Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 381–390

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 339चतुर्थोऽध्यायः ] है । अग्नि के तेज से ही मनुष्य बैठता है, चलता -फिरता है, काम करता है और वापिस आता है । ” तब जनक ने कहा– “ऐसा ही है याज्ञवल्क्य! ' अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किंज्योति- रेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चारयत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञव- COPT 115 11 जनक ने आगे पूछा— “हे याज्ञवल्क्य! सूर्य अस्त हो जाए, चन्द्र अस्त हो जाए, अग्नि शान्त हो जाए, तब यह मनुष्य किस तेज से युक्त होता है? " याज्ञवल्क्य ने कहा— “ तब वाणी ही इसका तेज होती है; वाणीरूप तेज से ही पुरुष बैठता है, चलता- फिरता है, काम करता है, और वापिस लौट सकता है । हे सम्राट्! अपना हाथ भी जब स्पष्ट रूप से देखा नहीं जा सकता, तब ( घोर अंधकार में भी) जब कहीं कुछ आवाज हो, तो मनुष्य वहाँ सीधा चला जाता है ।" तब जनक ने कहा— “याज्ञवल्क्य! ठीक है, वह ऐसा ही है" । अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥6 ॥

जनक ने और पूछा— “ हे याज्ञवल्क्य! सूर्य जब अस्त हो जाता है, चन्द्र भी अस्त हो जाता है, अग्नि शान्त हो जाती है, वाणी भी शान्त हो जाती है, तब यह मनुष्य किस ज्योति से युक्त है? ” तब याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया– “आत्मा के तेज से युक्त होता है; वही उसका प्रकाश है 1 आत्मा के तेज से ही वह बैठता है, घूमता-फिरता है, काम करता है, वापिस आता है कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुमौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्न भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥7 ॥

जनक ने पूछा— “ वह आत्मा कौन-सा है? याज्ञवल्क्य नेरहताकहाहै–, सर्वदा“जो (एकचेतन- सा) रहतापुरुष, - विज्ञानरूप शरीर में इन्द्रियों के बीच रहता है और हृदय में तेजरूप से घूमता फिरता है, वह इस लोक और परलोक में घूमता- फिरता रहता है । वह मानो ध्यान करताहै अर्थात्हो मृत्यु के सभी हो ऐसा भास होता है; स्वप्नावस्था में वह इस लोक को पार कर चला जाता रूपों का अतिक्रमण कर लेता है । सक्ष्सृज्यते स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः ॥ स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥8 पाप से जुड़ जाता है । और वह आत्मा जब जन्म लेता है अर्थात् शरीर धारण करता कोहै, तबछोड़वहजाता है । जब देह छोड़ देता है ( मर जाता है ) तब (देहेन्द्रियादि) पापों च परलोकस्थानं च तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवतस्थानेइदं तिष्ठन्नेते उभे स्थाने सन्ध्यंपश्यतीदंतृतीयःच परलोकस्थानंस्वप्नस्थानंचतस्मिन्सन्ध्ये। अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति

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340 उपनिषत्सञ्चयनम् तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दाश्च पश्यति य यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ॥9 ॥

इस पुरुष के ( आत्मा के ) दो ही स्थान हैं । एक यह लोक और दूसरा परलोक । तीसरा स्वप्नस्थान उन दोनों की सन्धि का स्थान है । उस बीच के स्थान में खड़ा रहकर यह आत्मा इन दोनों स्थानों ( इस लोक और परलोक को ) देख सकता है । और यह आत्मा, परलोक में जाने के लिए जिन साधनों से सम्पन्न होता है, उन साधनों का आश्रय लेकर पाप और आनन्द— दोनों को देख सकता है वह जब स्वप्नावस्था में होता है, तब इस सर्वांशों से पूर्ण जगत् का कुछ अंश ले जाता है, और तोड़ता- फोड़ता है और कुछ नया बना भी देता है और अपने तेज से, अपने प्रकाश से स्वप्नसृष्टि रच देता है । इस स्थिति में आत्मा अपने ही तेज से प्रकाशित होता है । न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्नथयोगान्पथः सृजते न तत्रानन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥10 ॥

वहाँ ( स्वप्नावस्था में) न तो रथ होते हैं, न घोड़े ही होते हैं, मार्ग भी तो नहीं होते | यह आत्मा स्वयं रथ, घोड़े और रास्ते उत्पन्न कर देता है । वहाँ स्वप्नावस्था में न तो आनंद होते हैं, न मोद और प्रमोद ही होता है । पर आत्मा स्वयं आनन्द और मोद को उत्पन्न कर देता है । उस स्वप्नावस्था में तालाब, सरोवर या नदी जैसा कुछ भी नहीं होता, परन्तु आत्मा ही तालाबों, सरोवरों और नदियों को पैदा कर देता है । तदेते श्लोका भवन्ति ।

स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्याऽसुप्तः सुप्तानभिचाकशीति ।

शुक्रमादाय पुनरेति स्थान हिरण्मयः पुरुष एकह सः ॥11 ॥

इस विषय में ये श्लोक हैं - स्वप्न द्वारा शरीर को निश्चेष्ट करके स्वयं असुप्त रहकर यह आत्मा सोए हुए सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है । फिर शुद्ध इन्द्रियमात्रारूप को लेकर अपने स्थान में आ जाता है । यह आत्मा तेजस्वी है, अकेला है और अमर है ।

प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।

स ईयतेऽमृतो यत्र काम हिरण्मयः पुरुष एकहसः ॥12 ॥

यह अमर, तेजस्वी आत्मा अकेला ही घूमता है । यह प्राण से निम्न कोटि के घोंसले की रक्षा करता है | और स्वयं घोसले से बाहर चलकर घूमने जाया करता है । वह स्वयं अमरजैसेहै शरीरऔर अपनी इच्छानुसार घूमता-फिरता है । स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि। उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥13 ॥

स्वप्नावस्था में वह आत्मा उच्च- नीच स्थितियों है । कभी स्त्रियों के साथ आमोद करता है, कभी हँसताको प्राप्तहै तो करताकभी है, और अनेक रूप धारण करता भयजनक दृश्य देखता है ।

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 341 आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति तं नायतं बोधयेदित्याहुः । दुर्भिषज्यस्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयं- ज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥14 ॥

“ लोग इसकी क्रीडाओं को ही देखते हैं, उस खुद को नहीं । इसलिए कहते हैं कि सोए हुए को (एकदम) जगाना नहीं चाहिए । क्योंकि आत्मा यदि शरीर में वापस न लौटे, तो उसकी चिकित्सा बड़ी कठिन हो जाती है । कुछ लोग कहते हैं कि जाग्रत् अवस्था ही स्वप्नावस्था है । क्योंकि मनुष्य जब जागता होता है और जिन पदार्थों को देखता है, उन्हीं पदार्थों को वह स्वप्नावस्था में भी देखता है । परन्तु, ऐसा कहना ठीक नहीं । क्योंकि स्वप्नावस्था में तो आत्मा स्वयं ज्योतिरूप बनकर प्रकाशित होता है । भगवन्! मैं आपको हजार गायें देता हूँ । मोक्ष के विषय में मुझे और भी कहिये ” –ऐसा जनक ने कहा । स वा एष एतस्मिन्सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागत- स्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥15 ॥

याज्ञवल्क्य बोले — ‘“ यह आत्मा सुषुप्तावस्था में रमण करता है, चलता-फिरता है, अच्छे- बुरे दृश्य देखता है, और फिर जैसे आया था, वैसे ही स्वप्नावस्था में वापस लौट जाता है । उस सुषुप्ति अवस्था में उसने जो कुछ देखा होता है, उससे वह लिप्त नहीं होता, क्योंकि उसे आसक्ति जैसा कुछ नहीं होता " । तब जनक बोले- "हे याज्ञवल्क्य! "वह ऐसा ही है । मैं आपको और हजार गायें देता हूँ, इससे आगे मोक्ष के विषय में और भी कहिए । ” स वा एष एतस्मिन्स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वा- गतस्तेन भवत्सङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्यं सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥16 ॥

याज्ञवल्क्य बोले— “ यह आत्मा इस स्वप्नावस्था में रमण करता है, चलता- फिरता है, अच्छे- बुरे दृश्य देखता है, फिर जैसे जहाँ से आया था, वहाँ जाग्रत् दशा में वापस चला जाता है । स्वप्नावस्था में उसने जो कुछ देखा होता है, उससे वह लिप्त नहीं होता । क्योंकि उसे आसक्ति जैसा कुछ है ही नहीं । ” जनक बोले— “ठीक ही है भगवन्! मैं आपको और हजार गायें देता हूँ । मोक्ष के विषय में मुझे और भी कहिए ।" स वा एष एतस्मिन्बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्तायैव ॥17 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा— “यह आत्मा जाग्रत् दशा में रमण करता है, घूमता-फिरता जाताहै, अच्छेहै । - बुरे दृश्य देखता है और फिर से जहाँ से जैसे आया था, वहीं स्वप्नदशा में वापिस चला तद्यथा महामत्स्य उभे कूलेऽनुसंचरति पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसंचरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥18 ॥

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342 उपनिषत्सञ्चयनम् जिस प्रकार एक महामत्स्य (बड़ा मगर ) नदी के दोनों तीरों पर घूमा करता है, वह इस पार भी जाता है और उस पार भी जाता है, वैसे ही यह आत्मा स्वप्नावस्था और जाग्रत् अवस्था — इन दोनों अवस्थाओं में घूमता रहता है । तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः सत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति ॥ 19 ॥

जैसे बाज अथवा गरुड आकाश में उड़-उड़कर थक जाता है और फिर पंख फैलाकर अपने घोंसले की ओर जाता है, उसी तरह यह आत्मा भी उस स्थान पर दौड़ जाता है कि जहाँ सो जाने के बाद उसे कोई चिन्ता नहीं रहती या कोई इच्छा भी नहीं होती । ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्ताव- ताणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छायति गर्तमिव पतति यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेद सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥20 ॥

इस पुरुष की ये ‘ हिता’ नाम की नाड़ियाँ केश सदृश हजार भाग में बँटी हों, इतनी सूक्ष्म हैं, और सफेद, आसमानी, पीले, हरित और लाल रंग के रसों से भरी हुई है । आत्मा को जब ऐसा लगता है कि कोई उसे मार डालता है, कोई उसे जीत लेता है, हाथी उसके पीछे पड़ा है, किसी खड्डे में वह गिर पड़ा है, वह जाग्रत् में देखे हुए सभी भय स्वप्न में अविद्या के कारण देखता है । जब उसे लगता है कि मैं देव हूँ, मैं राजा हूँ तब वह उसका परमलोक हो जाता है । तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयः रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्म- काममकाम रूप शोकान्तरम् ॥21 ॥

वह उसका कामरहित, पापरहित और अभय रूप है । जैसे अपनी प्रिय भार्या का गाढ आलिंगन करनेवालेपुरुष को बाहर का या अन्दर का कुछ भी ज्ञान नहीं होता, वैसे ही यह आत्मा जब परमात्मा से आलिंगित होता है, तब उसे भी कुछ बाहर का या भीतर का ज्ञान नहीं होता । यह उसका आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकरहित रूप है । अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तोनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनान- न्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान्हृदयस्य भवति॥22 ॥

इस ( सुषुप्तावस्था में) पिता पिता नहीं रहता, माता माता नहीं रहती, लोक लोक नहीं रहते,,,, देव नहीं रहते वेद नहीं चोर चोर नहीं रहता गर्भहत्यारा देव, वेद रहते(,, नहीं, तपस्वी तपस्वी रहता स्थितिसे, श्रमण श्रमणचाण्डाल नहींरहतारहता पौल्कस शूद्रनहींपिता और क्षत्रियाणीउस मेंपैदाउसेहुआ गर्भहत्यारापुत्र ) पौल्कसनहींनहींरहतारहता चाण्डाल | नहीं लगता तब वह हृदय के सभी शोकों का अतिक्रमण कर जातापुण्यहैभी। नहीं लगता और पाप भी

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बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 343चतुर्थोऽध्यायः ] यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते- ऽविनाशित्वान्न तु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥23 ॥

'वह देखता नहीं' – ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह देखते हुए भी नहीं देखता । क्योंकि द्रष्टा की दृष्टि का कभी नाश नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है इससे अलग कोई चीज है ही नहीं, कि जिसे देखा जाए | यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन्वै तन्न जिघ्रति न हि घ्रातुर्घातेर्विपरिलोपो विद्यते- ऽविनाशित्वान्नतु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥24 ॥

'वह सूँघता नहीं' –ऐसा लगता है, परन्तु वास्तव में वह सूँघता हुआ भी नहीं सूँघता । सूँघनेवाले की सूँघने की शक्ति का कभी लोप नहीं होता। क्योंकि वह अविनाशी है । परन्तु उससे अन्य कोई है ही नहीं, कि जिसे सूँघा जाए । यद्वै तरसते रसयन्वै तन्न रसयते नहि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्र- सयेत् ॥25 ॥

‘वह रसास्वाद नहीं करता' – ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह स्वाद लेता हुआ भी स्वाद नहीं लेता । क्योंकि वह अविनाशी है । परन्तु, उससे अलग कोई दूसरा है ही नहीं, कि जिसका रसास्वाद किया जाए । यद्वै तन्न वदति वदन्वै तन्न वदति न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते- ऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥26 ॥

' वह बोलता नहीं' – ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह बोलते हुए भी नहींअलगबोलताअन्य। वक्ताकोईकीहै बोलने की शक्ति का नाश नहा होता क्योंकि वह तो अविनाशी है । परन्तु उससे ही नहीं कि जिससे वह बोले । यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन्वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणु- यात् ॥27 ॥

'वह सुनता नहीं' – ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह सुनते जबहुए उससेभी नहींअलगसुनतादूसरा। श्रोताहै कोईकी श्रवण- शक्ति का नाश नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । परन्तु है ही नहीं, कि जिसे वह सुने । विद्यते- यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो ॥28 ॥

ऽविनाशित्वान्न तु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत भी नहीं सोचता । सोचनेवाले ‘ वह सोचता नहीं’– ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह सोचतेहै । परन्तुहुए वहाँ जब उसके सिवा दूसरा की सोचने की शक्ति का नाश नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी कोई अलग है ही नहीं कि जिसे वह सोचे । यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन्वै तन्न स्पृशति न हिततोऽन्यद्विभक्तंस्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपोयत्स्पृ- विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्द्वितीयमस्ति शेत् ॥29 ॥

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344 उपनिषत्सञ्चयनम् ‘ वह स्पर्श नहीं करता ' –ऐसा लगता है । पर वास्तव में वह स्पर्श करते हुए भी स्पर्श नहीं करता क्योंकि स्पर्श करनेवाले की स्पर्श शक्ति का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है परन्तु, उससे अलग दूसरा कोई है ही नहीं कि जिसका वह स्पर्श करे । यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञात- र्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्द्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥30 ॥

'वह जानता नहीं '– ऐसा लगता है, पर वास्तव में वह जानते हुए भी नहीं जानता । विज्ञाता की विज्ञापित (ज्ञान ) का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । परन्तु उससे अलग दूसरा कोई है ही नहीं कि जिसे वह जाने । यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद् रसये- दन्योन्यद्वदेदन्योऽन्यच्छृणुयादन्योऽन्यमन्वीतान्योऽन्यत्स्पृशेदन्योऽन्यद् विजानीयात् ॥31 ॥

जहाँ ( जाग्रत् और स्वप्न में ) कोई दूसरा हो तभी तो एक- दूसरे को देखता है, एक- दूसरे को सूँघता है, एक- दूसरे का स्वाद लेता है, एक-दूसरे से बोलता है, एक- दूसरे को सुनता है, एक - दूसरे का विचार करता है, एक- दूसरे का स्पर्श करता है, एक- दूसरे को जानता है । सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजी- af 113 211 " यह आत्मा जल जैसा शुद्ध, एक, साक्षीरूप, अद्वितीय है । यही ( ऐसा ही ) ब्रह्मलोक है । हे सम्राट्! ” – ऐसा याज्ञवल्क्य ने उपदेश दिया । यही मनुष्य की सर्वोच्च गति है, यही सबसे बड़ी सम्पदा है, यही उच्चतम लोक है, यही उसका परम आनन्द है । अन्य प्राणी इसी परमानन्द की एक मात्रा से ही जीवन जी रहे हैं । स यो मनुष्याणाः राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकै- र्भोगैः संपन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोका- नामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसंपद्यन्तेऽथ ऽवृजिनोऽकामहतोऽथये शतं कर्मदेवानामानन्दाःये शतमाजानदेवानामानन्दाःस एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियो- लोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ स एकः प्रजापति- आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च ये शतं प्रजापतिलोक हतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकःश्रोत्रियोऽवृजिनोऽकाम- याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददाम्यत सम्राडिति होवाच हत्सीदितियाज्ञवल्क्यो॥33 ॥ बिभयांचकार मेधावी राजाऊर्ध्वंसर्वेभ्योविमोक्षायैवमान्तेभ्यब्रूहीत्यत्रउदरौ-

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 345 मनुष्यों में जो किसी प्रकार से पंगु न हो, धनिक हो, दूसरों पर स्वामित्व रखता हो, विश्व का अधिकतम वैभवशाली हो, वह मनुष्य का श्रेष्ठ आनन्द है । ऐसे मनुष्य के आनन्द से सौ गुना एक आनन्द श्राद्ध आदि से पितृलोक को जीतने वाले पितृओं का होता है । और पितृलोक को जीतनेवाले पितृओं के ऐसे सौ गुने आनन्द का एक आनन्द गन्धर्वलोक का होता है । गन्धर्वलोक के उस एक आनन्द से सौ गुना एक आनन्द कर्मलोक का लेता है । वे कर्मों से देवत्व प्राप्त किए हुए हैं । उन कर्म देवताओं के एक आनन्द से सौ गुना एक आनन्द जन्मजात देवलोगों का होता है । और जो मनुष्य वेदाभ्यासी, निष्पाप और वासनारहित हो उसका भी यही लोक होता है । ऐसे देवों के आनन्द से सौ गुना आनन्द प्रजापति लोक का तथा वेदाभ्यासी, निष्पाप और वासनारहित का भी होता है । ऐसे प्रजापति लोक के आनन्द से सौ गुना आनन्द ब्रह्मलोक का तथा वेदाभ्यासी, निष्पाप, वासनारहित मनुष्यों का भी होता है । ऐसे प्रजापतिलोक के एक आनन्द से सौ गुना आनन्द ब्रह्मलोक का होता है । तथा जो मनुष्य वेदाभ्यासी, निष्पाप तथा वासनारहित हो, उसका भी यही लोक होता है । ब्रह्मलोक का यह आनन्द सबसे बड़ा है । " तब जनक ने कहा- " मैं आपको हजार गायें देता हूँ । हे भगवन्! मोक्ष के विषय में आगे कुछ उपदेश दीजिए । " तब याज्ञवल्क्य को भय लगा कि यह राजा बड़ा मेधावी (बुद्धिशाली) है, जिसने मेरे सारे ज्ञान को अपने सभी प्रश्नों के उत्तर के माध्यम से प्राप्त कर लेने तक के लिए मुझे रोक लिया है । स वा एष एतस्मिन्स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ॥34 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा— “वह यह पुरुष ( आत्मा ) इस स्वप्नावस्था में रमण (विहार ) करके और अच्छा- बुरा देखकर फिर से जिस तरह आया था, उसी तरह से यथास्थान अर्थात् जाग्रत्दशा में वापिस लौटता है । तद्यथाऽनः सुसमाहितमुत्सर्जद्यायादेवमेवाय शारीर आत्मा प्राज्ञेना- त्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥35 ॥

जैसे लोकव्यवहार में बोझ से लदी हुई गाड़ी जोर से आवाज करती हुई ही चलती है, वैसे ही यह शरीर में अवस्थित आत्मा (लिङ्गदेह रूप आत्मा ), उस स्वयंप्रकाश रूप आत्मा से (चिदाभास से ) व्याप्त हुआ ऊर्ध्व साँस लेते हुए ( आवाज करते हुए) चलता है । स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपतावाणिमानं निगच्छति तद्यथाम्रं वौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात्प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः संप्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥36 ॥

यह देह जिस समय वृद्धावस्था आदि से कृश हो जाता है, तब वह आम, उदुम्बर या पिप्पल के फल की तरह झड़ जाता है, उसी तरह आत्मा शरीर के इन अंगों से बिछुड़ जाता है और फिर से जहाँ से जैसे आया था, उसी तरह यथाक्रम अन्य देह में चला जाता है । तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येव हैवंविदः सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्प्यन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥37 ॥

जब राजा आता हो तब जैसे उग्रकमों और पापकर्मी लोग, सूतजाति के–लोग“ यह, गाँवआता केहै, नेतायह लोग, अन्न, पानी, निवासादि को तैयार रखकर राह देखते हैं, और कहते हैं कि

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346 उपनिषत्सञ्चयनम् आता है, उसी तरह इस ज्ञानी मनुष्य के लिए भी सभी प्राणी कहते हैं कि– “ यह वह आता है, यह वह आता है ” । तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येव- मेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥38 ॥

इति तृतीयं ब्राह्मणम् ॥ जिस प्रकार राजा के कहीं जाते समय सब उग्रकर्मी, पापकर्मी और ग्रामीण नेता लोग और सूत जाति के लोग एकत्रित हो जाते हैं, उसी प्रकार अन्तकाल में जब मनुष्य ऊपर की श्वास लेता है, तब सभी इन्द्रियाँ इस आत्मा के पास इकट्ठा होकर आती हैं । ( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) चतुर्थं ब्राह्मणम् स यत्रायमात्माऽबल्यं न्येत्य संमोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमा- यन्ति स एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ् पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥1 ॥

वह यह आत्मा जब दुर्बलता को प्राप्त कर मानो संमूढ हुआ हो, ऐसा होता है, तब शरीरगत ये वाणी आदि सभी प्राण (इन्द्रियाँ) उसके साथ मिलकर वह उन प्राणों से ( इन्द्रियों में से ) तेज का अंश खींच लेता है और हृदय की ओर गमन करता है । जब आँख का तेज चला जाता है, तब मनुष्य रूप नहीं देख पाता । एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानाती- त्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्वो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽनू- त्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥2 ॥

चक्षु का चेतन आत्मा से एकीकृत जाने पर लोग कहते हैं कि यह देखता नहीं है । नासिका का चेतन आत्मा के साथ एकरूप होने पर लोग कहते हैं, यह सूँघता नहीं है । जिह्वा का चेतन आत्मा से एकरूप होने पर यह स्वाद नहीं लेता, ऐसा कहते हैं । मुख का चेतन आत्मा से एकरूप होने पर कहते हैं कि यह बोलता नहीं है | कान का चेतन आत्मा से एकरूप होने पर कहते हैं कि यह सुनता नहीं है । मन का चेतन आत्मा से एकरूप हो जाने पर कहते हैं कि यह सोचता नहीं है । त्वगिन्द्रिय का चेतन आत्मा से एकरूप होने पर कहते हैं कि यह स्पर्श नहीं करता है । बुद्धि का चेतन होने पर कहते हैं कि वह जानता नहीं है । उस मनुष्य के हृदय का अग्रभाग प्रकाश आत्मा से एकरूप उस प्रकाश के द्वारा ही वह आत्मा नेत्र, मस्तक या शरीर के किसी भाग से बाहर निकलतासे जगमगाताहै है । ( ) साथ प्राण भी बाहर निकलता है । उसके बाहर निकलते ही उसके साथ प्राण इन्द्रियाँ भी बाहर। निकलउसके

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 347 आती हैं । और इस समय यह आत्मा विशेष ज्ञान से युक्त हो जाता है और विज्ञानयुक्त प्रदेश में ही जाता है । उस समय उसके साथ विद्या और कर्म तथा पूर्व प्रज्ञा ( पूर्वानुभूत विषयों की वासनाएँ ) भी जाती हैं । तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपस हरत्येवमेवायमात्मेदः शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममा- क्रम्यात्मानमुपसंहरति ॥3 ॥

जैसे घास के तिनके पर ( चलने वाला ) जोंक नामक कीड़ा उस तिनके की नोक पर जाने के बाद दूसरे तृणों का अवलम्बन लेने के लिए अपना अंग सिकोड़ता है, वैसे ही यह आत्मा भी इस शरीर का आश्रय छोड़कर इस शरीर को अविद्या को प्राप्त करवा कर अर्थात् अचेतन बनाकर दूसरे नवीन शरीर का आश्रय लेकर उसी में अपना उपसंहार कर देता है अर्थात् अपना आत्मभाव करने लगता है । तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतर रूपं तनुते एवमेवायमात्मेदः शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतर रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥4 ॥

जैसे कोई सुनार सोने के टुकड़े को लेकर अन्य नवतर और अधिक सुन्दर आकार की रचना करता है, वैसे ही यह आत्मा इस शरीर को छोड़कर, उसे अविद्या को प्राप्त करवा कर ( अचेतन बनाकर ) अन्य नवीन और अधिक सुन्दर शरीर को बनाता है । वह शरीर या तो पितृओं का - सा, या गन्धर्वों का- सा, वा देवों का सा, या प्रजापति का सा, ब्रह्मा का-सा अथवा सभी प्राणियों जैसा होता है । स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वम- यस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥5 ॥

श्रोत्रमय वह यह आत्मां ब्रह्म है । वह विज्ञानमय है, मनोमय है, प्राणमय है, चक्षुर्मय( अन्धकारमयहै, ) भी है है, । पृथ्वीमय है, जलमय है, वायुमय है, आकाशमय है, तेजोमय है, अतेजोमयऔर सर्वमय है । यह जो कुछ अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय और अधर्ममय, वैसा होता है । शुभ वह काममय,, परोक्ष है प्रत्यक्ष है वह सब कुछ है । वह जैसा कर्म और आचरण करता है से पुण्यशाली और करनेवाला शुभ होता है और पाप कर्म करनेवाला पापी होता है । पुरुषहै पुण्यकर्म। वह जैसी कामनावाला होता पापकर्म से पापी होता है । कुछ लोग कहते हैं कि यह पुरुष काममयहै, हीवैसे ही वह कर्म करता है । और है, वैसे ही संकल्पवाला होता है । और जैसे संकल्पवाला होता जैसे कर्म वह करता है, वैसा ही फल उसको प्राप्त होता है ।

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348 उपनिषत्सञ्चयनम् तदेष श्लोको भवति—

तदेव सक्तः सहकर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य ।

प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम् ॥

तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकामय- मानो यो कामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ॥6 ॥

इस विषय में यह मन्त्र है- इसका लिंग ( मन ) जिसमें अति आसक्त होता है, उसी फल की अभिलाषावाला होकर ही वह काम करता है । इस लोक में जो कुछ भी करता है, उस कर्म का फल परलोक में प्राप्त करके ( भोगकर ) फिर से कर्म करने के लिए इस लोक में आ जाता है । कर्मफलभोग की कामना करने वालों में निश्चितरूप से आवागमन का चक्र चलता रहता है । परन्तु, जिस पुरुष में कामना ही नहीं होती, जिसने अपनी सारी कामनाएँ छोड़ दी हैं, जिसकी कामनाएँ पूर्णत: पूरी हो चुकी हैं, जिसको आत्मप्राप्ति के अतिरिक्त कोई अन्य कामना नहीं है, उसके प्राण शरीर को छोड़कर और कहीं नहीं जाते । वह ब्रह्मस्वरूप होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है ।

तदेष श्लोको भवति- यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।

अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ॥

तद्यथाऽहिनिर्व्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदः शरीर शेतेऽथायमशरीरोऽमृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्त्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥7 ॥

उसी अर्थ में यह श्लोक है– “जब मनुष्य के हृदय में स्थित सारी कामनाएँ छूट जाती हैं, तब मरणशील मानव अमर हो जाता है । और इस देह के होते हुए भी ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । " जैसे साँप द्वारा उतार दी गई निर्जीव त्वचा बिल में पड़ी रहती है, वैसे यह शरीर भी पड़ा रहता है । पर शरीर से मुक्त हुआ अमर आत्मा तो ब्रह्मरूप ही है, वह तेजस्वरूप है ।

तदेते श्लोका भवन्ति- अणुः पन्था विततः पुराणो माःस्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।

तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥8 ॥

इसके विषय में यह श्लोक है- "इस प्राचीन विशाल मार्ग को जानना कठिन है । पकड़ा है, मुझे वह प्राप्त हुआ है । ब्रह्म को जाननेवाले ऋषि भी उसी रास्ते से स्वर्ग तथा उसकेमैंने उसेभी पार ( ऊर्ध्व ) जाते हैं ।

तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलः हरितं लोहितं च ।

एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च ॥१

कुछ लोग कहते हैं कि उसमें श्वेत ब्रह्म है, कुछ कहते पीला है, कुछ कहते हैं वह नीलवर्ण है, कुछ कहते है वह हरितहैं वह आसमानी है, कुछ कहते हैं वह है । किसी ब्रह्मविद् ने वह रास्ता खोज निकाला है । उसी मार्ग वर्ण है, कुछ कहते हैं वह लाल वर्ण,जाते हैं । पर ब्रह्मज्ञ पुण्यशाली और तेजस्वी लोग

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाः रताः॥10 ॥