Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 321–330

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 321 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ).279 उनके ये नाम कर्मानुसारी ही हैं । इसलिए जो उनमें से एक- एक देव की उपासना करता है, वह ( इसके वास्तविक स्वरूप को ) जानता नहीं है । इसीलिए वह यह अपूर्ण है । वह एक- एक विशेषण से युक्त होता है । इसलिए ‘ यह सब आत्मा ही है' – ऐसी उपासना करनी चाहिए । क्योंकि इस आत्मा में ही ये सब एक हो जाते हैं । वह यह आत्मतत्त्व ही इन सबमें जानने योग्य है । क्योंकि यह ' आत्मा' है, इस आत्मा को जानने से ही इस सारे जगत् को ( मनुष्य ) जान लेता है । जैसे ( व्यवहार में ) खोए हुए पशु के पदचिह्न से वह पशु खोज लिया जाता है, उसी प्रकार जो इस तथ्य को इस प्रकार जानता है, वह कीर्ति और स्वजन का समागम प्राप्त करता है । तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्प्रेयोऽन्यस्मात्सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रिय रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति ॥8 ॥

वह यह आत्मतत्त्व पुत्र से भी अधिक प्रिय होता है, धन से भी अधिक प्रिय होता है । अन्य सभी से भी अधिक प्रिय होता है । क्योंकि यह आत्मा सबसे अत्यन्त समीपवर्ती है । तो यह जो आत्मदर्शी है, वह जो मनुष्य आत्मा से भिन्न ( अन्य) को प्रिय कहता है उससे यह कह दे कि “ तुम्हारा प्रिय नष्ट हो जाएगा । " और होता भी तो ऐसा ही है, क्योंकि वह समर्थ होता है । इसलिए आत्मरूप प्रिय की ही उपासना करनी चाहिए । तो जो आत्मतत्त्व को सर्वाधिक प्रिय मानकर उसकी उपासना करता है, उसका प्रिय कदापि नष्ट नहीं होता । तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते किमु तद्ब्रह्मा- ऽवेद्यस्मात् तत्सर्वमभवदिति ॥9 ॥

जिस ब्रह्मविद्या से “ हम सर्वरूप ( अशेष ) हो जाएँगे” – ऐसा लोग मानते हैं, उस ब्रह्म के विषयहो में जिज्ञासु ब्राह्मणों ने कहा है कि "ब्रह्म क्या है? उसने क्या जाना कि जिससे वह सर्वरूप गया ”? ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत् सर्वमभवत् तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवः सूर्यश्चेति तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाऽहं ब्रह्मास्मीति स इदः सर्वं भवतिदेवतामुपास्ते-तस्य ह न देवाश्चऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीतिनाभूत्या ईशत आत्मान सह्येषाःवेद सयथाभवत्यथपशुरेवयोऽन्यांस देवानां यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुंज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेवतन्न प्रियं यदेत- पशावादीयमानेऽप्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां न्मनुष्या विद्युः ॥10 ॥

वह ब्रह्म सर्वरूप हो पहले यह ब्रह्म ही था । उसने स्वयं को जाना कि 'मैं ब्रह्म हूँ । ' इसलिएहो गये । इसी प्रकार गया । देवों में से जिस-जिसने ब्रह्म को जाना, वे स्वयं ही तद्रूप (ब्रह्मरूप ) ऋषियों में और मनुष्यों में जिसने- जिसने ब्रह्म को जाना वे तद्रूप (ब्रह्मरूपभी) थाहो ।"गये । उसीसमयकोमें भीही - ", आत्मरूप से देखते हुए ऋषि वामदेव ने कहा कि मैं मनु था मैं सूर्य इस

पृष्ठ 322

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 322 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

280 उपनिषत्सञ्चयनम् इस ब्रह्म को, “ मैं ब्रह्म हूँ” –इस प्रकार जो कोई जानता है, तो वह सर्वरूप हो जाता है । ऐसे ब्रह्मज्ञानी की ‘ब्रह्मरूपता न हो ' अर्थात् उसका सर्वात्मभाव न होने देने में देवलोग भी सामर्थ्य नहीं रखते । क्योंकि वह ब्रह्मवेत्ता उनका भी ( देवों का भी) आत्मा हो जाता है । देवों का भी ध्येय, देवों का भी विज्ञेय ब्रह्म हो जाता है । और जो अन्यान्य देवों की उपासना करता है कि - "वह अन्ना है, मैं अन्य हूँ ” ऐसा मानता है, वह पशु के समान हो जाता है । जैसे बहुत से पशु अपने मालिक का पालन- पोषण करते हैं, वैसे ही एक- एक अज्ञानी पुरुष देवों का पालन- पोषण करता है । एक भी पशु का हरण किए जाने पर मनुष्य को अच्छा नहीं लगता तो फिर बहुत से पशुओं के हरण किए जाने पर तो कहना ही क्या है? इसलिए उन देवताओं को यह बात अच्छी नहीं लगती कि मनुष्य इस बात को जान लें । ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकः सन्न व्यभवत्तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्यु- रीशान इति तस्मात्क्षत्रात्परं नास्ति तस्माद्ब्राह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद्ब्रह्म तस्माद्यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उपनिश्रयति स्वां योनिं य उ एन हिनस्ति स्वाः स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयास हिसित्वा ॥11 ॥

आरम्भ में एक ब्रह्म ही था । अकेले होने से वह विभूतियुक्त कार्य करने में असमर्थ था । उसने प्रशस्त क्षेत्र की रचना की । देवों में जो क्षत्रिय जाति के हैं, वे इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र,, ( ),, मृत्यु ईशान आदि हैं उन्हें उत्पन्न किया इसलिए क्षत्रिय से उत्कृष्ट कोई नहीं है पर्जन्य यम राजसूय यज्ञ में क्षत्रिय के नीचे बैठकर उपासना करता है । अपने यश को वह क्षत्रिय। इसीलिए ब्राह्मण, ( ) करता है । जो ब्रह्म है वह क्षत्रिय की योनि जन्मस्थान है । इसलिए यद्यपि में ही स्थापित प्राप्त करता हो, परन्तु राजसूय के पूर्ण होने के बाद अन्त में ब्राह्मण का ही राजाआश्रयश्रेष्ठत्व को भले ही ब्राह्मण से ही उसका जन्म हुआ है । जो कोई उस ब्राह्मण को मारता लेता है । क्योंकि करता है । जैसे श्रेष्ठ की हिंसा से पुरुष पापी होता है, वैसे ही है, वह अपनी ही योनि का नाश वह भी पापी होता है । स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि इति ॥12 ॥ यन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत गणश आख्या- वह ब्रह्म विकसित कर्म करने में असमर्थ हुआ

सामूहिक रूप से पहचाने जाते हैं । जैसे रुद्र ( ग्यारह ), वसु, तब उसने वैश्य को उत्पन्न किया । जो देव ( ) ( ), ( ), ( )और मरुत् उनचास हैं । आठ आदित्य बारह विश्वदेवा तेरह स नैव व्यभवत्स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमियं यदिदं किञ्च ॥13 ॥ वै पूषेय हीदः सर्वं पुष्यति

वह ब्रह्म विभूतियुक्त कर्म करने की । यह पृथ्वी ही पूषा है ( पोषण करनेवालीमें समर्थ नहींहै ), हुआक्योंकि। उसने सबके पोषक ऐसे शूद्रवर्ण की रचनाकरती है । स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत यहाँ जो कुछ है उन सबका पोषण वही स्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान् धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्त- बलीयासमासते धर्मेणयथा

पृष्ठ 323

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 323 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 281 राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्त सत्यं वदतीत्येतद्येवैतदुभयं भवति ॥14 ॥

फिर भी ब्रह्म से विभूतियुक्त कार्य न हो सका । इसलिए उसने कल्याणस्वरूप धर्म (न्याय ) को उत्पन्न किया । वह धर्म क्षत्रिय का भी रक्षण करता है । धर्म से उच्चतर कोई भी वस्तु नहीं है । इसलिए जैसे दुर्बल मनुष्य राजा की सहाय से बलवान को जीतना चाहता है, वैसे ही धर्म (न्याय ) की सहायता से (मनुष्य ) अपने से अधिक बलवान् को जीतना चाहता है । धर्म ही सत्य है । इसलिए जो मनुष्य सत्य बोलता है, उसके विषय में कहा जाता है कि वह धर्मानुसार बोल रहा है, और जो मनुष्य धर्मानुसार बोलता है, उसके विषय में कहा जाता है कि वह सत्य बोल रहा है । इस तरह धर्म और सत्य दोनों एक ही हैं । तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद्ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यः शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोक- मिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्या हि रूपाभ्यां ब्रह्माभवत् । अथ यो ह वा अस्माल्लोकात्स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाननुक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदिह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवमात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मा- नमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते अस्माद्धयेवात्मनो यद्यत्क्रामयते तत्तत्सृजते ॥15 ॥

इसी तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – ये चार वर्ण उत्पन्न हुए । ब्रह्म ही देवों में अग्निरूपमें में ब्राह्मण ( श्रेष्ठवर्ण) हुआ । मनुष्यों में वह ब्राह्मणरूप में हुआ । क्षत्रियों में ब्रह्म क्षत्रिय बनाहैं, तथा, वैश्यपृथ्वी वैश्य बना, शूद्रों में शूद्ररूप हुआ । इसीलिए लोग देवलोक में जाकर अग्नि बनना चाहते से प्रकट हुआ पर मनुष्यों में ब्राह्मण ही बनना चाहते हैं क्योंकि अग्नि और ब्राह्मण में ब्रह्म उसकाविशेषरूपरक्षण आत्मा नहीं था । अब जो मनुष्य आत्मा को बिना देखे ही इस जगत् से चला जाननेवालेजाता है, या कर्म न करनेवाले का, करता क्योंकि उसने आत्मा को जाना नहीं होता । जैसे वेद को न मनुष्य आत्मा रक्षण वेद और कर्म नहीं करते, वैसा ही आत्मा को न जाननेवाले का भी होता उसकाहै । जोपुण्य भी अन्त को जाने बिना ही इष्टफलदायक अश्वमेध यज्ञादि बड़ा पुण्यकार्य भी करतारखकरहै, उसकी उपासना करनी में नष्ट हो जाता है । इसलिए मनुष्य को आत्मा के ऊपर ही श्रद्धा, उसका किया हुआ कार्य नष्ट नहीं चाहिए । जो मनुष्य आत्मा की ही श्रद्धापूर्वक उपासना करता है होता । वह जो कुछ चाहता है, उसे प्राप्त कर सकता है । अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजतेनिपृणातितेन देवानां लोकोऽध यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्योयदेभ्योऽशनं ददाति तेनयत्प्रजामिच्छतेमनुष्याणामथतेन यत्पशुभ्यस्तृणोदकंपितॄणामथ यन्मनुष्यान्वासयतेविन्दतितेनतेनतेषांपशूनांलोकोयदस्ययथाहगृहेषुवै श्वापदा वयास्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेव हैवंविदे सर्वाणि तद्वा एतद्विदितं मीमा सितम् ॥16 ॥

पृष्ठ 324

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 324 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

282 उपनिषत्सञ्चयनम् अब यह जो आत्मा है ( शरीरेन्द्रिय संघात रूप कर्माधिकारी गृहस्थ आत्मा है ), वह सभी जीवों का लोक है ( आधार है ), ऐसा आत्मा जो होम करता है, जो यज्ञ करता है, उससे देवताओं का पोषण होता है । वह जो स्वाध्याय करता है उससे ऋषियों का, जो पिण्डतर्पणादि करता है तथा सन्तानप्राप्ति करता ( चाहता) है इससे पितृओं का, और जो मनुष्यों को आश्रय देता है तथा उन्हें खिलाता-पिलाता है उससेमनुष्यों का, और जो पशुओं को चारा- पानी पहुँचाता है उससे पशुओं का, और अपने घरों में कुत्तों, बिल्लियों, पक्षियों आदि को एवं चींटी तक के जीव-जन्तुओं को वह जो पोषण करता है, इससे उन सबका बड़ा परितोष और पोषण होता है, वह (परितोषक- पोषक ) योग्य हो जाता है । जैसे अपने शरीर के लिए मनुष्य अविनाशित्व चाहता है, वैसे ही इस प्रकार जाननेवाले के लिए सभी प्राणी अविनाशित्व चाहते हैं । इसीलिए यह मीमांसा प्रसिद्ध है । अर्थात् पंचमहायज्ञ प्रकरण में आवश्यक कर्मों की चर्चा सुप्रसिद्ध है । आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छश्च नातो भूयो विन्देत्तस्मादप्येतह्यैकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्य कृत्स्नता मन एवास्यात्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैव श्रोत्रेण हि तच्छृणोत्यात्मैवास्य कर्मात्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्ङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशु पाङ्ङ्क्त पुरुषः पाङ्ङ्क्तमिदः सर्वं यदिदं किंच तदिद‍ सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥17 ॥

इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ प्रारंभ में अकेला यह देहेन्द्रिय संघातरूप आत्मा ही था । उसने इच्छा; ( ) – “ औरअधिकप्रजारूपइच्छा सेहो उत्पन्नतो भीहोऊँवह पूर्णमुझेनहींधन होप्राप्तसकतीहो और, इसलिएमैं यज्ञादिआज कर्म करूँ ।कीबसकि, इतनीमैंहीस्त्रीवालाइच्छा हैहोऊँ। " ६ स्त्री हो तो अच्छा हो, उससे मैं सन्तानोत्पत्ति करूँ । और धनभी अकेला आदमी चाहता है कि “ मुझे ” पुण्यकार्य कर सकूँ । जहाँ तक मनुष्य को इनमें है कि मैं अधूरा हूँ । उसकी वह कमी इस तरह पूर्ण से एक-एक वस्तुहो नहींतो मिलतीअच्छा,किवहाँजिससेतक उसेमैं यज्ञादिलगता आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण सन्तान है, आँख ही उसकाहोती है कि यदि वह जान ले कि मन ही उसका मानुष धन को देख पाता है । कान उसका पारलौकिक दुनिया का धन है, क्योंकि आँख से ही सब से ही सुनता है । शरीर ही शरीरात्मा धन है, क्योंकि उस धन के विषय में वह कानों , (,,, कर्म है, क्योंकि) है आत्मा वाणी प्राण चक्षु और श्रोत्र पशु से ही वह कर्म करता है । यह यज्ञ पाँच प्रकार का का है । जो इस प्रकार जानता है, वह जो कुछ भी पाँच प्रकार का है, पुरुष भी उक्त प्रकार से पाँच प्रकार भी यहाँ है, उसे प्राप्त कर सकता है । ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ ।) पञ्चमं ब्राह्मणम् यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत्पिता " भाजयत् । त्रीण्यात्मनेऽकुरुत पशुभ्य एकं। एकमस्यप्रायच्छत्तस्मिन्सर्वंसाधारणं द्वेप्रतिष्ठितंदेवान-

पृष्ठ 325

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 325 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 283 यच्च प्राणिति यच्च न कस्मात्तानि न क्षीयन्तेऽद्यमानानि सर्वदा । यो वैतामक्षितिं वेद सोऽन्नमत्ति प्रतीकेन स देवानपि यच्छति स ऊर्जमुप- जीवतीति श्लोकाः ॥1 ॥

प्रजापति ने विज्ञान से और कर्म से जिन सात अन्नों की रचना की, उनमें से एक अन्न तो सर्वसाधारण है । दो अन्न देवों को बाँट दिए । तीन अन्न अपने लिए रखे और एक अन्न पशुओं को दिया । पशुओं को दिए गए उस अन्न से जो कुछ साँस लेता है या नहीं लेता वह सब कुछ टिकता रहता है । वे सभी अन्न प्रतिदिन खाये जाने पर भी क्यों क्षीण नहीं हो जाते? जो मनुष्य उसके क्षीण न होने का कारण जानता है, वह मुखरूपी प्रतीक से अन्न का भक्षण करता है, और देवताओं को प्राप्त होता है । वह अमृत का भोक्ता बनता है । इस विषय में ये मन्त्र हैं यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत्पितेति मेधया हि तपसाऽजनयत्पि- तैकमस्य साधारणमितीदमेवास्य तत्साधारणमन्त्रं यदिदमद्यते स य एत- दुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्र ह्येतद्वै देवानभाजयदिति हुतं च प्रहुतं च तस्माद्देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वत्यथो आहुर्दर्शपूर्णमासाविति । तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात्पशुभ्य एकं प्रायच्छदिति तत्पयः पयो ह्येवाग्रे मनुष्याश्च पशवश्चोपजीवन्ति तस्मात् कुमारं जातं घृतं वैवाग्रे प्रति- लेहयन्ति स्तनं वानु धापयन्त्यथ वत्सं जातमाहुरनुतृणाद इति । तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च नेति पयसि ही सर्वं प्रतिष्ठितं यच्च प्राणिति यच्च न । तद्यदिदमाहुः संवत्सरं पयसा जुह्वदप पुनर्मृत्युं जयतीति न तथा विद्याद्यदहरेव जुहोति तदहः पुनर्मृत्युमपजयत्ये- वंविद्वान्सर्व हि देवेभ्योऽन्नाद्यं प्रयच्छति । कस्मात्तानि न क्षीयन्ते- ऽद्यमानानि सर्वदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं पुनः पुनर्जनयते यो वैतामक्षितिं वेदेति पुरुषो वा अक्षितिः स हीदमन्नं धिया धिया जनयते । कर्मभिर्यद्वैतन्न कुर्यात्क्षीयेत ह सोऽन्नमत्ति प्रतीकेनेति मुखं प्रतीकं मुखेनेत्येतत्स देवानपि गच्छति स ऊर्जमुपजीवतीति प्रशसा ॥2 पिता प्रजापति ने अपनी मेधा ( बुद्धि और तप) कर्म से जो सात अन्न बनाए, ॥वे सचमुच पिता ने ज्ञान से और कर्म (तप) से उत्पन्न किए । उनमें से एक साधारण अन्न है । और वही यह साधारण अन्न है, जो खाया जाता है । जो ( शरीर के लिए ) इसकी उपासना करता है, वह पाप से ( अधर्मऐसासे ) नहीं बच सकता, क्योंकि यह अन्न मिश्र अर्थात् सभी प्राणियों का है । दो अन्न देवों को बाँट दिए कहा है । वे दो अन्न यह हैं— 1. हुतम्— यज्ञ में देवों के लिए होम किया गया और 2. करतेप्रहुतम्हैं–, औरयज्ञ में से बलि के लिए लिया हुआ । इसलिए आज भी गृहस्थ लोग देवताओं के लिए होम हैं । इसलिए होम करने के बाद बलिहरण भी करते हैं । कुछ लोग यही दर्शपूर्णमास है ऐसा कहते और पशु सकाम यज्ञों का यजन नहीं करना चाहिए । एक अन्न जो पशुओं को दिया वह दूध है । मनुष्य ही चटाए वास्तव में दूध से ही जीते हैं (टिकते हैं ) । इसीलिए उत्पन्न हुए बच्चे को नहींशुरूखानेवालामें दूध और' कहाघी जाता है । ' ( )जाते हैं । अथवा स्तनपान करवाते हैं । और उत्पन्न हुए बछड़े को घास आधारित है । अर्थात् जो साँस लेता है और जो साँस नहीं लेता- वह सब कुछ अन्न में ही प्रतिष्ठित है । एक वर्ष तक दूध श्वास लेने वाला और न लेनेवाला सब कुछ इस पयस ( दूध) पर ही आधारित

पृष्ठ 326

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 326 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

284 उपनिषत्सञ्चयनम् से यज्ञ करनेवाला मनुष्य बार- बार मृत्यु को जीतता है ऐसा जो कहा गया है, वह ठीक नहीं है । परन्तु जिस दिन वह दूध से होम करता है, उसी दिन वह मृत्यु को जीत लेता है । इस प्रकार जाननेवाला अवश्य ही अपना सब अन्नाद्य देवों को दे देता है । सर्वदा खाए जाने पर भी भला वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते? क्योंकि अन्न का क्षय नहीं होने देनेवाला पुरुष है । क्योंकि बुद्धि (ज्ञान) और मेहनत से वह अत्र को उगाता है । जो मनुष्य इस अक्षिति को पुरुष के रूप में-' पुरुष ही अक्षिति है ' इस प्रकार जानता है, वही इस अन्न को बुद्धि और कर्मों से उत्पन्न करता है । यदि वह ऐसा नहीं करता तब तो क्षीण हो ही जाता । वह प्रतीक से अनाज खाता है इसका अर्थ है मुख ( मुख्यत्व - प्रधानत्व) अर्थात् वह प्रमुखता से अन्न खाता है गौण रूप से नहीं और कहा गया है कि- "वह देवों के पास जाता है और अमृत का भोक्ता बनता है "" – यह सब तो अनाज की स्तुति करने के वचन हैं । त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति मनो वाचं प्राणं तान्यात्मनेऽकुरुतान्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषमिति मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति । कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धी- भीरित्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति यः कश्च शब्दो वागेव सैषा ह्यन्तमायत्तैषा हि न प्राणेऽपानो व्यान उदानः समानोऽन इत्येतत्सर्वं प्राण एवैतन्मयो वा अयमात्मा वाङ्मयो मनोमयः प्राणमयः ॥3 ॥

उसने ( जगत्पिता ने ) तीन अन्न अपने लिए नियत किए जो मन, वाणी और प्राण ( श्वास ) हैं । लोग कहते हैं— “मेरा मन अन्यत्र था इसलिए मैंने देखा नहीं, मेरा मन अन्यत्र था इसलिए मैंने सुना नहीं । ” इसलिए मनुष्य वास्तव में मन से ही देखता है और मन से ही सुनता है । इच्छा, संकल्प शंका, श्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि, भय - यह सब मन स्वरूप ही है । इसलिए यदि मनुष्य,,,कोई पीठ का स्पर्श करे तो भी वह मन से ही जान लेता है । जो कोई आवाज है वह का क्योंकि यह वाणी किसी अभिधेय ( अर्थ का ही ) अनुसरण करती है, स्वयं कुछ नहीं वाणी ही है । व्यान, उदान, समान — ये सब प्राण (श्वास ) के रूप हैं । वास्तव में तो यह शरीर, वाणीहै,। प्राण, अपान,से ही निर्मित हुआ है । मन और प्राण यो लोका एत एव वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः ॥4 ॥

तीन लोक ये ही हैं — वाणी लोक है, मन अन्तरिक्ष लोक है औरप्राण स्वर्गलोक है । त्रयो वेदा एत एव वागेवर्वेदो मनो यजुर्वेदः प्राणः सामवेदः तीन वेद भी वे ही हैं — वाणी ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद॥5 ॥है ।

देवाः पितरो मनुष्या एत एव वागेव देवाः मनः पितरःप्राणो मनुष्याः ॥6 ॥

देव, पितर और मनुष्य भी ये ही हैं - वाणी ही देव है, पितर पिता माता प्रजैत एव मन एव पिता वाङ्माता मन है और प्राण मनुष्य है । प्राणः प्रजा ॥7 ॥

पिता, माता और प्रजा भी ये ही हैं — मन ही पिता है, वाणीमाता है और प्राण प्रजा है ।

पृष्ठ 327

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 327 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 285 विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत् किंच विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वाऽवति ॥8 ॥

जाना हुआ, जाननेयोग्य तथा न जाना हुआ — ये भी इस तीन के ही रूप हैं । जो कुछ जाना हुआ है वह वाणी का रूप है, क्योंकि वाणी जानी हुई होती है । ऐसा रूप धारण करके वाणी मनुष्य का रक्षण करती है । यत्किंच विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वा- ऽवति ॥9 ॥

जो कुछ जाननेलायक है, वह मन का रूप है क्योंकि जाननेवाले के लिए मन ही इष्ट है । मन ही जाननेलायक होकर उसकी रक्षा करता है । यत्किंचाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वा- ऽवति ॥10 ॥

जो कुछ अविज्ञात है वह प्राण का ही रूप है, क्योंकि प्राण अविज्ञात है । प्राण अविज्ञात होकर उसका रक्षण करता है । तस्यैव वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्तद्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥11 ॥

यह पृथ्वी उस वाणी का शरीर है । यह अग्नि उसमें ज्योतिरूप से रहता है । जितनी वाणी है, उतनी पृथ्वी है । यह अग्नि भी उतना ही है । अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्ता- वती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनः समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥12 ॥

इस तरह इस मन का द्युलोक शरीर है । वह आदित्य ज्योतिरूप है । वहाँ जितने परिमाण का मन है, उतने ही परिमाणवाला द्युलोक है और उतना ही आदित्य है । वह अग्निरूप वाणी और आदित्य रूप मन—दोनों परस्पर संयुक्त हुए । उससे प्राण उत्पन्न हुआ । वह यह इन्द्र है वह शत्रुरहित है । प्रतिपक्षी तो कोई अपने से अलग ही होता है । जो कोई भी इस प्रकार जानता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता । अथैतस्य प्राणस्यापः शरीरं ज्योतीरूपमसौ चन्द्रस्तद्यावानेव प्राणस्ता- वत्य आपस्तावानसौ चन्द्रस्त एते सर्व एव समाः सर्वेऽनन्ताः स यो हैतानन्तवत उपास्तेऽन्तवन्तः स लोकं जयत्यथ यो हैताननन्तानु- पास्तेऽनन्तः स लोकं जयति ॥13 ॥

है उतना जल है और जल प्राण का शरीर है । उसमें ज्योति रूप में चन्द्र रहता है । जितना प्राण मानकर उतना ही चन्द्र है । ये सब (वाणी, मन, प्राण) समान हैं । वे अन्तहीन हैं । उन्हेंहै अन्तवाला। पर उन्हें अनन्त जो उनकी उपासना करता है, वह वैसे ही अन्तवाले (स्वर्गादि ) लोक में जाता मानकर जो उसकी उपासना करता है, वह अनन्तलोक में जाता है ।

पृष्ठ 328

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 328 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

286 उपनिषत्सञ्चयनम् स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलस्तस्य रात्रय एव पञ्चदशकला धुवैवास्य षोडशी कला स रात्रिभिरेवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते सोऽमावास्या रात्रिमेतस्या षोडश्या कलया सर्वमिदं प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते तस्मादेता रात्रिं प्राणभृतः प्राणं न विच्छिन्द्यादपि कृकलासस्यैतस्या एव देवताया अपचित्यै ॥14 ॥

यह संवत्सर ही प्रजापति है । वह सोलह कलाओं वाला है । रात्रियाँ ही उसकी कलाएँ हैं । सोलहवीं अमावसरूप कला स्थिर है । वह चन्द्र शुक्लपक्ष में रात्रियों से ही बढ़ता है और कृष्णपक्ष में उन्हीं से क्षीण होता है । अमावास्या की रात्रि में वह इस सोलहवीं कला के माध्यम से सभी सजीव प्राणियों के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । फिर दूसरे दिन जन्मता है । इसलिए अमावस की रात्रि में किसी प्राणी के प्राण का विच्छेद देवपूजा के लिए भी नहीं करना चाहिए, गिरगिट तक का भी नहीं । यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पु- रुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदशकला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीर्यत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः ॥1 5 ॥ वह यह जो सोलह कलावाला संवत्सर प्रजापति है, वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा ( शरीर) ही सोलहवीं कला है । वित्त से ही वह बढ़ता- घटता है । यह जो आत्मा ( पिण्ड - शरीर ) है, वह रथचक्र की नाभिरूप है । और वित्त रथचक्र के बाहर का परिघ है । इसलिए पुरुष यदि सर्वस्व खो बैठे और दीन- हीन हो जाए और ग्लानि का अनुभव करे, तो भी अगर देहपिण्ड से जीता हो, तो लोग ऐसा ही कहते हैं कि “ वह केवल बाह्य परिवार से ही चला गया है । अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोको देवलोकः पितृलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानां श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशसन्ति ॥16 । मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक— ये तीन ही लोक हैं । जो यह मनुष्यलोक है, वह पुत्र द्वारा ही जीता जाता है अर्थात् प्राप्त ( सिद्ध ) किया जाता है, दूसरे किसी कर्म से नहीं । कर्म से पितृलोक और विद्या से देवलोक जीते जा सकते हैं अर्थात् प्राप्त (सिद्ध ) किए जा सकते हैं | देवलोक सब, में श्रेष्ठ है इसीलिए तो लोग विद्या की प्रशंसा करते हैं । लोकों अथातः संप्रत्तिर्यदा प्रैष्यन्मन्यतेऽथ पुत्रमाह त्वं ब्रह्म त्वं इति स पुत्रः प्रत्याहाहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं लोक इति यज्ञस्त्वं लोक तस्य सर्वस्य ब्रह्मेत्येकता । ये वै के च यज्ञास्तेषाः यद्वै किंचननूक्तं सर्वःये वै सन्नयमितोऽभुनजदितिके च लोकास्तेषाः सर्वेषांतस्मात्लोकपुत्रमनुशिष्टंइत्येकतैतावद्वासर्वेषांइदःयज्ञसर्वमेतन्माइत्येकता मनुशासति स यदैवंविदस्माल्लोकात्प्रत्यथैभिरेव लोक्यमाहुस्तस्मादेन- स यद्यनेन किंचिदक्ष्णयाकृतं भवति प्राणैः सह पुत्रमाविशति तस्मात्पुत्रो नाम स पुत्रेणैवास्मिँल्लोके तस्मादेनःप्रतितिष्ठित्यथैनमेतेसर्वस्मात्पुत्रो मुञ्चति अमृता आविशन्ति ॥17 ॥ दैवाः प्राणा

पृष्ठ 329

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 329 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 287 अब यहाँ सम्प्रत्ति ( सम्प्रदान) कहा जाता है । पिता जब - “ अब मैं मरूँगा” ऐसा समझता है, तब पुत्र से कहता है— “तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है । " तब पुत्र प्रतिवचन कहता है— “मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ । ” पिता ने जो कुछ वेदाध्ययन किया है वह सब ब्रह्म है, जो यज्ञ किए हैं वे सब मिलकर ' यज्ञ' हैं, जितने जगत् हैं, उनका समास ' लोक' शब्द में होता है । इन तीन शब्दों में सब कुछ आ जाता है | पिता सोचता है कि पुत्र में यह सब कुछ है, इसलिए वह मुझे जगत् के पार पहुँचायेगा । इसलिए पढ़कर विद्वान् पुत्र को 'लोक्य' (लोक को प्राप्त कराने वाला ) कहा गया है । इसलिए पिता उसे पढ़ाता है । ऐसा जाननेवाला जो मनुष्य जब इस लोक से चला जाता है । तब इन प्राणों के साथ ही पुत्र में प्रवेश करता । और पिता ने अमुक कार्य यदि संयोगवशात् पूरा न किया हो तो पुत्र पिता को उसमें से बचा लेता है । इसीलिए उसे ' पुत्र' कहा जाता है । पिता पुत्र के रूप में इस जगत् में टिका रहता है । बाद में वागादि देव इस पिता में ( सम्प्रत्ति कर्म किए हुए पिता में ) अमर प्राण प्रवेश करते हैं । पृथिव्यै चैनमग्नेश्च दैवी वागाविशति सा वै दैवी वाग्यया यद्यदेव वदति तत्तद्भवति ॥18 ॥

पृथ्वी और अग्नि से उसमें दैवी वाक् का आवेश होता है । दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो कुछ भी बोलता है, वह उसी प्रकार हो जाता है । दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भव- त्यो न शोचति ॥19 ॥

द्युलोक और आदित्य से उसमें दैवी मन का आवेश होता है । दैवी मन वही है कि जिससे वह आनन्दित होता है और शोक नहीं करता । अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै दैवः प्राणो यः संचर- श्वासंचरश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्या भवति यथैषा देवतैव स यथैतां देवताः सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवञ्ज्ञैवं- विदः सर्वाणि भूतान्यवन्ति यदु किंचेमाः प्रजाः शोचन्तमैवासां तद्भवति पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति ॥20 ॥

जल और चन्द्रमा से उसमें दैव प्राण का आवेश होता है । यह दैव प्राण वही है, जो संचार करते हुए और संचार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और नष्ट भी नहीं होता । इस प्रकार जो जानता है, वह सभी प्राणियों का आत्मा हो जाता है । जैसा यह देव ( हिरण्यगर्भ) है, ऐसा ही वह हो जाता है । इस देवता का सभी प्राणी पालन करते हैं, वैसे ही इस उपासकजैसे का भी सभी प्राणी पालन करतेहैं । जो कुछ भी ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह दुःख उन प्रजाओं के साथ ही रहता है, पर उसको तो पुण्य ही मिलता है । क्योंकि देवताओं के पास पाप जा ही नहीं जा सकता । अथातो व्रतमीमासा प्रजापतिर्ह कर्माणि ससृजे तानि सृष्टान्यन्योऽन्ये- नास्पर्धन्त वदिष्याम्येवाहमिति वाग्दधे द्रक्ष्याम्यहमिति चक्षुः श्रोष्याम्य- हमिति श्रोत्रमेवमन्यानि कर्माणि यथाकर्म तानि मृत्युः श्रमो भूत्वोपयेमे तान्याप्नोत्तान्याप्त्वा मृत्युरवारुन्धत्तस्माच्छ्राम्यत्येव वाक् श्राम्यति चक्षुः श्राम्यति श्रोत्रमथेममेव नाम्नोद्योऽयं मध्यमः प्राणस्तानि ज्ञातुं दधिरे अयं वै नः श्रेष्ठो यः संचरश्चासंचरश्श्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति हन्तास्यैव

पृष्ठ 330

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

288 उपनिषत्सञ्चयनम् सर्वे रूपमसामेति त एतस्यैव सर्वे रूपमभवःस्तस्मादेत एतेनाख्यायन्ते प्राणा इति तेन ह वाव तत्कुलमाचक्षते यस्मिन्कुले भवति य एवं वेद य उ हैवंविदा स्पर्धतेऽनुशुष्यत्यनुशुष्य हैवान्ततो म्रियत इत्यध्यात्मम् ॥2 1 ॥ अब आगे व्रत का (उपासना कर्म का ) विचार किया जा रहा है । प्रजापति ने ही कर्मसाधनरूप यागादि करण को उत्पन्न किया । रचे हुए ये कर्मसाधन एक- दूसरे के साथ स्पर्द्धा करने लगे । वाणी ने कहा— “ मैं बोला ही करूंगी । " चक्षु ने कहा– “मैं देखा ही करूँगा । ” कान बोला— “ मैं सुना ही करूँगा । ” इस प्रकार प्रत्येक कर्मकरण- इन्द्रिय अपने- अपने काम के लिए बोले । अत: मृत्यु ने श्रमरूप होकर उन्हें पकड़ा अर्थात् उनमें ( मृत्यु में ) श्रमरूप से व्याप्त हो गया । उनमें व्याप्त होने पर मृत्यु ने उन्हें काम करने से रोक दिया । इसीलिए वाणी थक जाती है, आँख थक जाती है, कान थक जाता है । पर जो यह मध्यम प्राण है, उसे ही श्रमरूपी मृत्यु नहीं पकड़ सका । अतः उन इन्द्रियों ने प्राण को पहचानने का निश्चय किया कि " वह हममें सबसे श्रेष्ठ है । वह संचरणशील हो या स्थिर हो, तो भी थकता या नष्ट नहीं होता । इसलिए हम सब उसी का रूप ग्रहण करें ।" तब उन सभी ने प्राण का रूप ग्रहण किया । इसलिए उन्हें 'प्राण' नाम दिया गया है । तप्स्याम्यहमित्यादित्यो अथाधिदैवतं ज्वलिष्याम्येवाहमित्यग्निर्दध्रे भास्याम्यहमिति चन्द्रमा एवमन्या देवता यथादैवतः स यथैषां प्राणानां मध्यमः प्राण एवमेतासां देवतानां वायुर्निम्लोचन्ति ह्यन्या देवता न वायुः सैषानस्तमिता देवता यद्वायुः ॥22 ॥

अब अधिदैव दर्शन कहा जाता है । "मैं जला ही करूंगा" - ऐसा व्रत अग्नि ने धारण किया । “ मैं तपा ही करूंगा ” – ऐसा आदित्य ने और “मैं प्रकाशित हुआ ही करूंगा” – ऐसा चन्द्रमा ने भी कहा । इसी प्रकार अन्य देवों ने भी अपने - अपने कामों में लगे रहने का निश्चय किया । शरीर की इन्द्रियों की बात में जैसा मुख्य प्राण के बारे में हुआ, वैसा ही (इन ) देवों में वायु के बारे में हुआ । अन्य देव काम करते रुक जाते हैं, पर वायु चलता ही रहता है । अथैष श्लोको भवति यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छतीति प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति तं देवाश्चक्रिरे धर्मः स एवाद्य स उ श्व इति यद्वा एतेऽमुर्ह्यधियन्त तदेवाप्यद्य कुर्वन्ति । तस्मादेकमेव व्रतं चरेत्प्राण्याच्चै- वापान्याच्च नेन्मा पाप्मा मृत्युराप्नुवदिति यद्यु चरेत्समापिपयिषेत्तेनो एतस्यै देवतायै सायुज्य सलोकतां जयति ॥23 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ यहाँ यह मन्त्र है— ‘“जिस वायुदेव से सूर्य उगता है और जिसमें अस्त में से ही उगता है और प्राण में ही अस्त होता है । ” इसी को देवों ने धर्म ( नियमहोता है, वह इस प्राण और कल भी ( सभी काल में ) रहनेवाला (वैश्विक ) नियम है । वागादि इन्द्रियों ) माना है । वह आज, ने जो काम करने का निर्णय किया था वह काम वे आज भी करते और अग्नि आदि देवों वह भी एक काम करता रहे, श्वासोच्छ्वास की क्रिया करता रहे हैं । इसलिए मनुष्य को चाहिए कि ऐसी भावना किया करे, जो काम हाथ में लिया हो उसे पूरा करे । ऐसा, “पापीकरनेमृत्युसे मुझे प्राप्त न हो(” – ) संपूर्ण एकाकार हो जाता है और प्राण के लोक को प्राप्त करता है । वह उस देव में प्राण में ( यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । )