Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 141–150

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 141–150

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प्रारम्भिक वक्तव्य । गम्भीर शान्त एवं बड़े परिश्रमी थे । अच्छे कारीगर थे । वे शायद ही कोई मुकदमा दायर करते थे । अपने देशी राजाओं के नीचे वे शान्तिपूर्वक रहते थे " । ) लिखते हैं— १५ – सर मॉनियर विलियम्स ( Sir Maniyar Williams " हिन्दू लोग किसी प्राणी का वध करना अच्छा नहीं समझते ” । प्रभा-१६ - सर जॉन माल्कम ( Sir John Malcom ) हिन्दुओं के आदर्श से वित होकर कहते हैं — “ सत्यप्रियता, एवं विश्वासपात्रता में संसार की कोई जाति हिन्दुओं की बराबरी नहीं कर सकती " । १७ – भारतवर्ष के गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंगस ( Lard Hastings ) कहते हैं-" The Hindus are gentle, benevalent, more susceptible of gratitude for kindness shown to them than prompted to vengeance for wrongs inflicted, and as exempt from the worst propensities are of faithfnl human passion , affecas, any people upon the face os the earth. They comm ttee of both tionate, etc. ” Miuutes of evidence before the honses of parliament March 8th 1813. १७ – अर्थात् – “ हिन्दू लोग विनम्रस्त्रभाव वाले, दानशील, एवं अपने उपकारक के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ होते हैं । साथ हो में इनके साथ यदि कोई अनुचित एवं अन्यायपूर्ण व्यव-हार कर लेता है तो ( अपनी स्वाभाविक उदारता के कारण ) यह उसे बदला लेने की भावना नहीं रखते । वे ( हिन्दू ) काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्सर्य, अभिमान आदि दुर्गणों से सर्वथा अलग रहते हैं । विश्व में उक्त गुणों में जो जाति सर्वोच्च होसकती है, उसके साथ इस हिन्दू-जाति की तुलना की जासकती है । वे भक्त ( वफ़ादार कृतज्ञ ), मनुष्य से प्रेम करने वाले होते हैं । ( पार्लियामेंट, दोनों हाउसेज ( कॉमन्स एवं लाईस ) की कमेटी के सामने, ता ० ८ मार्च-१-१३ ) ” । ३८

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२०१७ || भूमिका १८ - विशेष हेबर साहब ( Bishop Habour Sahib ) लिखते हैं कि - " जो लोग हिन्दुओं के साथ रहे हैं, वे यह कदापि नहीं कह सकते कि सभ्य मनुष्यों में होने वाले किसी आवश्यक सद्गुण से हिन्दू विहीन हैं " । आगे जाकर फिर यही महानुभाव कहते हैं — “ I have found in India & race of gentle and temperate habits, with a natural talent and acuteness beyond the ordinary level of mankind. " SIBE A FAR " १८ — प्रो ० मॉनियर त्रिलियम ( Pro. Mahiyor William ) कहते हैं — . " I have found no people in Europe more religious than the Hindoos " अग २० - एक पाश्चात्य विद्वान् कहता है — “ We are told by Greeian writers that the Indians were the wisest of nations " २१ - अकबर के दरबार के नवरत्नों में से प्रसिद्ध इतिहास लेखक सर्वश्री अबुल -फज़ल कहते हैं — “ हिन्दु धार्मिक, नम्र, दूसरों के प्रति दया दिखाने वाले, न्याय-प्रेमी, कार्यकुशल, कृतज्ञ, सत्यप्रेमी, एवं व्यवहार के सच्चे हैं " । २२ – तेरहवीं सदी में शम्सुद्दीन अब्दुल्ला महोदय ने हिन्दुओं के सम्बन्ध में एक महान् मुसलमान का मत उद्धृत किया है । उसका सारांश यह है कि – “ बालू रेत के कणों की तरंह हिन्दुलोग संख्या में असंख्य हैं । वे धोखेबाजी, एवं अत्याचारों से सर्वथा मुक्त हैं, वे जीवनमरण से नहीं डरते " । १८ – अर्थात् – “ भारतवर्ष में मुझे सुसभ्यता, सुशीलता, सदाचारभावों की प्रधान-ता रखने वाली ऐसी जातिएं मिलीं हैं, जो कि मनुष्यजाति के साधारण धरातल से कहीं अधिक चतुर एवं उन्नत हैं " । १ ९ - " मैने हिन्दुओं से अधिक धर्मात्मा मनुष्य यूरोप में नहीं देखे " । २०- " हमें ग्रीस के लेखक कहते हैं कि हिन्दूलोग सब राष्ट्रों के लोगों से अधिक बुद्धिमान् हैं " । • ३६

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" प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ विदित होगया होगा कि पूर्व प्रदर्शित निदर्शनों से विज्ञ पाठकों को यह भलीभांति हमने केवल पूजन की सामग्री समझ जिस भारतीय साहित्य को, विशेषतः वैदिक साहित्य को वैज्ञा-हमने सर्वात्मना महत्व दे रक्खा है, उसी रक्खी है, जिस के पारायणरूप पुण्यपाठ को ही हैं, नए आविष्कार करते जा रहे निक साहित्य के आधार पर पश्चिमी विद्वान् दिन दिन नए उड़ा करते हुए सर्वत्र अपनी विजयपताका एवं उन के प्रभाव से संसार में अपना प्रभुत्व स्थापित है । प्रसङ्गोपात्त प्रकृत में उसे उद्धृत रहे हैं । इसी सम्बन्ध में हमें एक घटना का स्मरण होता कर देना अनुचित न होगा । भूतपूर्व महाराज ग्जालियर अपने किंवदन्ती के आधार पर यह सुना गया है कि- " पधारे । इन के साथ एक संस्कृतज्ञ भृत्यवर्ग के साथ एक बार पश्चिमी देशों की यात्रा करने ओर उक्त महाराज जर्मन पधारे । ओर मद्रासी विद्वान् भी थे । अन्यान्यदेशों भ्रमण करते हुए । " केसर लायब्रेरी " भी देखी द्रष्टव्य वस्तुओं के साथ साथ महाराज ने वहां की सुप्रसिद्ध । महाराज को यह देख कर लायब्रेरियन सुव्यस्थित तत्तत् पुस्तकों को दिखलाता जाता था । की अपेक्षा अधिक संख्या में सुरक्षित हैं आश्चर्य हुआ कि वहां संस्कृत साहित्य के ग्रन्थ भारत पर पड़ी । इन्होंने इसे खुलवा-अस्तु देखते देखते इन की दृष्टि सहसा एक सुवर्णमण्डित मञ्जूषा - “ क्षमा कीजिए! की । लायब्रेरियन से उत्तर मिला कर इसमें रक्खी पुस्तक देखने की इच्छा प्रकट " । के कारण मैं इसे नहीं खोल सकता हमारी पार्लियामेन्ट के एक विशेष नियम के नियन्त्रण दिया कि सम्बन्ध में केवल इतना सा कह महाराज की अधिक जिज्ञासा देख कर इसने इस की से लाई गई किसी वेद " इसमें बड़े उद्योग से अतुलद्रव्य खर्च कर के भारतवर्ष के बङ्गले पर वापस लौट कर सीधे प्रेसीडेण्ट शाखा है " । महाराज ने आगे कुछ न कहा ।: महाराज के लिए पुस्तकालयाध्यक्ष को पहुंचे, एवं वहां अपनी उक्त जिज्ञासा प्रकट की । फलत ठीक हमारे जैसे ॥ भारतीय पण्डित साथ थे, परन्तु उक्त पुस्तक दिखलाने की आज्ञा मिल गई का उक्त पुस्तक के अक्षरों कों पहिचानने उन्होंने महाराज के आदेश से ताड़पत्र पर लिखित के लिए उन परन्तु वेदमनभिज्ञ इन पण्डितर्जी प्रयास किया, कुछ अंश के फोटू भी लिए । ४०

पृष्ठ 144

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॥ भूमिका ॥ पङ्क्तियों को श्रज्ञातदशा में ही रह जाना पड़ा । बाद में वहीं किसी व्यक्ति विशेष से विदित हुआ कि उक्त पुस्तक में फ़ौलाद ढालने की विधि है । " हा हतभाग्य भारत! क्या तेरी इस मौलिक सम्पति से तेरी सन्तान भी कभी लाभ उठावेगी? पश्चिमी विद्वानों के वैदिक साहित्यप्रेम की एक और प्रामाणिक घटना का हाल सुनिए । लेखक के गुरुवर श्रीमधुसूदनजी श्रोझा विद्यावाचस्पति स्वर्गीय जयपुरेन्द्र श्री-माधवसिंहजी महाराज के साथ श्रीसम्राट्महोदय की ताजपोशी के अवसर पर इंग्लैण्ड पधारे थे । आप के वैदिकविज्ञान सम्बन्धी धारावाहिक व्याख्यानों से वहां के विद्वान् बड़े ही चमत्-कृत हुए थे । वहां की घटनाओं को सुनाते हुए गुरुवर ने एक बार कहा था कि हमें न्याय-शास्त्र के उद्भट विद्वान्, एवं विशुद्ध संस्कृत में धारावाहिक बोलने वाले टामस ( Thomas ) साहब के साथ किसी समय वैदिकपुस्तक प्रकाशनविभाग देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उस समय मानवश्रौतसूत्र ( जो कि भारतवर्ष में अप्राप्त है ) वा प्रकाशन हो रहा था । यह देख कर हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि अनेक भद्र महिलाएं स्थिर एवं शान्तभाव संशोधन से बड़ी सतर्कता के साथ उक्त ग्रन्थ कर र रही हैं । इधर हमारे देश की यह दशा है कि वैदिक ग्रन्थों के नाम से भी हम परिचित नहीं हैं । बम्बई यात्रा के अवसर पर एक ब्राह्मणश्रेष्ठ ने व्याख्यानों में शतपथब्राह्मण नाम के - उल्लेख से हम से यह प्रश्न किया था कि यह ब्राह्मण जाति कहां रहती है? अधिक खेद का विषय तो यह है कि इस देश के प्रसिद्ध विद्वान् भी केवल पौरुषेय- अपौरुषेय के झगड़े में ही वेद की इतिकर्तव्यता समाप्त समझ लेते हैं । कितने ही विद्वानों के श्रीमुख से तो यह भी सुना गया है कि वेद का भी क्या कभी अर्थ होता है? कभी नहीं । इस ईश्वर की वाणी के तो पारायणमात्र से ही हमारा कल्याण है । शिव! शिव!! कितनी अविद्या! कैसा पतन!! विचित्र विडम्बना!!! ४१

पृष्ठ 145

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20 प्रारम्भिक वक्तव्य -पाश्चात्य विद्वानों के उद्धरण उद्धृत नवीन शिक्षादीक्षित भारतीयों के सन्तोष के लिए विद्वानों के से प्राय: सर्वथा पराङ्मुख भारतीय किए गए । अब संस्कृतज्ञ, किन्तु वैदिक साहित्य भी हम अपना आवश्यक कर्त्तव्य सम-परितोष के लिए कुछ एक वैज्ञानिक निदर्शन बतलाना को ही वस्तु नहीं कि वेदशास्त्र केवल पारायण झते हैं । इन निदर्शनों से उन्हें यह विदित होगा कुछ कर उसे यथावत् जानलें तो सब है, अपितु उस में सब कुछ निहित है । यदि हम सकते हैं । विद्वत्समाज के कर्णकुहरों में जब वैज्ञानिक तत्ववाद को कई शताब्दियों से भूले हुए न केवल चौकन्ने सहसा चौकन्ने होजाते हैं । हमारा " विज्ञान " शब्द प्रविष्ट होता है तो वे वाले अपने कल्पित तेज से छिन्न भिन्न होने ही होजाते, अपितु इस विज्ञानसूर्य के प्रखर पण्डित महानुभाव प्रयास में व्यस्त यह संत्रस्त गन्धर्वनगररूप तम की रक्षा के व्यर्थ के विज्ञान न्याय का आश्रय लेते हुए " " अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते " श्रद्धा इस नष्ट होजाती है । यह विज्ञानवाद वाद तो नास्तिकों का मत है । विज्ञान से कि उन के इन करते हैं । कहना नहीं होगा अशास्त्रीय है ", अपने यह उद्गार प्रकट किया नहीं है । उन्हें शायद यह भ्रम होया है कि व्यर्थ के उद्गारों का शास्त्रीय दृष्टि से कोई मूल्य का निरूपण करते हैं । अथवा विज्ञान से हम नास्तिकों द्वारा अभिमत क्षणिकविज्ञानवाद वेदों के बहाने भारतवर्ष हो सकता है कि कुछ समय पूर्व उन के भ्रम का दूसरा कारण यह भी हुआ है । उस अनधिकारी विज्ञानवाद का प्रचार के ही एक व्यक्तिविशेष द्वारा उक्त क्षणिक फोनोग्राफ ( Pho-टेलीग्राफी ( Wireless ), ने वेदों में तार ( Telegraph ), वायरलेस का महत्व समझते हुए नित्य-सिद्ध करने में ही वेद nograph ) आदि आविष्कारों की सत्ता को अवैदिक बतलाते , श्राद्धकर्म्म आदि विषयों सिद्ध देवतावाद, अवतारवाद, प्रतिमापूजन चेष्टा की है । " संम्भव है हम भी विज्ञान हुए क्रियात्मक सनातनधर्म के उपहास की विफल बतलाने के लिए ही यह प्रयास के बहाने सनातनधर्म के उक्त सिद्धान्तों को कारण अवैदिक है । इस सम्बन्ध में अपने व्यक्तित्व का कर रहे हों " यही उन के भ्रम का दूसरा ४२

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भूमिका स्पष्टीकरण करते हुए हम उन विद्वानों की सेवा में करबद्ध यह निवेदन कर देना चाहते हैं कि न तो हमारा उद्देश्य वेदों में तार टेलीफोन ही सिद्ध करना है । न हम क्षणिक विज्ञानवादी हैं, एवं न हम सनातनधर्म्म के सिद्धान्तों का खण्डन करने के लिए ही आगे बढ़े हैं । श्रुति-स्मृति पुराण - निबन्ध - तत्र आदि ग्रन्थ हमारे लिए सर्वथा प्रमाण हैं । “ नित्यं विज्ञानमान-न्दं ब्रह्म ” “ विज्ञानादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते " " स एष भ्रात्मा विज्ञानघनः ” “ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः " इत्यादि श्रौतस्मार्त्त स्थलों में जिस अभिप्राय से विज्ञानशब्द प्रयुक्त हुआ है, हमारे विज्ञान शब्द का वही तात्पर्य है । " सनातनधर्म के प्रत्येक सिद्धान्त की शास्त्रीय प्रमाणों द्वारा मौलिक उपपत्ति बतलाना " ही हमारे प्रयास का चरम लक्ष्य है । प्रभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए थोड़ी देर के लिए यह मान लीजिए कि हमारा यह वैज्ञानिक साहित्य सर्वथा कल्पित है । यदि ऐसे कल्पित साहित्य से भारतवर्ष में सनातनधर्म्म के सिद्धान्तों पर से उखड़ी हुई श्रद्धा पुनः प्रतिष्ठित होजाती है, दूसरे शब्दों में हमारे इस कल्पित शब्दाडम्बर से प्रभावित होकर जनता आप के धार्मिक सिद्धान्तों की सत्य ता पर पूर्ण विश्वास करती हुई उन के अनुष्ठान में प्रवृत्त होजाती है तो भगवान् भर्तृहरि के निम्न लिखित सिद्धान्त के अनुसार आप इस साहित्य का उपहास करने का कोई अधिकार नहीं रख सकते— क उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः । असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ ( वाक्यपदी " मीमांसाशास्त्र सम्मत विषय की पूर्ण सङ्गति, प्रत्येक विषय की सिद्धि के लिए शास्त्रीय प्रमाणों का श्राश्रय, शास्त्रसिद्ध युक्तिवाद, एवं तर्कवाद द्वारा विषय की स्थापना, फलांश में जनता की आर्यसंस्कृति की ओर प्रवृत्ति, सनातनधर्म्य के प्रत्येक सिद्धान्त की पूर्ण पुष्टि " इन सब बातों के रहते हुए भी यदि अज्ञानतावश किन्हीं आंख वालों को यह साहित्य नास्तिकता फैलाने वाला ही प्रतीत होता है तो उन की चिकित्सा

पृष्ठ 147

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॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ ” जिस ईश्वर स्वयं धन्वन्तरि भी नहीं कर सकते - " सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः समष्टिरूप बुद्धियोगनिष्ठा प्रजापति के हम ( मनुष्य ) अंश हैं, उस के साथ कम्र्म्म - ज्ञानयोग की पुरुषार्थ है । अपनी पुरुषार्थसिद्धि द्वारा अविच्छिन्न सम्बन्ध स्थापित कर लेना ही हमारा परम , पहिले उस का यथार्थस्वरूप के लिए जिस विश्वेश्वर का आश्रय लेना आवश्यक हो जाता है कोटि प्रविष्ट है । 64 उस विश्वेश्वर का यथार्थ स्वरूप जान लेना भी आवश्यक को सफल बतलाते हुए, उस की प्राप्ति का उपाय बतला कर जीवात्मा के चरम लक्ष्य के प्रतिपाद्य विषय है । विश्वेश्वर बनादेना " बस भारतीय वैदिक साहित्य का यही प्रधान दो तत्व विज्ञातव्य हैं । त्रिशुद्ध स्वरूपज्ञान के सम्बन्ध में प्रधानरूप से विश्व एवं ईश्वर यहहुआ विश्वोत्पत्ति का बनता आत्मतत्व ही महामाया के सम्बन्ध से सोपाधिक बनता ही बन सकता है । विशुद्ध है । विश्व में रहने वाले पुरुष का उपास्य सोपाधिक विश्वात्मा में हमारे सामने दो प्रश्न आत्मा का शास्त्रमर्य्यादा से कोई सम्बन्ध नहीं है । अब इस सम्बन्ध हुआ कैसे विश्वरूप में रह जाते हैं 1 । वह व्यापक आत्मा माया बल से सीमित बनता कैसे पुनः विशुद्ध परिणत होगया? यही पहिला प्रश्न है । संहारकाल में यह विश्व है । दूसरे शब्दों में आत्मा विश्व आत्मभ्वरूप में परिणत हो जायगा? यही दूसरा प्रश्न ? यही प्रश्न हमारी जिज्ञासा को कैसे बन गया, विश्व आत्मरूप में कैसे परिणत हो गया ने संचर एवं प्रतिसंचर नाम बलवती बनाते हैं । इन्हीं दोनों प्रश्नों के समाधान के लिए ऋषियों ? इस प्रश्न का समाधान करने के दो पक्षों का समर्थन किया है । आत्मा विश्व कैसे बनगया , व्यक्ति आदि अनेक नामों से वाली विद्या संचरविद्या है । इसी को सर्ग, सृष्टि, उत्पत्ति जायगा? इस प्रश्न का समाधान व्यवहृत किया गया है । विश्व कैसे आत्मरूप में परिणत हो , अव्यक्तभाव श्यादि विविध-करने वाली विद्या प्रतिसंचरविद्या है । यही प्रतिसर्ग, विनाश कर नानात्व का विधान करती है, नाम से व्यवहृत हुई है । संचरविद्या एकत्र को उद्देश्य मान " विधान करती है । " ब्रह्मवेदं सर्वम् प्रतिसंचरविद्या नानात्व को उद्देश्य मान कर एकत्त्व का सर्वरूप ब्रह्म को उदेश्य बतलाती हुई यह श्रुति " ब्रह्म ही सब कुछ है " इत्यादि रूप से एक

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भूमिका ॥ ( नानारूप ) विश्व का विधान करती हुई संचरविद्या का स्पष्टीकरण कर रही है । एवं " ' सर्व खल्विदं ब्रह्म ” इत्यादि श्रुति " यह सब कुछ ( दृश्यमान प्रपञ्चरूप विश्व ) ब्रह्म है " इत्यादि रूप से सर्वरूप विश्व को उद्देश्य कोटि में रख कर इस के स्थान में एकत्व मूलक ब्रह्म का विधान करती हुई प्रतिसंचर विद्या का स्पष्टीकरण कर रही है । इसी प्रकार 966 प्रजा-पतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च " ( शत ० ब्रा ० ११/२/३ ) - २५ एकं वा इदं विबभूव सर्वम् ” ( ऋक् सं ० ६ ४।२ ९ ) - " तमेकं सन्तं विना बहुधा वदन्नि ” ( ऋक्, सं ० ११-१६४/४६ ) - - ४७ ५ पुरुष एवेदं सर्वम् " ( यजुः सं ० ३१ | २ | ) - * “ श्रात्मैवेदं सर्वम् ” 266 ( छा ० उप ० ७।२३।२ । ) — " श्रात्मा उ एकः सन्नेतत् त्रयम् " ( शत ० १४।१।१ ) -66' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः " ( तै ० उप ०२।१ । ), " त्रीणि ज्योतीर्षि १ – “ प्रजापति ही यह सब कुछ है, जो कि ( नानारूप से ) प्रत्यक्ष दिखलाई दे रहा है । २—०' एक ( ब्रह्म ) ही यह सब कुछ बना हुआ है " । ३ – “ उसे एकरूप होते हुए ( भी संचरपक्षानुसार ) विद्वान् लोग श्रग्नि - यम- मातरिश्वा यदि नानारूप से व्यवहृत करते हैं " । ' पुरुष ( श्रव्यय - अक्षर तर पुरुष की समष्टिरूप षोड़शी पुरुष ) ही यह सब कुछ ( बन रहा है " । ५- " चात्मा ही यह सब कुछ ( बन रहा ) है " । ६ - " आत्मा ही ( आरम्भ में एकरूप रहता हुआ विश्वदशा में ) नाम - रूप - कर्म भेद से तीन स्वरुपों में परिणत हो रहा है " । ७— “ उस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी ( मिट्टी ), पृथिवी से श्रोषधि ( अन्न ), ओषधि से रेत ( शुक्र ), रेत की आहुति से पुरुष उत्पन्न हुआ है " । = - " वह षोडशी पुरुष ( अपने से उत्पन्न विश्व के साथ ) सूर्य्य, चन्द्र, अग्नि अपनी इन भूतज्यो-तियों से, किंवा ज्ञानमय अव्यय, क्रियामय अक्षर, अर्थमय दर, इन तीन आत्मज्योतियों से युक्त होरहा है " । ४५

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प्रारम्भिक वक्तव्य वा इदं सर्वम् ” ( शत ० १३ / -सचते स षोडशी " ( यजु ० सं ० ८३६ ) - ' षोडशकलं सर्वं प्रवर्त्तते " ( गीता ० 1. ) - 19669 २।२।१३ ) – १. “ अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः 9266 " ग्रहमा-) - १२ " मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते विश्व मध्यं च भूतानामन्त एव च " ( गीता ० १०।२० धनंजय ( गीता०-परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति सचराचरम् ” ( गीता ० ६ १० ) - १३ मत्तः में परिणत आत्मप्रजापति ही विश्वरूप ७ । ७ ) इत्यादि श्रुति - स्मृतिएं " ब्रह्म ही, किंवा का प्रतिपादन कर रहीं हैं । हुआ है " इस सिद्धान्त का समर्थन करती हुईं संचरविद्या १२ ११४ ) - “ २ सर्व ह्ययमात्मा " इसी प्रकार " " सर्वमुह्येवेदं प्रजापतिः ” ( शत ० ब्रा ० इद-०७।५।१।२७१ ) - " ४ प्रजापतिर्वा ( शत ०४।२।२।१२ । ) - 3 इमे लोकाः प्रजापतिः ” ( शत ०२ | २ | ७ | १ | ) नाम वै प्रजापतिः " ( शत मग्र एक एवास " ( शत ० २२ | ४ | ११ ) - " " रूपं वै १६ , एककल किंवा निष्कल परात्पर इन 8- " ( पञ्च कल अव्यय, पञ्चकलअक्षर, पञ्चकलचर से उभयथा विश्व व्यष्टि एवं समष्टि रूप कलाओं से युक्त षोडशी प्रजापति से उत्पन्न ) यह सम्पूर्ण षेाडशकल है ” । हूं । मुझ से ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है " । १०- " मैं ( अव्यय पुरुष ) सम्पूर्ण विश्व का उत्पत्तिस्थान ११ - " मैं भूतों का आदि, मध्य, एवं अन्त हूं " । चराचर विश्व का निम्माण करती है " । १२ – “ मेरी अध्यक्षता में प्रकृति ( अक्षर ) ही अन्य कुछ नहीं है, अर्थात् मैं ही सब कुछ १३ – “ हे धनंजय! ( इस विश्व में ) मुझ से अतिरिक्त बन रहा हूं " । गत्वा ) प्रजापति ही है " । १ - " यह सब कुछ ( दृश्यमान विश्व अन्ततो ही है " । २ - " यह सब कुछ ( प्रलयदशा में ) आत्मा है " । ३– “ यह सातों लोक ( प्रतिसर्गदशा में ) प्रजापति समय प्रजापति ही एकरूप से विद्यमान था " । ४ – “ जब यह नानाभावरूप विश्व नहीं था तो उस में ) प्रजापति ही है " । ५ — “ रूप एवं नामात्मक यह प्रपञ्च ( प्रतिसञ्चरदशा ४६

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66६, || भूमिका | " एक उ वै प्रजापतिः ” ( कौ ० २६७ ) - " त्रयं सदेकमयमात्मा ” ( शत ० १४।५।१ । ) --10 " अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना " ( गीता ० २२२८ ) - “ रात्र्यागमे मलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ” ( गीता ०८।१८ ) इत्यादि श्रुति स्मृति वचन " सम्पूर्ण विश्व अन्ततो. गत्वा ब्रह्मरूप में ही परिणत हो जाता है " इस सिद्धान्त का समर्थन करते हुए प्रतिसंचर-विद्या ही बतला रहे हैं । पूर्वोक्त निदर्शनों से कहना हमें यही है कि विद्याशास्त्र १ ग्रात्मविद्या, रविश्वविद्या भेद से दो भागों में विभक्त है । दोनों की समष्टि ही सर्वविद्या है । हमारा वेदशास्त्र ही इस सर्वविद्या की मूलप्रतिष्ठा है । वेदशास्त्र में प्रधान रूप से उक्त दो विद्याओं का ही निरूपण हुआ है । प्रजापतिविद्या, उद्गीथविद्या, प्रणवविद्या, सामविद्या, परिमरविद्या, संवर्गविद्या प्रवर्ग्यविद्या, महदुक्थविद्या, महाव्रतविद्या, देवविद्या, भूतविद्या, संवत्सरविद्या, पृष्ठ -विद्या, अभिप्लवविद्या, परिप्लवविद्या, वषट्कारविद्या, मन्त्रविद्या, तन्त्रविद्या, त्राटक, यामल, डामर, ज्यौतिष, छन्द, आयुर्वेद, व्याकरण, निरुक्त, शिक्षा, कल्प, योग आदि आदि अवान्तर सब खण्डविद्याओं का मूलस्तम्भ एकमात्र वेदशास्त्र ही है । इन सब खण्ड विद्याओं का उक्त आत्मविद्या एवं विश्वविद्या इन दो विद्याओं में हीं अन्तर्भाव है । इन दोनों में आत्मविद्या मौलिकविद्या है, विश्वविद्या यौगिकविद्या है । मौलिकतत्व को विज्ञानभाषा में ६– “ ( विश्वाभावकाल में ) प्रजापति ही एक ( रूप से विद्यमान ) है " । ७- प्रतिसञ्चरदशा में नाम रूप- कर्ममयी तीनों विश्वकलाएं एक आत्मस्वरूप में हीं परिणत हो जातीं हैं ” । ८ - " सम्पूर्ण विश्व अन्त में अव्यय में ही लीन हो जाता है " । ६ - " रात्र्यागमरूप प्रलय काल में यह सारा प्रपञ्च उस अव्यक्त नाम की प्रकृति में ही लीन हो जाता है '? । * इस विषय का विशद विवेचन " वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्वम् " नाम के गद्यग्रन्थ ( संस्कृतभाषामय ) में देखना चाहिए । यह ग्रन्थ अभी प्रकाशित है । ४७