Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 171–180
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 171–180
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१० - स्थिरधर्म १- भार २- आयतन ३- स्थानविरोध ४ - विभाज्यता ५- सान्तरत्व - अस्थिरधर्म्म ' ८-१- शैत्य २- प्राकुञ्चन ३- कठिनत्व ४- वर्णरूपता ३ - सव्यपेतधर्म १- नोदनावल, -- ॥ प्रारम्भिक वक्तव्य ॥६ ६- संगठन ७- स्थितिस्थापकत्व ८- चापन १- जड़ता ०- अविनश्वरत्व ५- क्षणभंगुरत्व ६- घनत्व ७- द्रवत्व - विरलख ३- श्राकर्षणवल २- केन्द्रापगवल, ६८ है, एवं का मुख्य कारण रस - बल का तारतम्य है । बलगर्भित रसनधान तत्व श्रात्मा है, एवं रसगर्भित बलप्रधान तत्व विश्व है । रस प्रधान आत्मा ज्ञानजगत् का अनुग्राहक जा चुका है । बलप्रधान विश्व विज्ञानजगत् की आधार भूमि है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया THIS ही है । इस इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारे विज्ञान की आधारभूमि बलतत्र मेद से बल के — ' स्थिरधर्मप्रयोजक, ' अस्थिरधर्म्मप्रयोजक, सव्यपेतधर्म्मप्रयोजक में विभक्त हैं, जैसा तीन प्रधान भेद हैं । इन में से प्रत्येक बल क्रमशः १०-८- ३ अवान्तर भागों कि निम्न लिखित परिलेख से स्पष्ट हो जाता है । उक्त बलों की आगे जाकर अवान्तर अनेक अवस्थाएं और हो जाती हैं । उदाहरण के लिए नोदनावल को ही लीजिए । यह बल ११ भागों में विभक्त है-
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|| भूमिका ११ - नोदनाबल ( सव्यपेतधर्म्म ) १ - वस्त्वाकर्षण २ - व्यवकलिताकर्षण ३- माध्याकर्षण ६- अनुलग्नताबल ४ - रासायनिकाकर्षण ५- प्राणविकयोगाकर्षण ७-- संसक्त कबल ८- संनिकर्षवल -कैशिकवल ० - शोषणवल 11 ११ - चोपणवल इसी प्रकार पदार्थतत्व हमारे यहां रूढ- योगरूढ यौगिक भेद से तीन भागों में विभक्त माना गया है । प्रत्येक पदार्थ की घन - ( निविडावयव संघातता - कठिनता - विनेयता - उद्वर्त्तनीयता ), १ द्रव - ( तरलावयव ), वाष्प - ( विरलावयत्र ) भेद से तीन तीन अवस्थाएं मानीं गईं हैं । इन्हीं तीनों व्यवस्थाओं के लिए संहिता में क्रमश: ध्रुव - पत्र -रुण शब्द प्रयुक्त हुए हैं- ( देखिए यजु: -सं ०१३।३४ ) । एवमेत्र समस्त विज्ञानराशि हमारे यहां आधिभौतिकविज्ञान ( पदार्थविज्ञान ), आध्या-त्मिकविज्ञान ( शारीरकविज्ञान ), आधिदैविकविज्ञान ( ताराविज्ञान ) भेद से तीन भागों में विभक्त है । निदर्शन मात्र है । इसी प्रकार मनोविज्ञान ( Cycloige ), वनस्पतिविज्ञान, ओषधि-विज्ञान, भूगर्भविज्ञान, धातुविज्ञान आदि अवान्तर स्वण्डविज्ञानों का भी विशद विवेचन हमारे शास्त्रों में उपलब्ध होता है । पूर्वप्रतिपादित कुछ एक निदर्शनों से श्रद्धालु भारतीय विद्वानों को यह समझलेने, एवं मानलेने में सम्भवतः अब कोई आपत्ति न रही होगी कि वेद वास्तव न विज्ञान का अद्भुत खजाना है । साथ ही में उन्हें यह भी स्वीकार करलेने में कोई आपत्ति न रही होगी कि वेद-स्वाध्याय से विमुख होकर सचमुच हमनें - " जीवनेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः " को सर्वा-मना चरितार्थ कर अपने हाथों अपना सर्वनाश करा लिया है । ६६
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प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ जाता है । हमारा जब हम अपने अतीत पर दृष्टि डालते हैं तो हमारा सारा भ्रम दूर हो करने के भी अधिकारी नहीं हैं । श्राज अतीत कैसा था? न पूछिए । आज हम उस के स्मरण थे " दशा हमें " हम किसी समय वैसे हमारे पतन की पराकाष्टा हो गई है । आज की गिरी मनुका -इन अक्षरों पर भी विश्वास नहीं करने देती । कहां भगवान् " एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । ॥ ” स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः । किसी समय जगद्गुरू उदात्तभावनामय यह उद्घोष, कहां हमारी ऐसी पतनावस्था में परमुखापेक्षी बन रहा है । वेदस्खा-बनने का दावा रखनेवाला भारतवर्ष आज प्रत्येक कार्य ब्रह्म ब्रह्मवीर्य्य नष्टप्राय है । फलतः ध्याय का तिरस्कार करने वाले ब्राह्मणों का ज्ञानप्रधान का अर्थ-क्रियाप्रधान क्षत्रवीर्य्य, वैश्यों ( ज्ञान ) के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला क्षत्रियों का से पराङ्मुख होते का स्वधर्म्म आज दोलायमान है । स्व - स्वकर्म्म प्रधान विड्वी, एवं शूद्रों वर्ण चारों वर्णों के कम्मों पर अपना पूर्ण हुए चारों वर्ण उत्पथगामी बन रहे हैं । आज प्रत्येक वह समाज सभी में प्रकृतकृत्य होता हुआ अधिकार जमाने की विफल चेष्टा कर रहा है । फलतः उक्त वर्णव्यवस्था प्रकार समाजकल्याणोपयोगिनी की अशान्ति का कारण बन रहा है । इसी भी आज सर्वात्मना विलुप्त है । के साथ साथ ही व्यक्तिकल्याणोपयोगिनी श्राश्रमव्यवस्था हुई हो, में ही इस देश की ऐसी स्थिति सर्वत्र दावानल प्रज्वलित होरहा है । वर्तमानयुग कहीं अधिक सभ्यता पर इस से भी यह बात नहीं है 1 । पहिले भी कई बार भारतीय भगवदंशभूत शङ्कर - रामानुज -वल्लभ-भयङ्कर आक्रमण हुए हैं । परन्तु तत्तत् समय में हो उच्छिन्न न धरातल पर अवतीर्ण कुमारिलभट्ट - उदयनाचार्य आदि प्रातःस्मरणीय महापुरुषों पतनान्ताः समुच्छ्रयाः " सभ्यता को पुनः प्रतिष्ठित किया है । " संयोगा विप्रयोगान्ताः रखने वाले भारतवर्ष की समुन्नति से सम्बन्ध यह न्याय प्रसिद्ध है । एवं इधर हमारे सौभाग्य से परिक्रमा लगाने २४ अंश के व्यासार्द्ध से सुप्रसिद्ध विष्णुपद नामक कदम्ब ( नाक ) की पुनः भारत का भाग्योदय होने वाले ध्रुव भी आधी परिक्रमा समाप्त कर चले हैं । आज
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भूमिका ॥ वाला है । धीरे धीरे ध्रुव का रुख वेदप्राणमूर्ति अभिजिन क्षेत्र की ओर होने लगा है । जिस दिन ध्रुव ठीक अभिजित् पर श्राजांयगे, उस दिन भारत ( निस्तेज ) भारत पुनः भायुक्त बनता हुआ अपने भारत ( प्रकाशानुगामी ) नाम को सार्थक कर देगा, यह ध्रुवसिद्धान्त है । उसी ध्रुव की प्रेरणा से अपने विचारों को ध्रुत्र बनाते हुए हमने इस पथ में आगे बढ़ने का संकल्प किया है । थोड़े शब्दों में ध्रुवसिद्धान्त का भी इतिहास सुन लीजिए । तत्तद्देशों का अभ्युदय, एवं पतन का कारण ध्रुव ही है । भूपिण्ड धौवविद्युत से ही आकर्षित रहता है । जिस प्रकार क्रान्तिवृत्त की प्रत्येक बिन्दु से ठीक १० अंश पर नाक ( कदम्ब ) है, एवमेव विष्ववृत्त की प्रत्येक बिन्दु से ध्रुव ठीक १० श पर है । अतएव जहां क्रान्तिवृत्तीयपृष्टी केन्द्र को कदम्ब कहा जाता है, विष्वतीय पृष्ठी केन्द्र ध्रुव नाम से व्यवहृत हुआ है । जिस प्रकार लगभग ३० अंश के व्यासार्द्ध से वृत्त बनाकर सप्तर्षिगण ध्रुव के चारों ओर परिक्रमा लगाया करते हैं, एवमेव २४ अंश के व्यासार्द्ध से वृत्त बना कर ध्रुव कदम्ब के चारों ओर परिक्रमा लगाया करता है । भूपि -ण्ड का विष्ववृत्त इसी से आकर्षित है । इसीलिए ध्रुव को सम्पत्ति का प्रदाता माना गया 1 जैसा कि निम्न लिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है-जज्ञानं सप्त मातरो वेधामशासत श्रिय । C अयं ध्रुवो रयीणां चिकेत यत् ॥ ( ऋक्सं ९ । १०२४ ॥ ॥ " यह ध्रुव सप्तमाता नाम से प्रसिद्ध सप्तर्षियों से पहिचाना जाता है, सप्तर्षिमण्डल ही ध्रुत्र का परिचायक है । जिस बुद्धि से सम्पत्ति का आगमन होता है, ध्रुव वैसी बुद्धि का प्रेरक है । यदि कोई व्यक्ति नियत समय पर नियत अवधि पर्यन्त ४० दिन तक अविच्छिन्न-से रूप ' के दर्शन करता है तो उस की बुद्धि में अपने आप सम्पत्ति प्राप्ति का उपाय स्फुरित ध्रुव होजाता है । कारण पृथिवी की जितनी भी रयि ( दौलत ) है, उस सब का प्ररेक ध्रुव ही है । " ध्रुव किसी नक्षत्र का नाम नहीं है, अपितु निराकार विद्युत् ही ध्रुव है । यह विद्युत् बिन्दु जिंस नक्षत्र के समीप रहती है, पहिचान के लिए उसी नक्षत्र को " ध्रुव " नाम से ७१
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॥ प्रारम्भिक वक्तव्य सम्बोधित कर दिया जाता है । यह अपने नियत मण्डल का परित्याग नहीं करती, अतएव इसे की यह परि-ध्रुव कह दिया जाता है । वस्तुत: यह अपने मण्डल पर परिक्रमा लगाती है । इस क्रमा २५ हजारवर्ष में पूरी होती है । इसी ध्रुवपरिभ्रमण से अयनपरिवर्तन होता है 1 । सम्पात-परिवर्तन का मुख्य हेतु ध्रुवपरिवत्तन है । किसी समय अभिजित नक्षत्र पर ध्रुव बिन्दु थी । नाक्षत्रिक उस समय अभिजित् ही ध्रुत्र कहलाता था । अभिजित् नक्षत्र वेदप्राणमय है । अतएव विद्या में इसे ब्रह्मा कहा गया है । जब तक अभिजित ध्रुव रहा, तब तक भारतवर्ष में वेदविद्या का पूर्ण विकास रहा । आगे जाकर इस ध्रुव ने मिश्र पर अनुग्रह किया । मिश्र का सुप्रसिद्ध पिरामिड इसी काल में बना था । वहां से ध्रुव के हटते ही मिश्र का वैभव भूगर्भ में विलीन होगया । क्रमशः पश्चिमी देशों पर ध्रुत्र का अनुग्रह हुआ । वे समुन्नत हुए । इस प्रकार परिक्रममाण धव या अभिजित् से ठीक सामने आगया है, आधी परिक्रमा समाप्त हो चली है, १२॥ हजार वर्ष समाप्तप्राय हैं । अब पश्चिमी देशों से हट कर उस का रुख पूर्वीय देशों की ओर होने लगा है । यही हमारे भाग्योदय की पूर्वसूचना है । पश्चिमी देशों का भविष्य अन्धकारपूर्ण होने वाला है । तात्यय्य कहने का यही है कि ध्रुवपरिभ्रमण ही तत्तद्देशों की उन्नति अवनति का मुख्य कारण में । स्वतन्त्र भारत ने इसी ध्रुत्रवियोग से अब तक परतन्त्रता के कष्ट सहे हैं । निकट भविष्य उस पर धुत्र का अनुप होने वाला है । हमारा भाहत भारत पुनः भारत बनने वाला है, ध्रुव-सिद्धान्त ( ध्रुवपरिभ्रमण सिद्वान्त ) का यही संक्षिप्त इतिहास है । इसी इतिहास का स्पष्टीकरण करते हुए गुरुवर कहते हैं -नाकस्थविष्णोः परितस्तु वेदहरू व्यासार्द्धजे सञ्चरति ध्रुवं ध्रुवः 1 वृत्ते ततः क्वापि पुरा युगे स हि प्रागमेरुखस्वस्तिकगोऽभिजित्यभूव ॥ १ ॥
प्राग्मेरुस्थे हंसपृष्ठेऽभिजिद्रे ब्रह्मण्यासीत् स ध्रुवो यत्र काले ।
ब्रह्मादिष्टो वेदधर्मस्तदासीत् सर्वप्रीतो हृद्गतः प्रोन्नतश्च ॥२ ॥
तवासीद्वारते सोऽपि सूर्यो विज्ञानेनोच्छ्राययन् भारतीयान् ॥
अस्तं यातो भारतस्यैष सूर्यः क्लिश्यन्तत्यांय्यांस्तेन बुद्धयन्धकारात् ॥३ ॥
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-- || भूमिका ॥ मेरुवस्तिक मेष हित्वोत्तरस्य खस्वस्तिकर्मणवस्य ॥ गतो ध्रुवः कर्षति वेदधम्म विपर्य्ययेणाद्य विपर्य्ययस्थः ॥ ४ ॥
वारावशादपि फलं ध्रुव एष दत्ते तेनाभिजित्परिगतः स हि वैदिकानाम् ॥ मागुन्नतिं बहु चकार स चाधुनैषां वेदद्विषां सततमुन्नतिमातनोति ॥५ ॥
कालेन केन च परिक्रममाण एष प्राचीमुपेत्य पुनरेष्यति दक्षिणाशाम् ॥ तेन ध्रुवं ध्रुव इहाभिजिति प्रपन्नां भूयः करिष्यति स भारतधर्म्मवृद्धिम् ॥ ६ ॥
( श्रीगुरूप्रीतइन्द्रविजय ५ प्रक्रम ) यह तो हुई अपनी पराई सुख - दुःख की चर्चा । अब हम प्रसंगवश अपनी दशा का भी संक्षेप से दिग्दर्शन करा देना आवश्यक समझते हैं । एक भारतीय ब्राह्मण के नाते भार-तवर्ष की उक्त दशा पर हमारे अन्तरात्मा में वेदना का उदित होना स्वाभाविक था । हमारे स्वर्गीय पिता श्रीबालचन्द्रजी - शास्त्री सनातनधर्म के अन्यतम भक्त थे । ऐसे घर में जन्म लेकर, साथ ही में बचपन से ही संस्कृतशिक्षा की उपासना करने के कारण उक्त धर्म के प्रति श्रद्धा होना भो स्वाभाविक था । सौभाग्य से एक दो बार जयपुर राजसभा के प्रधान पण्डित विद्यावाचस्पति समीक्षाचक्रवर्त्ती गुरुवर श्रीमधुसूधनजी ओझा के श्रीमुख से वैदिकसाहित्य का प्रवचन सुनने का अवसर प्राप्त हुआ । उन एक प्रवचनों का लेखक के मानसजगत् पर इतना अमिट प्रभाव पड़ा कि जिस की प्रेरणा से इसे किसी अलक्षित ईश्वरीयसूत्र से आकर्षित होकर ओझा-जी की सेवा में वेदस्वाध्याय आरम्भ करना पड़ा । यह घटना सम्भवतः १५ वर्ष पहिले की है । तब से आज तक हमारा अध्ययन उसी रूप से चल रहा है । अध्ययनकाल में ही हमारा यह संकल्प होगया था कि इस समय वैज्ञानिक पद्धति से वैदिक साहित्य को राष्ट्रभाषा में जनता के सामने उपस्थित करना चाहिए । जब तक विज्ञानदृष्टि से आज की पढ़ी लिखी भारतीय जनता को उसे उस की धार्मिक आज्ञाओं का रहस्य न बतला दिया जायगा, तब तक विज्ञानप्रधान पाश्चात्य देशों के संसर्ग से उखड़ी हुई धर्मश्रद्धा कथमपि पुनः प्रतिष्ठित नहीं हो सकती । अपने इसी विचार को कार्यरूप में परिणित करने के लिए
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• प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ पृष्ठ लिखे गये, एवं आज भी हमारा वैदिक साहित्य के भिन्न भिन्न विषयों पर लगभग ४० सहस्र शतपथ ब्राह्मण का विज्ञानभाष्य यह कार्य यथावत् चल रहा है । ब्राह्मणग्रन्थों में सुप्रसिद्ध मुण्ड - माण्डूक्यादि लगभग ८००० पृष्ठों में संपन्न हुआ है । इस के अतिरिक्त ईश - केन- कठ प्रश्न-, हिन्दुत्योंहारों का उपनिषदूविज्ञानभाष्य, गीताविज्ञानभाष्य, पुराण रहस्य, श्राद्धविज्ञान सर्वविद्यानिधानत्वम् ( संस्कृत वैज्ञानिकरहस्य, हमारे संशय एवं उनका निराकरण, वेदस्य में ), आदि ग्रन्थ संपन्नप्राय हैं । रहता हुआ प्रभूत-यह निर्विवाद है कि एक साहित्यसेवी सतत स्वाध्याय में निमग्न को ही रहता है 1 । अपनी इसी असमर्थता द्रव्य साध्य साहित्य का प्रकाशन करने में असमर्थ की यात्रा की थी । बम्बई में लगभग दूर करने के लिए कुछ समय पूर्व हमने बम्बई एवं कलकत्त साहित्य प्रयास से जनता का ध्यान इस ७ मास के चिर प्रयास से, एवं कलकत्ते में ३ मास के न । फल दोनों हीं जगह सन्तोषप्रद की उपादेयता, एवं श्रावश्यकता की ओर आकर्षित हुआ यात्रा-का कार्य आरम्भ किया गया । उक्त हुआ । फिर भी जो कुछ हुआ उसी के बल पर प्रकाशन । से प्रकाशन आरम्भ किया था यों से पहिले ही हमने शतपथभाष्य का मासिक पुस्तकरूप है । भी हो चुके हैं । यह सौभाग्य का विषय इस के तीन वर्ष में लगभग १२०० पृष्ठ प्रकाशित इस अमूल्य सम्मतिएं भेजते हुए कि देश के सभी गण्यमान्य विद्वानों ने उक्त भाष्य पर अपनी के प्राप्त द्रव्य से इशोपनि-साहित्य को परम उपयोगी बतलाया है । इस के बाद बम्बईसमिति हुआ है । यह भाष्य १०० षविज्ञानभाष्य का प्रथम खण्ड, एवं द्वितीयखण्ड प्रकाशित ही पृष्ठों में संपन्न हुआ है । उचित तो यह था कि पहिले हम उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका न थी । फलतः ईशभाष्य प्रका-प्रकाशित करते, परन्तु उस समय इस की प्रेस काँपी तय्यार का के बाद क्या प्रकाशित होगा? इस शन के अनन्तर इस का प्रकाशन करना पड़ा । इस सद्बुद्धि पर निर्भर है, जो कि इन उत्तर कालपुरुष पर निर्भर है । अथवा उन धनिकों की एवं जगत् की निन्दा - स्तुतियों का कार्यों के सञ्चालक हैं । हम अपने कर्तव्य पर दृढ़ हैं, का कर्त्तव्य देश के सामने है, वह समादर करते हुए इसी प्रकार मरणपय्र्यन्त दृढ़ रहेंगे । देश जैसा ठीक समझे करै । ७४
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|| भूमिका | उपनिषत - गीता - व्याससूत्र तीनों की समष्टि विद्वत्समाज में प्रस्थानत्रयी नाम से प्रसिद्ध है । भारतवर्ष की सभी सम्प्रदाएं इस त्रयी के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । फलतः सभी सम्प्र-दायाचार्यों नें इन पर अपनें अपने स्वतन्त्र भाष्य लिखे हैं | इतर पाश्चात्य एवं पूर्वीय विद्वानों नें भी इस त्रयीसमुद्र का भलीभांति मन्थन किया है । आजदिन प्रायः सभी भाषाओं में त्रयी का उपबृंहण उपलब्ध हो रहा है । ऐसी स्थिति में हमसे यह पूंछा जा सकता है कि - " जब उप-निषदादि के अर्थ समझने की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है तो फिर यह व्यर्थ का साहस क्यों किया जाता है? | इस प्रश्न के सम्बन्ध में अधिक कुछ न कह कर हम केवल यही कहना पर्य्याप्त समझते हैं — कि ' आज तक उपनिषदादि पर जितने भाष्य लिखे गए हैं, वे सब दर्शनमर्यादा से आक्रान्त हैं । साथ ही में सभी सम्प्रदायाचार्यों ने इसे अपने घर की ( स्वाभिमत मत की ) प्रातित्विक वस्तु बनाने की विफल चेष्टा की है । किसी आचार्य की दृष्टि से उपनिषदें अद्वैतत्व का प्रतिपादन करतीं हुईं खण्डब्रह्म का निरूपण करतीं हैं । किसी की दृष्टि में द्वैत का, किसी की में विशुद्धाद्वैत का, किसी की में विशिष्टाद्वैत का, किसी की में द्वैताद्वैत का प्रतिपादन है । परन्तु हमारी दृष्टि म उपनिषदें विज्ञानसहकृत अध्यात्मतत्व की निरूपिकाएं हैं, जैसा कि - " उपनिषदों में क्या है? " इस प्रश्न के समाधान में स्पष्ट हो जायगा । विज्ञानसिद्धान्त सम्पूर्ण विश्व के लिए समान है । वह एक देशी नहीं, अपितु सार्व-दैशिक है । इसी विज्ञानराशि को, जो कई शताब्दियों से विलुप्तप्राय थी, संसार के सामने रखने के लिए यह प्रयास है । इस भाष्य में, किंवा इस वैज्ञानिक साहित्य में आपको सर्वथा अपूर्वता मिलेगी । इस में प्राचीन भाष्यों के अर्थ की मीमांसा से यथाशक्ति बचने की चेष्टा की गई है । फिर भी यत्र तत्र सर्वथा सत्यसिद्धान्त की रक्षा के नाते " शत्रोरपि गुणा वाच्या दोषा वाच्या गुरो-रपि " इस व्याप्त वचन के अनुसार हमें प्राचीनों के सम्बन्ध में अपने सष्ट विचार प्रकट करने पड़े हैं । जिस महापुरुष ने अपनी ईश्वरदत्त अलौकिक प्रतिभा के बल पर अपनी आयु के ४० ७५
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3। प्रारम्भिक वक्तव्य ॥ के अमल रत्नों से संसार को प्रकाशित किया वर्ष लगा कर जिस वेदराशि का मन्थन कर विज्ञान यह सारा प्रयास उसी दिव्यविभूति का है, हम उस दिव्यपुरुष के उच्छिष्ट भोगी हैं, हमारा आगे इस सामान्य कृति को अपना कर प्रसाद है । हमतो निमित्त मात्र हैं । आशा है देश हमारी के लिए हमें उत्साहित करेगा । कर दिया जाता, परन्तु उचित था कि भूमिका भाग को यहीं समाप्त कर ग्रन्थ प्रारम्भ के अनुसार हमें भाषा का आश्रय लेना जैसा कि प्रारम्भ में हम निवेदन कर चुके हैं, लोकरुचि जाती है, की दृष्टि ग्रन्थ के मूल विषय पर पीछे पड़ा है । आधुनिक पाश्चात्यशिक्षादीक्षित विद्वानों है । " ग्रन्थ के रचयिता कौन एवं बहिरंग धम्र्मों की ओर उन का ध्यान पहिले आकर्षित होता विचारों की प्रधानता थी? ग्रन्थ थे? यह कब बना था? इस के निर्माणकाल में किन हैं? " इस सम्बन्ध में क्या विचार का अमुक नाम क्यों रक्खा गया? अन्य विद्वानों के हुए अनावश्यक लोकरुचि को लक्ष्य में रखते पहिले वे इन प्रश्नों का समाधान चाहते हैं । अतः, है । हमारा यह विश्वास ही नहीं होते हुए भी उक्त प्रश्नों के सम्बन्ध में कुछ कहना यावश्यक उठाया तो भूमिका को देखने का कष्ट अपितु दृढ़ निश्चय है कि यदि पाठकों ने आद्योपान्त इस इस के लिए गतार्थ हो जायगा । सभी उपनिषदों का निरूपणीय विषय सामान्यरूप से उन की चेष्टा की जायगी । सम्बन्ध में निम्न लिखित विषयों पर ही प्रकाश डालने जाता है? १ - उपनिषदों के आद्यन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया २ - उपनिषत् शब्द का अर्थ क्या है? ३ क्या उपनिषत् वेद है? ४ - उपनिषदों में क्या है? है? ५ - उपनिषत् ज्ञान का अधिकारी कौन ६ - उपनिषत् हमें क्या सिखाती है? } -७ - औपनिषद -ज्ञान के प्रवर्त्तक कौन थे? सम्बन्ध है? ८- ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषदों में परस्पर में क्या । - श्रुतिशब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एकदृष्टि ७६
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भूमिका उक्त प्रश्न जितने ही सरल हैं, इन का उत्तर उतना ही कठिन है । उत्तर का अभाव इस कठिनता का कारण नहीं है, अपितु धार्मिकजगत् की जड़श्रद्धा ने ही इन प्रश्नों का उत्तर कठिन बना रक्खा है । कुछ समय से ( जब से वैदिक स्वाध्याय छूटा है तब से ) यहां के विद्वानों की ऐसी प्रवृत्ति होगई है कि उन्होंने अपने घर में अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए जो अपना एक कल्पित सिद्धान्त बना रक्खा है, उस के विरुद्ध वे एक अक्षर भी सुनना नहीं चाहते, चाहे फिर वह विचार शास्त्र एवं युक्तिसङ्गत ही क्यों न हो । यद्यपि - " यस्तर्केणानुसंधते स धर्म वेद नेतरः " यह भी उन्हीं के प्राप्त पुरुषों का सिद्धान्त है, परन्तु आज कल उन की दृष्टि में इस सिद्धान्त का भी कोई मूल्य नहीं है । बस हमारी कठिनता का यही कारण है । परन्तु कोई चिन्ता नहीं । संभव है हमारा यह प्रयास उन्हें वास्तविक स्थिति का परिचय करा सके । इसी सम्भूतिद्वारा असम्भूति के विनाश के लिए क्रमप्राप्त मंगल रहस्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । : 0: प्रारम्भिक निवेदन समाप्त जयपुर - राजधानी विज्ञानमन्दिर - भूराठीचा जयपुर, ( राजपूताना ) विद्वद्भिर्विधेयः-मोतीलाल शर्मा - गौड़: : 0: