Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 21–30

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किमपि प्रास्ताविकम् ( क ) -कम्र्ममेदमूलक - अधिकारी - वर्ग का विभेद - नामक प्रथम अवान्तर - विषय में श्र ेय प्रय-श्रेयप्रेय- रूप से तीन प्रकार के अधिकारी वर्गों का स्वरूप- समन्वय प्रयास हुआ है । असंख्य - द्वन्द्वभावों से समाक्रान्त- इस चराचर विश्व में सत्त्व - रज- स्तमोगुणों के समन्वय - तारतम्य से तीन प्रकार की अभिरुचियों उपलब्ध होरहीं हैं, जिन का प्रधान कारण है पदार्थों का त्रैविध्य । कुछ एक तथ्य, और पदार्थ तो सर्वथा हितकर हैं, किन्तु ' रुचिकर ' नहीं । कुछ एक तथ्य, और पदार्थ ' रुचिकर ' हैं, किन्तु ' हितकर ' नहीं । एवमेव कुछ एक तथ्य, तथा पदार्थ हितकर भी हैं, और रुचिकर भी । उदाहरण के लिए भौतिक- द्रव्यो को ही लीजिए । चिरायते का कटुतम रसात्मक क्वाथ ( काढा ) हितकर अवश्य है, किन्तु रुचिकर नहीं । अम्ल-द्रव्य ( इमली - अमचूर - आदि ) एक वातव्याधिग्रस्त मानव के लिए रुचिकर अवश्य हैं, किन्तु हितकर नहीं । किन्तु नोबू इसी के लिए हितकर भी है, और रुचिकर भी । विशुद्ध हितकरभाव का पारिभाषिक नाम है-' श्र ेयः ', विशुद्ध रुचिकरभाव का नाम है- ' प्रेयः ', एवं उभयात्मक भाव का नाम है- ' श्रयः प्रेयः ' । और इस दृष्टि से अधिकारी वर्ग के भी तीन हीं श्रेणिविभाग स्वतः एव संसिद्ध होजाते हैं । नीचे लिखी तालि-कात्रों से इस वर्गत्रयी का भलीभाँति स्पष्टीकरण होजाता है—-१- श्रयोऽनुगतकर्म्म- - ( बुद्धियोगप्रधान - हितकरकर्म्म ) - निःश्रो यसजनक - कर्म्म २ - श्रयः - प्रयोऽनुगत कर्म्म - ( मनोबुद्धि - समन्वित - हितकर - रुचिकर - कर्म्म ) - अभ्यु-दयनिः यस - साधक - कर्म्म ३ - प्रयोऽनुगत - कर्म--- ( मनः प्रधान- रुचिकर कर्म्म ) - प्रत्यवायजनक कर्म्म ३ - संन्यासानुगत - ज्ञानात्मक - कर्म्म - उपनिषन्मार्ग 9-उत्तमाधिकारी २- वानप्रस्थानुगत - उ- उपासनात्मक कर्म - आरण्यकमार्ग १- गृहस्थानुगत --कर्मात्मक कर्म - ब्राह्मणमार्ग - मध्यमाधिकारी - ( 5 ) २- { ३--१०० - श्राश्रमवञ्चित - कल्पनात्मक -मार्ग ( कुपथ ) --- श्रधमाधिकारी १ - उत्तमाधिकारी - आत्मनिष्ठ - अलौकिक - धीरपुरुष - श्र योमार्गानुगामी २- मध्यमाधिकारी — व्यवहारनिष्ठ - लौकिक -- चतुर- पुरुष - श्र योमार्गानुगामी ३- अधमाधिकारी – पतनोन्मुख - निष्ठाशून्य -- हीन पुरुष प्रयोमार्गानुगामी १५

पृष्ठ 22

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१ -- { उपनिषद्भूमिका १ खण्ड १ - विद्यासापेक्ष - निवृत्तिकर्म्म - श्रयः - कर्म्म - श्रात्मनिष्ठ - अलौकिक - मानव २-- २ - विद्यासापेक्ष - प्रवृत्तिकर्म्म २ - विद्यानिरपेक्ष- सत्कर्म्म } श्रेयः - प्र यः – कर्म्म – व्यवहारनिष्ठ - लौकिक - भानब ३--१४ - विद्यानिरपेक्ष - असत्कर्म्म - प्र यः — कर्म्म — निष्ठाच्युत् - उभयतोभ्रष्ट मानव १ - देवबलप्रधान - सत्त्वगुणान्वित- आत्मनिष्ठ - पुरुष - श्रेयोमार्गानुगामी २- उभयत्रलप्रधान - रजोगुणान्वित - व्यवहारनिष्ठ - मानव - उभयमार्गानुगामी ३ - असुर बल प्रधान तमोगुणान्वित - निष्ठाच्युत - मनुष्य - प्रेयोमार्गानुगामी ( ख ) - ' दैवी - आसुरी - सम्पत, और मङ्गलरहस्य ' नामक द्वितीय श्रवान्तर विषय में गुत्रत्रया-न्विता - महत्प्रकृति के अनुबन्ध से वितायमाना दैवी - श्रासुरी सम्पत्ति का ही दिग्दर्शन प्रयास हुआ है । विश्व की मूलभूता महत्प्रकृति ' लोकविद्या ' के अनुसार उस तृतीय- द्युलोक से सम्बन्ध रखती है, जिसे पारमेष्ठ्य - सोमलोक कहा गया है, जैसा कि - ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम, आसीत् ' से प्रमाणित है । सोममय - परमेष्ठी ही वह ' प्रजापति ' है, जिस के गर्भ में ( महिमामण्डल में ) भृगु - अङ्गिरामयी - श्रासुरी, तथा दैवी - सम्पत्ति के बीज सुरक्षित रहते हैं । यही पारमेष्ठ्य - त्रीघ्र- भृग्वङ्गिरोमय- सौम्य तत्त्व ' महत्प्रकृति ' है, जिस के माध्यम से परमेष्ठी - प्रजापति त्रयस्त्रिंशद्विध-- ( ३३ ) देवदेवताओं, तथा नवतीनवं । ६६ ) विध असुरों के पिता प्रमाणित हो रहे हैं । ' देवाश्च ह वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे ' इत्यादि ब्राह्मणश्रति के अनुसार इन दोनों प्राजापत्यों में प्रकृत्यैव प्रतिद्वन्द्विता प्रक्रान्त रहती है, जिस इस प्रतिद्वन्द्वि-तामूलक द्वन्द्वभाव से ही विश्व - ' द्विनियति ' ( देवनियति, और असुरनियति ) रूपेण द्वन्द्वात्मक प्रमाणित होरहा है * । देवभावानुबन्धिनी गुणविभूति ही विश्वान्तर्गता दैवीसम्पत् है, और उलग्रन्थि का विमोक ही इसका सहज स्वभव है - ' दैवीसम्पद्विमोक्षाय ' । ठीक इसके विपरीत - सुरभावानुबन्धिनी दोषविभूति ही विश्वानुगता वह श्रासुरी - सम्पत् है, जिसका प्रधान धर्म है बलग्रन्थिरूप वारुणपाश को उत्तरोत्तर दृढतम प्रमाणित करते रहना । उभयभावान्विता प्रकृति के प्रवर्ग्यभाग से जन्म लेने वाले प्रत्येक भूत - भौतिक पदार्थ में दोनों हीं गुण - दोष - विभूतियाँ अनिवार्य्यरूपेण विद्यमान रहतीं हैं, जिसके आधार पर - ' गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी ' यह श्रामाणक प्रसिद्ध है । गुणान्विता देवी --सम्पत्ति का जहाँ श्रयोभाव से सम्बन्ध है, वहाँ दोषा-न्विता आसुरी सम्पत्ति का प्रयोभाव से सम्बन्ध माना गया है । * ' द्विनियति ' शब्द का ही निर्वचनानुगत - विकृतरूप -- ' दुनिया ' है । १६

पृष्ठ 23

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किमपि प्रास्ताविकम् देवभाव के साथ सहज विरोध रखना श्रासुरभाव का सहजधर्म है । इसी आधार पर कहा ' श्र ' याँसि बहु विघ्नानि ' । श्रेयोभावानुबन्धी दैवबल के संग्राहक उपनिषच्छास्त्र के स्वाध्याय में प्रयोभावानुबन्धी जाता है कि-सुरवल के द्वारा विघ्नोपस्थिति दुर्निवारा है । तन्निवृत्यर्थ ही दैवोपासक ऋषि के द्वारा मङ्गल का वध हुआ है, एवं दैवी - सम्पत्ति से अनुगत ' मङ्गल ' का यही संक्षिप्त स्वरूप - निदर्शन है । * ( ग ) - ' आत्मविद्या, और उपनिषच्छास्त्र ' नामक क्रमप्राप्त तृतीय- अवान्तर विषय में प्रमुखरूपेण ' उपनिषत् ' शब्द के अत्यन्त रहस्यपूर्ण उस ' अवच्छेदक ' का ही स्वरूपोपबृंहण हुआ है, जिसकी विस्मृति से ‘ उपनिषत् ' साहित्य के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की वैसी कल्पनाएँ जागरूक होपड़ीं हैं, जिनके द्वारा ' उपनिषत् ' का मौलिक - रहस्यात्मक - पारिभाषिक तत्त्वार्थ एकान्ततः ही अभिभूत होगया है । इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि, उपनिषच्छास्त्र का प्रमुख अवच्छेदक ' आत्मविद्यात्त्व ' ही है । किन्तु इसका यह तात्पर्य्यं कदापि नहीं है कि, ' उपनिषत् की आत्मविद्या से अनुप्राणित आत्मा वह निर्विशेष तत्त्व है, जिसका दिग्देशकालसीमाओं से कोई सम्बन्ध नहीं हैं " । तात्पर्य यही है कि, काल्पनिक-वेदान्तियों की कल्पना के प्रसूनरूप - जगन्मिथ्यात्त्वमूलक - वेदान्त से अनुप्राणित विश्वातीत - निर्विशेष- नामक परात्परब्रह्म कदापि उपनिषच्छास्त्र का अवच्छेदक नहीं है । श्रपितु उपनिषदों में उपवर्णित ' आत्मा ' षट्परि-ग्रहविशिष्ट वह ' प्रजापति ' तत्त्व है, जिसके आधार पर निःश्रेयस् भावान्विता अभ्युदयपरम्पराओं का उपनिषदों में ज्ञान - विज्ञानात्मक - स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । मायाकला से समन्वित -- मायीपुरुष, कला - परिग्रहोपेत सकलपुरुष, गुणपरिग्रहोपेत सगुणपुरुष, विकारपरिग्रहोपेत वैकारिकपुरुष, श्रञ्जनपरिग्रहोपेत साञ्जनपुरुष एवं आवर गपरिग्रहविशिष्ट आवरणपुरुष, इन षडविध - प्राजापत्य - आत्मसंस्थानों के अवा-रपारीण ज्ञानान्वित - वैज्ञानिक तथ्य का प्रतिपादन करने वाला, इत्थभूता ' ग्रात्मविद्या ' से समन्वित शास्त्र ही, - उपनिषच्छास्त्र है, इस प्रक्रान्त- अवान्तर प्रकरण में विस्तार के साथ इसी तथ्य का स्वरूपोप हुण हुआ है । ( घ ) - ' मङ्गलभेदमीमांसा ' नामक अन्त के अवान्तर - विषय में उपनिषदों के आदि, और अन्त में होने वाले माङ्गलिक- मन्त्रों के सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन का प्रयास हुआ है । ऋक् - यजुः साम-अथर्व - भेदभिन्ना संहिताओं के भेद से उपनिषत् - ग्रन्थ भी भिन्न - भिन्न संहिताओं से अनुप्राणित हैं । संहिता-भेदभिन्न उपनिषद्ग्रन्थ के मङ्गलमन्त्र भी विभिन्न ही हैं । ऐसा क्यों?, मङ्गलमन्त्रों का विभिन्न स्वरूप क्यों?, प्रस्तुत श्रवान्तर - विषय में इसी प्रश्न की वैज्ञानिकी - पारिभाषिकी उपपत्ति का समन्वय हुआ है । तदित्थं चार अवान्तर प्रमुख विषयों से समन्वित यह द्वितीय - स्तम्भ प्रासङ्गिकी अनेक परिभाषाओं का दिग्दर्शन कराता हुआ उपनिषत् - प्रेमियों की तुष्टि का ही कारण माना जायगा ।

पृष्ठ 24

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उपनिषद्भूमिका १ खण्ड ( ३ PPUNTA ) - उपनिषत् - शब्द का क्या अर्थ है?, नामक तृतीय - स्तम्भ के... संस्मरणीय - प्रमुख - विषयों का स्वरूप - दिग्दर्शन -क - विषयोपक्रम ख- प्राचीनदृष्टि, और ' उपनिषत् ' शब्द का अर्थ ग- विज्ञानदृष्टि, और ' उपनिषत् ' शब्द का अर्थ घ- ब्राह्मणभागानुगत- ' उपनिषत् ' -- शब्द ङ – आरण्यकभागानुगत - ' उपनिषत् ' शब्द च - उपनिषद्भागानुगत- ' उपनिषत् ' - शब्द स उपरि निर्दिष्ट प्रमुख विषयों की अभिधाओं के माध्यम से ही यद्यपि प्रस्तुत तृतीय - स्तम्भ के प्रतिपाद्य-विषयों का स्वरूप - दिग्दर्शन गतार्थ बन जाता है । तथापि प्रक्रान्त - प्रसङ्ग समन्वय की दृष्टि से इस सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव निवेदन कर दिया जाता है । उपनिषद्ग्रन्थों के सम्बन्ध में विद्वत् सम्प्रदाय में यही धारणा पुष्पित - पल्लवित होती रही है कि, " मन्त्रत्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के सर्वान्त में प्रतिष्ठित, श्रतएव-' वेदान्त ' नाम से प्रसिद्ध ज्ञानकाण्ड प्रतिपादक- ईश - केन- कठ आदि सुप्रसिद्ध वेदग्रन्थों में हीं ' उपनिषत् ' शब्द निरूढ है " । ( ख ) - प्राचीनदृष्टि, और ' उपनिषत् ' शब्द का अर्थ ' नामक श्रवान्तर प्रकरण में विद्वत्सम्प्रदायानुगता इसी काल्पनिक - धारणा का विस्तार से उपवर्णन हुआ है । कहना न होगा कि, ‘ उपनिषत् ' शब्द को तथाविधरूपेण ईश - केन- कठ- श्रादि वेदग्रन्थ - विशेषों में हीं ‘ निरूढ ' मान बैठने से ‘ उपनिषत् ' शब्द के उस व्यापक यौगिक- अर्थ का सर्वथा ही अभिभव होजाता है, जिस अभिभूति के दुष्परिणाम स्वरूप ही अनेक शताब्दियों से हम ' उपनिषत् ' के पारिभाषिक अर्थसमन्वय से एकान्ततः असंस्पृष्ट ही प्रमाणित होते रहे हैं । ( ग ) विज्ञानदृष्टि, और ' उपनिषत् ' शब्द का अर्थ ' नामक अवान्तर - प्रकरण में ‘ उपनिषत् ' शब्द के पारिभाषिक यौगिक अर्थ का ही विस्तार से स्पष्टीकरण हुआ है, जिस स्पष्टीकरणात्मक बृहत्सन्दर्भ का निष्कर्षार्थ यही है कि-" सृष्टिरहस्यात्मिका -- ज्ञानगर्भिता - मौलिक- विज्ञानात्मिका- जिस पारिभाषिकी उपपत्ति से हमारा प्रज्ञानमन दृढ आस्थापूर्वक तद्विषय पर श्रद्धारूपेण प्रतिष्ठित होजाता है, रहस्यात्मिका वह मौलिक उपपत्ति हो तद्विषय की उपनिषत् है " । “ उप - समीपे - नि - नितरां - निश्चयेन सीदति - यया - उपपत्या, सा वैज्ञानिकी - उपपत्तिरेव उपनिषत् " ही उपनिषत् का यौगिकार्थं समन्वय है, जिसका समानरूपेण मन्त्रब्राह्मणत्मक सम्पूर्ण वेदशास्त्र के ज्ञातव्य - कर्त्तव्य - विषयषट्क के साथ सम्बन्ध होरहा है । विज्ञान- स्तुति - इतिहास - रूपेण तीन ज्ञातव्य - विषय हैं, जो मन्त्रसंहिता से अनुप्राणित हैं । और यही " ज्ञातव्यवेदात्मक - संहितावेद ', किंवा ' मन्त्रवेद ' है । २१

पृष्ठ 25

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किमपि प्रास्ताविकम् कर्म्म - उपासना - ज्ञान - रूपेण तीन हीं कर्त्तव्यात्मक विषय हैं, जो ब्राह्मणवेद से अनुप्राणित हैं । ब्राह्मणवेद विधिभाग कर्म्मरूप कर्त्तव्य की इतिकर्त्तव्यता का स्वरूप - विश्लेषक है, जो विधिभाग- शतपथ- ऐतरेय का आदि ' ब्राह्मण ' श्रमिधा से ही प्रसिद्ध है । जो ब्राह्मणभाग उपासनारूप कर्त्तव्य का सङ्क ेतग्रह - गोपथ-' आरण्यक ' नाम से, एवं विज्ञानगर्भित ज्ञान का सङ्केतग्रह कराने वाला भाग ' उपनिषत् ' नाम कराता से है प्रसिद्ध , वही होरहा है । ज्ञातव्यत्रयी, और कर्त्तव्यत्रयी, के संकलन से मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के प्रमुख ६ विषय हैं, जिनमें मन्त्रानुगत आरम्भ के तीन विषय तत्त्वमीमांसा प्रधान हैं, एवं ब्राह्मणानुगत ( विधिरूप ब्राह्मण- होजाते आरण्यक - उपनिषदनुगत ) आगे के तीन विषय आचारमीमांसा प्रधान हैं । तथोक्त विषयषट्क के अनुपात से मौलिक - उपपत्तिरूपा उपनिषत् को प्रमुख ६ भागों में विभक्त जासकता है, एवं तदनुरूप ही उन ६ श्र उपनिषदों को क्रमशः विज्ञानोपनिषत्, स्तुत्युपनिषत्, इति- माना वृत्तोपनिषत् कर्मोपनिषत्, उपास्त्युपनिषन्, ज्ञानोपनिषत, इन नामों से समन्वित माना जासकता है, जिन इन ६ श्र उपनिषदों के गर्भ में ( प्रत्येक में ) अवान्तर - ज्ञातव्य - कर्त्तव्य - भेद - निबन्धन - असंख्य उपनिषदें समाविष्ट हैं । एवं इस तथ्यपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर यह कहा, और माना जासकता है मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के यच्चयावत् ज्ञातव्य - विषयों के साथ मौलिक - विज्ञानोपपत्तिरूप ' उपनिषत् ' कि का, सम्बन्ध है । ' उपनिषत् ' शब्द के इस व्यापक अर्थ की स्वीकृति पर ही निम्न लिखित सैद्धान्तिक - वचनों से अनुप्राणित- ' उपनिषत् ' शब्द का अर्थ समन्वित होसकता है— - तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेवोपनिषत् ( शत ० ब्रा ० ) । २ – यदेव विद्यया श्रद्धया - उपनिषदा करोति, तदेव वीर्य्यवत्तर ' भवति ( छान्दो-ग्योपनिषत् ) ३ – उपनिषदं भो ब्रूहि - इति, उक्ता ते उपनिषत् ( उपनिषत् ४ - अथादेशा उपनिषदाम् ( शत ० ना ० ) ५- अथ खल्वियं सर्वस्यै बाच उपनिषत् ( ए ० आ ० )

६ - वेदस्योपनिषत् - सत्यं सत्यस्योपनिषद्दमः ।

दमस्योपनिषद्दानं, दानस्योपनिषत् तपः ॥

तपसोपनिषत्याग, त्यागस्योपनिषत् सुखम् । सुखस्योपनिषत स्वर्गः, स्वर्गस्योपनिषच्छमः । ( महाभारते ) पूर्वोद्धत श्रौतस्मार्त्त - वचन विस्पष्ट शब्दों में उपनिषत् शब्द के यौगिकार्थ का ही समर्थन कर रहे हैं । अतएव कदापि उपनिषत् शब्द को वेद के अन्तभागरूप - ईश - केन- कठ- श्रादि ग्रन्थों में हीं निरूढ नहीं माना जासकता । ' उपनिषत् ' शब्द की यौगिकार्थानुगता व्यापकता के अनुबन्ध से ही तो भगवान् वासुदेव कृष्ण के मुखपङ्कज से विनिःसृत, मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र की पारिभाषिकी सूचीरूप सुप्रसिद्ध गीताशास्त्र भी ' भगवद्गीतोपनिषत् ' रूपेण उपनिषत् नाम का अधिकारी बना हुआ है । गीता ‘ श्रुति ' नहीं, अपितु २२

पृष्ठ 26

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उपनिषत् भूमिका १ खण्ड श्रुत्यर्थानुसरिणी - श्रतएव परतः प्रमाण - निबन्धना ' स्मृति ' है । यदि श्रुति ( वेद ) के अन्तभाग में ही उपनिषत् शब्द निरूढ होता, तो गीता जैसा स्मार्त्त ' ग्रन्थ कदापि उपनिषद् शब्द - व्यवहार का पात्र नहीं बनता । अब इस सम्बन्ध में केवल यही प्रश्न शेष रह जाता है कि, यदि उपनिषत् - शब्द वेद के अन्तिम भाग में निरूढ नहीं है, तो उस पुरातन लोकव्यवहारात्मक - वृद्धव्यवहार में ' ईश - केन- कठ ' आदि ग्रन्थविशेष ही-' उपनिषत् ' नाम से क्यों, और कैसे प्रसिद्ध होगए, जबकि वृद्धव्यवहारात्मक - सनातन - लोकव्यवहार को शक्तिग्राहकों में शिरोमणि माना गया है * । इस श्रापातरमणीय प्रश्न के समाधान के लिए ही- ' ब्राह्मण-श्रारण्यक - उपनिषद् - प्रन्थानुगत उपनिषत् - शब्द ' रूपेण अन्त के तीन अवान्तर प्रमुख प्रकरण त्र समाविष्ट हुए हैं । श्रारभ्याधीत -- विधियों, तथा अनारम्याधीत - विधियों से सम्बन्ध रखने वालीं उपनिषदों का विमेद ही इस प्रश्न की समाधानभूमि है, जैसाकि पाठक तत्सन्दर्भ में देखेंगे । तदित्थं अवान्तर ६ प्रमुख– विषयों से समन्वित प्रस्तुत- तृतीय स्तम्भ में उपनिषत् शब्द के विज्ञानसम्मत उस तत्त्वार्थ का ही स्पष्ठीकरण हुआ है, जिस स्पष्टीकरण के बिना उपनिषच्छास्त्र का ज्ञानानुगत - वैज्ञानिक स्वरूप विगत अनेक - शताब्दियों से विस्मृति के गर्भ में हीं विलीन होता रहा है । ३ ( ४ ) - क्या ' उपनिषत् ' वेद है?, नामक चतुर्थ - स्तम्भ के संस्मरणीय - प्रमुख - विषयों का स्वरूप - दिग्दर्शन-5 क प्रस्तावना ख - विषयप्रवेश ग - वेद पौरुषेय हैं, अथवा श्रापौरुषेय?, इस सम्बन्ध में दार्शनिकों के विभिन्न— -विचार घ - वेद के तात्विक स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणित- ' वैज्ञानिक - वेद- निरुक्ति ' “ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " इत्यादि सुप्रसिद्ध प्रातिशाख्य - सिद्धान्त के श्राधार पर विद्वद्वर्ग, तथा अस्मदादि सामान्यवर्ग की सदा से ही सत्त्वश्रद्धामयी, अतएव श्रार्षनिष्ठया परिपूता इत्थंभूता श्रास्था प्रक्रान्ता है कि, ऋक् - यजुः – साम - अथर्थ - मेदभिन्ना - शाखान्विता संहिता चतुष्टयी रूप मन्त्रभाग, तथा विधि— श्रारण्यक उपनिषत् - रूप ब्राह्मणभाग, दोनों की समष्टि का ही नाम ' वेदशास्त्र ' है । देवयुगात्मक - वेदयुग से प्रारम्भ कर विगत - शताब्दि - पर्यन्त, अर्थात् मन्वन्तरानुगता कालगणनानुपात से अर्थों वर्षों से मन्त्र, * - शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद्व्यवहारतश्च तत्र शक्तिग्राहक शिरोमणेर्लोकव्यवहारस्य २३ क

पृष्ठ 27

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किमपि प्रास्ताविकम् और ब्राह्मण, दोनों विभागों का ही ' वेदत्त्व ' निर्वाध निर्भ्रान्त - रूपेण श्रद्धा - आस्था - पूर्वक सभी वर्गों के लिए मान्य प्रमाणित होता श्रारहा था । किन्तु एक वेदभक्त के द्वारा ही कुछ समय पूर्व इसप्रकार की श्रापातरमणीया मान्यता श्रभिव्यक्त होपड़ी कि, " ऋक् - यजुः साम - श्रथर्व नामकी चार वेदसंहिताएँ मात्र ही ' वेद ' है । एतदतिरिक्त शाखा -- रूपा अन्यान्य मन्त्रसंहिताएँ एवं ब्राह्मण - आरण्यक--उपनिषत् -- नामक यच्चयावत् वेदग्रन्थ वेदव्याख्यामात्र हैं, साक्षात् वेद नहीं " । आपातरमणीया इसी मान्यता ने उपनिषत् के सम्बन्ध में भी इत्थंभूत प्रश्न उत्पन्न कर ही तो दिया कि – “ क्या उपनिषत्--“ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " के अनुगामी सनातनधर्मावलम्बी तथाकथित तथ्य के आधार पर अपने अन्तराल में ऐसा कुछ अनुमान लगा रहे होंगे कि, श्रमुक - वेदभक्त के द्वारा नवीनरूपेण उद्भाविता धारणा के ठीक विपरीत हम उन की श्रास्था के अनुसार उपनिषद्ग्रन्थों के वेदत्त्व का ही समर्थन करने जारहे होंगे । हमें दुःख है कि, सनातनधर्म्म पर मनसा वाचा - पूर्ण - श्रास्था - श्रद्धा रखते हुए भी, स्वयं को इसी श्रास्थामयी श्रद्धा के बल पर ' सनातनधर्मावलम्बी ' मानते हुए भी हम तद्धर्म्मपथानुगामी विद्वानों के अन्तरालानुगत अनुमान के सर्वथा विरुद्ध, एवं अमुक वेदभक्त महाशय की आपातरमणीया धारणा से श्रनुगत दृष्टिकोण का ही समर्थन करने जारहे हैं, एवं प्रक्रान्त प्रश्न के सम्बन्ध में आज विवश बनकर हमें ' सनातनधर्मावलम्बी - जगत, एवं वेदभक्त- आर्य्यसमाज, दोनों को ही प्रचण्डरूपेण थोड़ी देर के लिए अग्निश्च वायुश्च बन जाने के लिए असंदिग्ध रूपेण इसी अप्रिय समाधान का अनुगमन करना पड़ रहा है कि-अवान्तर शाखाओं में विभक्त ऋग्वेद, १०१ अवान्तर शाखाओं में विभक्त-यजुर्वेद, १००० अवान्तर - शाखाओं में विभक्त सामवेद, ६ श्रवान्तर - शाखाओं में विभक्त अथर्ववेद, सम्भूय ११३१ शाखाओं में विभक्ता मन्त्रसंहिताएँ, ११३१ ग्रन्थों में ही विभक्त ब्राह्मणग्रन्थ, ११३१ ही आरण्यकग्रन्थ, एवं ११३१ ही उपनिषद्ग्रन्थ, सम्भूय ४५२४ ( चार हजारपान्सौ चौबीस ) संख्याओं में विभक्त शब्दराशिरूप-ग्रन्थ कदापि वेद नहीं है । जिस का स्पष्टार्थ यही निकलता है कि, न तो मन्त्र--संहिताएँ ही वेद है, न ब्राह्मण ही वेद है, न आरण्यक ही वेद है । फलतः क्या उपनिषत् वेद है १, प्रश्न का भी एकमात्र ऋजु -समाधान निष्कर्ष यही निकल श्राता है कि, उपनिषत् वेद नहीं है ” । तो क्या - “ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " सिद्धान्त प्रामाणिक सिद्धान्त नहीं हैं?, अवश्य ही यह सिद्धान्त प्रामाणिक, अतएव सर्वात्मना शिरसा श्राराध्य है । तो फिर यह वदतोव्याघात कैसे?, इसी ग्रन्थि के पाशबन्धन- विमोक के लिए हमने प्रस्तुत चतुर्थ - स्तम्भ में - ( ग ) - वेद पौरुषेय हैं, अथवा अपौरुषेय?, इस नवीन प्रश्न का उत्थान आवश्यक समझा है, जिस इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न के समाधान के बिना न तो-' क्या उपनिषत् वेद है? ', इस प्रश्न का ही सम्यक समाधान सम्भव, एवं नैव प्रातिशाख्य सिद्धान्त की प्रमाणिकता का ही समन्वय सम्भव । २४

पृष्ठ 28

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उपनिषद्भूमिका १ खण्ड आस्तिकवर्ग की धारणा के अनुसार- " वेद, मनुष्य की रचना नहीं है । अपितु यह तो साक्षात् ईश्वर की वाणी है । अतएव वेद अपौरुषेय है, अर्थात् पुरुषविशेष ( मनुष्यविशेष ) के प्रयत्न से सर्वथा असंस्पृष्ट है " । बुद्धिवादी कहता है – “ इत्थंभूता धारणा का कोई भी वैज्ञानिक - सम्बल नहीं है । ' वेद ' शब्दात्मक शास्त्र है, शब्दरचनात्मक ग्रन्थ है । और ऐसी शब्दरचना मानवबुद्धि--से ही सम्भव है । अतएव कदापि वेद को ' अपौरुषेय ' नहीं माना जासकता " । विवाद यहीं पर उपशान्त नहीं होजाता । श्रपितु इस अपौरुषेयता, तथा - पौरुषेयता के श्राधार पर प्रधानरूपेण ६ मत, एवं अवान्तर - ४० ( चालीस ) मत होजाते हैं । प्रक्रान्त प्रश्न की जटिलता के संबद्ध के इन श्रावान्तर ४० मतों के द्वारा हमारी मानस-- प्रज्ञा एकवार तो सहसा विकम्पित ही होपड़ती है, एवं सचमुच ही तो वेद की यह पौरुषेयता, एवं पौरुषेयता एक तटस्थ जिज्ञासु के लिए असमाधेय प्रश्न ही प्रमाणित होजाता है । नीचे लिखी तालिकाओं से तथोक्त चालीसों मतों की रूपरेखा श्रंशतः अभिव्यक्त होजाती है— ( १ ) -- पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिनत मत - वेद प्रकृतक हैं, अपौरुषेय हैं, कूटस्थानित्य हैं । ( २ ) - नव्यन्यायदर्शनाभिमत -- मत- वेद ईश्वरकृत हैं, पौरुषेयापौरुषेय हैं, अनित्य हैं 1 ( ४ ) - प्राचीनन्यायदर्शनाभिमत - -मत----वेद ईश्वरावतारकृत हैं, पौरुषेय हैं, प्रवाहनित्य हैं । ( ३ ) - सांख्यदर्शनाभिमत- मत--वेद प्राकृतिक हैं, अपौरुषेय हैं, अनित्य हैं ( ५ ) — वैशेषिक दर्शनाभिमत-( ६ ) - नास्तिकमत---मत - वेद महर्षिकृत हैं, पौरुषेय हैं, अनित्य हैं । - वेद साधारण ग्रामीण - मनुष्यों का व्यवस्थाशास्त्रमात्र है । उक्त प्रमुख षड़विध मतों के गर्भ में प्रतिष्ठित अवान्तर ४० मतों के स्वरूप - दिग्दर्शन के लिए ही प्रस्तुत - पौरुषेया पौरुषेय नामक अवान्तर प्रकरण में निम्नलिखित प्रत्यवान्तर ६ विभाग हुए हैं, जिन में क्रमश: ( १ ) पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनसम्मत विभिन्न १३ अवान्तरमतों का, ( २ ) नव्यन्यायदर्शनसम्मत विभिन्न ७ अवान्तरमतों का, ( ३ ) प्राचीनन्यायदर्शनसम्मत विभिन्न ५ श्रवान्तरमतों का, ( ४ ) - सांख्यदर्शना-भिमत - विभिन्न ७ श्रवान्तरमतों का, ५ - वैशेषिकदर्शनाभिमत, विभिन्न ७ अवान्तर मतों का, ( ६ ) -नास्तिक-दर्शनाभिमत एक मत का, सम्भूय ४० अवान्तरमतों का युक्ति - तर्क - प्रमाण पुरस्सर दिग्दर्शन प्रयास हुआ है । एवं इस प्रयास से उस सन्देहलक्षण की अभिव्यक्ति होपड़ी है, जिस का स्वरूप ' एकस्मिन् धर्म्मणि विरुद्ध-- नानाकोटयवगाहिज्ञानं संशयः ' इत्थंभूत है । यदि परमतत्त्वेन नास्तिक मत को उपेक्षणीय भी मान लिया जाय, तब भी शेषभृत दार्शनिक ३६ उन अवान्तर मतों में से तो किसी भी मत को उपेक्षणीय मानने का साहस कोई भी दर्शन भक्त - श्रास्तिक नहीं कर सकता । जबकि पाँचों प्रास्तिक दर्शनों की मान्यताओं में ही परस्पर श्रश्वमाहिष्य है, तो स्वतः ही एक आस्तिक के भावुकतापूर्ण अन्तर्जगत् में इत्थंभूत प्रश्न का उदय सहज-रूपेणैव सम्भव बन जाता है कि- वेद अपौरुषेय है, अथवा अपौरुषेय? । निष्कर्षतः जवततक इस महान् प्रश्न का सभ्यक् समाधान प्राप्त नहीं होजाता, तबतक अन्यान्य -- प्रयत्न - सहस्रों से भी न तो उपनिषदों के वेदत्त्वानुबन्धी प्रक्रान्त प्रश्न का ही समाधान सम्भव, एवं न प्रातिशाख्य-- सिद्धान्त की प्रामाणिकता का ही संरक्षण- सुरक्षित । २५

पृष्ठ 29

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

किमपि प्रास्ताविकम् विगत तीन सहस्राब्दियों से तथोक्त प्रश्न उत्तरोत्तर दुरूह ही बनता चला आ रहा है दार्शनिक - मूलसूत्रों के भाष्यकारों, व्याख्याकारों, टीका - टिप्पणीकारों आदि की मतवादात्मिका श्रावेशाविष्टा भ्रान्तिपरम्परा के कारण । मतवादात्मिका मान्यता- परम्परा के कारण ही सर्वथा निर्णीत पौरुषेय- अपौरुषेय- निबन्धन प्रश्न अपनी जटिलता की सीमा का अतिक्रमण करता हुआ वेदभक्त भारतीय मानवों का ध्यान स्वयं वेद के रहस्यात्मक बोध से भी सर्वथा ही पराः परावत प्रमाणित कर चुका है । मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र में ज्ञानविज्ञानसिद्धा किन रहस्यपूर्णा सृष्टिविद्याओं का स्वरूप विश्लेषण हुआ है?, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न के समाधान - संस्पर्श से भी पराङमुखा बन जाने वाले भारतीय विद्वानों की वेदशास्त्रभक्ति का एकमात्र क्रीडास्थल आत्यन्तिकरूपेण वेद का पौरुषेय- अपौरुषेय - रूप शुष्कवाक्कल ही शेष रह गया है । एवं इस शुष्क वाकूकलह का ही अन्ततोगत्वा यह भीषण परिणाम हुआ है कि, वेदशास्त्र के प्रति निःसीम भक्ति व्यक्त करने वाले एक भारतीय के द्वारा ही मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद की पौरुषेयता, तथा अपौरुषेयता का अङ्गभङ्ग कर दिया गया, जिसके अनुबन्ध से ही हमें अगत्या श्राज प्रस्तुत भूमिका- प्रथमखण्ड में- ' क्या उपनिषद् वेद है? " जैसे आपातरमणीय अप्रिय प्रश्न के समाधान में प्रवृत्त होना पड़ रहा है । समाधान की कामनामात्र से ही तो इस दुरूह प्रश्न का समाधान याज अञ्जसैव इसलिए सम्भव नहीं है कि, मतवादात्मिका सम्प्रदायवाद - परम्पराओं के काल्वालीकृत आवरण से वेद का ज्ञानविज्ञानात्मक-पारम्परिक, पारिभाषिक अध्ययनाध्यापन क्रम विगत तीन सहस्रवर्षों से उत्तरोत्तर शिथिल ही होता रहा है । अवश्य ही पुण्य श्लोक सर्वश्री महाभाग सायण - महीधर आदि वेदव्याख्याताओंोंने वेद के कर्मकाण्डीय पक्ष का पारम्परिक संरक्षण करते हुए इस दिशा में कर्म्मभूमि भारतवर्ष की यज्ञकर्मनिबन्धना आचारनिष्ठा के संरक्षण में प्रशंसनीय ही योगदान दिया है । किन्तु जहाँतक वेद की रहस्यात्मिका ज्ञानविज्ञानात्मिका-सृष्टिविद्या - निबन्धना परिभाषाओं का प्रश्न है, उस सीमा पर्य्यन्त हम इन महाभागों को सर्वथैव उपांशु--पथानुवर्त्मा ही उपलब्ध कर रहे हैं । इसी परिभाषा - विलुप्ति के कारण स्वयं श्रीसायण - महीधर- श्रादि विश्वविश्रु त वेदभाष्यकार भी पौरुषेय - पौरुपेय प्रश्न को लेकर पर्याप्ता - अहमहमिका के अनुगामी प्रतीत होरहे हैं | आज हम प्रस्तुत चतुर्थ - स्तम्भ को आधार बना कर पौरुषेय - अपौरुषेय भावानुबन्धी दुरूह प्रश्न के सम्बन्ध में जिस तथ्यपूर्ण कटु सत्य को स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त कर देने का साहस, किंवा दुःसाहस करने के लिए प्रवृत्त हो रहे हैं, हम समझते हैं वर्त्तमानयुग के समस्त भारतीय वेदभक्त तो इस प्रवृत्ति से आरम्भ में संक्षुब्ध हो ही पड़ेंगे, साथ ही विगत तीन सहस्र वर्षों की अवधि में जिन जिन लोकविश्रु त श्राचार्य्यप्रवरोंनें इस दिशा में अपनी जो जो साम्प्रदायिक धारणाएँ व्यक्त कीं हैं, उन उन के चान्द्रमहिमामण्डल- विचरण-शील हँसात्मा भी एक बार तो इस प्रवृत्ति से निरतिशयरूपेण संबन्ध ही होपड़े गे, जिस इस क्षोभ - विक्षोभ की जननी प्रवृत्ति का निष्कषार्थ केवल इसी निम्न लिखित वाक्य से अनुप्राणित माना जायगा कि “ मन्त्रब्राह्मणात्मक शब्दात्मक वेदशास्त्र स्वयं वेद नहीं है, अपितु यह तो वेद का शास्त्र है ” । “ मन्त्र, तथा ब्राह्मण -- रूप वेद किसी ग्रन्थविशेष का नाम नहीं है । अपितु वेद तो इस चराचर. पञ्चतन्मात्राधारेण प्रतिष्ठित -- पाच भौतिक विश्व का मूल - आरम्भण ( उपादान ) द्रव्य है, २६

पृष्ठ 30

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उपनिषद्भूमिका १ खण्ड जिसकी चिति-- चयन --संघात से ही विश्वस्वरूप का निर्माण हुआ है ", इस वाक्य - सन्दर्भ से अनुप्राणित तत्त्वात्मक मौलिक- वेद ही वह अपौरुषेय - कूटस्थ - नित्यवेद है, जिसके आधार पर ही विश्व, तथा विश्वप्रजा का स्वरूप निर्माण हुआ है । क्या विगत तीन- सहस्र वर्षावधि के वेदभक्त आचार्य, विद्वान्, और सर्वसामान्य इस तथ्य से झटिति सहमत होजायँगे? | क्या तत्त्वात्मक वेद की स्वरूपसत्ता पर उनका झटिति विश्वास होजायगा १, नेति होवाच । इसलिए ' नंति होवाच ' कि, तथोक्ता सुदीर्घा अवधि से चले आ रहे संस्कारों की धारावाहिकी -- परम्परा ने उनके मानस -- जगत् को ऐसा श्रभिभूत कर लिया है कि, वे अपनी अन्धश्रद्धा के विपरीत एकाक्षर -श्रवण का भी साहस नहीं कर सकते । किन्तु हम ऐसी आस्था रख रहे हैं कि, स्वयं तत्त्वात्मक वेद में श्रश्मावणात्मक वैसा प्राणात्मक वीर्य्य है, जिसके बलवदाकर्षण से अन्ततोगत्त्वा उनको अपनी त्रिसहस्रवार्षिकी भी सांस्कारिकी दुराग्रहवृ ते का परित्याग कर ही देना पड़ेगा, एवं अवनतशिरस्क बन कर अन्ततः उन्हें यह स्वीकार कर ही लेना पड़ेगा कि -“ मन्त्रब्राह्मणात्मक– तत्त्वात्मक सृष्टिमूलभूत वेद अपौरुषेय ही है, कूटम्थनित्य ही है, एवं इस दृष्टि से ब्राह्मण की अन्तभागरूपा तत्वात्मिका उपनिषत भी अवश्य ही अपौरुषेयवेद है । ठीक इसके विपरीत - तत्त्वात्मक- मौलिक - वैज्ञानिक - वेद का शब्द के द्वारा स्वरूपोपवर्णन करने वाला, बुद्धिपूर्वक शब्दरचनात्मक - मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेदशास्त्र पौरुषेय ही है, ऋषिकृत ही है, एवं इस दृष्टि से ब्राह्मण का अन्तभागरूप उपनिषद्-ग्रन्थ भी वेद न होकर वेद की पुस्तकमात्र ही है । " पाञ्चभौतिक- प्रत्यक्षदृष्ट - विश्व के उपादान पञ्च पञ्चीकृत ' पञ्चभूत ' माने गए हैं । इनके उपादान पञ्चपञ्चीकृत ' रेणुभूत ', एवं इनके उपादान अपञ्चीकृत- विशुद्ध तत्त्वात्मक ' अणुभूत ' माने गए हैं । गुण-भूतों से श्रणुभूतों का, इनसे रेणुभूतों का, इनसे पञ्चभूतों का, एवं इनसे पञ्चमहाभूतात्मक विश्व का उदय माना गया है । सांख्यपरिभाषा में सर्वादि के अपञ्चीकृत, अतएव विशुद्ध, अतएव च अविभाज्य - तत्त्वरूप गुणभत ही ' तन्मात्रा ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनके ' शब्द - स्पर्श - रूप - रस - गन्ध ' नाम सुप्रसिद्ध है । इन पाँच-तन्मात्राओं के उत्तरोत्तर - भावी पञ्चीकरण से ही पञ्चमहाभूतात्मक विश्व की स्वरूप - निष्पत्ति हुई है । सैषा स्थितिः - प्राकृतिकी । उक्ता प्राकृतिक — स्थिति के सर्वादिभूत - गुणभूत का ही वैज्ञानिक नाम है ' विश्वसृट् ' । अणुभूत का नाम है - – ' पञ्चजन ', रेणुभूत का नाम है - ' पुरञ्जन ', पञ्चभूत का नाम है - ' पुर ', एवं पञ्चमहाभूत का नाम है – विश्वम् ' । विश्वम् ' का मूल ' पुरम् ' ( पञ्चभूत ) है, ' पुरम् ' का मूल - ' पुरञ्जन ' ( रेणुभूत ) है, पुरञ्जन का मूल ' पञ्चजन ' ( अणुभूत ) है, एवं पञ्चजन का मूल है – विश्वसृट्, अर्थात् पञ्चतन्मात्रारूप-गुणभूतपञ्चक, अर्थात् शब्द - स्पर्श - रूप - रस- गन्ध - नाम की सुप्रसिद्धा पञ्चतन्मात्राएँ । क्या सृष्टि के मौलिक-कारण से अनुप्राणिता प्रश्नावली - गुणभूतरूपा पञ्चतन्मात्रा पर ही विश्रान्त है? । राजर्षि मनु कहते हैं-नहीं, पञ्चतन्मात्रारूप गुणभूतों का भी जो मूल कारण है, वही वास्तविक मूलकारण है इस व्यक्त - विश्व का, २७