Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 91–100

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100

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विषयसूची १८६ ऋक्की ही सामरूपता ५५४ - विदेहमुक्ति का उक्थ- निष्कामभाव ६५५ - श्राध्वर्यवक का उक्थ - अध्वर्यु ५५६ - हौत्रकर्म्म का उक्थ होता ५५७ - श्रौद्गात्रकम्मं का उक्थ - उद्गाता ५५८ - श्रारम्भस्थानानुगत उक्थ - याव ५५- हृदयात्मक - आरम्भस्थान ५६० - हृदय से वस्तु का प्रस्ताव 39 19 १६० " " ५६१ - उक्थ, और प्रस्ताव ५६२ - उपक्रम - बीजरूप- प्रस्ताव ५६३ - हृदयस्थानीय - प्रस्तावबिन्दु की उक्थरूपता ५६४- उक्थरूप ऋगभाव ५६५ - हृदयपर्व, और उक्थात्मिका ऋ ५६६ – सापेक्षभावानुबन्धी ' आरम्भ ' शब्द ५६७ - प्रस्तव, और निधन ५६८ - नाश, और तन्निचन्धन मृत्युभाव ५६६- श्रवसान, और मृत्युभाव ५७० - वस्तु का अन्तिम श्रावरण, और निधनभाव ५७१- निधनात्मक छन्द ५७२- छन्दोरूप - वयोनाघ ५७३ - वयोनाधात्मक - पारावतपृष्ठ ५७४- ' पृष्ठ ' के पारिभाषिक स्वरूप का समन्वय ५७५- पृष्ठात्मक सामभाव ५७६- अवसानात्मक सामभाव ५७७ - प्रस्तावात्मिका - ऋक् ५७८ - निधनात्मक - साम ५७६ - अनिरुक्तभावापन्न - हृदय ५८० - निरुक्तभावापन्ना - परिधि ५८१ - अनिरुक्त - मूल मात्र ५८२ - निरुक्त - मूल भाव ५८३ - उक्थात्मक अनिरुक्तभाव ५८४- पृष्ठात्मक निरुक्तभाव ५८५ संकोचात्मक - उक्थभा क ५८६ - विकासात्मक पृष्ठभाव ८७ - उथ की ही पृष्ठरूपता ५८६ - ' ऋच्यधूढं साम गीयते ' का पारिभाषिक समन्वय ५६१- ( क ) - ' त्रिचं साम ' ५६१- ( ख ) - ‘ ऋचा समं मेने, तस्मात् साम ' " | ५६२ - हृदयरूप - उक्थपर्व, और ऋग्वेद " " I 29 " I " " " " " " 29 93 99 " 37 १६२ ५६३ - परिधिरूप - पृष्ठपर्व, सामवेद ५६४ - प्रतीति, और भाति का समतुलन 93 ५६५- सत्तासिद्ध - पदार्थ का स्वरूप समन्वय II ५६६ - ' वस्तुभाव ' का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय ५६७- सत्तासिद्ध - पदार्थ, और ' ब्रह्म ' भाव 99 ५६८ - हृदय - और परिधि - से सीमित ' रसभाव ' ५६६ - रसभाव का उपबृंह ६०० - उपबृ ंहणधर्म्म, और ' ब्रह्म ' भाव ६०१ - ' ब्रह्म ' पर्व, और यजुर्वेद १६२ " ६०२ - वस्तुपूरक अग्निमय- तीन - पर्व, और तन्निबन्धन - पर्ववेद " ६०३ – पर्वत्रयी का अन्योऽन्याश्रयत्त्व II ६०४ - पदार्थमात्रानुबन्धिनी पर्वत्रयी, और तदभिन्ना 67 " वेदत्रयी ६०५ - पर्वत्रयी रूपेण वेदत्रयी का विश्व में साम्राज्य ६०६ – पर्ववेदसंस्था - परिलेखः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तो 39 33 31 " 39 " 55 १६३ ( १ ) पर्ववेदनिरुक्तिः प्रकीर्ण भावापन्ना १२ - 25

पृष्ठ 92

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उपनिषद्भूमिका- प्रथमखण्ड अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ६२५ - ऋतु, और दा के रहस्यपूर्ण पारिभाषिक-स्वरूप का विश्लेषक - श्रौत सन्दर्भ ( २ ) -भावनावेदनिरुक्तिः - प्रकीर्ण- ४२६ - देवात्मा का मित्र ऋतुभाव भावापन्ना १३ - * -६०७ ( ख ) ज्ञान, और कर्म्म के साम्राज्य का संस्मरण ६०८ - कर्म्मगर्भित - ज्ञानतत्त्व, और तत्प्रधान विश्वात्मा " १६७ ६०६ - ज्ञानगर्भित - कर्म्मतत्त्व, और तत्प्रधान विश्व ६१० - विश्वात्मा की ' नियति ' से सञ्चालित विश्व " ६११ - विश्वात्मा की प्रतिहता प्रेरणा ६१२ - नियतिर्दण्डात्मक महद्भय ६१३ - कर्म्मधारा का परितः प्रवाह ६२७ - देवात्मा का वरुण - दक्षभाव १६८ १६६ 39 ६२८ - कामना, और ऋतु ६२६ - कामपूर्ति, और दक्ष ६३० - ब्रह्म, और ऋतु 39 33 39 ६३१ - क्षत्र और दक्ष 19 ६३२ - अभिगन्ता, और ऋतु ६३३ – कर्त्ता, और दक्ष 99 99 ६३४ - ब्रह्म क्षेत्र का साह - समन्वय ६३६ - ब्राह्मण - क्षत्रिय का ६३५ - मित्र - वरुण का ६३७ - ज्ञान - कर्म्म का " ६३८ - क्रतु दक्ष का " ६३६ - समन्वयमूलक - ' मैत्रावरुणग्रह ' 23 39 18 19 " " ६१४ - ' कर्म्मभावना.. और वेदोपलब्धि ६१५ - ' भावना ' शब्द का पदे पदे अभिनय ६१६ - ' भावना ' के विविध विवत्त ६१७ - ' कर्म्मभावना ', तथा ' ज्ञानभावना ' रूपेण भावना के दो महिमा - विव " ६१८ - सत्ता - स्वभाव- अभिप्राय- चेष्टा श्रात्म-" " जन्म- क्रिया- विभूति - बन्धु - आदि - विविध-भावानात्मक विवर्त्त ', और कोशकार ६१६ - ' भावो - भावना - क्रिया ' आदिरूपेण व्या -38 करणसम्मता भावना ६२० - उत्तर का लोकसंग्रहदृष्ट्या समादर ६२१- वेदत्रयी का स्वरूप संसाधक - भावनावेद ६२२ - ' भावना ' रूप परिभाषिक तत्त्व से समन्वित ' ऋतु ', और ' दक्ष ' १६८ ६२३- भावना मात्र में कतु, और दक्ष की व्यापकता ६२४- क्रतु दक्ष की समन्वितावस्था से ही-' भावना ' की स्वरूप - निष्पत्ति समन्वय ६४० - मित्र पुरोहित की स्वरूप परिभाषा ६४१ - समृद्धि के पारिभाषिक तथ्यों का स्वरूप-६४२ - ज्ञानरूप ब्रह्म का स्वातन्त्र्य ६४३ - कर्म्मरूप क्षेत्र का पारतन्त्र्य ६४४ - ज्ञानोपायक - ब्राह्मणतन्त्र ६४५ - कर्मानुगत- सत्तातन्त्र ६४७- सत्तातन्त्र का पारतन्त्र्य " 27 " 33 33 ६४६- ब्राह्मणतन्त्र का स्वातन्त्र्य " " " ६४८ - राष्ट्रसमष्टि का रहस्यात्मक समन्वय " " ६४६ - ' ग्रहयाग ' का संस्मरण " " ६५०- -'कर्म्मप्रेरणा, कर्म्म, कर्मसिद्धि, रूप तीन विभाग, और तत्ममन्वय ६५१ - उदाहरणात्मक यज्ञकर्म्म ६५२ - यज्ञकर्म में ऋत्विजों का वरगा ६५३ - यज्ञेतिकर्त्तव्यता का अनुगमन, और ऋत्विजों के आदेश ६५४ - यज्ञ - परिणाम - वेत्ता ऋत्विक ५१

पृष्ठ 93

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विषयसूची ६५५- कर्म्मपरिणामदर्शों - ऋत्विग्ब्राह्मण स्वरूप- सम-१६६ | ६८० - श्रौत - शब्दों के रहस्यार्थों का तथा वरुण-39 न्वय, और तन्निबन्धन मित्र, , और ब्राह्मण ६५६ - कम्र्मोत्थान का आरम्भस्थान और ' कर्मोपक्रम ' ६५७– ब्राह्मण, ' कर्म्मसिद्धि ” ६५८ - कर्म्म का अवसानस्थान, और ' ६५६ - स्वयं यज्ञकर्म्म, और ' कर्म्ममध्य व्याप्ति, और " ६६० - ब्रह्म - क्षत्रोभय - सहयोग की 99 कर्मसिद्धि का संस्मरण व्याप्ति का ६६१- श्रौतसिद्धान्त की रहस्यात्मिका 37 समन्वय कर्म्मशैथिल्य ६६२ - ब्रह्म, और उसका ६६३ - क्षेत्र, और उसका आदेशदानशैथिल्य , किन्तु-६६४ - ब्रह्म का भी ज्ञानकम्र्मोभयत्त्व 39 प्रधान रूपेण ज्ञानानुगतत्त्व , किन्तु ६६५- क्षेत्र का भी कर्म्मज्ञानोभयत्त्व प्रधानरूपेण - कर्मानुगतत्त्व ६६६ - ब्रह्म, और प्राज्ञाप्रदान ६६७ - क्षेत्र, और श्राज्ञानुवर्त्तन ६६८ वर्गीकरण की अनिवार्यता, और तन्मूला 19 समृद्धि - धम्मों का अभि-६६६ - उभयानुगमन से उभय भव, और समृद्धि का अवरोध स्वरूप- संरक्षण, ६७० - ज्ञान के स्वातन्त्र्य का 23 और तन्निबन्धनोपाय -प्रदर्शन ६७१ - मैत्रावरुणग्रहपतिपादिका श्रुति के समृद्धिवीज का स्पष्टीकरण ६७२ - हितैषी, और मित्र ६७३ - द्व ेषी, और वरुण ६७४ - एक रहस्यपूर्णा - आपत्ति ६७५- आपत्ति - निराकरणोपक्रम ६७६ - कम्मप्रवृत्ति, और मित्रभाव ६७७ - कर्मसिद्धि, और शत्रुभाव ६७८ - कर्म्मावसानरूपा कर्म्मसिद्धि ६७६ - कमवसान का महान् शत्रुत्त्व द्वारा शब्द ६८१ - सिद्धि के साथ मानवप्रज्ञा की शत्रुता ही कर्म्मप्रवृत्ति का अन्यतम - द्वारा २०२ ६८२ - पूर्वभावी संकल्प ६८३ - उत्तरभाविनी - कर्म्मसिद्धि ६८४- मध्यस्थ - कर्म्म ६८५ - भावना, वासनात्मक संकल्प २०० ६८६ - भावना - वासनात्मक संस्कारों के द्वारा-६८७ - स्मृति के उत्तेजक संस्कार " २०१ 27 29 " 27 ५२ मानस - विकास का अवरोध ६८८ - उत्तेजनात्मक क्षोभ ६८६- क्षोभानुगता अशान्ति ६६० - अशान्तिमूलक- दुःख तन्निबन्धन ६६१ - दुःखरूपा महामृत्यु, और महाविनाश का अन्यतम ६६२ -- मृत्युपाश से श्रात्मपरित्राण उपाव ६६३ - कामभावानुगता प्रवृत्ति ६६४ - प्रकृतिकर्मानुगता कम्मसिद्धि २०१ 39 99 " 27 ६६५ - ' त मन्दोऽपि प्रवर्त्तते ' का संस्मरण महती ६६६ - सिद्धि की वरुणरूपता में एक,, अन्या विप्रतिपत्ति, और तन्निराकरणप्रयास विप्रतिपत्ति ६६७ - मध्यस्थ- कर्म्म के माध्यम से ही II का सम्भावित निराकरण ६६८- प्रारम्भक्षण, रूढता और सिद्धिभाव की लक्ष्या-जन्म ६६६ - लक्ष्यानुगति, और संसिद्धि का ७०० - लद पूरक - कर्म्म लक्ष्यसिद्धि ७०१ - कर्भ के प्रति अनन्यता, और " ७०२ - कम्र्मानुगत श्राधकार ७०३ – फलानुगत - अधिकार शैथिल्य ७०४ - फलचर्व्वणा से कर्माधिकार-२०३ " " "

पृष्ठ 94

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७२३ - कर्म्म- पुरुषार्थः प्रवृत्तिः -- मध्यविन्दुः, उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड ७०५ - फल चर्व्वणा से सम्भावित दो महान्-अनिष्ट २०३ ७०६ - संकत्न्यानुगता सिद्धि की अधिकारात्मिका-चर्व्वणा का अन्यतम शत्रुत्व ७०७ - सिद्धि की तिनिबन्धना ' वरुणरूपता ' का तात्त्विक स्वरूप समन्वय ७०८ - सिद्धिदास - मानवों का कर्म्मशून्यत्त्व ७०६ - ज्ञानसिद्ध - लक्ष्मीसिद्ध - भोजनसिद्ध आदि सिद्धों की प्रतिमानात्मिका कर्म्मण्यता ७१० - समृद्धि से अनुगत प्रतिमान का शत्रुत्व ७११- सिद्धिरूप - वारुणपारण से श्रात्मत्राण का एकमात्र उपाय ७१२ - क्रतुरूप ब्रह्मभाव का पूर्व ७१३ - दक्षरूप क्रतुभाव का उत्तररूपत्त्व 25 " " 99 ७१४- उभयानुगत कर्म्मभाव का मध्यरूपत्त्व " ७१५ - त्रिपर्वा - भावनात्मक - पदार्थ, और तन्नित्र-न्धन - ' भावनात्मवेद ' ७१३ - ब्रह्मानुगत - अनुज्ञाकर्म ७१४ - क्षत्रानुगत - धाराक ७१५- परिणामी - समृद्धिक ७१६ - भावनाकर्म्मानुगता प्रस्तावना, और तन्नि-बन्धना - श्रनुज्ञा ७१७ - उपक्रमात्मिका प्रस्तावना, और तन्निबन्धन उक्थभाव ७१८ - उक्थरूपा - अनुज्ञा, और ' ऋग्वेद ' ७१६ - कर्म्मसिद्धिरूप निधनभाव, और तन्नि-बन्धन - ‘ सामवेद ' 39 ७२० - मध्यस्थ - यजनरूप - कर्म, और ' यजु-र्वेद ' 29 ७२१- भावनाजगत्, और तदनुगत त्रयीवेद का तात्त्विक - स्वरूप - समन्वय ७२२ - मित्रः ब्रह्म - ज्ञानम् - उपक्रमः, बन्धन - ‘ ऋग्वेद ’ और तन्नि-23 39 " II 33 Rel " २०४ " ' और तन्निबन्धन - ' यजुर्वेद ' ७२४ - दक्षः -- क्षत्रम् - कर्म -- उपसंहारः, और तन्निबन्धन - ' सामवेद ' " इति – वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( २ ) - भाववेदनिरुक्ति-प्रकीर्णभावापन्ना १३ अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ३ ) - भाववेदनिरुक्तिः-प्रकोणभावापन्ना १४ SK IF PE - * --७२५ -भाव, और भावना के अभेद का प्रशिक समन्वय प्रयास ७२६ - क्रियादृष्टि से अनुप्राणिता उभय- भिन्नता " ७२७ - परमार्थ दृष्टि से ' भाव ', और ' भावना ' २०४ २०६ की विभिन्नता 33 ७२८ - अन्तर्जगद्नुगता क्रिया, और ' भावना ' ” ७२६- - बहिर्जगदनुगता क्रिया, और ' भाव ' ७३० - भावनामय पदार्थों का ज्ञानमण्डल में प्रवेश " ७३१ - ज्ञानसीमा से बहिर्भुत पदार्थों का भाव-मयत्त्व - संस्थापन ७३२- भावनात्मक पदार्थों के निर्माता अन्य व्यक्ति, और ईश्वर ७३३ - भाव, और भावना - शब्दों से अनुप्राणित सुसूक्ष्म पारिभाषिक - भेद का समन्वय ७३४ - पदार्थसत्ता के दो विभिन्न स्वरूप 31 " 27 ५३

पृष्ठ 95

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७३५ - ज्ञानपूर्विका - सत्ता ७३६ – सत्तापूर्वक ज्ञान ७३७ - ज्ञानपूर्वक पदार्थों का अस्तित्त्व ७३८ - अतिपूर्वक पदार्थों का ज्ञान - ज्ञानपूर्विका सत्ता, और तन्निबन्धना ७३६-भावना ७४० - सत्तापूर्वक ज्ञान, और तन्निबन्धन भाव विषयसूची २११ २०६ ७५७ - अन्तिम भावविकार, और सामवेद ७५८ - भाववेदत्रयी स्वरूप परिलेखः 29 29 " ७४१ - ज्ञानानुगृहीत पदार्थों का भावनामयत्त्व,, ७४२- सत्तानुगृहीत पदार्थों का भावमयत्त्व " ७४३ - ' भावना ', और ज्ञानप्राधान्य 35 ७४४ - ' भाव ', और सत्ता प्राधान्य का तात्त्विक ७४५ - भावना, और भाव के पार्थक्य स्वरूप समन्वय प्रतिक्षणा-७४६ - भावरूप पदार्थों से श्रनुप्राणित नुगत परिवर्तन में ७४७ – अनन्तभावविकारों का षड्भावविकारों # 3 अन्तर्भाव ७४८ - ' जायते ' - रूप प्रथम भावविकार ७४६ - ' अस्ति ' रूप द्वितीय ७५० - ' विपरिणमते ' - रूप- तृतीय ७५१ – ‘ वद्ध'ते ' रूप - चतुर्थ ७५२ - ' अपक्षीयते ' -रूप - पञ्चम ७५३ - ' नश्यति ' - रूप- षष्ठ " " २१० इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ३ ) - भाववेदनिरुक्तिः-प्रकीर्णभावापन्ना १४ थ- वैज्ञानिक - वेदनिरुक्तौ ( ४ ) — दिग्वेदनिरूक्तिः प्रकीर्णभावापन्ना ७५६ - सत्तासिद्ध - पदार्थ ७६० - भातिसिद्ध - पदार्थ ७६१ - उभयसिद्ध - पदार्थ " " " 19 " " ७५४ - " अतोऽन्ये भावविकाराः -- एतेषामेव विकारा भवन्तीति हम्माह वार्ष्या-यरिणः ” २११ ७५५ - आरम्भानुगता - भावविकारचतुष्टयी, और ऋग्वेद " 23 ७५६ - पश्चम - भावविकार, और यजुर्वेद 17 १५ 0 * 1 २१५ " " " " ५४ " ७६२ - विशुद्धसत्तासिद्ध - पदार्थ " ७६३ – वत'मानानुबन्धी - सत्तासिद्ध - पदार्थ ७६४- चर्म्मचक्षु से अतीत सत्ता सिद्ध पदार्थ " ७६५ - ईश्वर - जीव - परलोक - प्राण - मन - बुद्धि चित्त- -महान् श्रव्यक्त - देवशक्तियाँ आदि प्रत्यक्षा-तीत सत्तासिद्ध - पदार्थ का ७६६ - वर्त्तमानानुबन्धी- सत्तासिद्ध-- पदार्थों स्वरूप समन्वय ७६७ - उभयसिद्ध - पदार्थों का स्वरूप - दिग्दर्शन " ७६८ - व्यवहारभावानुगत भातिसिद्ध - पदार्थ श्रादि ७६६ - दिक् - देश - काल - संख्या -- परिमाण -पदार्थों का भातिसिद्धत्त्व " ७७०- अस्तित्त्व से संस्पृष्टा भातियाँ ७७१- अस्ति, और भाति का पार्थक्य " " 23

पृष्ठ 96

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उपनिषद्भूमिका -- प्रथमखण्ड ७७२- सत्तारूपेण - पदार्थोपलब्धि, और वेद का सम्बन्ध २१६ ७७३- भातिरूपेण - पदार्थोपलब्धि, और वेद का सम्बन्ध ७७४- उभयरूपेण पदार्थोपलब्धि, और वेद क । सम्बन्ध ७७५ - वेदतत्त्व की सर्वव्याप्ति का संस्मरण ७७६ - सर्वव्याप्तिलक्षण- विश्वमूर्ति वेद का पदार्थ त्रयी के भेद से तीन संस्थाओं में विभाजन 31 ७७७ - तीनों संस्थाओं के रहस्यात्मक उदाहरण का तात्त्विक स्वरूप- समन्वय " ७७८ - हृदय - परिधि - सत्तारस - रूप पर्ववेद का संस्मरण 99 ७७६ - पर्ववेदानुगत - उभयसिद्धा वेदसंस्थानुगत-उदाहरण 39 59 ७८०- मानसभावनानुगत ' भावनावेद ' का संस्मरण " ७८१ भावना वेदानुगत भातिसिद्ध वेदसंस्था का उदाहरण ७८२ - बहिर्जगदनुबन्धी - भाववेद का संस्मरण ७८३- भाववेदानुगत सत्ता सिद्धा वेदसंस्था का उदाहरण ७८४ - विशुद्धभातिसिद्धा - वेदसंस्था के तात्त्विक उदाहरण का स्वरूप- समन्वय ७८८५ -- रहस्यात्मक - वर्गीकरण, और सप्तविध वेद-संस्थाओं का नाम - संस्मरण ७८६- क्रमप्राप्ता चतुर्थी - दिग्वेदसंस्था, और उस का रहस्यात्मक - स्वरूप - समन्वय ७८७- दशविध दिशाओं का प्रमुख चार दिशाओं अन्तर्भाव ७८५ - ऊर्ध्व - अधः - स्वस्तिक भाव ७८६ - मित्राद्ध कपाल ७६० वरुणाद्ध कपाल ७६१ - ऐन्द्र - पर्व कपाल ७६२ - वरुण- पश्चिमकपाल " " 97 ७६३ - मैत्रावरुणग्रह, और दिक्तत्व ७६ ४ - पूर्वादिक्, और इन्द्रदेवता ७६५-५श्चिमादिक् और वरुणदेवता ७६६ - उत्तरादिक्, और चन्द्रदेवता ७६७ दक्षिणादिक, और यमदेवता ७६८ - पूर्वादिक, और ऋग्वेद ७६६- दक्षिणादिक्, और सामवेद ८००- उत्तरादिक, और सामवेद ८०१ - प्रतिचीदिक, और अथर्ववेद ८०२ - दिग्वेद प्रतिपादक - श्रु तिवचन इति — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ४ ) - दिग्वेदनिरुक्तिः-प्रकीर्ण भावापन्ना १५ अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ५ ) — देशवेदनिरुक्तिः -प्रकीर्णभावापन्ना १६ २१७ २१८ " " ८०३ स्थानात्मक देशभाव का संस्मरण २२३ 11 " " ८०४ - देशानुग्राहिका - दिशा का संस्मरण ८०५- देश की परिचायिका - दिशा ८०६ - मातिसिद्धा दिशा के सहयोगी देशभाव का भी भातिसिद्धत्त्व २१७८०७ - पूर्वदेश - पश्चिमदेश-- श्रादिभेदेन देशभावों का दिगनुबन्धत्त्व समन्वय ८०८ - स्वस्वरूपानुगत - देश का सत्तासिद्धत्व-समन्वय 37 " ५५ "

पृष्ठ 97

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. ८०६ - देशानुगत प्रदेशभाव २२३ ८१० - प्रदेशानुगत - मूर्त्तिरूप - पिण्डभाव पदार्थों के 22 ८११ - सत्तासिद्ध - धामच्छद - - देशात्मक - भाव का साथ दिगदनुचन्धी भातिसिद्ध सम्बन्ध ८१२ - पूर्वदेश, और ऋग्वेद ८१३ - दक्षिणदेश, और यजुर्वेद ८१४- उत्तरदेश, और सामवेद ८१५- पश्चिमदेश, और अथर्वेद सत्तासिद्ध ८१६ - देशशब्द की पर्य्यवसान भूमि पदार्थ अस्तित्त्व ८७ - उपलब्धि, और ८१८ - अस्तित्व, और सत्ताभाव विषयसूची 29 99 " 23 39 देश-रूप भग-८१६ - सत्तात्मक सूर्य की उपलब्धि ८२०- देशात्मक- सूर्य्य, और उसका वेदत्त्व ८२१ - मूर्त्ति मण्डल - गति - मावत्रयी ८२२ - मूलद्दिण्डात्मक - सूर्य्यदेश, ऋग्वेद वान् सूर्य्यनारायण ८२३ - अनन्त और २२४ का आधारभूत उक्थ 19 - समन्वय ८२४ - उक्थ का एकत्त्व ८२६ - अर्कानुगत स्वतन्त्र - तेजोमण्डल सामवेद " ८२७ - तेजोमण्डलरूप देश, और ८२८ - तेजोमण्डलरूप- बहिः पृष्ठ ८२५ - अर्को का अनेकत्त्व समन्वय ८२६ - सूर्य्यपिण्डरूप उक्थपृष्ठ ८३०- मध्यस्थ- सञ्चारीभाव " I, " ८३६ - गतिभावात्मक ब्रह्मभाव का ८३७ - स्वज्योतिर्म्मय -- सूर्य्यात्मक - उदाहरण समन्वय संस्मरण ८३८ - परज्योतिर्मय - उदहरण का का संस्मरण ८३६ - रूपज्योतिर्म्मय - उदाहरण तीन वेदों ८४० -देशात्मक पदार्थों से ' अनुगत का तात्त्विक स्वरूप समन्वय २२४ " " ८४१- देशवेदप्रतिपादक - श्रुतिवचन २२५ " ८४२ - मूर्त्ति उक्थ, और तदनुबन्धी तदनुबन्धी ऋग्वेद ८४३ - वस्तुभाव - ब्रह्म-- और यजुर्वेद साम-८४४ - मण्डल - पृष्ठ, और तदनुबन्धी वेद इति – वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ " ( ५ ) - देशवेदनिरुक्तिः -प्रकीर्णभावापन्ना १६ अथ — वैज्ञानिकवेदनिरुक्तिौ ( ६ ) — कालवेदनिरुक्तिः-प्रकीर्णभावापन्ना १७ - ** ८३१ - सूर्य्यबिम्बतः -- भूपृष्ठपर्य्यन्त व्याप्त गतिभाव, और तद्रूप यजुर्वेद 33 देशवेदत्त्व 39 ८३२ - सत्तासिद्ध - पिण्डमात्र का - त्रयी ८३३- पिण्डानुगता उक्थ - पृष्ठ - ब्रह्म ८३४- मूलपिण्डात्मक - उक्थभाव ८३५ - तूलमण्डलात्मक पृष्ठभाव ब्रह्म २२६ 23 _८४५ विश्वसृष्टिप्रवर्तक - प्रतिष्ठापुरुष - विष्णु _८४६ - विश्वसृष्टिपालक - यज्ञपुरुष ८४७- विश्वसृष्टिसंहारक- महापुरुष - महाकाल 99 ४- कालसीमा से प्रतीत महाकाल ८८४६ - काल विजयी - मृत्युञ्जय महाकाल ८४६- ( ख ) खण्ड - कालातीत महाकाल ८५० - उपाधिभावानुगत - कालपुरुष 39 ५६

पृष्ठ 98

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उपनिषद् भूमिका - प्रथमखण्ड ८७२ - महाकालवेद का स्वरूप समन्वय ८७३- महाकालखण्डत्रयी के अगणित खण्ड २३० 39 २२६ ८७४- महाप्रलय - प्रलय खण्डप्रलय - नित्य--८५१ - श्रखण्ड - काल के उपाधिभेद निबन्धन भूत - भविष्यत् वर्त्तमान- नामक तीन महिमा विवर्त्त ८५२ - विशुद्धसत्तासिद्ध-- कालातीत -- विश्वतीत-अखण्ड - महाकालपुरुष ८५३ - सोपाधिक - कालपुरुष की भातिसिद्धता 29 ८५४ - खण्डनयी से अनुगत भातिभाव " ८५५ -खण्डत्रयी की सर्वव्याप्ति ८५६ - भूतात्मक - कालखण्ड के गर्भ में सृष्टिप्रपञ्च का विलयन ८५७- भविष्यदात्मक कालखण्ड में सृष्टि का विलयन ८५८ - विश्वसत्ताकालात्मक - वत्त ' मानकाल ८५६ सृष्टि का मूलाधार ' भूतकाल ' ८६० - वर्तमान का जन्मदाता ' भूतकाल ' ८६१ - अभाव को भाव के प्रति कारणता ८६२ - उत्पत्तिदशानुगत - वत्तमानकाल ८६३ - प्रभवस्थान, और भूतपर्व ८६४ - प्रतिष्ठास्थान और वत्त ' मानपर्व ८६५ - परायणस्थान, और भविष्यत्पर्व ८६६ - विश्वप्रपञ्च का प्रभवस्थान- भूतकाला- II त्मक - उक्थ, और तन्निबन्धन ऋग्वेद ८६७ - विश्वप्रपञ्च का परायणस्थान- भवि- " यत् कालात्मक - निधन, और तन्निब-न्धन - सामवेद ६ - विश्वप्रपञ्च का 99 प्रतिष्ठास्थान- वर्त्तमा-नकालात्मक - पृष्ठ, और तन्निबन्धन-यजुर्वेद ८६- भूतकालः – सृष्ट ेः प्रागवस्था - उक्थम्, और ऋग्वेद ८७० - वर्त्तमानकालः - सृष्टयवस्था - ब्रह्म, और यजुर्वेद ८७१ - भविष्यत्कालः - सृष्ट रुत्तरावस्था पृष्ठम्, और प्रलयादि - वण्डावस्थाएँ. ८७५ - कालवेदत्रयी का स्वरूप- समन्वय ८७६- प्रात: काल, और पूर्वाह्न ८७७ - सायंकाल, और अपराह्न " २३० 39 33 39 " " " 33 ८७८ - मध्यकाल, और मध्याह्न ८७६ - कालानुगता वेदत्रयी का स्वरूप समन्वय-प्रयास ८८० - कालवे प्रतिपादक- श्रुतिवचन ८८१- पूर्वाह्णबिन्दुः-ऋग्वेदः - भूतकालः उक्थम् और २- मध्यकालः- वर्त्तमानकाल: -ब्रह्म, यजुर्वेदः और ८८३ - अपराहणबिन्दुः- भविष्यत्कालः - पृष्ठम्, और सामवेदः " 29 " 3 35 " इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ 39 ( ६ ) - कालवेदनिरुक्तिः प्रकीर्ण-भावापन्ना १७ अथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ ( ७ ) - वर्णनिरुक्तिः- प्रकीर्ण-भावापन्ना १७ - * --८८४ - ब्राह्मणानुगत - ब्राह्मणत्त्व २३५ सामवेद " ८८५ - क्षत्रियानुगत - क्षत्रियत्त्व ५७

पृष्ठ 99

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विषयसूची २३५ ६०५ - प्राणातत्त्व की स्वरूप- परिभाषा " ६०६ - विशुद्ध सत्तात्मक- प्राणात्मक वर्णतत्त्व का ८८६ - वैश्यानुगत - वैश्यत्त्व ८८७ - ' त्त्व ' भावानुवन्धी वर्णभाव अष्टाक्षर गायत्री छन्द, और प्रातःसवनीय - प्राणाग्निदेवता ८८६ - ब्रह्मतत्त्वानुगत - ब्रह्मवी तदनुगत-39 ८६०- ब्रह्मवीर्य्यात्मक - ब्राह्मणवर्णविशिष्ट महान्-अग्निदेव ८६१ - एकादशाक्षर - त्रिष्टुप् छन्द, और तदनुगत-माध्यन्दिनसनीय - प्राणेन्द्र देवता II ८६२ - क्षत्रतत्त्वानुगत क्षत्रवीर्य्य ८६३ - क्षात्रवीर्य्यात्मक - क्षत्रियवर्णविशिष्ट - इन्द्रदेव ८६४ - द्वादशाक्षर - जगती छन्द, और तदनुगत-सायंसवनीय - प्राणात्मक - विश्वेदेवता " ८६५ - विट्तत्त्वानुगत - विड्वीर्य्य ८६६ - विडवीर्य्यात्मक - वैश्यवर्णविशिष्ट - विश्वेदेव ८६७ - आधिदैविक प्रकृतिसिद्ध नित्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यवर्णात्मक अग्नि - इन्द्र- विश्वेदेव ८६८ - गायत्र्या ब्राह्मणं - निरवर्त्तयत् 21 99 II 39 19 " ८६६- त्रिष्टुभा राजन्यं- ” ६०० - जगत्या वैश्यंम्-६०१ - न केनचिच्छन्दसा शूद्र निरवर्त्तयत् 33 ६०२ - वर्णतत्त्वानुबन्धी - प्राणदेव, और तदनुगत-सत्तासिद्ध भाव का तात्त्विक स्वरूप समन्वय ६०३ - इन्द्रियातीता - वर्णत्रयी ६०४ - प्राणात्मक वर्णतत्त्व " " 91 29 २३५ " ६०७ - ज्ञानशक्ति प्रधान ब्राह्मणवर्णं ६०८ - क्रियाशक्ति प्रधान - क्षत्रियवर्ण ६०६ - अर्थशक्ति प्रधान वैश्यवर्णं ६१० - ब्राह्मणवर्णात्मक सामवेद ६११ - क्षत्रियवर्णात्मक - यजुर्वेद ६१२ - वैश्यवर्णात्मक ऋग्वेद २६१३ - वर्णत्रयी से अनुगता - वेदत्रयी ६१४ - वर्णवेदप्रतिपादकश्रुतिवचन २३६ ६१५ – पृथिवी - अग्निः अर्थः- उक्थम् - विट्, और ऋग्वेदः ६१६ - अन्तरिक्षम् वायुः - क्रिया - ब्रह्म- क्षत्रम्, और यजुर्वेदः " । ६१७ - द्यौः - इन्द्रः- ज्ञानम् - पृष्ठम् ब्रह्म, सामवेदः 39 21 " 39 " " और इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ " ( ७ ) - वर्णवेदनिरुक्तिः - प्रकीर्ण-भावापन्ना १८ वेद के तात्त्विक स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणिता वैज्ञानिक - निरुक्तिश्च OF अत्र - उपरता ** ५८

पृष्ठ 100

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उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड * - उपनिद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्ड का विराम १ - क्या उपनिषत् वेद है?, प्रश्न का संस्मरण २ – मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र की प्रामाणिकता का संस्मरण ३- आज के भावुकतापूर्ण - निरर्थक - ऊहावोह १३६ " ४ - वैज्ञानिक - वेदस्वरूप का समन्वय, और तन्माध्यम से सम्पूर्ण 93 ५- प्राजापत्यवेद का स्वरूप- संस्मरण भ्रान्तियों का निराकरण, ” ६ – ' अनन्ता वै वेदाः ' का माङ्गलिक -- संस्मरण ७ – उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत द्वितीय तृतीय खण्डों " संस्मरण से अनुप्राणित विषयों का ८ –खण्डत्रयानुगत - उपनिषद् भूमिकानिबन्ध - से अनुगत किञ्चिदिव आवेदन ६ - भूमिकानुगता - मङ्गलकामना इति - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत-प्रथमखण्डस्य - स्मारकविषयसूची 33 २४० II 93 उपरता ि ५६