Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 161–170
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 161–170
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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ २ – “ सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासां सुक्षितीनाम् । देवत्रा रथ्योहिता ” ( सामसं ० पू ०२।८।१० ) ।
66 ' यज्ञ इन्द्रमवर्द्धयद् यद् भूमिं व्यवर्त्तयत् ।
चक्राण श्रपश दिवि " ( ऋकू सं ० ८।१४।५ । ) ॥
४ – “ अहं परस्तादहमवस्ताद् यदन्तरिक्षं तदु मे पिताऽभूत् ॥ ” श्रहं सूर्यमुभयतो ददर्श अहं देवाना परमं गुहा , यत् ५ - “ अथ तत ऊर्ध्व उदेस्य नैवोदेता, नास्तमेता एकल एव मध्ये स्थाता । तदेष श्लोकः-" न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहं सत्येन या विराधिषि ब्रह्मणा " ॥ ( छा ० उप ० ) हैवास्मै भवति । स ६- " न ह वा अस्मा उदेति, न निम्लोचति, सकृदिवा मन्यन्ते, ग्रह एव वा एष न कदाचनास्तमेति, नोदेति । तं यदस्तमेतीति परस्ताव । तदन्तमित्वा - अथात्मानं विपर्यस्यते, रात्रिमेवावस्ताव कुरुते, अहः विपर्य-अथ यदेनं प्रातरुदेतीति मन्यन्ते, रात्रेरेव तदन्तमित्वाऽऽथात्मानं ) न कदा-स्यते, अहरेवावस्तात् कुरुते, रात्रिं परस्तात् । स वा एष ऐ ( ० सूर्य्यः ब्रा ० ) चन निम्लोचति, न ह वै कदाचन निम्लोचति " । ( । - " नैवास्तमनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः । उदयास्तमनाख्यं हि दर्शनादर्शनं रवेः || ” ( पुराण ) ) महोदय के जिस कुछ शताब्दियों पहिले उत्पन्न सुप्रसिद्ध विद्वान् न्यूटन ( Newton है, वह सिद्धान्त न्यूटन से कई आकर्षण सिद्धान्त का आज पश्चिमी देशों में डिण्मिघोष हो रहा ने कितने स्पष्ट शब्दों में प्रकट शताब्दियों पहिले उत्पन्न होने वाले स्वनामधन्य श्री भास्कराचार्य किया है, देखिए—
भाकृष्टशक्तिश्च महीतया यत् खस्थं गुरुस्वामिमुखं स्वशक्त्या ।
आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क पतस्वियं खे ॥
( सिद्धान्तशिरोमणि ) ५८
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इसी प्रकार -भूमिका “ हरिमाण: -किकिदिवि - व्रतधाजि रतिविद्धहृद्रोगाः । यक्ष्माऽ - मीवा - रक्षश्चाष- निहाका - रपोऽहंसी- चित्रः ॥ ” इत्यादि नामों से प्रसिद्ध रोगों का विश्लेषण एवं सूर्य - ओषधि अग्नि- मणि - मन्त्र द्वारा उन के समूल विनाश का उपाय बतलाने वाले भारतीय क्या विज्ञानशून्य कहे जासकते हैं? " या प्रोषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा ॥ भ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥१ ॥
साकं यक्ष्म पत चाषेण किकिदीविना ॥ साक व्रातस्य धाज्या साकं नश्य निहाकया ॥ २ ॥
यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव ॥ विप्रः स उच्यते भिषग्ररक्षोहामीवचातनः ॥३ ॥
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः ॥ ततो यक्ष्मं वि बाधध्व उग्रो मध्यमशीरिव ॥ ४ ॥
मावो रिषत् खनिता यस्मै चाहं खनामि वः ॥ द्विपच्चतुष्पदमस्माकं सवमस्त्वनातुरम् ॥ ५ ॥
शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमुत वो रुहः ॥ अधा शतक्रत्वो यूयमिदं मे अगदं कृत ॥ ६ ॥ " ( ऋकूसं ०१० मं ०६७ सूक्त ) ।
क्या उक्त प्रकार के मर्म्मस्पर्शी घोषधिविज्ञानवेत्ता इस युग में मिल सकेंगे? " यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद्वस्तावधि संश्रुतम् ॥ एवा ते मूत्रं मुच्यतां वद्दिवलिति सर्वकम् ॥ १ ॥
विषितं ते वस्तिबिलं समुद्रस्योदधेरिव ॥ एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्वालिति सर्वकम् ॥२ ॥
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० प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ येथेषुका परापतवष्टाधिधन्वनः ॥ ॥ एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्वालिति सर्वकम् ॥३ प्र ते भिनमि मेहनं व वेशन्त्या इव ॥ सं ० १ | १ | ३७ | ) एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्वालिति सर्वकम् || ४ || ” ( अथर्व अवरुद्ध मूत्र को निका-उयुक्त मन्त्रों में शलाका ( Cotteter ) प्रयोग से जिस प्रकार ( Surgery ) से शून्य बत-जने का आदेश है, उसे देखकर उन ऋषियों को शल्यचिकित्सा ? लाना क्या अक्षम्य अपराध नहीं है ॥ " वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्स्तावर्यमा होता कृणोतु वेधाः सिस्रतां नार्वृतप्रजाता त्रि पर्वाणि जिहतां सुतवा उ चतस्रो दिशः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत ॥ देवा गर्भं समैरयन् त व्यूवन्तु सूतवे ॥२ ॥
सुषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि ॥ श्रथया सुपणे त्वमव त्वं विष्कले सृज ॥ ३ ॥
विभिनमि मेहनं वि योनिवि गवीनके ।
॥
विमातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुगाऽवजरायु पद्यताम् ॥ ४
। यथा वातो तथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः || ५ || ( अं ० सं ० २।२।११ ) एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुगा पताव जरायु पद्यताम् मदोन्मत्त मस्तक उन मन्त्रों को देखकर प्रसवचिकित्सा विज्ञान का गर्व करने वालों का भारतीय शल्यशास्त्र के सम्बन्ध में ऋषियों की महत्ता के आगे क्या नही झुक सकता? देखिए पश्चिमी विद्वानों के क्या विचार हैं-हैं — “ The ancient Hindus १ – प्रॉफेसर विलसन ( Wilson ) महोदय कहते में वैसी ही पार-१ - अर्थात्- “ प्राचीन भारतवासियों ने औषधिविज्ञान एवं शल्यशास्त्र हैं " । के कि कार्य इतिहास में लिखे गए दर्शिता प्राप्त की थी, जैसी कि उन ( पश्चिमी ) लोगों नें, जिन ६०
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|| भूमिका ॥ attained as thorough proficiency in medicine and surgery, as any people whose acquisitions are recorded. " २ – मि ० बेवर ( Mr. Baber ) इस सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं – “ In surgery too, the Indians seem to have attained a special proficiency, and in this department European surgeons, might perhaps ever at the present day, still learn something from them. " ३ — प्रॉ ॰ मेकडानल्ड ( Macdonald ) कहते हैं — “ In modern days European surgery has borrowed the operation of shinoplasty, or the formation of artificial nose from India, where English men become acquainted with the art in the last country... ४ - माननीय ऐलफिन्स्टसन ( Elphinston ) साहब लिखते हैं – “ Their surgery is as remarkable as their medicine. " ५ - मिसेज मेनिंग ( Ms. Maning ) कहती हैं — “ The surgical instrument of the Hindus were sufficiently sharp, indeed as to be capable of dividing & hair lougitudally. ” २ – प्रथीत - " जान पड़ता है - शल्यविज्ञान में भी भारतवासियों नें विशेष पारदर्शिता प्राप्त की थी । इस क्षेत्र में युरोपियन सर्जन सकते हैं " । इस समयभी इनसेशायद कुछ सीख ३ -- अर्थात् - " इन दिनों योरोप के शल्यविज्ञान ने हिनोप्लास्टी ( Rhinoplasty ) का ऑपरेशन एवं कृत्रिम नाक बैठाना हिन्दुस्तान से सीखा है । युरोपियन लोग गत शताब्दियों में इस कला से परिचित हुए " । ( ४ — अर्थात्- " उन ( भारतीयों ) का शल्यविज्ञान उन के ओषधिविज्ञान की तरह ही 8-पूर्वथा " । ५ - अर्थात् - " हिन्दुओं के शस्त्र काफ़ी तौर से तेज होते थे । वे बाल से भी सूक्ष्म पदार्थ को विभक्त कर सकते थे । ६१
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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ Hindus ) महोदय का कहना है - That the ६ – माननीय डॉ ० सील ( Seal of demonstration....... bodies for purposes osteric practised dissection on dead operations as well as wajor operations .......... Post morton for embryological observations. " surgery were availed of इसी प्रकार --रजः । अश्वो जातो अनभीषुरुक्थ्यो रथस्त्रिचक्रः परवर्त्तते यच्च पुष्यथ ॥ महत् तद वो देव्यस्य प्रवाचनं द्यानुभवः पृथिवीं युग क्या भारत को विमानविद्या से इत्यादि निदर्शनों को देखते हुए भी आज का है? कदापि नहीं । अपरिचित बतलाने का अनुचित साहस कर सकता -Bivi प्रदिशा विधर्मणि । १ - “ सप्तार्थन भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति विश्वतः ॥ ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परिभवन्ति
( ऋक्सं ] ० १।२६४३६ । ) ॥
२ – “ कृष्णणं नियान हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पन्ति व्युद्यते ॥ त आवत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवी । ३ - समानमेतदुदकमुच्चैत्यवचाहभिः ( ऋक्सं ० १।१६४ | ४० | ) । ० २।१६४ | ५११ ) भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्ययः । ( ऋक्सं । यदा खल्वसावादित्यो ४ - अग्निर्वा इतो दृष्टिमुदीरयति, महतः सृष्टान्नयन्ति " न्यरश्मिभिः पर्य्यावर्त्तते, अथ वर्षति ५ - " " वायुर्वे दृष्ट्या ईशे " कादम्बिनी ) । ६ -- “ वायुनैवोद्धृतं तोयं वायुरेव प्रवर्षति " ( श्रीगुरुप्रणीत कहीं मिल सकता है? क्या इस से बढ़ कर दृष्टिविज्ञान संसार में अन्यत्र चीर फाड़ करते थे । वे मुर्दे को ६ - अर्थात् - " हिन्दू लोग प्रयोग के लिए मृतशरीर की करते थे " । सम्बन्धी रोगों के लिए भी चीर फाड़ चीर कर उसकी परीक्षा भी करते थे, एवं गर्भ ६२
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। भूमिका । अपने आप को विज्ञान की चरम सीमा पर पहुंचे हुए मानने वाले उन विज्ञानाभिमानियों क्या हम निम्न लिखित प्रश्नों का उत्तर मांग सकते हैं? १ - " वृक्ष की अपेक्षा मनुष्य के शरीर में जब रसादि की अधिक मात्रा रहती है तो फिर क्या कारण है कि वृक्ष कटने पर बढ़ जाता है, एवं मनुष्य कटने पर पुनः प्ररोहित नहीं होता? ” । २ - " उत्पन्न शिशु के प्रथम वय में केश भूरे क्यों होते हैं? फिर काले क्यों होजाते हैं? फिर श्वेत कैसे, एवं क्यों होजाते हैं? अन्तिम वय में फिर पीतवत् क्यों हो जाते हैं? ” । ३ – “ उत्पन्न शिशु के दांत क्यों नहीं होते? उत्पन्न होने पर पहिले ऊपर, फिर नीचे यह वैषम्य क्यों? उत्पन्न होकर क्यों गिर जाते हैं? फिर क्यों उत्पन्न होते हैं? फिर क्यों गिर जाते हैं? दुबारा गिरे बाद फिर उत्पन्न क्यों नहीं होते? " । - " अल्पमात्रायुक्त शुक्रविन्दु से ( जो कि अनस्था घनभावरहित है ) हस्त - पाद-उर - चक्षु - तोत्र- मस्तकादि विविधाकाराकारित पुरुष कैसे उत्पन्न हो जाता है? " । यदि आप इन प्रश्नों के समाधान में असमर्थ हैं, यदि आप को इन प्रश्नों का युक्ति-युक्त विज्ञानसिद्ध उत्तर प्राप्त करना है तो वेदपुरुष की शरण में आइए! यह आप की सारी जिज्ञासाएं पूरी करैगा । इसी प्रकार अन्यान्य पदार्थ विज्ञानों का हमारे शास्त्रों में इतना स्पष्ट एवं सुगम विश्ले-पण उपलब्ध होता है, जिसे देख कर आज के विज्ञानवादियों के वैज्ञानिक तत्व अधूरे मानने पड़ते हैं । उदाहरण के लिए तत्वगणना का ही विचार कीजिए । पश्चिमी विद्वान् जहां उत्तरो-तर तत्वसंख्या की वृद्धि मानते हुए अपने ज्ञान की अपूर्णता का परिचय दे रहे हैं, वहां भार-तीय शास्त्र में अनादिकाल से सदा के लिए पृथिवी - जल - तेज - वायु - आकाश यह पांच तत्र ६३
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- प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ प्रतिष्ठित हैं । न इन में कभी परिवर्तन हुआ, न भविष्य में होगा । यही तो वेद का नित्यत्व एवं अपौरुषेयत्व है । ही हमें यह जान कर उन सभ्यताभिमानियों की सभ्यता पर तरस आता है, एवं साथ छात्रों को भारतीय दुःख भी होता है, जब कि वे आधुनिक शिक्षणालयों में आज भारतीय के सम्बन्ध विज्ञान के निगूढतम रहस्यों की परीक्षा किए बिना ही भारतीय विज्ञान ही यह सिखाया जाता है में अनुचित भ्रम फैला रहे हैं । उन अबोध विद्यार्थियों को आरम्भ में थे । वे केवल कि - " # भारतीय विद्वान विज्ञान ( Sience ) स सर्वथा अपरिचित । हो ईश्वर के उपासक थे । आत्मा की खोज में ही उन का बुद्धिबल प्रयुक्त हुआ हैं सकता है. आत्मा के स्वरूप को वे पहिचान गए हों, परन्तु ऐहलौकिक सुखसाधनभूत नामक पदार्थविज्ञान का तो उन्हों ने स्पर्श भी नहीं किया । तभी तो वे कभी अग्नि की पदार्थ को हाथ जोड़ते दिखलाई देते हैं, कभी सूर्य - पृथिवी नक्षत्र - वायु - दृष्टि ही - भादि उन्होंने स्तुति करते मिलते हैं । तत्वविज्ञान से सर्वथा अपरिचित रहने के कारण में देखते पृथिव्यादि पंच महाभूतों को तत्व ( Elements ) मान रक्खा है । हम प्रत्यक्ष ७० धातुओं हैं कि पृथिवीपिण्ड सुवर्ण, रजत, ललौह, पद, हीरक आदि ७ विश्वविद्यालय में * कुछ समय पूर्व ब्राह्मणवंशगौरव महामना मालवीयजी के आयोजन से काशीहिन्दू हुई थी । वहां यही प्रश्न कई प्रमुख विद्वानों की उपस्थिति में पञ्चमहाभूतवर्षत् एवं त्रिदोषपत् होते हैं तो ऐसी अवस्था में उपस्थित हुए थे कि पांचों भूत जब प्रत्यक्ष में यौगिकभाव, क्रान्त उपलब्ध अन्वेषण करने पर भी जब हम इन्हें तत्व कैसे माना गया? इसी प्रकार सूक्ष्मतम यन्त्रों से सर्वात्मना के उक्त त्रिदोषभाव वात - पित्त - कफ की सत्ता नहीं देखते तो ऐसी परिस्थिति में भारतीय आयुर्वेदशास्त्र द्वारा ( श्रीमधुसूदनजी की आधारभूमि क्या है? कहना नहीं होगा कि वहां उक्त प्रश्नों का श्रीगुरुचरणों श्रभा द्वारा ) सम्यक् समाधान हुआ था । निवेदन करेंगे सर्वथा अप्रासङ्गिक होते हुए भी इस सम्बन्ध में हम श्रीमालवीय जो से सविनय का स्तुत्य कार्य कि हिन्दूसंस्कृति की रक्षा के लिए जहां उन्होंने ' हिन्दूविश्वविद्यायल ' स्थापित करने कर-किया है, वहां हिन्दूसंस्कृति के प्राणभूत वैदिकविज्ञान के अध्ययनाध्यापन की व्यवस्था I
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भूमिका ॥ की समिटमात्र है । दूसरे शब्दों में अनेक धातुओं के समवाय से ही भूपिण्ड का स्वरू-प निष्पन्न हुआ है । ऑक्सिजन ( Oxggen ), एवं हाइड्रोजन ( Hydrogen ) की नियत मात्रा के रासायनिक मिश्रण से जल उत्पन्न हुआ है । फलतः यह भी तत्व-मर्यादा से बाहर निकल जाता है । यदि अग्नि से ताप का ग्रहण किया जाता है तो यह ( ताप ) पदार्थों की एक अवस्था विशेष होगी, न कि स्वतन्त्र तत्व । यदि ज्वाला को अग्नि समझा जायगा तो वह ऑक्सिजन एवं कार्बन ( Carbon ) दोनों के संयोग से उत्पन्न होने वाला यौगिक द्रव्य ही होगा । फलतः अग्नि भी तत्व नहीं माना जासकेगा । इसीप्रकार ऑॉक्सिजन एवं नाइट्रोजन ( Nitrogon ) के सम-न्वय से उत्पन्न होने वाला वायु भी तत्व नहीं माना जासकता । एवमेव पृथिवी - जल-तेज - वायु आदि के प्रतिष्ठित रहने के लिए अवकाशरूप शून्यलक्षण आकाश को भी तत्त्व मानना निरी भ्रान्ति ही है । आकाश में जो एक नीलिमा दिखलाई पड़ती है, इसी से आकाश नाम के पदाथ की कल्पना करना और भी अधिक भ्रान्ति है । कारण स्पष्ट है । घनीभूत वायु ही यह प्रत्यक्ष दृष्ट नीलिमा है, दूसरे शब्दों में नीलिमा वायु का समुच्चितरूप ही है । ऐसी अवस्था में वायु को नीरूप मानने वाले वैशेषिक - नैय्या-यिकादि भारतीय दार्शनिकों के सिद्धान्त का भी कोई मूल्य नहीं रह जाता । इस प्रकार जब हम सर्वात्मना भूतों को यौगिक पाते हैं तो ऐसी स्थिति में इन्हें तत्व मानना भ्रान्ति नहीं है तो और क्या है " । इस प्रकार उक्त शब्दाडम्बर को आगे रखते हुए, अपनी अज्ञता से भारतीय तत्ववाद पर आक्षेप करने वाले उन विज्ञानधुरीणों के प्रति हमारा यही वक्तव्य है कि अभी आपको भारतीय
" योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
स जीवनेव शूद्रत्वमाशुगच्छति सान्वयः ॥
इस अनुशाप से ब्राह्मणज'ति को बचावें । क्या हम आशा करें कि यह भारत का गौरव ( श्रीमालवीयजी ) भारत की इस दिव्यविभूति ( बौदिकज्ञान ) की रक्षा का कोई उपाय करेंगे? ६५
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03 प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ ऋषियों के उन सत्य सिद्धान्तों का मनन करना चाहिए । जिन्हों ने ग्रात्म परमात्म जैसे अप्रत्यक्ष-तम तत्वों का साक्षात्कार कर लिया था, क्या परोक्षद्रष्टा, अतीतानागतज्ञ वे महर्षि ? भौतिक तत्ववाद जैसे स्थूल विज्ञान के सम्बन्ध में इतनी बड़ी भूल कर सकते थे कदापि नहीं! सर्वथा असम्भव!! आर्य वैज्ञानिकों नें गुण - अणु - रेणु - महाभूत - सत्वभूत भेद से पांच प्रकार के भूत मानें हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द नाम से पांचों तन्मात्राएं हीं गुण-भूत हैं । यह सर्वथा मौलिक तत्व हैं । यही श्यवस्था एकद्रव्यात्मक अणु - रेणु - भूतों की है । यही हमारे पञ्चतत्व हैं । इनके समबन्ध से चौथी श्रणि के महाभूतों की उत्पत्ति हुई है । महाभूत शब्द ही इन की यौगिकता का परिचायक है । स्वयं भारतीय इन्हें यौगिक मान रहे हैं । इन यौगिक पश्ञ्चमहाभूतों से पांचवी श्रेणि के अस्मदादि सत्यभूतों की उत्पत्ति हुई है । इसी प्रकार वायु को रूपिद्रव्य मानना भी ( पाश्चात्यों का ) सर्वथा असंगत ही है । सौर-मण्डल के चारों ओर व्याप्त अम्भ नाम के आपोमय समुद्र की प्रतिच्छाया ही यह प्रत्यक्ष दृष्ट । नीलिमा है । वही कृष्ण पारमेष्ठ्य प्रप्तस्य सौर मण्डल के भीतर श्राता हुआ नीला दिखाई पड़ता है इसी प्रकार तापलक्षण अग्नि को पदार्थ न मानना भी भ्रान्ति ही है । अवस्था हीं तो पदार्थ का वास्तविक स्वरूप है । यदि तत्तत् पदार्थों में से तत्तदवस्थाओं को निकाल दिया जायगा तो पदार्थस्वरूप ही क्या बाकी बच जायगा । एवमेव प्रकाश को कोई पदार्थ न मानाना भी केवल उनका साहस ही है । विज्ञान जगत् में भी क्या कोई शून्य तत्व है? । अपिच जिसे आप अवकाश कहते हैं, वह भी शून्य ( खाली के जगंह ) नहीं है । “ प्राणा वै अवकाशाः ( शत ० ना ० १४।२।२।५१ ) इस श्रौत सिद्धान्त ' शुन ’ अनुसार वह एक सूक्ष्म एवं सर्वव्यापक प्राणतत्व है । इसी को भारतीय वैज्ञानिकों ने । नाम से व्यवहृत किया है, जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन् भरे नृतमं वाजसातौ । शृण्वन्तमुग्रमृतये समन्सुघ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम् । ६६ ( ऋकसं ० ३।३१।१ । ) ।
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भूमिका। सर्वव्यापक, शुन नामक यही मघवा इन्द्रप्राण सब के लिए अवकाश बनता हुआ आकाश नाम से प्रसिद्ध हो रहा है । जैसा कि - " यस्स आकाश इन्द्र एव सः " ( जै ० उ ० १ | २८ | २ | ) इत्यादि से स्पष्ट है । सचमुच - " नेन्द्राहते पवते धाम किश्चन ” ( ऋक्सं ० ९ १६६ | ६ | ) । के अनुसार इस शुन इन्द्र का कहीं भी प्रभाव नहीं है । आकाशात्मक शुन इन्द्र के सम्बन्ध से ही इस अवकाश को - " शुने हितम् " इस निर्वाचन के अनुसार ' शून्य ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । शून्य शब्द का अर्थ खाली स्थान नहीं है, अपितु उस स्थान को शून्य कहा जाता है जिसमें कि शुन नाम का इन्द्र, किंवा आकाश व्याप्त है । इन्द्र सर्वव्यापक है । इसी आधार पर भारतीय दार्शनिको ने आकाशात्मक इस तत्व को विभु माना है । “ इन्द्रो वागित्याहुः " ( शता ०१ | ४ | ५ | ४ | ) के अनुसार यही इन्द्र ( आकाश ) वाक् है । इसी वाक् समुद्र से चीचीतरंग द्वारा शब्दसृष्टि होती है । मुखविनिःसृत शब्दजरूप आघात से, हस्तपादादि रूप संयोगज श्राघात से, एवं विभागज श्राघात से वाक्समुद्र में लहर पैदा हो जाती है । यह लहर कर्ण - शष्कुली पर आकर तत्रस्थ प्रज्ञान मन से गृहीत होकर क - च - ट - त - पादि शब्द रूप में परिणत होती है । इसी आधार पर शब्द को आकाश ( वाग्रूप इन्द्र ) का गुण माना गया है । इसप्रकार इन्द्रात्मक आकाश का पदार्थत्व भलीभांति सिद्ध हो जाता है । स्थूलदृष्टि से परोक्ष होने मात्र से ही पदार्थ का अभाव मान बैठना क्या एक वैज्ञानिक के लिए उचित है? किसी के साहित्य को बिना सोचे समझे कलङ्कित करने का व्यर्थ प्रयास करने वाले उन विवेकियों के सम्बन्ध में, अधिक क्या कहें ।
" न स्थाणोरपराधोऽयं यदन्धो नैनमीक्षते ।
चक्षुर्दोषादुलूकोऽयं सूर्यज्योतिनं पश्यति " ॥
पूर्व की संचर- प्रतिसंचरविद्याओं के आरम्भ में यह बतलाया गया है कि विश्वेश्वर प्रजापति आत्मा - विश्व भेद से दो भागों में विभक्त है ( देखिए भा ० भू ० पृ ० सं ०४४ - ४६ ) । इस द्वैधीभाव “ १ सयोगात, २ - विभागाच, ३- शब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिः " ( बै ० दर्शन २ | २ | ३१ ) | ६७