Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 131–140

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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- प्रारम्भिक वक्तव्य the feeble promethean speck in the full flood of the heavenly extinguished glory of. " noonday sun - faltering and feeble and ever ready to be www १६ – प्रोफेसर बेबर साहब ( Bewar ) ने अपनी हिस्ट्री आफ संस्कृत लिट्रेचर ( History of Sanskrit Literature ) में हिन्दूतत्व ज्ञान की, उस की विशाल में गहनता की, उस की सर्वोच्चता की बड़ी प्रशंसा की है । आप हिन्दूतत्वज्ञान के सम्बन्ध that the Indian लिखते हैं — “ It is in this field and that of Grammar mind attained the highest pitch of its marvellous featality. 66 १७ - श्रीमती एनी बेसेन्ट ( ( Anne Besant ) कहतीं हैं — “ India Psychology is a far more perfect science than European Psychology. " १८ — डाक्टर एनफिल ( Enfil ) अपनी हिस्ट्री ग्राफ फिलॉसफी ( History of Philosophy ) में लिखते हैं- " We find that it ( India ) was visited for the purpose of acquiring knowledge by Pythagoras, Anaxarches, Pyrrho, and others who afterwords became eminent philosophers in Greece. 99 and १ ९ - एक स्वेडिश काउन्ट ( Count ) का कथन है- " Pythagoras Plato hold the same doctrine that of Pythagoras being probably १६ - अर्थात् - " इस ( तत्वज्ञान ) क्षेत्र में, एवं व्याकरण में हिन्दुओं ने अपनी वर्यकारिणी उत्पादक बुद्धि की सर्वोच्चता प्राप्त की है " । १७ — अर्थात् — “ हिन्दूमानसशास्त्र युरोपियन नानसशास्त्र से कई गुना अधिक पूर्ण विज्ञान है " । १८ - अर्थात् - " हम देखते हैं कि हिन्दुस्तान में पायथागोरस ( Pythagoras ) और पायरो ( Pyrrho ) ज्ञान प्राप्त करने के लिए आए थे । ये महानुभाव ग्रीस के नामा-ङ्कित तत्वज्ञानी होगए हैं " । १ ९ - अर्थात् – “ प्लटो और पायथागोरस दोनों एक ही सिद्धान्त मानते हैं, जो कि सिद्धान्त हिन्दुस्तान से लाया गया है । पायथागोरस ने अपने तत्वज्ञान के अभ्यास को पूर्ण करने के लिए हिन्दुस्तान में यात्रा की थी " । २८

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|| भूमिका | derived from India whither he travelled to complete his philosophical studies. ” २० - प्रॉफेसर शेगेल ( Shegal ) कहते हैं – “ The doctrine of transmigration of souls was indigenous to India and was brought into Greece by Pythagoras. " " २१ - मि ० कालब्रुक ( Callbrook ) कहते हैं - " The Hindus were in this respect the teachers and not the learners. " २२ – एक फ्रेश्व १७ पण्डित का कथन है— “ The traces of Hindu philosophy which appear at each step in the doctrines professed by the illustrious men of Greece abundantly prove that it was from the East came their science, and that many of them no doubt drank deeply at the principal fountain. " ०१२३ - प्रॉफेसर बॉप ( Bopp ) कहते हैं " Sanskrit is more perfect and and copious than the Greek and Latin. At one time sanskrit was the one language spoken all over the world. " २० - अर्थात् - " पुनर्जन्म का सिद्धान्त हिन्दुस्तान का है, एवं वह ग्रीस में पायथा-गोरस के द्वारा लाया गया " । २१ - अर्थात् – ' ' इस बात में ( तत्वज्ञान के सम्बन्ध में ) हिन्दू गुरू थे, न कि शिष्य " । २२ – अर्थात् ' ग्रीस के सुप्रसिद्ध महानुभावों के द्वारा प्रकट किए सिद्धान्तों में पद पद पर हिन्दूतत्वज्ञान के चिन्ह मिलते हैं । उनसे यह बात सिद्ध होती है कि उन की विद्या पूर्वीय देशों से आई थी, एवं उन ( विद्वानों में से ) में से बहुतों ने मूलस्रोत से तत्व-ज्ञान का जलामृत पान किया था " । २३ – अर्थात् - " संस्कृत ( भाषा ) ग्रीक एवं लेटिन भाषाओं से अधिक पूर्ण एवं विशाल है । "......... " एक समय संस्कृत भाषा सारे संसार में बोली जाती थी " । २६

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- प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ ३४ — भारतवर्ष की प्राचीन स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए मि ० थानट ( Tharnat ) of extra-" The ancient state of India must have been one ordinary magnificence. " कहते हैं- " २५ — संस्कृत साहित्य के अनन्य उपासक सर्वश्रीमेक्समूलर ( Muxmuller ) जो कि अपने आपको - “ शर्म्मण्य - ( जर्मन ) - देशनिवासी भट्ट मोक्षमूलर शर्मा " इस उपाधि से सम्बोधित करने मे गौरवान्वित समझते हैं ) का नाम कौन नहीं जानता । आपने संस्कृत साहित्य में बड़ा परिश्रम किया है । प्रायः सभी वेदग्रन्थों पर आपने अग्रेजी में हुए आप कुछ न कुछ लिखा है । संस्कृत साहित्य के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते कहते हैं— “ Although there is hardly any department of learning which has not received new light and new life from the ancient us from literature of India, yet no where is the light that comes to India so important, novel, and so rich as in the study of the religion and mythology. २४ - अर्थात् — “ भारत की प्राचीन स्थिति असाधारण रूप से उत्कृष्ट भी " । २५ – अर्थात् - " यद्यपि विद्या का कोई विभाग ऐसा नहीं है, जिस ने भारत के प्राचीन साहित्य से नया प्रकाश और नवीन जीवन प्राप्त न किया हो, तथापि वह प्रकाश जो कि भारतवर्ष से हमारे पास आता है, वह अन्य विषयों में इतना महत्वपूर्ण, नवीन एवं विशाल नहीं है, जितना कि धर्म्म और माइथालॉजी ( Methologi ) - असदाख्यानविज्ञान— ( मिथ्या-कथाओं द्वारा सत्यविज्ञान प्रकट करने वाला ज्ञान ही माइथालाजी है, अवश्य ही ' माइथा ' अभी शब्द " मिथ्या " शब्द का विकृतरूप है ) के अध्ययन में है । ( अर्थात् हमारे पास शेष भारतवर्ष का धर्म्मसम्बन्धी, एवं माइथालॉजी सम्बन्धी ज्ञान ही आपाया है । भारत की ज्ञानविभूति से अभी तक हम वश्चित हैं ) " । ३०

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..। भूमिका ॥ २६— सुप्रसिद्ध साहित्य सेवी स्वनामधन्य प्रॉफेसर मेण्डानल्ड ( Megdanald ) ( जो कि अपने आपको मुग्धानल नाम से सम्बोधित करते हैं ) कहते हैं— “ The intellectual debt of Europe to sanskrit literature has undeniably great. It may perhaps be come greater still in the years that one to come. " २७- काउन्ट जॉन स्टर्जना ( Count John Stirjana ) कहते हैं- “ The litrature of India makes us acquainted with a great nature of past ager, which will always occupy a distinguished place in the history of the civilization of mankind. " २८ - प्रॉफेसर हीरेन ( Heeren ) कहते हैं — “ The literature of sanskrit language incontestally belongs to a highly cultivated people, when we may with great reason consider to have been the most in formed of all the east. It is at the same time scientific and a poetic literature. Hindu literature is one of the richest in prose and poetry. " २६ — अर्थात् — “ संस्कृत साहित्य का यूरोप पर जो बौद्धिक ऋण है, वह बहुत भारी है । शायद भविष्य में यह ऋण और भी और भी अधिक होजाय " । २७ — अर्थात् — “ भारतवर्ष का साहित्य परिचय भूतकाल के एक महाराष्ट्र के साथ हमारा परिचय कराता है, जिस साहित्य ने कि हरएक शाखा का ज्ञान प्राप्त किया था, एवं जो मानव जाति की सभ्यता में सदा के लिए एक महत्वपूर्ण आसन ( प्रतिष्ठा ) पर विराजमान रहेगा " । २८ - अर्थात् - " संस्कृत साहित्य निश्चितरूप से ऊंचे दर्जे के सुसभ्य लोगों का साहित्य है । इन लोगों को हम पूर्वीयदेशों के सब लोगों से अधिक ज्ञानवान् कह सकते हैं । यह साहित्य वैज्ञानिक एवं कवितायुक्त है । हिन्दू साहित्य गद्य और पद्य में ऊंचे से ऊंचे साहित्य में से है " । ३१

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- प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ is the ori-१२ ९ - डा ० वेलेन्टिन ( Ballantyne ) कहते हैं - " Sanskrit ginal source of the Europen languages of the present day. Sanskrit is the mother of all Aryan languages. " ३०- - संस्कृत साहित्य की विशालता का परिचय देते हुए प्रॉफेसर मेगूडानल्ड in quantity ( Magdanald ) कहते हैं — “ That the sanskrit literature exceeds that of Greece and Rome put together. ३१ - इसी सम्बन्ध में प्रो ० मेक्समूलर साहब ( Maxmuler Sahib ) कहते हैं-in existence " The number of sanskrit works of whfch M.S.S. are still than the whole amounts to ten thousands. This is more I believe classical literature of Greece and Italy put together. " यहां तक ३२ - माननीय सर विलियमजोन्स ( Sir William Jones ) तो स्वीकार करते हैं कि " अमरकीर्त्ति न्यूटन ( Newton ) के यश को बिलकुल कम न करते हुए मुझे यह कहना पड़ता है कि न्यूटन द्वारा आविष्कृत सब तत्व हिन्दूतत्व-ज्ञान में मिलते हैं । " २१- अर्थात् — “ वर्तमान की सब युरोपीय भाषाओं का मूल संस्कृत ही है । ..... संस्कृत सब आय्यभाषाओं की माता है " । ३० – अर्थात् — “ संस्कृत साहित्य संख्या में ग्रीस एवं रोम दोनों देशों के संयुक्त साहित्य से भी ज्यादह है " । ३१ — अर्थात्– “ संस्कृत ग्रन्थों की संख्या, जिन की प्रतियां अब तक मिली हैं, शायद लगभग १० हजार हैं । यदि ग्रीस एवं इटली के साहित्य को मिला लिया जावे, तब भी यह इस से ज्यादह निकलेंगी ” । ३२

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भूमिका ३३ — अमेरिका येल विश्वविद्यालय के माननीय प्रेसीडेन्ट डा ० साइल्स ( Syles ) संस्कृत साहित्य का अध्ययन कर इससे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें " आडम " की पुस्तकें भारतवर्ष में उपलब्ध होने की सम्भावना जान पड़ी । इसी सम्भावना से प्रेरित होकर उन्होंने उनकी खोज के लिए सर विलियम जोन्स से प्रार्थना की थी । ३४ - फ्रेञ्च महापुरुष पायरी लॉटे ( Pieree Lati ) ने कॉमिटि फ्रेङ्को हिन्डो ( Comiti Franco Hindow ) नामक संस्था के प्रेसीडेन्ट को भारतमाता के लिए अपने निम्न लिखित परमपूज्य भाव प्रकट किए थे-" हे प्राचीन भारत भूमि! हे सकल तत्वज्ञान एवं कलाकौशल की प्रद्य जननि! मैं तुझे बड़े आदर, बड़े प्रेम, एवं पूज्यभाव से घुटने टेक कर नमस्कार करता हूं " । २३५ - महापुरुष ईसा के ६ हजार वर्ष पहिले एजेकिल ( Ajakil ने कहा था-" And, below the glory of the God of Israel came from the way of 3 the East " ( देखो! इस्राएल के ईश्वर का तेज पूर्व की तरफ से श्राया ) । मीमांसा कीजिए यह पूर्वीय देश कौन सा था? क्या वह भारतवर्ष नहीं था, था और अवश्य था । सुप्रसिद्ध बंगाली इतिहास लेखक पण्डित सत्यचरण शास्त्री महोदय ने " हितवादी " में अपने एक गवेषणापूर्ण निबन्ध से यह सिद्ध किया है कि " ग्राज से तीन हजार वर्ष पूर्व भारत वासियों ने पूर्वीय एवं पश्चिमीय कई राष्ट्रों में धम्र्मोपदेशक भेजकर अपने धर्म्म, तत्वज्ञान, एवं साहित्य का प्रचार किया था, एवं उन्हों ने कई राष्ट्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था " यह तो हुई भारतवर्ष के साहित्य की चर्चा । अब थोड़ी देर के लिए आचार - व्यवहार पर भी ध्यान दीजिए । यद्यपि यह ठीक है कि इस २० वीं शताब्दी का भारत अवश्य ही अपने ३३

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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ इस बात का साक्षी है कि आदर्श से पिछड़ गया है, परन्तु यह किस की कृपा है? इतिहास विद्वानों की कुटिलता ही भारत की इस हीनदशा का एकमात्र कारण उन कुटिल राजनैतिक है । हमारे उन बोध है, जिन का कि एकमात्र उद्देश्य अपनी अर्थलालसा को तृप्त करना थे, बालकों को आज आरम्भ से ही यह सिखलाया जाता है कि - " तुम्हारे पूर्वज असभ्य जंगली थे, लौह, ताम्र, अग्नि, सूर्य आदि जड़ पदार्थों के उपासक थे, विज्ञानशून्य मानवजीवन थे । तुम्हें सर्वप्रथम सत्यता का पाठ हम पढ़ा रहे हैं । हमारे संसर्ग से तुम कोई मौलिक साहित्य नहीं के रहस्य को समझ रहे हो । तुम्हारे पास अपने घर का , साथ ही में कुछ एक भौतिक है " । कहना नहीं होगा कि इस भीषण शिक्षायन्त्र से यन्त्रित अपने मौलिक साहित्य से वश्चित सर्वनाशक आविष्कारों से उपलालित हमारे यह होनहार युवक कृपा से अर्थसमस्या को हल रहते हुए आदर्श को भुलाते जारहे हैं । उन्हीं राजनैतिकों की ही नहीं है कि वह अपनी प्राचीन करने में अहोरात्र त्रस्त भारतवर्ष के पास याज इतना समय का अच्छी तरह स्मरण है, संस्कृति के दर्शन कर सके । हमें अपने बचपन की उन घटनाओं लोग हरे वृक्ष के नीचे खड़े रह कर जो कि भारत की वास्तविकता के बचे खुचे श्रालोक थे ॥ जो करना आदर्श के विरुद्ध मानते थे शपथ खाना पाप समझते थे, परसम्पत्ति का अपहरण बार जो कुछ कह देता था, उसे यथाशक्ति निभाने में वह सदा सतर्क व्यक्ति अपने मुख से एक आदर्श का जो पतन हुआ है, वह रहता था । इन २० वर्षों के भीतर भीतर इस देश के स्टाम्पों का भी कोई मूल्य नहीं । अवश्य ही हमारे सर्वनाश की पूर्वसूचना है । आज लिखित स्वाहा है । एक दूसरे का सर्वस्व असत्यमार्ग को अपनाना आज बुद्धिमानी समझी जारही द्वारा वही । जब तक उक्त महापुरुषों के करना आज का आदर्श बन रहा है । क्यों? उत्तर था, तब तक यह देश अपने श्राविष्कृत उक्त जहरीले गेस का प्रभाव इस देश में न फैला सत्य था? इन प्रश्नों का समाधान आदर्श में कैसा बढ़ा चढ़ा था? इस का व्यवहार कितना बन कर इस सम्बन्ध में अपने सत्य-उन पश्चिमी विद्वानों से पूछिए, जिन्होंने पक्षपात रहित विचार प्रकट किए हैं । ३४

पृष्ठ 138

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- भूमिका ॥ १- सुप्रसिद्ध विद्वान् स्टेवो ( Stabo ) कहते हैं — “ They are so honest as neither to 29 require locks to their doors not writings to bind their agreements २ - एपिक्टेटस ( Apicktatus ) के सुयोग्य शिष्य एरियम ( Arrian ) जो दूसरी सदी में हुए हैं, लिखते हैं- “ No Indian was ever known to till the untruth. ” ३ – सुप्रसिद्ध चीनी यात्री हूयेनसांग लिखते हैं — “ The Indians are distinguished by the straighi forwardness and honesty of their With regard to riches, they never take any thing unjustly character. to justice, they make even excessive can cessions. slod with deom regard! ४ - तेरहवीं शताब्दी में उत्पन्न होने वाले मि ० मार्को पोलो ( Marco Polo ) कहते हैं — " You must know that these Brahmins are the the best best merchants mer in the world and the most truthful, for they would not till anything on earth. " a lie for ५ – सरजॉन माल्कम साहब ( Sir John Malcom Sahib ) लिखते हैं— " Their truth is as remarkable as their " courage. - " वे ( भारतवासी ) बड़े ईमानदार हैं । न तो उन्हें अपने दर्वाजों के तालेलगाने पड़ते हैं, एवं न दस्तावेजों के लिए लेख लिखना पड़ता है " । " कोई हिन्दुस्तानी असत्य बोलता हुआ न जाना गया " । ३ – “ भारतवासी अपनी सरल प्रकृति एवं ईमानदारी के लिए प्रसिद्धहैं । धन के सम्बन्ध में यह बात है कि वे अन्याय से कोई चीज नहीं लेते । न्याय के मामलों मेंवे बहुत रियायत करते हैं " । ४ – “ आप को जानना चाहिए कि ये ब्राह्मण संसार में सब से अच्छेव्यापारी, एवं सब से अधिक सच्चे हैं । वे इस पृथिवी पर की चीज के लिए झूठ नहीं बोलते " । ५ - " उन का सत्यभाषण उतना ही उल्लेखनीय है, जितना कि उन का धैय्ये" । ३५

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२० ॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥७ पूर्ण परिचय ६ – कई वर्षों तक हिन्दू समाज में रहने वाले, उन की सभ्यता से हैं " I have had before रखने वाले कर्नल लिमन ( Colonel Sleeman ) लिखते , liberty and life has me hundreds of cases in which a man's has property refused to tell it. " dedended upon his telling a lie and he “ It was love ७ – प्रॉफेसर मैक्समूलर ( Muxmuller ) साहब लिखते हैं-contact with India, of truth that struck all the peodle who came character in of its in habitants. as the prominent feature in the national . " No one ever accused them of falsehood हैं -- “ The Indians are really 1000-- निबूर साहब ( Neibuhr ) कहते gentle, virtuous, the most tolerent nation in the word. They are the ones who seek to laborious and that, perhaps of all men, they are injure their fellow- being in the least. neml amo and poets of १ -- मि ० कॉलेमन ( Coleman ) कहते हैं-- " The sages ancient or India have inculcated moral precepts and displayee poetic modern date need be ashamed to acknowledge. " , ६ – “ मेरे सामने ऐसे हजारों मामले उपस्थित हुए हैं, जिनमें मनुष्य की जायदाद उन्होंने झूठ बोलने से स्वतन्त्रता एवं जिन्दगी उन के झूठ बोलने पर ही निर्भर थी, परन्तु इन्कार किया " । थी, जिसने उन ७— “ भारतवासियों के राष्ट्रीय चरित्र में सत्यप्रेम एक ऐसी वस्तु । सब लोगों को मोहित कर दिया, जिन से कि भारत का सम्बन्ध हुआ " सभ्य, -- - " हिन्दुस्तान संसार में सब से अधिक सहनशील राष्ट्र है । वे हिन्दुस्तानी एक ऐसे हैं, जो अपने प्रामाणिक एवं परिश्रमी हैं । एवं समग्र संसार के मनुष्यों में वे ही जीवधारी बन्धुओं को कभी कष्ट नहीं पहुंचाते " । --का सौन्दर्य १- " भारतवासियों ने जो नैतिक श्राज्ञाएं जारी कीं हैं, तथा जैसा काव्य राष्ट्र को न शर्माना प्रकट किया है, उसे स्वीकार करने में किसी भी आधुनिक अथवा प्राचीन चाहिए " । ३६

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० ॥ भूमिका ॥ www १० - - स्यामदेश का चीनी राजदूत खान थाई ( Khan Thai ) कहता है कि स्याम के राजा का सुवी ( Suwe ) नामक रिश्तेदार जो ईसवी सन् १२३१ में भारत यात्रा करने थाया था, उसने भारत से लौटने पर राजा से रिपोर्ट की थी कि “ The Indians are straight forward and honest. ११ - - फायर जोडिन्स ( Fire Zodens ) कहते हैं -- “ That is people of India are true in speech and eminent in justice. " " १२ – चीन सम्राट याँगटी ( Yangti ) के राजदूत फीकू ( Feitu ) जो कि ईसवी सन् ६०५ में भारतवर्ष में आये थे, लिखते हैं कि - हिन्दुलोग अपनी पवित्र सौगन्द पर विश्वास करते हैं " । १३ – इडरीसी ( IIrisi ) अपने भूगोल में जो कि ११ वीं शताब्दी में लिखा गया है, लिखते हैं— “ The Indians are naturally inclined to justice and never depart from in it their actions. Their good faith, honesty and fidelity are well - know, and the are so famous for these qualities that people flock to their country from every side. " १४ - सुप्रसिद्ध ग्रीक निवासी मेगेस्थेनिस ( Megasthanese ) कहते हैं कि-" भारतवासियों में दासत्व का अभाव था । यहां स्त्रियों का सतीत्व अलौकिक था । लोगों में अचल धैर्य था । बीरता में सब एशियावासियों में यह बढ़े चढ़े थे । बे बड़े १०— “ भारतवासी सरलप्रकृति, एवं ईमानदार हैं " । ११ - " भारतवासी जुबान के सच्चे, एवं न्याय के लिए प्रसिद्ध हैं " । १३ – “ भारतवासियों का स्वाभाविक झुकाव न्याय की ओर है 1 । वे अपने कार्यों में कभी न्याय को नहीं छोड़ते । उन की सुश्रद्धा, प्रामाणिकता, एवं कर्त्तव्यपरायणता सुप्रसिद्ध है । इन सद्गुणों के लिए वे इतने प्रख्यात हैं कि हरएक प्रान्त से झुण्ड के झुण्ड लोग ( आदर्श सीखने के लिए ) उन के देश ( भारतवर्ष ) में आते हैं " । ३७