Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 51–60

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 51 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयः खण्डः ] केनोपनिषत् ( 2 ) 9

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥5 ॥

जिस ब्रह्मतत्त्व को ( कोई भी मनुष्य) मन से (अन्त: करण से ) समझ नहीं पाता, परन्तु “ मन ही जिसके द्वारा जाना ( समझा जा सकता है ” – ऐसा कहा जाता है, वही ब्रह्म है, ऐसा तुम जानो । मन और बुद्धि के द्वारा पहचाने जानेवाले जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ।

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूषि पश्यति ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥6 ॥

जिस ब्रह्मतत्त्व को कोई आँखों से देख नहीं पाता, परन्तु आँखें ही जिसके द्वारा देखी जाती हैं, वही ब्रह्म है, ऐसा तुम जानो । (जिसके होने से ही आँखें अपने विषयों को देख सकती हैं, वही ब्रह्म है । ) चक्षुओं के द्वारा दिखाई देने वाले जिस दृश्य समुदाय की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ।

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदः श्रुतम् ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥7 ॥

जिस ब्रह्मतत्त्व को कोई भी मनुष्य अपने कानों से नहीं सुन सकता, परन्तु जिसके द्वारा ही यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जा सकती है ( अर्थात् श्रोत्रेन्द्रिय में सुनने की शक्ति आती है ), उसी को तुम ब्रह्मरूप में जानो । जो लोग श्रोत्रेन्द्रिय से जानने लायक पदार्थों के समूह की उपासना करते हैं, वह ( श्राव्य पदार्थ समूह) ब्रह्म नहीं है ।

यत्प्राणेन न प्रणिति येन प्राणः प्रणीयते ।

तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेहं यदिदमुपासते ॥8 ॥

इति प्रथमः खण्डः । जो ब्रह्मतत्त्व प्राणों से चेष्टायुक्त नहीं होता, परन्तु प्राण ही जिसके द्वारा चेष्टित होता है, उसी को तुम ब्रह्म जानो । प्राणों के द्वारा चेष्टित किए जाने वाले पदार्थसमूह की लोग उपासना करते हैं पर वह ब्रह्म नहीं है । अथ द्वितीयः खण्डः

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।

यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ तु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥1 ॥

यदि तू ऐसा मानता है कि "मैंने ब्रह्म को भलीभाँति जान लिया है " तब तो सही बात यही होतीजो है कि “ तुझे ब्रह्म का स्वरूप थोड़ा- सा ही ज्ञात हुआ है । " क्योंकि उस ब्रह्म का आंशिक स्वरूप तू है और उसका ( अन्य ) आंशिक स्वरूप जो देवों में है (इन दोनों को मिलाकर भी वह करनेज्ञान अल्पयोग्य ही रहेगा) इसलिए मैं मानता हूँ कि तुम्हारा जाना हुआ ब्रह्मस्वरूप सचमुच फिर से विचार ही है ।

पृष्ठ 52

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 52 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

10 उपनिषत्सञ्चयनम्

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।

यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥2 ॥

( शिष्य कहता है कि— ) “ मैं ब्रह्म को अच्छी तरह से जान चुकाहूँ ”– ऐसा तो मैं नहीं मानता, पर साथ- ही- साथ ‘“मैं ब्रह्म को जानता ही नहीं”– ऐसा भी मैं नहीं मानता, क्योंकि मैं उसे जानता तो हूँ ही । किन्तु मेरा यह जानना कुछ निराला ही है ( सामान्य ज्ञेय-ज्ञाता के बीच जैसा जानना होता है, ऐसा तो नहीं है ) । मेरे इस कथन के रहस्य को तो हममें से केवल वही समझ सकता है, जो ब्रह्म को जाननेवाला हो ।

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।

अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥3 ॥

जिस मनुष्य का मत ऐसा है कि “ब्रह्म जाना नहीं जा सकता ", उसका तो वह जाना हुआ ही होता है । परन्तु जो मनुष्य यह मानता है कि "ब्रह्म को मैंने जान लिया है ” तो वह आदमी कुछ भी नहीं जानता ( ऐसा समझना चाहिए) ( क्योंकि ) जानने का अभिमान रखनेवालों के लिए वह ब्रह्मतत्त्व ज्ञात हुआ होता ही नहीं और जिनमें ज्ञातृत्व का कुछ भी अभिमान नहीं होता, उनको यह ब्रह्मतत्त्व ज्ञात हुआ होता है । अर्थात् वे ब्रह्मसाक्षात्कारी होते है ।

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।

आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥4 ॥

उपर्युक्त प्रतिबोध ( संकेत ) से उत्पन्न हुआ ज्ञान ही (बौद्धिक प्रतीति से उत्पन्न हुआ ज्ञान ही) वास्तविक ज्ञान है, क्योंकि ऐसे ज्ञान से अमृतत्व को ( अमृतस्वरूप परमात्मा को ) मनुष्य प्राप्त करता है । अन्तर्यामी परमात्मा से ही वह परमात्मज्ञान की शक्ति (ज्ञान ) प्राप्त करता है और वह उस ज्ञान से ( विद्या से ) अमृतस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त करता है ।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥5 ॥

इति द्वितीयः खण्डः । यदि इस मानवदेह में परब्रह्म को पहचान लिया जाए तब तो बड़ी अच्छी ही बात है । परन्तु अगर इस जन्म में वह न जाना गया, तब तो बहुत बड़ा विनाश ही है - ऐसा सोचकर बुद्धिमान् लोग सकल प्राणियों में परब्रह्म को समझकर इस लोक से प्रयाण करके ( मरकर) अमर हो जाते हैं । अथ तृतीयः खण्डः ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥1 ॥

परब्रह्म परमेश्वर ने ही देवों के लिए (देवताओं को निमित्त बनाकर असुरों की । परन्तु परब्रह्म परमेश्वर की ही उस विजय पर इन्द्रादि देव ( अपनी महिमा समझकरके ऊपर) अभिमान) विजय करनेप्राप्त लने ।

पृष्ठ 53

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 53 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीयः खण्डः ] केनोपनिषत् ( 2 ) 11 त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । तद्वैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥2 ॥

वे इस प्रकार समझने लगे कि यह तो हमारी ही विजय है और यह हमारी ही महिमा है । किन्तु परब्रह्म ने इन देवताओं के अभिमान को पहचान ही लिया । (और कृपा करके देवताओं के इस अभिमान को दूर करने के लिए ) उनके सामने ही साकार स्वरूप में प्रकट हो गये । ( उन्हें यक्ष के रूप में प्रकट

हुए देखकर भी ) “ यह दिव्य यक्ष कौन है' "- वह उन देवताओं ने नहीं जाना ।

तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥3 ॥

उन इन्द्रादि देवताओंने अग्निदेव से इस प्रकार कहा——-"हे जातवेदा! आप इस बात को ठीक तौर से जान लीजिए (जाँच - पड़ताल कीजिए ) कि यह दिव्य यक्ष कौन है? " ( तब अग्नि ने कहा कि ) "हाँ ठीक है । " तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥4 ॥

अग्निदेव उस यक्ष के पास दौड़कर गए । उन अग्निदेव से यक्ष ने पूछा कि " तुम कौन हो? ” अग्नि ने कहा कि “ मैं प्रसिद्ध अग्निदेव हूँ और मैं ही 'जातवेदा ' के नाम से प्रसिद्ध हूँ । ” तस्मि’स्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदः सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥5 ॥

( तब ब्रह्मरूप परमात्माने कहा कि- ) " ऐसे (अग्नि और जातवेदा [ सर्वज्ञ ] के दो नाम धारण करनेवाले) तुझमें कौन- सा सामर्थ्य है? बताओ तो? ” तब अग्नि ने उत्तर दिया कि “ अगर मैं चाहूँ तो इस धरती में जो कुछ भी है, इन सबको जलाकर भस्म कर सकता हूँ । ” तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥6 ॥

( अग्नि के ऐसा कहने पर उस दिव्य यक्ष ने) उस अग्नि के आगे एक तिनका रखा ( और कहा कि— ) “इस तिनके को जला दो ।" तब वह अग्नि अपनी पूरी ताकत से उस तिनके पर टूट पड़े । परन्तु उस तिनके को जला न सके । (इसलिए लज्जित होकर ) लौट आए और देवों के पास जाकर कहने लगे कि “ मैं इसे ( यक्ष को ) जानने में समर्थ नहीं हो पाया हूँ कि सचमुच यह यक्ष कौन है? " अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥7 ॥

तब देवताओं ने वायु से कहा कि "हे वायुदेव! जाकर इस विषय को जान आइए (ठीक तरह से पहचान लीजिए) कि यह दिव्य यक्ष कौन है "? तब वायुदेव ने कहा कि “ठीक है । ” ( अभी जान-पहचान करके आता हूँ) । तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मात- रिश्वा वा अहमस्मीति ॥8 ॥

वायुदेव दौड़कर उस ( यक्ष ) के पास गए । उनसे भी उस दिव्य यक्ष पूछा कि “ तुम कौन हो? ” तब वायु ने कहा कि "मैं प्रसिद्ध वायुदेव हूँ और मैं ही ' मातरिश्वा ' कहलाता हूँ । ”

पृष्ठ 54

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 54 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

12 उपनिषत्सञ्चयनम् तस्मि स्त्वयि किं वीर्यमिति? अपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्या- मिति ॥ 9 ॥

तब यक्षरूप ब्रह्म ने कहा--'"वायु और मातरिश्वा इन दो नामों को धारण करने वाले तुझमें कौन- सा सामर्थ्य है? ( तब वायु ने उत्तर दिया कि- ) " अगर मैं चाहूँ तो इस धरती में जो कुछ भी है, उसे उठाकर आकाश में उड़ा सकता हूँ । ” तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं तदेतद् यक्षमिति ॥10 ॥

(वायु के ऐसा कहने पर उस दिव्य यक्ष ने ) उस वायुदेव के सामने एक तिनका रखा और कहा कि “ इस तिनके को उठा लो और उड़ा दो ।" तब वह वायु अपने पूरे जोर से उस तिनके पर टूट पड़ा, परन्तु उसे उठाने में किसी भी तरह समर्थ न हो सका । इसलिए लज्जित होकर वहाँ से लौट आया और देवताओं से कहने लगा कि " सचमुच यह दिव्य यक्ष कौन है, यह जानने में मैं समर्थ नहीं हो सका हूँ । ” अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्य- द्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥11 ॥

इसके बाद देवों ने इन्द्र से कहा कि "हे इन्द्रदेव! इस विषय को जानकर ठीक तौर से जाँच- पड़ताल कीजिए कि यह दिव्य यक्ष कौन है " । ( उत्तर में इन्द्र ने कहा कि -— ) ठीक है और वह दौड़कर यक्ष की ओर गया । परन्तु वह दिव्य यक्ष उसके सामने से अन्तर्धान हो गया । स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमजगाम बहुशोभमानामुमा हैमवतीं ता होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥12 ॥

इति तृतीयः खण्डः ॥ वह इन्द्र उसी आकाशप्रदेश में ( यक्ष के ==स्थान पर ही ) अतिलावण्यवती, हिमालय की पुत्री देवी उमा के पास आ पहुँचा और उनसे आदरपूर्वक कहने लगा कि- " (हे देवी! ) यह दिव्य यक्ष कौन है? " अथ चतुर्थः खण्डः सा ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयध्वमिति । ततोहैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥1 ॥

तब उन भगवती उमादेवी ने स्पष्ट उत्तर दिया कि "वह तो परब्रह्म परमात्मा की ही इस विजय में तुम लोग अपनी विजय मानने लगे थे । उमा परमात्मा ही है और उस के इस कथन के द्वारा ही इन्द्र निश्चयपूर्वक जान गया कि ' यह ब्रह्म है । '

पृष्ठ 55

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 55 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थः खण्डः ] केनोपनिषत् ( 2 ) 13 तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥2 ॥

अग्नि, वायु और इन्द्र– इन तीन देवताओं ने ही इस निकटतम ब्रह्म का साक्षात्काररूप स्पर्श किया था और सर्वप्रथम उन्होंने ' यह ब्रह्म है' – ऐसा जाना था । इसलिए तो वे तीनों अन्य देवताओं से अधिक ऊँचे हुए हैं । तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥3 ॥

इसलिए तो इन्द्र अन्य देवताओं की अपेक्षा मानो अतिशय उच्चस्थानीय है, क्योंकि उसने इस अत्यन्त प्रिय और अतिनिकटस्थ परमात्मा का, उमादेवी से सर्वप्रथम सुनकर अपने मन से उसका स्पर्श ( अनुभव ) किया था और उसी ने तो अन्य देवताओं की अपेक्षा सर्वप्रथम इस ब्रह्म को अच्छी तरह से पहचाना था कि “ यह साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम है । " तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीन्यमीमिषदा३ इत्यधि- दैवतम् ॥4 ॥

उस ब्रह्म का यह सांकेतिक उपदेश है (उपासना के लिए आदेश है ) कि जो यह विद्युत् की चमकार जैसा है और जो आँख की पलक जैसा (निमिषमात्र जैसा) है, क्षणस्थायी है, वह ब्रह्म का अधिदैवत रूप है | अथाध्यात्मं यदेतद् गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्ण सङ्कल्पः ॥5 ॥

अब आध्यात्मिक उदाहरण दिया जा रहा है कि जो हमारा मन इस ब्रह्म के पास जाता हुआ -सा दिखाई देता है; और इस ब्रह्म का (वह) निरन्तर अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है; इस मन से ही संकल्प ( अर्थात् उस ब्रह्म की अनुभूति की उत्कट अभिलाषा) भी होता है । तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैन सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥6 ॥

वह परब्रह्म परमात्मा सब प्राणियों के लिए प्राप्तव्य होने से 'तद्वन' इस नाम से प्रसिद्ध हैं, इसलिए “वह ‘ तद्वन’ ( परमात्मा ) सभी प्राणियों का अभीष्ट विषय और सभी का परमप्रिय है " ।–इस भाव से उसकी उपासना करनी चाहिए और जो कोई भी साधक इस ब्रह्म को इस प्रकार की उपासना से जान लेता है, उसे सचमुच ही सभी प्राणी सर्वतः हृदयपूर्वक चाहते हैं । ( अर्थात् वह प्राणीमात्र का

प्रिय बन जाता है ) ।

उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता य उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदम- मेति ॥7 ॥

“हे गुरुदेव! ब्रह्म- सम्बन्धी रहस्यमयी विद्या का उपदेश कीजिए । ” –इस प्रकार शिष्य ने प्रार्थना की । तब गुरुदेव कहते हैं कि “तुम्हें हमने रहस्यमयी ब्रह्मविद्या बता दी है । तुम्हें हम लोगों ने निश्चयपूर्वक ब्रह्मविषयक रहस्यमयी विद्या बता ही दी है । इस तरह तुम्हें समझ लेना चाहिए ” ।

पृष्ठ 56

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 56 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

14 उपनिषत्सञ्चयनम् तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वांगानि सत्यमायतनम् ॥8 ॥

उस रहस्यमयी ब्रह्मविद्या के तप, समनस्क सर्वेन्द्रियसंयम और निष्काम कर्म– ये तीन आधार हैं तथा वेद उस विद्या के सभी अंग हैं । ( क्योंकि वेद में उसके सभी अंगों का वर्णन किया गया है । ) और सत्यस्वरूप परमात्मा उसका आयतन अर्थात् प्रातव्य है 1 यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमन्ते स्वर्गलोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥9 ॥

इति चतुर्थः खण्डः ।

इति केनोपनित्समाप्ता ॥

यदि कोई भी मनुष्य इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्या को पूर्वोक्तानुसार अच्छी तरह से जान लेता है, वह सर्व पापसमूह को नष्ट करके अविनाशी, असीम, सर्वश्रेष्ठ परमधाम में स्थित हो जाता है । सदा- सर्वदा के लिए स्थित हो जाता है । इस प्रकार केनोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

पृष्ठ 57

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 57 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

(3) कठोपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) कठोपनिषद् कृष्णयजुर्वेद के अन्तर्गत है । उस वेद की काठकसंहिता में शामिल होने से उसे काठकोपनिषद् भी कहते हैं । नचिकेता और यम की कथा तो बहुत पुरानी है । ऋग्वेद ( 10.135 ) में भी उसका उल्लेख है । तैत्तिरीय ब्राह्मण ( 3.1.8 ) इस कथा की रूपरेखा बताता है । इस उपनिषद् में वह कथा विस्तृत रूप में दी गई है । ऐसे तो सम्पूर्ण उपनिषद् यम और नचिकेता के संवाद के रूप में है । इस उपनिषद् में छः वल्लियाँ हैं और कुल मिलाकर 119 मंत्र हैं । पहली 29 मंत्रों वाली वल्ली में वाजश्रवस ( औदालकि आरुणि) विश्वजित् यज्ञ कर रहा था । यज्ञ के नियमानुसार उसको अपनी सारी सम्पत्ति का दान करना चाहिए । पर उसके बदले वह तो बूढ़ी, दूध नहीं देने वाली गायों का दान करने लगा! यह देखकर उसके तरुण पुत्र नचिकेता को अपने पिता के दुर्हेतु का ख्याल आया । पिता को ठीक तरह से सावधान करने के लिए नचिकेता ने पूछा कि वे उसका दान किसे करते हैं? बार- बार कहने पर पिता ने क्रोध से कह दिया कि “ तुम्हें मृत्यु ( यम ) को भेंट करता हूँ । ” ऐसा कहकर बाद में वह पश्चात्ताप करने लगा, पर नचिकेता तो यम के लोक में जा ही पहुँचा । वह पहुँचा तब यमराज अपने लोक में नहीं थे । यमराज की राह देखते हुए नचिकेता ने तीन दिन और तीन रात्रियाँ शान्ति से यमलोक में आतिथ्य - रहित होकर गुजारीं । घर पर वापस आए यमराज ने सब हाल सुनकर बड़े खेद का अनुभव किया । उन्होंने नचिकेता से तीन वरदान माँगने को कहा, ताकि नचिकेता को हुई असुविधा के लिए प्रतिदान के रूप में उसे कुछ दिया जा सके । यमराज से पहले वरदान के रूप में नचिकेता ने माँगा कि उसके पिता की मानसिक शान्ति हो । वे अपने पुत्र को पहचान लें और सन्तुलित मन से उसको ( नचिकेता को ) प्रेम करें । दूसरे वरदान से नचिकेता ने स्वर्ग में पहुँचाने वाली यज्ञविद्या माँगी । यमराज ने सम्पूर्ण यज्ञविद्या उसे सिखाई और बाद में उसकी समझदारी की परीक्षा भी ली । इससे खुश होकर नचिकेता को ऊपर से एक रत्नजड़ित माला भी भेंट कर दी और यज्ञाग्नि का नाम भी ‘नाचिकेताग्नि’ रख दिया । अन्तिम वरदान के रूप में नचिकेता ने यमराज से मृत्यु के बाद होने वाली मनुष्य की ( आत्मा की ) स्थिति का ज्ञान देने का वरदान माँगा । सूक्ष्मतम और दुर्ज्ञेय आत्मतत्त्व सम्बन्धी ज्ञान का वरदान देने से पहले यमराज ने नचिकेता को अन्यान्य भोगों के प्रलोभन देकर इस वरदान को छोड़ देने को कहा, पर नचिकेता अडिग रहा । तब यमराज ने आत्मज्ञान का उपदेश देना शुरू किया ।

पृष्ठ 58

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 58 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

16 उपनिषत्सञ्चयनम् दूसरी वल्ली में 25 मन्त्र हैं । इसमें श्रेय-प्रेय विवेक, अविद्यामग्नों की दुर्दशा, आत्मज्ञान की दुर्लभता, कर्मफल, ज्ञानफल, ॐ कार का उपदेश, आत्मस्वरूप आदि विषय संगृहीत हैं । तीसरी वल्ली में 17 मन्त्र हैं । इसमें विवेकी और अविवेकी का भेद, आत्मा की सूक्ष्म बुद्धिग्राह्यता, उद्बोधन, निर्विशेष आत्मतत्त्व, विज्ञान- महिमा आदि विषय संगृहीत किए गये हैं । चौथी वल्ली में 15 मंत्र हैं । इसमें आत्मज्ञ की सर्वज्ञता, निर्भयता, अशोकत्व आदि का निरूपण तथा भेदापवाद आदि विषय शामिल हैं । पाँचवीं वल्ली में भी 15 मन्त्र ही हैं । इसमें मरणोत्तर जीवन, आत्मा की प्रतिरूपता, असंगता आदि विषय समझाए गए हैं । छठी वल्ली में 18 मंत्र हैं और इसमें संसाररूप अश्वत्थवृक्ष का वर्णन किया गया है । इसमें अमरत्व की प्राप्ति, ईश्वर की सर्वशासकता, स्थानभेद से भगवद्दर्शन का तारतम्य, आत्मज्ञान का प्रकार और प्रयोजन आदि विषय चर्चित किए गए हैं । इन छः वल्लियों को दो अध्यायों में बाँटा गया है । प्रथम तीन वल्लियाँ पहले अध्याय की हैं और अन्तिम तीन वल्लियाँ दूसरे अध्याय की हैं । प्रधान दस उपनिषदों में कठोपनिषद् की गणना होती है और वर्तमान समय में भी यह उपनिषद् बहुत प्रेरक एवं उपादेय है । शान्तिपाठः

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ॥

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हे पूर्णब्रह्म परमात्मा! आप हम दोनों की (गुरु-शिष्य की ) साथ-ही -साथ रक्षा करें | हम दोनों का एक ही साथ पालन करें । हम दोनों साथ- ही -साथ शक्ति प्राप्त करें । हम दोनों द्वारा प्राप्त की गई विद्या तेजोमयी हो । हम दोनों आपस में द्वेष न करें । (हे परमात्मन्! आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक, त्रिविध तापों की ) शान्ति हो । अथ प्रथमोऽध्यायः प्रथमा वल्ली ॐ उशन्ह वैवाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥1 ॥

( ॐ सच्चिदानन्द परमात्मा का नाम-स्मरण करके उपनिषद् का प्रारम्भ होता है) यह बात तो सुविदित है कि यज्ञ का फल चाहनेवाले, वाजश्रवा के पुत्र (उद्दालक ) ने विश्वजित् यज्ञ में ( )संपत्ति ब्राह्मणों को दे दी । उसका नचिकेता नाम का एक प्रसिद्ध पुत्र था । अपनी सारी

पृष्ठ 59

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 59 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् (3 ) 17 तह कुमार सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥2 ॥

(जिस समय ब्राह्मणों को) दक्षिणा के रूप में देने के लिए गायें लाई जा रही थीं, उस समय छोटा बच्चा होने पर भी उस नचिकेता में श्रद्धा ( आस्तिक्य बुद्धि) का प्रवेश हुआ और वह उन बूढ़ी गायों को देखकर सोचने लगा ।

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।

अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥3 ॥

जो गायें ( जीवन का ) अन्तिम बार का पानी पी चुकी हैं, जो अन्तिम बार की ही घास खा चुकी हैं, जिन गायों का अन्तिम बार का ही दूध दुहा जा चुका है, जिन गायों की इन्द्रियों की शक्ति खत्म हो चुकी है, ऐसी ( निरुपयोगी मरणासन्न) गायों को देनेवाला वह दाता तो सर्वसुखरहित ( श्वान- शूकरादि निम्न योनियों और) नरक आदि लोकों को प्राप्त करता है । (इसलिए मुझे पिता को सावधान कर देना चाहिए । )

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।

द्वितीयं तृतीयं त होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥4 ॥

ऐसा विचार करके वह अपने पिता से कहने लगा- "हे पिताजी! आप मुझे किसको देंगे? ” (पिता से उत्तर न मिलने पर उसने यही बात ) पुन: दूसरी बार, तीसरी बार भी कही । तब पिता ने उससे क्रोधपूर्वक कहा कि– “ मैं तुझे मृत्यु ( यम ) को देता हूँ । ”

बहूनामेमि प्रथमो बहुनामेमि मध्यमः ।

कि स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥5 ॥

( पिता के इस प्रकार कहने पर नचिकेता एकान्त में अनुताप करता हुआ कहता है कि— ) “मैं बहुत से शिष्यों में तो प्रथम कक्षा के आचरण में आया हूँ और अनेक छात्रों में ( आचरण विषय में) मध्यम श्रेणी में चल रहा हूँ । ( मैंने कभी निम्न कोटि का आचरण तो किया नहीं है, तो फिर पिताजी ने ऐसा क्यों कहा? ” होगा? ) यमराज का ऐसा कौन- सा कार्य हो सकता है कि जो मेरे द्वारा करवाकर पिताजी पूर्ण करेंगे

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे ।

सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥6 ॥

(नचिकेता ने अपने पिता से कहा कि-) "हे पिता! पूर्वकाल में आपके पितामहमें भी )आदिअन्य पूर्वजश्रेष्ठ जिस प्रकार का आचरण करते आए हैं, उस पर विचार कीजिए डालिएऔर ( वर्तमानकाल। ( और उसके बाद आप अपने, ( लोग जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं उस पर भी जरा नजर है अर्थात् कर्तव्य के बारे में निर्णय कीजिएगा । ) यह मरणशील मानव अन्न की तरह पकायासे उगताजाता(जन्म लेता ) जराजीर्ण होकर घिस - पिसकर मर जाता है । ) और फिर अन्न की ही तरह फिर है ।

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।

तस्यैताः शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥7 ॥

के लिए उसे यमराज के (नचिकेता का वचन सुनकर पिता ने अपनी सत्यनिष्ठानचिकेतासाबितने तीनकरनेदिन और तीन रात तक राह ) “ पास भेजा । पर यमराज के वहाँ उपस्थित न होने से कहकर सलाह देते हुए कहा कि— हे देखी । यमराज के आने पर उनके सचिवों ने उन्हें सारी बात 2 उ० प्र०

पृष्ठ 60

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १, पृष्ठ 60 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

18 उपनिषत्सञ्चयनम् सूर्यपुत्र यमराज! अतिथि होकर ब्राह्मण अग्नि ( वैश्वानर) रूप से ही घर में प्रवेश करता है । सत्पुरुष ऐसे अतिथि की ( अर्घ्य, पाद्य, दान आदि) ऐसे प्रकार से शान्ति करते हैं । इसलिए (इस ब्राह्मण अतिथि की शान्ति के लिए ) जल आदि ले आइए । ”

आशाप्रतीक्षे सङ्गतः सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूश्श्च सर्वान् ।

एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥8 ॥

जिसके घर में ब्राह्मण अतिथि बिना खाए रहता है, वह उस अल्प बुद्धि मनुष्य के लिए आशा- प्रतीक्षा अर्थात् प्राप्य और ज्ञात पदार्थों की इच्छाएँ, उन विषयों के संयोगजन्य फल, प्रियवाणी का फल, -, -, - यज्ञ यागादि के फल कूप उद्यानादि आपूर्तों का फल पशु पुत्रादि-६- सब कुछ नष्ट कर देता है I

तिस्त्रो रात्रीर्यदवात्सीगृहे मेऽनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।

नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥१ ॥

( यमराज बोले- ) "हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे वन्दनीय अतिथि हैं । आपको नमस्कार हो । हे ब्राह्मण! मेरा कल्याण हो । आप जो तीन रात तक मेरे घर में बिना भोजन किए रहे हैं, इसलिए आप मुझसे प्रत्येक रात्रि के बदले में एक-एक करके तीन वरदान माँग लें । ”

शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभिमृत्यो ।

त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥10 ॥

( तब नचिकेता ने कहा कि— ) “हे मृत्युदेव! गौतमवंश में उत्पन्न हुए मेरे पिता उद्दालक मेरे प्रति शान्त संकल्पवाले, प्रसन्न चित्तवाले और क्रोध- खेद रहित हों और आपके द्वारा वापिस भेजा गया मैं जब उनके पास जाऊँ, तब वे मुझ पर विश्वास करके (' यह वही मेरा पुत्र नचिकेता है' ऐसा भाव रखकर) मेरे साथ वात्सल्यपूर्ण बातचीत करें, यह मैं मेरे तीन वरदानों में से प्रथम वरदान माँगता हूँ । ”

यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।

सुखरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥11 ॥

" मृत्युमुख से विमुक्त हुए तुमको देखकर मेरे द्वारा प्रेरित होकर, तुम्हारे पिता आरुणि ( अरुणपुत्र) उद्दालक पहले की ही भाँति (' यह मेरा पुत्र नचिकेता ही है' ऐसा ) विश्वास करके दुःख और क्रोध से रहित हो जाएँगे और वे अपने जीवन की शेष रात्रियों में सुखपूर्वक सोएँगे" – (ऐसा ) दिया । यमराज ने वरदान

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।

उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥12 ॥

( तब नचिकेता ने कहा कि— ) “हे यमराज! स्वर्गलोक में जरा-सा भी भय नहीं ( ) मृत्युरूप आप स्वयं भी नहीं हैं में रहनेवाला मनुष्य भूख और प्यास । आपका- दोनोंप्रभुत्वको पारनहीं करकेहै वहाँ, शोकवृद्धत्वको सेलाँघकरकोई डरताआनन्दनहींप्राप्तहै । स्वर्गलोकहै । यहाँ

मह्यम् । स त्वमग्निः स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तः श्रद्दधानाय करता है ।

स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥13 ॥

हे मृत्युदेव । आप तो स्वर्ग के साधनरूप अग्नि को जानते आप उस अग्निविद्या को अच्छी तरह समझाकर बताइए । स्वर्ग ही हैं । इसलिए मुझ श्रद्धावान् को करते हैं । इसलिए दूसरे वरदान के रूप में मैं यह वरदान माँगतामेंहूँरहनेवाले। ” लोग अमरत्व को प्राप्त