Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 151–160

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 151–160

पृष्ठ 151

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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ " ब्रह्म " कहा जाता है, अतएव तत्प्रतिपादिका आत्मविद्या को हम " ब्रह्मविद्या " कह सकते हैं । यौगिकतत्व को " यज्ञ " कहा जाता है । फलतः तत्प्रतिपादिका विश्वविद्या को " यज्ञ-विद्या " कहना मन्वर्थ बन जाता है । सृष्टिदशा में ब्रह्म ही यज्ञरूप में परिणत होता है, प्रलय-दशा में वही यज्ञ ब्रह्मरूप में परिणत होजाता है । ब्रह्म के आधार पर यज्ञ प्रवृत्त होता है, यज्ञ को लक्ष्य बना कर ब्रह्मप्राप्ति होती है । ब्रह्मदशा में एकत्व प्रधान है, यज्ञदशा में नानात्व प्रधान है । यही सुप्रसिद्ध ज्ञान एवं विज्ञान तत्व हैं । ब्रह्म से यज्ञ की ओर आना, आत्मा से विश्व की ओर आना, एकत्व से अनेकत्व की ओर आना, अमृत से मृत्यु की घोर थाना विज्ञान है । यज्ञ से ब्रह्म की ओर जाना, विश्व से आत्मा की ओर जाना, अनेकत्त्व से एकत्त्व की ओर भी जाना, मृत्यु से अमृत की ओर जाना ज्ञान है । दोनों दोनों के उपकारक हैं । केवल ज्ञान निरर्थक है, केवल विज्ञान भी क्षणिकविज्ञानकोटि में प्रविष्ट होता हुआ नाश का ही कारण है । ज्ञान - विज्ञान का समन्वितरूप ही अभ्युदय एवं निःश्रेयस का साधक है । दोनों के सम्यक परिज्ञान ही ज्ञान - विज्ञानमूर्त्ति ( सदसत् श्रमृतमृत्यु - आत्मविश्व - ब्रह्मकर्म्म श्रनिरुक्तनिरूक्तमूर्त्ति ) विश्वेश्वर का सम्यक् परिज्ञान होता है । यही योगमायावच्छिन्न पुरुष का परम पुरुषार्थ है । दोनों के परिज्ञान के अनन्तर कुछ भी शेष नहीं रह जाता, जैसा कि ज्ञान - विज्ञानाचार्य भगवान् कृष्ण कहते हैं – ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ ( गीता ७।२ ) । ज्ञानप्रधान आत्मविद्याशास्त्र ही दर्शनशास्त्र है, एवं विज्ञानप्रधान विश्वविद्याशास्त्र ही यज्ञशास्त्र है । दोनों का नित्य सम्बन्ध है । यही दोनों शास्त्र पश्चिमी विद्वानों में फिलॉसफी ( Philosophy दर्शन ), एवं सायन्स ( Scinnce विज्ञान ) नाम से प्रसिद्ध हैं । ब्रह्म नाम का मौलिकतत्वविभाग ही वहां फिजिक्स ( Physics ) नाम से, एवं यज्ञ नाम का यौगिकतत्व-विभाग ही केमेस्ट्री ( Chemistry ) नाम से व्यवहृत हुआ है । हो क्या रहा है । पश्चिमी ४८

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-- भूमिका । ॐ विद्वान् जहां केवल यज्ञविद्यात्मक विज्ञान ( Material Science ) का आश्रय लेते हुए क्षण-स्थायी लौकिक वैभव से युक्त होते हुए शाश्वत शान्तानन्द से वञ्चित रहते हुए प्रतिक्षण नाश की ओर जा रहे हैं, वहां भारतीय विद्वान् ब्रह्मविद्यात्मक केवल ज्ञान का डिण्डिमघोष करते हुए, " कलौ वेदान्तिनः सर्वे " इस न्याय को सर्वात्मना चरितार्थ करते हुए, ऐहलौकि वैभव मुलक विज्ञानशास्त्र ( यज्ञविद्या ) का सर्वथा तिस्कार करते हुए, फलतः दरिद्रता के अनन्य उपासक बनते हुए सब ओर से पथभ्रष्ट हो रहे हैं । होना क्या चाहिए? " अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन " इत्यादि प्रदेशों को शिरोधार्य कर हमें उस नित्य विज्ञान का आश्रय लेना चाहिए, जिस के मूल में शाश्वत ज्ञानधारा प्रवाहित हो रही है । उस ज्ञान की उपासना करनी चाहिए, जिस के आधार पर ऐहलौकिक अभ्युदय का साधनभूत यज्ञरूप विज्ञान प्रतिष्ठित हो रहा है । यही तो वेदशास्त्र का सर्वोच्च महत्व है, यही तो भारतवर्ष का जगदगुरुत्व है, यही तो संस्कृति का सर्वमूर्धन्यत्व है । जैसा कि ऊपर कहा गया है, यज्ञविद्या ही हमारा विज्ञानशास्त्र है । इस यज्ञविज्ञान का, एवं तदन्तर्गत अनन्त खण्ड विज्ञानों का दिग्दर्शन प्रकृत में नहीं कराया जासकता । इन सब के लिए तो वेद का स्वाध्याय ही आवश्यक है । यहां दो चार ऐसे प्रमाण उद्धृत कर दिए जाते हैं, जिन से हमारे भारतीय विद्वानों को यह विदित होजाय कि वेदशास्त्र ज्ञान के साथ साथ विज्ञान का भी अमूल्य एवं पूर्ण कोश है । १ – यज्ञः वेदि के समीप कुण्ड बना कर उस में अग्नि प्रतिष्ठित कर स्वाहा पूर्वक घृत तिलादि की आहुति देने मात्र को ही यज्ञ समझने वाले विद्वानों को यह नहीं भुला देना चाहिए कि यज्ञ एक ऐसा श्रेष्ठतम कर्म है, जिस के आधार पर नवीन विश्व का निर्माण किया जासकता है । मौलिकतत्वों के रासायनिक संयोग से उत्पन्न यौगिकभाव ही यज्ञ है । “ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ० " इत्यादि स्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार यज्ञ से ही सारे लोक, लोकों में रहने वाली प्रजा, सब कुछ ४६

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.03 प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ नियम का ही नाम यज्ञ है । प्राकृतिक उत्पन्न हुए हैं । सृष्टिनिर्माण करने वाले प्राकृतिक नित्य में समर्थ हैं । यज्ञ हमारे लिए इष्टकाम-यज्ञ के परिज्ञान से हम भी प्रकृतिवत नवीन रचना करने ही अभिप्रेत है । अन्तर्याम सम्ब-धुक है 1 । यज्ञकर्म में प्रधानरूप से दो तत्वों का समन्वय है, दूसरी सदा गौण रहती है । न्ध से मिलने वाली उन दो वस्तुओं में एक सदा प्रधान रहती गौण वस्तु को “ योषा " नाम से व्यवहृत प्रधान वस्तु को संकेतभाषानुसार " वृषा " नाम से, एवं शब्दों में वृषा पुरुष है, योषा स्त्री किया जाता है । वृषा अन्नाद है, योषा अन्न है । दूसरे विस्फोटक है, स्त्री - पुरुष का सम-है । स्त्री - स्त्री का समन्वय निरर्थक है, पुरुष पुरुष का समन्वय क्रमशः रयि प्राण नामों से व्यवहृत न्वय जनक है । प्रश्नोपनिषत् में यही दोनों योषा वृषा है, जैसा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति बतलाई गई हुए हैं । वहां रयि - प्राण के समन्वय से ही सम्पूर्ण सोम भा ० १ प्र ० । अन्नरूप योषातत्व कि उस भाष्य में स्पष्ट होजायगा – ( देखिए प्रश्नो ० तत्व , यह दाहक है । दाहक अग्नि ऊष्ण है, यह दाह्य है । अन्नादरूप वृषातत्व अग्नि है ही ऋतु है, ऋतुओं की समष्टि ही है, दाह्य सोम शीत तत्व है । गर्मी सर्दी का मिथुनभाव त्रैलोक्य का उत्पादक है 1 । इसी संवत्सर है, संवत्सर ही यज्ञपजापति है, यही यज्ञप्रजापति हमारे सामने करते हुए निम्न लिखित श्रौतवचन प्राजापत्य यज्ञविज्ञान का स्पष्ट शब्दों में निरूपण हैं । " १ - " यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ( यजुः सं ०३१।२६ ) । 119 मनुष्यविध सामदेवताओं ने संवत्सरमूति यश १— “ प्रकृतियज्ञ के सञ्चालक प्राणदेवताओं में, एवं किया था । बैधयज्ञ का संचालन के आधार पर ही प्रजोत्पादक यश, एवं देवात्मोत्पादक कम्ने का ) । अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में इसी यज्ञ यह धर्म्म ( यज्ञ कर्म्म ) बहुत प्राचीन थे ( हैं सहारा लिया गया था " । ५०

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० भूमिका ॥ २ – " ऋतुरस्मि, आर्त्तवोऽस्मि । श्राकाशाद्योनेः सभूतो भार्यायै-रेतः संवत्सरस्य तेजो भूतस्यात्मभूतस्य त्वमात्मासि, यस्त्व-मसि सोऽहमस्मि " ( कौ ० उ ० १६ ) | ३ - स एष संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः ” ( शत ० १४/४ । ३ । ३२२ ) । ४ - " यः स भूतानां पतिः सवत्सरः सः " ( शत ० ६ । १ । ३ । ) । ५ - " संवत्सरो वै पिता वैश्वानरः " ( शत ० १।५।१।१६ । ) । ६ - " संवत्सरो यज्ञप्रजापतिः " ( शत ० १२ । ५ । १२ । ) । - " संवत्सरसम्मितो वै यज्ञः । पञ्च वा ऋतवः संवत्सरस्य । तं पञ्चभिराप्नोति तस्मात् पञ्च जुहोति " । ( शत ० ११ । १ । १ । १ । ) । " २ - " मैं ( पार्थिवप्रजा ) ऋतु हूं, ऋतु का भाग हूं । आकाशरूप योनि से उत्पन्न, भायी के रेतोरूप संवत्सर के तेज से अपने श्रात्मा का स्वरूप निष्पन्न करने वाला तू चात्मा संवत्सर ( की प्रतिकृति ) है, जो तू ( संवत्सर ) है, वही मैं ( प्रजा ) हूं " । ' ( सृष्टिसाक्षी षोडशी पुरुष से उत्पन्न होने के कारण ) वह संवत्सर प्रजापति भी अवश्य ही षोडश-कल है । अर्थात् सृष्टिकर्त्ता षोडशी पुरुष ही संवत्सररूप बन कर प्रजोत्पत्ति का कारण बनता है । अतः इस षोडशकल श्रात्मा के सम्बन्ध से हम संवत्सर को भी षोडशकल कह सकते हैं " । ४ – “ जो कि ( विश्व में ) भूपति नाम से प्रसिद्ध है, वह यही संवत्सर है । कारण भूतों को उत्पन्न कर . उन पर शासन करना संवत्सर का ही काम है " । ५- " तीनों विश्वों में अग्नि वायु यादित्य रूप से व्याप्त, इन्हीं तीनों विश्वनरों से कृतस्वरूप, अतएव वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध संवत्सर ही ( लोक एवं प्रजा का ) पिता है " । ६ - अग्नि- सोम के समन्वयरूप यज्ञ से अपना स्वरूप सम्पन्न करने वाला संवत्सर अवश्य ही यज्ञ-प्रजापति है " । ७—— प्राकृतिक नित्यं यश का परिमाण संवत्सर ही है । अर्थात् संवत्सर की सीमा ही इस नित्य यज्ञ की स्वरूपसम्पदिका है । संवत्सर की पांच ऋतुएं हैं । अतएव मनुष्यकृत वैध यज्ञ में पांच बाहुतिएं दीं 1 जातें हैं । इन पांचों से उन पाचों ऋतुओं को अपने अधिकार में करता हुआ यशकर्त्ता यजमान संवत्सर सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है " ।

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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥६-८ " संवत्सरोऽग्निर्वैश्वारः " ( तै ब्रा ११७१२ । ५ । ) । ६ - " संवत्सरो वै सोमः पितृमान " ( तै ० ब्रा ० १६ादा ) ।

१० - ' तस्मादाहुः संवत्सरस्य सर्वे कामा: " ( शत ० १० । २ । ४ । १ । ) ।

११ - " ऋतवः संवत्सरः " ( तै ० प्रा ० ३ ॥

१२ – “ स वै यज्ञ एव प्रजापतिः " ( शत ० ११७ || ४ | ) | १३ – “ यज्ञाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते " ( शत ४ । ४ । १२ । १ । ) । १४ – “ पुरुषो यज्ञः " ( शत ० १।३।२२१ । ) । १५ – “ पुरुषो वै सम्वत्सरः " ( शत ० १३ | २ | १ | ) । महर्षियों अपने तपोयोग से इस अलौकिक यज्ञविद्या के दर्शन किए, एवं लोक-कल्याण के लिए उसी यज्ञ विद्या को बंधयज्ञ रूप से हमारे सामने रक्खा । ऐसे अमूल्य धन को खोकर सचमुच आज हम अपने हाथों हीं अपना सर्वनाश करा रहे हैं । याज इस नित्य-विद्या का अवसान हमने आग में दो चार मन घी डालने पर ही मान रक्खा हैं । -१-८- " संवत्सर प्रजापति अग्नि वायु- दित्यमूर्ति बनता हुआ वैश्वानर है । कारण वैश्वानर का स्त्ररूप इन्हीं तीनों से निष्पन्न हुआ है " । ६— “ संवत्सर पितरप्राणयुक्त सोममय है " । १०– “ इसी लिए यह कहा जाता है कि सम्पूर्ण काम ( इच्छा ) संवत्सर के ही हैं " । ११– “ ऋतुओं की समष्टि ही सम्वत्सर है " । १२ – “ वह ( सम्वत्सर रूप ) यज्ञ ही ( प्रजोत्पादन के कारण प्रजापति है " । " १३ – “ यज्ञ से ही सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है " । १४ - " पुरुष ( मनुष्य ) साक्षात् यज्ञ ( की प्रतिकृति ) है " । १५ - " संवत्सर से उत्पन्न पुरुष वास्तव में संवत्सर ( की प्रतिमा ) है " । -१-५२

पृष्ठ 156

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२ – ज्योतिः १० भूमिका . FYFIFIR DING OF भौतिकविज्ञान में अपने आप को मूर्द्धन्य मानने वाले पश्चिमी विद्वान् भौतिक विज्ञा-नान्तर्गत ज्योतिर्विज्ञान के सम्बन्ध में हीट ( Heat ), लाइट ( Light ), इलेक्ट्री ( Electricity ) इन तीन तत्वों को प्रधानता देते हैं । इन का यह सम्पूर्ण ज्योतिर्विज्ञान पदार्थ-विज्ञानान्तर्गत हमारे श्रग्निविज्ञान में ही अन्तर्भूत है । उक्त तीनों पदार्थ भारतीय विज्ञानशास्त्र में क्रमशः ताप ( Temperathre ), प्रकाश ( Light ), विद्युत् ( Electricity ) इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । तापलक्षण घनाग्नि पार्थिवज्योति है, प्रकाशलक्षण विरलाग्नि इन्द्र है, यही आदित्य है, यही दिव्यज्योति है । " रूपं रूपं मघवा बोभवीति ” ( ऋक्सं ० ३।५३८ ), “ इन्द्रो रूपाणि कनिक्रदचरत् " " इन्द्रो ज्योर्तिज्योंतिरिन्द्रः " इत्यादि श्रुतिएं इस दिव्यलोकस्थ इन्द्र को ही सप्तवर्णात्मक प्रकाश का अधिष्ठाता बतला रहीं हैं । अन्तरिक्ष में रहने वाला ऋत वायु विद्युल्लक्षण है, यही प्रान्तरिक्ष्यज्योति है । केवल अग्नि ही घन - तरल - विरल भेद से तीन अवस्थाओं में परिणत होता हुआ क्रमशः अग्नि वायु श्रादित्य नामों से प्रसिद्ध हो रहा है । इन तीनों में प्रत्येक की अवान्तर अनेक व्यवस्थाएं मानीं गई हैं । तीनों में से अन्तरिक्ष्य विद्यु-ल्लक्षण वायव्यज्योति को ही लीजिए । विज्ञान ( Electricity ) के आधार पर आज पाश्चात्य देशों कों उचित अभिमान हो रहा है, जिस विद्युच्छक्ति से व्याज विविध आविष्कार किए जा रहे हैं, उस का पूरा विवरण आपके वेदशास्त्र में अनादिकाल से निहित है । जहां पश्चिमी विद्वानों की -दौड़ सौर विद्युत् पर ही समाप्त हो जाती है, वहां उनसे कई सहस्र वर्ष पहिले प्रकट होने वाले ग्रन्थों में सौर- सौम्य ध्रौव भेद से तीन प्रकार की विद्युच्छक्तियों का उल्लेख मिलता है । ध्रुवनक्षत्र में प्रतिष्ठित जिस विद्युत ने अपने आकर्षणबल से गुरुत्वाकर्षण की पराकाष्ठा पर पहुंचे हुए पाञ्चभौतिक भूपिण्ड को कन्दुक ( गेंद ) की तरह निरावलम्ब आकाश में नियत क्रान्तिवृत्त पर गतिशील बना रक्खा है, एवं जिस के प्रवेश से लौहा फ़ौलाद बन जाता है, ५३

पृष्ठ 157

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ारम्भिक वक्तव्य ॥७ वही हमारी " धौवविद्युत् " है । जिस के संचार से चक्षु मुख- नासिका - मन - प्राण - वाकू-हस्त - पादादि देहेन्द्रियों का सञ्चालन होता है, जिस के आघात प्रत्याघात से अङ्ग अङ्ग का स्फुरण होता है, जिस के निकल जाने से शरीर निश्चेष्ट हो जाता है, वही दूसरी " सौम्यविद्युत् " सौम्य-है । इस का प्रधान सम्बन्ध सोममय छान्न से बनने वाले सौम्य मन के साथ है । अतएव इसे में चाञ्चल्य का -विद्युत् कहना न्यायसङ्गत होता है । इसी शीघ्रगामिनी विद्युज्योति के प्रभाव से मन पर उदय होता है । इसी विद्युत् के प्रभाव से मन स्वप्नावस्था में भी अपने अन्तर्जगत् में संस्कारों । मन की इसी विद्युज्योति का दिग्दर्शन कराती हुई मन्त्रश्रुति कहती है-दौड़ लगाता रहता

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।

दूरङ्गमञ्ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥

( यजुः सं ० ३४।१ ) स्वज्योतिधन सूर्य्यपिण्ड से, दूसरे शब्दों में आपोमय आन्तरिक्ष्य समुद्र के गर्भ से निकलने वाली विद्युत् सौरविद्युत् है ।

श्रग्ने देवो अर्णमच्छा जिगास्यच्छा देवाँ ऊचिषे धिष्ण्या ये ।

या रोचने परस्तात् सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः ॥

[ ऋक् सं ० ३।२२ | ३ | ] उक्त मन्त्रवर्णन के अनुसार आपोमय सरस्वान् समुद्र के गर्भ में सूर्य बुद्बुद्वत् प्रति-ष्ठित है । इस सूक्ष्म अप्समुद्र से ही उक्त विद्युत् का विकास हुआ है । सूर्य स्वयं विद्युन्मूर्त्ति है — " वि देव सविता ” ( गो ० ब्रा ० पू ० १।३३ । ) । यह विद्युत् पानी से उत्पन्न हुई है, त व्यवहृत किया गया है-एव इसे ब्राह्मणग्रन्थ, एवं मन्त्रसंहिता में " अपां ज्योतिः " नाम से “ विद्युद्रा अपां ज्योतिः ” ( शत ० ७।५।२।४६ - यजुः सं ० १३।५।३ ) । इसी समुद्र में अश्व जो पशु नाम का प्राणपशु उत्पन्न होता है । ध्यान रहै, जिस भौतिक पशु में दिव्यप्राणात्मक नाम से अन्तर्याम सम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहता है वह भौतिक, किंवा पार्थिवपशु उस प्राणपशु के ५४

पृष्ठ 158

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। भूमिका ॥ ही प्रसिद्ध होता है * । “ वीर्य्यं वा आपः " ( शत ० ५। ३ | ४ | १ | ) के अनुसार अप्तत्व ही है । बलाधायक प्राण ही वीर्य है । इस प्राण की ध्यावासभूमि पानी ही है- " आपो-मयः प्राणः ” ( छां उ ०६।४ | ४ | ) | पानीदार वस्तु ही " आबूदार " कहलाती है । निर्वीर्य्य, एवं निष्प्राण व्यक्ति के लिए लोक में " अमुक व्यक्ति का तो पानी उतर गया, पानी मर गया, आव जाती रही " यह किंवदन्ती प्रसिद्ध है । " श्रदृभ्यो ह वाग्रेऽश्वः सम्बभूव " ( शत०-५ | १ | ४ | ५ | ) के अनुसार इस वीर्य्यरूप अप्तत्व से ही अश्वपशु उत्पन्न होता है । अतएव पशु--यों में अश्व को " वीर्य्य " नाम से व्यवहृत किया जाता है- ' अश्वः पशूनामन्नादो वीर्य्यवत्तमः ' ( तै ० ० ब्रा ० ३८७१ ) - " वीर्यं वा अश्वः " ( शत ० २।१।४।१३-२४ । ) । उक्त प्रकरण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि सूर्य, सौरीविद्युत, एवं अश्व-पशु तीनों की उत्पत्ति एक ही स्थान में हुई है । अतएव तीनों को हम समानधर्मा मानने के लिए तय्यार हैं 1 । यही कारण है कि सूर्य्य - विद्युत अश्व तीनों को ब्राह्मणग्रन्थों में तीनों नामों से व्यवहृत किया गया है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों से स्पष्ट हो जाता है । १ - " असौ वा आदित्यः ( सूय्यः ) अश्वः " ( तै ० ब्रा ० ३।६।२३।२ । ) । २ - " विद्युदेव सविता ” ( गो ० ना ० पृ ० १।३३ । ) । ३ – “ सौय्य वा अश्वः " ( गो ० उ ० ३ । १ । ) । ४ -- " आशुः सप्तिः, अश्व एव जव दधाति " ( तै ० प्रा ० ३८१३२ ) । उक्त तीनों विद्युत् इन्द्रतत्व में अन्तर्भूत हैं । “ स्तनयित्नुरेवेन्द्रः " ( शत ० ११ ||| ) से भौतिक इन्द्रविद्युत् ही अभिप्रेत है । यही ( विद्युत ) सोमसम्बन्ध से सोममय प्रज्ञानात्मा ( मन ) पर अपना अधिकार जमा लेती है, जैसा कि पूर्व में कहा जाचुका है । सोम और इन्द्र का घनिष्ट सम्बन्ध है, यह सिद्ध विषय है । आकाश में जो विद्युत् चमकती है, वह भौतिक है । मन * पुरुष अश्व गौ - अवि श्रज इन पांचों प्राणात्मक एवं प्राणी पशुओं का वैज्ञानिक विवेचन शतपथ-विज्ञानमाभ्यान्तर्गत " पश्वालम्भनमीमांसा " में देखना चाहिए । ५५

पृष्ठ 159

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०२॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥७ में रहने वाली विद्युत् आध्यात्मिकी है । केनोपनिषत् में इन दोनों का विशद निरूपण हुआा है, जैसा कि तद्भाष्य में स्पष्ट होजायगा । त्रिधा विभक्त एकमात्र इस इन्द्रविद्युत के यथार्थ स्वरूप को पहिचान लेने के अनन्तर मनुष्य सब कुछ कर सकता है । इसी अभिप्राय से काशिराज प्रतर्दन एवं इन्द्र की संवादभाषा में ऋषि ने इन्द्र के मुख से - 46 ' * मामेव विजानीहि! एत-देवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये यन्मां विजानीयात् " ( कौ ० उ ० ३।१ । ) यह अक्षर कहलवाए हैं । निष्कर्ष यह है कि विद्युद्विज्ञान का हमारे शास्त्र में बड़े विस्तार से निरूपण हुआ है । विशेष जिज्ञासा रखने वालों को ऋक्संहिता के १।३१।१३, १६३ ९, ११६४१२६, - ६/३/८ -११८६।३, −१०।११।५, इत्यादि स्थल देखने चाहिएं । इन में स्पष्टरूप से विद्युत्तत्व का निरू-पण हुआ है । १३- प्रहविज्ञानम् २ : 0: जिन गैसों के आधार पर पश्चिमी वैज्ञानिक आए दिन विश्वनाश के मार्ग निकालने में अपने आप को धन्य मान रहे हैं, उन्ही ग्रहों से भारतीय ऋषियों ने ग्रहयाग नाम की सुप्र-सिद्ध यज्ञप्रक्रिया द्वारा आत्मकल्याण के पथ का निर्माण किया है । यह ग्रह ४० प्रकार के माने गये हैं । वायु में रहने वाला रुद्रतत्व ही ग्रह, किंवा गेस ( Gas ) है । रूद्रतत्व विनाशक ( जहरीला ) प्राण है । इसीलिए इसे पुराणों में संहारक देवता माना गया है । ४० भागों में विभक्त रुद्रात्मक इन ग्रहों का क्या उपयोग है? सृष्टि में यह क्या काम करते हैं? ऋषियों नें इन के प्रयोग से क्या लाभ उठाया है? इन प्रश्नों के समाधान के लिए शतपथब्राह्मण का ग्रह-याग ( ४ काण्ड ) प्रकरण देखना चाहिए । ३ : 0: * " हे प्रतर्द्दन! तुम मुझे ( इन्द्र विद्युत् को ) ही पहिचानो! मैं मनुष्य का सब से बड़ा यही हित समझता हूं कि वह मुझे पहिचानले ” । ५६

पृष्ठ 160

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४ - परिशिष्टविज्ञानम् || भूमिका || -इसी प्रकार ग्रहणविज्ञान, पृथिवीपरिभ्रमणविज्ञान, श्रोषधिविज्ञान, गर्भविज्ञान, वृष्टिविज्ञान, आदि अनेक विद्याओं का स्वयं वेद में मूलरूप से विस्तृत विवरण उपलब्ध होता है । यन्त्रविशेष की सहायता से ग्रहण का स्वरूप सब से पहिले महर्षि अत्रि ने ही संसार

के सामने रक्खा था । जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रों से स्पष्ट है ।

* ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन् कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन् ॥

अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधाव स्वर्भानेोरपमाया अघुतत् ॥१ ॥

. यं वै सूर्य स्वर्भानुमा विध्यदासुरः ॥

स्तन्वविन्दन् न ह्यन्ये अशक्नुवन् ॥ २ ॥ ( ऋक्सं ०५/४०/८६ ) ।

" अपने अक्ष पर घूमता हुआ, इस स्वाक्षपरिभ्रमरण से अहोरात्र ( दिन - रात ) का स्वरूप बनाता हुआ भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर अपने नियत ( क्रांतिवृत्त नाम के ) मार्ग से परिक्रमा लगाता हुआ संवत्सर का स्वरूप संपन्न कर रहा है " इस का पता वैज्ञानिकों नें लगा लिया है । परन्तु भूपिण्ड क्यों घूमता है? इस प्रश्न के समाधान में प्रायः बैज्ञानिक असमर्थ ही रहे हैं । इधर आप के महर्षियों नें सूर्य की स्थिरता, पृथिवी का परिभ्रमण यादि के साथ साथ ही उक्त प्रश्न का भी समाधान किया है, जैसा कि निम्न लिखित प्रमाणों से सिद्ध है । १.1 " कतरा पूर्वा कतरा परायो कथा जाते कवयः को विवेद । विश्वं त्मना विभ्रतो यद्ध नाम विवर्त्तेते अहनी चक्रियेव || ” ( ऋक्सं १ ९ १८५११ । ) * भूमिका आवश्यकता से अधिक विस्तृत होती जारही है । एवं साथ ही में हमें उनिषत् सम्बन्धी कुछ एक आवश्यक प्रश्नों पर विचार और करना है । ऐसी अवस्था में इन मन्त्रों का अर्थ एवं विषय की पूर्ण सङ्गति नहीं लगाई जासकती । प्रकृत में केवल कुछ एक आवश्यक उद्धरणमात्र उद्धृत कर दिए जाते हैं । मन्त्रार्थो की विशेष जिज्ञासा रखने वालों को हमोर लिखे अन्य निबन्धों को ही देखना चाहिए । ५७