Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 121–130

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ की उपेक्षा कर धर्म-वाले वे दोनों वीर बालक आदि महानात्माओं ने ऐहलौकिक सब सुखों का कौन ऐतिहासिक रक्षा में ही अपने जीवन का उत्सर्ग किया था, इस सत्य परिस्थिति के संघर्ष में राज-विरोध कर सकता है । यह सब क्या था? राजनीति एवं धर्मनीति । नीति का सवात्मना पराजय, एवं धर्म्मनीति का पूर्ण विजय ही धर्म का स्व बात वास्तव में यथार्थ है । श्राचार - व्ययहार - संस्कृति आदि उस की " है, यही राष्ट्र की मौलिक, सम्पत्ति है । जिस राष्ट्र का नाश करना हो, । बिना प्रयास हो जायगा ' सभ्यता, संस्कृति आदि को कुचल डालिए, सब कुछ से सम्बन्ध न अब तक हमारे ऊपर जो आक्रमण हुए थे, उन का सीधा संस्कृति है । मानवता, ' था । परन्तु वर्त्तमान युग में हमने अपनी संस्कृति पर आक्रमण किया का स्वरूप विकृत सभ्यता, संस्कृति आदि के स्वरूपनिर्माण करने वाले शिक्षायन्त्र कर दिया है । कर लिया है । राष्ट्र के मूलप्राण वैदिकसाहित्य को एकान्ततः विस्मृत हम उन देश-परिणाम जो कुछ हुआ, एवं हो रहा है, वह हमारे सामने है । हैं इसलिए कि आप का साहित्य-प्रेमियों को सावधान कर देना अपना श्रावश्यक कर्त्तव्य समझते राष्ट्र की इस शून्य यह आन्दोलन तब तक सर्वथा व्यथ ही रहैगा, जब तक कि आप आप समुन्नत मौलिक विभूति की रक्षा का पूर्ण उपाय न कर लेंगे । जिन राष्ट्रों को , समाधान हो जायगा । " एक परतन्त्र समझ रहे हैं, उन की साहित्य प्रगति देखिए परतन्त्र रहना कहीं घोड़े का गधा बन कर स्वतन्त्र हो जाने की अपेक्षा हम उस का खोकर यदि हम को अधिक अच्छा समझते हैं " । अपनी सभ्यता, धर्म, संस्कृति हैं । हम हम रहैं, फिर स्वतन्त्रता मिले तो इस की अपेक्षा हम परतन्त्र ही अच्छे को सर्वात्मना पूर्ण स्वतन्त्र बनें, यही हमारी उत्कट अभिलाषा है, एवं इस अभिलाषा, शिक्षित, पूर्ण संघटित करने वाला यही हमारा वैदिक साहित्य है । योग्य, चाहिए बलवान् । हमारी शिराओं में राष्ट्र के लिए सर्वत्र स्वतन्त्रता है । हमें योग्य बनना अपने पूर्वसाहित्य की अपने पूर्वजों का वही ऊर्करस पुनः प्रवाहित हो, इस के लिए हमें १८

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२०२ ॥ भूमिका ॥ उपासना करनी चाहिए । हम उन देशप्रेमियों से क्या यह नहीं कह सकते कि अभी धाप का देश धर्म्म, सभ्यता, सङ्गठन यादि समुन्नतिमूलक सभी साधनों से वञ्चितप्राय है । व्याज भारतवर्ष का प्रत्येक गृह कलह भूमि बन रहा है । ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, दम्भ, मात्सर्य, स्वार्थपरायणता, स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार, निर्बलों का दलन, ज़मीदारों का एकच्छत्र शासन कृषकवर्ग का विनाश, धर्म का तिस्कार क्या यह बातें उन्नति प्राप्ति के उपाय हैं? सोचिए! और खूब सोचिए!! सोच समझ कर किसी निर्णय पर पहुंचिए!!! व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र का इसी में कल्याण है । आपके विचार से शास्त्र हमारे पतन के कारण है, इतिहास कहता है शास्त्र मर्यादा की अवहेलना ही हमारी अवनति का मुख्य हेतु है । किस प्रामाणिक कहैं, समाधान कीजिए । कितने हीं महानुभावों के विचार से दैनिक जीवन में इस वैदिक साहित्य का उपयोग नहीं हैं । बुद्धि के अन्यमत शत्रु इन पुरुष पुङ्गवों से हम यही कहने की धृष्टता करेंगे कि अभी आपने जीवन - मृत्यु का रहस्य ही नहीं समझा है । आप जीवन की कहते हैं, हमारे विचार से हमारे प्रत्येक कर्म का स्वरूप जिस विधि से इस साहित्य में निरूपित हुआ है, उस की तुलना में अन्य कोई साहित्य क्षणमात्र भी नहीं ठहर सकता । अस्तु इस साहित्य का उपयोग है, अथवा नहीं? इस प्रश्न का समाधान स्वयं यह साहित्य ही करेगा | अन्यथा - " मुखमस्तीति वक्तव्य दशहस्ता हरीतकी " यह न्याय तो सर्वत्र निःशुक्ल उपलब्ध होता ही है । जैसा कि प्रारम्भ में निवेदन किया जा चुका है, वेदतत्व, किंवा वैदिक साहित्य आज हमारे लिए एक असमावेया पहेली बन गई है । अपने आपको शास्त्रों के मर्मज्ञ समझने वाले बड़े बड़े विद्वान् भी आज दिन वेदों के अर्थ करने में कुण्ठित देखे जाते हैं । इन्हीं सारी विषम समस्याओं को देख कर यथार्थ में अनुचित समझते हुए भी समयगति के अनुरोध से उचित मानते हुए हमने भाषा द्वारा वैदिकतत्वों को जनता के सामने रखने का प्रयास किया है । केवल संस्कृतज्ञ विद्वानों की वैदिक साहित्य की ओर विशेष रुचि नहीं देखी जाती । एवं PE

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॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ हैं, वे प्रायः अनार्ष पश्चिमी विचारों के जो महानुभाव पाश्चात्य शिक्षा दीक्षा से अलङ्कृत कोटि के मनुष्यों का तो कहना ही उच्छिष्ट भोगी देखे जाते हैं । ऐसी दशा में इतर साधारण का धीरे धीरे यह निश्चय होता जारहा है । है । आधुनिक विचार वाल सभ्य महानुभावों मस्तक रहा है । विज्ञान- शिल्प-कि भारतवर्ष आज की उन्नति के सामने सदा ही नत हुआ है, एवं इस का एकमात्र भ्यता - संस्कृति - श्रादर्श आदि भावों का इसी युग में विकास आंशिक रूप से सहमत हैं । वास्तव श्रेय पश्चिमी विद्वानों को ही है । हम भी इन विचारों से , समय का सदुपयोग आदि में पश्चिमी जगत् ने अपनी कर्मप्रवणता, अध्यवसाय, दक्षता है । इस में आशातीत उन्नति प्राप्त करली समुन्नतिमूलक सिद्धान्तों को अपनाते हुए इस क्षेत्र उन्नति केवल भौतिक विज्ञान को ही सम्बन्ध में भी हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि के मोह में पड़ कर उस शाश्वत का परम साधन मानने वाले पश्चिमी राष्ट्र क्षणिक अभ्युदय आत्मज्ञान के गर्त में गिरेंगे । क्योंकि बिना शान्तानन्द से वञ्चित रहते हुए किसी दिन विनाश सकता । फिर भी वे जाग्रत हैं, हम के केवल विज्ञान वास्तविक समुन्नति का कारण नहीं बन की हम चाहिए । उन सभ्यराष्ट्रों सुप्त हैं, यह मान लेने में हमें कोई आपत्ति नहीं करनी का मूल कारण । यही तो हमारे सर्वनाश नकल करते हैं, परन्तु गुणों की नहीं, व्यसनों की हुए हम आदि सद्गुणों को अपनाते है । आज उदासीनता, आलस्य, दीनता, परावलम्ब हुए भी, मानते हैं । यह सब कुछ समझते वर्तमान युग में उन से सभी बातों में पिछड़ गए उन्नति का सेहरा तय्यार नहीं हो सकते कि हुए भी हम यह कदापि स्वीकार करने के लिए - कला है । विज्ञान - साहित्य - राजनीति एकमात्र पाश्चात्यों के मस्तक की ही शोभा बढ़ा रहा प्राप्त की थी, यह मानलेने में आदि सभी विषयों में महर्षियों ने विदितवेदितव्य की उपाधि कुछ भी आपत्ति नहीं है । हैं तो आत्मा कम्पित हो -हमारे देश की मनोवृत्ति का जब हम अध्ययन करते वाले इस देश ने कब कृतघ्नता को जाता है | सम्पूर्ण विश्व को कृतज्ञता का पाठ पढ़ाने हैं, जिन देश में ऐसी ऐसी विभूतिएं विद्यमान अपनाया, यह जानना कठिन है । आज इसी २०

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|| भूमिका 11-का समकक्ष सम्भवतः अन्य देशों में न हो तो कोई आश्चर्य नहीं । परन्तु इस कृतघ्न देश की कृतघ्नता ने उन विभूतियों के लाभ से हमें वञ्चित कर रक्खा है 1 । हमारी अविद्या की सीमा यहीं समाप्त नहीं हो जाती । यदि कोई पश्चिमी विद्वान् भारतीय विद्वान् के प्रति, अथवा साहित्यांश के प्रति अपनी सम्मति प्रकट करना है, तब हमारी अांखें खुलती हैं । अमुक विषय उपादेय है, अथवा अनुपादेय! पश्चिमी विद्वानों की सम्मत्ति मांगिए, तभी सफलता मिलेगी । कैसी अविद्या! कितनी बिडम्बना! एक बार स्व ० जे ० एम ० सेन गुप्ता ने गान्धी- जयन्ती के व्यवसर पर भारतीयों की उक्त मनोवृत्ति का दिग्दर्शन कराते हुए कहा था कि - " जखून एई पश्चिमेरा श्रामादेर चोखे प्रांगुल दिए देखे दाय, तखून भ्रमरा बुझि एई बड़ो लोक " । अर्थात् हमारे नेता कितने ही बड़े विद्वान्, अथवा महात्मा क्यों न हों, जब तक ये पश्चिमी लोग हमारी आंखों में अंगुली दे देकर हमें यह न बता दें, तब तक ( उनका महत्व ) हमारी समझ में नहीं आता । यद्यपि हमारी दृष्टि में भारतीय - साहित्य के सम्बन्ध में पश्चिमी विद्वानों की सम्मति का कोई महत्व नहीं है । तथापि लोकरुचि को सम्मुख रखते हुए हम यह यावश्यक समझते हैं कि पश्चिमी विद्वानों को ही सर्वेसर्वा मानने वाले उन भ्रान्त भारतीय पथिकों के भ्रम निवारणार्थ उन्हींके आराध्य विद्वानों की कुछ एक सम्मतिएं इस सम्बन्ध में उद्धृतकीं जांय । भारतीय साहित्य के अनन्यभक्त स्वनामधन्य माननीय मि ० क्रोझर Mr. ( Crozor ), दार्शनिक तत्ववेत्ता सर्वश्री मि ० शॉपनहार ( Mr Shapanhar ), इतिहास लेखक कर्नल टाड साहब ( Col. Todd ), डाक्कर साइल्स ( Dr. Syles ), मि ० गौस ( Mr Gose ), मि ० थार्नटन ( Mr. Thornton ), अध्यात्मशास्त्रवेत्ता अमेरिकन विद्वान् एमर्सन ( Emerson ) सुप्रसिद्ध विकासवादी माननीय हक्सले ( Huxlay ), माननीय जर्मन विद्वान् मि ० शेगल ( Mr. Shaigal ), डा ० एलग्झेन्डर ( Dr Alexander ), सर विलियम जोन्स ( Sir -William - Jones ), मि ० बाल ( Mr. Ball ), रास्को ( Mr. Rasko ), प्रसिद्ध विद्वान् सुकरात ( Socrates ), सुप्रसिद्ध रिपब्लिक ( Republic ) ग्रन्थनि ' ता दार्शनिक विद्वान् २१

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2। प्रारम्भिक वक्तव्य 4 प्लेटो ( Plato ), पाइथागोरस ( P.thagoras ), प्रो ० विल्सन ( Prof. Wilson ), डा ० साल ( Dr Seal ), भट्टोपाह मेक्समूलर ( Maxmuler ), एरिस्टॉटल ( Aristate ), मि ० झिनो ( Mr. Jhina, सर्वश्री तिसरो ( Cicero ), मि ० पिकाक ( Mr. Peacock ', सर डब्ल्यूनोन्स ( Sir. W Jonos ), डा ० वेलेन्टिन ( Dr. Walantin ), प्रो ० बॉप ( Bopp ), मिस कार्पेन्टर ( Miss. Carpenter ), मि ० ग्रिफिथ ( Mr Griffith ), डा ० एनेथिल ( Dr Anapil ), प्रो ० वेलेस ( Pro. Walace ), यदि कितने ही पाश्चात्य विद्वानों ने भारतवर्ष को सभी विद्याओं में अपना परम गुरू माना है । उन महापुरुषों को यह स्वीकार करने में जरा भी आपत्ति नहीं है कि “ पश्चिमी देशों में आज जो कुछ विद्या का विकास देखा जाता है, वह एकमात्र भारतवर्ष की असीम उदारता का ही फल है । भारतीय साहित्य का ध्यांशिकरूप से मन्थन करने वाले उन सत्यनिष्ठ पुरुषपुङ्गवों ने इस देश के प्रति, एवं यहां के ऋषियों के प्रति जो स्पष्ट एवं सत्य उद्गार प्रकट किए हैं, पथभ्रष्ट भारतीयों के लिए वे सन्मार्ग प्रदर्शक आलोक हैं । सभी विद्वानों के उद्धरण प्रकृत में उद्धृत । नहीं किए जा सकते, उदाहरण के लिए कुछ एक निदर्शन ही उपस्थित कर देना पर्याप्त होगा १ - सुप्रसिद्ध फ्रेञ्च पण्डित लुई जेकोलियट ( Louis Jacolliot ) अपने बाइबिल इन इण्डिया ( Bible in India ) नामक ग्रन्थ में लिखते हैं- " Soil of ancient India, ! cradle of humanity, hail! hail! Venerable and efficient Nurse the Whom centurios of brutal invasions have not yet buried under and of dust of oblivion. Hail, father land of faith, of love, of poetry " science! May we hail a revival of thy past in our western future १ - - श्रथात् - " हे प्राचीन भारत भूमि! हे मनुष्यजाति की श्राद्यजननि! तेरा जय जयकार हो । पूजनीया एवं समर्थ धात्रि! क्रूर परचक्रों की शताब्दियां भी तुझे आज तक विस्मृति की धूल में न दबा सकीं । माता तेरी जय हो! हे धर्म की, प्रेम की, कविता की, एवं विज्ञान की जन्मभूमि! हम तुझे प्रणाम करते हैं, और चाहते हैं कि तेरे भूतकाल का पुनरावर्तन हमारे पश्चिम के भविष्यकाल में हो " । २२

पृष्ठ 126

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भूमिका २ - एक दूसरा फ्रेञ्च विद्वान पं ० क्रोफर ( Crozor ) लिखता है— “ If there is a country on earth, which can justly claim the honour of having been the cradle of the human race or at least the scene of primitive civilization the successive developments of which is the second life of man that country assuredly is India. " ३ – पृथ्वी भर की प्राचीन सभ्यता, साहित्य एवं धर्म की छान बीन करने के पश्चात् - काउन्ट जॉन स्टजना ( Count John's Ton ) अपने दी ओरीजिन आफ हिन्दू इज्म ( The Origin of Hinduism ) ग्रन्थ में लिखते हैं- “ What has been briefly stated here may be sufficient to show that no nation on earth can vie with the Hindus in respect to the antiquity of their religion and the antiquity cf their civilization. " ४ - सुप्रसिद्ध तत्वज्ञ विक्टर कजिन ( Victor Cousin ) अपनी हिस्ट्री आफ माडर्न फिलॉसफी ( History of Modern Philosophy ) में लिखते हैं— “ When २ - अर्थात् – “ यदि पृथिवी पर ऐसा कोई देश है, जो कि न्यायपूर्वक सत्व का गौरव रखता हो तो वह मानवजाति का प्राय स्थान था । अथवा कम से कम उस प्राथमिक सुधार का प्रावस्थान था, जिस सुधार की क्रमशः उन्नति होना ही मानवजाति का परिवर्तन है तो वह देश निःसन्देह भारतवर्ष ही है " । ३ - अर्थात् — “ यहां जो कुछ संक्षेप से कहा गया, वह यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि पृथिवी पर प्रतिष्ठित कोई भी राष्ट्र हिन्दुओं के धर्म की प्राचीनता, एवं उनकी सभ्यता की प्राचीनता के सम्बन्ध में प्रतिस्पद्धी ( बराबरी ) नहीं कर सकता " । ४ — अर्थात्– “ जब हम भारतवर्ष के काव्य एवं वेदान्त - ग्रन्थों का अवधानपूर्वक अध्ययन करते हैं तो हमें उक्त ग्रन्थों में इतने और ऐसे गम्भीर सत्य प्राप्त होते हैं कि ( इन-के सामने ) पाश्चात्य प्रतिभाशक्ति की " मसजिद तक की दौड़ ” हमें प्रतितुच्छ प्रतीत होती है, एवं हमें पूर्व ( भारत ) के सामने घुटनों के बल झुकना पड़ता है, साथ ही में मनुष्यजाति के इस आस्थान में उच्चातिउच्च तत्वज्ञान की जननी भूमि का परिचय मिलता है ' ' । २३

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॥ प्रारम्भिक वक्तव्य । and philoso hical monuments we read with attention the political so many truths, and truths ....... of India we discover there meanness a contrast with the so profound, and which make such genius has sometimes stopped, of the results at which the European the knee before that of the East and that we are constrained to bend of the highest race the native land to see in this cradle of human philosophy. " ( Col. Todd ) अपने राजस्थान ( Rajasthan ' ) ५— कर्नल टाड़ साहब sages like those whose systems of में लिखते हैं – “ Where can we look for those of Greece to whose works philosophy were the prototypes of were disciples? Where shall we find Plato, Thales and Phythagoras the planetary system yet excites astronomers whose knowledge of the architects and sculptors whose wonder in Europe, as well as and the musicians who could make the works claim our admiration from tears to smiles. mind oscillate from joy to sorrow, का मत है कि-६ - भारतवर्ष के इतिहास की खोज करने वाले एक फ्रेञ्च इतिहासज्ञ mother it is, that the common “ India is the world's cradle; thence सकते हैं, जिनके कि ५ - अर्थात् – ' ' हम उन ऋषियों को अन्यत्र कहां पा थेल्स और पायथागोरस शिष्य दर्शनशास्त्र ग्रीस के आदर्श थे । जिनके ग्रन्थों के प्लेटो, ज्ञान आज थे । हम उन ज्यौतिषियों को कहां पासकते हैं, जिन का ग्रहमण्डलसम्बन्धी मूत्तिकारों को कहां भी योरोष में आश्चर्य उत्पन्न कर रहा है । हम उन कारीगरों एवं गायकों को कहां देख सकते पासकते हैं, जिनके कार्य हमारी प्रशंसा के पात्र हैं । हम उन हैं, एवं आंसुओं को मुस्कराहट में बदल हैं, जो मन को दु: ख में दौड़ा सकते हैं । " है । इस सर्वसाधा-६ - अर्थात् — “ भारतवर्ष जगत् की उत्पत्ति का आदिस्थान अपनी सन्तान को भेजा है, रण की मातृभूमि ने यहीं से पश्चिम की अन्तिम सीमा तक न मुर्झाने वाला प्रमाण देते हुए एवं " अपना उत्पत्ति स्थान भारतवर्ष ही है " ऐसा कभी । का हमें हकदार बनाया है " उसने अपनी भाषा, कायद, नीतितत्व, साहित्य, एवं धर्म २४

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|| भूमिका ॥ in sending forth her children even to the utmost West, has in unfading testimony of our origin bequeathed us the legacy of her language, her laws, her moral, her literature and her religion. ' " " ७- —यही फ्रैश्च विद्वान् आगे जाकर फिर कहता है— “ Can there be any absurdity in the suggestion that India of six thousand years ago ' brilliant ' civilized, ever flowing with population, impressed upon Egypt, Persia, Judia, Greece and Rome, a stamp as ineffaceable impression as profound, as those last have impressed upon us? " ८ - औपनिषद तत्वज्ञान के सम्बन्ध में अपने पक्षपात रहित सत्यविचार प्रकट करते हुए पण्डित पालड्यूसन ( PollIusion ) कहते हैं- “ Philosophy_of Gita begins where the English Philosophy ends. " ६ - सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान् शॉपनहार ( Shopanhar ) अपनी वल्ट आल्स-विली वस्टीलनू ( Welt Als Wille Vorstellung ) नामक जर्म्मन् ग्रन्थ की प्रस्तावना में लिखते हैं— “ In the whole world there is no study, do beneficial and so elevating as that of the Upnishadas. It has been the solace of my life, it will be the solase of my death. " ७ – अर्थात् - " तेजस्वी ( Brilliant ), सुसभ्य एवं जनसमूह परिप्लुत ( आज से ) ६ हजार वर्ष पूर्व के भारतवर्ष ने मिश्र, ईरान, जूडिया, ग्रीस, एवं रोम देशों पर अपना उतना ही गहरा एवं अमिट प्रभाव जमाया था, जितना कि इन देशों ने हम पर जमाया था, क्या यह कहने में कोई बेहूदगी होगी? ( नहीं ) ” । --८ - अर्थात् – ' जहां अंग्रेजी तत्वज्ञान का अन्त होता है, वहां गीता के तत्वज्ञान का प्रारम्भ होता है " । र – अर्थात्– “ सम्पूर्ण विश्व में उपनिषदों के समान और कोई अध्ययन लाभप्रद एवं उन्नतिप्रद नहीं है । वह ( उपनिषदों का अध्ययन ) मेरे जीवन की शान्ति रही है, एवं आगे भी मेरे जीवन की शान्ति रहेगी " ।

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० ॥ प्रारम्भिक वक्तव्य Stiernas ) कहते हैं— “ But १० - काउन्ट जॉन स्टर्जना ( Count John than 3000 years before Christ, if it be true that the Hindus more so high a degree according to Baill's calculation, had attained how many centuries of astronomical and geometrical of learning their culture have been, since earlier must be the commencement in the path of science. " the human mind advances only step by step civilization is the ११ - एक अङ्गरेज इतिहासवेत्ता का मत है कि “ Hindu earliest civilization in the world. " ) ने भारत के १२ – सुप्रसिद्ध अमेरिकन अध्यात्मशास्त्रवेत्ता इमर्सन ( Emerson करते हुए कहा है-तत्वज्ञान के प्रकाश को पश्चिमी देशों में फैलने की उत्कट आकाङ्क्षा प्रकट which ravished the " I look for the hour when that supreme their beauty lips spoke oracles to all souls of those Eastern men and through times, shall speak in the West also. " की १० — अर्थात्– “ यदि यह बात सच है कि हिन्दुओं ने बेली ( Baille ) ज्यौतिष और भूमिति गणनानुसार इंसी ( Chsist ) के ३००० ( तीन हजार ) वर्ष पहिले की सस्कृति का आरम्भ के ज्ञान में इतने ऊंचे दर्जे की पारदर्शिता प्राप्त कर ली थी तो उन सिद्ध करने के इस के ( ईसा के ) कितनी शताब्दियों पहिले होना चाहिए - ( यह बात यह वर्ष पूर्व ही उन्नति के सर्वोच्च लिए प्राप्त है कि भारतवर्ष का साहित्यज्ञान ईसा से हजारों पर धीरे धीरे ही आगे शिखर पर पहुंच चुका था ) क्यों के मानवीय मन विज्ञान के पथ बढ़ता है " । ११ – अर्थात् — “ हिन्दू सभ्यता संसार में पहिली सभ्यता है " । १२ — अर्थात्– “ मैं उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रहा हूं, जब कि परमात्मज्योति में निमग्न पश्चिम में भी चमकेगी, जो कि पूर्व के लोगों के आत्माओं को ( सदा ) परमात्मा संस्कृत-रखती है, और ( जिस श्रात्मज्योति के प्रभाव से ) हर घड़ी उनके होठ देववाणी ( भाषा ) बोलते रहते हैं " । २६

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.. | भूमिका १३ – डॉक्टर एलेग्डर ( Alexander ) भारतीय तत्वज्ञान की व्यापकता एवं विशालता का उल्लेख करते हुए कहते हैं – “ Hindu Philosophy was so comprehensive that counterparts of all systems of philosophy were to be found in it. " १४ - जान स्टर्जन ( John Stjerna ) अपनी विल्डम आफ दी एन्शेन्ट इन्डिया ( Wisdom of the Ancient India ) में लिखते हैं- 66 Remarkable is -the precision with which the immortality of the soul and its existence when separate from the body, is expressed in the sacred writings of the Hindus, and not merely as philosophical proposition " but as a doctrine of religion. In this respect the Hindus were far in advance of the philosophers of Greece and Rome who considered the immortality of the soul as problematical. " -१५ - यशोमूर्त्ति जम्मन पं ० शेगेल ( Shaigal ) कहते हैं — “ Even the loftiest philosophy of the Europeans, their idealism, appears in comparison with the abundant light and vigour of oriental idealism like a १३ – अर्थात् – “ भारतीय तत्वज्ञान ( हिन्दूतत्वज्ञान ) इतना विशाल है कि सब प्रकार के युरोपियन तत्वज्ञान के प्रतिरूप इस में मिलते हैं " । १४ – अर्थात् — “ हिन्दुओं के पवित्र ग्रन्थों में आत्मा का श्रमरत्व, एवं शरीर से पृथक् होने पर उस का ( नित्य ) अस्तित्व विशुद्धता से केवल तत्वज्ञान ( Philosophy ) की रीति से ही नहीं समझाया गया है, अपितु धार्मिकतत्वों से भी समझाया गया है- ( धर्म्मा-चरण द्वारा उसे व्यावहारिक रूप भी दिया गया है ) । इस बात में हिन्दूलोग ग्रीस एवं रोम देशों के तत्वज्ञानियों से बहुत बढ़े चढ़े थे, जो कि आत्मा के अमरत्व को अनिश्चित मानते थे " । १५ - अर्थात् – “ युरोपियनों का सर्वोच्च तत्वज्ञान, उन का भावप्राधान्यवाद पूर्वीय देशों के विद्वानों के भावप्राधान्यवाद ( Idealism ) के प्रखर प्रकाश एवं शक्ति के सामने उसी प्रकार तुच्छ है, जैसे दोपहर के सूर्य के स्वर्गीय प्रकाश के साम ने आग की जरा सी, और कमजोर चिनगारी ” ।