Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 191–200
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 191–200
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भूमिका --23 || भङ्गस्य ॥ प्रजापति । विघ्नध्वं वा बोध्यम् । प्रचुरस्यास्यैव बलवत्तरविघ्ननिवारणे कारणत्वम् विघ्नध्वंस एव फलं, सस्तु मङ्गलस्य द्वार्मित्याहुः प्राञ्चः । नव्यास्तु मङ्गलस्य ) समाप्तिस्तु बुद्धिप्रतिभादिकारणकलापाव " ( कारिकावली माना है । हमारा इस से कोई विरोध-इस प्रकार मंगलपाठ को विघ्नविनाश का मुख्य हेतु के मंगलपाठ की भी एक कारण है । परन्तु उपनिषदों नहीं है । व्यवश्य ही मङ्गलाचरण का यह गुहानिहित के साथ साथ और भी एक कारणता यहीं तक सीमित नहीं है । यहां विघ्नविनाश संसार सम्बन्ध की विच्युति रहस्य है । यहां श्रासुरभाव का आक्रमण प्रधान नहीं है, अपितु है । प्रकरण से स्पष्ट हो जाता की ही यहां प्रधान कारणता है, जैसा कि निम्न लिखित दशा में ' प्रजापति ' आत्मविद्याप्रतिपादकशास्त्र ही उपनिषत् है । आत्मतत्व सपरिग्रह दो भागों में विभक्त है । जीव प्रजापति कहलाने लगता है । यह प्रजापति ईश्वर - जीव भेद से है । परन्तु अविद्या अस्मिता - रागद्वेषादि ईश्वर - प्रजापति का अंश है, दूसरे शब्दों में वही अपने उस बनता हुआ यह जीव प्रजापति पाप्मा धम्र्मों के लेप से साञ्जन बनता हुआ, सलेप जीवात्मा है । " इन दोषों को हटा कर निरञ्जन, निर्लेप ईश्वर - प्रजापति की समता खो बैठता इल निरञ्जन ज्योतितत्व के साथ को शुद्ध निरञ्जन रूप में परिणत कर, उस व्यापक प्रतिपाद्य विषय है, मात्र उपनिषदों का प्रधान के समवलय का मार्ग बतला देना " ही एक में विस्तार से बतलाया जाने जैसा कि— “ उपनिषदों में क्या है? " इस प्रश्नसमाधानप्रकरण वाला है । पशुपति है, प्राण पाश है । प्रजापति में छात्मा - माण- पशु यह तीन कलाएं हैं । आत्मा तीसरा पशुभाग आत्मवित्त, किंवा पशुपति ने पाश से पशु को बांध रक्खा है । इन तीनों में में विभक्त - बहिर्वित्त भेद से दो भागों पशुपतिवित्त कहलाता । यह पशुपतिवित्त अन्तर्वित्त ( अन्तरङ्ग वित्त ) है । पत्नी सन्तान-है । सप्तधातुमय पाञ्चभौतिक शरीर आत्मा का अन्तवित्त हैं । ) है । दोनों ही वित्त आत्मा के भोग्य अनुचर - गृह - अन्न - द्रव्य आदि बहिवित्त ( बाह्य सम्पत्ति है, आत्मा भोक्ता भोग्यतत्व को ही विज्ञानभाषा में " पशु ' कहा जाता है । प्राण भोगसाधन ११
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भूमिका 2। मङ्गल रहस्य प्रजापत्यसंस्था है । भोग्य - भोगसाधन - भोक्ता इन तीनों की समष्टि ही एक प्राजापत्यसंस्था है । उपनिषदों की दृष्टि प्रधान रूप से यद्यपि प्रजापति की आत्मकला की ओर ही रहती है, तथापि आत्मतत्व चूंकि प्राण एवं पशु से अविनाभूत है, अतः अगत्या आत्मस्वरूप विवेचन के साथ साथ गौणरूप से उपनिषत् को प्राण और पशु स्वरूप पर भी प्रकाश डालना पड़ता है । भोगसाधनरूप प्राणतत्त्व 2 2 वाक् - प्राण - चक्षु - श्रोत्र - मन ( थ्प्राग्नेयप्राण- वायव्यप्राण - श्रादित्यप्राण - दिक्सौम्यप्राण- भाखरसौम्य-प्राण ) भेद से पांच भागों में विभक्त है । यह पांचों प्राण अपने अवयवी मुख्य प्राण में ( जो कि मुख्यप्राण " उद्गीथ " " उक्थ " " अङ्गी " आदि विविध नामों से व्यवहृत हुआ है ) बद्ध रहते हैं । एवं पञ्चप्राणात्मक यह मुख्य प्राण महदुक्थ रूप हृदयस्थ भोक्ता श्रात्मा में बद्ध रहता है । इसी आधार पर -- " यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश " ( मुण्डक उप ० ३।१।६ । ) यह कहा जाता है । इन प्राणों से, किंवा पञ्चप्राणात्मक मुख्य प्राण से शरीरादिरूप पशु भाग बद्ध है । इस परस्पर के ग्रन्थिबन्धन के कारण तीनों नित्य प्रविनाभूत हैं । एक दूसरे के बिना एक दूसरा अनुपपन्न है 1 । इसी लिए श्रात्मा को प्रधानरूप से लक्ष्य बनाता हुआ भी उपनिषच्छास्त्र उक्त ग्रन्थिबंधन से बद्ध प्राण एवं पशु को भी अपना निरूपणीय विषय बनाता है । ऐसी स्थिति में हम यह कह सकते हैं कि - " प्राजापत्यविद्या का ही नाम उपनिषद्विद्या है, उपनिषदों में प्रजापति का ही निरूपण हुआ है । " उक्त तीनों ( यात्मा - प्राण- पशु ) तत्वों का उपनिषत् में संचर - प्रतिसंचर रूप से निरूपण हुआ है । ज्ञानमार्ग प्रतिसंचर है, विज्ञानमार्ग संचर है । अनेक से एक की और जाना ज्ञान है, एक से अनेक की ओर थाना विज्ञान है । वृक्षमूल को आधार मान कर तूलरूप - शाखा-प्रशाखा - मनुशाखा - अनुपशाखा - पत्र - वृन्त - पुष्प - मञ्जरी - फल आदि का निरूपण करना विज्ञान है । शाखा प्रशाखादि नाना भावों को लक्ष्य बनाकर एक मूलवृक्ष पर इन सब नानाभावों का अवसान कर देना ज्ञान है । एक को उद्देश्य बना कर नानाभाव का विधान करना विज्ञान है, एवं नानाभाव को उद्देश्य मान कर एकत्व का विधान करना ज्ञान है । इन दोनों पक्षों का पूर्व प्रकरण में सप्रमाण निरूपण किया जा चुका है - ( देखिए प्रा ० नि ० पृ ० सं०४२-४८ ) । १२
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भूमिका --2 || मङ्गल रहस्य ॥ ॐ प्रतिसञ्चर अभ्युदय का करण होगा, ज्ञान बही यथार्थ होगा, जिस में विज्ञान अनुस्यूत होगा । विज्ञान वही का परिज्ञान के लिए नानाभावमूलक विश्व जिस का श्रालम्बन ज्ञान होगा । अद्वैतमूलक ज्ञानसम्पत्ति है " यह ज्ञान प्राप्त करने से नितान्त अपेक्षित है । “ सम्पूर्ण विश्व आत्ममय हैं, ईश्वरमय का ही वैभव है " यह विज्ञान पहिले “ सम्पूर्ण विश्व उस एक आत्मा का, एक प्रजापति है तो सब कुछ गतार्थ है, अन्यथा संपत्ति प्राप्त करना आवश्यक होगा । ज्ञान यदि विज्ञान सहित सब कुछ नष्ट है । जाचुका है । यह आत्म-श्रात्मविद्या, किंवा प्राजापत्यविद्या उपनिषद्विद्या है, यह कहा , अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, प्रपञ्च रस - बल के ग्रन्थिबन्धन तारतम्य से निर्विशेष, परात्पर में ) भेद से अनेक भागो में ( ११ भागों विकारक्षर, विश्वसृद्, पञ्चजन, पुरञ्जन, पुर, प्रजापति में परिणत होजाना ही विज्ञान है । एक ही विभक्त होजाता है । एक आत्मा का उक्त ११ रूपों इन उद्देश्य रूप से तत्तत् स्थलो में आत्मा इन नानाभावों में परिणत हो रहा है । उपनिषच्छास्त्र वह एकाकी है । साथ ही में विधेय कोटि में सभी नानारूपों का विशदरूप से निरूपण करता का के स्वरूपज्ञानपूर्वक नानाभाव श्रात्मतत्व को हमारे सामने रखता जाता है । " नानाभाव का मुख्य लक्ष्य है, यही ज्ञानपक्ष परियाग, एव एकतत्व की आराधना " ही उपनिषत् है । , जाया, आदि का मोह छोड़ो, " पशु, द्रव्य, अनुचर, गृह, माता, पिता, सन्तान नियमों को - ब्रह्मचर्य - एकान्तवास आदि राग - द्वेष का परित्याग करो, शमदम - तप - सस - अहिंसा को साथ विरक्ति पैदा करो, इन्द्रियों प्रज्ञानात्मा अपनाते हुए इन्द्रिय संयम द्वारा शारीर भोगों के में, महान् को अव्यक्तात्मा ( मन ) में, प्रज्ञान को विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) में, विज्ञान को महानात्मा में, वाक् अक्षर को अव्यय की वाक्कला में, अव्यक्त को आत्मक्षर में, आत्मक्षर को अक्षर में, में में, अव्ययमन को विज्ञानमयकोश को प्राण में, प्राण को श्वोवसीयस नाम के अव्ययमन हुए, विश्वप्रपञ्च से हुए, सर्वपरिग्रहशून्य बनते लोन करते हुए सर्वान्तरतम आनन्द में लीन होते जाओ ” यह निरञ्जन श्रात्मस्वरूपमात्र रह एकान्ततः बाहर निकलते हुए केवल निष्कैवल्य, १३
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भूमिका 3 मङ्गल रहस्य 11-वन्यधम जाओ, बढ़ाते बढ़ाते पशु-एक पक्ष है, एक मार्ग है । " मूल आत्मा के ऊपर उक्त परिग्रहों को बढ़ाते यह एक मार्ग है । एक में संसार भाग तक आत्मा को व्याप्त करते हुए संसार में लिप्त हो जाओ " । पहिला मुक्तिमार्ग का अनासक्तिपूर्वक परित्याग है, दूसरे में श्रासक्तिपूर्वक संसार का ग्रहण है दोनों मार्गों में से उपनिष-है, दूसरा बंधनमार्ग है । इन ज्ञान - विज्ञानप्रधान मुक्ति बंधनरूप हुआ, संसार की च्छास्त्र विज्ञानमार्ग को लक्ष्य बना कर धीरे धीरे उस से आत्मा को पृथक् करता पर पहुंचा देता है । प्रवृत्ति-बंधनमूला विभूतियों को हटाता हुआ जीवात्मा को विशुद्ध श्रात्मतत्व साध्य है । मार्ग उद्देश्य है, निवृत्तिमार्ग विधेय है । संसार साधन है, विश्वातीत श्रात्मा है, ब्रह्म साध्य दूसरे शब्दों में विज्ञान साधन है, ज्ञान साध्य है । प्रकारान्तर से कम साधन से पृथक् करती है, अतएव है । उपनिषत् हमें ( श्रात्मा को ) संसार से, दूसरे शब्दों में गृहस्थधर्म्म यह गृह्य धर्म्म नहीं है, अपितु वन्य धर्म है । , चौथा सन्यास पहिला आश्रम ब्रह्मचर्य है, दूसरा गृहस्थ है, तीसरा वानप्रस्थ है किया है । ज्ञान अमृत है । ऋषियों ने ज्ञान - कर्ममय आत्मा की पूर्णता के लिए उक्त श्राश्रम विभाग है, अनित्य है । " अमृतं तत्व है, सल्लक्षण है, नित्य है । कर्म्म मृत्युतत्व है, असल्लक्षण वाच्य श्रात्मा अवश्य ही चैत्र मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन " ( गी ० ६।१६ । ) के अनुसार अहं शब्द के अनुसार मनुष्य ज्ञान - कर्म्ममय है । “ शतायुर्वै पुरुषः " ( तै ० त्रा ०३ | ८ | ५ | ३ ) इस श्रौत सिद्धान्त में ज्ञानकर्ममय ईश्वरात्मा का की आयु १०० वर्ष की मानी गई है । इन १०० वर्षों की आयु में समर्थ बन जाय, यही इस अंशभूत यह जीवात्मा ज्ञान- कर्म्म पर सर्वात्मना अधिकार प्राप्त करने को गतार्थ बनाने के लिए ऋषियों नें पुरुषश्रेष्ठ का परम पुरुषार्थ है । शतायु पुरुष के इस पुरुषार्थ सूक्ष्म है । प्रकट इस की आयु के ५०-५० वर्षों के दो विभाग कर डाले हैं । कर्म्म स्थूल है, ज्ञान स्थूल कर्म्ममार्ग हमारे में कर्म्म स्फुट है, ज्ञान अन्तर्लीन है । अतएव ' स्थूलारुन्धति ' न्याय से पहले सामने रखा गया है, अनन्तर ज्ञानमार्ग का श्राश्रय लिया गया है । " कर्मकर्म्म यः पश्येत् - अर्म्मणि च कर्म्म यः " ( गी ०४।१८ ) के अनुसार कर्म १४
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भूमिका --23 || मङ्गलरहस्य । आश्रमव्यवस्था कर्म्म व्याप्त है । कर्म एवं ज्ञान दोनों श्रविनाभूत में * श्मकर्म ( ज्ञान ) व्याप्त है, एवं कर्म्म ( ज्ञान ) में अन्तर दोनों में केवल कर्म के अविकसित है । हैं । कर्म्म बिना ज्ञान के अनुपपन्न है, ज्ञान बिना साधन है । एवं है । कर्म्म साध्य है, ज्ञान यही है कि कर्म्ममार्ग में कर्म्म पुरुषार्थ है, ज्ञान क्रवथ । ज्ञान - कर्म्म के साध है, कर्म साधन है ज्ञानमार्ग में ज्ञान पुरुषार्थ है, कर्म क्रत्वर्थ है । ज्ञान के ५० वर्षों के भी ऋषियों नें कर्म्मप्रधान पूर्वायु इन्हीं पुरुषार्थ - क्रत्वर्थ भेदों को लक्ष्य में रख कर के भी कर डाले हैं, एवं ज्ञानप्रधान उत्तरायु ५० वर्षों २५-२५ वर्ष के हिसाब से दो विभाग के लिए के २५ वर्ष कम्मर्थ ज्ञानसम्पादन यही २५-२५ के दो विभाग मान लिए हैं । आरम्भ करने वाला है, है । आगे यह पुरुष जो कर्म्म नियत हैं । ब्रह्म ज्ञान है । यही पहिला ब्रह्मचर्याश्रम का मुख्य उद्देश्य प्राप्त करना ही इस प्रथमाश्रम तदर्थ ज्ञान सम्पादन करना, कर्म्म करने की योग्यता का अनुष्ठान गृहस्थाश्रम है । इस में कर्म्म है । २६ से ५० वर्ष पर्यन्त दूसरा विभाग है । यही ( ५१ होती है । आगे की तीसरी पञ्चविंशति करते हुए आत्मा के कर्म्म भाग की पूर्णता सम्पादित है, जो कि के लिए जो निवृत्त कर्म्म अपेक्षित से ७५ पर्यन्त ) वानप्रस्थाश्रम है । ज्ञान प्राप्ति इस तपःकर्म्म है, वानप्रस्थाश्रम में ज्ञानोपथिक निवृत्तकर्म " तपश्चर्या ” नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध इस के लिए घर में नहीं किया जा सकता, का ही अनुष्ठान किया जाता है । इस का अनुष्ठान नाम से यह धर्म्म वन्य किंवा आरण्यक संरार ( गृहस्थ ) छोड़ना आवश्यक होजाता है । अतएव । इस ( गी ०६।१० । ) यह कहा जाता है प्रसिद्ध है । इसी के सम्बन्ध में - " एका की यतचित्तात्मा " में विशुद्ध ) ज्ञानप्रधान संन्यासाश्रम है । इस के अनन्तर चौथी - पञ्चविंशति ( ७६ से १०० पर्यन्त उदय की सफलता से विशुद्ध ज्ञान का ज्ञानचर्या का ही अनुष्ठान किया जाता है । इस अनुष्ठान है, यही ब्रह्मज्ञान है, यही होजाता है, बन्धन मला हृद्ग्रन्थि टूट जाती है । यही औषनिषदज्ञान एवं उपनिषत् साधन साध्य विदेहमुक्ति है । ऐसा ही योगी जीवन्मुक्त कहलाता है । आरण्यक परन्तु हमारी दृष्टि में यहां ग्रकम्मं से विशुद्ध * इस अकर्म्म शब्द के व्याख्याताओं ने अनेक अर्थ किए रखने हैं । वालों को उक्त श्लोक का भाष्य ही देखना ज्ञान ही अभिप्रेत है | इस विषय की विशेष जिज्ञासा चाहिए । १५
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भूमिका .: । मङ्गल रहस्य ॥-निष्ठाद्वयी भाव के अभेद से एक हैं । आरण्यकमूला तपश्चर्या ही उपनिषन्मूला ज्ञानसंपत्ति के उदय का कारण है । यही कारण है कि ऋषियों नें “ बृहदारण्यकोपनिषत् " इत्यादि रूप से आरण्यक और उपनि-षत का एक साथ व्यवहार करने में कोई हानि नहीं समझी है । निष्कर्ष यही हुआ कि जो मनुष्य यथाविधि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता हुआ, गृह-स्थधर्म में दीक्षित होकर आश्रमधर्म्मानुकूल कर्ममार्ग में प्रवृत्त रहता हुआ, यथा समय वानप्रस्था-श्रम का आश्रय लेता हुआ अन्त में सन्यासधर्म में दीक्षित हो जाता है, वही ज्ञानकर्ममय आत्मा की इन दोनों विभूतियों पर विजय प्राप्त करता हुआ उस अमृतमृत्युमय पूर्णेश्वर के साथ सायुज्यभाव प्राप्त करने का अधिकार होता है । पूर्वकथनानुसार श्राश्रम यद्यपि चार हैं, तथापि उपकार्य - उपकारक भावों के अभेद के कारण दो आश्रम ही रह जाते हैं 1 । कमीश्रम पहिला है, ज्ञानाश्रम दूसरा है । कमीश्रम गृह-स्थ है, ज्ञानाश्रम सन्यास है 1 । ब्रह्मचर्य कर्म्माश्रम का उपकारक बनता हुआ इसी में अन्तर्भूत है, एवं वाननस्थ ज्ञानाश्रम का उपकारक बनता हुआ ज्ञानाश्रम में ही अन्तर्भूत है । कर्मप्रधानगृहस्था-श्रम प्रवृत्तिमय है, ज्ञानप्रधान सन्यासाश्रम निवृत्तिमय है । कर्म्मप्रधान गृहस्थ नानाभावापन्न होता हुआ विज्ञान कोटि में प्रविष्ट है, एवं ज्ञानप्रधान सन्यास एकत्वभाव से आक्रान्त रहता हुआ ज्ञान-कोटि में प्रविष्ट है । पहिलामार्ग ( कर्म्ममार्ग ) कर्मनिष्ठा, किंवा योगनिष्ठा है । दूसरा मार्ग ( ज्ञानमार्ग ) ज्ञाननिष्ठा, किंवा सांख्यनिष्ठा है । इन दोनों निष्ठाओं के समन्वय से ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप विकसित होता है । एक ही आत्मा की दो कलाएं हैं । “ एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ” ( गी ०५।५ । ) का यही रहस्य है । दोनों मार्ग भिन्न भिन्न हैं, लक्ष्य एक है । एक में सांसारिक अभ्युदय की प्राप्ति है, दूसरे में निःश्रेयसभाव की प्राप्ति है । दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि एक में सांसारिक सम्पत्ति का ग्रहण है, दूसरे में इस का परित्याग है । कामनाप्रधान कर्म्मकाण्ड का प्रतिपादक ग्रन्थ ब्राह्मण नाम से प्रसिद्ध है, एवं कामनाशून्य ज्ञानमार्ग का प्रतिपादक शास्त्र उपनिषत् नाम से व्यवहृत देखा जाता है ।
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भूमिका श्रश्रमविभागप्रदर्शन -- 2 || मङ्गल रहस्य ॥ १. — ब्रह्मचर्य - ज्ञानमार्ग----२ - गृहस्थ - - कर्ममार्ग--३ - वानप्रस्थ - कम्ममार्ग--ज्ञान - विज्ञान - उद्देश्य ( क्रत्वर्थज्ञान ) - २५ (.... ) → विरोध ( पुरुषार्थकर्म्म ) - २५ ( ५० ) → उद्देश्य ( क्रत्वर्थक ) - २५ ( ७५ ) ------ → ४ - सन्यास – ज्ञानमार्ग- → विधेय ( पुरुषार्थज्ञान ) – २५ ( १०० ) -ज्ञानम् । १ - कम्र्मोपकारक ज्ञानप्रधान प्रथमाश्रम ( साधनात्मकं ज्ञानम् ) - विश्वात्मकं । २ - ज्ञानोपकृत कर्म्मप्रधान द्वितीयाश्रम ( साध्यात्मकं कर्म्म ) - विश्वात्मकं कर्म्म कम्म । ३ - ज्ञानोपकारक कर्म्मप्रधान तृतीयाश्रम ( साधनात्मकं कर्म ) - आत्मोपयिकं ४- कर्मोपकृत ज्ञानप्रधान चतुर्थाश्रम ( साध्यात्मकं ज्ञानम् ) - आत्मोपयिकं ज्ञानम् । ( कमनिष्ठा योगनिष्ठा ) ( ज्ञाननिष्ठा सांख्यनिष्ठा ) १ - उपकारको ब्रह्मचर्याश्रमः > कम्म श्रमः - विज्ञानपक्षः ( ब्राह्मणम् ) १- उपकार्यो गृहस्थाश्रमः ' १ - उपकारको वानप्रस्थाश्रमः-२ - उपकार्यः सन्यासाश्रमः-→ ज्ञानाश्रमः - ज्ञानपक्षः ( उपनिषत् ) पूर्वप्रतिपादित आश्रमविज्ञान से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता पूणों आत्मनिष्ठ -सैषा कि औौषनिषद ज्ञान बन्धनों को छोड़ कर वन्यधम्मों के अधिकारी सन्यासी हैं, न कि गृहस्थी । जो महापुरुष सांसारिक के लिए जहां उपनिषच्छास्त्र का पालन करने के लिए ज्ञाननिष्ठा की ओर प्रवृत्त हो गए हैं, उन से - संपत्ति आदि सांसारिक परिकरों महामङ्गलप्रद है, ठीक इस के विपरीत जाया - पुत्र भृत्य - पशु अमङ्गल की भूमिका है । उपनिषद्विद्या युक्त सांसारिक एक गृहस्थी के लिए इस का अध्ययन को स्त्री- पुत्र सम्पत्ति आदि से का प्रधान लक्ष्य प्रतिसंचर मूलक मुक्तिभाव है । यह हमारी बुद्धि करवाती है । " तं यथा पृथक् करती है 1 । विज्ञान - मज्ञान आदि खण्ड आत्माओं से हमें अलग १७
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भूमिक ॥ मङ्गलरहस्य | शरीर त्रयो यथोपासते तथैव भवति ” ( छन्दोग्य उपनिषत् ) " श्रद्धापयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ” ( गीता ~~~~~~~~ ) इत्यादि श्रौतस्मात्त सिद्धान्तों के अनुसार विशुद्ध आत्मा की ओर लेजाने वाला उपनिषच्छास्त्र गृहस्थियों के लिए अवश्य ही अमङ्गल का कारण है । सन्यासधर्मेौपयिक उपनिषदों का अध्ययन हम गृहस्थियों के लिए अवश्य ही अहितकर है । तो क्या उपनिषदों का अध्ययन छोड़दें? ऋषि उत्तर देते हैं नहीं । हम तुम्हें एक ऐसा उपाय बतलादेते हैं कि गृहस्थाश्रम में प्रतिष्ठित रहते हुए भी तुम उपनिषदामृत का पान कर सकते हो । वह उपाय है- उपनिषदों के आद्यन्त में मङ्गलपाठ करना । मंगल से उपनिषज्जनित अमङ्गल एकान्ततः दूर हो जायगा । प्रज्ञा - पाण - भूत - भेद से अध्यात्मसंस्था में तीन शरीरों की सत्ता मानी गई है । दूसरे शब्दों में शरीर त्रयी का ही नाम अध्यात्मसंस्था है । प्रज्ञामात्रा कारणशरीर है, प्राणमात्रा सूक्ष्म-शरीर है, एवं भूतमात्रा स्थूलशरीर है । कारणशरीररूप आत्मा मनःप्रधान बनता हुआ आयुमय है, सूक्ष्मशरीर प्राणमय बनता हुआ इन्द्रियप्रधान है, एवं तीसरा स्थूलशरीर वाक्प्रधान बनता हुआ रसासृङ्मासमेदअस्थिमज्जामय है । साथ ही में यह स्मरण रखना चाहिए कि उक्त तीनों शरीरों शरीरों के में से तीसरे स्थूलशरीर में ही जाया - प्रजा आदि वहिर्वित्तों का अन्तर्भाव है । इन तीनों आरम्भक जहां क्रमशः प्रज्ञा - प्राण - भूत हैं, वहां इन तीनों के उपकारक, किंवा मूलाधार क्रमशः ( १ ) पार्थिव इन्द्र - वायु अग्नि देवता हैं । स्तौम्यत्रिलोकी रूपा महापृथिवी में त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न प्रदेश पृथिवीलोक है । इस के अधिष्ठाता अग्नि हैं । यह अग्नि भूतमात्राप्रधान बनता हुआ अर्थ-तत्व है । यही स्थूलशरीर की मूलप्रतिष्ठा है । पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न ( १५ ) पार्थिव प्रदेश अन्त-रिलोक है । इस के अतिष्ठावा देवता वायु हैं । यह वायु प्राणमात्राप्रधान बनता हुआ क्रियातल है । यही सूक्ष्मशरीरकी मूलप्रतिष्ठा है । एकविंशस्तोमावच्छिन्न ( २१ ) पार्थिव प्रदेश द्युलोक है, इस के शासक मघवा नाम के सौर इन्द्र देवता हैं । यह इन्द्र प्रज्ञाप्रधान बनता हुआ ज्ञानतत्व है, यही कारणशरीर की प्रतिष्ठा है । १८
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भूमिका -० ॥ मङ्गल रहस्य | देवत्रयी १ - प्रज्ञामात्रा — श्रात्मविवर्त्त - ज्ञानप्रधान - - एकविंश -- इन्द्रः - कारणशरीरम् २ - प्राणमात्रा - देवविवर्त्त --- क्रियापधान -- पञ्चदश – वायुः – सूक्ष्मशरीरम् १३- भूतमात्रा - भूतविवर्त्त - - अर्थप्रधान — त्रिवृत् -- अग्निः - स्थूलशरीरम् पार्थिव अग्नि ऋग्वेद की मूल प्रतिष्ठा है । यान्तरिक्ष्य वायु यजुर्वेद का मूलाधार है । दिव्यलोकस्थ इन्द्र, किंवा आदित्य सामवेद की आलम्बनभूमि है । इन तीनों लोकों का. एवं तीनों लोकों के अधिष्ठाता अग्नि वायु - इन्द्र तीनों देवताओं का प्रभव प्रतिष्ठा - परायणरूप चौथा सोम-लोक ( पारमेष्ठ्य लोक ) अथर्वा है । यह अथवा ब्रह्म ( सोम ) ही पार्थिव अग्नि में आहुत होकर घन-तरल - विरल भेद से एक ही पार्थिव व्यग्नि के अग्नि वायु - इन्द्र यह तीन विभाग कर डालता है, जैसा कि प्रज्ञानात्मप्रतिपादिका केनोपनिषत में विस्तार से बतलाया गया है । ऐसी स्थिति में सोमरूप, अतएव अन्नात्मक यथर्वब्रह्म का अन्नादरूपा अग्नित्रयी से अवछिन्ना वेदत्रयी में ही अन्तर्भात्र मान लेना न्यायसङ्गत है । अग्नि वायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थं ऋग - यजुः सामलक्षणम् ॥ ( मनुः १।३२ । ) इस मानव सिद्धान्त के अनुसार अग्नि वायु - रवि से ही क्रमः ऋतू - यजुः साम का प्रादुर्भाव हुआ है । इन तीनों में से क्रमशः अग्निमय पार्थिव ऋग्वेद, किंवा ऋङ्मय अग्नि का स्थूलशरीर के साथ सम्बन्ध है । स्थूलशरीर की मूलप्रतिष्ठा ऋग्वेद ही है । प्रत्येक वस्तुपिण्ड अग्नि-मय है । दूसरे शब्दों में जिन स्थूल पिण्डों का हम अपने चर्मचक्षुओं से प्रत्यक्ष कर रहे हैं, वे सब अग्निप्रधान हैं । इसी आधार पर - " यच्च किञ्चिद्दष्टिविषयकमग्निकम्मैव तत् ” ( यास्कनि ० दै ०७१८८।३ । ) यह नैगभिक सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । आन्तरिक्ष्य वायुमय यजुर्वेद, किंवा यजुर्मय वायु का सूक्ष्मशरीर के साथ सम्बन्ध है । सूक्ष्मशरीर की मूलप्रतिष्ठा यजुर्वेद ही है । यजु में यत् - एवं जू दो तत्व हैं, जैसा कि तीसरे प्रकरण में स्पष्ट होगा । इन दोनों में यत्तत्व ही गतिभत प्राण है । यही प्राणमात्रा का स्त्ररूपसमर्पक है । यही सूक्ष्मशरीर की मूलप्रतिष्ठा है । तीसरे आदित्यमय १६
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भूमिका .. || मङ्गल रहस्य | वेदत्रयी सामवेद, किंवा साममय आदित्य का कारणशरीर के साथ सम्बन्ध है । सामवेद ही कारण शरीर की मूलप्रतिष्ठा है । यादित्य ही कारणशरीररूप आयु का जनक है । आयु ही आत्मसंस्था की प्रतिष्ठा है । इसी आधार पर - " सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " ( यजुः सं ० १३।४६ । ) यह कहा गया है । १– रवि: -- -दिव्यः-: - - साममयः - कारण शरीर सञ्चालकस्तत्प्रतिष्ठा च । २ - वायु: - - आन्तरिक्ष्यः — — यजुर्मयः — सूक्ष्मशरीर सञ्चालकस्तत्प्रतिष्ठा च । १३- अग्निः- -- पार्थिवः-- ऋङ्मयः - स्थूलशरीरमवत्तकस्तत्प्रतिष्ठा च । उक्त कथन से यह भी भलीभांति सिद्ध होजाता है कि ऋग्वेद की जितनी भी उपनि-षदें हैं, उन सब के अध्ययन से जो अमङ्गल होता है, उस का विशेष प्रभाव ऋङ्मूर्त्ति स्थूलशरीर पर ही पड़ता है 1 । यजुर्वेद की उपनिषदों से होने वाला अमङ्गल यजुर्मय सूक्ष्मशरीर में क्षोभ उत्पन्न करता है । एवं सामोपनिषज्जनित अमङ्गल साममय कारणशरीर की अशान्ति का कारण बनता है । इन तीनों शरीरों पर होने वाले अमङ्गलों को शान्त करने के लिए उस कर्म से आद्यन्त में मङ्गल-पाठ होता है । ऋग्वेदीया उपनिषदों में प्रधानरूप से मंगल द्वारा स्थूलशरीर के मंगल की कामना की जाती है । यजुर्वेदीया उपनिषदों में प्रधानरूप से सूक्ष्मशरीर को आपत्ति से बचाया जाता है । एवं सामवेदीया उपनिषदों में कारणशरीर की रक्षा के लिए मङ्गलपाठ किया जाता है 1 । अथर्व में पूर्वकथानुसार तीनों वेदों का उपभोग है । अतएव अथर्ववेदीया उपनिषदों में स्थू ० सू ० का ० इन तीनों की शान्ति के लिए प्रार्थना की जाती है । कारण अथर्वा सोम तीनों शरीरों में व्याप्त है । " सर्व हीदं ब्रह्मणा ( अथर्ववेदेन ) हैवसृष्टम् " ( तै ० ब्रा ० १२/६/२ ) के अनुसार अथर्वा ही तीनों की प्रतिष्ठा है । उदाहरण के लिए " पिप्पलादोपनिषत् " नाम से प्रसिद्ध प्रश्नोपनिषत् के मङ्गलपाठ को ही अपने सामने रखिए । यह प्रथर्ववेद की उपनिषत् है । इस का मङ्गलपाठ निम्न लिखितरूप से हमारे सामने आता है— भद्रं कर्णेभिः शणुयाम देवाः, भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः व्यशेम देवहितं यदायुः " । ( १००१ । १ । )