Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 361–370

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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319 तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) अन्तर्यामी है, वही अमृत है । इतना वर्णन प्राणियों के विषय में हुआ । अब शरीर के विषय में कहा जाता है । यः प्राणे तिष्ठन्प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरं यः प्राण- मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥16 ॥

जो प्राणों में रहता हुआ प्राणों में ओतप्रोत है, जिसे प्राण नहीं जानता, जिसका प्राण शरीर है | जो प्राण के भीतर रहकर प्राण का नियमन करता है वही यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यो वाचि तिष्ठन्वाचोऽन्तरो यं वाङ्न वेद यस्य वाक् शरीरं वाच- मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥17 ॥

जो वाणी में रहते हुए वाणी के भीतर ओतप्रोत है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका शरीर है । वाणी के भीतर रहकर जो वाणी का नियंत्रण करता है, यह वही तुम्हारा आत्मा है, वह अन्तर्यामी है, वही अमृत है | चक्षुषि तिष्ठश्चक्षुषोऽन्तरो यं चक्षुर्न वेद यस्य चक्षुः शरीरं यश्चक्षुरन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥18 ॥

जो आँख में रहते हुए आँख से ओतप्रोत हो गया है, जिसे आँख नहीं जानती, आँख जिसका शरीर है, जो आँख के भीतर रहकर आँख का नियंत्रण करता है, वह यही तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यः श्रोत्रे तिष्ठञ्छ्रोत्रादन्तरो यः श्रोत्रं न वेद यस्य श्रोत्रः शरीरं यः श्रोत्र- मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥19 ॥

जो कान में रहते हुए कान में घुलमिल गया है, जिसे कान नहीं जानता, कान जिसका शरीर है | जो कान के भीतर रहकर कान का नियन्त्रण करता है, वही यह तुम्हारा आत्मा है, वहीं अन्तर्यामी है और वही अमृत है । यो मनसि तिष्ठन्मनसोऽन्तरो यं मनो न वेद यस्य मनः शरीरं यो मनो- ऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥20 ॥

जो मन में रहते हुए मन के साथ अनुस्यूत हो गया है, जिसे मन नहीं जानता, मन जिसका शरीर है । जो मन के भीतर रहकर मन का नियन्त्रण करता है, वही तुम्हारा यह आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वहीं अमृत है | यस्त्वचि तिष्ठःस्त्वचोऽन्तरो यं त्वंन वेद यस्य त्वक् शरीरं यस्त्वच- मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥21 ॥

जो त्वचा में रहते हुए त्वचा के साथ अनुस्यूत होकर रहता है, जिसे त्वचा नहीं जानती, त्वचा जिसका शरीर है । जो त्वचा के भीतर रहकर त्वचा का नियंत्रण करता है, वह यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है और वही अमृत है । यो विज्ञाने तिष्ठन्विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानः शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥22 ॥

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320 उपनिषत्सञ्चयनम् जो विज्ञान में रहते हुए विज्ञान में ओतप्रोत है, जिसे विज्ञान नहीं जानता, विज्ञान जिसका शरीर है । जो विज्ञान के भीतर रहकर विज्ञान का नियंत्रण करता है, वह यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । यो रेतसि तिष्ठन् रेतसोऽन्तरो यः रेतो न वेद यस्य रेतः शरीरं यो रेतोऽ- न्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टो द्रष्टाऽश्रुतः श्रोताऽमतो मन्ताऽविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता नान्योऽतोऽस्ति विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतो- ऽन्यदार्तं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ॥23 ॥

इति सप्तमं ब्राह्मणम् ॥ जो वीर्य में रहकर वीर्य में अनुस्यूत हो गया है, जिसे वीर्य नहीं जानता, वीर्य जिसका शरीर है । जो वीर्य में रहकर वीर्य का नियंत्रण करता है, वह यह तुम्हारा आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृत है । वह सबको देखता है, उसे कोई नहीं देखता । वह सबको सुनता है, उसको कोई नहीं सुनता । वह सब कुछ सोचता है पर वह सोचा नहीं जा सकता । वह सब कुछ जानता है पर वह जाना नहीं जा सकता । आत्मा के सिवा अन्य कोई देखनेवाला नहीं है, इसके सिवा दूसरा कोई सुननेवाला नहीं है । इसके सिवा अन्य कोई सोचनेवाला नहीं है । इसके सिवा अन्य कोई जाननेवाला नहीं है । वही यह आत्मा है, वही अन्तर्यामी है, वही अमृतमय ( अविनाशी ) है । इसके सिवा सब कुछ विनाशशील है— इसके बाद उद्दालक आरुणि शान्त हो गया । ( यहाँ सातवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * अष्टमं ब्राह्मणम् अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्न प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥1 ॥

तब वचक्नुपुत्री गार्गी ने कहा- “ हे पूज्य ब्राह्मणो! अब मैं उनसे दो प्रश्न पूछूंगी । इनका यदि वे ( याज्ञवल्क्य) उत्तर दे देंगे, तो तुममें से कोई भी ब्रह्मसम्बन्धी बातों में उन्हें जीत सकनेवाला नहीं है । ” तब ब्राह्मणों ने कहा-"ठीक है, पूछो गार्गी! ” सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठे- देवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति गार्गीति ॥2 ॥ पृच्छ

वह बोली— “हे याज्ञवल्क्य! जैसे काशी में रहनेवाले या विदेहों में रहनेवाले ( ), पुत्र उतारे गए धनु पर फिर से प्रत्यञ्चा धनुष की डोरी चढ़ाकर शत्रुओं को किसी योद्धा का, दो बाण हाथ में लेकर सामने खड़ा हो जाए उसी तरह दो प्रश्न लेकर बहुत पीड़ा पहुँचानेवाले ये प्रश्न मैं आपसे पूछ रही हूँ । मुझे उन प्रश्नों का उत्तर दीजिए ।” मैं आपके सामने खड़ी हुई हूँ । तब याज्ञवल्क्य ने कहा-'-" पूछो गार्गी! ”

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321तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10) सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावा- पृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥3 ॥

उसने ( गार्गी ने ) पूछा– “हे याज्ञवल्क्य! जो तत्त्व स्वर्ग के ऊपर है, और जो पृथ्वी के नीचे है, जो स्वर्ग में भी है और पृथ्वी में भी है तथा उन दोनों के बीच में भी है । और ( विद्वान्) कहते हैं कि वह भूत, भविष्यत् तथा वर्तमानकाल में भी है, वह तत्त्व ताने-बाने की तरह किसमें पिरोया हुआ है? " स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाशे तदोतं च प्रोतं afa 114 11 याज्ञवल्क्य ने कहा— “हे गार्गी! जो तत्त्व स्वर्ग (द्युलोक ) से ऊपर है और पृथ्वी से नीचे है, जो (स्वर्ग और पृथ्वी के ) भीतर भी है, उन दोनों के बीच में भी है, और जो भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल में भी है, वह आकाश में तानेबाने की तरह ओतप्रोत है । सा होवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य यो म एतं व्यवोचोऽपरस्मै धारयस्वेति पृच्छ गार्गीति ॥5 ॥

तब गार्गी ने कहा--'"हे याज्ञवल्क्य! आपको मैं नमस्कार करती हूँ । आपने मेरे प्रश्न का उत्तर अच्छी तरह से दे दिया । अब दूसरे प्रश्न के (उत्तर) के लिए तत्पर हो जाइए । ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “ गार्गी! पूछो! ” सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावा- पृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिँस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥७ ॥

गार्गी ने कहा— “हे याज्ञवल्क्य! जो तत्त्व स्वर्ग ( द्युलोक ) से ऊपर है, जो पृथ्वी के नीचे है, जो इन दोनों के बीच में भी है, वह स्वयं भी पृथ्वी और स्वर्ग ही है । विद्वान् लोग जिसे भूत, भविष्य और वर्तमान कहते हैं, वह तानेबाने की तरह किसमें ओतप्रोत है? " स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षत आकाश एव तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥7 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा—-'"हे गार्गी! जो तत्त्व स्वर्ग से ऊपर है, पृथ्वी से नीचे है, दोनों के बीच में है, और जो ये दोनों भी है, जिसे विद्वान् लोग भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह आकाश में ही तानेबाने की तरह पिरोया हुआ है । " तब गार्गी ने कहा– “पर यह आकाश किसमें ओतप्रोत है? ” स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वम- दीर्घमलोहितमस्नेहमच्छायमतमोऽवाय्वनाकाशमसङ्गमरसमगन्धमचक्षु- ष्कमश्रोत्रमवागमनोऽतेजस्कमप्राणममुखममात्रमनन्तरमबाह्यं तदश्नाति किंचन न तदश्नाति कश्चन ॥8 ॥

21 उ० प्र ०

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322 उपनिषत्सञ्चयनम् तब याज्ञवल्क्य ने कहा-– “ हे गार्गी! (जिसके भीतर आकाश तानेबाने की तरह बुना हुआ है) उस तत्त्व को ब्रह्मवेत्ता लोग ‘ अक्षर' ( अविनाशी ) ब्रह्म कहते हैं । वह न स्थूल है न पतला, न छोटा हैन बड़ा, न लम्बा न नाटा, वह लाल नहीं है (किसी वर्णवाला नहीं है ), वह प्रवाही भी नहीं है । वह न छायावाला है न अँधेरेवाला, वह पवनयुक्त नहीं, आकाशयुक्त नहीं, वह असंग, रसरहित, गन्धरहित, चक्षुरहित, श्रोत्ररहित, वाणीरहित, मनरहित, तेज़रहित, प्राणरहित, सुखरहित है । वह पाप नहीं है । उसमें बाहर और भीतर – ऐसा भेद नहीं हैं । वह कुछ खाता नहीं है और उसको भी कोई खाता नहीं है । एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि निमेषा मुहूर्ता अहोरात्राण्यर्धमासा मासा ऋतवः संवत्सरा इति विधृतास्तिष्ठन्त्येतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्यः स्यन्दन्ते श्वेतेभ्यः पर्वतेभ्यः प्रतीच्योऽन्या यां दिशमन्वेतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशसन्ति यजमानं देवा दर्वी पितरोऽन्वायत्ताः ॥ 9 ॥

“हे गार्गी! इस अक्षर ( अविनाशी ) ब्रह्म की आज्ञा से सूर्य और चन्द्र अपने - अपने स्थान पर स्थित रहते हैं । हे गार्गी! इस अक्षर ब्रह्म की आज्ञा से ही स्वर्ग और पृथ्वी अपने - अपने स्थान पर स्थित रहते हैं । हे गार्गी! इस अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म की आज्ञा से ही क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतुएँ, वर्ष — ये सभी अपने- अपने स्थान पर स्थित ( स्थिर रहते हैं । हे गार्गी । इस अक्षर- ब्रह्म की ही आज्ञा से श्वेत पर्वतों ( हिमालय आदि ) से निकलकर कुछ नदियाँ पूर्व की ओर, कुछ पश्चिम की ओर, और कुछ अन्यान्य— जिस किसी दिशा में बहती हैं । हे गार्गी! इस अक्षर (ब्रह्म ) की आज्ञा से ही मनुष्य दानियों की प्रशंसा करते हैं तथा देवों का, यज्ञ करनेवालों का तथा पितृलोग दर्वी होम का अनुसरण करते हैं । यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वा- ऽस्माल्लोकात्प्रेति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लो- कात्प्रैति स ब्राह्मणः ॥10 ॥

"हे गार्गी! जो मनुष्य इस अक्षर को बिना जाने ही यदि हजारों वर्ष तक भी होम किया करे, यज्ञपूजा किया करे, तपश्चर्या किया करे, तो भी उसके ये सब (होम, पूजा, तप आदि) नाश होने वाले ही होते हैं । हे गार्गी! जो मनुष्य अक्षर को जाने बिना ही इस जगत् से मृत्यु को प्राप्त कर है, वह कृपण ( दीन - हीन — दयापात्र) ही है । परन्तु हे गार्गी! जो मनुष्य इस अक्षरतत्त्व कोचलाजानकरजाता मरण प्राप्त करता है, वह ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता ) है । तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं द्रष्टृश्रुतः श्रोत्रमतं मन्त्रविज्ञातं विज्ञातृ दतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतृ नान्यदतोऽस्ति मन्तृ नान्य- विज्ञात्रेतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्चेति नान्यदतोऽस्ति ॥11 ॥

“हे गार्गी! यह अक्षरब्रह्म सबको देखता है, पर उसे सुनता है, पर उसे कोई नहीं सुन सकता । वह सोच सकता हैकोई, परनहींवह देखसोचासकतानहीं जा। वह सब कुछ सकता । वह

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बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 323तृतीयोऽध्यायः ] सबको जानता है, पर जाना नहीं जा सकता । उसके सिवा कोई देखनेवाला नहीं है, कोई सुननेवाला नहीं है, कोई सोचनेवाला नहीं है, कोई जाननेवाला नहीं है । हे गार्गी! उस अक्षर में आकाश तानेबाने जैसा बना हुआ है । " सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्येध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्येध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चिद्ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाच- क्नव्युपरराम ॥12 ॥

इति अष्टमं ब्राह्मणम् ॥ तब गार्गी बोलीं— “ हे पूजनीय ब्राह्मणो! आप सब इन्हें नमस्कार करके मुक्त हों तो भी बड़ी बात है, ऐसा मान लीजिए । आपमें से कोई भी ब्रह्मसम्बन्धी बातों में इन ब्रह्मवेत्ता को जीत नहीं सकेगा । " ऐसा कहकर वाचक्नवी ( गार्गी) शान्त हो गईं । ( यहाँ आठवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * नवमं ब्राह्मणम् अथ हैनं विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ कति देवा याज्ञवल्क्येति स हैतयैव निविदा प्रतिपेदे यावन्तो वैश्वदेवस्य विविद्युच्यन्ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्त्रेत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रयस्त्रिशदित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति षडित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति त्रय इत्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येति द्वावित्योमिति होवाच कत्येव देवा याज्ञवल्क्येत्यध्यर्ध इत्योमिति होवाच कत्येव देवा इत्येक इत्योमिति होवाच कतमे ते त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्री च सहस्त्रेति ॥1 ॥

” याज्ञवल्क्य ने बाद में शकलपुत्र शाकल्य विदग्ध ने पूछा- "हे याज्ञवल्क्य! देव कितनेदेवहैंगिनाए? गए हैं उतने उत्तर दिया— “विश्वदेवों की स्तुति में देवों की संख्या बताने वाले मंत्र में जितनेठीक है याज्ञवल्क्य! पर " -" – “ तीन हजार तीन सौ और छः देव हैं । तब शाकल्य ने कहा यह तो यह भी ठीक वास्तव में देव कितने हैं? " याज्ञवल्क्य बोले- “ तैंतीस देव हैं । " शाकल्य: नेहैं कहा। ” शाकल्य बोला— है पर याज्ञवल्क्य! सचमुच देव कितने हैं? " याज्ञवल्क्य ने कहा– “नेछ कहा– “तीन देव । ” तब ठीक है पर सही रूप में देव कितने हैं याज्ञवल्क्य! " तब याज्ञवल्क्य ? " याज्ञवल्क्य ने कहा— शाकल्य बोला— ‘ “याज्ञवल्क्य! यह भी ठीक है पर फिर भी देव कितनेपरहैंवास्तव में देव कितने हैं? ” “दो देव हैं । ” फिर शाकल्य बोला- “याज्ञवल्क्य । यह भी ठीक है याज्ञवल्क्य ने कहा— “ डेढ़ देव । ” शाकल्य बोला - " याज्ञवल्क्य! यहबोला-भी ठीक“ठीकहै परहै | फिरअब भीवे सहीतीन रूप में देव कितने हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले– “एक देव! ” शाकल्य हजार तीन सौ छ: देव कौन कौन-से हैं? " इति कतमे ते स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिशत्त्वेव देवा शदिन्द्र- त्रयस्त्रि’शदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रि श्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिशाविति ॥ 2 ॥

पृष्ठ 366

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324 उपनिषत्सञ्चयनम् याज्ञवल्क्य ने कहा— “ ये तो उनकी शक्तियाँ ही हैं । ये देव तो तैंतीस ही हैं । ” शाकल्य ने पूछा— “ये तैंतीस कौन- कौन से हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले– “ आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, ये सब मिलकर इकत्तीस हुए । इनमें इन्द्र और प्रजापति मिलने से तैंतीस हुए ।” (फिर दोनों में प्रश्नोत्तरी चली -) कतमे वसव इत्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसव एतेषु हीद सर्व वसु हितमिति तस्मा- द्वसव इति ॥3 ॥

प्रश्न: —‘वसु कितने हैं? ' उत्तर– ' अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, सूर्य, स्वर्ग, चन्द्रमा और नक्षत्र- ये वसु हैं । सब कुछ इनमें बसता है इसलिए वे वसु कहे गए हैं कतमे रुद्रा इति दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्माच्छरीरान्म- यदुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद्रुद्रा इति ॥4 ॥

प्रश्नः– “रुद्र कितने हैं? ” उत्तर– “इस पुरुष में दस प्राण और ग्यारहवाँ आत्मा ( ये ‘रुद्र ’ हैं ) जब इस मरणशील शरीर में से जब ये उठकर चले जाते हैं, तब ( सगे- सम्बन्धियों को ) रुलाते हैं इसलिए वे 'रुद्र' हैं । " कतम आदित्या इति द्वादश वै मासाः संवत्सरस्यैत आदित्या एते हीद‍ सर्वमाददाना यन्ति ते यदिदः सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति ॥5 ॥

प्रश्न: - ‘“ आदित्य कितने हैं? " उत्तर- "वर्ष के बारह महीने ही बारह आदित्य हैं । वे इस सारे जगत् को अपने साथ लेकर ( आददाना) बह जाते हैं ( यन्ति ) । इसलिए वे आदित्य कहे गए हैं । कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति ॥6 ॥

प्रश्न: - “ इन्द्र कौन है? प्रजापति कौन है? " उत्तर- "मेघ ही इन्द्र है और यज्ञ ही प्रजापति है । ” प्रश्न— “ मेघ कौन है? " उत्तर-" वज्र ही ।" प्रश्नः- "यज्ञ कौन है? ” उत्तर– “ पशु । ” कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीद सर्वं षडिति ॥7 ॥

प्रश्नः– “वे छ: देव कौन - कौन से हैं? ” उत्तर— “अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष । —: ( ) जाते हैं, और द्युलोक ये छ देव हैं । उनमें ही सब कुछ सभी देव समा आदित्य कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति इति ॥8 ॥ योऽयं पवत

प्रश्न— “ वे तीन देव कौन - कौन से हैं? " उत्तर- "ये में सभी देव समा जाते हैं । ” प्रश्न—“वे दो देव कौन से तीन लोक ही तीन देव हैं, क्योंकि इन्हीं “ -? " -? " “ " प्रश्न— तो यह डेढ़ देव कौन सा है उत्तर वह, जोहैंकि बहताउत्तर—है अर्थात्वे अन्नपवनऔर। ” प्राण हैं ।

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तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 325 तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यदस्मिन्निदः सर्वमध्या- त्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्या- चक्षते ॥१ ॥

प्रश्न- “कुछ लोग तो ऐसा कहते हैं कि वायु अकेला ही बहता है, तो फिर वह डेढ़ कैसे? ” उत्तर— “ क्योंकि इसी में यह सब ' ऋद्धि' को प्राप्त होते हैं ( अधि+ ऋद्धि) इसीलिए वह ‘ अध्यर्ध ’ कहा जाता है । ” प्रश्न– “ तो एक देव कौन सा है? ” उत्तर- " वह प्राण है, वह ब्रह्म है, वही ‘ त्यत्' कहा जाता है । पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्व- स्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष‍ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवाय शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥10 ॥

तब शाकल्य ने कहा– “हे याज्ञवल्क्य! पृथ्वी जिस चैतन्यपुरुष का निवासस्थान है, अग्नि जिसकी आँख है, मन जिसकी ज्योति है, वह पुरुष सभी के शरीरों का बड़े से बड़ा आश्रय है, ऐसा जानना चाहिए । ऐसा जो मनुष्य जानता है केवल वही ज्ञानी है । " तब याज्ञवल्क्य बोले— “ तुम जिसे सभी शरीरों का आश्रयरूप मानते हो, उस चेतनपुरुष को तो मैं जानता ही हूँ । जो पुरुष शरीर में रहता है, वही यह है । समझे न शाकल्य? ” तब शाकल्य ने पूछा- "उस पुरुष का देव कौन है? याज्ञवल्क्य बोले— “ अमृत । ” काम एव यस्यायतन हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्स- र्वस्यात्मनः परायण स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं काममयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति स्त्रिय इति होवाच ॥11 ॥

शाकल्य ने कहा— “काम जिसका निवासस्थान है, हृदय जिसकी आँख है, मन जिसकी ज्योति है, वह पुरुष सभी के शरीरों का आश्रयस्थान है, ऐसा जानना चाहिए । उसे जाननेवाला ही ज्ञानी कहलाता है समझे याज्ञवल्क्य? " तब याज्ञवल्क्य ने कहा- "जो पुरुष सबके शरीर का बड़े से बड़ा आश्रयस्थान है, ऐसा जो तुमने कहा, उस काममय पुरुष को मैं जानता हूँ । " तब शाकल्य ने कहा— "उसका देव कौन है? " याज्ञवल्क्य बोले- “स्त्रियाँ हैं । " रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्व- स्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवासावादित्ये पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति सत्यमिति होवाच ॥12 ॥

- ",,! शाकल्य ने कहा- रूप जिसका निवासस्थान है आँख से जो देखता है मन जिसकी उसकोज्योतिऐसा है, वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है, ऐसा जानना चाहिए । याज्ञवल्क्य जाननेवाला ही ज्ञानी होता है (समझे? )" तब याज्ञवल्क्य ने कहा- "जो तुमने कहा" कितब वहशाकल्यपुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान होता है तो उस आदित्यस्थ पुरुष को मैं जानता। " ही हूँ । कहा-' -"? " ने तो उसका देवता कौन है याज्ञवल्क्य बोले- वह सत्य है

पृष्ठ 368

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326 उपनिषत्सञ्चयनम् आकाश एव यस्यायतन श्रोत्रं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्या- त्सर्वस्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषः सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायः श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥13 ॥

शाकल्य ने कहा— ‘ “ आकाश जिसका निवासस्थान है, कान जिसकी आँख है, मन जिसकी ज्योति है, वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है, ऐसा जानना चाहिए । हे याज्ञवल्क्य! उसको जाननेवाला ही ज्ञानी कहलाता है । " तब याज्ञवल्क्य बोले - "जो तुमने कहा कि वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है, उस प्रतिघोषात्मक पुरुष को तो मैं जानता ही हूँ । ” तब शाकल्य ने कहा— “तो उसका देव कौन है? ” याज्ञवल्क्य ने कहा–“वह दिशाएँ हैं । ” तम एव यस्यायतन हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्या- त्सर्वस्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति मृत्युरिति होवाच ॥14 ॥

शाकल्य बोला— ‘ “ अंधकार जिसका निवासस्थान है, हृदय आँख है, मन ज्योति है, वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है — ऐसा जानना चाहिए । उसको जाननेवाला ही हे याज्ञवल्क्य! ज्ञानी कहलाता है । ” तब याज्ञवल्क्य बोले – “ जो तुमने कहा कि वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है, तो मैं उस छायामय पुरुष को जानता हूँ शाकल्य । " तब शाकल्य ने कहा- “ उसका देव कौन है? " याज्ञवल्क्य बोले— “ मृत्यु । ” रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्व- स्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥15 ॥

शाकल्य ने कहा – “रूप जिसका आश्रयस्थान है, जो आँख ही जिसकी शक्ति है, मन जिसकी ज्योति है, वह पुरुष सबके शरीर का आश्रयस्थान है, ऐसा जानना चाहिए । हे याज्ञवल्क्य! उसको जाननेवाला ही ज्ञानी कहलाता है " । तब याज्ञवल्क्य बोले– “जो तुमने कहा कि वह पुरुष आश्रयस्थान है, उस दर्पणस्थ पुरुष को मैं जानता हूँ ।” शाकल्य ने कहा– “उसका देव कौन सबकाहै? ” याज्ञवल्क्य बोले— “ असु अर्थात् जीव । ” आप एव यस्यायतनं हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं त्सर्वस्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्यज्ञवल्क्य विद्या- पुरुषश् सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषःवेदसवा अहं तं शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥16 ॥ एष वदैव शाकल्य ने कहा— “जल जिसका निवासस्थान है, हृदय आँख है, मन,,जातासबकाहैआश्रयस्थान" । तब याज्ञवल्क्यहै ऐसा बोले—जानना “चाहिएतुमने जो। उसकोकहा किऐसावहजाननेवालापुरुष सबकेही हे याज्ञवल्क्यज्योति है! उसज्ञानीपुरुषसमझाको

मैं उस जलगत पुरुष को जानता हूँ शाकल्य ।” तब शाकल्य बोला-शरीर“उसकाका आश्रयस्थान है, तो “ ”?”याज्ञवल्क्य बोले— वरुण । देव कौन है

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तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 327 रेत एव यस्यायतनः हृदयं लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात्सर्व- स्यात्मनः परायणः स वै वेदिता स्याद्याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुष‍ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति होवाच ॥17 ॥

शाकल्य ने कहा— “ वीर्य जिसका निवासस्थान है, हृदय आँख है, मन ज्योति है, वह पुरुष सबके आत्मा का बड़ा आश्रयस्थान है, ऐसा जानना चाहिए । जो पुरुष यह जानता है वही हे याज्ञवल्क्य! ज्ञानी कहलाता है ।" तब याज्ञवल्क्य बोले– “ तुम जिसे सबके शरीर का आश्रयस्थान कहते हो, उस पुत्रमय को तो मैं जानता हूँ शाकल्य । " तब शाकल्य बोला – “उसका देव कौन है? ” याज्ञवल्क्य बोले— “प्रजापति । ” शाकल्येति होवाच याज्ञवल्क्यस्त्वा स्विदिमे ब्राह्मणा अङ्गारावक्षयण- मक्रता 3 इति ॥18 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा-"हे शाकल्य! तुम्हें इन ब्राह्मणों ने अंगारे पकड़ने का चिमटा बना दिया है अर्थात् अपने स्वार्थ के लिए तुमको बलि का बकरा बना दिया है । याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरुपाञ्चालानां ब्राह्मणानत्य- वादीः किं ब्रह्म विद्वानिति दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥19 ॥

शाकल्य बोला— “हे याज्ञवल्क्य! कुरुपांचाल देश के ब्राह्मणों के ऊपर तुम आक्षेपतबकरतेशाकल्यहो, तो क्या तुम ब्रह्म को जानते हो? ” याज्ञवल्क्य बोले - "मैं दिशाओं को जानता हूँ । ” बोला— “ यदि तुम दिशाओं को, उनके देवों को और उनके आधारों को जानते हो, तब— किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां दिश्यसीत्यादित्यदेवत इति स आदित्यः कस्मि- प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति रूपेष्विति चक्षुषा हि रूपाणि पश्यति कस्मिन्नु रूपाणि प्रतिष्ठितानीति हृदय इति होवाच हृदयेन हि रूपाणि जानाति हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि भवन्तीत्येव- मेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥20 ॥

“हे याज्ञवल्क्य! कहो कि इस पूर्व दिशा में तुम किस रूप में हो? ” याज्ञवल्क्य? ” याज्ञवल्क्यबोले—ने “ ” - " कहा— आदित्यदेवतावाला“ आँख में । ” हूँशाकल्य। शाकल्यबोला-बोलातब आँखवह किसमेंआदित्यप्रतिष्ठितकहाँ प्रतिष्ठितहै? " बोला-याज्ञवल्क्यहै “ ये रूपने कहा-किसमें “रूपों में, क्योंकि मनुष्य चक्षु के द्वारा ही रूपों को देखता है । ही" शाकल्यमनुष्य रूपों को जानता है । हृदय प्रतिष्ठित हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले- " हृदय में, क्योंकि हृदय से! ठीक है, ऐसा ही है । " में ही रूप प्रतिष्ठित हैं । " तब शाकल्य बोला- “हे याज्ञवल्क्य कस्मि- किं देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति यमदेवत इति सदक्षिणायामितियमः प्रतिष्ठित इति यज्ञ इति कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इतिश्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठितेति श्रद्धायामिति यदा ह्येष श्रद्धा प्रतिष्ठितेि ददाति श्रद्धायाः ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नुह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥21 ॥

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328 उपनिषत्सञ्चयनम् शाकल्य ने पूछा— “दक्षिण दिशा में आप किस रूप में हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले– “यमदेव के रूप में । ” शाकल्य बोला— “ वह यम किसमें रहते हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले– “ यज्ञ में । ” शाकल्य -‘ “ यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? ” याज्ञवल्क्य -" – “ ”ने“दक्षिणापूछा किसमें प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य बोले–बोले“ श्रद्धा मेंदक्षिणाही प्रतिष्ठितमें । तबहै शाकल्य। जब मनुष्यने पूछा—श्रद्धा रखता है, तब दक्षिणा देता है । इसलिए श्रद्धा में ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है । शाकल्य ने पूछा— “ श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है? ” याज्ञवल्क्य बोले– “हृदय में ही प्रतिष्ठित है । हृदय से ही श्रद्धा जानी जा सकती है । अतः हृदय में ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है । " तब शाकल्य बोला– “हे याज्ञवल्क्य! ठीक है, वह ऐसा ही है । " किं देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति वरुणदेवत इति स वरुणः कस्मि- प्रतिष्ठित इत्यप्स्विति कस्मिन्त्र्वापः प्रतिष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैत- 'वरुण द्याज्ञवल्क्य “112 2 ॥? " " शाकल्य ने पूछा— पश्चिम दिशा में आप किस रूप में हैं याज्ञवल्क्य बोले- के रूप में । ” शाकल्य ने पूछा- " उन वरुण को किसका आधार है? " याज्ञवल्क्य ने कहा— “जल का । ” शाकल्य ने पूछा-"जल को किसका आधार है? " याज्ञवल्क्य बोले— “ वीर्य का । ” शाकल्य ने पूछा— “ वीर्य कहाँ प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य बोले- " हृदय में । इसलिए जब पिता जैसे रूपवाला पुत्र जन्मता है, तब लौकिक जन ऐसा कहते हैं कि 'मानो यह पिता के हृदय से ही निकला है । हृदय से ही बना है ।' क्योंकि वीर्य हृदय के आधार से ही टिका हुआ है । ” तब शाकल्य ने कहा – “हे याज्ञवल्क्य । ठीक है, वह ऐसा ही है । " किं देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति सोमदेवत इति स सोमः कस्मि- न्प्रतिष्ठित इति दीक्षायामिति कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति तस्मादपि दीक्षितमाहुः सत्यं वदेति सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति हृदय इति होवाच हृदयेन हि सत्यं जानाति हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥23 ॥

शाकल्य ने पूछा– “ उत्तर में आप किस देववाले हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले— “सोमदेववाला ।” शाकल्य बोला—‘ “वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है? याज्ञवल्क्य बोले— “ दीक्षा में‘“? " – “ ” है दीक्षाकि ‘सत्यकिसमेंबोलोप्रतिष्ठित। ’ क्योंकिहै दीक्षायाज्ञवल्क्यसत्य के बोलेआधार परसत्यही तोमें टिकी। इसीलिए दीक्षा लेनेवाले। शाकल्यसे कहाबोला—जाता “ सत्य को किसका आधार है? ” याज्ञवल्क्य बोले– “ हृदय का हुई है । " तब शाकल्य ने पूछा— को जानता है । सत्य हृदय में ही रहता है । उसी के आधार पर सत्यही, क्योंकि मनुष्य हृदय से ही सत्य --'“हे याज्ञवल्क्य! वह ऐसा ही है । ” "ने कहा टिका रहता है । तब शाकल्य किं देवतोऽस्यां धुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत ष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक्प्रतिष्ठितेतिइति सोऽग्निः कस्मिन्प्रति- प्रतिष्ठितमिति ॥24 ॥ हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं