Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 181–190

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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पृष्ठ 182

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5 11 T: 11 मंगलरहस्य त

मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते, वीरपुरुषकाणि भवन्ति ।

आयुष्यत पुरुषकाणि, चाध्येतारश्च वृद्धियुक्ता तथा स्युः ॥

क पनिषदों के प्रान्त में मङ्गलपाठ का विधान है । इस सम्बन्ध में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि प्राद्यन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया जाता है? प्रकृत प्रकरण में इसी प्रश्न के समाधान की चेष्टा की गई है । भारतवर्ष में उपलब्ध होने वाले जितनें भी प्रास्तिक ग्रन्थ हैं, उन सब के आरम्भ में गणेशस्तव, अमि, लक्ष्मी, विष्णु, दुर्गा, श्रों, इत्यादि रूप से मगंल उपलब्ध होता है । इस के अतिरिक्त सनातनधर्मी जगत् के जितनें कर्म्म हैं, उन सब का आरम्भ मंगलपाठ से ही होता है । यदि हम किसी को व्यवहार में पत्र लिखते हैं तो उस के प्रारम्भ में भी " श्रीः " " श्रीरामजी " " श्रीगणेशाय-नमः ” “ श्रतत्सद्ब्रह्मणेनमः ” “ श्रीवल्लभायनमः ” “ श्रीदुर्गायै नमः " इत्यादि रूप से मंगल -विधाता इष्टदेव का स्मरण करना चिरन्तन पद्धति में श्रन्तर्भूत हो रहा है । सचमुच यह हमारी उदात्त भावना है । मनोविज्ञान ( Cycloige ) के सिद्धान्त के अनुसार - " जा की रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी जिन तैसी " यह भाव सर्वसम्मत है । हम अपने जीवन में, अपने मानस-जगत में जैसे भावों की प्रधानता रखते हैं, तदनुसार ही हमारे आत्मा के साथ फलाफल का सम्बन्ध होता है । इस सद्भावना के लिए ही हमारे जीवन के सब कर्म, हमारे देश के सब आतिक ग्रन्थ उक्त मंगलभावना से युक्त रहते हैं । " स्वस्ति " भाष ही हमारे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है । इस स्वस्तिभावना को दृढ़ करने के लिए ही मंगलपाठ आवश्यक है । " श्रेयांसि बहु विघ्नानि " इस सुप्रसिद्ध वृद्धव्यवहार के अनुसार प्रत्येक श्रेयकर्म्म ( शुभ कर्म्म ) में अवश्य ही विघ्न श्राया करते हैं । सांसारिक कर्म श्रेय, प्रेय, श्रेयमेय भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । २.

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भूमिका || मङ्गल रहस्य | श्रेय - प्रेय आसक्ति-हैं । आत्मोन्नतिलक्षण कर्म श्रेय हैं, यह तीनों कर्म्म अधिकारी भेद से सुव्यवस्थित हैं I । सीधी भाषा में सम्पादकलक्षण कर्म्म श्रेयप्रेय लक्षण कर्म्म प्रेय हैं, एवं उभयलोकसम्पत् रुचिकर इन नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । इन तीनों को हम हितकर, रुचिकर, हितकर- होता हुआ हितकर अवश्य है, परन्तु एक ज्वरात रोगी के लिए चिरायते का काढ़ा ज्वरविनाशक रुचिकर नहीं है । इसी में चढ़ जाते हैं, क्योंकि यह काढ़ा पीते समय रोगी के प्राण ब्रह्माण्ड हितकर नहीं । मद्यपी के लिए रुचिकर अवश्य है, परन्तु रोगी के लिए अन्न खाना किसी अंश में भ्रमण, का सात्विक भोजन, स्वास्थ्यवर्द्धक मद्य रुचिकर है, परन्तु हितकर नहीं है । प्रतिदिन भी हैं । हितकर कम्मों में बुद्धि हितकर भी हैं, रुचिकर स्वकर्त्तव्यकर्म्म में नवणता आदि कर्म्म की प्रधानता है, एवं हितकर रुचिकर कम्मों में बुद्धि एवं की प्रधानता है, रुचिकर कम्मों में मन में मन की प्रधानता से सम्बन्ध रखने वाले केवल रुचि-मन दोनों का सामञ्जस्य है । इन तीनों है, परिणाम में यही विषो-नाश के कारण हैं । इन आरम्भ में रुचि कर कर्म्म प्रत्येक दशा में कर्म्म हैं । शेष दोनों ( हित. विषयोपभोग आदि सब ऐसे ही पम हैं, दु: खद हैं । अनियमित राग - द्वेष, अधिकारी, एवं लौकिक अधिकारी भेद से व्यवस्थित हैं । कर एवं हितकर - रुचिकर ) कर्म्म अलौकिक आत्मचिन्तन का ही अधिकारी अधिकारी है । यह विशुद्ध गृहस्थाश्रम में प्रतिष्ठित व्यक्ति लौकिक पुत्र- कलत्र परिपालन, अर्थोपार्जन, सम्ब नहीं है । इसे श्रात्मचिन्तन के साथ साथ सांसारिक लेना आवश्यक आदि लौकिक कम्मों का आश्रय न्धियों के साथ यथा योग्य व्यवहार गृहस्थकर्म के सम्यक् परिपालन के हो जाता है । ऐसी स्थिति में अपने इस उभयधर्म्मविच्छिन्न के जितने कम हैं, सब रखना पड़ता है । गृहस्थाश्रम लिए इसे बुद्धि एवं मन दोनों का सामञ्जस्य में इस उमयकर्म का प्रकार यथाशास्त्र गृहस्थाश्रम मैं श्रेय प्रेय दोनों का समावेश है । इस, संन्यास आश्रम में अधिकारी क्रमशः वानप्रस्थ अनुष्ठान समाप्त करने के अनन्तर यही लौकिक हुआ, बुद्धिप्रधान की ओर से उदासीन बनता प्रविष्ट होता हुआ, लौकिक व्यावहारिक कम्मों बनता हुआ अलौकिक होता हुआ, विशुद्ध आत्मनिष्ठ विशुद्ध श्रेय कम्मों के अनुष्ठान में प्रवृत्त जन्मसाफल्य है । उपनिषत का परमपुरुषार्थ है, अधिकारी बन जाता है । यही इस पुरुष का प्रतिपादन करती है । अतएव उसने आत्मविद्या शास्त्र है, वह एकमात्र आत्मनिष्ठा

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भूमिका -- || मङ्गल रहस्य ॥ श्रेय - प्रेय श्रेय प्रेय इन दो विभागों को ही प्रधानता दी है । मध्य का उभयाधिकारी लौकिक कोटि में आता हुआ उपनिषत् की दृष्टि में प्रेय कोटि में ही अन्तर्भूत है । इस प्रकार संसार में श्रेय - प्रेय दो विरुद्ध भावों का साम्राज्य हो रहा । एक ओर इन्द्रियाराम, विषयोपभोग, अर्थलिप्सा, स्वार्थपरायं-गाता, नास्तिक्य श्यादि रुचिकर भावों की प्रधानता है, दूसरी ओर इन्द्रियसंयम, विषयोपराम, निःस्पृहा, परमार्थबुद्धि, आस्तिक्य आदि हितकर भावों की प्रधानता है । योगक्षेम को ही जीवन का परमपुरुषार्थ मानने वाले, आहार - निद्रा - भय - मैथुन आदि पशुधम्मों को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य समझने वाले, केवल मानस व्यापार को प्रधानता देने वाले, अतएव मन्दबुद्धि लोग उक्त दोनों कम्मों में से " प्रेम " मार्ग का श्राश्रय लेने में ही अपने आप को कृतकृत्य समझने लगते हैं । " जीवन भोजन के लिए है " यही इन का आराध्य मन्त्र है । ठीक इस के विपरीत - " भोजन जीवन के लिए है " इस रहस्य को समझने वाले, आत्माभ्युदय को ही परमपुरुषार्थ मानने वाले, बुद्धिव्यापार को प्रधानता देने वाले, अतएव " धीर " लोग उक्त दोनों कम्मों में से " श्रेय " मार्ग को ही अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझते हैं । इन दोनों में से श्रेयमार्गावलम्बी अलौकिक अधिकारी साधुभाव के अधिकारी बनते हैं, एवं प्रेयमार्गावलम्बी लौकिक अधिकारीलक्ष्यच्युत होजाते हैं । इन्हीं दोनों बिरुद्ध भावों का दिग्दर्शन कराती हुई उपनिषच्छ्रुति कहती है— * ग्रन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानायें पुरुषं सिनीतः ॥ तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥

श्रेयश्व प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ॥ श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्दृणीते ॥ २ ॥

( कठोपनिषत् १ ० | २ | ०११-२- मं ० ) । निष्कर्ष यही हुआ कि आत्मनिष्ठ अलौकिक, व्यहारनिष्ठ लौकिक, एवं पतनोन्मुख * इस विषय का विशद विवेचन कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य में देखना चाहिए ।

पृष्ठ 185

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भूमिका । मङ्गलरहस्य ॥ अधिकारी हो रहे हैं । इन में श्रारण्यकों लौकिक भेद से तीन प्रकार के अधिकारियों में उक्त तीनों कर्म्म विभक्त के लक्ष्य व्यव-एवं उपनिषदों के लक्ष्य आत्मनिष्ठ अलौकिक अधिकारी हैं, एवं ब्राह्मणग्रन्थ हुए सर्वथा लक्ष्य-हारनिष्ठ लौकिक अधिकारी हैं । तीसरे अधिकारी शास्त्रनिष्ठा से बहिभूत होते च्युत हैं । ३ – सन्यासक २ – बानप्रस्थकर्म-→ उपनिषद मार्ग __ → आरण्यकमार्ग-> उत्तमाधिकारी -२– { १ – गृहस्थकर्म्म-→ ब्राह्मणमार्ग-> मध्यमाधिकारी मार्ग ( कुपथ ) ----# अधमाधिकारी ३– { ० — शास्त्रविरुद्धकर्म्म– १ – उत्तमाधिकारी, श्रात्मनिष्ठ अलौकिक धीरपुरुष -२ – मध्यमाधिकारी, व्यवहारनिष्ठ लौकिक पुरुष -३ - अधमाधिकारी, पतनोन्मुख निष्ठाशून्य पुरुष-श्रेयमार्गानुगामी → - >>श्रेयमेयमार्गानुगामी > मेयमार्गानुगामी १ - श्रेयक -. > बुद्धिप्रधान हितकरकम्प --निःश्रेयसजनक । २- श्रेय प्रेयकर्म्म. ३ – प्रेयकर्म्य-। उभयप्रधान हितकर रुचिकरकर्म्य - अभ्युदयनिःश्रेयसजनक मनःप्रधान रुचिकरकम- -- प्रत्यवायजनक । विघ्न के स्थान में मङ्गल-जो मनुष्य प्रेयकम्मों में रत हैं, उन के लिए भासुरीसंपति ध्याव देवतास्मरणात्मक मंगलपाठ की कोई प्रद है । फलतः इन्हें अपनें कम्मों में विघ्नविनाशमूलक असुर-वाले व्यवहारनिष्ठ मनुष्य को जहां श्यकता नहीं रहती । श्रेयप्रेयकम्मों का अनुष्ठान करने वहां उसे ईश्वरोपासन, दिव्यषोडशसंस्कार भावमूलक प्रेयकर्म्म का अनुगमन करना पड़ता है,, विघ्न-है । ऐसी स्थिति में नित्यसहचारी आदि दैवभावमुलक श्रेयकर्म्म को भी अपनाना पड़ता इसे अपने । इस दुरित को दूर करने के लिए प्रर्वतक असुरों की कृपा का होना अनिवार्य होजाता है उत्तमा-हैं विशुद्ध श्रेयोऽनुगामी श्रात्मनिष्ठ दिव्यकम्मों में मंगल का आश्रय लेना पड़ता है । तोसरे का प्रबल इन श्रेयकम्मों में आसुरभाव धिकारी । यहां केवल दैवीसंपत् का साम्राज्य है । फलतः

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भूमिका ॥ मङ्गतरहस्य 11 उभयतो - नमस्कार आक्रमण होना अनिवार्य है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रख कर " श्रेयांसि बहु विघ्नानि " यह कहा गया है । इन कम्मों में विघ्न बहुत हैं, एवं प्रबल हैं । इसी प्राबल्य के कारण जहां ओर ग्रन्थों के आरम्भ में मंगलपाठ किया जाता है, वहां आत्मोपयिक आत्मीय कम्मों का प्रतिपादन करने वाले उपनिषद्ग्रन्थों के आद्यन्त में मंगलपाठ करना उसी प्रकार श्रावश्यक होजाता है, जैसे कि क्रोधमूर्त्ति रुद्र के लिए उभयतो - नमस्कार । देवताओं में रुद्र देवता संहारक माने गए हैं । इन के इस भीषण क्रोध को शान्त करने के किए -श्रादिनमस्कार ( " नमो बलशाय व्याधिनेऽन्नानां पतये नमः ” । " नमो भवस्य स्यै जगतां पतये • नमः ” " नमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणां पतये नमः ” ' नमः - मृतायादन्त्यै वनानां पतये नमः ' अन्तनमस्कार ( यजुः सं ० १६१८ ] ) इत्यादि रूप से आदि एवं अन्त में दो दो बार नमस्कार किया जाता है । उपनिषदों के अन्त में मङ्गलपाठ क्यों किया जाता है? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । प्रकारान्त से विचार कीजिए । जिन कार्यों से श्रात्मोन्नति होती है, आत्मा का अभ्युदय होता है, वे सब शुभ कर्म्म हैं, एवं आध्मपतन के हेतुभूत प्रत्यवायजनक सारे कर्म अशुभ हैं । विद्यासमुचित यज्ञ - तप- दानरूप निवृत्ति सत्कर्म्म, विद्यासमुचित यज्ञतपदानलक्षण प्रह तिसतकर्म्म, विद्यानिरपेक्ष इष्ट - प्रापूर्त्त दत्तरूप प्रवृत्तिसवर्कम्म यह तीन विभाग शुभकर्म के हैं, एवं विद्यानिरपेक्ष शास्त्रनिषिद्ध असतकम् अशुभ कर्म कहलाते हैं । इन चारों का १-२-१ इस क्रम से विभाजन समझना चाहिए, जैसा कि निम्न लिखित परिलेख से स्पष्ट होजाता है ।

पृष्ठ 187

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भूमिका 1.03 मङ्गलरहस्य -१-१ वि ० सा ० निवृत्तिक-२- १ - वि ० सा ० प्रवृत्तिकर्म्म. ३-२ - वि ० नि ० प्रवृत्तिक ४ - १ - अशास्त्रीयकर्म-माहिष्य. > श्रेयकर्म्म- → आत्मनिष्ठ ( अलौकिक ) । ← श्रेयमेयक व्यवहारनिष्ठ ( लौकिक ) । > मेयकर्म निष्ठाच्युत ( उभयतो भ्रष्ट ) । शुभ कर्मो का उदय दैवीसंपद से होता है, एवं शुभकर्म का आक्रमण आसुरीसंपत् से होता है । देवता एवं प्रमुरो मेंश्रश्वमाहिष्य ( सहजवैर ) है । देवता ज्योतिर्मय हैं, असुर स्पर्द्धा तमोमय हैं । प्रकाश एवं अन्धकार अत्यन्त विरुद्ध इन दोनों प्रतिद्वन्द्वी भावों में निरन्तर * “ सौय्या ' वा अश्वः ” ( गो ० प्रा ० उ ०३।१६ ) इस सामसिद्धान्त के अनुसार अश्व पशु में सौरप्राण से प्रतिष्ठित है । यद्यपि - " वारुणो ( इन्द्र ) की प्रधानता है । उधर महिष पशु में वारूण प्याण प्रधानरूप माना गया है, हिं देवतया अश्व: " ( तै ० त्रा ०१ / ७ / २ / ६ ) इत्यादि रूप से अश्वपशु को सोय्यवत् वारुण भी समझना चाहिए । सौर रश्मि-परन्तु वहां वारुण से सौरप्राणयुक्त वेन नाम का ज्येतिर्मय पानी ही विवादित अप्सु योनिर्वा मण्डल में प्रविष्ट पारमेष्ठ्य वारुण भाग ही अश्वपशु की योनि है । इसी आधार पर - " का प्रभुत्व है । सूर्य्य-अश्वः " ( तै ० ब्रा ०३ | - | ४, ३ ) यह कहा जाता है । उधर महिषपशु में विशुद्ध चाप्यप्राण है ) के बाहर मण्डल की अन्तिम सीमा ( जो कि चार्य सर्वस्त्र ( पुराण ) में ' लोकालोक ' नाम से प्रसिद्ध इस ग्रह का पारमेष्ठ्य पानी का साम्राज्य है । इसी लोकालोक स्थान पर सूर्योपग्रहभूत शनि की सत्ता है । से विरुद्ध दिक् में रहने जो भाग सूर्य की ओर रहता है, प्रकाशित वही श्रर्द्धभाग धर्म्मराज है । एवं सूर्य्य ज्योति तम में तारतम्य वाला तमोमय श्रर्द्धमाग यमराज है । वही यम है, वही धर्म है । केवल होता है । है । इनमें से तमोमय शनितेजः प्रधान याप्यप्राण से ही महिष पशु का निम्मार्ण माना जाता माहिष ही उस की प्रतिष्ठा है । अतएव निदानविद्या के अनुसार महिष को यमराज का वाहन है । इस प्राकृतिक स्थिति से प्रकृत में यही बतलाना है कि पूर्वदिक्स्थ सूर्य्य ( इन्द्र एक ), एवं ज्योतिर्मय पश्चिमदिक्स्थ है तो वरुण इन दोनों दिक्पालों में सहजबर है । एक देवेन्द्र है, दूसरा असुरेन्द्र एवं है । महिष में सहज वैर होना दूसरा तमोमय है । श्रतएव इन दोनों प्रतिद्वन्द्वी देवताओं से कृतात्मा अश्व सहजवैर के स्पष्टीकरण के लिए स्वाभाविक होजाता है । इसी प्रणविज्ञान के आधार पर संस्कृत साहित्य में को कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य " अश्वमाहिष्य ” न्याय प्रचलित है । इस विषय की विशेष जिज्ञासा रखने वालों देखना चाहिए । 1

पृष्ठ 188

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भूमिका -- || मङ्गल रहस्य 11. देवासुरसम्प चलती रहती है । " जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ” इस नैगमिक सिद्धान्त के अनुसार देवप्राण एवं असुरमाण दोनों प्राणदेवता + स्थावरजङ्गमात्मक विश्व के उपादान हैं । सुतरां इन दोनों से उत्पन्न विश्व के प्रत्येक पदार्थ में दैवासुरसंपत्ति की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इसी आधार पर - - ' " गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी " यह आभाणक प्रसिद्ध है । जिन पदार्थों में वह पदार्थ जड़ हो, अथवा चेतन ) दैवी संपत्ति अधिक होती है, वे सब सात्विक हैं । जिन में आसुरी सम्पत्ति को प्रधानता रहती है, वे सब पदार्थ तामस हैं । एवं दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित, अतएव देवासुर के सामञ्जस्यरूप उभयधर्मावच्छिन्न पदार्थ राजस हैं । देवप्रधान सत्वभाव, असुरप्रधान तमोभाव, एवं उभयप्रधान रजोभाव के कारण ही पूर्व-प्रतिपादित श्रेयादि मर्यादाएं प्रतिष्ठित हैं । १ – देववलप्रधान सात्विकभावयुक्त पुरुष - श्रेयोमार्गानुगामी आत्मनिष्ठ २ – उभयवलप्रधान राजसभावयुक्त पुरुष – उभयमार्गानुगामी व्यवहारनिष्ठ । ३ – असुरबलप्रधान तामसभावयुक्त पुरुष - प्रयोमार्गानुगामी निष्ठाच्युत । शुभकर्म की प्रेरणा अन्तरात्मस्थ सत्वभावप्रवर्तक देवता की प्रेरणा है । देवता के साथ ही उसी स्थान में देवविरोधी तमोभावप्रवर्तक असुर भी अवस्थित हैं । देवप्राण की स्वाभाविक प्रेरणा का विरोध करना इस घासुरप्राण का नैसर्गिक धर्म है । सौभाग्य से यदि देवता का बल अधिक होता है तो वे असुर दिव्य कर्म्म में विघ्न करने में असमर्थ रहते हैं । यदि असुर-बल का प्रभुत्व है तो कार्यविनष्टि है । वस्तुतस्तु चाहे देवबल कितना ही प्रबल क्यों न हो, फिर भी आसुरभाव का विघ्नरूप याक्रमण सर्वात्मना नहीं रोका जासकता । कारण इस का यही + देव शब्द केवल ३३ सौरप्राणों का ही वाचक है, परन्तु देवता शब्द देव असुर- पितर- गन्र्धव-ऋषि आदि प्राणामात्र का वाचक है । इस विषय का विशद विवेचन शतपथ विज्ञानभाष्यान्तर्गत अष्टविध-देवताविज्ञान नाम के प्रकरण में देखना चाहिए ।

पृष्ठ 189

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भूमिका -29 || भङ्गल रहस्य || --सुरविनाभाव । इन दोनों में ज्ञानतत्व है कि ज्ञान एवं कम्म दोनों ही ईश्वर प्रजापति की नित्य विभूतिएं हैं १ है, एवं कर्म्मत सतकर्म, अक सवज्ञान, अज्ञान, विरुद्धज्ञान भेद से तीन भागों में विभक्त , एवं विकर्म भेद से तीन भागों में विभक्त है । ज्ञान - कर्म के इन ६ यों विवत्तों में सवज्ञान हैं । यही कारण है कि सत्कर्म यह दो तो दैवी विभूतिएं हैं, एवं शेष चारों आसुरी विभूतिएं अशान्तिभाव संसार में दैवीसम्पत्तिमूलक शान्तिभाव अत्यल्पमात्रा में है, एवं आसुरीसम्पत्तिमूलक के अनुसार भी ज्योतिर्म्मय का साम्राज्य अधिक स्थान तक व्याप्त होरहा है । देवताविज्ञान गर्भ ही में आपोमय परमेष्ठीमण्डल के देवनाम के सौर दिव्यदेवता संख्या में ३३ ही हैं । साथ हैं । उधर आय-में उत्पन्न होन वाले सूर्य से विकसित यह प्राणदेवता असुरों के छोटे भाई आपोमय परमेष्ठी में उत्पन्न होने प्राणप्रधान असुर संख्या में देवताओं से तिगुनें ( १६ ) हैं, एवं हैं । असुर बल-के कारण यह देवताओं के बड़े भाई हैं । देवता सत्यसंहित हैं, विज्ञानघन अनुसार संहित बनते हुए असत्यसंहित हैं । " वलं वाव विज्ञानाद् भूयः " ( छा.उ.६ = । ) के रहना प्रकृतिसिद्ध है । फलतः प्रत्येक बलप्रधान विश्व में बलसंहित आसुरभाव का ही साम्राज्य जाता है । शुभ कार्य में इस सुरभाव का आक्रमण व्यवश्यंभावी बन के लिए ऋषियों ने प्रत्येक प्राकृतिक असुरों द्वारा होने वाले इसी विघ्नभाव को दूर करने आत्मा के अवयवरूप प्राण-कार्य्य के आदि - मध्य - मासान में मङ्गल की व्यवस्था की है । त्रिसत्य में मङ्गलपाठ किया जाता है । देवता भी त्रिसत्य ही हैं | इसी त्रिभाव के परिग्रह के लिए तीन स्थानों त्रिपर्व होता है । इसी साथ ही में प्रत्येक मङ्गल ग्रशान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! इस प्रकार मङ्गलरहस्य को लक्ष्य में रखकर अभियुक्त कहते हैं— I * " एतदेकमाचार्यस्य मङ्गलार्थमृष्यताम् । माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्य पहिला सूत्र है । महा-* भगवान् पाणिनिवीरचित अष्टाध्यायी क्रम के अनुसार " वृद्धिरादैच् " यह उन सब प्रयोजनों को अन्यथा भाष्यकार पतञ्जलि ने उक्त सूत्र के प्रयोजनों का विचार करते हुए अन्त में से सिद्ध हो जाते हैं तो फिर सिद्ध कर यह प्रश्न उठाया है कि - " जब कि उक्त प्रयोजन अन्यरूप ” इति ) ॥ “ वृद्धिरादैच ” सूत्र की क्या आवश्यकता रह जाती है? - ( कथं " वृद्धिरादैच्

पृष्ठ 190

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भूमिका ॥ मङ्गल रहस्य श. मर्यादा मङ्गलार्थं वृद्धिशब्दमा दितः प्रयुङ्क्ते । मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते, वीर-पुरुषकाणि भवन्ति, आयुष्मत् पुरुषकाणि, चाध्येतारश्च वृद्धियुक्ता तथा स्युरिति " ( पात ० महाभाष्य १।१ । ३ । ) । इति । न्यायशास्त्र के सुप्रसिद्ध कारिकावलीग्रन्थ में भी मंगल का उक्त फल ही बतलाया गया है, जैसा कि निम्न लिखित पतियों से स्पष्ट होजाता है— I * “ विघ्नविघाताय कृतं मङ्गलं शिष्यशिक्षायै निबध्नाति - " नूतनेति । +++ इत्थं च यत्र मङ्गल न दृश्येत, तत्रापि जन्मान्तरीयं तत् कल्प्यते । यत्र च सत्यपि मङ्गले समाप्तिर्न दृश्यते, तत्र बलवत्तरो विघ्नो, विघ्नप्राचुर्य इस आपत्ति का निराकरण करते हुए, सूत्र की सार्थकता प्रकट करते हुए आगे जाकर आचार्य कहते हैं कि चाचार्य ( पाणिनि ) के केवल इस एक ( वृद्धिरादैच् ) सूत्र को मङ्गलार्थ समझ कर सन्तोष कर लेना चाहिए । मङ्गलप्रिय, अतएव माङ्गलिक याचार्य श्रतिगहन व्याकरणशास्त्र के आदि में ( निर्विघ्न शास्त्रसमाप्ति के लिए ) मङ्गलसूचक वृद्धि शब्द का ग्रन्थ ( अष्टाध्यायी ) के आरम्भ में प्रयोग करते हैं । ( आस्तिक ) शास्त्र मङ्गल को आदि में रख कर हो प्रवृत्त होते हैं । “ इस मङ्गल से पढ़ने वाले आत्मदृष्ट्या वोर बनैं, दीर्घायु बनैं, एवं पढ़ाने वाले समृद्धि युक्त हों " यही इस मंगल का प्रयोजन है " । * “ विघ्नविनाश के लिए किया हुआ मंगल शिष्यों के शिक्षण के लिए ( शिष्यवर्ग इसी प्रकार मंगल करते रहैं, यह बतलाने के लिए ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में ) " नूतनजलधररुचये " इत्यादि रूप से मंगल का विधान करते हैं +++ ( त्रिना मंगल के विघ्न नष्ट नहीं होते, एवं बिना विघ्ननाश के ग्रन्थ संपन्न नहीं होता, जब यह निश्चित । सद्धान्त है तो जो ग्रन्थ संपन देखे जाते हैं, एवं जिन के आरम्भ में मंगल नहीं देखा जाता, वहां यही मानना पड़ता है कि इस ग्रन्थकार ने जन्मान्तर में अवश्य ही मंगल किया होगा । उसी सांस्कारिक मंगल प्रभाव से इस का ग्रन्थ निर्विघ्न पूर्ण हुआ है ) । अपिच जहां मंगल रहने पर भी ( कादम्बरी आदि में ) ग्रन्थ समाप्ति नहीं देखी जाती, उस सम्बन्ध में यही कहना पड़ेगा कि अवश्य ही या तो उस कर्म में कोई बहुत बड़ा विघ्न श्राया होगा, अथवा छोटे छोटे अनेक विघ्न आए होंगे । कारण बलवत्तर विघ्नविनाश में बल-बत्तर मंगल को ही कारणता है । प्राचीन नैय्यायिकों के मतानुसार यह मंगल विघ्ननाश का कारण बनता हुआ समाप्ति का कारण हैं । उधर नव्यनैय्यायिकों के मतानुसार मंगल केवल विघ्नविनाश का कारण है । ग्रन्थ की समाप्ति तो ग्रन्थकर्त्ता के प्रतिभावल पर ही लम्बित है " । १०