Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 401–410

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 401 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 359 होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्त्रयः शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥3 ॥

इति द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥ बाद में असुरों ने (प्रजापति से) कहा- -"" आप हमें उपदेश दीजिए ।" तब उन्होंने वही अक्षर 'द' कहा ( और पूछा)– ' जान गए क्या? ' ( असुरों ने कहा- ) हाँ, जान गए । ( आपने हमें) ' दया रखो’ ऐसा कहा है । ( प्रजापति ने कहा- ) “ठीक है तुम समझ गए हो ।" यह प्रजापति के अनुशासन की मेघगर्जना दैवीवाणी का अनुकथन करती है । अर्थात् दमन करो, दान करो, दया करो । इसलिए दया, दान और दमन— तीनों सीखना चाहिए । ( यहाँ दूसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) तृतीयं ब्राह्मणम् एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सर्वं तदेतत्त्र्यक्षरहृदयमिति ‘ हृ ' इत्ये- कमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥1 ॥

इति तृतीयं ब्राह्मणम् । जो यह हृदय है, वह प्रजापति है, वह ब्रह्म है, वह सब कुछ है । इसमें ह्र द यं ऐसे तीन अक्षर हैं । इसमें ‘हृ' प्रथम अक्षर है, ऐसा जो जानता है उसके लिए अपने और दूसरे लोग भेंट आदि लाते हैं । ‘ द' एक अन्य अक्षर है- ऐसा जाननेवाले के लिए अपने और पराये लोग देते हैं । और ‘ य' एक

अन्य ( तीसरा ) अक्षर है । ऐसा जो जानते हैं, वे स्वर्ग में जाते हैं ॥

( यहाँ तीसरा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * चतुर्थंब्राह्मणम् तद्वैतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोकान् जित इवसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्य ह्येव ब्रह्म ॥ 1 ॥

इति चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ वह ( हृदयरूप ) ब्रह्म ही सत्य है, वही पहले था । वही है कि जो सत्य है । “ वह महान्, सत्य, आदरणीय और सबसे पहले जन्मा है ” – ऐसा जो मनुष्य जानता है उस मनुष्य के शत्रु जीत लिए जाते हैं और नष्ट होते हैं । ब्रह्म ही सत्य है । ( यहाँ चौथा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * पञ्चमं ब्राह्मणम् आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्मसत्यमितिप्रजापतिंस प्रजापतिर्देवास्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत्र्यक्षर

पृष्ठ 402

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 402 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

360 उपनिषत्सञ्चयनम् इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्य- तोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतः सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वासमनृत हिनस्ति ॥1 ॥

यह जगत् पहले जल ही था । जल ने सत्य की रचना की । सत्य ही ब्रह्म है । ब्रह्म ने प्रजापति को उत्पन्न किया । प्रजापति ने देवों को उत्पन्न किया । वे देव सत्य की ही उपासना करते हैं । सत्य शब्द में तीन अक्षर हैं । एक पहला ' स' अक्षर है, एक दूसरा ' ती' अक्षर है और एक तीसरा ' य' अक्षर है । इनमें पहला और तीसरा अक्षर ' सत्य' है, बीच का अमृत ( असत्य) है । यह अनृत दोनों ओर से सत्य से घिरा हुआ है । ( इसलिए वह) सत्यप्राय ही है । जो मनुष्य यह जानता है कि सत्य का जोर अधिक होता है उसका नाश अनृत कभी नहीं करता (प्रमाद से यदि अनृत बोला गया हो, तो भी । ) तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तावेतावन्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रति- ष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स यदोत्क्रमिष्यन्भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥2 ॥

वह जो सत्य है, वह यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डल में पुरुष है और जो दाहिनी आँख में ( चेतन ) पुरुष है — वे दोनों एक-दूसरे में अवस्थित हैं । यह आदित्य अपनी किरणों द्वारा आँख के चेतन पुरुष में बसता है और यह दाहिनी आँख का चेतन पुरुष अपने प्राणों से आदित्य में रहता है । इसलिए जब प्राण निकलने लगते हैं, तब ( मनुष्य ) सूर्य को स्पष्ट रूप से देखने लगता है । ये किरणें वापिस उसके पास नहीं जातीं । य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एक शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदित्यहरिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥3 ॥

सूर्यमण्डल में जो पुरुष है, उसका मस्तक ' भू:' है । सर एक होता है और यह अक्षर भी तो एक है । ' भुव: ' इसके दो हाथ हैं । हाथ दो होते हैं, और ये अक्षर भी तो दो ही हैं । ‘ ( पैर) है । पैर दो होते हैं और ये अक्षर भी तो दो ही हैं । उसका रहस्यमय नाम ‘स्वःअहर्' ’उसकी प्रतिष्ठा,, जानता है वह पाप का त्याग कर देता है अर्थात् वह पाप का नाश करता है । है ऐसा जो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एक शिर एकमेतदक्षरं इति बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरेभुव तस्योपनिषदहमिति हन्ति पाप्मानं जहाति च य एवंवेद ॥4 ॥

इति पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥ इस दाहिनी आँख में जो चेतन पुरुष है, उसका'भू: भी एक अक्षर ही है । ‘ भुव:’ यह दो हाथ हैं । हाथ दो होते'हैंयह, औरमस्तक है । मस्तक एक है और यह पैर हैं । पैर दो होते हैं, और ये अक्षर दो ही हैं । 'अहम्' उसका ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः ' उसके है वह पापों का नाश कर देता है । रहस्यमय नाम है । ऐसा जो जानता ( यहाँ पाँचवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ ।)

पृष्ठ 403

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 403 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 361 षष्ठं ब्राह्मणम् मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा ब्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥1 ॥

इति षष्ठं ब्राह्मणम् ॥ प्रकाशरूप सत्यवाला यह पुरुष मनोमय है । वह हृदय के भीतर चावल या यव के दाने जैसा है, वही सभी का ईश्वर है, सबका अधिपति है, और यह जो कुछ भी है, वह वही है, वही सबके ऊपर शासन करता है | ( यहाँ छठा ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * सप्तमं ब्राह्मणम् विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद्विद्युद्विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्धयेव ब्रह्म ॥1 ॥

इति सप्तमं ब्राह्मणम् ॥ विद्युत् ब्रह्म है— ऐसा कहते हैं । ( अंधकार का ) खण्डन करने से वह विद्युत् है । इसी प्रकार के गुणवाले 'विद्युद्ब्रह्म' को जो जानता है, उसके पापों को विद्युत् ( ब्रह्म ) नाश कर देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है । ( यहाँ सातवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) अष्टमं ब्राह्मणम् वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥1 ॥

इत्यष्टमं ब्राह्मणम् ॥ वाणी ही गायरूप में उपासना करनी चाहिए । इसके चार आँचल हैं- स्वाहाकार, वषट्कार, स्वधाकार और हन्तकार । देवलोक उसके 'स्वाहा' और 'वषट्' – इन दो आँचलों के आधार पर जीतेहैं । हैं । मनुष्य ‘ हन्तकार’ ( के आधार पर जीते हैं) और पितृलोक 'स्वधाकार' के आधार पर जीते उसका प्राण ही ऋषभ है और मन बछड़ा है । (यहाँ आठवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * नवमं ब्राह्मणम् अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैषनैनं घोषा भवति यमेतत्कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति घोषु शृणोति ॥1 ॥

इति नवमं ब्राह्मणम् ॥

पृष्ठ 404

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 404 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

362 उपनिषत्सञ्चयनम् मनुष्य के भीतर जो यह अग्नि है, वह वैश्वानर अग्नि है, जिससे वह अन्न पचाया जाता है, जो खाया जाता है । उसी की यह आवाज होती है । जिस आवाज को दोनों कान बन्द करके मनुष्य सुनता है । जब मनुष्य उत्क्रमण करने की तैयारी करता है अर्थात् शरीर से चले जाने की तैयारी करता है, तब यह आवाज वह नहीं सुन सकता । (यहाँ नौवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) दशमं ब्राह्मणम् यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रेति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिही यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमा- गच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दभेः खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन्वसति शाश्वतीः समाः ॥ 1 ॥

इति दशमं ब्राह्मणम् ॥ मनुष्य जब इस लोक से चला जाता है अर्थात् मृत्यु को प्राप्त करता है, तब वायु के पास जाता है । वायु अपने को उसके लिए रथ के पहिए के छिद्र जैसा बनकर उसे दे देता है, जिसके द्वारा वह ऊपर जाता है । फिर वह सूर्य के पास जाता है । सूर्य अपने को उसके लिए लम्बर नाम के वाजिन्त्र के छिद्र जैसा बना देता है । उससे वह ऊपर चढ़ता है । वह चन्द्रमा के पास जाता है । चन्द्र उसके लिए अपने आपको नगारे के काने (छिद्र) जैसा बना देता है । उसके द्वारा मनुष्य ऊपर चढ़ता है, और लोक में आता है, जहाँ ( मन के या शरीर के ) दुःख नहीं होते । और उसमें बहुत- बहुत वर्षों तकऐसे ( अनगिनत वर्षों तक ) निवास करता है ।1 ( यहाँ दसवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) एकादशं ब्राह्मणम् एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते परम हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्य हरन्ति परम हैव लोकं जयति य परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परम हैव लोकं जयतिएवं वेदैतद्वै वेद ॥1 ॥ य एवं

इत्यैकादशं ब्राह्मणम् ॥ रोगग्रस्त मनुष्य का शरीर जो तपता है, वह बड़ा तप है— को जीत लेता है । मरे हुए मनुष्य को जो वन में ले जाता इस प्रकार जो जानता है वह परमलोकलेता है, वह परमलोक को जीत लेता है । मरे हुए मनुष्यहै, वह सचमुच बड़ा तप है — ऐसा जो जान देता है, वह बड़ा तप है — ऐसा जो जानता है, वह परम लोकके शरीर को जो चारों ओर अग्नि में रख ) (होती है । को जीत लेता है उसकी अच्छी गति ( यहाँ ग्यारहवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । )

पृष्ठ 405

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 405 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 363 द्वादशं ब्राह्मणम् अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृदः कस्त्वेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन्भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥1 ॥

इति द्वादशं ब्राह्मणम् ॥ कुछ लोग कहते हैं — ‘ अन्न ब्रह्म है ।' पर वह ठीक नहीं, क्योंकि प्राण के बिना अन्न सड़ जाता है । कुछ लोग कहते हैं 'प्राण अन्न है ।' वह भी ठीक नहीं । क्योंकि अन्न के बिना प्राण सूख जाते हैं । पर ये दोनों देव एकरूपता को प्राप्त कर परमभाव प्राप्त करते हैं । परमोच्च स्थिति को प्राप्त करते हैं, ऐसा निश्चय करके प्रातृद ने अपने पिता से कहा– “जिस मनुष्य को ऐसा ज्ञान है, उस मनुष्य का मैं क्या अच्छा या बुरा कर सकता हूँ? ” तब पिता ने हाथ हिलाकर कहा - "प्रातृद! ऐसा मत कहो । इन दोनों (प्राण और अन्न ) की एकरूपता प्राप्त करके तो भला कौन परमभाव को प्राप्त कर सकता है? ” उसके पिता ने और आगे ऐसा भी कहा कि- " अन्न है वह 'वि' है । क्योंकि ‘ वि' रूप अन्न में ही सभी प्राणी प्रविष्ट हैं । और 'रम्' यह प्राण है । क्योंकि ये सभी प्राणी 'रम्' यानी प्राण में ही रमण करते हैं । जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, उसमें सभी प्राणी प्रवेश करते हैं, उससे सभी प्राणी आनन्द प्राप्त करते हैं । ( यहाँ बारहवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) त्रयोदशं ब्राह्मणम् उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदः सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद्वीर- स्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥1 ॥

अब ‘ उक्थ ’ के विषय में ( स्तुतिगान के विषय में) कहा जाता है । प्राण ही 'उक्थ' है क्योंकि वह सारे जगत् को उठाता है और जो मनुष्य इस प्रकार से जानता है उसके यहाँ है'उक्थ। ’ जाननेवाले पुत्र का जन्म होता है । वह उक्थ में समा जाता है और उक्थ के लोक में बसता यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय यजुषः सायुज्यः सलोकतां जयति य एवं वेद ॥2 ॥

से ही युक्त अब यजुष् के विषय में कहा जाता है— प्राण ही यजुष् है क्योंकि ये केसभीलिएप्राणीसभीप्राणप्राणी एकत्रित होते हैं । जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, उसकी श्रेष्ठता को स्थापितमें यजुष्करनेरहता है, उस लोक में निवास होते हैं । वह मनुष्य यजुष् में समा जाता है और जिस लोक करता है ।:

पृष्ठ 406

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 406 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

364 उपनिषत्सञ्चयनम् साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥3 ॥

अब सामरूप प्राण की उपासना कही जाती है— साम ही प्राण है प्राण में ही ये सभी प्राणी एकत्रित होते हैं । वे उसकी श्रेष्ठता स्थापित कर देते हैं । जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, वह साम में समा जाता है । जिस देश में साम रहता है, उसी देश को वह प्राप्त होता है । क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो ह वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितो: प्रक्षत्रमत्राप्नोति क्षत्रस्य सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥4 ॥

इति त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥ अब क्षत्र के विषय में प्राणोपासना कही जाती है—प्राण ही क्षत्रियत्व है । क्योंकि प्राण ही क्षत से बचाता है ( त्राण करता है ) । जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, उसे क्षत्रियत्व मिल जाता है । उस क्षत्रियत्व को अन्य किसी रक्षण की आवश्यकता नहीं रहती । जो इस प्रकार जानता है, वह क्षत्रियत्व में समा जाता है, और जिस लोक में क्षत्रियत्व रहता है, उस लोक में जाता है । ( यहाँ तेरहवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) * चतुर्दशं ब्राह्मणम् भूम्यरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥1 ॥

भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौः– ये आठ अक्षर हैं । गायत्री का प्रथम पद भी तो आठ ही अक्षर है । ये ( भूमि आदि ) ही गायत्री का प्रथम पाद है । इस प्रकार इसके पाद को जो मनुष्य जानता है,वालावह इस त्रिलोक में जो कुछ है, उसे जीत लेता है । ऋचो यजूषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरः ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं aa 11211 पदं ‘ऋच: यजूंषि सामानि’ — ये आठ अक्षर हैं । गायत्री का एक दूसरा चरण वाला है । जो मनुष्य इसके इस चरण को इस तरह जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्याभी आठ हैही, उसकाअक्षरों फल प्राप्त कर लेता है । प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरः ह वा हैवास्या एतत्स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति एकं गायत्र्यै पदमेतदु वेदाथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा योऽस्या एतदेवं पदं तत्तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष य एष तपति यद्वै चतुर्थं उपर्युपरि तपत्येव हैव श्रिया यशसापरोरजातपति इति सर्वमु ह्येवैष रज वेद ॥3 ॥ योऽस्या एतदेवं पदं

पृष्ठ 407

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 407 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 365 प्राण, अपान और व्यान- ये आठ अक्षर हैं । गायत्री मंत्र के एक तीसरे चरण के भी तो आठ ही अक्षर हैं । ये प्राण आदि ही गायत्री का तीसरा चरण है । जो मनुष्य इस तीसरे चरण को इस प्रकार जानता है, वह जितना प्राणीसमुदाय है, उन सबको जीत लेता है । और यह जो कुछ तपता (प्रकाशता) है, वही इस गायत्री का तुरीय अर्थात् चौथा चरण है । वह दर्शत् (दिखाई देनेवाला ) और परोरज ( अन्धकार से उस पार का ) है । ' दर्शत्' का अर्थ- ' मानो दिखाई देता हो' और ' परोरज' का अर्थ— ‘ सब रजों के ( लोकों के ) अंधकार के परे है ।' ऐसा होता है । जो मनुष्य इसको इस प्रकार जानता है, वह तेज और यश से प्रकाशित हो जाता 1 सैषा गायत्र्येतस्मिस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद्वै तत्सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद्यदिदानीं द्वौ विवदमानावे- यातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्द- ध्याम तद्वै तत्सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादा- तुर्बल सत्यादोजीय इत्येवं वैषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयास्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणास्तत्रे तद्यद्गयास्तत्रे तस्माद्गायत्री नाम स यामेवामू सावित्रीमन्वाहैषैव स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणा- स्त्रायते ॥4 ॥

यह गायत्री इस दिखाई देनेवाले और अन्धकार के उस पार के चौथे चरण पर प्रतिष्ठित है । और वह चरण सत्य के आधार पर स्थित है । सत्य क्या है? आँख ही सत्य है । आँख वास्तव में सत्य है, क्योंकि आज भी दो मनुष्य झगड़ते हुए आयें और उनमें से एक यदि कहे कि ‘ मैंने देखा' और दूसरा कहे कि ' मैंने सुना' तो 'मैंने देखा' – ऐसा कहनेवाले के ऊपर ही हम श्रद्धा रखते हैं । वह सत्य बल के आधार पर टिका हुआ है । इसलिए कहते हैं कि बल सत्य से भी ओजस्वी है । इसी प्रकार यह गायत्री शरीर में स्थित प्राण पर आधारित है । उसने 'गयों' का त्राण किया- 'गय' का अर्थ है प्राण | गायत्री ने उन प्राणों का त्राण (रक्षण) किया । इसलिए इसका नाम 'गायत्री' पड़ा है । (उपवीत के समय) आचार्य ने जिस गायत्री का उपदेश दिया था वह यही है । वही गायत्री उस बटुक के प्राणों का रक्षण करती है । ता हैतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद्गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद्यदिह वा अप्येवंविद्बह्विव प्रति- गृह्णाति न हैव तद्गायत्र्या एकं च न पदं प्रति ॥5 ॥

कुछ ( वैदिक शाखाओं वाले लोग यज्ञोपवीत देते समय उपवीतार्थी को) गायत्री छन्द वाले मंत्र के बदले (तीन चरणों वाले छन्द के बदले ) अनुष्टुभ् छन्द वाली ( चार चरण के छन्द वाली ) सावित्री का उपदेश करते हैं । और कहते हैं कि वाणी ' अनुष्टुभ्' है । इसलिए हम वाणी काचाहिएउपदेश। इसकरतेप्रकारहैं ।,परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए । गायत्री छन्द वाली सावित्री का ही उपदेश करना के समानजाननेवाला मनुष्य चाहे कितनी ही भेंटों को स्वीकार करे, तो भी वह गायत्री के एक चरण भी नहीं होंगी । स य इमा’स्त्रींल्लोकान्पूर्णान्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्प्रथमंएतद्द्द्वितीयंपदमाप्नु- यादथ यावतीयं त्रयी विद्या यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या

पृष्ठ 408

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 408 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

366 उपनिषत्सञ्चयनम् पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत्प्रतिगृह्णीयात्सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कृत उ एतावत्प्रतिगृह्णीयात् ॥6 ॥

यदि मनुष्य धन से परिपूर्ण इन तीनों लोकों का स्वीकार करे, तो उसे गायत्री के प्रथम चरण मात्र के समान ही मानते हैं । यदि वह तीनों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर ले, तो वह गायत्री के दूसरे चरण के बराबर ही है । यदि वह सभी प्राणियों को अपने प्रभुत्व में ले ले, तो वह गायत्री के तीसरे चरण के बराबर ही है । अन्धकार के उस पार प्रकाशित गायत्री का जो चौथा चरण दर्शनीय है, वह तपता हुआ सूर्य है । वह तो किसी से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । इतना बड़ा धन तो मनुष्य कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता है भला? तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै कामो मा समृद्धीति वा न हैवास्मै स कामः समृद्ध्यते यस्मा एवमुपतिष्ठतेऽहमदः प्रापमिति वा ॥ 7 ॥

( अन) उस गायत्री का उपस्थान (बताते हैं - ) हे गायत्री! तू एकपदी ( = त्रैलोक्यरूप ) है, तू द्विपदी ( = वेदरूप ) है, तू त्रिपदी ( = प्राणापानव्यानरूप) है और तू चतुष्पदी (= तुरीय ) भी है । और इस सबसे परे ( निरुपाधिक स्वरूप से) तू अपद् ( चरणरहित ) है । तू किसी से जानी नहीं जा सकती । तुम्हारे दर्शनीय, अन्धकारातीत प्रकाशित स्वरूप को नमस्कार हो । यह गायत्री मन्त्र को जाननेवाला विद्वान यदि किसी से बैर रखता हो और उसके लिए कहे कि, 'उसकी कामना फलवती न हो' तो उसकी कामना फलदायी नहीं होती और यदि कहे कि ‘ उसकी कामना सफल हो' तो वह सफल हो जाती है । एतद्ध वै तज्जनको वैदेहो बुडिलमाश्वतराश्विमुवाच यन्नु हो तद्गायत्री- विदब्रूथा अथ कथः हस्तीभूतो वहसीति मुखः ह्यस्याः सम्राण्न विदांच- कारेति होवाच तस्या अग्निरेव मुखं यदि ह वा अपि बह्निवाग्नावभ्याद- धति सर्वमेव तत्संदहत्येव हैवैवंविद्यद्यपि बह्निव पापं कुरुते तत्संप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः संभवति ॥8 ॥ सर्वमेव इति चतुर्दशं ब्राह्मणम् ॥

इस विषय में विदेहराज जनक ने अश्वतराश्व के पुत्र बुडिल गायत्री का जानने वाला हूँ? तो फिर हाथी बनकर मेरा भार क्योंसे कहा— “तुमने कहा था न कि मैं “!? ” सम्राट् मैं उस मंत्र का मुख नहीं जानता था ” -ढोते हो तब बुडिल बोला-, । तब जनक बोले " है ।लोग अग्नि में बहुत ईंधन डालते हैं तो भी वह सबको अग्नि ही गायत्री का मुखजानता है, वह बहुत पाप करे, तो भी वह सब पापों को खाक कर देता है । वैसे ही जो मनुष्य ऐसा,,,उसको वृद्धत्व नहीं आता उसे मृत्यु नहीं आती । जला देता है और शुद्ध एवं पवित्र होता है (यहाँ चौदहवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । )

पृष्ठ 409

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 409 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः ] बृहदारण्यकोपनिषद् ( 10 ) 367 पञ्चदशं ब्राह्मणम् हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । पूषन्नकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन्समूह तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि । वायुरनिल- ममृतमथेदं भस्मान्तः शरीरम् । ॐ 3 क्रतो स्मर कृतः स्मर क्रतो स्मर

कृतः स्मर । अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥1 ॥

इति पञ्चदशं ब्राह्मणम् ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥5 ॥

हिरण्मय पात्र से सत्य (ब्रह्म) का मुख ढँक गया है । हे पूषन्! धर्मरूप दृष्टिवाले मेरे देखने के लिए उसे खोल दो । हे पूषन् ( पोषक देव)! हे एकर्षे! हे यम! हे सूर्य! हे प्राजापत्य! अपनी किरणों को (वहाँ से ) हटा लीजिए, जिससे मैं तुम्हारा जो अतिकल्याणकारी रूप है, उसे देख लूँ । ( आदित्यमण्डल में स्थित ) जो वह पुरुष है, वह अमृतस्वरूप मैं ही हूँ । ( मरण होने पर मेरा) प्राणवायु बाह्य अनिल में ( वायु में ) तथा यह शरीर भस्म में मिल जाए । हे ऊँकाररूप मनोमय अग्नि! स्मरणीय कार्यों का स्मरण कर । हे अग्नि! मेरे किए हुए का स्मरण कर । हे अग्नि! हमें कर्मफल की प्राप्ति के लिए शुभ मार्ग की ओर ले चल । हे देव! तू सर्व प्राणियों के सर्वज्ञानों को जानता है । हमारे कुटिल पापों को दूर कर । हम बार- बार तेरा वन्दन करते हैं । ( यहाँ पंद्रहवाँ ब्राह्मण पूरा हुआ । ) यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् में पाँचवाँ अध्याय समाप्त होता है ।

पृष्ठ 410

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 410 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

368 उपनिषत्सञ्चयनम् अथ षष्ठोऽध्यायः प्रथमं ब्राह्मणम् ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥1 ॥

ॐ जो मनुष्य सबसे बड़ी और सबसे अच्छी वस्तु को जानता है, वह स्वजनों में सबसे बड़ा और सबसे अच्छा बनता है । प्राण ही सबसे बड़ी और सबसे अच्छी वस्तु है । इस प्रकार जानकर जो उसकी ( प्राण की ) उपासना करता है, वह स्वजनों में सबसे बड़ा और सबसे अच्छा तो बनता ही है, पर अन्य लोगों में भी जहाँ वह चाहता है वहाँ सबसे बड़ा और सबसे अच्छा बन जाता है । यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥2 ॥

यदि कोई मनुष्य किसी के उत्तम निवासस्थान रूप वस्तु को जानता है, वह स्वजनों में उत्तम आश्रयस्थान रूप बनता है । वाणी ही श्रेष्ठ है । और जो ऐसा जानता वह अन्य लोगों में भी जहाँ वह चाहता है उत्तम आश्रयरूप बन जाता है । यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥3 ॥

यदि कोई मनुष्य प्रतिष्ठा को ( सद्गुणयुक्त स्थिति को ) जानता है ( उपासना करता है), वह सुभिक्षादि अच्छे समय में अच्छी तरह से स्थिर रहता है, तथा विषम काल में भी अच्छी तरह से स्थिर रहता है । चक्षु ही प्रतिष्ठा ( अच्छी स्थिति) है क्योंकि आँख के द्वारा ही अच्छे- बुरे देशकाल में मनुष्य अच्छी तरह से स्थिर रहता है । दोनों में समानरूप से रह सकता है । यो ह वै संपदं वेद स हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै संपच्छ्रोत्रे हमे सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः सहास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥4 ॥

जो मनुष्य संपद को जानता (उपासना करता) है, उसकी जो भी इच्छा हो, पूर्णही संपद है । कान हो तभी सब वेद सुने जा सकते हैं । जो मनुष्य श्रोत्र की होती है । कान, । है उसकी किसी भोग की कामना सरलता से पूर्ण हो सकती है इस प्रकार से उपासना करता यो ह वा आयतनं वेदायतनः स्वानां भवत्यायतनंजनानां मनो हवा आयतनमायतनः स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवंवेद ॥5 ॥

जो कोई आयतन ( आश्रय) को जानता (उपासना करता) है, वह स्वजनोंका आश्रय बनता है, और अन्य जनों का भी आश्रयस्थान बनता है ।मन ही वह आश्रय है । यो ह वै प्रजातिं वेद प्रजायते ह प्रजया पशुभिः | 16 || ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद रेतो वै प्रजातिः प्रजायते