Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 341–350

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 341 का मूल पृष्ठ
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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 299 हैं, जो कोई इन लोकों को आत्मा से भिन्न मानता है तो लोक भी उसका त्याग कर देते हैं । जो देवों को आत्मा से अलग मानता है तो देव उसे छोड़ देते हैं । जो कोई प्राणियों को आत्मा से अलग मानता है तो प्राणी भी उसको छोड़ देते हैं । •मनुष्य इस सबको आत्मा से अलग ही मानता है, तो वे सब भी उसे छोड़ ही देते हैं । अतः ये ब्राह्मण ( ज्ञान ), ये क्षत्रिय ( बल), यह जगत्, ये देव, ये प्राणी— यह जो कुछ भी है, सब आत्मा ही है । स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ 7 ॥

उदाहरणार्थ-जब ढोल पीटा जाता है, तब बाहर के लोग उसकी आवाजों को पकड़ नहीं सकते । परन्तु ढोल को या ढोल बजाने की क्रिया को पकड़ने से ही आवाजें पकड़ी जा सकती हैं । (उसी प्रकार आत्मा को आत्मचेतना से प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् सामान्य छोड़ देने से विशेष पकड़ा नहीं जा सकता, विशेष को पकड़ने के लिए सामान्य का ग्रहण भी करना ही चाहिए । ) स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥8 ॥

शंख के फूँके जाने पर बाहर के लोग उसकी आवाज को पकड़ नहीं सकते । परन्तु शंख को या शंख फूँकने की क्रिया को पकड़ लेने से शंख की आवाज को पकड़ा जा सकता है, वैसे ही इस आत्मा का स्वरूप समझना चाहिए । स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्शब्दाञ्शक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तुग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १ ॥

जिस तरह वीणा के बजाए जाने पर बाहर के लोग उसकी आवाजों को नहीं पकड़ पाते, किन्तु, वीणा को या वीणा बजाने की क्रिया को पकड़ने से वे आवाजें पकड़ी जा सकती हैं, वैसे ही इस आत्मा का स्वरूप समझना चाहिए । स यथार्थैधाग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्य- स्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥10 ॥

है, वैसे ही जैसे भीगी लकड़ियों से जलाई गई अग्नि में से तरह-तरह (काउपासनाधुआँ प्रक्रियाएँनिकलता), उपनिषदें, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्याएँ(आत्मा) के नि:श्वासरूप ही हैं ।

श्लोक, सूत्र, मंत्रविवरण, अर्थवाद– ये सब इस महान् तत्त्व

स्पर्शानां त्वगेका- स यथा सर्वासामपाश् समुद्र एकायनमेव सर्वेषासर्वेषाः रसानां जिह्वै- यनमेवः सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव शब्दाना कायनमेव सर्वेषाः रूपाणां चक्षुरेकायनमेव सर्वेषाः सर्वासां श्रोत्रमेकायनमेव सर्वेषा संकल्पानां मन एकायनमेवहस्तावेकायनमेव‍ विद्याना हृदयमेकायनमेव सर्वेषां कर्मणाविसर्गानां पायुरेकायनमेव सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेव सर्वेषांवेदानां वागेकायनम् ॥11 ॥

सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव सर्वेषां

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300 उपनिषत्सञ्चयनम् जैसे सभी जलों का एक गमन- स्थान सागर है, सब स्पर्शो का एक गमन- स्थान त्वक् (त्वचा) है, वैसे सभी गन्धों का एकाश्रय नासिकाएँ हैं, वैसे सभी रसों का एकाश्रय जीभ है, वैसे सब रूपों का एकाश्रय चक्षु ही है, वैसे सभी शब्दों का एकाश्रय श्रोत्र ही है, वैसे सभी संकल्पों का एकाधिकरण न ही होता है, वैसे सभी विद्याओं का एकाश्रय हृदय ही है, वैसे सभी कर्मों का एकाधार दो हाथ ही हैं, वैसे सभी आनंदों का एकाश्रय जननेन्द्रिय है, वैसे सभी उत्सर्गों का एकायन गुदा है, वैसे सभी मार्गों का एकाश्रय दो पैर ही हैं, और वैसे ही सभी वेदों का एकाश्रय वाणी ही है 1। स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रह- णायेव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा अर इदं महद्भूतमनन्त- मपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥12 ॥

"जैसे नमक के डले को पानी में डालने से वह पानी में ही विलीन हो जाता है, उसे पानी में से बाहर निकालने की किसी की ताकत नहीं होती । पानी को जहाँ कहीं से भी लिया जाता है, तो वह खारा ही होता है । इसी तरह हे मैत्रेयी! यह महद्भूत ( परमात्मा ) अनन्त, अपार और विज्ञानघन ही है । इन महाभूतों में से ( परिच्छिन्न जीव रूप से ) वह उत्पन्न होकर फिर उन्हीं में वह ( जीव ) विलीन हो जाता है । ( परिच्छिन्नता - देहादिभाव से ) मुक्त होने के बाद, मरने पर ('मेरा है ' ऐसा ) ज्ञान नहीं रहता । ” हे मैत्रेयी! ऐसा मैं कहता हूँ । सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्नथ प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच याज्ञवल्क्यो न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥13 ॥

मैत्रेयी ने कहा— “ मरने के बाद, ('यह मेरा है' ऐसा) ज्ञान नहीं रहता- ऐसा कहकर " – “! रहाभगवन्हूँ । नेइतनामुझे उलझनही ज्ञान में( किही डालमरने दियाके बाद। ज्ञानियोंतब याज्ञवल्क्यको विशेषबोलेज्ञान नहींअरेहोतामैं )तुम्हेंतुम्हारेउलझनलिए मेंपर्याप्तनहींतो डालआप है । यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं इतर शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुतेपश्यति तदितर विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं तदितर इतरं विजानीयाद्येनेदःपश्येत्तत्केन कः शृणुयात्तत्केनसर्वं विजानातिकमभिवदेत्तत्तं केन केन कं मन्वीतजिघ्रेत्तत्केनतत्केन कंकं विजानीयादिति ॥14 ॥ विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन

इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ है, वहींजहाँएक(-अविद्यावस्थादूसरे को सुनतामें ) हैद्वैत, वहींजैसाएकहो वहीं एक- दूसरे को सूँघता है, वहीं एक - दूसरे को देखता वहीं एक- दूसरे को जानता है । परन्तु, जहाँ -दूसरे से बोलता है, वहीं एक- दूसरे से विचार करता है, भला कौन किसके द्वारा किसको सूँघेगा इस (ज्ञानी) के लिए सब कुछ आत्मा ही हो गया हो, वहाँ??? सुनेगा कौन किसके द्वारा किसे कौन किसके द्वारा किसे देखेगा कौन किसके द्वारा किसे द्वारा किसे जानेगा? जिसके द्वारा मनुष्यबोलेगाइस? कौन किसके द्वारा किसका विचार करेगा? कौन किसके विज्ञाता को कैसे जाना जा सकता है भला? सबको जानता है उसे किसके द्वारा जाना जा सकता है? ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ ।)

पृष्ठ 343

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301द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10) पञ्चमं ब्राह्मणम् इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चा- यमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म शारीर- स्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद’ सर्वम् ॥1 ॥

यह पृथ्वी सब भूतों का मधु है, और सभी भूत पृथ्वी का मधु है । इस पृथ्वी में जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है, और जो अध्यात्म, शरीरस्थ, तेजोमय अमृतमय पुरुष है, वही यह आत्मा है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । ( अर्थात् पृथ्वीस्थ चेतन ही शरीस्थ चेतन है, पृथ्वीस्थ चेतन शरीरस्थ चेतन का और शरीरस्थ चेतन पृथ्वीस्थ चेतना का मधु (सारतत्त्व) है । इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपाः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मः रैतसस्तेजोमयोऽ- मृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥2 ॥

यह जल सब प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी जल का मधु हैं । उसी प्रकार जल में जो तेजोमय अमृत पुरुष बसता है, और शरीरस्थ वीर्यरूप जो तेजोमय पुरुष बसता है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सबकुछ है । अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजो- मयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद’ सर्वम् ॥3 ॥

यह अग्नि सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी अग्नि का मधु हैं । इस प्रकार अग्नि में जो तेजोमय अमृत पुरुष रहता है और शरीर में जो वाणी के रूप में तेजोमय अमृत पुरुष रहता है वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मस्मिन्वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽ-॥ मृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥4 में जो यह वायु सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी वायु का मधु है । इसयहप्रकारआत्मावायुहै, वही तेजोमय अमृत पुरुष है, और शरीर में जो प्राणरूप तेजोमय अमृत पुरुष है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानिचाक्षु-मधु यश्चायमस्मिन्नादित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं ब्रह्मेद’ षस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं सर्वम् ॥5 ॥

का मधु है । इस प्रकार, यह आदित्य सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी आदित्य पुरुष है वही यह आदित्य में जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष है और जो शरीर में चक्षुरूप तेजोमय अमृत आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है ।

पृष्ठ 344

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302 उपनिषत्सञ्चयनम् इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशा सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म श्रौत्रः प्रातिश्रुत्क- स्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥6 ॥

ये दिशाएँ सब प्राणियों का मधु हैं और सभी प्राणी दिशाओं का मधु है । इस प्रकार दिशाओं में जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष है और जो शरीर में श्रोत्रस्थ सर्वश्रवणक्रियाओं में उपस्थित जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है I अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मस्मिश्श्चन्द्रे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजो- मयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥7 ॥

यह चन्द्र सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी चन्द्र का मधु है । इस चन्द्र में जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष है और इस शरीर में जो मानसरूप तेजोमय अमृतरूप पुरुष है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- स्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोम- योऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥8 ॥

यह विद्युत् सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी विद्युत का मधु है । इस प्रकार इस विद्युत् में जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष रहता है और इस शरीर में त्वचा में रहनेवाला जो तेजोमय और अमृतमय पुरुष है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है I अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्म शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥१ ॥

यह बादलों की गड़गड़ाहट सभी प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी बादलों की गड़गड़ाहट का मधु है । इस प्रकार इस गड़गड़ाहट में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो इस शरीर में आवाज और सुर के स्वरूप में तेजोमय और अमृतमय पुरुष है, वही यह आत्मा है, वही अमृत, है और वही सब कुछ है । है वही ब्रह्म अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो भूतानि मधु `काशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदंयश्चायमध्यात्म हृद्या- सर्वम् ॥10 ॥ ब्रह्मेद

यह आकाश सब प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी आकाश आकाश में जो यह तेजोमय और अमृतमय पुरुष में तेजोमय और अमृतमय पुरुष है वही आत्मा है रहता, यहीहै अमृतऔर शरीरहै में जोका हृदयमधु हैके । आकाशइस प्रकारके रूपइस , यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है ।

पृष्ठ 345

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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 303 अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मस्मिन्धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धर्मस्तेजोमयो- ऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदमृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥11 ॥

यह धर्म सभी प्राणियों का मधु है, और ये सभी प्राणी धर्म का मधु हैं । इस प्रकार इस धर्म में जो तेजोमय अमृतमय पुरुष रहता है और जो इस शरीर में धर्मनीति सम्बन्धी जो तेजोमय और अमृतरूप पुरुष रहता है, वही आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है और वही सब कुछ है । इदः सत्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चा- ऽयमस्मिन्सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चाऽयमध्यात्म सत्यस्तेजो- मयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥12 ॥

यह सत्य ही सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी सत्य का मधु हैं । इस प्रकार इस सत्य जो यह तेजोमय और अमृतमय पुरुष रहता है और शरीर में जो सत्यमय ( सच्चाई के रूप में ), तेजोमय और अमृतमय पुरुष रहता है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । इदं मानुषः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुष्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाऽयमस्मिन्मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः यश्चायमध्यात्मं मानुष- तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेद सर्वम् ॥13 ॥

यह मनुष्य जाति सभी प्राणियों का मधु है और ये सभी प्राणी मनुष्य जाति का मधु है । इस प्रकार जो इस मनुष्य जाति में तेजोमय अमृतरूप पुरुष रहता है और इस शरीर में जो मानवता के रूप में तेजोमय और अमृतरूप पुरुष रहता है, वही यह आत्मा है, यही अमृत है, यही ब्रह्म है और यही सब कुछ हैं । अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चाय- मस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदः सर्वम् ॥14 ॥

यह आत्मा सभी प्राणियों का मधु है और सभी प्राणी आत्मा का मधु है । इस प्रकार इस आत्मा में तेजस्वी और अमृतरूप पुरुष रहता है और इस शरीर में भी जो तेजोमय अमृतरूप पुरुष रहता है, वही यह आत्मा है, वही अमृत है, वही ब्रह्म है, वही सब कुछ है । स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूताना राजा तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥15 ॥

यह आत्मा सभी प्राणियों का अधिपति है, सभी प्राणियों का राजा है । जैसे रथ के पहियों की नाभि में तथा उसके परिघ में सभी अरे जड़े हुए होते हैं, उसी प्रकार इस आत्मा में सभी प्राणी, सभी देव, सब लोक, सब प्राण और सभी आत्मा समर्पित ( अनुस्यूत ) ही हैं । इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।

पृष्ठ 346

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304 उपनिषत्सञ्चयनम् तद्वां नरा सनये दस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् । दध्यङ् ह यन्म- ध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्रयदीमुवाचेति ॥16 ॥

दध्यङ् नाम के आथर्वण ने इस मधु ( आत्मविद्या) को अश्विनीकुमारों से कहा । तब कोई एक ऋषि इस मधु को देखकर बोल उठे- " जैसे बादल बरसात को प्रकट करते हैं, वैसे ही हे नररूपधारी अश्विनो! तुम्हारे उस क्रूरकर्म को मैं प्रकट करता हूँ कि तुमने अपने लाभ के लिए दध्यङ् के मस्तक को उतार कर उसकी जगह पर एक घोड़े का मस्तक जोड़ दिया है । इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङ्काथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचदत् । आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यः शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्रवोच- दृतायन्त्त्वाष्ट्रं यद्दस्त्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥17 ॥

यह मधुविद्या अथर्वण के पुत्र दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों से कही । उसको देखकर एक मंत्रद्रष्टा ऋषि बोल उठे— “ हे अश्विनीकुमारो! अथर्वण के पुत्र दध्यङ् के लिए तुम लोगों ने ( उनके सर को उतार कर) घोड़े का मस्तक जोड़ दिया । तब भी तो दध्यङ् ने अपना वचन सत्य करने के लिए तुम्हें यह त्वाष्ट्र ( सूर्य सम्बन्धी ) मधुविद्या का उपदेश दिया । हे शत्रु को मारनेवालो! और जिन्होंने उसके साथ- ही - साथ जो कक्ष्य ( गोपनीय) मधुविद्या है, उसका भी उपदेश कर दिया । ( यहाँ उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम इन्द्र ने दध्यङ् को मधुविद्या सिखाते समय यह शर्त रखी थी कि इसे दूसरे किसी से कहने पर तुम्हारा सर कट जाएगा । अश्विनीकुमारों ने उस विद्याको पाने के लिए दध्यङ् का सर उतार कर पहले सुरक्षित रख दिया और उसके स्थान पर घोड़े का सर जोड़कर उस मुख से विद्या सुनी । विद्या सुनने के बाद मानव- मस्तक फिर से धड़ पर जोड़ दिया गया । ) इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङ्काथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतऋषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः पुरः स पक्षी भूत्वा पुरःपुरुष आवि- शदिति । स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किंचना- संवृतम् ॥18 ॥

अथर्वण के पुत्र दध्यङ् ने यह मधुविद्या अश्विनीकुमारों से कही । यह देखते हुए एक ऋषि बोल उठे— “उस परमेश्वर ने दो पैरवाले शरीर बनाए, फिर चार पैरवाले शरीर बनाए । उस परमात्मा ने पहले पक्षी का रूप लेकर उन शरीरों में प्रवेश किया । सभी शरीरों में वही पुरुष रहता है, इसीलिए तो वह ‘ पुरिशय’ कहा जाता है । वह पूर्षु ( शरीररूपी) पुरों (नगरों) में शेते अर्थात् रहता है । विश्व कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जहाँ वह व्याप्त न हो । उसके द्वारा व्याप्त न हो, ऐसा कुछ भी नहीं हैमें। इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतऋषिः पश्यन्नवोच- द्रूपरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दशेत्ययं वै हरयोऽयं सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमय-वै दश च मात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥19 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ अथर्वण के पुत्र दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों से यह मधुविद्या उठे— “ इस आत्मा के रूप को प्रकट करने के लिए वह हरएककहीरूप। उसे देखकर एक ऋषि बोल का प्रतिरूप हो गया । इन्द्र

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द्वितीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 305 ( परमेश्वर ) माया से अनेक रूपवाला देखा जाता है । क्योंकि उसके शरीररूपी रथ में एक सौ दस इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हैं । वास्तव में तो यह परमेश्वर स्वयं ही एक सौ दस ( अनेक ) है, वही सहस्र है, वही अनन्त है, वही अबाह्य है, वही अपूर्व ( कारणरहित) है, वही 'अनपर' (कार्यरहित ) है, वही ‘ अनन्तर' ( विजातीय भेद से रहित ) है, वही अबाह्य है, वही सबका अनुभव करनेवाला है । वही ब्रह्म है, सभी वेदान्तों का यही अनुशासन ( उपदेश ) है । ( यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * षष्ठं ब्राह्मणम् अथ वशः पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनो पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डि- ल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥1 ॥

अब गुरुपरम्परा कहते हैं । यह विद्या पौतिमाष्य ने गौपवन से ली । गौपवन ने पौतिमाष्य से, पौतिभाष्य ने गोपवन से, गोपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने आग्निवेश्यादाग्निवेश्यःकौशिक और गौतम से प्राप्त की शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्चानभिम्लात। ( और ) गौतम ने— आनभिम्लातादानभिम्लात आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमाद् गौतमः सैतवप्राचीनयोग्याभ्या सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भार- द्वाजाद्भरद्वाजो भारद्वाजाच्च गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद्भारद्वाजः पारा- शर्यात् पाराशर्यो बैजवापायनाद् बैजवापायनः कौशिकायनेः कौशि- कायनिः ॥2 ॥

आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य ने शाण्डिल्य और आनभिम्लात से, आनभिम्लात ने दूसरे आनभिम्लात से, उस आनभिम्लात ने तीसरे आनभिम्लात से, उस तीसरे आनभिम्लात ने गौतम से, गौतम ने सैतव और प्राचीनयोग्य से, सैतव और प्राचीनयोग्य ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने दूसरे भारद्वाज और गौतम से, गौतम ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने वैजवापायन से, वैजवापायन ने कौशिकायनि से और कौशिकायनि ने— घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायण- स्त्रैवणेस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रे- यादात्रेयो माण्टेर्माण्टिगतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारिता- त्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्वत्सनपाद्वाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्या- दाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वाष्ट्रा- द्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङाथर्वणो- ऽथर्वणो दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वसनान्मृत्युः प्राध्वसनः 20 उ० प्र०

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306 उपनिषत्सञ्चयनम् प्रध्वसनात्प्रध्वसन एकर्षेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥3 ॥

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः ॥ 2 ॥

घृतकौशिक से, घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से, पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने जातूकर्ण्य से, जातूकर्ण्य ने आसुरायण और यास्क से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि से, औपजन्धनि ने आसुरि से, आसुरि ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि से, माण्टि ने गौतम से, गौतम ने दूसरे गौतम से, दूसरे गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कैशोर्य काप्य से, कैशोर्य काप्य ने कुमारहारित से, कुमारहारित ने गालव से, गालव ने विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी कौण्डिन्य ने वत्सनपात् बाभ्रव से, वत्सनपात् बाभ्रव ने पन्थासौभर से, पन्थासौभर ने अयास्य आंगिरस से, अयास्य आंगिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से, आभूति त्वाष्ट्र ने विश्वरूप दध्यङ्,,, त्वाष्ट्र से विश्वरूप त्वाष्ट्र ने दोनों अश्विनों से दोनों अश्विनों ने दध्यङ् आथर्वण से आथर्वण ने अथर्वा दैव से, अथर्वा दैव ने मृत्युध्वंसन से, मृत्युध्वंसन ने प्रध्वंसन से, प्रध्वंसन ने एकर्षि से, एकर्षि ने विप्रचित्ति से, विप्रचित्ति ने व्यष्टि से, व्यष्टि ने सनारु से, सनारु ने सनातन से, सनातन ने सनग से, सनग ने परमेष्ठी से, परमेष्ठी ने ब्रह्म से यह विद्या प्राप्त की । ब्रह्मा स्वयंभू है । उस ब्रह्मा को नमस्कार | ( यहाँ छठा ब्राह्मण पूरा हुआ ।) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् का दूसरा अध्याय समाप्त होता है । *

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बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 307तृतीयोऽध्यायः ] अथ तृतीयोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्वि- देषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति स ह गवाः सहस्त्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः ॥ 1 ॥

विदेह देश के राजा जनक ने बहुत दक्षिणावाले यज्ञ से यजन किया । वहाँ कुरुपांचाल देश के ब्राह्मण आ मिले थे | उस विदेही जनक को यह जानने की इच्छा हुई कि इन ब्राह्मणों में सबसे अधिक विद्वान् ब्राह्मण कौन होगा भला? उसने एक हजार गायें एकत्र की और प्रत्येक गाय के दोनों सींगों में दस- दस पाद ( भरी ) सोना बाँध दिया । तान्होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वयमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा 3 इति ता होदांचकार ते ह ब्राह्मणाश्चक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो बुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताश्वलो बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी 3 इति स होवाच नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयः स्म इति त ह तत एव प्रष्टुं दधे होताश्वलः ॥2 ॥

फिर जनक ने ब्राह्मणों से कहा- "हे पूज्य ब्राह्मणो! आपमें से जिसको ब्रह्म का अच्छे से अच्छा ज्ञान हो, वह ब्रह्मिष्ठ ब्राह्मण इन गायों को ले जाए । " परन्तु वे ब्राह्मण (गायें ले जाने का ) साहस न कर पाए । तब याज्ञवल्क्य ने अपने ही एक ब्रह्मचारी से कहा– “ अरे सोम्य सामश्रवा! इन्हें तुम ( हमारे निमित्त) ले जाओ । ” तब वह ब्रह्मचारी उनको (याज्ञवल्क्य के घर पर) लेकर चलने लगा । इससे दूसरे ब्राह्मण क्रुद्ध हो गए कि “हमारे आगे उसने अपने को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ कैसे समझ लिया? तदनन्तर जनकविदेह का होता अश्वल था, उसने उनसे ( याज्ञवल्क्य से ) पूछा - "हे याज्ञवल्क्य! हम सबमें क्यातो तुम्हीं सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता हो? ” तब उन्होंने ( याज्ञवल्क्य ने कहा कि- " सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानी को हम नमस्कार करते हैं । हम तो केवल गायों की आकांक्षा करनेवाले हैं । " तब अश्वल ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न पूछने का निश्चय किया । याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदः सर्वं मृत्युनाप्तः सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रार्त्विजाग्निना वाचा मुक्तिःवाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः स होता स सातिमुक्तिः ॥3 ॥

के वश में ही रखा अश्वल ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! यह सब जो मृत्यु से व्याप्त है,करकेमृत्युमुक्त हो जाता है? ” गया है । तब किस साधन के द्वारा यजमान मृत्यु की व्याप्ति का केअतिक्रमणद्वारा ही (मृत्यु का अतिक्रमण किया ( ) “ तब याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि होता नामक ऋत्विज कर सकता है । वही मुक्ति और जाता है । ) क्योंकि होता वाक् और अग्निरूप है । वह मृत्यु को पार अतिमुक्ति है ।

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308 उपनिषत्सञ्चयनम् याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदः सर्वमहोरात्राभ्यामाप्तः सर्वमहोरात्राभ्या- मभिपन्नं केन यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युर्णर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्वर्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥4 ॥

अश्वल ने पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! यह जो सब कुछ है, वह रात-दिन के वश में ही है । तो इन रात और दिन से यजमान किससे मुक्त हो सकता है? ” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया– “अध्वर्यु नाम के ऋत्विज से तथा आँखरूपी सूर्य से ( वह मुक्त हो सकता है ), क्योंकि— आँख ही यज्ञ का अध्वर्यु है, और आँख सूर्य का ही दूसरा रूप है और सूर्य ही अध्वर्यु है । वही मुक्ति और अतिमुक्ति है । " याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदः सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्तः सर्वं पूर्व- पक्षापरपक्षाभ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमति- मुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥5 ॥

अश्वल ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! यह जो सब कुछ है, वह पूर्व पक्ष और अपरपक्ष ( शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष ) से ही व्याप्त है । तो यजमान किससे इन पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष के घेरे से मुक्त हो सकता है? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि- "उद्गाता नामक ऋत्विज् के द्वारा और प्राण के द्वारा ऐसा हो सकता है । क्योंकि जो प्राण है वह वायु है, और जो वायु है वही उद्गाता का रूप है । वही मुक्ति है और अतिमुक्ति है । ” याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केनाक्रमेण यज- मानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सौऽसौ चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ सम्पदः ॥6 ॥

अश्वल ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! यह जो आकाश है, वह तो आधाररहित, कहाकरनेवाला— ‘“ब्रह्मायजमाननामककिसऋत्विज्आधारसेसेऔरसीढ़ीमनसेसेचढ़करतथा चन्द्रस्वर्गसेमें ऐसापहुँचहोसकतासकताहै? ” तब याज्ञवल्क्यहै तब यज्ञने,, का ब्रह्मा है और जो मन है वही चन्द्र है और वही ब्रह्मा है । वह मुक्ति है क्योंकि मन ही यज्ञ, ” सम्पद का निरूपण करते हैं । है और अतिमुक्ति है । अब याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरमद्यग्भिर्होतास्मिन्यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोऽनुवाक्या तृतीया किं ताभिर्जयतीति यत्किंचेदं प्राणभृदिति च याज्या च शस्यैव ॥7 ॥

अश्वल ने पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! आज से स्तुति करेगा? ” याज्ञवल्क्य बोले— “तीन प्रकारइस यज्ञ में होता कितनी (कितने प्रकार की ) ऋचाओं कौन- सी हैं वे? ” याज्ञवल्क्य ने कहा- “ 1. पुरोनुवाक्याकी ऋचाओं से ।" अश्वल बोला— “ कौन- पूछा- उनसे वह किसको जीतता है अर्थात् ", 2. 3. " ने याजा और शस्या । तब अश्वल कुछ प्राणियों का समुदाय है, उस सबको वह जीतक्यालेताप्राप्तहै करता। ” है? " याज्ञवल्क्य ने कहा- "जो ( पुरोनुवाक्या = यज्ञ से पहले बोली जानेवाली ऋचाएँ । शस्या = यज्ञ के बाद बोली जानेवाली स्तुतिपरकऋचाएँ । याज्या = यज्ञ के समय बोली जानेवाली ऋचाएँ )