणी उत्पन्न हुए । तब दूसरी ( शतरूपा) ने बकरी का रूप लिया, तो दूसरा (संभोगमनु ) बकराकिया हुआ । जब दूसरी ( शतरूपा) भेड़ी बनी तो वह दूसरा ( मनु ) भेड़ा बना और उसके साथ तो उससे बकरे- बकरियाँ और भेड़ा- भेड़ियाँ उत्पन्न हुईं । इस प्रकार जो कोई भी यहाँ स्त्री-पुरुष का युगल है— चींटियों से लेकर जो कुछ भी युगल है, वह उसने ही उत्पन्न किया है । सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहीद सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत्सृष्ट्या हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥15 ॥

पृष्ठ 320

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278 उपनिषत्सञ्चयनम् उस प्रजापति ने जाना कि— “ मैं ही सृष्टि हूँ । मैंने ही यह सब कुछ बनाया है । ” इसलिए वह ‘सृष्टि’ ऐसे नामवाला हुआ । जो कोई भी इस प्रकार जानता है, वह इस प्रजापति की इस सृष्टि में स्रष्टा होता है । अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत तस्मादेतदु- भयमलोमकमन्तरतोऽलोमका हि योनिरन्तरतः । तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव वा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किं- चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इद सर्वमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्या हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥16 ॥

बाद में इस प्रकार उसने मन्थन किया । उसने मुखरूपी योनि में से दो हाथों से मन्थन करके अग्नि उत्पन्न किया । इसलिए ये हाथ और मुख ( दोनों ) भीतर की ओर लोमरहित हैं । इसीलिए स्त्रियों की योनि भी भीतर से लोमरहित है । कर्मकाण्ड में याज्ञिक ऐसा कहते रहते हैं कि— “इस एक-एक देव का पूजन करो ” ( पर ) ये सब देव प्रजापति के (एक के ) ही देवभेद हैं । इसलिए यह प्रजापति ही सर्वदेवरूप है । इसके बाद जो कुछ भी यहाँ आर्द्र ( भीगा) है, वह सब उसने अपने वीर्य से उत्पन्न किया है । वही सोम है ( सोमरस है) । बस, इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है । सोम ही अन्न है और अग्नि अत्राद है । वह यही तो ब्रह्मा की अतिसृष्टि (उत्कृष्ट सृष्टि) है कि उसने अपने से भी उत्कृष्ट देवता उत्पन्न किये । और भी यह कि स्वयं मरणधर्मा होने पर भी उसने अमृत देवों इसलिए तो वह अतिसृष्टि ( उत्कृष्टसृष्टि) है । जो कोई भी इस प्रकार जानता है, वहकोइसउत्पन्न किया | ( )इस अतिसृष्टि में ही देवसमूह में ही प्राप्त हो जाता है । प्रजापति की तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौनामायमिदः- रूप इति तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौनामायमिदं रूपमिति स एष इह प्रविष्ट आनखाग्रेभ्यो यथा स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाये तं न पश्यन्ति क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः प्राणो नाम भवति । वदन् वाक्पश्यश्चक्षुः । अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव स्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्तेशृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मन- ह्येषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र न स वेदाकृत्स्नो त्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्मानेन ह्येते सर्व एकं भवन्ति तदेत- विन्देदेवं कीर्ति श्लोकं विन्दते य ह्येतत्सर्वं वेद । यथा ह वै पदेनानु- एवं वेद ॥7 ॥

उस समय यह जगत् अव्याकृत ( अप्रकट ( ) ) ( )हुआ । यह व्यापक आत्मा अमुक था । वह नाम और रूप से ही प्रकट अभिव्यक्त रूपवाला हैभी । वह” — अव्याकृतइस प्रकारवस्तुही,व्यक्तनामहोतीऔर रूपनामवालाके द्वाराऔरही अमुक"अमुक - अमुक नामवाली होकर प्रकटहै, हुआया अमुक। इसरूपवालीसमय में तरह अस्त्र अपने म्यान में प्रविष्ट होताहै ।हैवह, अथवायह आत्माअग्नि नख से लेकर समस्त देहों में प्रविष्ट है । जिसकोई देख नहीं सकता क्योंकि अपने आश्रयरूप काष्ठ में प्रविष्ट होता है, - ',होता है । बोलने से ही वह वह असंपूर्ण है । श्वास प्रश्वास की क्रिया से ही वह उसे ‘ ', वाक् होता है देखने से ही वह चक्षु है, मनन करनेप्राणसे 'हीऐसेवहनामवाला मनहै ।.