Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 111–120

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 111–120

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031 प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ ५ - यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्म्ममयो मृगः । यश्च विमोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम विभ्रति ॥ मनुः २।१५७१ ) । ६ - यथोक्तान्यपि कर्माणि परिहाय द्विजोत्तमः । श्रात्मज्ञाने शमे च स्याद्वेदाभ्यासे च यत्नवान् ॥ ( मनुः १२ । ८ । ) । 11 - विभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् । धनम् || ( मनुः तस्मादेतत् परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् १२२६६ । ) । ८- सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ ( मनुः १२११००. ) । ६ - यथा जातबलो वह्निर्दहत्य निपि द्रुमान् तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः ॥ ( मनुः १२।१०११ ) । ५ - जिस प्रकार लकड़ी का हाथी, एवं चमड़े का कल्पित मृग केवल नाममात्र के हाथी- मृग हैं, एवमेव जो ब्राह्मण वेदज्ञान से शून्य है वह भी उस नाम कोटि में ही प्रविष्ट है । अर्थात् जो मूल्य, जो महत्व लकड़ी - चर्म्म के हाथी मृग का है, वही महत्व स्वाध्यायशून्य ब्राह्मण का है । ६— ( यदि किन्हीं विशेष परिस्थितियों के कारण ब्राह्मण शास्त्रसिद्ध अग्निहोत्रादि आवश्यक कम्मों को न करसके तो श्रापद्धर्म्म मर्यादा के अनुसार ) यथोक्त शास्त्रीय कम्मों को छोड़ता हुआ भी ब्राह्मण श्रात्मचिन्तन, इन्द्रियसंयम, एवं वेदाभ्यास में सदा सतर्क रहै 1 । अर्थात् और सब कम्मों के न बनने पर भी श्रात्मनित्यत्व-भावना, सदाचार, एवं वेदाध्ययन इन तीन कम्मों को तो किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ना चाहिए । ७- - ( वेदशास्त्र में प्रतिपादित ) सर्वथा नित्य वेद ने ही इस भौतिक जगत् को धारण कर रक्खा है । इसी लिए वेदवित् विद्वान् वैदिक कर्म्माधिकारी इस द्विजाति के सम्बन्ध में वेदशास्त्र को ही सर्वोच्च पुरुषार्थ-साधनं समझते हैं । — सेना, राज्य, दण्डविधान, सब लोकों पर शासन इत्यादि सब कर्म्म यथावत् रूप से एक वेदश विद्वान् ही कर सकता है । ६ - जिस प्रकार बड़े वेग से प्रज्वलित बलवान् अग्नि गीले वृक्षों को भी जला डालता है, एवमेव एक वेदज्ञ ब्राह्मण अपने आत्मा के कर्मदोषों को वेदरूप ज्ञानाग्नि से जला डालता है । 21 ८

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० भूमिका1 न केवल भारतवासी ही, अपितु समस्त विश्व का मानवसमाज यदि किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उसे भारतवर्ष में उत्पन्न वेदराशि के अधिष्ठाता अग्रजन्मा ( ब्राह्मण ) का ही शिष्यत्व स्वीकार करना चाहिए । वह सब को सभ्यता, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प आदि का पाठ पढ़ाएगा । सुनिए! कान खोलकर सुनिए!! साथ ही में अपनी वर्त्तमान दशा पर दो धांसू बहाए!!! भगवान् मनु क्या कहते हैं-एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ ( मनुः २।२० । ) “ भारतवर्ष में उत्पन्न होने वाले ब्राह्मण से पृथिवी में रहने वाले सम्पूर्ण मनुष्य अपने अपने कर्त्तव्य कर्म्म की, एवं चरित्र की शिक्षा प्राप्त करें " क्या आर्य-साहित्य को छोड़कर ऐसी उदात्त भावना आपको अन्य साहित्य में मिल सकती है? सर्वथा असम्भव: हा हतभाग्य भारत! 9 आज तेरा वह गौरव कहां चला गया? वेद जैसी अप्रतिम ज्ञानराशि का अधिष्ठाता बनता हुआ भी तू आज अपने उस उच्चासन से कैसे गिर गया? परलोक के महाबन्धन को तोड़ने वाला तू आज इस भूप्रदेश में भी अपने आप को सुरक्षित न रख सका! आज तू असभ्य है! जंगली है! विज्ञानशून्य है! परमु-खापेक्षी दासानुदास " मा च याचिष्म कञ्चन " कहां है! है! गया तेरा यह आदर्श! भूल गया अपने वास्तविक स्वरूप को? खो बैठा अपनी सारी प्रभुता? उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्य वरान्निबोधत!!! आप प्रश्न करेंगे धर्म्मप्राण भारतवर्ष की उक्त दशा क्यों हुई? शास्त्रकारों ने धर्म का - " यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म्मः ” ( जिसके अनुष्ठान से, आचरण से, व्यवहार

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नारम्भिक वक्तव्य सुखरूप निःश्रेयसभाव की प्राप्ति होती से ऐहलौकिक सुखरूप अभ्युदय, एवं पारलौकिक का यह भारतवर्ष के सनातनधर्मी जगत् है, वही धर्म है ) यह लक्षण किया है । इधर में भी यही आश्चर्य है, प्रकृति के कोप विश्वास है कि हम धम्मीचरण में सर्वाग्रणी हैं । परन्तु हैं । के लिए अनेक साधन प्रस्तुत महानुभाव सर्वाग्रणी हैं । आज भारतवर्ष में धम्र्मप्रचार - महोपदेशक - महामहोप + सैंकड़ों - हजारों मन्दिर, शतशः धम्माचार्य, शतशः उपदेशक है, प्रस्तुत हैं । हरिकथा भी होती देशक, तीर्थ, व्रत, दान, आदि सभी तो धर्म्म के साधन है । दान-संख्या में उपस्थित भी होती पुराण भी बांचे जाते हैं, श्रद्धालु जनता हजारों की 1 । षट्तीर्थ पटशास्त्री- पुराण-वीरों की ओर से प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन भी कराया जाता है करने के वक्षस्थल को कम्पित रत्न आदि असंख्य उपाधिधारी भी विद्यमान हैं । भारतवसुन्धरा पुरुषपुङ्गव अध्यापक महोदय वाली बड़ी बड़ी संस्कृतपाठशालाएं, एवं उनमें महामहाधुरीण होना चाहिए, वह सब आवश्यकता भी सुशोभित हैं । इस प्रकार धर्मरक्षा के लिए जो कुछ की धर्म्म, देव, द्विज, गुरू, शास्त्र से अधिक तो विद्यमान है । फिर क्यों दिन दिन जनता का उत्तर चाहते हैं? अच्छा आदि पर से श्रद्धा उठती जा रही है? क्या आप इस प्रश्न सुनिए! पर दृष्टि डालिए । समा-विगत शताब्दियों के वाङ्मय इतिहास पर एवं साहित्यसृष्टि की चरम उन्नति का द्योतक धान हो जायगा । महाभारतकाल जहां वैदिक - साहित्य के बाद का भी उपक्रम बना । महाभारत था, वहां वही समय इस साहित्य की अवनति विषय है । व्याकरण-वैदिक साहित्य क्रमशः अवनत ही होता जा रहा है, यह निःसंदिग्ध है, की ओर से जितना मन्थन हुआ न्याय - ज्यौतिष - साहित्य आदि इतर विषयों का विद्वानों भी उद्योग हुआ होता तो आज उन्हीं विद्वानों की ओर से यदि वैदिकसाहित्य के लिए शतांश , दण्डी, क्षेमेन्द्र, बाण, माघ इस साहित्य की यह दुर्दशा न होती । भवभूति, कालिदास है, राजाओं के इतिहास की पुनरुक्ति आदि प्रतिभाशाली विद्वानों की प्रतिभा का उपयोग हुआ तो भारतवर्ष को यह दुर्दिन न में । यदि, यही विद्वान् वैदिकसाहित्य की ओर दृष्टिपात करते

पृष्ठ 114

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भूमिका ॥ देखने पड़ते । इस महाभीषण युग में एक दो महापुरुष ऐसे अवश्य हुए हैं, जिन्होंने वैदिक-साहित्य के उद्धार का प्रयत्न किया है । यदि सर्वश्री सायणाचार्य, एवं सर्वश्री महीधर न होते तो हमारे लिए वेदशास्त्र एक " हौ ग्रा " मात्र रह जाता । परन्तु जिस युग में उक्त वेदव्याख्या-ताओं ने वेद पर भाष्य लिखे थे, वह युग कर्म्मकाण्ड प्रधान युग था । शब्दशास्त्र पर पूर्ण निष्ठा थी । साथ ही में वेद के रहस्यार्थों को प्रकट करने वाले, वैज्ञानिकतत्वों का विश्लेषण करने वाले गाथा - निदान - रहस्य- आठ प्रकार के निरुक्त आदि ग्रन्थ विद्यमान थे । फलतः सायण महीधरने उस कर्म्मयुग में वेदों की कर्म्मपरक व्याख्या करना ही उचित समझा । इन भाष्यकारों का विशेष लक्ष्य कर्म्मकाण्ड की सङ्गति लगाने पर ही रहा । आगे जाकर साहित्य के अन्यतम शत्रु नरराक्षसों की भीषण लीलाने इन्हीं ग्रन्थ - पत्रों से महिनों हम्मामों को गरम रक्खा । परिणाम जो कुछ हुआ देश के सामने है । उपलब्ध वेदभाष्य कर्मकाण्ड प्रधान हैं, रहस्य ग्रन्थ सर्वेथा विलुप्त हैं । अतएव उन गुहानिहित वैदिक तत्वों को समझने एवं समझाने में आज बड़ी कठिनता उपस्थित हो रही है । वर्तमान शताब्दी की तो कुछ बात ही न पूँछिए । सर्वज्ञानानिधि वेद का अध्ययना-ध्यापन आज एकान्ततः अवरुद्ध है । यह सभी विद्वान् जानते हैं कि शिक्षा, कल्प, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, ज्यौतिष यह ६ प्र शास्त्र अङ्गमात्र हैं । वेदार्थ समझने की योग्यता प्राप्त करने के लिए ही उक्त अङ्गों का अध्ययन आवश्यक माना गया है । उधर आश्रम-व्यवस्था के अनुसार २५ वर्ष की आयु में साङ्ग वेद का अध्ययन कर ब्रह्मचारी को गृहस्था-श्रम में प्रवेश करने की आज्ञा है । हम देश के विद्वानों से प्रश्न करते हैं कि जैसी शिक्षाप्रणाली आज वर्तमान है, उसके अनुसार क्या कोई व्यक्ति २५ वर्ष की समाप्ति तक साङ्गोपाङ्ग सर-हस्य वेद का अध्ययन समाप्त कर सकता है? हम तो देखते हैं कि व्याकरणादि एक एक अङ्ग के अध्ययन में ही आज विद्वान् अपना सारा जीवन समाप्त कर देते हैं । शेष अङ्ग, एवं श्रङ्गी वेदशास्त्र के अध्ययन का तो अवसर ही नहीं आता । उक्त यों अङ्गों में से शिक्षा कल्प-छन्द - निरुक्त- ज्यौतिष ( वेदाङ्गज्योतिष ) इन पांच अङ्गों का अध्ययन तो आज सर्वथा ११

पृष्ठ 115

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० प्रारम्भिक वक्तव्य है । इस शास्त्र के सम्बन्ध में विलुप्तप्राय है । केवल व्याकरण का अध्ययनाध्यापन प्रचलित घोष - प्रघोष - अल्प-भी जैसा मार्मिक बोध होना चाहिए, उसका अभाव ही है । विवार श्वास स्वरित यह सब पदार्थ प्राण - महाप्राण - सम्प्रसारण- विटा - संकृत उदात्त अनुदात्त पदार्थों का रहस्यार्थ बतला-विज्ञान से सम्बन्ध रखते हैं । क्या कोई वैय्याकरणधुरीण इन दर्शनों का अवसर सकता है? व्याकरण के अतिरिक्त साहित्य, न्याय, सांख्य, वेदान्तादि हीं शास्त्रों की प्रायः थोड़ी-आता है । इनमें भी विशेषतः साहित्य, न्याय, वेदान्त इन तीन सम्राट् है । परन्तु बहुत चर्चा सुनी जाती है । यह सब शास्त्र सामन्तगण हैं, वेदशास्त्र के बड़े बड़े कालेजों में जाइए । अटक से कटक तक, आज हो क्या रहा है । भारतवर्ष गर्व से भूमण्डल को कम्पित कर-कन्या से कुमारी तक पर्यटन कर आइए । अपने प. ण्डित्य के तर्कवागीशों, न्यायरत्नों का ने वाले पदशास्त्रियों, वेदान्तनिधियों, महामहोपाध्यायों, । सभी प्रमुख स्थान अन्वेषण कीजिए । आपको सर्वत्र सामन्तगणों की ही प्रधानता मिलेगी मिलेंगे । सौभाग्य वैय्याकरणधुरीणों से, साहित्याचार्यों से, वेदान्तनिधियों से आक्रान्त जायंगे, पद-से यदि कहीं वेद की चर्चा मिलेगी भी तो पारायणरूप में । मन्त्र कण्ठ किए पूर्णरूप से संपन्न मिलेगा । बिना अर्थ घन जटा स्वरसन्निवेशपूर्वक वेदविज्ञान का श्राद्धकर्म्म शास्त्र का सिद्धान्त है? जो के केवल पारायण में ही वेदज्ञान की इतिश्री मान लेना किस से अपने आप को वेदज्ञ मान-व्यक्ति वेद का अर्थ न जानकर केवल कुछ मन्त्र कण्ठ कर लेने है, सुनिए! ने का मिथ्या दम्भ करता है, उस के लिए स्वयं वेद ही क्या कहता योऽर्थम् । स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थज्ञइव सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ " जिस प्रकार एक गधा अपनी पीठ पर रक्खे हुए चन्दनकाष्ठ के भारमात्र , एवमेव वह व्यक्ति एक का अनुभव करता है, उसे चन्दनगन्ध का विवेक नहीं अर्थ है नहीं जानता । ठीक इस के बोझा ढोहने वाला लठ्ठ है, जो कि वेद पढ़कर उस का भोग करता है, एवं विपरीत जो व्यक्ति अर्थ जानता है, वह सम्पूर्ण सम्पत्तियों का

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| भूमिका ॥ इस शरीर को छोड़ने के पश्चात् अर्थज्ञान से अपने सब कर्म्मदोषों का विधूनन करता हुआ नाकस्व का अधिकारी बनता है " । वेद म्राट् का यह तिरस्कार! यह अपमान!! ऐसी उपेक्षा!!! असह्य है । आज हम प्रायश्चित्त के भागी हैं । इसी पाप से आज हमारी यह हीनदशा होरही है । पाश्चात्य-शिक्षा - दीक्षित नवयुवक, एवं शिक्षक आज भारतीय विद्वानों से धर्म की उपपत्ति पूंछते हैं । श्राद्ध क्यों किया जाता है? ब्राह्मण को भोजन करा देने से परलोक गत आत्मा कैसे तृप्त हो जाता है? यज्ञोपवीत धारण करने से क्या लाभ है! कान पर जनेऊ क्यों चढ़ाई जाती है? शिखाभार का क्या प्रयोजन है! भोजन के अन्त में श्राचमन क्यों किया जाता है? अचेतन पाषाण प्रतिमाओं के अर्चन से ईश्वरप्राप्ति कैसे हो जाती है? रजोदर्शन से पूर्व ही कन्या के विवाह को क्यों महत्व दिया जाता है? अन्त्यजस्पर्श में क्या हानि है! षोडश स्मात्ते, एवं ३२ श्रौत संस्कारों का क्या महत्व है? व्यापक ईश्वर परिछिन शरीर से कैसे अवतार धारण कर लेता है । ऐसे ऐसे असंख्य प्रश्न आज विद्वत् समाज के सामने उपस्थित हैं । परन्तु उन विद्वानों की ओर से उक्त प्रश्नों का कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिल रहा है । परिणाम इसका यह हो रहा है कि पश्चिम के विज्ञान से चमत्कृत भारतीय शिक्षितवर्ग अपने सिद्धान्तों का कोई मौलिक उत्तर न प्राप्त करने से इस के प्रति क्रमशः अश्रद्धालु बनता जा रहा है । उक्त सभी प्रश्नों के मौलिक वैज्ञानिक युक्तियुक्त समाधान हैं, और अवश्य हैं । परन्तु वेद में, जैसा कि " जिज्ञास-मानां प्रमाणं परमं तिः " से पूर्व में निवेदन किया जा चुका है । पूर्व कथनानुसार धर्मनिर्णय के सम्बन्ध में आज स्मृतिशास्त्र रूप धर्म्मशास्त्र को ही प्रधान माना जा रहा है । अथवा दूसरे शब्दों में यों कहिए कि धर्मव्यवस्था के सम्बन्ध में भारतीय विद्वानों का ज्ञान प्रायः स्मार्त्तग्रन्थों तक ही सीमित है । इधर स्मृतिशास्त्र केवल श्रुतिसिद्ध आदेशों का विधानमात्र करता है । इन आदेशों की उपपत्ति बतलाना स्मार्त्तग्रन्थों की मर्यादा से बाहर की बात है । उस का एकमात्र कर्त्तव्य धर्म्म की इतिकर्तव्यता बतलाना है । यदि इससे .१३

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•.॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ करना चाहिए? " इत्यादि कोई " अमुक कर्म्म का क्या रहस्य है? " " अमुक कर्म ऐसे ही क्यों कर उस का तिरस्कार कर तर्कमूलक प्रश्न करता है तो वह इस हेतुवादी को नास्तिक बतला देता है, जैसा कि भगवान् मनु कहते हैं— योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ( मनुः२ ( ११ ) । ही धर्म जिज्ञासा रखने वाले व्यक्तियों को भारतीय विद्वानों की ओर से उक्त उत्तर प्रश्नों का कोई समाधान प्राप्त होता है । वैदिक विज्ञानशून्य इन पण्डितम्मन्यों के पास उक्त । राम राम नहीं । यदि बहुत ही अनुग्रह हुआ तो " अंग्रेजी पढ़कर तुम नास्तिक होगए सदुत्तर देने का अब तो घोर कलियुग भागया । शास्त्र पर से विश्वास उठ गया " यह ही में यह भी सिद्ध विषय है अनुग्रह करते हैं । हम शास्त्रनिष्ठा का विरोध नहीं करते । साथ सकती । उस का कल्याण कि सामान्य जनता वैदिक विज्ञान की अधिकारिणी नहीं बन जिन्होंने शिक्षा प्राप्त की शब्दशास्त्र पर अनन्यभाव से श्रद्धा - विश्वास करने से ही है । परन्तु भी साधन से विकसित है, जो भौतिक विज्ञान का अध्ययन कर चुके हैं, जिन की बुद्धि किसी । उन्हें तर्क- युक्ति-हो चुकी है, उन के सन्तोष के लिए केवल शब्दप्रमाण पर्याप्त नहीं हो सकता में उन की धर्मविरोधिनी भावनाओं विज्ञान का आश्रय लेकर ही समझाना पड़ेगा । तभी ही कभी विच्छिन्न न होने वाली परिवर्तन हो सकेगा । इस शिक्षित समाज की उपेक्षा करने से इन शिक्षितों को केवल गन्धर्व धर्म्मधारा आज मन्द होती जा रही है । " धर्म्मपदार्थ " आज दिन धर्मविरोधी नए नए बिल नगर प्रतीत हो रहा है । फलतः उन्हीं शिक्षितों के द्वारा आए जा रहे हैं । विद्वत्समाज व्यवस्थापिका सभा ( Legislative Council ) में उपस्थित किए वाला नहीं है । उधर राजनैतिकदल सुप्त है, धर्मसमाज क्षुब्ध है । आज उसे कोई आश्वासन देने प्राप्ति में यदि कोई महाप्रतिबन्धक स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए उन्मत्त है । उस की दृष्टि में खन्त्रता इसी कुत्सितभावना से है तो “ शास्त्र " - ऋषियों के लोककल्याणकारी आदेश । १४

पृष्ठ 118

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.. || भूमिका ॥ॐ भावितान्तःकरण नेताओं की ओर से नाममात्र के नैतिक प्रसार के साथ साथ ही शास्त्रीय-मर्यादाओं के विनाश का भी पुनीत कार्य किया जा रहा है । उन का कहना है कि-" परतन्त्र राष्ट्र का कोई धर्म नहीं । जिस विषम समय में, गुलामी के जमाने में राष्ट्र के असंख्य प्राणी अन्न वस्त्र के लिए त्राहि त्राहि कर रहे हों, उस विपत्ति के युग में शास्त्र का डिन्डिमघोष कोई महत्व नहीं रखता । आज हमारे सामने सबसे अत्यावश्यक प्रश्न रोटी कपड़े का है । जब तक आर्थिक चिन्ता दूर नहीं होजाती, रोटी कपड़े का प्रश्न हल नहीं हो जाता, राष्ट्र स्वतन्त्र नहीं होजाता, तब तक शास्त्र, धर्म आदि की चर्चा को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता । अपिच ब्राह्मणों की स्वार्थ लीला को चरितार्थ करने वाले जिस शास्त्र ने राष्ट्र को परतन्त्र किया, जो धर्ममार्ग केवल स्वार्थयों की दम्मलीला है, ऐसे शास्त्र को तो किसी भी युग में किसी भी प्रकार का महत्व नहीं दिया जा सकता । आज युग धर्म बदल गया है । अतः उस पूर्वयुग की परिस्थिति के अनुकूल बने हुए उन शास्त्रों को आज के इस विकास युग में मानना सर्वथा व्यर्थ है " । संस्कृतिमूलक भारतीय शास्त्र के सम्बन्ध में उक्त विचार प्रकट करने वाले उन राज-नितिवीथी पथिकों, एवं वर्तमान युग के शिक्षित एवं शिक्षकों से हम यह सविनय निवेदन कर देना चाहते हैं कि विद्वत् समाज की उपेक्षा, अहम्मन्यता, व्यर्थ के आडम्बर से ही धर्म्म, एवं तत्प्रतिपादक शास्त्र के सम्बन्ध के आपके इस सम्बन्ध में उक्त विचार हो गए हैं । आप चाहते हैं समाधान, सफल एवं सुफल कारण, उस का है वर्तमान युग में अभाव । यहीं पर सीमा समाप्त हो जाती, तब भी कोई बात न थी । परन्तु यह पण्डित नामधारी सज्जन तो धर्म की ओट में सर्वथा शास्त्र विरुद्ध बहुभोज ( नुकता ), वृद्धविवाह, कन्याविक्रय, धर्म के नाते भोली जनता की वञ्चना यादि रूढिवादों के प्रचार से समाज एवं राष्ट्रोन्नति भी अन्यतम शत्रु बन रहे हैं । सत्काय्यों का विरोध करना, दूसरे के गुणों की उपेक्षा कर उसके प्रकृतिसिद्ध मानव जन्म सुलभ दोषों का ही अन्वेषण करते रहना, अपने धक्कों को धर्म की

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प्रारम्भिक वक्तव्य दुहाई देकर उन से अनुचित लाभ उठाना ही इन पुरुषार्थियों का परम पुरुषार्थ है । इन्ही सब है । कारणों से यदि आप धर्म को अपने मार्ग में कण्टक समझने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं परन्तु सोचिए, बुद्धिपूर्वक विचार कीजिए! यदि कोई अल्पज्ञ अपने दोष से किसी अमूल्यत्व का खरूप ओर का ओर ही बना देता है तो क्या एक बुद्धिमान् का यह कर्त्तव्य नहीं हो जाता के लिए कटिबद्ध होजाय? कि वह उस अमूल्यतत्व का परित्याग न कर सर्वात्मना उस की रक्षा स्वार्थ के जिस वेदराशि के लिए पश्चिमी विद्वान् अहोरात्र अकथ परिश्रम कर रहे हैं, अपने है, वह जहां अतिरिक्त जो पाश्चात्य जगत् एक कपर्दिका व्यय करने में भी महापातक समझता । जिस संस्कृतवाणी आए दिन वैदिक साहित्य के उद्धार के लिए विपुल धनराशि व्यय कर रहा है ) कह कर का उस की जन्मभूमि में उसी के सुपूतों द्वारा “ मृतभाषा " ( Dead language ( जर्मन आदि में ) सत्कार किया जाता है, वही मृतभाषा जब कि आज परराष्ट्रों में इस नियतभाषा ( Compulsory language ) बनने का गौरव प्राप्त कर रही है, वहां करें । यदि साहित्य के प्रति हमारे उक्त उद्गार कहां तक ठीक हैं, यह आप स्वयं निर्णय में कोई भी आपत्ति स्थिरबुद्धि से विचार करेंगे तो उक्त परिस्थितियों से आप को यह मान लेने नवीन दृष्टि में न होगी कि वेद अवश्य ही किसी अपूर्व ज्ञानराशि का महाकोश है । आपकी धर्म के सम्बन्ध में – “ धर्म धर्म नाश का कारण है, ठीक इसके विपरीत आर्यऋषियों का इस एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः " यह घन्टाघोष है । आइए! देखें हमारा इतिहास सम्बन्ध में अपने क्या विचार प्रकट करता है । यह निर्विवाद विषय है कि भारतवर्ष सदा से ही राजनीति के साथ साथ धर्मनीति एवं धर्म्मनीति में संघर्ष को भी प्रधान मानता आरहा है । यहीं नहीं अपि तु जब जब राजनीति धर्म्मनीति का पालन किया उपस्थित हुआ है, तब तब ही राजनीति की उपेक्षा की गई है, एवं किन्हीं विशेष गया है । धर्मनीति को सफल बनाने में दुर्भाग्य से यदि तत्कालीन मानव समाज स्वयं ईश्वर परिस्थितियों से असमर्थ हो जाता है तो ऐसे अवसर पर धर्म्मरक्षा के लिए धर्ममूर्ति सिद्धान्त की को अंशरूप से नरदेह में अवतार धारण करना पड़ता है । निम्न लिखित गीता कौन भारतीय उपेक्षा कर सकता है? १६

पृष्ठ 120

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भूमिका

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥१ ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥

धर्म्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ २ ॥ ( गी ० ४।७-८ ) ।

सृष्टि से आरम्भ कर आज तक के मधु - कैटभ, महिषासुर, रक्तबीज, शुम्भ-निशुम्भ, वृत्रासुर, नमुचि, बलासुर, तारकासुर, विद्युन्माली, अम्बुजाक्ष, शालकटंकट, वराहासुर, भस्मासुर, राक्षसेश्वर रावण, राजा वेन, कंस, शिशुपाल आदि के शासनकाल इस सम्बन्ध में ज्वलन्त उदाहरण हैं । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम ने शक्तिरूपिणी गर्भिणी जगन्माता सीता का परित्याग क्यों किया? धर्मनीति की रक्षा के लिए । सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने अपने विशाल साम्राज्य का परित्याग किया, अकथनीय कष्ट सहे 1 । धर्ममूर्त्ति महाराज शिवि ने अपने शरीर का मांस व्याध के अर्पण कर दिया । धर्म्मराज युधिष्ठिर ने चौदह वर्ष तक वनवास के कष्ट सहे । प्रातःस्मरणीय महादानी कर्ण ने इन्द्र के मांगने पर अपने शरीर का चर्म्मरूप कवच भी उखाड़ फेंकने में कष्ट का अनुभव न किया । यावदार्यकुल कमल दिवाकर, हिन्दूधर्मरक्षक, " हिन्दु सूर्य " प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रताप दाने दाने के मोहताज बने रहने पर भी सुख मानते रहे । आर्यसंस्कृति की प्रतिमूत्तिएं, श्रार्यजाति को सर्वोच्च भासन दिलाने चालीं उन पायललनाओं का एकमात्र धर्म - रक्षा के लिए हंसते हंसते जौहरव्रत ( चिता में जीवित जलजाना ) पालन करना आज भी उन के चरणों में हमारे मस्तक को श्रद्धा से अव नत किए हुए है । इसी प्रकार छत्रपति शिवाजी, वीर छत्रसाल, सरदार चुंडावत, राठौर वीर दुर्गादास, गुरु गोविन्दसिंह, जीवित ही दीवारों में चुने जाते समय भी. मन्दहास र - इस विषय का विशद विवेचन गीताविज्ञानभाष्यान्तर्गत राजर्षिविद्या की " ' बुद्धियोगलक्षण-सनातनोपनिषत् ” नाम की पांचवीं उपनिषत् के “ श्रीकृष्ण का अाधिकारिक जीवत्व लक्षण ईश्वर " नाम के तृतीय उपदेश में देखना चाहिए । १७