Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 61–70
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 61–70
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प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 19
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥14 ॥
“हे नचिकेता! स्वर्ग प्राप्त करानेवाली अग्निविद्या को अच्छी तरह से जाननेवाला मैं तुम्हें अच्छी तरह से कह देता हूँ । उसे तुम मुझसे भलीभाँति समझ लो । तुम इस अग्निविद्या को अविनाशी लोकों को प्राप्त करानेवाली और जगत् का आधाररूप एवं बुद्धिरूपी गुफा में छिपी हुई जानो । ” — ऐसा यमराज ने कहा ।
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥15 ॥
इसलिए इसके बाद यमराज ने स्वर्गादि लोकों के आदिकारणरूप अग्निविद्या का उस नचिकेता को उपदेश दिया । उसमें कुण्ड आदि बनाने के लिए जितने कद की और जितनी संख्या में ईंटें जरूरी होती हैं तथा उनका चयन कैसे किया जाता है और किस प्रकार उनको व्यवस्थापित किया जाता है इत्यादि बातें भी बताईं । तब नचिकेता ने भी वह उपदेश जैसा सुना था, ठीक उसी तरह समझदारीपूर्वक उसी प्रकार से यमराज को कह दिखाया । उसके बाद यमराज उस पर सन्तुष्ट होकर फिर से उसको कहने लगे ।
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः सृकां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥16 ॥
(नचिकेता की अद्भुत बुद्धि को देखकर- ) प्रसन्न हुए महात्मा यमराज नचिकेता से कहने लगे— “ अब मैं यहाँ तुम्हें फिर से एक वर और ज्यादा यह देता हूँ कि यह अग्निविद्या तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी और इसके साथ ही तुम इस अनेक स्वरूपवाली रत्नमाला को स्वीकार करो । ”
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धि त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमाः शान्तिमत्यन्तमेति ॥17 ॥
शास्त्रोक्त रीति से इस अग्नि का तीन बार अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ऋक् - यजुष् - साम— इन तीनों के साथ सम्बन्ध जोड़कर, यज्ञ-दान- तप– इन तीनों कर्मों को निष्काम भाव से करता हुआ जन्म और मृत्यु का अतिक्रमण कर लेता है । ब्रह्मा की उत्पन्न की गई समग्र सृष्टि को जानने वाले इस स्तुतियोग्य अग्निदेव को जानकर और उसका निष्कामभाव से अनुष्ठान करके मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त करता है ।
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेर्ताद्वादेत्वा य एवंविद्वाश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥18 ॥
ईंटों का स्वरूप, संख्या और अग्निचयनविधि - इन तीनों बातों को जानकर, ' नाचिकेत' नाम की अग्निविद्या का तीन बार अनुष्ठान करनेवाला कोई भी मनुष्य इस प्रकार जानता हुआ इस नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह मनुष्य मृत्यु के फासले को अपने आगे ही (इस मनुष्य शरीर में ही) काटकर, शोक का अतिक्रमण करके स्वर्गलोक में आनन्द का अनुभव करता है ।
एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥19 ॥
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20 उपनिषत्सञ्चयनम् ( यमराज नचिकेता से कहते हैं कि--) “ हे नचिकेता! तुम्हें बताई गई यह स्वर्ग प्राप्त कराने वाली अग्निविद्या है, जिसे तुमने दूसरे वरदान के रूप में माँगा था । लोग इस अग्नि को अब से ( भविष्य में) तुम्हारे ही नाम से कहा करेंगे । हे नचिकेता! अब तुम तीसरा वरदान माँग लो ” ।
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥20 ॥
( तब तीसरा वरदान माँगते हुए नचिकेता कहता है कि— ) " मरे हुए मनुष्य के विषय में यह जो संशय है कि कुछ लोग इस विषय में ऐसा कहते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व रहता है और कुछ लोग कहते हैं कि मरणोपरान्त आत्मा का अस्तित्व रहता ही नहीं है । आपके द्वारा उपदेश पाकर मैं इसके विषय में अच्छी तरह समझ लूँ— यह मेरा तीन वरदानों में से तीसरा वरदान है । "
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥21 ॥
( तब यमराज ने कहा कि— ) "हे नचिकेता! इस विषय में पूर्वकाल में देवों ने भी संदेह किया था । ( पर वे भी समझ नहीं पाए थे ) क्योंकि यह विषय बड़ा ही सूक्ष्म है और इसलिए यह सरलता से समझाया नहीं जा सकता । इसलिए कोई दूसरा वरदान माँग लो । इसी को देने के लिए मुझ पर दबाव मत डालो । यह आत्मज्ञान सम्बन्धी वरदान मुझे वापिस लौटा दो । ”
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ ।
वक्ताऽस्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥22 ॥
( तब नचिकेता ने यमराज से कहा कि— ) "हे यमराज! आपने जो यह कहा कि देवों ने भी इस विषय पर विचार किया था ( परन्तु वे भी निर्णय नहीं कर पाए थे ) और यह विषय सरलता से जाना जा सके, ऐसा भी नहीं है । इतना ही नहीं, पर ऐसे विषय को समझानेवाला आपके सिवाय तो कोई मिलनेवाला भी नहीं है । ( अत: मेरी समझ में तो यही आता है कि— ) इसके सिवा कोई अच्छा वरदान है ही नहीं । "
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्यशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥23 ॥
( तब यमराज ने नचिकेता को प्रलोभन देते हुए कहा कि— ) “हे नचिकेता! तुम सौ आयुवाले पुत्र- पौत्रादि को और बहुत- से पशुओं को, हाथियों को, सोने को और घोड़ों को भी माँगवर्षों की भूमण्डल के बड़े विस्तृत साम्राज्य को भी माँग लो । तुम स्वयं भी जितने वर्ष चाहो, उतने लोवर्ष। जिओ" ।
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वां कामभाजं करोमि ॥24 ॥
हे नचिकेता! धन, सम्पत्ति एवं चिरकालपर्यन्त रहनेवाली आत्मज्ञानविषयक वरदान के तुल्य मानते हो, तो इसे माँग लो और आजीविका को तुम यदि इस बन जाओ । मैं तुम्हें सभी उत्तमोत्तम भोगों को भोगनेवाला बना दूँगातुम। इस पृथ्वीलोक में बड़े सम्राट् ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाःश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
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21 17प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 )
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥25 ॥
इस मनुष्यलोक में जो- जो भोग दुर्लभ हैं, उन सभी प्रकार के भोगों को अपनी इच्छानुसार माँग लो । रथों और विविध प्रकार के वाद्यों के साथ इन स्वर्ग की अप्सराओं को अपने साथ ले जाओ । मनुष्यों को ऐसी स्त्रियाँ कभी मिल नहीं सकतीं । मेरे द्वारा दी गई इन स्त्रियों के द्वारा तुम अपनी सेवा करवाओ । परन्तु हे नचिकेता! मरणोत्तर आत्मा की स्थिति के विषय में मुझसे मत पूछो । ”
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीते ॥26 ॥
यमराज के पूर्वोक्त प्रलोभन में न आते हुए नचिकेता ने कहा– “हे यमराज! आपके द्वारा वर्णित_ ये क्षणभंगुर भोग और उनसे प्राप्त किया जानेवाला सुख तो मनुष्य के अन्तःकरण सहित इन्द्रियों का जो तेज है, उसे क्षीण कर देते हैं । तदुपरान्त यह आयु चाहे कितनी भी लम्बी क्यों न हो, पर वास्तव में तो स्वल्प ही है । इसलिए आपके ये रथ आदि वाहन और अप्सराओं के ये नाच - गान आपके पास ही रहने दीजिए । ( मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं है । )
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥27 ॥
मनुष्य को धन से कभी भी तृप्त नहीं किया जा सकता । जब हमने आपके दर्शन कर ही लिये हैं, तब धन को हम ऐसे ही प्राप्त कर लेंगे और जहाँ तक आप शासन करते रहेंगे, वहाँ तक तो हम ऐसे ही आवश्यक रूप से जिएँगे ही । इसलिए उन सबको माँगने का प्रयोजन ही क्या है? इसलिए मेरे लिए माँगने लायक वरदान तो वही (आत्मज्ञान ही ) है ।
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥28 ॥
“ यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और मरणधर्मा है ।” —इस बात को अच्छी तरह जाननेवाला मानवलोक का कौन निवासी ऐसा होगा जो आपके जैसे जरारहित और अमर आत्माओं का सहवास पाकर भी स्त्रियों के सौन्दर्य, क्रीडा और आमोद- प्रमोद का बार- बारचिन्तन करके अतिदीर्घकाल तक भी जीवित रहने में आनन्द मानेगा?
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥29 ॥
इति प्रथमेऽध्याये प्रथमा वल्ली । हे यमराज! जिस महान् आश्चर्यमय पारलौकिक आत्मज्ञान के विषय में मनुष्य लोग ऐसीजो निर्णयशंका करते हैं कि मृत्यु होने के बाद यह आत्मा रहता है या नहीं? तो इसके विषय वरदानमें आपकानचिकेता नहीं हो, वह मुझे कहिए । मेरा जो यह गंभीर वरदान है, इससे अलग अन्य कोई माँगता ॥ इस प्रकार कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय की प्रथम वल्ली समाप्त हुई
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2222 उपनिषत्सञ्चयनम् द्वितीया वल्ली
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषसिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥1 ॥
कल्याणकारिणी विद्या ( श्रेय) अलग ही है और प्रिय लगनेवाले भोगों का साधन ( प्रेय) भी अलग ही है । अलग- अलग फल देनेवाले होने पर भी ये दोनों साधन मनुष्य को अपनी- अपनी ओर आकर्षित करते हैं ( मनुष्य को बाँधते हैं ) । इन दोनों में से श्रेय के ( कल्याण के ) साधन को ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है, पर जो प्रेय को ( सांसारिक उन्नति के साधन को ) ग्रहण करते हैं, वे पारमार्थिक सुख से वंचित रह जाते हैं ।
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥2 ॥
श्रेय और प्रेय — ये दोनों मनुष्य के आगे आते हैं । बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों के ऊपर ठीक तरह से सोचकर उन्हें अलग- अलग से जान लेता है और वह धीर ( बुद्धिवाला) मनुष्य प्रेयस् ( भोगसाधन ) की अपेक्षा श्रेयस् ( परम कल्याण के साधन ) को ही श्रेष्ठ मानकर प्रसन्न होता है, जब कि भन्दबुद्धिवाला मनुष्य लौकिक योगक्षेम की कामना से प्रेय को ( भोग साधन को) अपनाता है ।
स त्वं प्रियान्प्रियरूपाश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥3 ॥
हे नचिकेता! इन मनुष्यों में तुम एक ऐसे नि: स्पृह हो कि जिसने अत्यन्त सुन्दर ऐसे इहलोक और परलोक के सभी भोगों को छोड़ दिया! इस सम्पत्तिरूप शृंखला को तोड़कर तुमने इसे! ( ) - नहीं तुम बन्धन में नहीं फँसे जिसमें बहुत से आदमी फँस जाते हैं । अपनाया
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्तः॥4 ॥
‘विद्या’ और ‘ अविद्या’ के नाम से प्रसिद्ध ये दोनों ( श्रेय और प्रेय) परस्पर अत्यन्त विपरीत और - भिन्न भिन्न फल देने वाली हैं । तुम नचिकेता को मैं विद्या का अभिलाषी मानता से, भोग तुमको प्रलोभित नहीं कर सके हैं । हूँ क्योंकि बहुत
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥5 ॥
अविद्या में रहने पर भी अपने को पण्डित और बुद्धिमान् योनियों में बार- बार भटक कर, अन्धों से प्रेरित ( अवलम्बित माननेवाले भोगेच्छु मूढ़ मानव विविध ) - भटकते रहते हैं । होकर अन्धों की ही तरह इधर उधर
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेनमूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यतेमे ॥6 ॥
इस तरह सम्पत्ति के मोह से मूढ़ बने हुए और ही नहीं देता । ( वह तो ऐसा ही समझता है कि— )सदैवयह प्रमादप्रत्यक्ष करते हुए अज्ञानी को परलोक दिखाई दिखाई देनेवाला लोक ही सत्य है,
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23प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) इसके सिवाय स्वर्ग- नरक आदि कुछ है ही नहीं । ऐसा माननेवाला अभिमानी मनुष्य बार- बार मेरे ( यमराज के ) वश में आ जाता है ।
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विदुः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥7 ॥
जो आत्मतत्त्व बहुत- से लोगों को तो सुनने के लिए भी नहीं मिल पाता; जिस आत्मतत्त्व को बहुत- से लोग सुनकर भी नहीं समझ पाते हैं; इस गूढ आत्मतत्त्व का वर्णन करनेवाला आश्चर्यमयं ( बहुत दुर्लभ ) ही है और उसे प्राप्त करनेवाला अत्यंत कुशल (निपुण ) पुरुष भी दुर्लभ ही है । जिसको कुशल आचार्य ने उपदेश दिया है और जिसने आत्मतत्त्व जान लिया है, वह तो अतिदुर्लभ है ।
न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥8 ॥
अल्पज्ञ मनुष्य के द्वार। कहे जाने पर और उसी परिधि में ही बहुत चिन्तन किए जाने पर भी यह आत्मतत्त्व सरलता ( सहजता) से समझा नहीं जा सकता । यदि किसी ज्ञानी पुरुष द्वारा उपदेश न किया जाए तो इस विषय में मनुष्य का प्रवेश नहीं हो सकता । क्योंकि यह आत्मतत्त्व तो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है । इसलिए तर्क से अतीत है । ( अर्थात् इसके विषय में तर्क भी नहीं किया जा सकता । )
नैषा तर्केण मतिरापणीया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥१ ॥
हे प्रियतम! ( नचिकेता! ) तुमने जो यह बुद्धि प्राप्त की है, वह तर्क के द्वारा नहीं प्राप्त की जा सकती । यह बुद्धि तो अन्य शास्त्रज्ञ आचार्य के द्वारा कही जाए तभी आत्मज्ञान के लिए उपयोगी होती है । सचमुच तुम बड़े ही धैर्यशाली पुरुष हो । हे नचिकेता! हम चाहते हैं कि तुम्हारे जैसा प्राश्निक हमें मिले ।
जानाम्यह शेवधिरित्यनित्यं न ह्यधुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
•ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥10 ॥
मैं जानता हूँ कि कर्मफलों का खजाना अनित्य ही है । क्योंकि अनित्य ( विनाशी ) वस्तुओंपदार्थों केसे परमात्मस्वरूप यह नित्य वस्तु प्राप्त नहीं हो सकती । इसलिए मैंने कर्तव्यबुद्धि से अनित्यइस सापेक्ष नित्य द्वारा ‘ नचिकेत' नाम की अग्नि का चयन किया है । इन्हीं अनित्य पदार्थों से मैं ( यमराजपद ) को प्राप्त कर सका हूँ । कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् । ॥11 ॥ स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः
हे नचिकेता! जो सभी प्रकार के भोगों की चरमसीमा है, जो जगत् का आधार है, महत्त्वपूर्णजो यज्ञ काहै चिरस्थायी फल है, जो निर्भयता का अन्तिम छोर है, जो स्तुति करने योग्य है और जो तथा जिसके गुणानुवाद वेदों में तरह- तरह से•गाए गए हैं, जो लम्बे समयमानतातक स्थायीहूँ कि हैतुम-बहुतऐसे स्वर्गलोक को देखकर भी तुमने धैर्यपूर्वक उसका त्याग कर दिया! इसलिए मैं ही बुद्धिमान् हो ।
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24 उपनिषत्सञ्चयनम्
तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥12 ॥
योगमाया के पर्दे में छिपे हुए, सर्वव्यापी, सभी की हृदयरूपी गुहा में स्थित ( और इसलिए ) संसाररूपी गहन वन में बसनेवाले, सनातन, कदाचित् ही दिखाई देनेवाले उस परमात्मदेव को विशुद्ध बुद्धिवाला साधक अध्यात्मयोग की प्राप्ति के द्वारा जान-पहचान कर हर्ष और शोक को छोड़ देता है ।
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयः हि लब्ध्वा विवृतः सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥13 ॥
मरणशील मनुष्य जब इस धर्ममय उपदेश को सुनकर, उसे अच्छी तरह ग्रहण कर, ( और ) उसके ऊपर विवेकपूर्वक विचार करके, इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को जानकर जब उसका अनुभव कर लेता है तब वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्राप्त करके आनन्द में ही मग्न हो जाता है । तुम नचिकेता के लिए तो मैं, उस परमधाम के द्वार खुले ही हैं, ऐसा मानता हूँ । "
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् पश्यसि तद्वद ॥14 ॥
( यमराज के वचन सुनकर नचिकेता ने कहा कि यदि मैं मोक्षयोग्य होऊँ और यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों तो— ) आप जिस परमात्मा को धर्म से अतीत, अधर्म से भी अतीत तथा कारण और कार्यरूप इस जगत् से भी अतीत ( परे) अतिक्रान्त तथा भूतकाल एवं भविष्यकाल से भी अतिक्रान्त मानते हैं, उस परमात्मा के विषय में कहिए । ”
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदः संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥15 ॥
( नचिकेता के ऐसा पूछने पर यमराज ने कहा कि— ) "सभी वेद जिस परमतत्त्व प्रतिपादन करते हैं, सभी तप भी जिस पद को अपना लक्ष्य मानते हैं, जिसको चाहनेवालेका बार- बार, ' ' ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं वह पद मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ । वह ओम् साधकगण है । इस प्रकार का एक अक्षर
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥16 ॥
( अत:) यह ( एक ) अक्षर ही ( अपर) ब्रह्म है । यह एक अक्षर ही ( पर ), जानकर जो मनुष्य जैसी इच्छा करता है उसे वह मिल ही जाता है । ब्रह्म है । इस अक्षर को
एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥17 ॥
( ऐसा है इसलिए— ) यह ॐकार ही परब्रह्म की से श्रेष्ठ आधार है और यही सभी का अन्तिम आश्रय प्राप्ति के लिए ( अन्य ) सभी प्रकार के आधारों ऐसा अच्छी तरह से जानकर जो साधक श्रद्धा औरहैप्रेम। ' इससेसे बड़ा कोई भी आलम्बन नहीं है'.,परमात्मप्राप्ति का गौरव प्राप्त करता है । उसका आश्रय लेता है वह सचमुच
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प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 2525
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥18 ॥
यह ज्ञानस्वरूप आत्मा जन्मता नहीं और मरता भी नहीं है । यह आत्मा किसी और पदार्थ से उत्पन्न नहीं होता और इस आत्मा से भी कोई पदार्थ उत्पन्न नहीं होता । ( तात्पर्य यह कि यह आत्मा किसी का कार्य भी नहीं है और कारण भी नहीं है । ) यह आत्मा अजन्मा, नित्य, सदा एकसमान रहनेवाला और पुरातन (क्षय- वृद्धिहीन ) है । शरीर का नाश होने पर भी इसका नाश नहीं किया जा सकता ।
हन्ता चेन्मन्यते हन्तु हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायः हन्ति न हन्यते ॥19 ॥
यदि कोई मारनेवाला व्यक्ति आत्मा को मारने में अपने को समर्थ माने अथवा यदि कोई मरनेवाला आदमी अपने आत्मा को मरा हुआ माने, वे दोनों आत्मा के सही स्वरूप को नहीं जानते । क्योंकि यह आत्मा किसी को मारता भी नहीं और किसी के द्वारा मारा भी नहीं जा सकता ।
अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥20 ॥
इस जीवात्मा की हृदयरूपी गुफा में रहनेवाला परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान् से भी महान्है । परमात्मा की उस महिमा को कामनारहित और चिन्तारहित कोई विरल साधक ही सर्वाधार परमात्मा की कृपा से ही देख पाता है ।
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥21 ॥
वह परमात्मा बैठा हुआ भी दूर तक पहुँच जाता है । सोया हुआ भी चारों ओर चलता रहता है । ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त न होनेवाले उस देव को मेरे सिवा दूसरा भला कौन जान सकने में समर्थ है?
अशरीर शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥22 ॥
जो परमात्मा अस्थिर ( विनाशशील) शरीरों में शरीररहित परन्तु अचल भाव से स्थित हैकरता, उस। महान् सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान् पुरुष कभी भी किसी भी कारण से शोक नहीं
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू स्वाम् ॥23 ॥
है एवं धारणाशक्ति से ( ) ) यह परब्रह्म परमात्मा वेदाध्ययन प्रवचन से प्राप्त करने योग्य नहीं का वरण अथवा बहुत शास्त्रों के श्रवण से भी प्राप्त करने योग्य नहीं है । यह ( साधकहै और) ऐसेजिससाधक( आत्माके प्रति ( ही ) करता है अर्थात् स्वीकार करता है, उसी के द्वारा प्राप्त करने के योग्य परमात्मा अपने स्वरूप को प्रकट करता है ।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥24 ॥
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26 उपनिषत्सञ्चयनम् दुराचरण से निवृत्त हुए बिना, सूक्ष्म बुद्धि होने पर भी वह ( परमात्मा) प्राप्त नहीं किया जा सकता । जो मनुष्य अशान्त है, जो मन और इन्द्रियों को अपने वश में नहीं रख सकता है, जिसका मन शान्त नहीं है, ऐसा मनुष्य भी परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता ।
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥25 ॥
इति प्रथमेऽध्याये द्वितीया वल्ली । संहारकाल में जिस परमात्मा के ब्राह्मण और क्षत्रिय - ये दोनों ( अर्थात् प्राणीमात्र ) खाद्यान्न बन जाते हैं और सर्वसंहारक मृत्यु जिसका उपसेचन ( व्यंजन - तरकारी आदि) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, उसे ठीक तरह से भला कौन जान सकता है? इस प्रकार कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय की दूसरी वल्ली समाप्त हुई । * तृतीया वल्ली
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ 1 ॥
शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में स्थित परब्रह्म के उत्तम निवासस्थान ऐसे हृदयाकाश में अर्थात् बुद्धिरूपी गुफा में छिपे हुए और सत्य का पान करनेवाले दो तत्त्व हैं । वे दोनों छाया और आतप ( धूप ) की भाँति भिन्न हैं- ऐसा ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी महापुरुष कहते हैं । और यही बात तीन बार ‘ नाचिकेत’ अग्नि का चयन करने वाले एवं पञ्चाग्नि की उपासना करनेवाले गृहस्थ भी तो कहते हैं ।
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतः शकेमहि ॥2 ॥
अग्नि कोजो औरयज्ञ करनेवालोंसंसार- समुद्रके कोलिएपारदुःखसागरकरने की काइच्छावालोंअतिक्रमणके लिएकरने जोके भयरहितलिए सेतुरूप है, उस 'नाचिकेत ’ है, उस अविनाशी परब्रह्म परमात्मा को जानने में (प्राप्त करने में ) हम समर्थ पदहैं । है और परम आश्रय
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीर रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रगहमेव च ॥3 ॥
हे नचिकेता! तुम जीवात्मा को रथ का मालिक (रथ में बैठकर जानेवाला | ) ही रथ मानो बुद्धि को सारथी जानो और मन को लगाम समझो । जानो और शरीर को
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥4 ॥
ज्ञानी लोग इस रूपक में इन्द्रियों को अश्व कहते हैं और शब्द के लिए चलने का मार्ग कहते हैं तथा शरीर -मन- इन्द्रियों से युक्त -आत्मास्पर्श-रूपादिको 'भोक्ताविषयों को उन अश्वों ' कहते हैं ।
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प्रथमोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 27
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥5 ॥
जो मनुष्य सदैव विवेकहीन बुद्धिवाला और अयुक्त चंचल मन वाला होता है, उसकी असावधान सारथि के दुष्ट अश्वों की तरह वश में रहनेवाली नहीं होतीं । इन्द्रियाँ
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥6 ॥
परन्तु जो मनुष्य सदा विवेकसम्पन्न और मनोजयी होता है, उसकी इन्द्रियाँ सावधान सारथि के उत्तम अश्वों की तरह वश में रहती हैं ।
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति सःसारं चाधिगच्छति ॥7 ॥
परन्तु जो मनुष्य सदा विवेकहीन बुद्धिवाला, असंयमी चित्तवाला और अपवित्र रहता है, वह उस परमपद को प्राप्त नहीं कर सकता । परन्तु बार-बार जन्म- मरणरूप संसारचक्र में ही भटकता रहता है ।
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥8 ॥
परन्तु जो मनुष्य सर्वदा विवेकशील बुद्धि से युक्त, संयत चित्तवाला और पवित्र रहता है, वह तो उस परमपद को प्राप्त कर ही लेता है जिससे वह फिर से जन्म ग्रहण नहीं करता ।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१ ॥
जो कोई भी मनुष्य यदि विवेकशील बुद्धिरूपी सारथि से युक्त होता है और जो अपने मन को वश में रखता है, तो वह संसारमार्ग को पार करके उस व्यापक परमात्मा (विष्णु ) के पद को प्राप्त करता है ।
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥10 ॥
क्योंकि इन्द्रियों की अपेक्षा शब्दादि विषय बलवान् हैं, शब्दादि विषयों की अपेक्षा मन बलवान् है, मन की अपेक्षा बुद्धि बलवती है और बुद्धि की अपेक्षा महान् आत्मा ( महत्तत्त्व) बलवान् है । (महत्तत्त्व बलवत्तम है ) । ( अथवा बुद्धि की अपेक्षा जीवात्मा बलवान है -- ऐसा अर्थ भी लिया जा सकता है । )
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥11 ॥
महत्तत्त्व की ( अथवा जीवात्मा की ) अपेक्षा अव्यक्त (मूल प्रकृति या ईश्वर की माया ) बलवती है और उस अव्यक्त से ( मूल प्रकृति या माया से) पुरुष ( परमेश्वर) श्रेष्ठ है । पुरुष (परमात्मा) से अधिक श्रेष्ठ कुछ भी नही है । वह सबकी पराकाष्ठा है, वही परम गति है ।
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥12 ॥
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28 उपनिषत्सञ्चयनम् इस समस्त जगत् का आत्मरूप यह परमपुरुष सभी प्राणियों में रहता हुआ भी माया के आवरण में छिपा होने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता । केवल सूक्ष्मतत्त्व को समझनेवाले लोगों के द्वारा ही अति सूक्ष्म ( तीक्ष्ण ) बुद्धि से देखा जा सकता है ।
यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥13 ॥
बुद्धिमान् साधक को पहले वाणी आदि सभी इन्द्रियों का मन में निरोध करना चाहिए । फिर उस मन का ज्ञानस्वरूप बुद्धि में विलीनीकरण करना चाहिए; बुद्धि का महत्तत्त्व में लय कर देना चाहिए और महत्तत्त्व का शान्तस्वरूप परमपुरुष में लय कर देना चाहिए ।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥14 ॥
( ओ मनुष्यो! ) उठो, जागो ( सावधान बन जाओ और— ) श्रेष्ठ महापुरुषों से मिलकर उनके द्वारा परब्रह्म परमेश को जान लो । क्योंकि त्रिकालज्ञ तत्त्वज्ञानी लोग इस तत्त्वज्ञान के मार्ग को छुरे की तीक्ष्ण धार के समान दुस्तर कहते हैं ।
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥15 ॥
जो परमतत्त्व शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है और जो अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (अन्तरहित) और महत्तत्त्व से ( अथवा जीवात्मा से ) भी उच्चतर है, जो सर्वथा सत्यस्वरूप उस परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से सदा के लिए मुक्त हो जाता है ।
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तः सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥16 ॥
यमराज के द्वारा कहे गए और नचिकेता के द्वारा सुने गए इस सनातन आख्यान को कहकर ( ) सुनकर बुद्धिमान् मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमान्वित होता है प्रतिष्ठित होता है । और य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥ तदानन्त्याय कल्पत इति ॥17 ॥
इति प्रथमेऽध्याये तृतीया वल्ली ।
इति प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥1 ॥
जो मनुष्य सर्वथा शुद्ध होकर इस परम गुह्य (रहस्यमय है अथवा श्राद्ध के समय में भोजन करनेवाले लोगों को सुनाता ) प्रसंग को ब्राह्मणों की सभा में सुनाता और असीम फल देने में समर्थ होता है, अनन्त फलवाला होताहै, उसका वह सुनाने का कर्म अविनाशी है । इस प्रकार कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय में तीसरी वल्ली समाप्तहुई ।