Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 71–80
उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 71–80
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द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 2922 अथ द्वितीयोऽध्यायः चतुर्थी वल्ली पराञ्चि खानि व्यतॄणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति
कश्चिद्धीरः प्रत्यंगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्नान्तरात्मन् ।
॥1 ॥
स्वयंभू ( स्वयं ही प्रकट होनेवाले) परमेश्वर ने सभी इन्द्रियाँ बाहर की क्षीण ( मर्यादित ) कर दी हैं । इसलिए मनुष्य इन्द्रियों से बहुधा बाहर की वस्तुओंओरकोजानेवाली बनाकर किन्तु अन्तरात्मा को नहीं देख पाता । जिस मनुष्य ने अमरत्व की इच्छा करके अपनीही देख पाता है, बाह्य विषयों की ओर से खींचकर भीतर संयमित रखा है, वही दुर्लभ मनुष्य प्रत्यगात्माइन्द्रियों को I सकता है को देख
पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥2 ॥
परन्तु जो मूर्ख मनुष्य बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं (उन भोगों में ही रममाण रहते हैं ), वे तो चारों ओर फैले हुए मृत्यु के पाश में (बन्धन में ) फँस जाते हैं । परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य अमृतत्व निश्चल मानकर संसार के अनित्य पदार्थों में से किसी भी पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करतेको।
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥3 ॥
जिसके अनुग्रह से मनुष्य शब्दों को, स्पर्शों को, रूपसमुदाय को, रससमुदाय को, गन्धसमुदाय को और मैथुन ( स्त्रीसंग ) आदि सुखों का अनुभव करता है; और उसी के अनुग्रह से इन सबके होते हुए यहाँ बाकी क्या रह जाता है (जो उनसे बाकी अर्थात् शेष रहता है ) वही यह तत्त्व ब्रह्म है (जिसे तुम नचिकेता ने पूछा था । )
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥4 ॥
स्वप्नावस्था के दृश्यों और जागरितावस्था के दृश्यों ( दोनों अवस्थाओं के दृश्यों) को मनुष्य जिसके कारण देखता है, उस सर्वश्रेष्ठ, सर्वव्यापी सर्वात्मा को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोक नहीं करता ।
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥5 ॥
जो मनुष्य इस कर्मफलभोक्ता जीवरूप आत्मा को ही भूतकाल और भविष्यत्काल के शासक के रूप में ( परमेश्वर के रूप में ) जानता है, फिर वह उस आत्मा की रक्षा करने की इच्छा नहीं करता । वही यह आत्मतत्त्व है ।
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥6 ॥
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30 उपनिषत्सञ्चयनम् सबसे पहले जल में से जो तप के द्वारा हिरण्यगर्भ के रूप में प्रकट हुआ था, उसी को मुमुक्षु बुद्धिरूपी गुहा में सर्वभूतों के साथ प्रविष्ट हुआ देखता है, वही ब्रह्म है । वही यह है ।
या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥7 ॥
और भी, जो देवतामयी अदिति प्राणरूप से प्रकट होती है, जो प्राणियों के साथ उत्पन्न हुई है और हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वहाँ रहती है, उसे उस रूप में पुरुष जो देखता है, वही ब्रह्म है अर्थात् वही यह है |
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥8 ॥
और भी, जो सर्वज्ञ अग्निदेव गर्भिणी स्त्रियों द्वारा सुयोग्य खान- पान के द्वारा पोषित गर्भ की तरह दो अरणियों में सुरक्षित रहता है तथा सावधान एवं होमसामग्रीयुक्त पुरुषों द्वारा प्रतिदिन स्तुतियोग्य है, यही वह ब्रह्म है । ( यहाँ अरणीस्थ अग्नि में ब्रह्मदृष्टि बताई है । )
यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥9 ॥
( और भी प्राण में ब्रह्मदृष्टि बताते हैं कि ) जहाँ से सूर्य उदित होता है और जहाँ अस्त होता है, जिस प्राणात्मा में ( अग्नि आदि और जल आदि ) सभी देव रहते हैं उस परमेश्वर को कोई भी कभी भी अतिक्रान्त नहीं कर सकता, यही वह ब्रह्म है ।
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥10 ॥
जो परमतत्त्व यहाँ ( देहेन्द्रिय संधान में) भासित होता है, वही अन्यत्र (देहादि संघात के परे ) भी है और जो अन्यत्र है, वही यहाँ भी है । जो मनुष्य इस तत्त्व में नानात्व ( विभिन्नता ) देखता है, वह एक मृत्यु से दूसरे मृत्यु को अर्थात् बार- बार जन्म और मरण को प्राप्त हुआ करता है ।
मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥11 ॥
शुद्ध मन से ही यह परमात्मतत्त्व प्राप्त किया जा सकता है । इस जगत् में केवल एक परमात्मा के सिवा भिन्न-भिन्न भाव कोई भी नहीं है । इसलिए इस जगत् में जो कोई भी अनेक की तरह देखता है, वह मनुष्य बार- बार जन्मता है और बार- बार मृत्यु को प्राप्त होता है ।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥12 ॥
अँगूठे के परिमाण वाला पुरुष ( परमात्मा - परमपुरुष ) शरीर के मध्य भाग में (हृदयाकाश स्थित है । जो भूत, भावि ( और वर्तमान ) का ईश्वर है । उसे जान लेने के बाद मनुष्य किसी की में ) ( )निन्दा नहीं करता । यहीं वह तत्त्व है । जिसके विषय में तुमने पूछा था । भी
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥13 ॥
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द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 31 अंगुष्ठ के - से परिमाण वाला परमपुरुष परमात्मा धूमरहित, ( ) और भविष्य पर शासन करनेवाला वही परमात्मा आज भी ज्योति की तरह है । भूत वर्तमान में रहता है) । वह सनातन है, वही ब्रह्मतत्त्व यह है ( जो तुमनेहै और कल भी रहेगा ( अर्थात् तीनों काल पूछा था ) ।
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान्पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥14 ॥
जिस प्रकार ऊँचे शिखर पर बरसा हुआ पानी पर्वत के उसी प्रकार भिन्न - भिन्न प्रकार के ( धर्म- विशेषता वाले) आत्माओंअनेक स्थलों में चारों ओर बह जाता है, पीछे दौड़ता हुआ मनुष्य उन्हीं के शुभाशुभ लोकों में ( योनियों मेंको) भटकताआत्मा सेरहताअलग मानकर, उनके है ।
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥15 ॥।
इति द्वितीयेऽध्याये चतुर्थी वल्ली । हे गौतम! जिस तरह निर्मल जल में बादलों के द्वारा चारों ओर से बरसायागया पानी वैसा ही रहता है, ठीक उसी प्रकार ( केवल पुरुषोत्तम परमात्मा ही सब कुछ है ) ऐसा जाननेवाले ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । मुनि का आत्मा इस प्रकार कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय में चतुर्थ वल्ली समाप्त हुई । * पञ्चमी वल्ली
पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥1 ॥
नित्यविज्ञानस्वरूप उस अजन्मा परमेश्वर का, ग्यारह द्वारों वाला ( मनुष्य शरीररूप ) एक नगर है । इस प्रकार उस परमात्मा का ध्यान करने से मनुष्य शोक को प्राप्त नहीं होता और इस शरीर के रहते ही कर्मबन्धनों से मुक्त हुआ वह मृत्यु के बाद विदेहमुक्त हो जाता है । सचमुच यही वह ब्रह्म है ( जिसके विषय में तुमने पूछा था ) ।
हसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥2 ॥
वह परमात्मा गमन करनेवाला है; आकाश में गति करनेवाला सूर्य है, अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाला सर्वव्यापी वायु है; वेदी ( धरती ) पर रहनेवाला 'होता' है ( वेदीस्थापित अग्नि और होता भी वही है ), वही कलशस्थ सोम है । इसी तरह वह मनुष्यों में संचलन करनेवाला, आकाश में गतिशील तथा जल में विविध रूपों से प्रकट होनेवाला, धरती में भी रूपवैविध्य द्वारा प्रकट होनेवाला वही सबसे बड़ा परम सत्य है |
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।
मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते ॥3 ॥
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32 उपनिषत्सञ्चयनम् जो आत्मा प्राण को ऊपर ले जाता है और अपान को नीचे ले आता है, उस हृदय के बीच में बैठे हुए सर्वोत्तम और भजनीय परमेश्वर की सभी देव उपासना करते हैं ।
अस्य विस्त्रःसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥4 ॥
एक शरीर से दूसरे शरीर में गमन करने के स्वभाव वाला यह आत्मा ( जीवात्मा) जब इस (वर्तमान ) शरीर को छोड़कर चला जाता है (और उस जीवात्मा के साथ- ही - साथ जब इन्द्रियाँ और प्राण आदि भी चले जाते हैं ) तब इस मृत देह में क्या शेष रह जाता है? ( अर्थात् कुछ भी बाकी नहीं रहता ) तो यही वह है । ( तात्पर्य यह है कि कुछ बाकी रहा हुआ न दिखाई देने पर भी जो परब्रह्म सदैव जड़चेतन में व्याप्त होकर रहता है, यह तो शेष रहता ही है और यही वह परमतत्त्व है, जिसके विषय में तुमने पूछा था । )
न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।
इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ 5 ॥
मनुष्य आदि कोई भी प्राणी प्राण की शक्ति से जीवित नहीं रह सकता और अपान की शक्ति से भी जीवित नहीं रह पाता । परन्तु जिस परम चैतन्यतत्त्व में ये दोनों (प्राण और अपान ) आश्रित हैं, ऐसे किसी अनूठे तत्त्व से ही वे सब प्राणी जीवित रहते हैं । ( अर्थात् चेतनतत्त्व में ही प्राण, अपान आश्रित हैं) और उसी से ये सब प्राणी जीवित रहते हैं ।
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥6 ॥
यमराज कहते हैं कि हे गौतमवंशीय नचिकेता! मरण होने के बाद इस जीवात्मा का क्या होता है, यह बात अब मैं तुम्हें कहूँगा और उसी के साथ- ही- साथ मृत्यु के बाद जीवात्मा कहाँ जाता है, कैसे रहता है और उस रहस्यमय चेतनतत्त्व का स्वरूप क्या है? यह भी बताऊँगा ।
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥7 ॥
जिसका जैसा कर्म होता है और शास्त्र- श्रवण से जिसको जैसा भाव प्राप्त होता है, उसी प्रकार का शरीर धारण करने के लिए बहुत- से जीवात्मा तो तरह- तरह की जंगम योनियों को प्राप्त करते हैं और अन्य कई जीवात्मा तो स्थावरभाव को ( वृक्ष आदि की योनि को ) भी प्राप्त करते हैं । य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥8 ॥
यह कि जो जीवों के कर्मानुसार भाँति- भाँति के भोगों का निर्माण करनेवाला है, वह परमपुरुष परमेश्वर जब प्रलयकाल में सभी सोये हुए ही रहते हैं, तब भी स्वयं जाग्रत् ही रहता है | ( सभी जब अज्ञान- व्याप्त होते हैं, तब स्वयं ज्ञानवान् रहता है । ) वही अमृतमय है और उसी में सभी लोक आश्रित रहते हैं, उसका अतिक्रमण कोई नहीं कर सकता । यही वह परमतत्त्व है ।
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द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 33
अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१ ॥
जिस प्रकार समग्र ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही अग्नि अन्य विविध आधारभूत वस्तु के रूपों को धारण किए हुए रहता हैं, ठीक उसी प्रकार सभी प्राणियों का अन्तरात्मा परब्रह्मरूप एक होने पर भी तरह - तरह के रूपों को धारण करके प्रविष्ट होता है । इतना ही नहीं, उनके बाहर भी भिन्न-भिन्न रूपों में वह रहता है ।
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥10 ॥
जिस प्रकार राकल ब्रह्माण्ड में एक ही वायु अपने अव्यक्त रूप से व्याप्त है, फिर भी भिन्न- भिन्न व्यक्त वस्तुओं के संयोग से उन उन वस्तुओं के अनुरूप गति और शक्तिसम्पन्न दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार इन समस्त प्राणियों का अन्तर्यामी परमेश्वर तो एक ही है, तथापि उन प्राणियों के सम्बन्ध से भिन्न-भिन्न गति और शक्तिवाला दिखाई पड़ता है । इतना ही नहीं, वह प्राणियों ( वस्तुओं ) के बाहर भी अनन्त ( असीम) विविध रूपों में भी रहता है ।
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥1 1 ॥
जैसे सूर्य समग्र लोक का नेत्र है, फिर भी नेत्र सम्बन्धी बाह्य दोषों से सूर्य लिप्त नहीं होता । उसी तरह सर्व प्राणियों का अन्तरात्मा तो एक ही है, फिर भी वह संसार के दुःखों से लिप्त नहीं होता, किन्तु उनसे वह बाहर ही रहता है ।
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषाः सुखः शाश्वतं नेतरेषाम् ॥12 ॥।
सदैव सभी के अन्तरात्मा के रूप स्थित, अद्वितीय, सभी प्राणियों को अपने वश में रखनेवाला वही सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने एक ही रूप को लीला से अनेक प्रकार का बना देता है, ऐसे परमात्मा को जो ज्ञानी पुरुष अपने भीतर अवस्थित देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत आनन्द प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं ।
नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥13 ॥
वह परमात्मा नित्यों का ( जीवों का ) भी नित्य है, जो चैतन्यों का भी चैतन्य है, जो अकेला ही अनेक जीवों की कामनाओं का विधान करता है; जो ज्ञानी लोग ऐसे परमेश्वर को अपने भीतर ही सदा देखा करते हैं, उन्हीं को शाश्वत शान्ति मिलती है, दूसरों को नहीं ।
तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।
कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥14 ॥
वह अनिर्वचनीय परम सुख यह परमात्मा ही है, ऐसा ज्ञानी लोग मानते हैं । उसे मैं कैसे ठीक से समझ सकता हूँ कि वह किस प्रकार प्रत्यक्षतः प्रकट होता है या वह अनुभव में आता है? ( मेरे लिए यह संभव नहीं । ) 3 उ ०प्र०
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34 उपनिषत्सञ्चयनम्
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥15 ॥
इति द्वितीयेऽध्याये पञ्चमी वल्ली ॥5 ॥
वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न ही++चन्द्र और तारागण ही प्रकाशित होते हैं । वहाँ बिजली भी चमकती नहीं है । तो फिर यह लौकिक अग्नि भला कैसे प्रकाशित हो सकता है? क्योंकि उसी (परमेश्वर ) के प्रकाश से तो वे सब प्रकाशित हो सकते हैं । इस प्रकार कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय में पञ्चम वल्ली समाप्त हुई । * षष्ठी वल्ली
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥1 ॥
जिसका मूल ऊपर की ओर है और शाखाएँ नीचे की ओर हैं, ऐसा यह अश्वत्थ वृक्ष सनातन ( अनादि ) काल से चला आ रहा है । वही ज्योतिःस्वरूप है, वही ब्रह्म है और वही अमृत कहा जाता है । सभी लोग उसी का आश्रय ग्रहण किए हुए हैं । कोई भी उसे लाँघ नहीं सकता । सचमुच वही ब्रह्म 1
यदिदं किंच जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥2 ॥
परब्रह्म परमात्मा से निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है, वह अपने प्राणस्वरूप ( परमकारणस्वरूप ) परमेश्वर में ही चेष्टा करता है ( तात्पर्य यह है कि जगत् की सम्पूर्ण गति का आश्रय परमेश्वर ही है ) । उद्यत वज्र की तरह भय उत्पन्न करनेवाले इस परमेश्वर को जो जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥३ ॥
भय से इसइन्द्रपरमेश्वर, वायु और के भयमृत्युसे अपनेअग्नि- अपने जलताकार्योंहै, इसीमें नियमानुसारके भय से सूर्यनिमग्नप्रकाशितरहते हैंहोता। है और इसी के
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥4 ॥
यदि शरीर का पतन होने से पहले इस मनुष्य- शरीर में ही ( साधक करने में समर्थ हुआ ( तब तो अच्छी बात है ) और यदि नहीं हुआ तो अनेक) परमात्मा का साक्षात्कारऔर योनियों में शरीर धारण करने के लिए मजबूर होता है । कल्पों तक विविध लोकों
यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ।
यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥5 ॥
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द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 35 जिस प्रकार दर्पण में सामनेवाली वस्तु दिखाई देती है, उसी प्रकार शुद्ध अन्तःकरण में ब्रह्म के दर्शन होते हैं । जिस प्रकार स्वप्न में वस्तु अस्पष्ट दिखाई देती है, उसी तरह पितृलोक में परमात्मा दिखाई देते हैं । जिस प्रकार पानी में वस्तु के रूप का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार गंधर्वलोक में परमात्मा की आभा जैसा कुछ दिखाई पड़ता है, परन्तु ब्रह्मलोक में तो परमात्मा का स्वरूप छाया और आतप ( धूप ) की भाँति स्पष्ट रूप से अलग- अलग से दिखाई पड़ते हैं । (यहाँ दर्पण:= निर्मल अन्तःकरण, स्वप्न = जाग्रत् वासनाएँ आदि के सूचक हैं ) ।
इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥6 ॥
अपने - अपने कारण की वजह से भिन्न-भिन्न रूपों में उत्पन्न हुई इन्द्रियों की जो अलग- अलग प्रकार की सत्ता है और उनका उदय और अस्त होने का जो स्वभाव है, उसे पहचान कर उन इन्द्रियों ते आत्मा का स्वरूप अलग ही है - ऐसा समझने वाला धीर (ज्ञानी ) पुरुष कभी शोक नहीं करता ।
इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥7 ॥
इन्द्रियों से मन श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि उच्चतर है, बुद्धि से भी उसका स्वामी जीवात्मा श्रेष्ठ है, और उस जीवात्मा से ( महत्तत्त्वरूप जीवात्मा से ) अव्यक्त शक्ति श्रेष्ठ है । ( कठ. 1.3.10 की भाँति )
अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥8 ॥
परन्तु उस अव्यक्त से भी उसका स्वामी परमपुरुष परमात्मा श्रेष्ठ है । वह व्यापक है और सर्वथा निराकार ही है । जिसे जानकर जीवात्मा बन्धनमुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप ब्रह्म को प्राप्त करता है ।
न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ।
हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥9 ॥
इस परमेश्वर का वास्तविक स्वरूप हमारे समक्ष प्रत्यक्ष विषय के रूप में टिक नहीं सकता । इसको कोई भी अपने चर्मचक्षुओं से देख नहीं पाता । मन से बार- बार चिन्तन करके ध्यान में लाया गया वह परमात्मा निर्मल और निश्चल हृदय से तथा विशुद्ध बुद्धि से देखा जा सकता है । जो उसे पहचान लेते हैं, वे अमृत ( आनंद) स्वरूप हो जाते हैं ।
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥10 ॥
जब मन के साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ठीक तरह से स्थिर हो जाती हैं ।और बुद्धि भी किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करती, तब उस स्थिति को योगी लोग 'परमगति' कहते हैं
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
॥ अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥11
साधक इन्द्रियों की उस स्थिर धारणा को ही योगी लोग ' योग' मानते हैं । क्योंकि उस समयको सावधान प्रमादरहित हो जाता है । योग उदय और अस्त होनेवाला होता है । (इसलिए साधक रहकर निरन्तर योगस्थ रहने का प्रयत्न करना चाहिए । )
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36 उपनिषत्सञ्चयनम्
नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥12 ॥
वह परब्रह्म परमेश्वर न तो वाणी से या न ही मन से प्राप्त किया जा सकता है और नेत्रों से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता । तब फिर "यह आत्मा है ही” – ऐसा कहने वालों के सिवा अन्य के द्वारा भला कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥13 ॥
इसलिए इस परमात्मा को प्रथम तो "वह अवश्य है ""-–इस प्रकार निश्चयपूर्वक ग्रहण करना चाहिए । ( तात्पर्य यह कि पहले उसके अस्तित्व का दृढ निश्चय कर लेना चाहिए ) । उसके बाद तत्त्वभाव से ( स्वरूप भाव से) भी उसे प्राप्त करना चाहिए । इन दोनों प्रकारों में से "वह अवश्य है ही ’ —इस प्रकार निश्चयपूर्वक परमात्मसत्ता को स्वीकार करनेवाले साधक के लिए उस परमात्मा का पारमार्थिक स्वरूप उसके निर्मल चित्त में यों ही साक्षात् हो जाता है ।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।
अथ मर्त्योऽमर्त्यो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥14 ॥
इस साधक के हृदय में अवस्थित सारी कामनाएँ जब पूर्णत: छूट जाती हैं, तब मरणधर्मा मानव अमर हो जाता है । और वह यहीं अर्थात् इसी लोक में ब्रह्म का अच्छी तरह से अनुभव कर लेता है ( जीवन्मुक्त हो जाता है ) ।
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमर्त्यो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् ॥15 ॥
जब साधक के हृदय की सब ग्रन्थियाँ ( अहंता- ममतारूप संशय ) पूर्ण रूप से खुल जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य इसी शरीर में अमर हो जाता है । बस इतना ही सनातन उपदेश है ।
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥16 ॥
हृदय में सब मिलाकर एक सौ एक नाडियाँ हैं । उनमें से एक मस्तक ( भाल प्रदेश ) की ओर निकली हुई है । ( उसी को ‘ सुषुम्णा' कहा जाता है ) । मनुष्य उस नाडी के द्वारा ऊपर के लोक अमृतभाव को प्राप्त हो जाता है । शेष अन्य सौ नाडियाँ मरणकाल में जीव को तरह- तरह कीमेंयोनियोंजाकर में ले जाने का कारण बनती हैं । पुरुषोऽनऽन्तरात्मा अङ्गुष्ठमात्रःतं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकांसदा जनानांधैर्येण ।हृदये सन्निविष्टः । तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतम् ॥17 ॥
सर्वान्तर्यामी, अंगुष्ठमात्र परिमाणवाला, परमपुरुष सदैव हृदय मुंज से शलाका की तरह धैर्य से अलग करके जिसने देखा है, उसी मेंकोप्रतिष्ठितविशुद्ध है । इस आत्मा कोचाहिए । अमृतस्वरूप जानना
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द्वितीयोऽध्यायः ] कठोपनिषत् ( 3 ) 377 मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥18 ॥ ।
इति द्वितीयेऽध्याये षष्ठी वल्ली ।
इति द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥2 ॥
इति यजुर्वेदीयकठोपनिषत् समाप्ता ॥
== इस तरह उपदेश सुनकर नचिकेता यमराज की कही हुई इस विद्या को और संपूर्ण योगविधि को सुनकर, मृत्युरहित और विशुद्ध ( विकारशून्य) होकर ब्रह्म को प्राप्त हो गया । यदि कोई अन्य व्यक्ति भी इस अध्यात्मविद्या को इस तरह जानेगा, तो वह भी वैसा ही (ब्रह्मसाक्षात्कारी ) हो जाएगा । इस प्रकार कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय की षष्ठ वल्ली समाप्त हुई । इस प्रकार कठोपनिषत् समाप्त होती है । शान्तिपाठः
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै ॥
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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(4 ) प्रश्नोपनिषत् (उपनिषत्परिचय ) ने इसी परम्परानुसार यह उपनिषद् अथर्ववेद के अन्तर्गत मानी जाती है । शंकराचार्य वेद की मुण्डकोपनिषद् को ‘मन्त्र' कहा है और इस उपनिषद् को 'ब्राह्मण' कहा है इसमें। प्राचीनछ: और प्रमाणभूत शास्त्ररूप मानी गई दस उपनिषदों में इस उपनिषद् का भी स्थान है । प्रश्न और उनके उत्तर होने से इसे 'प्रश्नोपनिषद्' कहा गया है । इसे 'षट्प्रश्नोपनिषद्' भी कहते हैं | इसमें गद्यात्मक मंत्रों की कुल संख्या 67 सुकेशादि छः ब्रह्मजिज्ञासु मुनि प्रसिद्ध ब्रह्मनिष्ठ पिप्पलाद मुनि के पास समित्पाणि होकर शास्त्रानुसार ब्रह्मज्ञान के लिए गए । पिप्पलाद ने उनसे एक साल तक अपने घर में रहकर तपश्चरण करने को कहा । पिप्पलाद की सूचना का यथा पालन करके वे जब उनके सामने प्रश्न लेकर उपस्थित हुए तो प्रत्येक ने अपना एक- एक प्रश्न पूछा और पिप्पलाद ने उन सभी प्रश्नों का परितोषजनक उत्तर भी दिया । पिप्पलादमुनि के पास आए हुए ये सभी ब्रह्मजिज्ञासु बड़े बुद्धिशाली थे । उन्होंने उनसे बहुत सुन्दर प्रश्न पूछे — ' हम कहाँ से आते हैं? ' ' जीवन का मूलस्रोत कौन- सा है? ’ ‘ कौन से अवयव ( इन्द्रियाँ) प्रकाश देते हैं? ' 'उनमें मुख्य अवयव कौन-सा है?' ' यह प्राण ( संजीवनी शक्ति) कहाँ से आती है?' 'देह में वह कैसे आ जाती हैं? ' 'इससे फिर अलग क्यों हो जाती हैं? ' ‘निद्रित कौन होता है?' 'जागता कौन है?' 'स्वप्न में क्या होता है? ' ' सुख का मूल क्या है? ' ‘ ॐ के ध्यान से कौन- सी गति और प्राप्ति होती है?' और ' परम सत् क्या है और कहाँ रहता है? ' इस उपनिषद् के छ: प्रकरण हैं और उन्हें 'प्रश्न' नाम दिया गया है । प्रथम प्रश्न में 16, द्वितीय में 13, तृतीय में 12, चतुर्थ में 11, पंचम में 7 और षष्ठ में 8 मंत्र हैं । कुल मिलाकर 67 गद्यकण्डिकाएँ ( मंत्र) हैं । इस उपनिषद् की मुण्डकोपनिषद् के साथ बहुत- कुछ समानता देखकर कुछ लोग तो यहाँ तक कह देते हैं कि मुण्डक ही मूल ग्रन्थ है और ‘'प्रश्न' तो उसकी व्याख्या ही है | मुण्डकोपनिषद् में आए हुए कुछ गद्यांशों को छोड़कर शेष पूरी पद्य में लिखी गई है, जब कि ‘ प्रश्नोपनिषद्' पूरी गद्य- रचना है । प्रश्नोपनिषद् के प्रश्न क्रमशः आगे बढ़ते रहते हैं । यह परिवर्तनशील जगत्, जगत् की चलती- फिरती हस्तियाँ, उन सबका कोई एक समान मूल, उसको खोजने के लिए अन्तर्दृष्टि, विराट् का भीतर में दर्शन, बाहर- भीतर का ऐक्य- इस प्रकार बढ़ते- बढ़ते अन्त में इस उपनिषद् का अद्वैत में पर्यवसान होता है । h