Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 101–110
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 101–110
पृष्ठ 101
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
-श्रीः इति - उपनिषदविज्ञान भाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्डस्य प्रधानविषयसूची तथा स्मारकविषयसूची उपरता
पृष्ठ 102
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः प्रारम्भिक - निवेदन ( प्रथमखण्डानुबन्धी )
पृष्ठ 103
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
(
पृष्ठ 104
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ ॐतत् सद् ब्रह्मणे नमः ॥ काम PE. उपनिषद विज्ञानभाष्यभूमिका 1 णा -४
१ - नि षु सीद गणपते! गणेषु स्वामाहुर्विपतमं कवीनाम् ।
ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवचित्रमर्च ॥
२ – एक एवाग्निर्वहुधा समिद्धएक: सूर्यो विश्वमनुप्रभूतः ।
एकैवोषाः सर्वमिदं विभाति " एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ” ॥
६ – हेगणपते! आप गपों में ( मध्द्भणों में एवं स्तोतृगणों में विराजिए । क्यों कि ( विद्वान्-लोग ) आप ही को कवियों के मध्य में श्रेष्ठ मेधावी समझते हैं । अपिच आपके बिना दूर का अथवा समपि कोई भी कार्य नहीं किया जासकता । ( इसलिए सभी कार्यों के आरम्भ में आपका प्रथम स्मरण नितान्त अपेक्षित का हैं ) । हे महनीय गणपते! त्रिवृत् ( ६ ), पञ्चदश ( १५ ), सप्तदश ( १७ ), एकविंश ( २१ त्रिव २७, त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) आदि विविध स्तोमों से युक्त महामहिमशाली, अतएव विद्वानों की दृष्टि ), में चादरणीय जो यह हमारा स्तोम ( कार्यराशि ) है, उसे आप निर्विघ्न पूर्ण करने का अनुग्रह करैं । “ ऋक् सं ० १०।११२ । ” १ – एक हो अग्नितत्व ( गायत्री - त्रिष्टुप जगती यादि छन्दों के भेद से ) गाईपत्य, श्राहवनीय दक्षिणाग्नि, आवसथ्याग्नि, सभ्याग्नि, धिष्ण्याग्नि, आहृताग्नि, प्रहृताग्नि, आमादग्नि, क्रव्यादग्नि, कव्यवाडग्नि, वैश्वानरश्रग्नि, सान्तपनाग्नि, वेदाग्नि, संवत्सराग्नि आदि अनेक रूपों से यत्र तत्र प्रज्वलित हो रहाहै । एक ही सूर्य्य विश्वोपलक्षित चराचरजगत् में विभूति एवं योग सम्बन्ध से प्रविष्ट होकर उन सब स्थावरजंगम पदार्थों का आत्मा बनता हुआ नानाभावों में परिणत हो रहा है । ३० योजन पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखने बाला, सूर्य से ३० योजन पश्चिम की ओर अपनी स्थितेि रखने वाली उषाकाल की अधिष्ठात्री उषादेवीउदयबिन्दु के भेद से नानारूप धारण कर सर्वत्र प्रकाशित हो रही है । मानाभेदभिन्न उक्त सारा प्रपन्च एक हीब्रह्म का बैभव है । एक ही ब्रह्मतत्व उपाधि भेद से अनेक रूप धारण कर विभूति सम्बन्ध से सर्वत्र व्याप्त हो रहाहै । 66 ऋक् सं ० ६/४/२६ " |
पृष्ठ 105
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
-- । मङ्गलपाठ ॥ॐॐ
३ – वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
-वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सानो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥
४- -वागतरं प्रथमजा ऋतस्य वदानां माताऽमृतस्य नाभिः ।
सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु ॥
५ – यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
तं देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुत्तुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥
३— * वसु - रुद्र आदित्य मेदभिन्न ३३ श्राग्नेय देवता, सम्पूर्ण सौम्यदेवता, कर्म्मदेवता, आत्मदेवता, श्रमिमानीदेवता, पुरुषविध नित्य अष्टविध चेतन चान्द्र देवता, पुरुषविध चेतन अनित्य प्राणी देवता आदि सभी देवता एकमात्र वाक्तत्व को आधार बनाकर ही जीवित हैं । २७ गन्धर्व, सब प्रकार के पशु, मनुष्य आदि सब प्रजाएं वाक् को प्रतिष्ठा बना कर ही स्वरूप से प्रतिष्ठित हैं । भूः भुवः स्वः, महः, जनः तपः, सत्यं यह साता भुवन वाक्धरातल में ही समर्पित हैं । ( इस प्रकार जो वाक्तत्व चराचर में व्याप्त हो रहा है ) इन्द्रपत्नी नाम से प्रसिद्ध वह वाग्देवी ( हमारे इस शब्दराशरूप वाङ्मय यज्ञ में इसे सफल बनाने के लिए ) हमारी पुकार सुनें । " तै ० ब्रा ० २२८ । - । ५ । ” । ४— “ अक्षरामिति ( अ -- त -- रम् -- इति ) ध्यक्षरं, वागित्येकमक्षरम् " " एकाक्षरा वै वाक् ” ( ताण्ड्यत्रा ० ४ | ४ | ३ । ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार वाक्रूप एकाक्षर ब्रह्म, किंवा अक्षरस्वरूप वाग्ब्रह्म ही ( विश्व में ) सब से पहिले प्रकट हुआ है । अतएव यह वाग्देवी ऋततत्व की ' प्रथमजा ' कहलाती है । यह . वाक् ( अनन्त ) वेदों की माता है, अमृत की नाभि है । ऐसी यह वाग्देवी प्रसन्न होती हुई हमारे इस वाग्यज्ञ नें पधारे । श्रपिच हमारी रक्षा करने वाली यह वाग्देवी ( हमार इस वाग्यज्ञ को निर्विघ्न पूर्ण करने लिए हमारी प्रार्थना सुनें । " तै ० ना ० २८ " । ५ - जो श्रौपनिषद पुरुष ( सृष्टिनिर्माण के लिए ) प्रतिष्ठालक्षण चतुर्मुख ब्रह्मा को सर्वप्रथम उत्पन्न करता है, जो वेदान्त पुरुष उस ब्रह्मा के लिए ( सृष्टिसाधनरूप ) वेदों को अर्पित करता है, प्रज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध सर्वेन्द्रियलक्षण मन, एवं विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध बुद्धि के प्रकाश स्वरूप उसी ( चिद्धन ब्रह्म ) देव की शरण में मैं मुमुत्तु जारहा हूं । " श्वेता ० उ ० ६।१८ " । * देवताओं के स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वत्समाज में आज अनेक प्रकार की भ्रांतिएं फैली हुई हैं । इस के निराकरण के लिए शतपथ हिन्दी विज्ञान भाष्य ( १ वर्ष ) के १०-११-१२ अंक देखने चाहिएं | २
पृष्ठ 106
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ - भूमिका
६- प्रोष्ठापिधाना नकुली दन्तेः परिवृता पविः ।
सर्वस्यै वाच ईशाना चारुमामिह वादयेत् ॥
ध्यात्मजगत् के अन्तस्तल पर पहुंचे हुए विचारकक्षा के परपारगामी महामहिम-शाली उन महामहर्षियों के अनन्तकाल के तपोयोग से प्रादुर्भूत औपनिषद ज्ञान के सम्बन्ध में बहिरङ्गभाव से सम्बन्ध रखने वाली समालोचना का, दूसरे शब्दों में बहिरंग परीक्षा का समावेश करना अनुचित नहीं तो उचित भी नहीं कहा जासकता । साथ ही में गभीरतम रहस्यार्थों का प्रतिपादन करनें वाले छन्दोभाषा-मय ( वेदभाषामय ) उपनिषद्ग्रन्थों का नागरी जैसी लौकिक भाषा में प्रतिपादन करना, इस व्यावहारिकी भाषा द्वारा अनेक तात्पर्यार्थों को अपने उदर में रखने वाले छन्दोभाषा के शब्दों के भावों को प्रकट करने का साहस करना भूपृष्ठ पर बैठे हुए सूर्य का स्पर्श करना है । इस लौकिकी भाषा द्वारा वेद के गभीरतम तत्वों को यथावत् प्रकट कर देना नितान्त असम्भव है । लौकिकी भाषा की कौन कहै, हमारा तो यह भी विश्वास है कि भारती नाम से प्रसिद्ध ब्राह्मी - ( संस्कृत ) - भाषा के द्वारा भी वेदों के रहस्य को यथावत् प्रकट नहीं किया जासकता । जिस अर्थ के लिए वैदिक ऋषियों के अन्तःकरण में जो शब्द प्रकट हुआ है, उस शब्द की समता करने वाला, उसी अर्थ को यथावत् रूप से व्यक्त करने वाला शब्द दूसरी भाषाओं की कौन कहै, वैदिकभाषा के अतिसन्निकट संस्कृत साहित्य में भी उपलब्ध नहीं हो सकता । उक्थ - बृहती - धामच्छद - श्यैत- नौषस - जर्फरी - तुर्फरी - रथन्तर- बृहत् रेवत-शक्वर- वषट्कार- परिप्लव - पृष्ठ - अभिप्लव - स्तोम - अहर्गण - मनोता - वैश्वरूप्य निविव-कुम्ब्या - गाथा - अर्क - अशिति - ऊर्क -स्वरसाम - स्कम्भ - मन्थी -शुक्र- उपांशु - अन्तर्याम-बहिर्याम- अप्तोर्याम - अभिगर - प्रतिगर - काणुका - इरा - आभूति - आभीक प्राप्त्या प्रयुत-प्राद्रदार्नु - असित आदि सहस्रों शब्द वैदिक साहित्य में ऐसे प्रयुक्त हैं, जिन का अर्थ अन्यभाषा के शब्दों द्वारा कदापि गतार्थ नहीं हो सकता । जिस अर्थ के लिए ऋषि के द्वारा जो शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह अर्थ उसी शब्द से प्रकट हो सकता है । पर्याय शब्दों द्वारा
पृष्ठ 107
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रारम्भिक वक्तव्य उस अर्थं की सङ्गति लगा लेना एक प्रकार से असम्भव ही है । इसलिए वेदार्थ जिज्ञासुओं से आरम्भ में ही हम यह निवेदन कर देना अपना आवश्यक कर्त्तव्य समझते हैं कि यदि वे वेद का वास्तविक रहस्य जानना चाहते हैं तो उन्हें अनन्यभाव से मूलग्रन्थों की ही शरण में जाना चाहिए । तभी उन की जिज्ञासा सर्वात्मना शान्त हो सकती है । सर्वज्ञाननिधिस्वरूप जिस वेदराशि को सर्वप्रथम संसार के सामने रखने का गौरव एकमात्र इस देश के महर्षियों को मिला था, करालकाल की कुटिल भ्रूभङ्गी से आज वही ऋषिसन्तान अनार्षप्रणाली का अनुगमन करती हुई अपनी उस अमूल्य सम्पत्ति से सर्वथा वञ्चित हो गई है, यह जानकर किस अर्थ हृदय में अन्तर्वेदना का उदय न होगा । " वेदशास्त्र ही इतर सब शास्त्रों का मूल आधार है " इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में आर्यावर्त्त का कोई भी विद्वान् किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं उठा सकता । सभी विद्वान् एकखर से वेदमहत्ता स्वीकार करते हैं । यह सबकुछ होने पर भी आज भारतवर्ष में वैदिक अध्ययनाध्यापन के सम्बन्ध में विद्वानों की ओर से जैसी उदासीनता प्रकट की जारही है, निःसन्देह यह हमारे पतन का मूल कारण है । " वेदोऽखिलो धर्ममूलम् " - " वेदाद्धम्र्मो हि निर्बभौ " - " वेद एव द्विजातीना निःश्रयकरः परः " - " योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमा-१ - ऋक्, यजुः साम, अर्थव लक्षण मन्त्रात्मकवेद, एवं विधि, आरण्यक उपनिषल्लक्षण ब्राह्मणात्मक-वेद ही अखिल वेद है | मन्त्रत्र ह्मणात्मक यह सम्पूर्ण वेदशास्त्र ही धर्म्म में मूल है । अर्थात् मन्वादि धर्म्मशास्त्रों की प्रामणिकता वेदशास्त्र पर ही निर्भर है । " मनुः २ । ६ । ' २ - श्रुति वेदशास्त्र है, स्मृति धर्म्मशास्त्र है । इन्हीं दोनों से धर्म्मव्यवस्था हुई है । “ मनु २।१० ” ३ – द्विजाति के लिए वेदशास्त्र ही निःश्रेयसभावप्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है । " मनुः...... II ४— “ जो द्विजाति वेद न पढ़ कर ( केवल ) अन्य शास्त्रों में ( ही ) परिश्रम करता है, वह अपने इस जन्म में ही अपने वंशसहित शुद्रकोटि में प्रविष्ठ होजाता है । " मनुः २ १६८ ” । ४
पृष्ठ 108
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ भूमिका शु गच्छति सान्वयः ” – “ चातुर्वर्ण्य त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । भूतं भव्यं भवच्चैत्र सर्व वेदात - प्रसिद्ध्यति " - " ब्रह्मविद्यया ह वै सर्वे भविष्यन्तो मन्यन्ते मनुष्याः " " जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः " इत्यादि श्रौतस्मात्तवचन सर्वात्मना एकमात्र वेद का ही स्तुतिगान कर रहे हैं, वेद को ही अभ्युदय एवं निःश्रेयस प्राप्ति का अन्यतम कारण बतला रहे हैं । श्चर्यमहर्षियों का यह स्पष्ट एवं निःसदिग्ध वेद के आदेश है कि यदि द्विजातिवर्ग - वास्तविक रहस्य को जान लेता है तो इस लोक एवं परलोक दोनों में उस का पूर्ण स्वातन्त्र्य होजाता है । वैदिकविज्ञान के परिज्ञान से, एवं उसके प्रयोग ( Practice ) से वह कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथाकर्त्तुं समर्थ बन जाता है । प्रकृतिदेवी किसी नियत नियम विशेष के आधार पर ही विश्वरचना करने में समर्थ होती है । सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी नक्षत्र - ग्रह- उपग्रह - ऋषि-पितर असुर गन्धर्व - देवता मनुष्य पशु कृमि - कीट- पक्षि - ओषधि - वनस्पति - धातु-- उपधातु-रस- उपरस - विष उपविष पर्वत - नद नदी समुद्र आदि की समष्टिरूप विश्व किसी निश्चित नियम के आधार पर सम्पन्न हुआ है, विश्वरचना का कोई नियत क्रम है । सारी रचना किसी नियत शिल्प ( कारीगरी ) को लिए हुए हुई है । विश्व एवं विश्वान्तर्गत सारा प्रजावर्ग नियतभावस्वरूप इस नियतिब्रह्म की चर्चा ( श्राचरण - शासन ) से नित्य श्राक्रान्त है । दूसरे शब्दों में यह नियतिचर ब्रह्म ही सब का अधिष्ठाता बन रहा है । ' ब्राह्मण - क्षत्रिय वैश्य सच्छूद्र भेदभिन्न चारों वर्ण, पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौ रूप - तीनों लोक, ब्रह्मचर्य-गृहस्थ - वानप्रस्थ - संन्यास लक्षण चारों आश्रम, एवं जो कुछ भूत - भविष्यत् वर्त्तमान इन तीनों कालों में समाया हुआ है, वह सबकुछ वेद से ही प्रवृत्त हुआ है । " " मनुः १२/६७ । " । ६ - – “ ( वेदार्वद्यात्मिका ) ब्रह्मविद्या से मनुष्य सबकुछ होना संभव समझते हैं । अर्थात् वेदविद्या के आधार पर मनुष्य प्रकृतिवत् सबकुछ करने में समर्थ है । " " शतत्रा ० १४।४।२।२० । " । ७ – “ धर्म की ( मौलिक ) जिज्ञासा रखने वालों के लिए वेद ही सर्वश्रेष्ठ आधारभूमि है । धर्मशास्त्र में जिन कर्त्तव्य कम्मों का आदेश हुआ है, उन सब का यदि मौलिकरहस्य ( Atterupts thory ) जानना है तो वेद की ही शरण में जाना चाहिए । वेद ही 6. ऐसा क्यों करें? " यह जिज्ञासा शान्त करेगा " । " मनुः २ १३ " ।
पृष्ठ 109
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
1 प्रारम्भिक वक्तव्य यही नियतिचर ब्रह्म श्रौत - ( ब्राह्मण - उपनिषदादि ) - ग्रन्थों में " अन्तर्यामी " नाम से व्यवहृत हुआ हैं । यही अन्तर्यामी शास्ता नियतिचर ब्रह्म पाश्चात्य भाषा में नेचर ( Nature ) नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । प्रकृति -अव्यक्त- अक्षर - नियतिचर - शास्ता - नेचर कुछ भी कहिए. एक ही बात है । विश्वाधिष्ठाता, विश्वसृष्टिप्रवर्तक, सुसूक्ष्म, ज्ञानमूर्त्ति यह नियति-चर ब्रह्म ही मौलिक वेदतत्व है, जैसा कि आगे के प्रकरणों से स्पष्ट हो जायगा । यह सर्वज्ञ वेदतत्व चिरकाल के तपोयोग से प्रतीतानागतज्ञ, ÷ विदितवेदितव्य, A अधिगतयाथातथ्य महर्षियों के पवित्र अन्तःकरण में भगवान् स्वयम्भू प्रजापति की प्रेरणा से स्वतएव श्राविर्भूत हुआ है, एवं युगधर्मानुसार यह विलुप्त वेदतत्व समय समय पर उन्हीं सात्विक अन्तःकरणों में प्रकट होता रहता है । इसी आधार पर प्राप्त पुरुष कहते हैं-B
युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।
लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयम्भुवा ॥
मन्त्रब्राह्मणात्मक उसी नित्य अपौरुषेय वेदराशि को लोककल्याण के लिए उन श्राप्त महर्षियों नें हमारे समक्ष उपस्थित किया, एवं हमें आदेश दिया कि यदि तुम अपना ऐहलौकिक एवं पारलौकिक कल्याण चाहते हो, यदि सम्पूर्ण विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हो, यदि विश्व के मानव समाज को सभ्यता का पाठ पढ़ाने का अधिकार प्राप्त करना चाहते हो तो इस वेदराशि को अपना जीवनव्रत बनायो 1 । वेदार्थतत्ववेत्ता राजर्षि मनु स्थान स्थान पर इस वेदस्वाध्याय के ही महत्व का प्रतिप्रादन किया है । बिना वेद के वे द्विजाति का जन्म ही निरर्थक समझते हैं । मनु के कथनानुसार वेदवित् द्विजाति साक्षात् ब्रह्म की प्रतिमा है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों से स्पष्ट हो जाता है— • श्रतीत एवं भविष्य की स्थिति का अपनी दिव्यदृष्टि से पूर्ण ज्ञान रखने वाले । ÷ विश्व में जो कुछ जानने की वस्तु है, उसे जानने वाला ही " विदितवेदितव्य " कहलाता हैं । A वस्तुतत्व के यथार्थस्वरूप पर पहुंचने वाले । B युग युग के अन्त में विलुप्तप्राय इतिहास युक्त वेदों को महर्षिगण ने स्वयम्भू प्रजापति की अनुज्ञा ( प्रेरणा ) से तपोयोग पूर्वक ( तपश्चयां के बल से ) पुनः प्राप्त किया ।
पृष्ठ 110
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
• भूमिका १- वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं यथाकालमतन्द्रितः । प्राक तं ह्यस्याहुः परं धर्म्ममुपधर्म्मोऽन्य उच्यते । ( मनुः ४ । १४७ । ) । २- तपो विशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः । वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ ( मनुः २।१६५ । ) । ३ - वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्यन् द्विजोत्तमः । वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते । ( मनुः २।१६३ । ) । ४ - प्र हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः । कालिक यः स्रग्व्यपि द्विनोऽधीते स्वाध्यायं शक्तितोऽन्वहम् ॥ ( मनुः २ १६७ ] ) । १- ब्राह्मण को चाहिए कि वह नियत समय पर बालस्य रहित होकर वेद का ही अनन्यभाव से अध्ययन करै । क्योंकि वेदस्वाध्याय को ही ऋषियों ने ब्राह्मण का सर्वोत्कृष्ट धर्म्म ( कर्तव्य ) माना है, एवं अन्य कर्तव्यों को गौण कहा है । २- यम - नियमादि तपोरूप नियमों के अनुगमन के साथ, श्रुत्युक्त महानाम्नी आदि व्रतों के अनुपालन पूर्वक द्विजाति को सरहस्य मन्त्रब्राह्मणात्मक समय वेद जानना चाहिए । ३ - उस ब्राह्मणश्रेष्ठ को, जो कि तपश्चर्या करने की इच्छा रखता है, ( अनन्यभाव से ) सदा वेद का ही अभ्यास करना चाहिए । कारण वेदाभ्यास ( वेदस्वाध्याय ) ही ब्राह्मण का सर्वोत्कृष्ट तप माना गया है । श्रर्थात् वेदाध्ययन ही ब्राह्मण की उत्कृष्टतम तपश्चर्या है । ४ - वह ब्राह्मण अपने सर्वाङ्गशरीर से महा उग्र तप ही कर रहा है, जो कि पुष्पमाला धारण किए हुए भी प्रतिदिन स्वशक्ति के अनुसार वेद का अध्ययन करता है । यहां ' स्रग्वी ' का यही तात्पर्य्य है कि आश्रम व्यवस्था के अनुसार ब्रह्मचय्याश्रम स्वाध्यायकाल माना गया है । इस आश्रम में ब्रह्मचारी को विशेष नियमों में चलना पड़ता है । उन्हीं नियमों में पुष्पमाला धारण करने का भी निषेध है । यह सब साधन गृहस्था-श्रम से सम्बन्ध रखते है | मनु कहते हैं कि यदि आश्रमयुक्त नियमों का पालन किन्हीं विशेष पारीस्थतियों के कारण न होसके तब भी कोई हानि नहीं है । परन्तु वेदस्वाध्याय किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ना चाहिए ।