Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 41–50
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 41–50
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( 39 ) गिरगिट के किस रंग को आप झूठा साबित कर सकते हैं? एक-दूसरे से भिन्न उसके शरीर के सभी रंग वास्तविक ही हैं न? उपनिषदों के इस संग्रह को अपने मूल स्वरूप में ही प्रकाशित करने का यही हेतु है । अनेक अर्थों की संभावना वाले मंत्रों का कोई यदि नया ही अर्थ प्रकाशित करता है तो इससे भारतीय चिन्तन को लाभ ही होगा, हानि नहीं । इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर हमने मूलपाठों का ही जहाँ तक बन सका है अन्वय करके शब्दशः अनुवाद करने का प्रयत्न किया है । प्रासादिकता का जतन हो और अर्थ समझने में सरलता हो, इसको दृष्टिगत रखते हुए आवश्यकतानुरूप यत्र- तत्र कुछ शब्दों को ब्रैकेट ( ) में तथा कुछ को स्वतंत्र रखकर विषयवस्तु को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है । इसके अतिरिक्त प्रत्येक उपनिषद् के आरम्भ में उसका परिचय भी प्रस्तुत किया गया है । भारतीय तत्त्वज्ञान के निचोड़रूप श्रौत उपनिषदों का और अश्रौत उपनिषदों का तटस्थ हिन्दी रूपान्तर करने का यह प्रकल्प संशोधकों, स्वतन्त्र विचारकों, जिज्ञासुओं के लिए उपयोगी होने पर भी बड़ा परिश्रम माँगलेनेवाला है । मेरी इस जरावस्था में उसे हाथ में लेना मुश्किल ही था, किन्तु मेरे भूतपूर्व विद्यार्थी और आज के आत्मीयजन भाई श्री हरीश झवेरी ने आग्रह किया और मैं उसे टाल न सका । सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट होने के साथ-साथ वे भारतीय तत्त्वज्ञान का पूरा मर्म समझने वाले हैं । मैंने यह काम हाथ में स्नेहवश ले तो लिया, पर बीच- बीच में मेरी ली हुई इस जिम्मेदारी से मैं उद्विग्न हो उठता था, पर वे मुझे ढाढस बँधाते रहे और मेरा काम चलता रहा– यह इस लेखन का इतिवृत्त है । इसके लिए मैं उनका आभार मानूँ तो उन्हें बुरा लगेगा इसलिए आशीर्वाद देता हूँ । चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान ने इसके प्रकाशन का भार उठाया और वाचकों के सामने यह ग्रन्थ आ सका, इसके लिए मैं उनसे अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । आशा है कि मेरा यह प्रयास संस्कृत तथा संस्कृति के प्रेमियों को पसन्द आएगा । अन्त में स्वामी विवेकानन्द के उपनिषत्सम्बन्धी इन उद्गारों को उद्धृत करके भूमिका का समापन करता हूँ— “ मैं जब उपनिषदों को पढ़ता हूँ, तो मेरे आँसू बहने लगते हैं । यह कितना महान् ज्ञान है? हमारे लिए यह आवश्यक है कि उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता को अपने जीवन में विशेष रूप से धारण करें | हमें शक्ति चाहिए, शक्ति के बिना काम न चलेगा । यह शक्ति कहाँ से प्राप्त होगी? उपनिषदें ही शक्ति की खानें हैं । उनमें ऐसी शक्ति भरी पड़ी है कि जो सम्पूर्ण विश्व को बल, वीर्य और नवजीवन प्रदान कर सके । उपनिषदें किसी भी देश, जाति, मत, सम्प्रदाय का भेद किए बिना हर दीन, दुर्बल, दुःखी और दलित प्राणों को पुकार- पुकार कर कहती हैं कि उठो, अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, और बन्धनों को काट डालो । शारीरिक स्वाधीनता एवं आध्यात्मिक स्वाधीनता यही उपनिषदों का मूलमन्त्र है । ” विद्वानों का वशंवद केशवलाल वि. शास्त्री
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उपनिषत्क्रम पृष्ठांक 1 1. ईशावास्योपनिषत् 2. केनोपनिषत् 7 15 3. कठोपनिषत् 38 4. प्रश्नोपनिषत् 5. मुण्डकोपनिषत् 54 6. माण्डूक्योपनिषत् ( गौडपादकारिकासहित ) 68 7. तैत्तिरीयोपनिषत् 103 8. ऐतरेयोपनिषत् 125 १. छान्दोग्योपनिषत् 134 10. बृहदारण्यकोपनिषत् 265
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॥ श्रीः ॥ उपनिषत्सञ्चयनम् ( 1 ) ईशावास्योपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) मुक्तिकोपनिषद् में बताए हुए उपनिषत्क्रम में ईशावास्योपनिषद् या ईशोपनिषद् का प्रथम स्थान है । 'ईश ' शब्द से प्रारंभ होने से इसका नाम ईशोपनिषद् या ईशावास्योपनिषद् पड़ा है । इसे ‘ संहितोपनिषद्' भी कहा जाता है, क्योंकि इस उपनिषद् ने शुक्लयजुर्वेद के संहिता भाग में ( 40 अध्याय में) विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है । इस शुक्लयजुर्वेदसंहिता को वाजसनेयि संहिता भी कहा जाता है । केवल अठारह मंत्रों की छोटी - सी उपनिषद् होते हुए भी इस पर असंख्य विद्वान् आकर्षित हुए हैं और अन्यान्य उपनिषदों की अपेक्षा इस उपनिषद् पर अधिकाधिक टीकाएँ एवं विवेचन हुए हैं । और असंख्य विवेचन होने पर भी इस उपनिषद् के रहस्य को भलीभाँति अभी तक परितोषजनक रूप से खोला नहीं जा सका है । यह सम्पूर्ण जगत् ईश का निवासस्थान या ईश से व्याप्त है — यह कहकर प्रथम मंत्र में मनुष्यों को शिक्षा दी गई है कि वे जागतिक भोगों को आसक्ति का त्याग करके ही भोगें, क्योंकि सभी पदार्थ ईश के ही हैं, उनके नहीं हैं और अन्य के पदार्थ को अपना बनाने का लोभ छोड़ने की सलाह दी गई है । दूसरे मंत्र में अनासक्तिपूर्वक कर्मों को करते हुए ही सौ साल तक जीने की इच्छा करने को कहा गया है । समाज के अभ्युदय और नि: श्रेयस् के लिए कर्मठ जीवन का सन्देश दिया गया है । जीवन जीने का ऐसा एकमात्र मार्ग बताकर इस मार्ग पर न चलने वालों की अधोगति तीसरे मंत्र में बताई है । चौथे और पाँचवें मंत्र में रहस्यमय रूप से आत्मतत्त्व का स्वरूप और सर्वान्तर्यामित्व (सर्वगामित्व ) बताया गया है जबकि छठे और सातवें मंत्र में आत्मसाक्षात्कारी की सर्वत्र आत्मदर्शिनी, सर्वत्र प्रेममयी और मोहातीत, राग-द्वेषमुक्त स्थिति बताई है । आठवें मंत्र में आत्मसत्त्व का कवित्वमय वर्णन है । वहाँ आत्मा का स्वप्रकाशत्व, सर्वव्यापकत्व, श्रेष्ठत्व, विशुद्धत्व आदि बताया है 1 इसके बाद नौ से चौदह- ये छः मन्त्र बड़े ही अस्पष्ट हैं । इन्हें समझाने के लिए टीकाकारों ने अनेक परस्पर विरुद्ध अर्थ किए हैं । "ज्ञानी लोग 'विद्या' और ' अविद्या' के फल अलग बताते हैं, फिर भी उन दोनों का सन्तुलित संमिश्रण मनुष्य को अमरत्व देता है । ” यहाँ ‘ अविद्या’ को वैदिक कर्मकाण्ड और ' विद्या' को ज्ञानपूर्वक देवों के ध्यान के रूप में समझाया
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2 उपनिषत्सञ्चयनम् गया है । ज्ञानरहित केवल कर्म-विधि पितृलोक में तथा क्रियारहित केवल ज्ञानयुक्त उपासना देवलोक में पहुँचा सकती है, पर पितृलोक या देवलोक शाश्वत नहीं है । पुण्य क्षीण होने पर पुनः धरा पर आना पड़ता है । तो इन दोनों में जन्म- मृत्यु की श्रृंखला चालू ही रहती है । मुक्ति ( जन्म- मरण का अन्त ) नहीं हो सकती । मुक्ति तो तभी मिल सकती है, जब उपासना और ज्ञान का समुचित संमिश्रण हो । कर्तव्यपालन से चित्तशुद्धि और चित्तशुद्धि से निदिध्यासन (उपासना ) और बाद में साक्षात्कार मुक्ति होती है । इस सीढ़ी को ही समुचित संमिश्रण कहा गया है । इसी प्रकार बारहवें से चौदहवें मन्त्र तक के तीन मन्त्रों में आए हुए ' संभूति', ' असंभूति' और ' विनाश' शब्दों के अर्थ के विषय में भी टीकाकारों में बड़ा गहरा मतभेद है । शंकराचार्य ‘ संभूति ' का अर्थ 'कार्यब्रह्म' ( हिरण्यगर्भ ) और ' असंभूति' का अर्थ ‘ कारणब्रह्म' करते हैं । तदनुसार 'कार्यब्रह्म' की उपासना अद्भुत मानसिक सिद्धियाँ दे सकती हैं जब कि ‘कारणब्रह्म' की उपासना ' प्रकृतिलय' तक पहुँचाती है । ये दोनों मुक्तिदायक नहीं है । पर इन दोनों का समुचित (और क्रमिक ) सम्मिश्रण ही मुक्ति दिला सकता है । इस विषय में शुक्लयजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिन शाखा के भाष्यकार उव्वट ( 11 वीं सदी ) का विवरण बड़ा रसप्रद और आकर्षक है । ये ' संभूति' शब्द का अर्थ 'परब्रह्म' करते हैं और ' असंभूति’ शब्द (‘ विनाश' शब्द ) का अर्थ 'शरीर' करते हैं । भूख और प्यास के प्रति आलस्य से भौतिक शरीर मरणशरण हो जाता है, इसलिए जो साधना के लिए अनिवार्य है, ऐसे शरीर से साधक लोगों को समुचित भौतिक कार्यकलाप करते हुए भी उससे ऊपर उठ जाना पड़ता है । अत: ब्रह्मध्यान के द्वारा वे अमरत्व प्राप्त करते हैं । इसी को समुचित सम्मिश्रण कहा गया है । 15 से 18 — इन चार मन्त्रों में ऋषि ईश्वर से साक्षात्कार की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं एवं ईश का गुणानुवाद करते हैं । ऋषि ने ईश के लिए प्रतीकरूप में अग्नि और सूर्यमण्डल को चुना है । मन्त्रों में आए हुए 'क्रतु ' शब्द का अर्थ 'ईश' हो सकता है 1 ‘ अग्नि' का प्रतीक तत्कालीन यज्ञसंस्कृति की याद दिलाता है । ' यज्ञो वै विष्णुः' और ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' ये श्रुतियाँ इसकी प्रमाण हैं । और अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो एक समय ऐसा था जब कि कर्म और उपासना की विभावना के साथ त्याग और संन्यासी जीवन के बीच संघर्ष चल रहा था । संभव है कि यह उपनिषद् सामान्यजनों के लिए उस संघर्ष के नवीनीकरण के लिए प्रस्तुत की गई हो सन्निष्ठ साधकों को यह सन्देश देती है कि स्वार्थ और कामनाजन्य कर्मों को छोड़कर । यह संग्रहार्थ सेवा- कार्यों, ईश्वर- प्रीत्यर्थ किए जाने वाले कार्यों और मानव- कल्याण के कार्योंलोक- कर हुए जीना चाहिए । इस छोटी पर बहुत सुन्दर उपनिषद् का यही सन्देश है । को
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ईशावास्योपनिषत् ( 1 ) 3 शान्तिपाठः
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
ॐ रूप में अभिव्यक्त वह ( परब्रह्म) पूर्ण है और यह ( कार्यब्रह्म) भी पूर्ण है । क्योंकि पूर्ण में से ही पूर्ण उत्पन्न होता है । ( एवं प्रलय के समय ) पूर्ण का ( कार्यब्रह्म का ) पूर्णत्व लेकर ( अर्थात् स्वयं के भीतर समाकर ) पूर्ण ( परब्रह्म) ही शेष रह जाता है । त्रिविध तापों ( आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक ) की शान्ति हो ।
ईशावास्यमिदः सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥1 ॥
सकल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़- चेतनरूप जगत् (दिखाई देता ) है, यह सब ईश्वर से व्याप्त है ( सदा ईश्वर से घिरा हुआ रहता है ), (ऐसा समझकर) ईश्वर को साथ में रखकर त्यागपूर्वक उसे भोगते रहो, ( परन्तु ) उसमें आसक्ति मत रखो । ( क्योंकि — ) धन (भोग्यपदार्थ ) किसका है? ( अर्थात् किसी का नहीं) ।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥2 ॥
इस ( जगत्) में ( शास्त्रविहित) कर्मों को करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए । इस प्रकार ( त्यागभाव से ईश्वर- प्रीत्यर्थ ) भविष्य में किये जाने वाले कर्म तुम ( मानव ) में लिप्त नहीं होंगे । इस (मार्ग) से भिन्न दूसरा कोई मार्ग (उपाय) नहीं है ( कि जिससे कर्मबन्धन से छुटकारा पाया जा सके ) ।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥3 ॥
( जो ) असुरों की प्रसिद्ध ( तरह - तरह की ) योनियाँ और नरकादि लोक हैं, वे सब अज्ञान एवं दुःख- क्लेशरूप बड़े अन्धकार से घिरे हुए हैं । जो भी कुछ लोग आत्मा की हत्या करनेवाले हैं, वे लोग मरने के बाद उन्हीं भयंकर लोकों को बारम्बार प्राप्त करते रहते हैं ।
अनेजदेकं मनसो जतीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् ।
तद्भावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्, तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥4 ॥
यह परमेश्वर अचल, एकमात्र तथा मन से भी अधिक तीव्र गतिवाला है और सबसे पहले सबको जाननेवाला है | इस परमेश्वर को इन्द्र आदि देवगण भी जान नहीं पाये हैं, वह ( परमात्मा, ब्रह्म ) स्वयं स्थिर रहकर ही अन्य तीव्र गतिशील पदार्थों से आगे बढ़ जाता है । उसके अस्तित्व से (उसकी सत्ताशक्ति से ) ही वायु आदि देव जलवर्षण आदि क्रियाएँ करने में समर्थ हैं ।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥5 ॥
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4 उपनिषत्सञ्चयनम् वह (आत्मतत्त्व) काँपता ( चलता ) है ( और) काँपता ( चलता) नहीं भी है । वह बहुत दूर है, (फिर भी ) वह बहुत नजदीक में भी है । वह इस समस्त (जगत्) के भीतर भी है और बाहर भी वही है ।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥6 ॥
परन्तु जो मनुष्य ( साधक ) सभी प्राणियों को परमात्मा में ही सर्वदा देखता रहता है और सभी प्राणियों में परमात्मा को देखता है, तब तो वह ( कभी भी किसी से भी ) घृणा नहीं करता ।
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥7 ॥
जिस अवस्था में परब्रह्म- परमात्मा को यथार्थ रूप में जाननेवाले महात्मा के ( अनुभव में ) सभी प्राणी केवल परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं, तब ऐसी स्थिति में भला कौन - सा मोह रह सकता है? और कौन- सा शोक रह सकता है? (तात्पर्य यह है कि ऐसा मनुष्य सर्वथा शोक- मोहरहित होकर परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है । ) स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ 8 ॥
वह महात्मा उस परम तेजोमय सूक्ष्मशरीर से भी रहित, छिद्र- क्षति से रहित, शिराओं से रहित ( अर्थात् पांचभौतिक देह से रहित), शुद्ध दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप, शुभाशुभ कर्मों के सम्बन्ध से रहित- ऐसे परमेश्वर को प्राप्त करता है; जो परमेश्वर सर्वद्रष्टा है, सर्वज्ञ है, ज्ञानस्वरूप, सर्वश्रेष्ठ, सदा विद्यमान, सर्वनियन्ता और स्वेच्छा से प्रकट होनेवाले हैं तथा अनादि काल से सभी प्राणियों के कर्मानुसार यथायोग्य सभी पदार्थों को उत्पन्न करने आये हैं ।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाः रताः ॥9 ॥
जो लोग अविद्या की ( केवल यज्ञ- यागादि की ) ही उपासना करते हैं, वे लोग अज्ञानरूप घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो लोग केवल विद्या में ही (ज्ञान के मिथ्याभिमान में ही) डूबे हुए हैं वे लोग तो उससे भी अधिक अन्धकार में प्रवेश करते हैं ।
अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥10 ॥
ज्ञान के समुचित अनुष्ठान से अलग प्रकार का ही फल कहा गया है और कर्मों के यथार्थ अनुष्ठान से भी तो उससे अलग ही फल कहा गया है । इस प्रकार हम लोगों ने उन परिपक्व बुद्धिवाले (स्थिर बुद्धिवाले ) लोगों से वचन सुने हैं । उन्होंने हमसे उस विषय की सम्यक् व्याख्या करके यह विषय कहा था ।
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयः सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥11 ॥
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ईशावास्योपनिषत् ( 1 ) जो मनुष्य इन दोनों को अर्थात् विद्या को और अविद्या को (ज्ञानतत्त्व को और कर्मतत्त्व को ) भी समुचित रूप से पहचान लेता है, वह कर्मों के अनुष्ठान से मृत्यु को पार करके ज्ञान के अनुष्ठान से (ज्ञानोपासना से ) अमृत को भोगता है (तात्पर्य यह कि ज्ञानोपासना से शाश्वत आनन्दस्वरूप परमब्रह्म को प्राप्त करता है ) ।
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्या रताः ॥12 ॥
जो लोग अशाश्वत ( विनाशी ) देव, पितृ, मनुष्य आदि की उपासना करते हैं, वे लोग अज्ञानरूपी घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो लोग शाश्वत परमतत्त्व में लीन होते हैं ( अर्थात् उनकी उपासना के मिथ्याभिमान से पागल हो गये होते हैं ) वे तो उनसे भी मानो अधिक अन्धकार में प्रवेश करते हैं ।
अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥13 ॥
शाश्वत ब्रह्म की उपासना से अलग ही फल प्राप्त होता है, ऐसा कहते हैं; और विनाशी देव- पितृ- मनुष्य आदि की उपासना से भी तो अलग ही फल की प्राप्ति कही गयी है । ऐसा वचन हम लोगों स्थिरबुद्धि वाले लोगों से सुना है! उन्होंने हमें इस विषय में स्पष्ट रूप से विवेचनपूर्वक समझाया है ।
संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयः सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते ॥14 ॥
जो मनुष्य उन दोनों को ( अर्थात् शाश्वत परमात्मा को और विनाशी देव-पितृ- मनुष्यादि को ) भी साथ- साथ में भलीभाँति पहचान लेता है, वह मनुष्य नश्वर देवादि की उपासना से मृत्यु को पार करके अविनाशी परमात्मा की उपासना से अमृत का उपभोग करता है अर्थात् शाश्वत आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ।
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु'सत्यधर्माय दृष्टये ॥15 ॥
हे सर्वपालक सर्वपोषक परमात्मन्! सत्यस्वरूप परमेश्वर ऐसे आपका मुख, ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल रूपी पात्र से ढँका हुआ है । आपकी भक्तिरूपी सत्यधर्म का अनुष्ठान करनेवाले मुझको आप अपना दर्शन करवाने के लिए उसे खोल दीजिए । पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रूपं
कल्याणतमं तत्ते पश्यामि । योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥16 ॥
हे भक्तपोषक! हे प्रधानज्ञानस्वरूप! हे सर्वनियन्ता! हे भक्तों के या ज्ञानियों के परम लक्ष्यस्वरूप! हे प्रजापति के प्रिय! इन किरणों को समेट लीजिए । इस तेज को इकट्ठा कर लीजिए ( अर्थात् अपने तेज में विलीन कर दीजिए), जिससे कि आपका जो अतिशय दिव्य और कल्याणकारी स्वरूप है, उसे मैं ( आपकी कृपा से ध्यानपूर्वक ) देख रहा हूँ कि जो वह ( सूर्य की आत्मा ) परमपुरुष आपका ही स्वरूप है और मैं वही हूँ ।
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6 उपनिषत्सञ्चयनम्
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तः शरीरम् ।
ॐ क्रतो स्मर कृतः स्मर क्रतो स्मर कृतः स्मर ॥17 ॥
अब ये मेरे प्राण और इन्द्रियाँ, अविनाशी ऐसे समष्टिवायुतत्त्व में प्रविष्ट ( विलीन) हो जायँ । यह स्थूल शरीर अग्नि में जलकर खाक हो जाय । हे सत्-चित्- आनन्दघन! ( ॐ ) हे पज्ञस्वरूप प्रभो! आप मुझ भक्त को याद कीजिए! मेरे द्वारा किये गये कर्मों को याद कीजिए ।
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥18 ॥
इति वाजसनेयिसंहितायामीशोपनिषत्समाप्ता । हे अग्नि के अधिष्ठाता देव! हमें परमसम्पत्तिरूप परमात्मा की सेवा में पहुँचाने के लिए सुन्दर मंगलकारी मार्ग ( उत्तरायण मार्ग) पर आप ले चलिए । हे देव! आप हमारे सभी कर्मों को जाननेवाले हैं । इसलिए हमारे इस मार्ग के प्रतिबन्धक जो भी कुछ पाप हों, उन सभी को आप दूर कर दीजिए । आपको बारम्बार नमस्कार के वचन कहते हैं, बारम्बार नमस्कार करते हैं । इस प्रकार ईशावास्योपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
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( 2 ) केनोपनिषत् (उपनिषत्परिचय) प्राचीनतम माने गये दस उपनिषदों की श्रेणी में ईशावास्योपनिषद् के बाद केनोपनिषद् की गणना की जाती है । जो दस उपनिषदें बड़ी ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं, उनमें केनोपनिषद् का स्थान द्वितीय है । इस उपनिषद् का नाम भी आरंभ के 'केन' शब्द से रखा गया है । यह उपनिषत् सामवेद के तलवकाब्राह्मण में नौवें अध्याय में आई है, इसलिए इसे ‘ तलवकार उपनिषद्' भी कहा जाता है । तलवकार वे लोग कहे जाते थे कि जो स्वरताल के साथ सामगान कर सकते थे । सामगान की यह पूर्वकालीन प्रथा बाद के वर्षों में लुप्त हुई- सी मालूम पड़ती है । इस उपनिषद् की जैमिनीय शाखा और जैमिनि ब्राह्मण है । केनोपनिषद् के चार खण्ड हैं । पहले दो खण्ड पद्यात्मक हैं और अन्तिम दो खण्ड गद्यात्मक हैं । कुल मिलाकर मन्त्र की संख्या 35 है । जिज्ञासु शिष्य के इस प्रश्न से उपनिषद् का प्रारंभ होता है कि चक्षुः - श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों और मन को स्फूर्ति देने वाले उनके पीछे कौन-सा तत्त्व है? उत्तर में गुरु सर्वनियामक, सर्वसंचालक ब्रह्मतत्त्व का काव्यात्मक ढंग से वर्णन करते हैं । गुरु ब्रह्म को चक्षु का भी चक्षु, श्रवण का भी श्रवण, वाणी की भी वाणी और मन का भी मन कहते हैं । ब्रह्म की ही शक्ति से सबको शक्ति मिलती है । ऐसा कहकर ब्रह्मतत्त्व की अवाङ्मनसगोचरता दिखलाई गई है । अनुभूति में भी दुरूहता बताई गई है । पहले पद्यात्मक दो खण्डों में गुरु- शिष्य संवाद के रूप में प्रश्नोत्तर की शैली में सुन्दर रीति से परमतत्त्व ब्रह्म की विशेषताओं तथा उसकी अनुभूति की अनिवार्य आवश्यकताओं काके वर्णन किया गया है और अन्तिम दो (तीसरे और चौथे ) गद्यात्मक खण्डों से देवताओं अभिमान के मर्दन के लिए, यक्ष के रूप में ब्राह्मी चेतना के प्रकट होने का एक उपाख्यान दिया गया है । अन्त में परब्रह्म की उपासना का प्रकार और फल बताकर ब्रह्मविद्या के साधनों का। निर्देश किया गया है तथा उन साधनों से उस रहस्य को पहचनाने की महिमा गाई गई है कहीं - कहीं इस उपनिषद् को ब्राह्मणोपनिषद् भी कहा गया है । शान्तिपाठः च ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणिब्रह्म सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा निरतेमा निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
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8 उपनिषत्सञ्चयनम् हे परब्रह्म परमात्मा! मेरे सभी अंग- वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र और सभी इन्द्रियाँ तथा बल परिपुष्ट हों । यह जो सर्वरूप उपनिषत्प्रतिपादित ब्रह्म है, उस ब्रह्म की हम अवगणना (तिरस्कार) न करें और ब्रह्म ( भी ) हमारा परित्याग न करें । उस (ब्रह्म ) के साथ हमारा अटूट सम्बन्ध हो । उपनिषदों में प्रतिपादित जो सब धर्म हैं, वे सब परमात्मा में रत हममें प्रविष्ट हों, वे सद धर्म हमारे में हों । हे परमात्मा! ( हमारे ) त्रिविध तापों की शान्ति हो । अथ प्रथमः खण्डः
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥1 ॥
किस तत्त्व से सत्ता ( स्फूर्ति) प्राप्त करके और प्रेरित होकर यह मन ( अन्तःकरण ) अपने विषयों से संलग्न होता है? ( विषयों तक पहुँचता है? ) किससे नियुक्त होकर यह सर्वश्रेष्ठ नेत्रेन्द्रियहै?औरकिसकेश्रोत्रेन्द्रियद्वारा कोगतिशीलअपने- बनाईअपने हुईविषयइसकेवाणीअनुभवको लोगमें लगाताबोलतेहैप्राणहैं? गतिऔरकरताकौन प्रसिद्धहै, अर्थात्देव? चलता करता है अर्थात् नियुक्त
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचः स उ प्राणस्यप्राणः ।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥2 ॥
जो ( तत्त्व) मन का भी मन ( कारण ) है; प्राण का भी प्राण है; वाणी की भी वाणी है, (; लोगका भीउसकोश्रोत्र हैपहचानऔर चक्षुरिन्द्रियकर जीवन्मुक्तका होकरभी चक्षुइसहै मर्त्यलोकवही इससेसमस्तचले जानेजगत्केका प्रेरक ) परमात्मा हैश्रोत्रेन्द्रिय| ज्ञानी ( ) ( ) अमर जन्ममरणरहित हो जाते हैं । बाद अर्थात् मृत्यु के बाद
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः ।
न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि ।
इति शुश्रूम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥3 ॥
वहाँ (उस ब्रह्म तक ) न तो चक्षुरिन्द्रिय आदि इन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ भी पहुँच सकती हैं और मन भी तो नहीं ही पहुँच सकती हैं न ही वागिन्द्रिय आदि ऐसा है’– इस प्रकार हम अपनी बुद्धि से भी पहुँच पाता, इसलिए इस ब्रह्म के स्वरूप को, ‘ यह पाते । क्योंकि— “वह ब्रह्मतत्त्व जाने हुए सभीनहींज्ञेयपहचान पाते और दूसरों से सुनकर भी नहीं समझ साथ ) इन्द्रियों के द्वारा नहीं जाने गए पदार्थसमुदाय सेपदार्थों से बिल्कुल अलग ही है और ( साथ ही " –के हम सुनते भी उच्चतम ही सेहै स्पष्ट। ऐसाकरके अपनेसमझायापूर्वाचार्योंथा । मुख से आए हैं । उन्होंने हमें यह ब्रह्मतत्त्व अच्छी तरह
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥4 ॥
जो ब्रह्म वाणी द्वारा बताया गया नहीं है, पर को तुम जानो । वाणी के द्वारा बताए गए जिस तत्त्ववाणीकी ही जिसके द्वारा बोली जा सकती है, उसी लोग उपासना करते है, वह ब्रह्म नहीं है ।