Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 391–400

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 391–400

पृष्ठ 391

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 349 जो लोग अविद्या की उपासना ( कर्मोपासना) करते हैं, वे घोरतमस् में (भयंकर हैं और जो विद्या की ही उपासना ( द्वैतमूलक उपासना पद्धति ) में ही होते हैं ( अथवा केवलअज्ञानविधिविधानोंमें ) जाते में ही रत होते हैं ) वे तो इससे भी ज्यादा अन्धकार में प्रवेश करते हैं ।

अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।

तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाःसोऽबुधो जनाः ॥11 ॥

जो ‘ अनन्द’ ( असुखकर ) नाम के लोक हैं जो कि अदर्शनरूप अन्धकार से घिरे हुए हैं, वहाँ जो ज्ञानरहित हैं, ऐसे आत्मबोधहीन लोग मरने के बाद पहुँचते हैं ।

आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।

किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥12 ॥

पुरुष आत्मा को ' यह मैं हूँ' - इस प्रकार विशिष्ट रूप से जान लेता है, तब वह भला क्या चाहता हुआ और कौन - सी कामना के लिए शरीर के लिए संतप्त होगा?

यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन्संदेह्ये गहने प्रविष्टः ।

स विश्वकृत् स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकाः स उ लोक एव ॥1 3 ॥

इस अनेक संदेहों ( स्वार्थों ) से भरे गहन ( विषम) शरीर में प्रविष्ट आत्मा को जिसने साक्षात्कृत कर लिया है, वह प्रतिबुद्ध (ज्ञानी ) हो गया है, वह ( अब स्वयं) विश्व का सर्जनहार है, वह सबका कर्ता । उसको जो लोक मिलता है, वह आत्मा का ही लोक होता है ।

इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।

ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥14 ॥

हम इस शरीर में रहते हुए, उसी काल में यदि आत्मा (ब्रह्म) को जान लें, तब हम कृतार्थ हो जाएँगे । अन्यथा ( ऐसा न होने पर) बड़ी हानि होगी । जो लोग उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं, और दूसरे लोग दुःख को ही प्राप्त करते हैं ।

यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा ।

ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥15 ॥

जब भूत और भविष्य के स्वामी इस प्रकाशमान ( कर्मफलदाता) आत्मा को मनुष्य साक्षात् देख लेता है ( अनुभूति प्राप्त कर लेता है) तब वह अपनी रक्षा करना नहीं चाहता अर्थात् न तो वह किसी से ऊबता है, और न किसी की निन्दा करता है ।

यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते ।

तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥16 ॥

यह संवत्सररूप कालात्मा अहोरात्रादि अवयवों के साथ जिसके पीछे- पीछे घूमता रहता है, ऐसे ज्योतियों के भी ज्योतिस्वरूप इस आत्मा ( ब्रह्मतत्त्व) को (सभी ) देव 'आयु' के नाम से उपासते हैं । वह ज्योति अमर है |

यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः ।

तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥17 ॥

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उपनिषत्सञ्चयनम् 350 जिस ब्रह्म में पाँच ‘ पञ्चजन’ ( गंधर्व, देव, पितर, असुर और राक्षस —ये पाँच ' पंचजन हैं, अथवा तो चार ब्राह्मणादि वर्ण और पाँचवाँ निषाद मिलकर पाँच = पाँचों का समूह ) और (छठा) ब्रह्म) आकाश प्रतिष्ठित है उसी को मैं आत्मा मानता हूँ । उस अमर आत्मा को जाननेवाला मैं (स्वयं हूँ, अमर हूँ ।

प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः ।

ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥18 ॥

वह आत्मा प्राण का भी प्राण और आँख की भी आँख है । वह कान का भी कान और मन का भी मन है । जिन्होंने ऐसा ब्रह्म जाना है, उन्होंने सबसे प्राचीन और सबसे आदि ( प्रथम ) ब्रह्म को अवश्य पहचान लिया है ।

मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन ।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥19 ॥

इस ब्रह्म को मन से ही जानना ( पहचानना ) चाहिए कि यहाँ कुछ अलग- अलग नही है, जो यहाँ भेदभाव ( अलगाव ) देखता है, वह एक मृत्यु के बाद दूसरा, इस प्रकार से मृत्यु को प्राप्त करता ही रहता है ।

एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम् ।

विरजः पर आकाशादज आत्मा महान्धुवः ॥20 ॥

वह एक प्रकार से ही ( आचार्योपदेश से ही ) जाना जा सकता है, वह अन्य प्रमाणों से गम्य नहीं है । वह शाश्वत है, वह शुद्ध है, आकाश से भी परे है, वह महान् है, वही आत्मा परब्रह्म है, वह अविनाशी है ।

तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः ।

नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनः हि तदिति ॥21 ॥

बुद्धिमान ब्राह्मण को उस आत्मा को जानकर ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । उसको बहुत शब्दों का अभ्यास नहीं करना चाहिए । क्योंकि वह तो वाणी को थका देनेवाला ही है ( वह वाणी का श्रम ही है) । स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधि- पतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसम्भेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे विद्वासः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैष- णायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव भवतः । स एष नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यते-नेति

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 351 ऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥22 ॥

यह वह महान् अजन्मा आत्मा जो कि प्राणों में विज्ञानमय है और जो हृदय के भीतर में आकाश है, उसमें रहता है ( सोता है ), जो सबको वश में रखनेवाला, सब पर शासन चलानेवाला और सबका अधिपति है । वह शुभ कर्म से बड़ा नहीं हो जाता और अशुभ कर्म से छोटा भी नहीं हो जाता है । वह सबका ईश्वर है, वह प्राणीमात्र का पालक है । वह इन लोगों की मर्यादा का भंग न हो जाए, इसलिए उन्हें धारण करनेवाला सेतु है । ब्राह्मण लोग उसे वेदों के अध्ययन के द्वारा, यज्ञ द्वारा, दान द्वारा, तप द्वारा, अनशन द्वारा जानना चाहते हैं । उसी को जानकर मनुष्य मुनि बनता है । उसी को प्राप्त करने की इच्छा रखकर संन्यासी लोग संसार को छोड़कर संन्यास ले लेते हैं । उसका ज्ञान होने से ही पूर्व के ऋषि लोग सन्तानप्राप्ति की इच्छा नहीं रखते थे । ( वे सोचते थे कि- ) "हमें जो आत्मा मिला है, वही हमारा लोक है ( लक्ष्यस्थान है ) । तो हम अब संतानप्राप्ति से क्या करेंगे? ” वे पुत्रप्राप्ति की इच्छा, धनप्राप्ति की इच्छा और स्वर्गादि लोकप्राप्ति की इच्छा से मुक्त हो गए थे । और भिक्षा माँगकर निर्वाह करते थे । क्योंकि जो पुत्रप्राप्ति की इच्छा है, वही धनप्राप्ति की इच्छा है । और धनप्राप्ति की इच्छा है, वही लोक (स्वर्गादि ) प्राप्ति की इच्छा है, क्योंकि वे दोनों आखिर में हैं तो इच्छाएँ ही न! यह आत्मा ' नेति नेति' कहकर ही बताया जा सकता है । क्योंकि यह पकड़ने योग्य नहीं है इसलिए नहीं पकड़ा जाता । वह अक्षय है इसलिए क्षीण नहीं होता । वह चिपक नहीं जाता क्योंकि असंग है । वह बन्धन में पड़ा नहीं इसलिए उसे कोई दुःख नहीं है । वह अविनाशी है । इस आत्मा को पापपुण्य— हर्ष- शोकादि द्वन्द्व प्रभावित नहीं करते । इसलिए "मैंने पाप किया है या मैंने पुण्य किया है""–इन दोनों बातों को वह पार कर जाता है । उसको (इस प्रकार जाननेवाले आत्मज्ञानी को ) ‘यह किया अथवा यह नहीं किया' का दुःख नहीं होता । तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् । तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥23 ॥

यह बात मंत्र द्वारा कही गई है-- यह आत्मा, ब्रह्मवेत्ता की नित्य महिमा है । वह कर्म से न तो बढ़ता है, न घटता है । उसी को जाननेवाला होना चाहिए । उसको जान लेने के बाद मनुष्य पाप से लिप्त नहीं होता । अत: इस तरह का ज्ञानी शान्त, आन्तरिक तृष्णा से रहित, सभी इच्छाओं से मुक्त, सुख - दुःखादि को सहन करनेवाला एकाग्र होकर आत्मा ही आत्मा को देखता है । इस प्रकार देखनेवाले ब्रह्मवेत्ता को पाप का दोष नहीं लगता । वह सब पापों को तैर जाता है । पाप उसको सताता नहीं है, बल्कि सब पापों को वह सताता है । वह पापरहित, निष्काम और संशयरहित ब्रह्मज्ञ होता है । यह ब्रह्मलोक है । हे सम्राट्! उस ब्रह्मलोक को तुम पहुँच चुके हो । " इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने जनक से कहा । तब जनक बोला कि—- "यह मैं (जनक ) आप महानुभाव को विदेह प्रदेश का राज्य देता हूँ और ( साथ ही साथ) अपने आपको ( स्वयं को ) सेवक के नाते काम करने के लिए देता हूँ । ”

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352 उपनिषत्सञ्चयनम् स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥24 ॥

तब याज्ञवल्क्य बोले— “जन्मरहित यह महान् आत्मा ही अन्नभक्षक और धन-वसु -रूपी कर्मफलों का देनेवाला है । स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभय हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद ॥25 ॥

इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ यही वह महान् जन्मरहित आत्मा जरारहित, मरणरहित, अमृत और अभय ब्रह्म है । ब्रह्म अभय है । जो मनुष्य ब्रह्म को इस तरह जानता है, वह स्वयं अभय हो जाता है । ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * पञ्चमं ब्राह्मणम् अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुमैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्यो- ऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥1 ॥

याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं । एक का नाम मैत्रेयी और दूसरी का नाम कात्यायनी था । उनमें मैत्रेयी को ब्रह्म के विषय में रस था, जबकि कात्यायनी स्त्री- साधारण बुद्धिवाली थी । याज्ञवल्क्य को ( संसार छोड़कर ) अन्य चर्या ( आश्रम = संन्यासाश्रम ) में जाने की इच्छा हुई । मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन्वा अरेऽयमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥2 ॥

“हे मैत्रेयी! मैं अब यह गृहस्थाश्रम छोड़कर यहाँ से चला जानेवाला हूँ । तो इस कात्यायनी के साथ तुम्हारा ( सम्पत्ति का ) बँटवारा कर दूँ ।” – इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा । सा होवाच मैत्रेयी यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्स्यां न्वहं तेनामृताऽऽहो 3 नेति नेति होवाच याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितः स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेनति ॥3 ॥

तब मैत्रेयी बोलीं— ‘“हे भगवन्! यदि धन से भरपूर यह सारी धरती मेरी हो जाए, तो उससे मैं क्या अमृतरूप हो सकती हूँ? ” तब याज्ञवल्क्य ने कहा— “अरे! नहीं रे! नहीं! तब जैसे साधनसम्पन्न मनुष्यों का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन होगा । अमृतत्व की तोतो केवल " आशा भी नहीं हो सकती । धन से सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥4 ॥

तब मैत्रेयी ने कहा— “जिससे मैं अमृत न बन सकूँ, उसके लिए मैं क्या ( ), ” -? अमृत बनने की रीति जानते हैं वह मुझे बताइए । क्या करूँ आप जो

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 353 स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया वै खलु नो भवती सती प्रियमवृधत् हन्त तर्हि भवत्येतद्व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यास- स्वेति ॥5 ॥

तब याज्ञवल्क्य बोले—‘"मैत्रेयी! तुम मुझे प्यारी तो पहले से ही थी । और अब तो अधिक प्यारी हो गई हो । अच्छा, मैं तुम्हें समझा देता हूँ । जैसे -जैसे मैं कहता जाऊँ वैसे उस पर गहरा चिन्तन करो । स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कानाय जाया प्रिया भवति न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति न वा अरे पशूनां कामाय पशवः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पशवः प्रिया भवन्ति न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय लोका: प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्या- त्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदः सर्वं विदितम् ॥6 ॥

याज्ञवल्क्य ने कहा — पति के लिए पति प्रिय नहीं लगता, पर आत्मा के लिए पति प्रिय लगता है । पत्नी के लिए पत्नी प्रिय नहीं लगती, पर आत्मा के लिए पत्नी प्रिय लगती है । अरे! पुत्रों के लिए पुत्र प्यारे नहीं लगते आत्मा के लिए ही पुत्र प्यारे लगते हैं । धन के लिए धन प्यारा नहीं लगता, आत्मा के लिए धन प्यारा लगता है । पशुओं के लिए पशु प्यारे नहीं लगते, पर आत्मा के लिए पशु प्यारे लगते हैं । ब्राह्मण के लिए ब्राह्मण प्रिय नहीं लगता पर आत्मा के लिए ब्राह्मण प्रिय लगता है । क्षत्रिय के लिए क्षत्रिय प्रिय नहीं लगता, आत्मा के लिए क्षत्रिय प्रिय लगता है । लोगों के लिए लोग अच्छे नहीं लगते, आत्मा के लिए लोग अच्छे लगते हैं । देवों के लिए देव प्रिय नहीं लगते, आत्मा के लिए देव प्रिय लगते हैं । वेदों के लिए वेद अच्छे नहीं लगते, आत्मा के लिए ही वेद प्रिय लगते हैं । अरे! प्राणियों के लिए प्राणी प्रिय नहीं लगते, आत्मा के लिए ही प्राणी प्रिय लगते हैं ।! अरेउस! सबके लिए सब प्रिय नहीं लगता, आत्मा के लिए ही सब कुछ प्रिय लग रहा है । अरे मैत्रेयी आत्मा को देखना चाहिए, उसे सुनना चाहिए, उसका चिन्तन करना चाहिए, उसका ध्यान करना चाहिए । आत्मा को देखने के बाद, सुनने के बाद, सोचने के बाद, उसका ध्यान करने के बाद सब कुछ जाना जा सकता है । 23 उ० प्र०

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354 उपनिषत्सञ्चयनम् ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योऽन्य- त्रात्मनो देवान्वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान्वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्येदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदः सर्वं यदयमात्मा ॥7 ॥

जो मनुष्य ब्राह्मण को आत्मा से अलग मानता है, उसे ब्राह्मण परास्त कर देता है ( अलग कर देता है ), जो क्षत्रिय को ब्रह्म से भिन्न मानता है, उसे क्षत्रिय परास्त कर देता है । जो लोगों को ब्रह्म से भिन्न मानता है, उसे लोग अपने से अलग कर देते हैं । जो देवों को ब्रह्म ( आत्मा ) से अलग मानता है उसे देव अपने से अलग कर देते हैं । जो वेदों को ब्रह्म से अलग मानता है, उसे वेद पराजित ( पृथक् ) कर देते हैं, जो प्राणियों को आत्मा से अलग मानता है, उसे प्राणी अपने से पृथक् कर देते । यह ब्राह्मण, यह क्षत्रिय, ये लोग, ये देव, ये वेद, ये प्राणी– यह जो कुछ भी है, वह सब आत्मरूप (ब्रह्मरूप ) ही है । स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥8 ॥

जैसे बजाए जानेवाले दुन्दुभि आदि की आवाजें बाहर से नहीं पकड़ी जा सकतीं, पर दुन्दुभि के अथवा उसे बजाने वाले के पकड़े जाने से ही आवाज पकड़ी जाती है, वैसे ही आत्मा का भी है । स यथा शङ्खस्य ध्यायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥१ ॥

जैसे फूँके जानेवाले शंख की आवाजें बाहर से नहीं पकड़ी जा सकतीं, परन्तु शंख के या फूँकनेवाले के पकड़े जाने पर आवाज पकड़ी जाती है, वैसे ही आत्मा का भी है । स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणा- यास्तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥10 ॥

जैसे बजाई जानेवाली वीणा के स्वर बाहर से नहीं पकड़े जा सकते, परन्तु वीणा के अथवा वीणावादक के पकड़े जाने से वीणा का स्वर पकड़ा जा सकता है, वैसे ही आत्मा का भी है । स यथार्द्रेन्धाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टः हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यै- वैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥11 ॥

जैसे भीगी लकड़ियों से जलाई अग्नि से तरह-तरह का धुआँ निकलता है, वैसे,,,,,,! यह जो ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद इतिहास पुराण विद्याएँ ही अरे मैत्रेयी,,,,,, ( ),, श्लोक, सूत्र मंत्रविवरण— अर्थवाद एवं यज्ञ हुत ( खिलाया) केहुआनि: श्वास रूपउपासनाएँही है, । उपनिषदे परलोक सभी प्राणी यह सभी कुछ उस महाभूत आत्मा पिलाया गया यह लोक और

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 355 स यथा सर्वासामपा समुद्र एकायनमेव सर्वेषा स्पर्शानां त्वगेकायन- मेव सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेव सर्वेषाः रसानां जिह्वैका- यनमेव सर्वेषा रूपाणा चक्षुरेकायनमेव सर्वेषां शब्दाना श्रोत्रमेकायनमेव सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनमेव‍ सर्वासां विद्याना हृदयमेकायनमेव सर्वेषां कर्मणाः हस्तावेकायनमेव सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेव सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकाय- नमेव सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेव सर्वेषां वेदानां वागेका- यनम् ॥12 ॥

जैसे सब जलों का एक मिलनस्थान सागर है, सब स्पर्शो का एक मिलनस्थान त्वचा है, सब गन्धों का एक मिलनस्थान नासिकाएँ हैं, सब रसों का एक मिलनस्थान जीभ है, सब रूपों का एक मिलनस्थान चक्षु है, सब शब्दों का एक मिलनस्थान श्रोत्र है, सब संकल्पों का एक मिलनस्थान मन है, सब विद्याओं का एक मिलनस्थान हृदय है, सभी कर्मों का एक मिलनस्थान दो हाथ हैं, सभी आनन्दों का एक मिलनस्थान जैसे उपस्थ है (गुह्येन्द्रिय है ), जैसे सभी मलत्यागों का एक मिलनस्थान गुदा है, जैसे सब मार्गों का एक मिलनस्थान दो पैर हैं और सब वेदों का एक मिलनस्थान वाणी है । स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वाऽरेऽयमा- त्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञव- COPT: 1113 11 जैसे नमक का ढेला भीतर- बाहर के भेद बिना पूर्णरूप से एक रसवाला (खारा ) ही होता है, वैसे ही अरे मैत्रेयी! यह आत्मा भी भीतर - बाहर के भेदभाव से रहित पूर्ण रूप से प्रज्ञानघन ही है । वह इन्हीं पाँच महाभूतों में से उठकर वह उन भूतों के बाद नष्ट होता है, मरने के बाद उसकी कोई संज्ञा नहीं रहती, ऐसा मैं कहता हूँ । ” – यह याज्ञवल्क्य बोले । सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मोहान्तमापीपिपन्न वा अहमिमं विजानामीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वारे- ऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥14 ॥

तब मैत्रेयी ने कहा— “ आप महानुभाव ने तो मुझे यहाँ (इस बात में) असमंजस में डाल दिया! यह बात तो मेरी समझ में नहीं आती । " तब याज्ञवल्क्य बोले– “ असमंजस में डाले ऐसी तो कोई बात मैं कहता नहीं हूँ । अरे मैत्रेयी: यह आत्मा अविनाशी है, उसका धर्म ही नाश न होने का है ” । यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतर रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतर शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतर स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्व- मात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं जिघ्रेत्तत्केन क रसयेत्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कः शृणुयात्तत्केन कं मन्वीत तत्केन कः स्पृशेत्तत्केननेति कं विजानीयाद्येनेद सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्स एष नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यते-

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356 उपनिषत्सञ्चयनम् ऽसितो न व्यथते न रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्ता- नुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥15 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ ‘“जहाँ द्वैतावस्था ( अज्ञानजनित स्थिति) होती है, वहाँ एक -दूसरे को देखता है, एक- दूसरे को सूँघता है, एक- दूसरे का स्वाद लेता है, एक- दूसरे से बोलता है, एक- दूसरे को सुनता है, एक- दूसरे को सोचता है, एक- दूसरे का स्पर्श करता है, एक- दूसरे को जानता है; परन्तु जब मनुष्य के लिए सभी कुछ आत्मा ही हो गया तो वहाँ किसके द्वारा किसको देखेगा? किसके द्वारा किसको सूंघेगा? किसके द्वारा किसका स्वाद लेगा? किसके द्वारा किसको बोलेगा? तब किसके द्वारा किसको सुनेगा? तब किसके द्वारा किसको सोचेगा? तब किसके द्वारा किसको स्पर्श करेगा? तब किसके द्वारा किसको जानेगा? जो सबको जानता है, उसे किस साधन से जाना जा सकता है? वह ‘ नेति नेति' ( अतद् व्यावृत्ति) से निर्दिष्ट हुआ आत्मा पकड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि वह पकड़ने योग्य नहीं है । वह अविनाशी है, क्योंकि वह विनाश के योग्य नहीं है । वह असंग है, क्योंकि वह किसी में लिपटता नहीं है । वह अबद्ध ( बन्धनरहित ) है । वह व्यथित और क्षीण नहीं होता । हे मैत्रेयी! स्वयं विज्ञाता को ( जाननेवाले को ) भला किस साधन के द्वारा पाया जा सकता है? हे मैत्रेयी! इस प्रकार तुमको उपदेश दिया गया । हे मैत्रेयी! यह तुम अवश्य ही जान लो कि केवल इतना ही ( यही ) अमृत है । ” ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य ने सर्वस्व का त्याग किया और परिव्राजक हो गए । ( यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * षष्ठं ब्राह्मणम् अथ वशः (पौतिमाष्यात्) पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः पौतिमाष्या- त्पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डि- न्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥1 ॥

अब वंश कहा जाता है— ( यह ज्ञान ) पौतिमाष्य ने गोपवन से, गोपवन ने दूसरे पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने दूसरे गोपवन से, गोपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौन्डिन्य से, कौन्डिन्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने दूसरे कौशिक और गौतम से और गौतम ने— आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो गौतमाद्गौतमः सैतवात्सैतवः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद्गार्ग्यायण उद्दालकायनादुद्दालकायनो जाबालायनाज्जाबालायनो माध्यन्दि- नायनान्माध्यन्दिनायनः सौकरायणात्सौकरायणः काषायणात्काषायणः सायकायनात्सायकायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥2 ॥

आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य ने गार्ग्य से, गार्ग्य ने दूसरे गार्ग्य से, उस गार्ग्य ने गौतम ने सैतव से, सैतव ने पाराशर्यायण से, पाराशर्यायण ने गार्ग्याणण से, गार्ग्यायण ने उद्दालकायनसे, गौतम,,, उद्दालकायनसौकरायण नेनेकाषायणजाबालायनसे, काषायणसे जाबालायनने सायकायनने माध्यन्दिनायनसे, सायकायनसे नेमाध्यन्दिनायनकौशिकायन नेसेसौकरायण, कौशिकायनिसेसे, ने--

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चतुर्थोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 357 घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणः पाराशर्या- त्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरायण- स्त्रैवणेस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रे- यादात्रेयो माण्टेर्माण्टिगतमाद्गौतमो गौतमाद्‌गौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारि- तात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्वत्सनपाद्बाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः सौभरोऽया- स्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्व- रूपात्त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङा- थर्वणो दैवादथवद्दिवो मृत्योः प्राध्वसनान्मृत्युः प्राध्वसनः प्रध्वञ्- सनात्प्रध्वसन एकर्षेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥3 ॥

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ इति बृहदारण्यकोपनिषदि चतुर्थोऽध्यायः ॥4 ॥

+ = घृतकौशिक से, घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से, पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने जातूकर्ण्य से, जातूकर्ण्य ने आसुरायण और यास्क से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि से, औपजन्धनि ने आसुरि से, आसुरि ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि से, माण्टि ने गौतम से, गौतम ने दूसरे गौतम से, उस गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कैशोर्य काप्य से, कैशोर्य काप्य ने कुमार हारित से, कुमार हारित ने गालव से, गालव ने विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी कौण्डिन्य ने वत्सनपाद् बाभ्रव से, वत्सनपाद् बाभ्रव ने पन्या सौभर से, पन्था सौभर ने अयास्य आंगिरस से, अयास्य आंगिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से, आभूति त्वाष्ट्र ने विश्वरूप त्वाष्ट्र से, विश्वरूप त्वाष्ट्र ने अश्विनीकुमारों से, अश्विनीकुमारों ने दध्यङ् आथर्वण से, दध्यङ् आथर्वण ने अथर्वा दैव से, अथर्वा दैव ने मृत्यु प्राध्वंसन से, मृत्यु प्राध्वंसन ने प्रध्वंसन से, प्रध्वंसन ने एकर्षि से, एकर्षि ने विप्रचिति से, विप्रचिति ने व्यष्टि से, व्यष्टि ने सनारु से, सनारु ने सनातन से, सनातन ने सनग से, सनग ने परमेष्ठी से, परमेष्ठी ने ब्रह्म से यह विद्या ली है । ब्रह्म स्वयंभू है । उस ब्रह्म को नमस्कार । ( यहाँ छठा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् में चौथा अध्याय समाप्त होता है ।

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358 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् खिलकाण्ड- परिशिष्ट काण्ड के आरंभ में शान्तिपाठ-

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

ॐ यह पूर्ण ब्रह्म है, यह जगत् पूर्ण है, उस पूर्ण ब्रह्म में से यह पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है । उस पूर्ण ब्रह्म में से इस पूर्ण जगत् को निकाल लें, तो भी पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है । ॐ ३ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदैनेन यद्वेदितव्यम् ॥1 ॥

इति प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ आकाश ब्रह्म ॐकार है, आकाश (चैतन्य ) सनातन परमात्मा है । जिसमें वायु रहता है, वह आकाश ही 'ख' है ।' – इस प्रकार कौरव्यायणी पुत्र ने कहा है । यह ॐ कार वेद है, ऐसा ब्राह्मण जानते हैं ( क्योंकि) जो ज्ञेय (जानने योग्य) है, वह ॐ कार से ही जाना जा सकता है । ( यहाँ पहला ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * द्वितीयं ब्राह्मणम् त्रयः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति-, देव होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥1 ॥ मनुष्य और असुर- - ये तीन प्रजापति के पुत्र पिता के यहाँ ब्रह्मचर्य का पालन और अभ्यास

करते हुए रहते थे । ब्रह्मचर्य पालन औरअभ्यास के बाद देवों ने कहा—-"' हमें उपदेश दीजिए । ” उनसे प्रजापति ने ‘ द’ यह अक्षर कहा । ( और पूछा- ) 'समझ गए न? ' ( तब देवों ने कहा- ) “हाँ, समझ गए, आपने हमें ‘ दमन करो' - ऐसा उपदेश दिया है ।” प्रजापति ने कहा- "ठीक है । तुम समझ गए हो । ” अथ हैनं मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति व्यज्ञासिष्टेति ॥2 ॥ होवाच

इसके बाद मनुष्यों ने उनसे कहा- "हमें उपदेश दीजिए ।” ‘ द’ कहा । (प्रजापति ने पूछा— ) “जान गए क्या? ” उन्होंने उनसे भी (प्रजापति ने ) वही अक्षर ' – ( ) “, ‘ करो ऐसा कहा है । प्रजापति बोले- ठीक है तुम समझकहा-गएहाँहो जान। ' गए । आपने हमें दान अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच न आत्येत्योमिति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति द इति