Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 331–340

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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289प्रथमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) षष्ठं ब्राह्मणम् त्रयं वा इदं नामरूपं कर्म तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्त्येतदेषाः सामैतद्धि सर्वैर्नामभिः सममेतदेषां ब्रह्मेतद्धि सर्वाणि नामानि बिभर्ति ॥1 ॥

यह जगत्, नाम, रूप और कर्म का समुदाय है । इन पूर्वोक्त नामों का ' वाक् ' ही उक्थ—कारण है, क्योंकि सभी नाम इसी से उत्पन्न होते हैं । यही उनका साम है, क्योंकि वास्तव में सभी नामों में वह ( वाग्) समान है | वही उनका ब्रह्म है क्योंकि यही साम सभी नामों को धारण करता है । अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येत- देषा सामैतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥2 ॥

अब रूपों का सामान्य चक्षु है । यही उनका उक्थ ( कारण ) है, क्योंकि इसी से सभी रूप उत्पन्न होते हैं । यही उनका साम है, क्योंकि यह सब रूपों के साथ समरूप है । यही उनका ब्रह्म है क्योंकि सभी रूप उसी के आधार पर होते हैं । अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्येतदेषा सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयः सदेकमयमात्माऽत्मो एकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतः सत्येन छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥3 ॥

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥ 1 ॥

अब यह शरीर ही कर्मों का उक्थ (कारण ) है, क्योंकि सभी कर्म शरीर से ही उत्पन्न होते हैं । शरीर ही कर्मों का साम भी हैं, क्योंकि सभी कर्म शरीर से ही हो सकते हैं अर्थात् सभी कर्मों में शरीर समानरूप से रहता है । शरीर ही सभी कर्मों का ब्रह्म है, क्योंकि सभी कर्म शरीर पर ही आधार रखते हैं । ये तीनों अलग- अलग दिखाई पड़ते हैं, पर वास्तव में ये एक ( शरीर ) ही हैं । आत्मा ( शरीर) एक होने पर भी इन तीनों रूपों में दिखाई देता है । उसी प्रकार यह अमर आत्मा भी सत्य से ( प्रत्यक्ष जगत् से) ढँका हुआ है । प्राण ही अमृत ( अमर) है । यह प्रत्यक्ष नामरूपात्मक जगत् ही सत्य है । उस नामरूप से यह आत्मा आच्छन्न है । (यहाँ छठा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् का प्रथम अध्याय समाप्त होता है । 19 उ० प्र ०

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290 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ द्वितीयोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् ॐ दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥1 ॥

गार्ग्य गोत्र का बालाकि नाम का एक ब्राह्मण था । वह गर्विष्ठ और वाचाल था । उसने काशी के राजा अजातशत्रु से कहा— “ मैं आपको ब्रह्म के बारे में समझा दूँगा । ” अजातशत्रु ने कहा— “ठीक है । इस वचन के लिए मैं आपको एक हजार गायें देता हूँ" । यहाँ लोग- " यह तो जनक ( जैसा श्रोता) है, यह तो जनक (जैसा दाता है ) है ” – ऐसा मानकर दौड़कर आया करते हैं । स होवाच गार्ग्यो य एवासावादित्ये पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा राजा भवति ॥2 ॥

गार्ग्य ने कहा--""सूर्य में जो (चेतन) पुरुष रहता है, उसी की मैं उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु ने कहा—-ऐसी बात मुझे मत कहो । मैं यह तो जानता ही हूँ कि वह पुरुष सबसे श्रेष्ठ है, सबका स्वामी है, राजा है और इसीलिए मैं उसकी उपासना करता हूँ । जो मनुष्य इसकी इस तरह उपासना करता है, वह सब प्राणियों में श्रेष्ठ बनता है, सबका स्वामी बनता है, राजा बनता है 1 स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा बृहत्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा अहमेतमुप्रास इति स य एतमेवमुपास्तेऽहरहर्ह सुतः प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥3 ॥

गार्ग्य ने कहा— “ जो ( चेतन ) पुरुष चन्द्रमा में रहता है, उसी की मैं ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु बोले- यह बात मुझे न कहो । मैं यह जानता ही हूँ कि वह सोम श्वेतवस्त्रधारी बड़ा राजा है और इसीलिए मैं उसे पूजता हूँ । जो मनुष्य इसकी इस तरह से उपासना करता है, उसे प्रतिदिन सोमरस परोसा जाता है और उसके लिए अन्न कभी क्षीण नहीं होता । स होवाच गार्ग्यो य एवासौ विद्युति पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठास्तेजस्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवतिइति स ॥4 ॥

गार्ग्य ने (फिर) कहा– ““विद्युत् में जो ( चेतन ) पुरुष रहता है, उसी की मैं ब्रह्म मानकर ” करतातेजस्वीहूँहै।, औरतब इसीलिएअजातशत्रुमैं बोले-उसे पूजतायह हूँबात। कोईमुझे नभी कहोयदि उसे। यहऐसातो मैंमानकरजानता ही हूँ कि वहउपासनापुरुष होगा और उसकी सन्तानें भी तेजस्वी होंगी । पूजेगा तो वह तेजस्वी स होवाच गार्ग्यो य एवायमाकाशे होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाःपुरुषपूर्णमप्रवर्तीतिएतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स वा अहमेतमुपास

पृष्ठ 333

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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 291 इति स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजो- ॥5 ॥

गार्ग्य ने कहा— “जो ( चेतन) पुरुष आकाश में रहता है उसे ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु बोले- यह बात न कहो । मैं यह तो जानता ही हूँ कि वह पुरुष पूर्ण है, और स्थिर है । इसीलिए मैं इसे पूजता हूँ । जो कोई उसे इस प्रकार पूजता है, वह सन्तति से और पशुओं से भरपूर हो जाता है । इस लोक में उसका वंश नष्ट नहीं होता । स होवाच गार्ग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्य- तस्त्यजायी ॥6 ॥

गार्ग्य ने कहा— “वायु में जो ( चेतन ) पुरुष है, उसे मैं ब्रह्म मानकर पूजता हूँ । " तब अजातशत्रु बोले- ऐसी बात मत कहो । यह तो मैं जानता ही हूँ कि वह पुरुष इन्द्र है, उसका बल अपार है, उसकी सेना अजेय है, इसलिए तो मैं उसको पूजता हूँ । जो कोई उसे इस तरह पूजता है, वह विजयी होता है, वह अजेय होता है, वह शत्रुओं को जीतनेवाला होता है । स होवाच गार्ग्यो य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवा- चाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥7 ॥

गार्ग्य ने कहा— “अग्नि में जो ( चेतन ) पुरुष है, उसकी मैं ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ । " तब अजातशत्रु ने कहा- ऐसा मत कहो, उसकी तो मैं 'विषासहि' के रूप में उपासना करता ही हूँ । जो कोई इस तरह उसकी उपासना करता है, वह 'विषासहि' ( अन्यों को सहन करनेवाला ) होता है, इसकी सन्तानें भी ‘विषासहि' ( सहनशील) होती हैं । स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूप हैवेनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माज्जायते ॥8 ॥

गार्ग्य ने कहा— “जल में जो यह पुरुष रहता है, उसकी मैं ब्रह्म समझकर उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु ने कहा--ऐसी बात न कहो! उसको मैं 'प्रतिरूप' के रूप में पूजता हूँ । जो कोई इस प्रकार उसकी उपासना करता है तो उसे प्रतिरूप ( अनुकूल) ही सब प्राप्त होता है । उसका प्रतिकूल कुछ नहीं होता, उसका पुत्र अनुकूल ही जन्म लेता है । स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इतियैः स य एवमेतमुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो सन्निगच्छति सर्वास्तानतिरोचते ॥१ ॥

गार्ग्य ने कहा—‘ “आदर्श (दर्पण ) में जो यह पुरुष रहता है उसे मैं ब्रह्म मानकरमेंउसकीजानताउपासनाहूँ और करता हूँ । ” तब अजातशत्रु बोले- ऐसी बात न कहो । उसको तो मैं तेजस्वी के रूप

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292 उपनिषत्सञ्चयनम् इसलिए उसकी उपासना करता हूँ । जो कोई भी उसकी इस प्रकार से उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है, उसकी सन्तानें भी तेजस्वी होती हैं । जो कोई इसके संपर्क में आता है, उससे वह अधिक तेजस्वी होता है | स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्व हैमास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥10 ॥

गार्ग्य ने कहा— “ चलते हुए मनुष्य के पीछे जो आवाज होती है, उसकी मैं ब्रह्म समझकर उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु ने कहा- ऐसी बात ( भी ) न कहो क्योंकि मैं उसको असु ( प्राण) के रूप में पहचानता ही हूँ, और उसकी उपासना करता हूँ । जो कोई भी उसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह इस लोक में पूर्ण आयुष्य को प्राप्त करता है, वह अकाल में प्राणत्याग नहीं करता । स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवा - चाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान् ह भवति नास्माद्गणश्छि- द्यते ॥11 ॥

गार्ग्य ने कहा— “जो यह दिशाओं में पुरुष है उसको ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ । " तब अजातशत्रु ने कहा- ऐसा न कहो । यह तो मैं जानता ही हूँ कि वह पुरुष हमारा दूसरा साथी है, और इसलिए मैं उसकी उपासना करता हूँ । जो कोई उसकी इस तरह उपासना करता है, वह अन्य साथीवाला होता है, उसके मित्र उससे कभी अलग नहीं हो जाते । स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वंं हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्यु- रागच्छति ॥12 ॥

गार्ग्य ने कहा— “जो यह छायारूप पुरुष है उसे ब्रह्म मानकर मैं उसकी उपासना करता हूँ । ” तब अजातशत्रु बोले — यह बात मत कहो । मैं जानता ही हूँ कि वह ' मृत्यु ' है और मैं उसकी इसी तरह उपासना करता हूँ । जो कोई भी उसकी इस तरह से उपासना करता है, वह पूर्ण आयुष्य प्राप्त, है और उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती । करता स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा ब्रह्मोपांस इति स स य एतमेवमुपास्त आत्मन्वीह भवत्यात्मन्विनी हास्यअहमेतमुपास इति तूष्णीमास गार्ग्यः ॥13 ॥ प्रजा भवति स ह

गार्ग्य ने कहा— “जो यह आत्मा (बुद्धि) में पुरुष है ही है”, और मैं उसकी इसी तरह— उपासना नकरताकहोहूँ। यह। जोतोकोईमैं जानताही हूँ कि वह ( बुद्धि) आत्मावाली हूँ । तब अजातशत्रु ने कहा ऐसी बात उसे ब्रह्म मानकर उसकी मैं उपासना करता भी इसकी इस तरह उपासना करता है,

पृष्ठ 335

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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 293 वह आत्मन्वी ( स्वतंत्र बुद्धिवाला ) होता है । उसकी प्रजा भी स्वतंत्र होती है । यह सुनकर गार्ग्य चुप हो गया । स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू3 इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच गार्ग्य उपत्वायानीति ॥14 ॥

अजातशत्रु ने कहा— “ बस, इतना ही तुमने जाना है क्या? " गार्ग्य ने कहा- “ हाँ, इतना ही जाना है । ” अजातशत्रु ने कहा- "इतने मात्र से ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता । ” तब गार्ग्य बोला— "तब आप ही मुझे समझाइये । मैं आपकी शरण में आया हूँ । ” स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुष सुप्तमाजग्मतुस्तमेतैर्नामभिरामन्त्रयांचक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोम-- राजन्निति न नो तस्थौ तं पाणिनापेषं बोधयांचकार स होत्तस्थौ ॥15 ॥

अजातशत्रु ने कहा – “ क्षत्रिय के पास ब्राह्मण जाए और यह आशा रखे कि वह मुझे ब्रह्म के बारे में समझाएगा, यह तो उल्टी ही बात हुई । फिर भी मैं तुम्हें समझाऊँगा । " ऐसा कहकर राजा गार्ग्य का हाथ पकड़कर खड़ा हुआ । वे दोनों एक सोए हुए पुरुष के पास गए । उस पुरुष को राजा ने इन नामों से जोर से पुकारा- "हे महापुरुष! हे श्वेतवस्त्रधारी! हे सोमराज! फिर भी वह मनुष्य जागा नहीं । फिर बाद में राजा ने उसे हाथ से टटोलकर जगाया, तब वह खड़ा हो गया । स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥16 ॥

अजातशत्रु ने कहा — जब यह पुरुष सोया हुआ था, तब उसके शरीर में रहनेवाला विज्ञानमय (चेतन ) आत्मा कहाँ था, और वह यहाँ फिर कहाँ से आ गया? ” गार्ग्य को कुछ मालूम नहीं था । स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतः श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥17 ॥

अजातशत्रु ने कहा—जब यह मनुष्य सो जाता है, तब उसके शरीर में अवस्थित विज्ञानमय (चेतन ) पुरुष अपने विज्ञान द्वारा सभी इन्द्रियों के विज्ञान को अपने भीतर ग्रहण करके हृदयाकाश में सो जाता है । यह पुरुष जब उन सभी विज्ञानों को अपने भीतर ग्रहण कर लेता है ( खींच लेता है ) तब ऐसा कहा जाता है कि वह सो गया है । अर्थात् वह 'स्वपिति' नामवाला हो जाता है । उस समय उसका श्वास भीतर चला जाता है, वाणी भीतर चली जाती है, कान भीतर चला जाता है, आँख भीतर चली जाती है और मन भी भीतर चला जाता है । स यत्रैतत्स्वप्नयाचरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥18 ॥

पृष्ठ 336

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294 उपनिषत्सञ्चयनम् जब यह मनुष्य स्वप्नावस्था में चलता-फिरता है, तब उसे ऐसे अनुभव होते हैं कि मानो वह राजा है, वह बड़ा ब्राह्मण है, कभी उच्च कभी निम्न कोटि में जाता है । जैसे कोई बड़ा राजा अपनी प्रजा को साथ में लिए अपने देश में यथेच्छ घूमता है, वैसे ही विज्ञानरूप पुरुष भी (उस समय) अपने प्राणों को साथ में लिए हुए ( अर्थात् इन्द्रियों को अपने साथ लेकर) अपने शरीर में अपनो इच्छानुसार घूमता रहता है । अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाड्यो द्वास- प्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभिप्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृष्य पुरीतति शेते स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते ॥19 ॥

जब वह मनुष्य सुषुप्त अवस्था में होता है, तब उसे कुछ भी मालूम नहीं होता । शरीर में ‘ हिता ’ नाम से प्रसिद्ध बहत्तर हजार नाड़ियाँ हैं । वे हृदय से निकलकर सारे शरीर में फैलती हैं । वह पुरुष उन नाडियों में से निकलकर शरीर में सो जाता है । जैसे कोई बच्चा या कोई बड़ा राजा अथवा तो विद्याविनयसम्पन्न कोई परिपक्व ब्राह्मण सर्वदुःखनाशक सुखावस्था को प्राप्त करके सो जाता है, वैसे ही यह विज्ञानमय पुरुष सो जाता है । स यथोर्णनाभिस्तन्तुनोच्चरेद्यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्त्येव- मेवास्मादात्मनः सर्वे प्राणाः सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि व्युच्चरन्ति तस्योपनिषत्सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥20 ॥

इति प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ जैसे मकड़ी ( सेहुआ ) अपनी लार के ( राल के ) तंतु से ऊपर जाती है, जैसे अग्नि से छोटे- छोटे अंगारे निकलते हैं, वैसे ही आत्मा में से सभी इन्द्रियाँ, सभी लोक, सभी देव, सभी प्राणी उत्पन्न होते हैहैं ॥ इस आत्मा का गूढ नाम है– “ सत्य का भी सत्य । ” इन्द्रियाँ सत्य हैं, पर आत्मा उनका भी सत्य (यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ ।) * द्वितीयंब्राह्मणम् यो ह वै शिशुः साधानः सप्रत्याधानः सस्थूण सदामं भ्रातृव्यानवरुणद्ध्ययं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणस्तस्येदमेवाधानमिदंवेद सप्त ह द्विषतो प्रत्याधानं प्राणः स्थूणान्नं दाम ॥1 ॥

जो कोई इस प्राणतत्त्व रूपी शिशु को उसके जान लेता है, वह अपने द्वेषी सात भतीजों (सात विरोधियोंनिवासस्थान, तबेले और खूँटे तथा रस्सी के साथ सकता है । वह शिशु यहाँ शरीर में अवस्थित मुख्य प्राण — पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि) को रोक तबेला और श्वास उसका खूँटा तथा अनाज ही उसकी है, शरीर उसका निवास-स्थान, मस्तक उसका रस्सी है । तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते भिरेन रुद्रोऽन्वायत्तोऽथ या अक्षन्नापस्ताभिःतद्या इमा अक्षन् लोहिन्यो राजयस्ता- पर्जन्यो या कनीनिका

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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 295 तयादित्यो यत्कृष्णं तेनाग्निर्यच्छुक्लं तेनेन्द्रोऽधरयैनं वर्तन्या पृथिव्य- न्वायत्ता द्यौरुत्तरया नास्यान्नं क्षीयते य एवं वेद ॥2 ॥

ये सात अक्षिति ( अमर देव) उसकी सेवा करते हैं । (जैसे— ) उसकी आँखों में जो लाल रेखाएँ हैं, उनके द्वारा रुद्र उसकी रक्षा करते हैं । आँख में जो पानी है, उसके द्वारा पर्जन्य उसकी रक्षा करते हैं । आँख की जो पुतली है, उसके द्वारा आदित्य उसकी सेवा करता है । आँख में जो काला अंश है, उसके द्वारा अग्नि उसकी रक्षा करता है । जो सफेद अंश है, उसके द्वारा इन्द्र उसकी सेवा करता है । आँख की नीचे की बरुनी के द्वारा पृथ्वी उसकी सेवा करती है । और ऊपर की बरुनी के द्वारा स्वर्ग उसकी सेवा करता है । जो मनुष्य ऐसा जानता है उसका अन्न कभी क्षीण नहीं होता । तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नस्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपम् । तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेत्य- र्वाग्बिलश्रमस ऊर्ध्वबुध्न इतीदं तच्छिर एष ह्यर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्न- स्तस्मिन्यशो निहितं विश्वरूपमिति प्राणा वै यशो विश्वरूपं प्राणानेतदाह तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति प्राणा वा ऋषयः प्राणानेतदाह वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्ते ॥3 ॥

उस विषय में यह श्लोक है— सोमरस भरने का जो 'चमस' ( यक्षपात्र) है, वह नीचे मुखवाला और ऊपर तले वाला है । उसमें विश्वरूप यश रखा हुआ है । उसके तीर पर सात ऋषि और आठवीं वेद द्वारा बोलने वाली वाणी स्थित है । नीचे मुखवाला और ऊपर की ओर तलेवाला ऐसा यह जो चमस के आकारवाला है वह मनुष्य का मस्तक है, क्योंकि यह नीचे छिद्र ( मुख ) वाला और ऊपर तलेवाला चमस ( सोमरस भरने का यज्ञ पात्र) ही है । उसमें विविध प्रकार का प्राण अवस्थित है । वही विश्वरूप यश - सर्वशक्तिमान सर्वोभवी है । इसलिए प्राण को ही विश्वरूप यश कहते हैं । उसके समीप सात ऋषि रहते हैं । प्राण ही ( गौण प्राणइन्द्रियाँ– दो आँखें, दो कान, दो नाक के छिद्र और सातवीं _जीभ ) ये ऋषि हैं । इसीलिए मंत्र इन्हें 'प्राण' संज्ञा देते हैं । वेद द्वारा बोलने वाली आठवीं वाणी हैं । वह वेद द्वारा उच्चार करती है । इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्र- जमदग्नी अयमेय विश्वामित्रोऽयं जगदग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रि- रिति सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥4 ॥

इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ ये दोनों ( कान ) ही गौतम और भरद्वाज हैं, यह ( एक ) गौतम और दूसरा भरद्वाज है । ये दोनों ( नेत्र ) ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं । यही ( एक) विश्वामित्र और दूसरा जमदग्नि है । ये दोनों (नथुने ) ही वसिष्ठ और कश्यप हैं । यही ( एक ) वसिष्ठ है और दूसरा कश्यप है । और जीभ ही अत्रि है, क्योंकि वाग् ( जीभको) द्वारा ही अन्न खाया जाता है । जिसे ' अत्रि' कहा जाता है, वह ' अत्ति' नामवाला ही है । जो इस तथ्य जानता है, वह सबका भोग करने वाला ( अत्ता) होता है और सब कुछ उसका अन्न हो जाता है । (यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । )

पृष्ठ 338

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296 उपनिषत्सञ्चयनम् तृतीयं ब्राह्मणम् द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च मर्त्यं चामृतं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च ॥1 ॥

ब्रह्म के दो रूप हैं — मूर्त और अमूर्त; मर्त्य और अमृत; चर और अचर; सत् और त्यत् (अदृश्य ) । तदेतन्मूर्तं यदन्यद्वायोश्चान्तरिक्षाच्च तन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत एष रसो य एष तपति सतो ह्येष रसः ॥2 ॥

वायु और अन्तरिक्ष से जो कुछ भी भिन्न है, वह ब्रह्म का साकार स्वरूप है । वह सब मरणशील ही है, वह अव्यापक ( परिमित) है, वह देखा जा सकता है । इस साकार, विनाशी, परिमित, देखे जानेवाले रूप का सारतत्त्व यह सूरज है, जो तपता है । दृश्य जगत् का वही सार है । अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतमेतद्यदेतत्त्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्या- मृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य ह्येष रस इत्यधिदैवतम् ॥3 ॥

और वायु और अन्तरिक्ष अमृत हैं, ये अमूर्त और त्यत् ( गतिशील) हैं, इसी अमृतरूप और गतिशील ` त्यत्' का जो रस ( सारतत्त्व) है, वह (इस आदित्यमण्डल में स्थित) पुरुष है, वही इस गतिशील तत्त्व का सार है (जो भौतिक आँख से देखा नहीं जा सकता) । यह देवों के विषय की ( अधिदैव) बात हुई । अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तं यदन्यत्प्राणाच्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतन्मर्त्यमेतत्स्थितमेतत्सत्तस्यैतस्य मूर्तस्यैतस्य मर्त्यस्यैतस्य स्थित- स्यैतस्य सत एष रसो यच्चक्षुः सतो ह्येष रसः ॥4 ॥

अब अध्यात्म की दृष्टि से मूर्तामूर्त का वर्णन किया जाता है । इस शरीर के भीतर हृदयस्थ आकाशरूप जो प्राण है, इसके सिवा जो कुछ भी है, वह मूर्त है, वह मर्त्य है, वह गतिहीन है, वह परिमित है, वह दृश्य है, इस मूर्त, मरणशील, गतिशून्य– परिमित दृश्य तत्त्व का साररूप यह आँख है । दृश्यपदार्थ का सार यही है । अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृतमेतद्यदेतत्त्यं तस्यै- तस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणे- क्षन्पुरुषस्त्यस्य ह्येषः रसः || 5 || शरीरस्थ प्राण और अन्तराकाश ही अमूर्त अर्थात् ( गतिशील) है, यही ‘ त्यत्' ( अदृश्य ) है । इस अमृत, गतिशीलनिराकार, है, वही अमृत है, वही ‘ यत्’ आँख में बसनेवाला पुरुष है । इस निराकार (अविनाशी- गतिशील अदृश्य का रस ( सारतत्त्व) दायीं व्यापक - अदृश्य ) ब्रह्मतत्त्व का वही है । सार तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपं यथा यथेन्द्रगोपो यथाऽग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकंमहारजनंयथा वासो यथा पाण्ड्वाविकं सकृद्विद्युत्तः सकृद्विद्युत्तेव

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297द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) हवा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयः सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम् ॥6 ॥

इति तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ अब उस पुरुष के रूप का वर्णन करते हैं- जैसे हल्दी सदृश किसी पक्के रंग से रँगा हुआ कपड़ा हो, जैसे सफेद ऊन हो, जैसे इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) हो, मानो अग्नि की ज्वाला हो, श्वेत कमल हो, बिजली की मानो एक चमक हो । जो मनुष्य ऐसा जानता है, उसकी कीर्ति बिजली की एक चमक जैसी होती है । इस ब्रह्म का 'यह नहीं यह नहीं' (न इति न इति ) कहकर ही वर्णन किया जा सकता है । अन्य रीति से इसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसका नाम 'सत्य का सत्य' है । प्राण ( इन्द्रियाँ) सत्य हैं । इसका भी यह (ब्रह्म ) सत्य है । ( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ ।) चतुर्थं ब्राह्मणम् मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ 1 ॥

) याज्ञवल्क्य ने कहा— “हे मैत्रेयि! मैं तो इस स्थान ( गृहस्थाश्रम) से आगे के ( केसंन्याससाथ आश्रमबँटवारा स्थान में जाना चाहता हूँ । इसलिए (मेरी जो कुछ सम्पत्ति है उसका ) इस कात्यायनी कर दूँ । सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्कथंजीवितं तेनामृता स्यामिति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां॥2 ॥

तथैव ते जीवितः स्यात् अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनेति तब मैं!, मैत्रेयी -'" यदि धन से भरी हुई यह समग्र धरती मुझे- मिल जाए अमर हो जाऊँगीने कहा-क्या? ”हेतबभगवन्याज्ञवल्क्य बोले- नहीं, जैसा। किधन बहुतसे अमरसी साधनहोने कीसामग्रियोंतो आशासे भीसम्पन्ननहीं मनुष्यों का जीवन होता है, वैसा ही तब तुम्हारा जीवन होगा की जा सकती । " कुर्यां यदेव भगवान्वेद सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन तदेव मे ब्रूहीति ॥3 ॥ सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँ?

-'"हे भगवन्! जिससे मैं अमर नहीं हो मैत्रेयी ने कहा- अमरत्व के विषय में आप जो कुछ भी जानते हों, वही मुझे बताइए ।” सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व सव्याख्यास्यामिहोवाच याज्ञवल्क्यःते व्याचक्षाणस्यप्रिया बतारेतु मे निदिध्यासस्वेतिनः ॥4 ॥

! पहले भी तुम हमारी प्यारी होकर रही हो । फिर ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- “धन्यरही होहो मैत्रेयी। आओ, बैठो मैं तुम्हें आत्मज्ञान का उपदेश दूँगा । और अब भी मुझे अनुकूल (प्रिय ) ही बोल मेरे बोले हुए वाक्यों का ध्यान से चिन्तन करो । ”

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298 उपनिषत्सञ्चयनम् स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति न वा अरे पुत्राणां कामारा पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोत्रव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदः सर्वं विदितम् ॥5 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा— “ अरे मैत्रेयी! पति की इच्छा के लिए पति प्रिय नहीं होता, किन्तु आत्मा की ( स्व की) कामना के लिए पति प्रिय होता है । अरे! पत्नी कहीं पत्नी की कामना के लिए प्रिय नहीं होती, पर आत्मा की कामना के लिए प्रिय होती है । अरे! पुत्रों की कामना ( फल) के लिए पुत्र प्यारे नहीं लगते, आत्मा की कामना के लिए ही तो पुत्र प्यारे लगते हैं । अरे! धन के फल के लिए धन अच्छा नहीं लगता, आत्मा (स्व) की इच्छा के लिए ही धन अच्छा लगता है । अरे, ब्राह्मण के फल के लिए ब्राह्मण प्रिय नहीं लगता, आत्मा की कामना के लिए ही ब्राह्मण प्रिय लगता है । अरे! क्षत्रिय ( भी ) क्षत्रिय की कामना के लिए प्रिय नहीं लगता, आत्मा की कामना के लिए ही वह प्रिय लगता है! प्रियअरे लगतेये सारेहैं |लोगअरे भी! येउनदेवलोगोंभी देवोंके लिएकी कामनाप्रिय नहींके लगतेलिए प्रियकिन्तुनहींआत्मालगतेकी कामना के लिए ही ये सब। यही देव प्रिय लगते हैं | अरे! प्राणी भी प्राणियों की कामना के लिए प्रिय, आत्मा की कामना के लिए कामना के लिए प्रिय लगते हैं । अरे! जो कुछ भी वस्तुएँ हमें प्यारी लगती हैंनहीं लगते, आत्मा कीं,,फल के लिए नहीं अपितु अपने आत्मा की कामना के लिए ही प्यारी वह उन वस्तुओं के,,! देखने हे मैत्रेयी लायक! इसहैआत्माउसकोको सुननादेखने चाहिएसे, उसकाउसकाश्रवणचिन्तनकरने सेकरना, उसकेचाहिए, लगतीउसका हैंध्यान। अरेकरनावहचाहिएआत्मा। मनन से, उसके ध्यान से सब कुछजाना जा सकता है । ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेदक्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं त्मनो देवान्वेद भूतानि तं पराद्योऽन्यत्रात्मनोदेवास्तं परादुर्योऽन्यत्रा- परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे भूतानि वेद सर्वं तं भूतानीदः सर्वं यदयमात्मा ॥6 ॥ लोका इमे देवा इमानि

जो मनुष्य ब्राह्मण या ज्ञान को आत्मा कर देता है, जो कोई क्षत्रिय या बल को आत्मासे भिन्नसे अलगमानता है, उसका ब्राह्मण या ज्ञान उसका त्याग मानता है तो क्षत्रिय या बल उसे छोड़ देते