Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 371–380
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 371–380
पृष्ठ 371
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 ) 329 शाकल्य ने पूछा– “ ध्रुवा ( ऊपर की दिशा ) में आप किस देव के रूप में हैं? ” याज्ञवल्क्य बोले— “ अग्निदेव के रूप में ।” शाकल्य बोला- "वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है? ” याज्ञवल्क्य बोले–“वाणी में । " शाकल्य बोला- "वाणी किसमें प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य बोले – “हृदय में । " शाकल्य ने पूछा- "हृदय किसमें प्रतिष्ठित है? ' अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्धयेतदन्य-. त्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैनदद्युर्वयासि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥25 ॥
तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “ओ प्रेत! यदि तुम ऐसा मानते हो कि हृदय इससे ( आत्मा- शरीर ) से अलग है, और यदि हृदय हमसे ( शरीर से) अलग हो, तब तो कुत्ते इसको खा जाते और पक्षी इसको कुचल डालते । कस्मिन्नु त्वं चात्मा च प्रतिष्ठितौ स्थ इति प्राण इति कस्मिन्नु प्राणः प्रतिष्ठित इत्यपान इति कस्मिन्वपानः प्रतिष्ठित इति व्यान इति कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इत्युदान इति कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति समान इति स एष नेतिनेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतान्यष्टावायतनान्यष्टौ लोका अष्टौ देवा अष्टौ पुरुषाः स यस्तान्पुरुषान्निरुह्य प्रत्युह्यात्यक्रामत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति त ह न मेने शाकल्यस्तस्य ह मूर्धा विपपातापि हास्य परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्नुरन्य- न्मन्यमानाः ॥26 ॥
शाकल्य ने पूछा– “ यह शरीर और आत्मा किसमें प्रतिष्ठित ( आधारित ) है? ” याज्ञवल्क्य ने कहा— “ प्राण में । ” शाकल्य ने पूछा- "प्राण किसमें प्रतिष्ठित हैं? " याज्ञवल्क्य ने कहा— “ अपान में । ” शाकल्य बोला- "और अपान किसमें प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य बोले- "व्यान में । " शाकल्य ने पूछा— “ व्यान किसमें प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य ने कहा- “उदान में । " शाकल्य ने पूछा– “ और उदान किसमें प्रतिष्ठित है? " याज्ञवल्क्य ने कहा– “समान में । यह आत्मा ' नेति नेति' कहकर ही बताया जा सकता है । वह पकड़ने योग्य नहीं है, क्योंकि वह पकड़ा नहीं जा सकता । वह अक्षीण ( अक्षय ) है, क्योंकि उसका क्षय नहीं होता । वह असंग है, क्योंकि वह कहीं चिपकता नहीं । वह बद्ध नहीं है, वह दु:खी नहीं होता, वह किसी से मारा नहीं जा सकता । ये आठ निवासस्थान हैं, आठ लोक हैं, आठ देव हैं, आठ पुरुष हैं । इन आठ पुरुषों को ठीक तरह से जान लेने पर अपनी बुद्धि में इकट्ठा करके उपाधि के धर्मों को मनुष्य पार कर जाता है । उसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिलता । उस परम पुरुष के बारे में मैं तुमसे पूछता हूँ ( हे शाकल्य! ) यदि वह तुम मुझे नहीं समझा पाओगे, तो तुम्हारा मस्तक नीचे गिर पड़ेगा ।" शाकल्य तो उस ( औपनिषद् पुरुष को ) जानता नहीं था इसलिए उसका मस्तक नीचे गिर पड़ा । चोर लोग तो (कुछ और होगा ऐसा मानकर उसकी हड्डियाँ तक उठा ले गए । अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान्वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥27 ॥
पृष्ठ 372
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
330 उपनिषत्सञ्चयनम् फिर उन्होंने ( याज्ञवल्क्य ने कहा--'"हे पूजनीय ब्राह्मणो! आपमें से जिस किसी की भी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न पूछे या आप सभी पूछें । अथवा तो मैं आपमें से किसी एक से या आप सभी से प्रश्न पूछूं । ” पर ब्राह्मणों की ऐसा कुछ करने की हिम्मत नहीं पड़ी । तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ-
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ ( 1 ) ॥
फिर याज्ञवल्क्य ने उनसे इन श्लोकों के द्वारा उनसे पूछा— “वृक्ष जिन विशालता आदि गुणों से युक्त है, इसी प्रकार पुरुष (जीव का शरीर ) भी तो वैसा ही ( उन्हीं गुणों से सम्पन्न) होता है, यह बात बिल्कुल सही है । पुरुष के लोम (रोंगटे ) होते हैं, और वृक्ष के पत्ते होते हैं । पुरुष के बाहर त्वचा होती है, तो वृक्ष के बाहर में छिलका होता है ।
त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदा तृण्णात्प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥ ( 2 ) ॥
इस पुरुष की त्वचा में से ही लहू निकलता है वैसे ही वृक्ष के छिलके से रस द्रवित होता है । इससे ( इस साम्य से ) काटे हुए वृक्ष में से जैसे रस निकलता है, वैसे ही जख्मी पुरुष से लहू निकलता
मासान्यस्य शकराणि किनाट स्राव तत्स्थिरम् ।
अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ( 3 ) ॥
मनुष्य के शरीर में मांस होता है, तो वृक्ष में भी छिलके का भीतर का भाग ( शकर ), तथा (रेशे ) उसके भी भीतर का भाग ( किनाट ) होता है । वह स्थिर है । पुरुष के स्नायुजाल के भीतर जैसे हड्डियाँ होती हैं, वैसे ही वृक्ष में किनाट (रेशे ) आदि के भीतर काष्ठ होते हैं । मज्जा तो दोनों में ही मज्जा-रूप में निश्चित की गई है ।
यद्वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥ ( 4 ) ॥
वृक्ष के काटे जाने पर भी वह मूल में से नए सिरे से अंकुरित होता है, उसी तरह मृत्यु के द्वारा काटे जाने पर भी मनुष्य किस मूल में से फिर से अंकुरित होता है (उग निकलता है )?
रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत्प्रजायते ।
धानरुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्यसम्भवः ॥ ( 5 ) ॥
ऐसा मत कहो कि वह वीर्य से उत्पन्न होता है । है । पुरुष की तरह वृक्ष भी बीज से ही उत्पन्न होता है क्योंकि, परन्तुवीर्यवह तोतो जीवितनष्ट होनेमनुष्य से ही उत्पन्न होता, नहीं होता । - से उत्पन्न हुआ करता है जबकि पुरुष तो मरने के बाद फिर जीवित के बाद भी फिर फिर यत्समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् । मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात्प्ररोहति ॥ ( 6 ) । यदि वृक्ष को मूलसहित उखाड़ दिया जाए, तो वह मनुष्य को काट डाले, तो फिर वह किस मूल से उगेगा?फिर से नहीं उगता । उसी प्रकार यदि मृत्यु
पृष्ठ 373
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
331तृतीयोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषत् ( 10 )
जात एव न जायते को न्वेवं जनयेत्पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमनस्य तद्विद इति ॥ ( 7 ) 28 ॥
इति नवमं ब्राह्मणम् ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषदि तृतीयोऽयायः ॥3 ॥
( हे ब्राह्मणो! ) यदि आप ऐसा मानें कि " वह पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, इससे वह फिर से उत्पन्न नहीं होता ।’—– तो वह ठीक नहीं है । वह फिर से जन्मता तो है ही । तो ( मैं पूछता हूँ कि ) उसे कौन जन्म देता है? ” ( याज्ञवल्क्य के प्रश्न का उत्तर जब ब्राह्मण लोग न दे सके, तब याज्ञवल्क्य ने स्वयं उत्तर देते हुए कहा कि- ) “ब्रह्म विज्ञानरूप है, आनन्दरूप है, वह दानी ( त्यागी ) यजमान की परम गति है । वह परमज्ञानी (ब्रह्मवेत्ता ) का चरम लक्ष्य है । ( यहाँ नौवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् में तीसरा अध्याय समाप्त होता है ।
पृष्ठ 374
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
332 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ चतुर्थोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् ॐ जनको ह वैदेह आसाञ्चक्रेऽथ ह याज्ञवल्क्य आवव्राज त होवाच याज्ञवल्क्य किमर्थमचारी: पशूनिच्छन्नण्वन्तानीत्युभयमेव सम्राडिति होवाच ॥1 ॥
विदेह जनक आसन पर बैठे हुए थे तब उनके पास याज्ञवल्क्य आए । उन याज्ञवल्क्य से जनक ने कहा— “हे याज्ञवल्क्य! किस हेतु से यहाँ आप आए हैं? क्या पशुओं की इच्छा से आए हैं अथवा सूक्ष्म वस्तु के निर्णायक प्रश्नों को सुनने के लिए आए हैं? " तब याज्ञवल्क्य ने कहा—-' "हे राजा! दोनों के लिए आया हूँ । " यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे जित्वा शैलिनिर्वाग्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छैलिनिरब्रवीद्वाग्वै ब्रह्मेत्यवदतो हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य । वागेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रज्ञेत्येनदुपासीत का प्रज्ञा याज्ञवल्क्य वागेव सम्राडिति होवाच वाचा वै सम्राड् बन्धुः प्रज्ञायत ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्ट हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि वाचैव सम्राट् प्रज्ञायन्ते वाग्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं वाग्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभ सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥2 ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा— “यदि किसी ने तुम्हें किसी सत्य की बात बताई हो, तो हम सुनना चाहते हैं । ” तब जनक बोले- “ शिलिनपुत्र जित्वा ने मुझे कहा था कि 'वाणी' ही ब्रह्म है । " तब याज्ञवल्क्य बोले— “ जैसे कोई मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला कहे, वैसा ही तुम्हें शिलिनपुत्र जित्वा ने बताया कि ‘ वाणी ब्रह्म है । ' क्योंकि जो मनुष्य बोल ही न सकता हो, उसकी दशा कैसी होती है? पर उस ब्रह्म का निवासस्थान क्या है, वह किसके आधार पर टिका हुआ है, आदि उसने तुम्हें बतायाकेवल एकहै क्याही अंश? ” जनकहुआ । ने” तबकहा-जनक"नहींबोले-जी!“”तोतबहे याज्ञवल्क्ययाज्ञवल्क्य!नेआपकहा- "तब तो वह ब्रह्म का याज्ञवल्क्य बोले— “वाणी ही उसका निवासस्थान है, आकाश उसका मुझे वह समझाइए । ” तब (ज्ञान) रूप में उपासना करनी चाहिए । " तब जनक ने पूछा– “हे याज्ञवल्क्यआधार है, उस ब्रह्म की प्रज्ञा “!!!? ”तब याज्ञवल्क्य बोले— हे सम्राट् वाणी ही प्रज्ञा है । हे सम्राट् वाणी प्रज्ञा क्या है,,,,,सकता है । ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इतिहास पुराण से ही मित्र को पहचाना जा टीकाएँ, भाष्य, यज्ञ, होम, अन्य को खिलाया गया अन्न, पिलाया, विद्या, उपनिषदें, श्लोक, सूत्र,,,,जानकरऔर इनजोसबउसकीप्राणियोंउपासनाको वाणीकरतासे हैही, तोजानावाणीजा कभीसकताउसकाहै । हे सम्राट्हुआ! पानीवाणी यहपरब्रह्मलोकही परलोकहै, ऐसा उपहार आदि देते हैं । वह देव बनकर देवों के पास जाता है त्याग नहीं करती । सभी प्राणी उसको ' " । तब विदेह के राजा जनक ने कहा—
पृष्ठ 375
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 333 “ मैं आपको हाथी जैसे बैल उत्पन्न करनेवाली हजार गायों का झुण्ड देता हूँ । " तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि– “मेरे पिता का ऐसा मत था कि शिष्य को पूरी शिक्षा दिए बिना उससे धन नहीं लेना चाहिए । " यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्म उदङ्कः शौल्बायनः प्राणो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छौल्बायनोऽब्रवी- त्प्राणो वै ब्रह्मेत्यप्राणतो हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य प्राण एवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा प्रियमित्येनदुपासीत का प्रियता याज्ञवल्क्य प्राण एव सम्राडिति होवाच प्राणस्य वै सम्राट्कामायायाज्यं याजयत्य- प्रतिगृह्यस्य प्रतिगृह्णात्यपि तत्र वधाशङ्कं भवति यां दिशमेति प्राणस्यैव सम्राट्कामाय प्राणो वै समाट् परमं ब्रह्म नैनं प्राणो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवंविद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृ- षभः सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥3 ॥
याज्ञवल्क्य ने फिर कहा— “तुम्हें जिस किसी ने (ज्ञान की बात बताई हो, उसे हम सुनना चाहते हैं । ” जनक बोले— “ शुल्वपुत्र उदक ने मुझसे कहा था कि– 'प्राण' ब्रह्म है । ” तब याज्ञवल्क्य बोले— “ जैसे कोई मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला मनुष्य कहता हो, वैसे ही तुम्हें शुल्वपुत्र उदक ने बताया है कि ' प्राण ब्रह्म है ।' क्योंकि यदि मनुष्य में प्राण न हो तो उसकी कैसी दशा होती? परन्तु इस प्राण का निवासस्थान क्या है और वह किसके आधार पर टिका है, वह तुम्हें उसने बताया है क्या? ” जनक बोले— “नहीं जी ”,, तब याज्ञवल्क्य बोले – “सम्राट्! तब तो वह ब्रह्म का एक अंश ही हुआ! ” तब जनक बोले- “ हे याज्ञवल्क्य! तो आप मुझे यह बताइए ।" तब याज्ञवल्क्य बोले— “प्राण उसका निवासस्थान है, और आकाश उसका आधार है । उस ब्रह्म की प्रिय के रूप में उपासना करनी चाहिए । " जनक बोले- "हे याज्ञवल्क्य! वह प्रिय क्या है? " याज्ञवल्क्य बोले- "हे सम्राट्! प्राण ही प्रिय है । हे सम्राट्! प्राण को टिकाए रखने के लिए ही मनुष्य यज्ञ के अनधिकारी को भी यज्ञ करवा देते हैं, अयोग्य दाता से भी दान ले लेते हैं । हे सम्राट्! मनुष्य प्राण टिकाने के लिए ही तो वह जिस दिशा में वध की शंका होती है, उस दिशा की ओर भी जाता है । हे सम्राट्! ‘प्राण परम ब्रह्म है' ऐसा जानकर जो मनुष्य उसकी उपासना करता है उसे प्राण कभी नहीं त्यागता है | सभी प्राणी उसे उपहारादि देकर उसका उपकार करते हैं । वह दैव बनकर देवों के पास जाता है " । तब विदेहराज जनक ने कहा- "जिन गायों से हाथी के आकार वाले बैल उत्पन्न होते हैं, ऐसी हजार गायें मैं आपको देता हूँ । ” तब याज्ञवल्क्य बोले– “ मेरे पिता ऐसा मानते थे कि शिष्य को पूर्ण शिक्षा दिए बिना उसके पास से कुछ लेना नहीं चाहिए । " यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्कुर्वार्ष्णश्चक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्वाष्र्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किः स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य चक्षुरेवायतनमाकाशः होवाचप्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति तत्सत्यं चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्राक्षमिति
पृष्ठ 376
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषत्सञ्चयनम्334 भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभि- क्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नानुशिष्य हरेतेति ॥4 ॥
याज्ञवल्क्य फिर बोले— “ तुम्हें और किसी ने कुछ ज्ञान की बात बताई हो, तो हम सुनना चाहते हैं । ” तब जनक बोले— “ वृष्ण- पुत्र बर्कु ने मुझसे कहा है कि- "चक्षु ही ब्रह्म है । ” तब याज्ञवल्क्य बोले — ‘“ जैसे मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला पुरुष कहता है, उसी तरह वृष्णपुत्र ने तुम्हें बताया है कि चक्षु ही ब्रह्म है | न देखनेवाले की कैसी दशा होती है? परन्तु उसने उसका निवासस्थान और उसका आधार क्या है, वह तुम्हें बताया है क्या? ” जनक बोला- “ नहीं जी । ” तब याज्ञवल्क्य बोले— “ तब तो हे सम्राट्! वह तो ब्रह्म का एक अंश हुआ । तब जनक ने कहा— “हे याज्ञवल्क्य! तब आप ही मुझे यह समझाइए ।" तब याज्ञवल्क्य ने कहा – “चक्षु ही इसका निवासस्थान है और आकाश उसका आधार है । उसे सत्य मानकर उसकी उपासना करनी चाहिए ।” तब जनक बोले— “ वह सत्यता क्या है याज्ञवल्क्य! ” तब याज्ञवल्क्य बोले– “हे सम्राट्! चक्षु ही तो ( सत्यता) है, क्योंकि आँख से देखनेवाले से यदि कोई पूछे कि– “ क्या तुमने देखा? ” और यदि वह उत्तर दे कि—‘ हाँ देखा', तो वह सत्य साबित होता है । हे सम्राट्! 'चक्षु ही परम ब्रह्म है ' ऐसा जानने वाले उपासक का चक्षु कभी त्याग नहीं करता है, सभी प्राणी उसे उपहार देकर उसका उपकार करते हैं । वह देव होकर देवों से मिलता है ।" तब जनक वैदेह ने कहा- "हाथी के आकार वाले बैलों को उत्पन्न करनेवाली हजार गायें मैं आपको देता हूँ ।” तब याज्ञवल्क्य ने कहा– “ मेरे पिता मानते थे कि पूर्ण शिक्षा दिए बिना शिष्य से कुछ भी लेना नहीं चाहिए । यदेव ते कश्चिदब्रवीतच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तद्भारद्वाजोऽब्रवी- च्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो हि किः स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवा- यतनमाकाशः प्रतिष्ठाऽनन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद्वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्रः श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनश् श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नानुशिष्य हरेतेति ॥5 ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा— “ जिस किसी ने तुम्हें सत्य के बारे में बताया हो, वह हम सुनना चाहते हैं । ” तब जनक ने कहा— “ भारद्वाज गोत्र के गर्दभीविपीत ने मुझे बताया है कि ' कान ब्रह्म है । ' याज्ञवल्क्य ने कहा— “ जैसे मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला मनुष्य कहता हो, वैसे ही भरद्वाज गोत्र के गर्दभीविपीत ने तुम्हें बताया कि 'कान ब्रह्म है । ' क्योंकि नहीं सुनने वाले की कैसी दशा होती है? परन्तु उस ब्रह्म का निवासस्थान कहाँ है, उसका आधार क्या है, इसके बारे में बताया है क्या? ” “ " '! जनक बोले— वह तो नहीं कहा था । तब याज्ञवल्क्य बोले- हे सम्राट् वह तो ही अंश हुआ ” । तब जनक बोले— “हे याज्ञवल्क्य! तब अब आप मुझे इस विषय में समझाइएब्रह्म का एक। ” तब
पृष्ठ 377
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
] ( 10 ) 335चतुर्थोऽध्यायः बृहदारण्यकोपनिषद् याज्ञवल्क्य बोले— “कान उसका निवासस्थान है, आकाश उसका आधार है । उस ब्रह्म को ' अनन्त' मानकर उसकी उपासना करनी चाहिए ।" तब जनक ने कहा- "हे याज्ञवल्क्य! वह अनन्तता क्या है? ” याज्ञवल्क्य बोले- "हे सम्राट्! दिशाएँ ही अनन्तता है । इसीलिए हे सम्राट्! मनुष्य यदि किसी भी दिशा में जाए, तो भी उसके अन्त तक नहीं पहुँच सकता । क्योंकि दिशाओं का कोई अन्त ही नहीं है । हे सम्राट्! दिशाएँ ही कान हैं । जो मनुष्य 'कान ही ब्रह्म है' – ऐसा समझकर उसकी उपासना करता है, उसे कान कभी नहीं छोड़ते । सभी प्राणी उसे उपहार देते हैं । वह देव बनकर देवों के पास जाता है । ” तब विदेह के राजा जनक ने कहा- "हाथी के आकार वाले बैल उत्पन्न करनेवाली हजार गायें मैं देता हूँ । ' तब याज्ञवल्क्य ने कहा—-—" मेरे पिता ऐसा मानते थे कि शिष्य को पूर्ण शिक्षा दिये बिना उससे कुछ भी लेना नहीं चाहिए । ” यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो ब्रह्मेत्यमनसो हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्र- वीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवायतन- माकाशः प्रतिष्ठाऽऽनन्द इत्येनदुपासीत का आनन्दता याज्ञवल्क्य मन एव सम्राडिति होवाच मनसा वै सम्राट्स्त्रियमभिहार्यते तस्यां प्रतिरूपः पुत्रो जायते स आनन्दो मनो वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैनं मनो जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवंविद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञव- ल्क्यः पिता मेऽमन्यत नानुशिष्य हरेतेति ॥6 ॥
याज्ञवल्क्य बोले— “जिस किसी ने तुम्हें सत्य के बारे में कुछ कहा हो, उसे हम सुनना चाहते हैं " । तब जनक बोले- "सत्यकाम जाबाल ने कहा है कि ' मन ब्रह्म है । " तब याज्ञवल्क्य बोले- “जैसे मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला मनुष्य कहता है, वैसे ही वह जाबाल बोला है कि ‘मन ही ब्रह्म है । ' मनरहित मनुष्य की कैसी दशा होती है? परन्तु, उसने यह बताया कि उसका निवासस्थान कहाँ है और उसका आधार क्या है? जनक बोले- "वह तो नहीं बताया!” तब याज्ञवल्क्य बोले-“तब तो हे सम्राट्! वह ब्रह्म का एक ही अंश हुआ । " तब जनक बोले –“ आप ही मुझे इस बारे में कहिए हे याज्ञवल्क्य । " तब याज्ञवल्क्य बोले–“ मन ही उसका निवासस्थान है और आकाश उसका आधार है । इसकी ' आनन्द' रूप में उपासना करनी चाहिए । " तब जनक ने पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! आनन्दता क्या है? ” याज्ञवल्क्य ने कहा- "हे सम्राट्! वह मन ही है । मन से ही मनुष्य स्त्री के पास जाता है और उसकी प्रार्थना करता है । उसके द्वारा अपने जैसा ही पुत्र उत्पन्न होता है । हे सम्राट्! वह आनन्दस्वरूप है । मन को ही परब्रह्म मानकर जो मनुष्य उसकी उपासना करता है उसे मन कभी छोड़ता नहीं । सभी प्राणी उसे उपहार देते हैं । वह देव बनकर देवों के पास जाता है । ” तब विदेहराज जनक ने कहा— “हाथी के आकार वाले बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गायें मैं आपको देता हूँ । ” तब याज्ञवल्क्य बोले– “मेरे पिता ऐसा मानते थे कि शिष्य को पूर्ण शिक्षा दिए बिना उससे कुछ नहीं लेना चाहिए । ” यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे विदग्धः शाकल्यो हृदयं वै ब्रह्मैति यथा मातृमान्पितृमानाचार्यवान्ब्रूयात्तथा तच्छाकल्योऽब्रवीद्धृदयं
पृष्ठ 378
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
336 उपनिषत्सञ्चयनम् वै ब्रह्मेत्यहृदयस्य हि कि स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद्वा एतत्सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य हृदय- मेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा स्थितिरित्येनदुपासीत स्थितता याज्ञवल्क्य हृदयमेव सम्राडिति होवाच हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानामायतन’ हृदयं वै सम्राट् सर्वेषां भूतानां प्रतिष्ठा हृदये ह्येव सम्राट् सर्वाणि भूतानि प्रतिष्ठितानि भवन्ति हृदयं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन’ हृदयं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते हस्त्यृषभः सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नानुशिष्य हरेतेति ॥7 ॥
इति प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ याज्ञवल्क्य ने कहा— जिस किसी ने तुम्हें सत्य के विषय में जो कुछ कहा हो उसे हम सुनना चाहते हैं । जनक बोले— “शकलपुत्र विदग्ध ने मुझसे कहा था कि हृदय ही ब्रह्म है । ” याज्ञवल्क्य ने कहा— “जैसे कोई मातृमान, पितृमान, आचार्यवान कहता हो, उसी तरह उस शाकल्य ने तुमसे कह दिया है कि 'हृदय ही ब्रह्म है' । हृदयविहीन की कैसी दशा होती है? परन्तु, उसने क्या तुम्हें उसके निवासस्थान और आधार के बारे में कुछ कहा है? ” जनक बोला– “ नहीं जी । ” तब याज्ञवल्क्य बोले— “ हे सम्राट्! वह तो ब्रह्म का एक ही अंश हुआ । " तब जनक बोले – “ तो आप उसे मेरे लिए कह दीजिए । " तब याज्ञवल्क्य ने कहा–“हृदय ही उसका निवासस्थान है, और आकाश उसका आधार है । उस ब्रह्म की स्थिरता के रूप में उपासना करनी चाहिए । " तब जनक ने पूछा–“वह स्थिरता का क्या अर्थ है? " याज्ञवल्क्य बोले- "हे सम्राट्! हृदय ही स्थिरता है । हृदय ही प्राणीमात्र का निवासस्थान है । हे सम्राट्! जो मनुष्य हृदय को परब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता है, उसे हृदय कभी छोड़ता नहीं | सभी प्राणी उसे उपहार देते हैं, वह देव होकर देवों से मिल जाता है । " तब विदेहराज जनक ने कहा— “ हाथी के आकार वाले बैल उत्पन्न करनेवाली हजार गायें मैं तुम्हें देता हूँ । ” तब याज्ञवल्क्य बोले— “ मेरे पिता का यह मत था कि शिष्य को पूरी शिक्षा दिए बिना उससे कुछ भी नहीं लेना चाहिए" । ( यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ । ) द्वितीयं ब्राह्मणम् जनको ह वैदेहः कूर्चादुपावसर्पन्नुवाच नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्यानु मा शाधीति स होवाच यथा वै सम्राण्महान्तमध्वानमेष्यन् रथं वा नावं वा समाददीतैवमेवैताभिरुपनिषद्भिः समाहितात्मास्येवं वृन्दारक आढ्यः सन्नधीतवेद उक्तोपनिषत्क इतो विमुच्यमानः क्व गमिष्यसीति नाहं तद् भगवन्वेद यत्र गमिष्यामीत्यथ वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यत्र गमिष्यसीति ब्रवीतु भगवानिति ॥1 ॥
राजा जनक विशिष्ट आसन पर से उठकर उन ( याज्ञवल्क्य) के पास जाकर “! ज्ञानोपदेश दीजिए ।” याज्ञवल्क्य ने कहा-' बोले— हे याज्ञवल्क्य आपको नमस्कार प्रणाम-करके" हो । मुझे हे सम्राट्! लम्बी यात्रा पर जाने का इच्छुक आदमी जैसे रथ या नाव को धारण करता है, वैसे ही तुम
पृष्ठ 379
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 337 इन उपनिषदों से प्रामाणित प्राण आदि ब्रह्म की उपासना करके गूढ ज्ञान से समाहित चित्तवाले हुए हो (अर्थात् आत्मा में एकाग्र चित्तवाले हुए हो) । इसीलिए तुम सम्माननीय हो, धनिक हो, वेदाभ्यासी हो।, गुरुओं के द्वारा तुम्हें उपनिषदों का ज्ञान दिया गया है । परन्तु तुम क्या यह जानते हो कि तुम इस देह मैं से छूटकर कहाँ जाओगे? ” जनक ने कहा- " नहीं भगवन्! मुझे पता नहीं कि मैं कहाँ जाऊँगा । ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “ मैं तुम्हें बतलाऊँगा कि तुम कहाँ जाओगे । " तब जनक ने कहा— “कहिए भगवन्! ” इन्धो ह वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्धः सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेणैव परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः ॥2 ॥
याज्ञवल्क्य ने कहा-–दाहिनी आँख में जो (चेतन) पुरुष रहता है, वह 'इन्ध' नाम का है | वह है तो ‘ इन्ध’ ही, परन्तु लोग उसे ' इन्द्र' ऐसे परोक्ष ( गूढ ) अर्थवाले नाम से कहते हैं । मानो देवों को गूढ अर्थ वाले नाम ही पसन्द आते हों और स्पष्ट अर्थवाले नामों से वे द्वेष करते हों ऐसा लगता है । अथैतद्वामेऽक्षणि पुरुषरूपमेषास्य पत्नी विराट् तयोरेष सक्ष्स्तावो य एषोऽन्तर्हृदय आकाशोऽथैनयोरतदन्नं य एषोऽन्तर्हृदये लोहितपिण्डो- ऽथैनयोरेतत्प्रावरणं यदेतदन्तर्हृदये जालकमिवाथैनयोरेषा सृतिः संचरणी यैषा हृदयादूर्ध्वा नाड्युच्चरति यथा केशः सहस्त्रधा भिन्न एवमस्यैता हिता नाम नाड्योऽन्तर्हृदये प्रतिष्ठिता भवन्त्येताभिर्वा एतदा- स्त्रवदास्रवति तस्मादेष प्रविविक्ताहारतर इवैव भवत्यस्माच्छारीरादा- त्मनः ॥3 ॥
बायीं आँख में जो मनुष्यरूप है, वह उसकी पत्नी विराज है । हृदय में जो आकाश ( खाली स्थान) है वह इन दोनों का मिलनस्थान है । और हृदय में जो यह लहू का पिण्ड है, वह उन दोनों का अन्न (खाद्य) है । और हृदय में जो यह जाल जैसा है, वह उन दोनों की ओढ़ने की चादर है । और हृदय से जो नाड़ी ऊपर जाती है वह उन दोनों का घूमने का रास्ता है । और' बाल के सहस्र भाग जैसी सूक्ष्म हिता नाम की जो नाड़ियाँ हृदय के भीतर हैं, इन्हीं के द्वारा ग्रहण किये गये अन्न का प्रवाह सम्पूर्ण शरीर में होता है, इसलिए बाहर के इस शरीररूपी आत्मा से उस भीतर के आत्मा को अधिक स्वच्छ आहार मिलता है । तस्य प्राची दिक् प्राञ्चः प्राणा दक्षिणा दिग्दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिगवाञ्चः प्राणाः सर्वा दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे नमस्तेऽस्त्वमे विदेहा अयमहमस्मि ॥4 ॥
इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ है, पश्चिम दिशा पूर्व दिशा इस आत्मा का पूर्वीय प्राण है, दक्षिण दिशा उसका दक्षिण उसकाका प्राणऊपर का प्राण है, उसका पश्चिमी प्राण है, उत्तर दिशा उसका उत्तरी प्राण है, ऊपर कीअलगदिशा- अलग प्राण हैं । वह आत्मा निचली दिशा उसका निचला प्राण है, सभी दिशाएँ उस आत्मा के 22 उ० प्र०
पृष्ठ 380
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
338 उपनिषत्सञ्चयनम् ‘ नेति नेति’ कहकर ही बताया जा सकता है । वह पकड़ने योग्य नहीं है, इसलिए पकड़ा नहीं जा सकता, वह क्षययोग्य नहीं है इसलिए वह क्षीण नहीं होता, वह असंग है इसलिए कहीं आसक्त नहीं होता, वह विनाश्य नहीं है, उसको कुछ दुःख नहीं होता । वह कभी भी नष्ट नहीं होता । तुभ निर्भय हो गए हो जनक! ” —ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा । तब विदेह के राजा जनक ने कहा– “ याज्ञवल्क्य! आप भी निर्भय हों । क्योंकि आप ही तो हमें उस अभयरूप ब्रह्म का ज्ञान देते हैं । इसलिए मैं आपको वन्दन करता हूँ । यह रहा विदेह देश और यह रहा मैं । " ( सब आपका ही है । ) ( यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * तृतीयं ब्राह्मणम् जनक' ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जन- कश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तहास्मै ददौ तः ह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥1 ॥
विदेहराज जनक के यहाँ याज्ञवल्क्य गए । उन्होंने ' मैं नहीं बोलूँगा' - ऐसा सोच तो रखा था । परन्तु एकबार जनक और याज्ञवल्क्य अग्निहोत्र के सम्बन्ध में बातें कर रहे थे, तब याज्ञवल्क्य ने जनक को वरदान दिया था तब जनक ने मनचाहा वर (कि मैं आपसे कभी कुछ भी प्रश्न पूछ सकता हूँ) माँग लिया था और याज्ञवल्क्य ने यह वरदान उसे दिया था । इसलिए राजा ने ही पहला प्रश्न पूछा । याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचा- दित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येमेवैतद्याज्ञ- वल्क्य ॥2 ॥
“ हे याज्ञवल्क्य! यह मनुष्य किस तेज से युक्त है? " याज्ञवल्क्य बोले— “ आदित्य ( सूर्य ) के तेज से ही । क्योंकि सूर्य के तेज से ही मनुष्य बैठता है, चलता-फिरता है, काम करता है और वापस लौटता है । " तब जनक ने कहा- "ठीक है याज्ञवल्क्य! वह ऐसा ही है । " अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥३ ॥
“हे याज्ञवल्क्य! सूर्य के अस्त होने पर यह मनुष्य किस तेज से युक्त होता है? " याज्ञवल्क्य ने कहा- '“चन्द्र के तेज से ही । क्योंकि चन्द्रमा ही इसकी ज्योति है । चन्द्र के तेज से ही मनुष्य बैठता है, चलता -फिरता है, काम करता है, वापस लौटता है । " तब जनक ने कहा-'-"ऐसा ही है याज्ञवल्क्य! " अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते पुरुषकर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥4 ॥
जनक ने फिर पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! सूर्य अस्त हो जाए यह पुरुष (मनुष्य) किस तेज से युक्त होता है? ” याज्ञवल्क्य बोले–और“ चन्द्रअग्निरूपभी अस्त हो जाए तब होता तेज सेयुक्त