Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 351–360

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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309 तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन्यज्ञ आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्ज्वलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अधिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥8 ॥

अश्वल ने पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! आज यह अध्वर्यु इस यज्ञ में कितने प्रकार की आहुतियों से होम करेगा? ” याज्ञवल्क्य बोले - “तीन प्रकार की ।" अश्वल ने कहा– “कौन - कौन से प्रकार की? ” याज्ञवल्क्य ने कहा- "(एक वे हैं ) जिनका होम करने से अग्नि प्रज्वलित हो उठती है ऐसी घृत, लकड़ी आदि की; ( दूसरी वे हैं ) जिनका होम करने से अग्नि में आवाज होती है, ऐसी मांसादि की और ( तीसरी वे हैं ) जिनका होम करने से हव्यपदार्थ नीचे बैठ जाते हैं, ऐसी दूध- घी आदि की हैं । ” तब अश्वल ने पूछा— “ उन आहुतियों से वह ( यज्ञकर्ता) क्या प्राप्त करता है? ” याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि—जिन आहुतियों को अग्नि में डालने से अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उनसे वह ( यज्ञकर्ता ) देवलोक को प्राप्त करता है, क्योंकि देवलोक मानो प्रकाशमय हो, ऐसा लगता है । जिन आहुतियों को अग्नि में डालने से बहुत आवाज होती है, उनसे वह पितृलोक प्राप्त करता है, क्योंकि पितृलोक में बहुत आवाजें हुआ करती हैं । जिन आहुतियों को अग्नि में डालने से आहुतियों के पदार्थ नीचे बैठ जाते हैं, उनसे वह मनुष्यलोक को ( पृथ्वी को ) प्राप्त करता है, क्योंकि मनुष्य लोक नीचे स्थित है । याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गो- पायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स नेन लोकं जयति ॥ 9 ॥

अश्वल ने कहा— “ हे याज्ञवल्क्य! दाईं ओर बैठे हुए यह ब्रह्मा नाम के ऋत्विज आज कितने देवों के द्वारा इस यज्ञ की रक्षा करेंगे? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा- "एक ही देवता से । " अश्वलं ने पूछा- "कौन है वह देवता? " याज्ञवल्क्य बोले - " मन ही एकमात्र वह है । मन तो अनन्त है । मन के अधिष्ठाता विश्वदेवों का कोई अन्त नहीं है । यह यजमान उस मन के द्वारा अनन्त लोक को प्राप्त करता है । याज्ञवल्क्येति होवाच कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन्यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्य- तीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एवं पुरोनुवाक्यापानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकः शस्यया ततो ह होताश्चल उपर- राम ॥10 ॥

इति प्रथमं ब्राह्मणम् ।11 फिर अश्वल ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! आज इस यज्ञ में उद्गाता कितने प्रकार के स्तोत्र गाएगा? ” याज्ञवल्क्य ने कहा- “ तीन प्रकार के स्तोत्र गाएगा ।" अश्वल ने पूछा- " ये तीन प्रकार कौन- कौन से हैं? ” याज्ञवल्क्य ने कहा— ( यज्ञ से पहले गाए जाने वाले ) पुरानुवाक्या, ( यज्ञ के समय गाए जाने वाले ) याज्या और ( यज्ञ के अन्त में गाए जाने वाले स्तुतिपरिक ) शस्या । ” अश्वल ने फिर

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310 उपनिषत्सञ्चयनम् पूछा- ""' अध्यात्मदृष्टि से ( शरीर के सम्बन्ध की दृष्टि से ) वे स्तोत्र कौन -कौन से हैं? ” याज्ञवल्क्य ने कहा— “ यह प्राणवायु ही यज्ञपूर्व गाया जानेवाला स्तोत्र है, ' अपान' यज्ञ के मध्य में गाया जानेवाला स्तोत्र है और ‘ व्यान’ यज्ञ के बाद गाया जानेवाला स्तुतिपरक स्तोत्र है । " अश्वल ने फिर पूछा– “इन स्तोत्रों से वह (यज्ञकर्ता ) क्या प्राप्त करता है? ” याज्ञवल्क्य बोले – “ पुरोवाक्या नामक स्तोत्रों से वह पृथ्वीलोक को प्राप्त करता है, याज्या नामक स्तोत्रों से वह अन्तरिक्ष लोक को प्राप्त करता है और शस्या नामक स्तोत्रों से वह द्युलोक ( स्वर्गलोक) को प्राप्त करता है । ” बाद में होता शान्त हो गया । ( यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ) * द्वितीयं ब्राह्मणम् अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इत्यष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥1 ॥

अब उन याज्ञवल्क्य से जारत्कारव आर्तभाग ने पूछा– “हे याज्ञवल्क्य! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं? ” याज्ञवल्क्य ने कहा- “आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं । " तब आर्तभाग ने फिर पूछा– “ये जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन - कौन से हैं? प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण गृहीतोऽपानेन हि गन्धाञ्जिघ्रति ॥ 2 ॥।

तब याज्ञवल्क्य ने कहा—–' “प्राणवायु ग्रह है, वह अपानवायुरूपी अतिग्रह के अंकुश में है ।

क्योंकि अपानवायु से ही वह सूँघता है ।

वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण गृहीतो वाचा हि नामान्यभिवदति ॥3 ॥

वाणी ग्रह है, वह नामरूपी अतिग्रह के अंकुश में है, क्योंकि वाणी से ही नाम बोलते हैं । जिह्वा वै ग्रहः स रसेनातिग्राहेण गृहीतो जिह्वया हि रसान्विजानाति ॥4 ॥

जीभ ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रह के अंकुश में है क्योंकि मनुष्य जीभ से ही रस को जानता है । चक्षुर्वै ग्रहः स रूपेणातिग्रहेण गृहीतश्चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति ॥5 ॥

आँख ग्रह है, वह रूपात्मक अतिग्रह के अंकुश में है, क्योंकि मनुष्य आँख से ही रूप को देखता है । श्रोत्रं वै ग्रहः स शब्देनातिग्राहेण गृहीतः श्रोत्रेण हि शब्दाछृणोति॥6 ॥,, कान ग्रह है वह शब्दरूपी अतिग्रह के वश में है क्योंकि मनुष्य कान से ही शब्द है । मनो वै ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतो मनसा हि कामान्कामयते सुनता

मन से ही इच्छा करता मन ग्रहहस्तौहै औरवै ग्रहःइच्छारूपीस कर्मणातिग्राहेणअतिग्रह के वशगृहीतोमें है हस्ताभ्याःक्योंकि मनुष्य ॥7 ॥ है ।

हि कर्म करोति ॥8 ॥

दो हाथ ग्रह हैं, वह कर्मरूप अतिग्रह के वश में हैं क्योंकि मनुष्य दो हाथों त्वग्वै ग्रहः स स्पर्शेनातिग्राहेण गृहीतस्त्वचा से ही कर्म करता है । ऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः ॥१ ॥ हि स्पर्शान्वेदयत इत्येते-

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बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 311तृतीयोऽध्यायः ] त्वचा ग्रह है और वह स्पर्शरूप अतिग्रह के वश में है, क्योंकि मनुष्य त्वचा से ही स्पर्श का अनुभव करता है । इस प्रकार ये आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं । ” याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदः सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित्सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥10 ॥

आर्तभाग ने पूछा– “हे याज्ञवल्क्य! यह सब कुछ मृत्यु का अन्न है । तो ऐसा कौन- सा देवता है, जिसकी मृत्यु भी अन्न हो (भक्ष्य हो)? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा– “अग्नि मृत्यु है, वह जल का अन्न ( भक्ष्य ) होता है । ऐसा जाननेवाला मनुष्य बार- बार आनेवाली मृत्यु को जीत लेता है । याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उदस्मात्प्राणाः क्रामन्त्याहो 3 नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्माय- त्याध्मातो मृतः शेते ॥11 ॥

आर्तभाग ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! मनुष्य जब यहाँ मर जाता है, तब उसके प्राण शरीर से चले जाते हैं या नहीं? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा- "नहीं रे! प्राण चले नहीं जाते, किन्तु यहीं ( इस शरीर में ही) लीन हो जाते हैं । (प्राणों को भीतर खींचने से ) वह फूल जाता है और यहीं वायु से भरा हुआ और मरा हुआ सुप्त रहता है । याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्य- नन्तं वै नामानन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥12 ॥

आर्तभाग ने पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! जब यहाँ मनुष्य मर जाता है, तब उसे कौन। - सीसबवस्तुदेव छोड़ नहीं जाती? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा– “नाम उसे नहीं छोड़ता । नाम अनन्त हैं अनन्त हैं । इससे वह मनुष्य अनन्त लोक को प्राप्त करता है । ( तात्पर्य यह हैआनन्त्यकि यदिकेमनुष्यदर्शनद्वारा- नाम के अनन्तत्व के अधिकारी विश्वदेवों को वह आत्मभाव से उपासता है, तो वह अनन्तलोक को प्राप्त होता है । ) याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राण- श्चक्षुरादित्यं मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवी शरीरमाकाशमात्मौषधीर्लो- मानि वनस्पतीन्केशा अप्सु लोहितं च रेतश्च निधीयते क्वाऽयंन नावे-तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो तत् सजन इति तौ होत्क्रम्य मन्त्रयांचक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैवकर्मणातदू- चतुरथ यत्प्रशशश्सतुः कर्म हैव तत्प्रशशसतुः पुण्योउपररामवै पुण्येन॥13 ॥

भवति पापः पापेनेति ततो ह जारत्कारव आर्तभाग इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ अग्नि में लीन हो जाती आर्तभाग ने पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! जब यहाँ मरे हुए पुरुषहैकी, मनवाणीचन्द्र में लीन हो जाता है, है, प्राण वायु में लीन हो जाते हैं, चक्षु आदित्य में लीन हो जाताहै, आत्मा आकाश में लीन हो जाता कान दिशाओं में लीन हो जाते हैं, शरीर पृथ्वी में विलीन हो जाता में लीन हो जाते हैं, लहू और वीर्य है, रोम ( रोंगटे ) औषधियों में लीन हो जाते हैं, बाल हैवनस्पतियों? " तब याज्ञवल्क्य बोले— “हे सोम्य! मेरा जल में मिल जाते हैं, तब इस पुरुष का क्या होताकरेंगे । हम दोनों की यह चर्चा जनसमुदाय के बीच हाथ पकड़ो । हम दोनों ( एकान्त में ही ) इसकी चर्चा

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312 उपनिषत्सञ्चयनम् करनी योग्य नहीं है । ” तब उन दोनों ने बाहर ( एकान्त ) में जाकर चर्चा की । उन्होंने जो कुछ कहा, वह कर्मसम्बन्धी ही था । और जिसकी प्रशंसा की वह भी सही रूप में कर्म की ही थी । मनुष्य पुण्यवान होता है और पाप कर्म से पापी होता है । इसके बाद आर्तभाग शान्त होपुण्यकर्मगया । से ( यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * तृतीयं ब्राह्मणम् अथ हैनं भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञल्क्येति होवाच मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतञ्जलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीदुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत्सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति तं यदा लोका- नामन्तानपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन्स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्क पारिक्षिता अभवन्निति ॥1 ॥

अब उन याज्ञवल्क्य से लाह्यानि भुज्यु ने पूछा - "हे याज्ञवल्क्य! हम जब मद्र देश में चरक ( अध्ययनव्रतधारी उसकी पुत्री गन्धर्वअथवासे गृहीतअध्वर्युथी )( गन्धर्वहोकर उसकेघूम रहे शरीरथे, तबमें कपिगोत्रीयआविष्ट हुआपतंचल। ) हमनेके उससेघर पर जा पहुँचे । वहाँ? ' ' ' — ' है‘ परिक्षितवहके बोला—वंशज कहाँमैं सुधन्वाथे'’ – इसकेआंगिरसविषयहूँ में। पूछाजब थाहमने। तोउससेअब हेलोकोंयाज्ञवल्क्यके अन्त के पूछाविषय मेंतू कौनऔर? "! कि परिक्षित के उन वंशजों का क्या हुआ मैं आपसे पूछता हूँ स होवाचोवाच वै सोऽगच्छन्वै ते तद्यात्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति न्वश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति द्वात्रिशतं वै देवरथाह्न्यान्ययं क्व समन्तं पृथ्वी द्विस्तावत्पर्येति ताः समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रःलोकस्त तद् यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं तावानन्तरेणाकाश-पर्येति स्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान्वायुरात्मनि यद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमिवद्वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं वैजयतिस वायुमेवय प्रशशसधित्वा तत्रागम-तस्मा- र्लाह्यायनिरुपरराम ॥2 ॥ एवं वेद ततो ह भुज्यु- इति तृतीयं ब्राह्मणम् ॥

तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “उसने ( गन्धर्व ने ) ( तुम्हें ) ( ) वहीं गए हैं कि जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते ऐसा कहा था कि वे परिक्षित के वंशजजाते हैं? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा– “देवरथ हैं " । भुज्यु ने पूछा— “अश्वमेध यज्ञ करनेवाले कहाँ दिन में अपने रथ के द्वारा सूर्य जितना अन्तर काटता( सूर्य के रथ) का बत्तीस गुना विस्तार—अर्थात् एक,इस लोक के आसपास इस लोक से दुगुनी है उसका बत्तीस गुना विस्तार इस लोक का है । और उससे दुगुने समुद्र ने घेर रखा है । उन पृथ्वी उसे घेर कर अवस्थित है । उस पृथ्वी को भी चारों एक छिद्र है ( आकाश है ) फिर इन्द्र ने दोनों के बीच उस्तरे की धार जैसा या मक्खी के पंख जैसा - ( आकाश - खाली जगह ) के द्वारा परिक्षित एक पक्षी ( अच्छी पंखवाले) का रूप लेकर उस छिद्र के वंशजों को) अपने भीतर स्थापित करके के( अर्थात्वंशजों को वायु को सौंप दिया । वायु ने उनको ( परिक्षित अपने ऊपर बिठाकर ) जिस स्थान पर अश्वमेधयज्ञ

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313तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) करनेवाले थे, वहाँ पहुँचा दिया । इस प्रकार गंधर्व ने यहाँ वायु की ही प्रशंसा की थी । इसलिए वायु ही व्यष्टि है, वायु ही समष्टि है । जो कोई भी इस प्रकार जानता है, वह अपमृत्यु और पुनर्मृत्यु को जीत लेता है । ” और इसके बाद लाह्यायनि भुज्यु शान्त हो गया । ( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ) चतुर्थं ब्राह्मणम् अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षाद- परोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्व इत्येष त आत्मा सर्वा- न्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥1 ॥

अब उनसे ( याज्ञवल्क्य से) चक्र के पुत्र उषस्त ने पूछा– “ हे याज्ञवल्क्य! जो ब्रह्म साक्षात् (हमारे सामने ही ) है जो अपरोक्ष ( हमसे जरा भी दूर ) नहीं है, और जो सभी के अन्तस् में आत्मा के स्वरूप में बसता उस ब्रह्म के विषय में मुझे समझाइए ।" तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “ यह जो तुम्हारा आत्मा है, वही सभी का आत्मा है । प्राण लेनेवाला जो तुम्हारा आत्मा है, वही सभी के अंतस में रहता है । व्यान वायु के द्वारा सारे शरीर में व्याप्त होकर रहने वाला जो तुम्हारा आत्मा है वही सभी के अंतस् में रहनेवाला आत्मा है । उदानवायु के द्वारा तुम्हारे शरीर में श्वास बाहर निकालने वाला जो तम्हारा आत्मा है, वही सभी के अन्तस् में रहनेवाला आत्मा है । यह तुम्हारा ही आत्मा सभी के अन्तस् में रहता है । स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयादसौ गौरसावश्व इत्येवमेवैतद् व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो न दृष्टे- द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारः शृणुयान्न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञाते- विज्ञातारं विजानीया एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होषस्त- श्चाक्रायण उपरराम ॥12 ॥

इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ उषस्त चाक्रायण ने कहा--'"(हे याज्ञवल्क्य! ) जिस तरह 'यह गाय है, घोड़ा है' ऐसा कहा जाता है, इसी तरह आपका 'यह ब्रह्म है'– ऐसा कथन है । परन्तु मुझे तो आप जो हमारे सामनेउसीही ( हैं साक्षात् हैं ) और जो के विषय में समझाइए । कहीं” तबभी याज्ञवल्क्यदूर नहीं है (नेजोकहा—अपरोक्ष“यहहै ) जोऔरतुम्हाराजो सभीआत्माके अन्तस्है, वहीमें रहतासबकेमेंहै भीतरकौन ( सबके अन्तस् में ) रहता है । " तब चाक्रायण ने कहा– “हे याज्ञवल्क्य! सभी के अन्तस् नहीं देख सकते । जो बसता है? '' तब याज्ञवल्क्य बोले- “ जो आँख को देखने वाला है उसे तुम( मन) है, उसे तुम नहीं कान का सुनने वाला है, उसे तुम नहीं सुन सकते । जो मन का सोचनेवाला

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314 उपनिषत्सञ्चयनम् सोच सकते । जो ज्ञान का ज्ञाता है, उसे तुम नहीं जान सकते । वह जो तुम्हारा आत्मा है, वही सभी के अंतर में रहता है । इसके सिवा सब कुछ नाशवान् है । तब उषस्त चाक्रायण शान्त हो गया । ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) पञ्चमं ब्राह्मणम् अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणो ह्येते एषणे एव भवतस्तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेद्बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिरमौनं च मौनं च निर्विद्याऽथ ब्राह्मणः स ब्राह्मणः केन स्याद्येन स्यात्तेनेदृश एवातोऽन्यदार्तं ततो ह कहोलः कौषीतकेय उपरराम ॥1 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ इसके बाद कुषीतक के पुत्र कहोल ने उनसे पूछा– “हे याज्ञवल्क्य! जो ब्रह्म साक्षात् (हमारे सामने ही) है, जो अपरोक्ष (जरा भी दूर) नहीं है, और जो सबके अन्तर में आत्मा के रूप में रहता है उस ब्रह्म के विषय में मुझे समझाइए । " तब याज्ञवल्क्य ने कहा– “यह जो तुम्हारा आत्मा है, वही सबके अन्तर में रहता है । ” तब कहोल ने पूछा - " कौन- सा आत्मा सबके अन्तस् में रहता है? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “ जो आत्मा भूख, प्यास, शोक, मोह, वृद्धत्व, मृत्यु– इन सबका अतिक्रमण करता है; ऐसे इस आत्मा को जो ब्राह्मण जानते हैं, वे पुत्र-प्राप्ति की इच्छा छोड़ देते हैं, धनप्राप्ति की इच्छा छोड़ देते हैं, स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति की इच्छा भी छोड़ देते हैं और भिक्षा माँगकर निर्वाह करते हैं । पुत्रप्राप्ति की इच्छा होती है, तभी तो धनप्राप्ति की इच्छा होती है । और जब धनप्राप्ति की इच्छा होती है, तब स्वर्गादि लोक की प्राप्ति की इच्छा होती है । क्योंकि आखिर में वे दोनों इच्छाएँ तो हैं ही । इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि वह पूर्णत: आत्मज्ञान प्राप्त करके उस आत्मज्ञानरूप बल से स्थिर रहने की इच्छा करे । फिर उस बल और पाण्डित्य को पूर्णतः प्राप्त करके वह मुनि होता है । फिर अमौन और मौन उन दोनों को पूर्णतः प्राप्त करके वह ब्राह्मण होता है ।" "तो वह ब्राह्मण कैसे होता है? ” — कहोल के ऐसा पूछने पर याज्ञवल्क्य बोले- "वह किसी भी प्रकार से हो, पर वह ब्राह्मण ऐसा ही ( उपर्युक्त योग्यतावाला) होता है । आत्मा भी ऐसा ही है । आत्मा के सिवा अन्य सब कुछ विनाशी ही है । ” यह सुनकर कहोल शान्त हो गया । ( यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ ।) * षष्ठं ब्राह्मणम् अथ हैनं गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्योते होवाच मप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौयदिदः सर्व- गार्गीति

पृष्ठ 357

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 357 का मूल पृष्ठ
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तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 315 कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेति गन्धर्वलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वादित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देवलोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु प्रजापति- लोकाओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपप्त- त्सदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥ 1 ॥

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ बाद में वचक्नु की पुत्री गार्गी ने उनसे पूछा- "हे याज्ञवल्क्य! विश्व में जो कुछ भी है, वह! सब यदि पानी में घुलमिल गया हो, तो फिर पानी किसमें घुलमिला है? ” याज्ञवल्क्य बोले— “ गार्गीलोकों वायु में । ” गार्गी बोली– “वायु किसमें अनुस्यूत है? " याज्ञवल्क्य बोले– “ गार्गी! अन्तरिक्ष में । ” गार्गी बोली – “ तो अन्तरिक्षलोक किसमें अनुस्यूत है? ” याज्ञवल्क्य बोले— “गार्गी! गन्धर्व लोकों में । ” गार्गी बोली- "गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है? " याज्ञवल्क्य बोले– “ गार्गी! सूर्यलोकों में । ” गार्गी बोली- " सूर्यलोक किसमें ओतप्रोत है? " याज्ञवल्क्य बोले— “ गार्गी! चन्द्रलोकों में । ” गार्गी बोली-"चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत है? " याज्ञवल्क्य बोले- “ गार्गी! नक्षत्रलोकों में । ” गार्गी बोली- "नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं? " याज्ञवल्क्य बोले- “गार्गी! देवलोकों में । ” गार्गी बोली– “देवलोक किसमें ओतप्रोत है? " याज्ञवल्क्य बोले– “गार्गी! याज्ञवल्क्य बोले – “ गार्गी! “? ”? ” इन्द्रलोकोंप्रजापतिलोकोंमें में गार्गी। ” गार्गीबोली—बोली इन्द्रलोक- "प्रजापतिलोककिसमें घुलेमिलेकिसमें तानेबानेहैं की किसमेंतरह तानेबानेमिलेजुलेकीहैं तरह “! ” - " याज्ञवल्क्य बोले— गार्गी ब्रह्मलोकों में । गार्गी बोली तब ब्रह्मलोक तो तुम्हारा मस्तक अनुस्यूत है? ” याज्ञवल्क्य बोले- "हे गार्गी! अब अधिक प्रश्न मत पूछोप्रश्न! नहींपूछना उचित नहीं है, उड़कर नीचे गिर पड़ेगा । जिस देव के सम्बन्ध में अमुक सीमा से अधिक! तुम अब अतिप्रश्न न उस देव के विषय में तुम हद से अधिक प्रश्न पूछ रही हो । इसलिए हे गार्गी पूछो । ” यह सुनकर वचक्नु की पुत्री गार्गी शान्त हो गई । ( यहाँ छठा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * सप्तमं ब्राह्मणम् मद्रेष्ववसाम अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच गन्धर्वगृहीता पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद्भार्याआथर्वण इति सोऽब्रवीत्पत- ञ्चलं काप्यं याज्ञिकाश्श्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत्सूत्रं तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्ध येनायं च लोकः परश्च

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316 उपनिषत्सञ्चयनम् लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तद्भगवन्वेदेति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाश्श्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोक सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत्पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन्वेदेति सोऽब्रवीत्पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाश्श्च यो वै तत्काप्यसूत्रं विद्यात्तं चान्त- र्यामिणमिति स ब्रह्मवित्स लोकवित्स देववित्स वेदवित्स भूतवित्स आत्मवित्स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वास्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत्सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद्ब्रूयाद्वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥1 ॥

फिर उनसे अरुण के पुत्र उद्दालक ने प्रश्न पूछा– “हे याज्ञवल्क्य! हम लोग मद्र देश में जब शास्त्रों का अभ्यास करते थे तब कपिगोत्रीय पतंचल के घर में रहते थे । उसकी स्त्री को गन्धर्व ने आविष्ट कर लिया था । हम लोगों ने उससे पूछा- "तू कौन है? ” उसने कहा——-" मैं अथर्व का पुत्र कबन्ध हूँ । ” उसने फिर कपिगोत्रीय पतंचल से और हम याज्ञिकों से (विद्यार्थियों से ) कहा – “हे कॉप्य! क्यों तुम लोग यह जानते हो कि यह लोक, परलोक और ये सब प्राणी किस सूत्र में पिरोये हुए हैं? ” कपिगोत्रीय पतंचल ने कहा- "भगवन्! नहीं, हम तो यह नहीं जानते । " तब उस गन्धर्व ने उस कपिगोत्रीय पतंचल से और हम याज्ञिकों से ( विद्यार्थियों से ) कहा- "हे काप्य! क्या तुम लोग उस अन्तर्यामी को जानते हो जो कि भीतर बैठे - बैठे ही इस लोक को, परलोक को और सभी प्राणियों को नियम में रखता है? ” काप्य पतंचल ने कहा- “भगवन्! नहीं, हम उसे नहीं जानते । ” फिर उस ( गन्धर्व ) ने कपिगोत्रीय पतंचल से औरहम सब याज्ञिकों से कहा——-"हे काप्य! जो मनुष्य उस सूत्र को और उस अन्तर्यामी को जान लेता है, वह ब्रह्म को जान लेता है, वह जगत् को जान लेता है, वह. देवों को जानता है, वह वेदों को जानता है, प्राणियों को जानता है और आत्मा को जानता है । वह सब कुछ जानता है । ” बाद में गंधर्व ने उन्हें जो कुछ समझाया था, वह मैं जानता हूँ । हे याज्ञवल्क्य! तुम यदि उस सूत्र को और उस अन्तर्यामी को बिना जाने ही इन ब्रह्मज्ञानी को ( ही ) दी जानेवाली गायों को हाँककर ले जाओगे, तो तुम्हारा सिर नीचेगिर पड़ेगा । " तब याज्ञवल्क्य बोले– “ हे गौतम! मैं उस सूत्र को और उस अन्तर्यामी को जानता हूँ । " तब कुद्दालक ने कहा- "मैं जानता हूँ—ऐसा तो कोई भी मनुष्य कह सकता है । पर तुम जो जानते हो, वह कहकर बताओहूँ, मैं जानता । ” स होवाच वायुर्वै गौतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्ति तस्माद्वै च लोकः प्रेतमाहुर्व्यस्रःसिषतास्याङ्गानीति वायुना हि गौतम सूत्रेणगौतम पुरुषं ॥ भवन्तीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्यान्तर्यामिणं ब्रूहीति ॥2 सन्दृब्धानि उन्होंने (याज्ञवल्क्य ने कहा--'“ हे गौतम! वह सूत्र वायु है । हे गौतम,!लोगयह लोककहते परलोकहैं कि इसकेतथा सभीशरीरप्राणीके बन्धपिरोयेछूटहुएगएहैं । इसलिए हे गौतम! जब मनुष्यइसमरवायुरूपीजाता हैसूत्र, तबमें पिरोये हुए रहते हैं । ” तब उद्दालक ने कहा – “ यहहैं,सबक्योंकितो ठीकहे गौतम! वायुरूपी सूत्र से ही वे सब "!के विषय में कहो । है । अब हे याज्ञवल्क्य अन्तर्यामी

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तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 317 यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥3 ॥

वह जो पृथ्वी में रहता है, पृथ्वी के भीतर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती, पृथ्वी जिसका शरीर है, पृथ्वी के भीतर रहकर जो पृथ्वी को नियम में रखता है, वही तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, और वही अमृत है | योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यमापो न विदुर्यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥4 ॥

जो यह जल में रहता हुआ जल ही संव्याप्त है, जिसे जल जानता नहीं, जल जिसका शरीर है, जो जल में रहकर जल का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी हैं, वही अमृत है । योऽग्नौ तिष्ठन्नग्नेरन्तरो यमग्निर्न वेद यस्याग्निः शरीरं योऽग्निमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥5 ॥

जो अग्नि में रहते हुए अग्नि में अनुस्यूत है, जिसे अग्नि नहीं जानता, जिसका शरीर अग्नि है जो अग्नि के भीतर रहकर अग्नि का नियमन करता है, वही तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । योऽन्तरिक्षे तिष्ठन्नन्तरिक्षादन्तरो यमन्तरिक्षं न वेद यस्यान्तरिक्ष शरीरं योऽन्तरिक्षमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ 6 ॥

जो अन्तरिक्ष में रहते हुए अन्तरिक्ष में ही संव्याप्त है, जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है । जो अन्तरिक्ष में अनुस्यूत रहकर अन्तरिक्ष को नियम में रखता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरो यं वायुर्न वेद यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥7 ॥

जो वायु में रहकर वायु के भीतर रहकर बसता है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका शरीर है, जो वायु के भीतर रहकर वायु का नियमन करता है, वही तेरा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत हैं ॥ यो दिवि तिष्ठन्दिवोऽन्तरो यं द्यौर्न वेद यस्य द्यौः शरीरं यो दिवमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥8 ॥

जो द्युलोक ( स्वर्ग ) में रहता है, स्वर्ग के भीतर उसका निवास है; जिसे द्युलोक ( स्वर्ग) नहीं जानता, स्वर्गलोक जिसका शरीर है; जो स्वर्ग के भीतर रहकर जो स्वर्ग को नियम में रखता है वही तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥9 ॥

जो सूर्य में रहता हुआ सूर्य के भीतर अनुस्यूत है, जिसे सूर्य नहीं जानता, जिसका शरीर सूर्य है, जो सूर्य के भीतर रहकर सूर्य का नियमन करता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है और वही अमृत है ।

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318 उपनिषत्सञ्चयनम् यो दिक्षु तिष्ठन्दिग्भ्योऽन्तरो यं दिशो न विदुर्यस्य दिशः शरीरं यो दिशो - ऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ 10 ॥

जो दिशाओं में रहता हुआ दिशाओं के भीतर अनुस्यूत है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर हैं, दिशाओं के भीतर रहकर जो दिशाओं का नियमन करता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यश्चन्द्रतारके तिष्ठश्चन्द्रतारकादन्तरो यं चन्द्रतारकं न वेद यस्य चन्द्र- तारक शरीरं यश्चन्द्रतारकमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्य- मृतः ॥11 ॥

जो चन्द्र और ताराओं में रहकर चन्द्र और तारकों के भीतर अनुस्यूत है, जिसे चन्द्र और तारक नहीं जानते | चन्द्र और तारक जिसका शरीर है जो चन्द्र और तारक के भीतर रहकर उनका नियमन करता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । य आकाशे तिष्ठान्नाकाशादन्तरो यमाकाशो न वेद यस्याकाशः शरीरं यश्चाकाशमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥12 ॥

जो आकाश में रहता हुआ आकाश के भीतर गूंथा हुआ है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका शरीर है । आकाश में अनुस्यूत होकर जो आकाश को नियमन में रखता है, वह यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यस्तमसि तिष्ठस्तमसोऽन्तरो यं तमो न वेद यस्य तमः शरीरं यस्तमोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥13 ॥

जो अँधेरे में रहते हुए अंधकार से ओतप्रोत है, जिसे अँधेरा नहीं जानता, अंधकार ही उसका शरीर है । अँधेरे में अनुस्यूत होकर जो अंधकार का नियमन करता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यस्तेजसि तिष्ठस्तेजसोऽन्तरो यं तेजो न वेद यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । इत्यधिदैवतमथाधि- भूतम् ॥14 ॥

जो तेज में रहते हुए तेज के साथ अनुस्यूत है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है । तेज के भीतर रहकर जो तेज का नियमन करता है वही यह तेरा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है | इतना वर्णन देवों के विषय में हुआ । अब प्राणियों के विषय में उसका वर्णन किया जाता है । यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यः सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिभूतमथाध्यात्मम् ॥15 ॥

जो सभी प्राणियों में रहते हुए सभी में अनुस्यूत है जिसे प्राणी नहीं जानते, प्राणी है । प्राणियों के भीतर रहकर जो प्राणियों का नियन्त्रण करता है, वही यह तुम्हारा आत्माजिसकाहै, शरीरवही