Upanishad Sanchayan Ishadi Ashtottar Shat Upanishad Part 1 with Hindi Translation by Keshavlal V Shastri Vraj Jivan Prachya Bharati Granth Mala No. 162 - Chaukhamba — पृष्ठ 81–90

उपनिषद सञ्चयन - ईशादि अष्टोत्तरशत उपनिषद १ · पृष्ठ 81–90

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प्रथम: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 39 शान्तिपाठः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवासस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हे देवो! हम अपने कानों से केवल कल्याणकारी बातें ही सुना करें । जिन्हें हम पूजते हैं, ऐसे हे देवो! हम अपनी आँखों से केवल शुभ दृश्यों को ही देखा करें । हम अपने सुदृढ़ अंगों से युक्त शरीर के द्वारा आपकी स्तुति करते रहें । हम देवों का दिया हुआ जितना आयुष्य है, उसे भोगते रहें । वैयक्तिक शान्ति हो, पर्यावरणीय शान्ति हो, प्राणीजगत् की शान्ति हो । अथ प्रथमः प्रश्नः ॐ सुकेशा च भारद्वाजः, शैब्यश्च सत्यकामः, सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो, भार्गवो वैदर्भिः, कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ 1 ॥

भरद्वाज का पुत्र सुकेशा, शिबि का पुत्र सत्यकाम, गर्ग वंश का सौर्यायणी, अश्वल का पुत्र कौसल्य, विदर्भनिवासी भृगुपुत्र और कात्य का पुत्र कबन्धी– ये सब लोग ब्रह्म की जिज्ञासा करनेवाले एवं ब्रह्म के सिवा और किसी से भी सम्बन्ध नहीं रखने वाले थे । वे ब्रह्म- विषयक सब कुछ जानना चाहते थे । “ यह पुरुष हमें ब्रह्म के विषय में सब कुछ कहने में समर्थ होगा” – ऐसा मन में सोचकर वे गुरु पिप्पलाद के पास हाथ में यज्ञकाष्ठ लेकर गए । तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान् पृच्छथ यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥2 ॥

ऋषि ने तब उनसे कहा— “ तुम लोग तपश्चर्या, ब्रह्मचर्य और गुरु एवं शास्त्रों पर श्रद्धा रखकर मेरे पास और एक वर्ष तक रहो और उसके बाद तुम मुझसे चाहे कोई भी प्रश्न पूछ लो । मैं अपनी पूरी शक्ति का उपयोग करके, यदि मैं जानता होऊँगा तब मैं उत्तर दूँगा । " अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥3 ॥

! एक वर्ष के बाद कात्य का पुत्र कबन्धी पिप्पलाद के पास आया और उसने पूछा- “हे भगवन् ये सब प्राणी कहाँ से आते हैं? " तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स ॥4 ॥ मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति

प्रजापति ने तपश्चर्या की । तब पिप्पलाद ने उससे कहा कि- "सन्तानप्राप्ति के इच्छुक होकरकोई खानेवाला ( सूर्य) हो, तब उनको ऐसा लगा कि उनके पास अन्न (चन्द्र ) हो और उस अन्त्र को ये दोनों परस्पर मिलकर प्रजा उत्पन्न कर सकते हैं । ”

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40 उपनिषत्सञ्चयनम् आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥5 ॥

आदित्य ( सूर्य) जीवन है और चन्द्र ही अन्न है । जो कुछ भी स्थूल ( कार्यरूप ) है अथवा सूक्ष्म ( कारणरूप) है, यह सब अन्न ही है । इसलिए स्थूल तो अन्न ही है, क्योंकि वह का रूप ( मूर्ति) ही तो है | अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद् दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥6 ॥

जिस प्रकार सूर्य उदित होते ही तुरन्त पूर्व दिशा की ओर प्रविष्ट होता है और अपनी किरणों के द्वारा वह पूर्व दिशा के सभी पदार्थों पर छा जाता है । इसी तरह वह दक्षिण दिशा, उत्तर दिशा, पश्चिम दिशा, ऊपर, नीचे, बीच में चारों ओर सभी जीवित प्राणियों को घेरकर सभी प्राणियों को प्रकाश

और जीवन देता है, इसी तरह सभी जगह अपनी किरणें फैलाकर सूर्य वही कार्य करता है ।

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाऽभ्युक्तम् ॥7 ॥

इन सभी प्राणियों में अन्तर्हित होने के कारण इस उदीयमान सूर्य को वैश्वानर कहा जाता, ' ' विश्व के सभी रूप उसी के ही हैं इसलिए उसे विश्वरूप भी कहा जाता है । वह है । इस — ( ) है । वह उदित होता है अर्थात् क्षितिज पर आदित्य सूर्य रूप से वह प्रकट होताजीवनपोषकहै अग्नि में ऋग्वेद के इस मंत्र में कहा गया है ॥ इसके विषय

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।

सहस्त्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥8 ॥

अपनी असंख्य किरणों के साथ सूर्य उदित हो रहा है । वह अनेकानेक ( कि—है । समग्र ) वहसजीवसभी जगहसृष्टि औरका वहअस्तित्ववालेसंजीवनीरूपसभीहैरूपों। विद्वान्में उपस्थितलोग सूर्य के विषयरूपों मेंमें दिखाईऐसा कहतेपड़ रहाहैं और सभी का एकमात्र प्रकाश है । यही सभी का उष्मादायक है । रहता है । वह सभी का आधार है संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्तेच । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते पितृयाणः ॥9 ॥ । एष ह वै रयिर्यः

जो वर्ष है, वह प्रजापति का प्रतीक है अर्थात् — घूमता है दक्षिण और उत्तर दिशाओं में । जो वह प्राणियों का स्वामी है । वह दो दिशाओं में जो लोग जनकल्याण के अन्य कार्य करते लोग सदैव वैदिक विधि-विधानों में डूबे हुए रहते हैं और करते रहते हैं, वे लोग अन्त में चन्द्रलोक रहते हैं और अपने उन कार्यों के लिए गौरव का अनुभव उसके बाद अनिवार्यरूप से) मर्त्यलोक में जाते तो हैं, किन्तु मर्यादित समय के लिए ही ( क्योंकि मार्ग में जाते हैं । ‘ पितृयाण' (पितृलोक मेंकावापस) वह लौट आते हैं । इसलिए कामनावाले मनुष्य दक्षिण मार्ग 'रयि' नाम से प्रसिद्ध है । अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धयाविद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभि-

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प्रथम: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 41 जयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् । परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥10 ॥

परन्तु अन्य कुछ लोग ऐसे भी हैं कि जो तप करके और संयम रखकर रखते हुए, शास्त्राध्ययनपूर्वक आत्मा को खोजकर उत्तर के मार्ग पर जाकर, गुरु और शास्त्रों में श्रद्धा कक्षा प्राप्त करते हैं | समग्र सजीव सृष्टि का आधार यह आदित्य है । इसी अवस्थासम्पूर्णतया आदित्य की ‘ ' ' ' भय का अतिक्रमण कहा जाता है । मनुष्य के लिए यह उत्तमोत्तम की को अमरत्व या को प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य को फिर इस मर्त्यलोक में नहीं आनाप्राप्तिपड़ताहै । एक। बार इस अवस्था पूर्णविराम है । इस विषय को यह अग्रिम श्लोक स्पष्ट करता है । यह जीवनयात्रा का

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।

अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥11 ॥

( जो काल का स्वरूप जानते हैं, वे आदित्य का इस प्रकार वर्णन करते हैं कि— ) वह पाँच पैरवाला ( पाँच ऋतुओं वाला) है, वह बारह स्वरूप वाला ( मासवाला ) है, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच के अवकाश ( अन्तरिक्ष ) में रहता है, यह जल की वर्षा करता है । (अन्य विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कैसा भी हो, आदित्य सर्वज्ञ तो है ही । वे लोग कहते हैं कि ) वह ( आदित्य ) सात पहियोंवाले रथ पर सवारी करता है, और प्रत्येक पहिये में छः-छः आरे जोड़े गये हैं और उस पर यह जगत् आश्रय लेता है । मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥12 ॥

संवत्सर की तरह मास को भी प्रजापति के रूप में लिया जा सकता है । ऐसा प्रतीक लें तो कृष्णपक्ष को अन्न ( चन्द्र = रयि) मानना चाहिए और शुक्लपक्ष यहाँ प्राणरूप ( जीवनरूप ) है । ( आदित्य = अन्न खानेवाला है ) इसलिए प्राण की (जीवन की ) रक्षा चाहनेवाले ऋषिलोग शुक्लपक्ष में ही वेदविहित विधि - विधानों के अनुष्ठान करते हैं और अन्य लोग किसी तरह ये अनुष्ठान कृष्णपक्ष में करते हैं ।1 अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥13 ॥

‘ दिन - रात्रि' को भी प्रजापति के प्रतीक के रूप में लिया जा सकता है । ऐसा करने में 'दिवस ' प्रजापति का प्राण अर्थात् जीवन ( माना जाता है और रात्रि उसका अन्न है ( रयि है ) । जो लोग दिवस के भाग में इन्द्रियसुखों में डूबे हुए रहते हैं, वे जीवन को हानि पहुँचाते हैं; जो लोग रात्रि के समय में इन्द्रियसुखों में मग्न बनते हैं, वह तो ब्रह्मचर्य ( आत्मसंयम जैसा) ही है । अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥14 ॥

( मानो ) अन्न ही प्रजापति है । उस अन्न में से जीवन का बीज ( वीर्यरूप में) आता है । उस बीज में से ये सब सजीव व्यक्ति उत्पन्न होते हैं ।

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ये मिथुनमुत्पादयन्ते ।

तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥15 ॥

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42 उपनिषत्सञ्चयनम् इसलिए जो लोग प्रजापति के उन नियमों का पालन करते हैं (प्रजापतितुल्य जीवनवाले होते हैं), वे लोग प्रजापति की तरह और उनके जैसी ही प्रजा को उत्पन्न करते हैं । ऐसे लोगों में से कुछभी लोग ऐसे भी होते हैं, जो कि केवल तपोयुक्त और तीव्र आत्मसंयमी जीवन जीते हैं, तो ये लोग दृढतापूर्वक सत्य में प्रतिष्ठित होते हैं । ( ऐसे लोग पहले पितृलोक में जाकर वहाँ अपना सम्बन्ध पूरा करके ब्रह्मलोक में जाते हैं । ) तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्यमनृतं न माया चेति ॥16 ॥

इति प्रथमः प्रश्नः ॥1 ॥

जिन लोगों में वक्रता, अप्रामाणिकता और चालाकी का लेश भी न हो, ऐसे लोगों को ही ब्रह्मलोक में स्थान मिलता है । इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में प्रथम प्रश्न समाप्त हुआ । अथ द्वितीयः प्रश्नः अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥1 ॥

इसके बाद उनसे ( पिप्पलाद से ) विदर्भवासी भार्गव ने ( भृगु के पुत्र ने पूछा कि— हे भगवन्! मुख्य रूप में कितनी इन्द्रियाँ प्राणियों के शरीरों को टिकाए रखती हैं? उनमें से कौन - सी इन्द्रिय शरीर को प्रकाशित करती है? और भी उनमें से कौन -सी सबसे अधिक महत्त्व रखती है? तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥2 ॥

महर्षि पिप्पलाद ने उनसे (भार्गव ऋषि से कहा कि वह देव तो आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ, मन, आँख, कान और अन्य कर्मेन्द्रियाँ भी हैं । वे सभी इन्द्रियाँ एक बार अपनी - अपनी शक्तियों को प्रकाशित करके गर्वपूर्वक कहने लगीं कि-"हम ही इस शरीर को शक्ति देकर धारण कर रहे हैं अर्थात् इसके आश्रयदाता हैं । " तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथा । अहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥3 ॥

तब मुख्य प्राण उन इन्द्रियों से कहने लगा कि– “यह ( शरीरविधारण के विषय में स्वयं को ही मुख्य मानने की ) भूल मत करो । (सच बात तो यह है कि) मैं ही अपने आपको पाँच अलग- अलग शक्तियों में विभक्त कर देता हूँ और इस शरीर को घुमाने फिराने के लिए उन शक्तियों का उपयोग हूँ । शरीर को आश्रय प्रदान करने का पूर्ण उत्तरदायित्व मेरा ही है । ” परन्तु ज्ञानेन्द्रियों ने उसकरता विश्वास नहीं किया । पर

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द्वितीय: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 43 सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रामत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकर- राजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रतिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥4 ॥

सभी करणों में— इन्द्रियों का प्रधान ऐसा प्राण (इन्द्रियों के किए हुए अपमान से ) आहत हो उठा और इसलिए उसने मानो ऊपर उठ जाने का-सा व्यवहार किया ( अर्थात् शरीर को छोड़ देने का-सा बर्ताव किया ) । पर ज्यों ही उसने शरीर छोड़ना शुरू किया, त्यों ही अन्य इन्द्रियों ने भी उसी तरह उसका अनुसरण किया और जब वह फिर से जाकर अपने स्थान पर स्थिर हुआ, तो अन्य इन्द्रियों ने भी ऐसा ही किया । जिस तरह मधुमक्खियों की रानी जब छत्ता छोड़ती है, तो मधुमक्खियों का सारा झुण्ड भी छत्ता छोड़ ही देता है और जब वह रानी मक्खी उस मधु के छत्ते में स्थिर रहती है, तो शेष सब मधुमक्खियाँ भी वैसा ही करती हैं । वाणी, मन, आँख और कान – ये सब करण ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) इन मधुमक्खियों जैसी ही हैं । ऐसा होने के बाद वे इन्द्रियाँ प्राण पर प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगीं ।

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।

एष पृथिवीं रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥5 ॥

यह प्राण अग्निरूप है जो हमें उष्णता देता है । यह प्राण सूर्य भी है और यही वर्षा देता है । इन्द्र के रूप में यही प्राण ( सबकी देखभाल करता है ) वही पृथ्वी है, वही रयि ( चन्द्र ) है । वही सर्वत्र उपस्थित है | वह सबको प्रकाशित करता है । सार यह है कि वह स्थूल अर्थात् कार्यरूप भी है और सूक्ष्म अर्थात् कारणरूप भी है । यह प्राण शाश्वत

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥6 ॥

रथ के पहियों की धुरी पर जिस तरह आरे जड़े हुए रहते हैं, ठीक उसी तरह प्राण में इस विश्व का सब कुछ जड़ा हुआ रहता है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद- यह वेदत्रयी और यज्ञ के विधि- विधान तथा क्षत्रिय एवं ब्राह्मण भी इस पर आधारित हैं ।

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ।

तुभ्यं प्राणस्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥7 ॥

(प्राण की स्तुति करती हुई इन्द्रियाँ कहती हैं कि— ) आप (प्राण) ही तो प्रजापति ( प्राणियों के स्वामी ) के रूप में माता के गर्भ में संचार करते हैं । आप (प्राण ) ही अपने माता- पिता के द्वारा उनके जैसे ही रूप में जन्म लेते हैं । हे प्राण! आप हर एक शरीर में इन्द्रियों के स्वामी के रूप में हैं । मनुष्य जैसे सभी प्राणी उनकी इन्द्रियों की सहायता से आपके लिए अपनी ओर से बलि (उपहार ) आपको देते हैं । ( वह उपहारों की श्रेष्ठता है ) ।

देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।

ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥8 ॥

आप देवों को दिए गए बलि के श्रेष्ठ अग्निरूप वाहक हैं । पहले पितृओं को ( पूर्वजोंभीकोआप) दिएही गए खाद्यान्न के रूप में भी तो आप ही हैं । ऋषियों के द्वारा परिशीलन किया गया सत्य

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44 उपनिषत्सञ्चयनम् हैं । अंगिरस ऋषियों में ( अर्थात् इन्द्रियों में ) अथर्वा ( अर्थात् प्राण) भी आप ही हैं । ( क्योंकि आप ही इन्द्रियों को सही रूप में कार्यशील बनानेवाले हैं । )

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।

त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ १ ॥

हे प्राण! आप देवों के राजा इन्द्र हैं । आप अपने तेज से सभी का नाश करनेवाले रुद्र भी हैं और साथ- ही- साथ सभी का रक्षण करनेवाले भी तो आप ही हैं । आप अन्तरिक्ष में ( अवकाश में) चारों ओर संचरण करते हैं और सभी तेजस्वी रूपों के स्वामी सूर्य भी आप ही हैं ।

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।

आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥10 ॥

हे प्राण जब आप मेघस्वरूप में वर्षा करते हैं, तब आपके ही सर्जनरूप ये सब प्राणी आनन्दविभोर हो उठते हैं और सोचते हैं कि हम जितना चाहें, उतना जल प्राप्त करेंगे ।

व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ।

वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्वनः ॥11 ॥

हे प्राण! आप पतित हैं (क्योंकि आप प्रथम मानव होने से किसी के द्वारा आपका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं किया गया है ) और ऐसा होने पर भी आप 'एकर्षि' के नाम से विख्यात हुए अग्नि के स्वरूपवाले हैं | आप ( आहुति में दिए गए मक्खन- घी को ) खानेवाले हैं । आप इस विश्व के स्वामी हैं । हम ( इन्द्रियाँ ) आदिपुरुष ऐसे आपको खाने के लिए ( आहुति रूप में घी- मक्खन) देनेवाले हैं । हे मातरिश्वा! आप हमारे पिता हैं । ( अथवा हे प्राण! आप वायु के भी पिता हैं ) ।

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।

या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥12 ॥

हमारी वाणी में आपका जो अंश अवस्थित है, हमारे श्रवण में आपका जो अंश विद्यमान है, हमारे देखने और विचार में आपका जो अंश है और समग्र रूप से मन के विविध कार्यों में जो आपका

अंश है उन सभी अंशों को आप मंगलमय बनाइए । आप शरीर से बहिर्गमन न करें ।

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् ॥

मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥13 ॥

इति द्वितीयः प्रश्नः ॥2 ॥

तीन लोक में जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह सब प्राण के जिस तरह माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है, उसी तरह हे प्राण! आपवश में है । हम प्रार्थना करते हैं कि करके हमें सद्बुद्धि भी दीजिए । हमारा रक्षण कीजिए और कृपा इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में दूसरा प्रश्न यहाँ समाप्त हुआ।

पृष्ठ 87

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तृतीय: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 45 अथ तृतीयः प्रश्नः अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन् कुत कथमायात्यस्मिञ्छरीरे? आत्मानं वा प्रविभज्य कथं एष प्राणो जायते? त्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥1 ॥ प्रातिष्ठते केनो- इसके बाद अश्वल के पुत्र कौसल्य ने ऋषि पिप्पलाद से

आता है? वह शरीर में किस तरह प्रवेश करता है? किस तरहपूछा- "हे भगवन्! यह प्राण कहाँ से में कार्य करता है? और इस शरीर से बाहर निकलने के लिए वह अपना विभाग करके इस शरीर लेता है? प्राणी और पदार्थ जैसी बाह्य वस्तुओं को टिकाए रखनेवह किस तरह (किस उपाय से ) काम शरीरगत भीतर के तत्त्वों को भी वह किस तरह आश्रय देता है? के(ज्ञानेन्द्रियादिलिए वह क्या करता है? और ) " करता है । को वह कैसे धारण तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥2 ॥

ऋषि पिप्पलाद ने कौसल्य से कहा कि “तुम्हारा प्रश्न बड़ा ही कठिन है, " बड़ी निष्ठा रखते हो इसलिए मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा ॥ फिर भी तुम ब्रह्म में आत्मन एष प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥3 ॥

यह प्राण आत्मा में से उत्पन्न होता है । जिस तरह शरीर की अपनी परछाई होती है, उसी तरह प्राण आत्मा में छिपा हुआ ( ओतप्रोत ) होता है और वह जब इच्छा करता है, तब इस स्थूल शरीर में आता है (स्थूल शरीर धारण करता है ) । यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते । एतान् ग्रामानेतान् ग्रामानधितिष्ठ- स्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव संनिधत्ते ॥4 ॥

जिस तरह कोई सम्राट् अपने प्रभुत्व में काम करनेवालों को “ तुम अमुक- अमुक गाँवों में जाओ और उनकी देखभाल करो” – ऐसा कहकर नियुक्त करता है, उसी प्रकार यह प्राण भी अपने नीचे काम करनेवाले प्राणों और चक्षुरादि ज्ञानेन्द्रियों को उनके अपने- अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए नियुक्त करता है । पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्भुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥5 ॥

मलत्याग करनेवाली इन्द्रिय और प्रजननेन्द्रिय को सम्हालने के लिए यह प्राण अपान को नियुक्त करता है और आँख - कान -नाक- मुख को सम्हालने के लिए स्वयं अपने को नियुक्त करता है । शरीर के मध्य भाग की देखभाल करने के लिए समान नाम का प्राण को नियुक्त करता है । वह अन्न को रक्त के रूप में परिवर्तित कर देता है । इस प्राणरूपी जठरस्थित अग्नि से ये सात इन्द्रियाँ (दो आँखें, दो नथुने, दो कान और जीभ) हमको सही ज्ञान करानेवाली सात ज्वालाओं जैसी होती हैं ।

पृष्ठ 88

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उपनिषत्सञ्चयनम् 46 शतं शतमेकैकस्यां हृदि ह्येष आत्मा । अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां व्यानश्च- द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु रति ॥6 ॥

नाड़ियाँ हैं । उन नाड़ियों में प्रत्येक हृदय आत्मा का निवासस्थान है । इस हृदय में एक सौ एकहजार उपशाखाएँ हैं । ' व्यान' नाम का की सौ -सौ शाखाएँ हैं और हर एक शाखा की बहत्तर- बहत्तरमें) भ्रमण करता रहता है । प्राण इन नाड़ियों में ( उनकी शाखाओं और उपशाखाओं अथैकयोर्ध्वं उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥7 ॥

और यदि मनुष्य अच्छे कार्य करता है, तो 'उदान' नाम का प्राण उसेकरतामृत्युहै तोके समयउसे अधममें सुषुम्णालोक नाडी के द्वारा उत्तम ( ऊर्ध्व ) लोक में ले जाता है । यदि मनुष्य नीच कर्मसमप्रमाण में करता है तो उसे में ले जाता है । यदि मनुष्य अच्छे और बुरे- दोनों प्रकार के कर्म हैं । मनुष्यलोक में ले जाता है जहाँ सामान्यतया मानवप्राणी जाया करते आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥8 ॥

जो सूर्य है, वह बाहर का प्राण है । यह सूर्य आँखों में स्थित प्राण पर मानो अनुग्रह करतायह प्राणहो वहहैधरती। इसयहपरतरहप्राणस्थितउदितअपनेपदार्थहोताप्रभुत्वऊँचेहै किकेनहींजिससेनीचेउड़कामजातेआँखेंकरनेवालेयादेखफिसलसकेंअपानवायुनहीं। जातेदेवपरपृथ्वी। वहनियन्त्रणकेसभीअधिष्ठातावस्तुओंरखता हैकोहैं,। इसीवहीअपनीवजह- अपनीसे जगह पर ठीक- ठाक रख देता है । आकाश और पृथ्वी के बीच के अवकाश में एक और वायु भी है, इसे 'समान' कहा जाता है । वह वायु प्राण का एक दूसरा अनुचर है । इसके सिवा एक और भी अनुचर है, उसे ' व्यान' कहते हैं । वह साधारण वायु है, वह भीतर और बाहर - दोनों जगह है । तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः । पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥१ ॥

जो अग्नि है, वह उदान है । जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उसके शरीर में से उष्णता चली जाती है और उसकी सभी इन्द्रियाँ मन में विलीन हो जाती हैं और वह अगले जन्म के लिए तैयार होता है ।

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः ।

सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥10 ॥

यह मनुष्य मृत्यु के समय में जिस तरह सोचता है उन्हीं विचारों के साथ वह जीवात्मा प्राण के साथ जुड़ता है । बाद में वह समनस्क जीवात्मा वाला प्राण अग्नि ( उदान) के साथ जुड़ता है । क्योंकि उदान उसका वाहक है | उस समय जीवात्मा की जो कामनाएँ हों, उस लोक में प्राण जीवात्मा को ले जाता है और उसके बाद जीवात्मा नया जन्म धारण करता है । य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति । तदेष

श्लोकः ॥11 ॥

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चतुर्थ: प्रश्न: ] प्रश्नोपनिषत् ( 4 ) 47 जो ज्ञानी मनुष्य इस प्राण को 'प्राण' के रूप में अर्थात् प्रजापति अथवा जानता है, उसके वंश का कभी विनाश नहीं होता ( क्योंकि वह जानता हिरण्यगर्भ के रूप में प्रजापति अर्थात् दोनों एक ही हैं) । और वह अमर भी हो जाता है । इसके हैसमर्थनकि वह स्वयं और है— में यह श्लोक

उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।

अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते ॥

विज्ञायामृतमश्नुते इति ॥12 ॥

इति तृतीयः प्रश्नः ॥3 ॥

प्राण वैश्विक आत्मा में से आता है ( उत्पत्ति) । वह अपनी इच्छानुसार आकार धारण ++ ( आयति) और इसके बाद शरीर के अलग - अलग भागों में अपने को प्रयोजित करता है । प्राणकरताके हैये अंश ( आकार - भाग) अलग- अलग प्रकार के होने से उन्हें अलग- अलग काम सौंपे गए हैं । बाहर का प्राण सूर्यरूप में और भीतर का नेत्र के रूप में है । तुम यदि प्राण और उसके कार्यों को भलीभाँति जान लो तो तुम अमर हो जाओगे । क्योंकि तब तो तुम जानते ही हो कि तुम स्वयं ही वह प्राण हो । इस प्रकार प्रश्नोपनिषद् में तीसरा प्रश्न यहाँ समाप्त हुआ । अथ चतुर्थः प्रश्नः अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिन् जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥1 ॥

इसके बाद गर्ग वंश के सौर्यायणी ने पिप्पलाद से पूछा– “हे भगवन्, इस मानव- शरीर में कौन से अंग सोकर आराम करते हैं? और कौन से अंग सर्वदा जाग्रत् रहते हैं? अंगों के इन दो वर्गों में ( सक्रिय और निष्क्रिय— ऐसे दो वर्गों में ) कौन -सा वर्ग स्वप्न देखने वाला होता । और गाढ़ निद्रा का सुख कौन -सा वर्ग प्राप्त करता है? गाढ़ निद्रा के समय में ये सब अंग किस स्थान में रहते हैं? तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एत- स्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥2 ॥

तब पिप्पलाद ने उससे कहा–- "“ हे गार्ग्य! जब सूर्य अस्त होता है, तब उसकी सभी किरणें एकत्रित हो जाती हैं और सूर्य के तेजोमय शरीर में विलीन हो जाती हैं । परन्तु फिर से जब सूर्य उगता है, तब ये किरणें पुनः सभी दिशाओं में फैल जाती हैं । उसी प्रकार मनुष्य जब गाढ़ निद्रा में ( सुषुप्ति में) लीन हो जाता है, तब उसकी सभी इन्द्रियाँ उनके शासक ( नेता) रूप मन में चली जाती हैं एवं एकाकार हो जाती हैं । तब ये इन्द्रियाँ कुछ भी कार्य नहीं करतीं । फलतः मनुष्य इस अवस्था में सुनता

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48 उपनिषत्सञ्चयनम् नहीं है, सूँघता नहीं है, स्वाद नहीं लेता, स्पर्श नहीं करता, बोलता नहीं है, स्वीकार भी नहीं करता, इन्द्रियों का आनन्द नहीं लेता, मल- मूत्र नहीं त्यागता है, चलता भी नहीं । लोग इसके विषय में कहते हैं कि 'वह सो रहा है' । प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानो- ऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥3 ॥

यह शरीर एक नगर जैसा है । जब हम सोये होते हैं, तब अग्नि सदृश प्राण तो जागते रहते हैं 1 जो अपान है, वह ‘गार्हपत्य अग्नि' है, और जो व्यान है, वह ' अन्वाहार्य' नाम का पचन- अग्नि है अथवा वह दक्षिण का अग्नि है और जो प्राण है, वह ' आहवनीय' नाम का अग्नि है । क्योंकि उसे गार्हपत्य अग्नि में से अलग कर दिया जाता है ( गार्हपत्य अग्नि प्रत्येक गृहस्थ के घर में सदैव जलता रहता है, कभी बुझता नहीं है ) । यज्ञानुष्ठान के समय उस गार्हपत्याग्नि से अलग कर जो अग्नि यज्ञभूमि में लाया जाता है, वह ' आहवनीय' कहलाता है । वही दक्षिण दिशा में स्थान पाकर 'दक्षिणाग्नि' होता है । ( यह मंत्र रूपकात्मक है ) । यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः । इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥4 ॥

( शारीरिक क्रियाओं में ‘ मानसिक यज्ञ' का चिन्तन रूप अनुष्ठान यहाँ रूपकात्मक ढंग से उपनिषद् द्वारा बताया जा रहा है । तृतीय कण्डिका के ही अनुसन्धान में— ) यहाँ मानस यज्ञ में समान नाम का प्राण पुरोहित माना जाता है । जिस प्रकार अग्निहोत्र यज्ञ में यज्ञ करानेवाले पुरोहित आहुति के दो समान भाग करते हैं, उसी तरह यह समान प्राण भी हमारे उच्छ्वासों और नि: श्वासों को दो समान भागों में बाँट देता है और शरीर का सन्तुलन करता है । ( इस मानस यज्ञ में) हमारा जो मन है वह पुरुषरूपी यजमान है । इसी के लिए यह ( मानस ) यज्ञ किया जाता है और जो उदान नाम का प्राण है, वह इच्छित यज्ञफल ही है, क्योंकि यह उदान ही प्रतिदिन जब मनुष्य निद्रावस्था में होता है तब मन को ब्रह्म की ओर ले जाता है ।1 अत्रैष देवः. स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति । श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥5 ॥

जब हम स्वप्न देखते हैं (स्वप्नावस्था में होते हैं ) तब हमारा मन अपनी महान् शक्तियों देखता है । हमने जो कुछ जाग्रत् अवस्था में देखा होता है, वही सब हम स्वप्नावस्था में देखते हैं को ( )तरह -जाग्रत् अवस्था का सुना-हुआ सब कुछ हम, फिर से स्वप्न में सुनते हैं । जाग्रत् । उसीबहुत से स्थानों में और बहुत से देशों में होते हैं तो स्वप्न में हम उन्हीं अवस्था में हम,लौटते हुए दिखाई देते हैं । देखी या अनदेखी सुनी या अनसुनी स्थानों और देशों में वापिस झूठी— इन सभी वस्तुओं को हम स्वप्न में देख सकते हैं और उनका, अनुभूत या अननुभूत, सही या वस्तुओं के साथ मानो हम एकरूप हो जाते हों, ऐसा अनुभव करते अनुभवहैं । कर सकते हैं । उन सभी स यदा तेजसाऽभिभूतो भवति अत्रैष देवः स्वप्नान्न ञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥6 ॥ पश्यत्यथ तदैतस्मि-