Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 201–210

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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भूमिका || मङ्गल रहस्य | पञ्चदेवता सदा मंगल वचन ही ' हे ( आग्नेयमाणप्रधान ) देवताओ! ( हम अपनें ) कानों से अपनी आंखों से सदा मङ्गलभाव सुनते रहें । हे यजन करने वाले यज्ञिय देवताओ ( हम से ( हम ) सदा युक्त रहैं, एवं जो ही देखा करें । थिर एवं दृढ़ अङ्गों से युक्त शरीरों में समर्थ सुखपूर्वक ( निर्विघ्न ) भोगने देवहित ( देवताओं में प्रतिष्ठित ) आयु है, उसे बनैं " - - यह है उक्त मङ्गलपाठ का अक्षरार्थ । में ज्ञानप्रधान उपनिषदों की भाषा ऐसी ज्ञान - क्रिया श्रर्थतत्वप्रतिपादक वैदिक साहित्य महर्षियों नें । एक एक शब्द में उन ज्ञानमूर्ति संक्षिप्त है, जिस का कोई ठिकाना नहीं गुहानिहित के प्रत्येक अक्षर में कुछ न कुछ गभीरतम तत्वों का समावेश किया है । उपनिषत् सम्बन्ध में " देवाः " पूर्व मन्त्र में - " करें मिः " के रहस्य रहता है । प्रत्येक शब्द भावप्रधान है । गया है । " अग्निः " यजत्राः " का सन्निवेश किया कहा गया है । " अतभिः " के सम्बन्ध में अनुसार ” ( तै ० ब्रा ०३।२।४।३ । ) के सर्वा देवताः " ( ऐ - ब्रा ०२ / ३ ) – “ सोमः सर्वा देवताः देवताओं का इन श्राग्नेय, एवं सौम्य -अग्नि और सोम दोनो सर्वदेवता हैं | इतर सम्पूर्ण विभक्त हैं, आदित्य इन तीन भागों में देवताओं में अन्तभीत्र है । आग्नेय देवता अग्नि वायु, विभक्त हैं । संभूय आग्नेय, वायव्य एवं सौम्य देवता दिक्सोम, भास्वरसोम भेद से दो भागों में हैं । इन पाचों देवता पांच प्रकार के हो जाते आदित्य, दिक्सौम्य, भास्वरसौम्य भेद से इन्द्रियों माण चतु - श्रोत्र - मन इन पांच प्राकृतिक ( ध्याधिदैविक ) प्राणदेवताओं से क्रमश: वाक - हैं । वागिन्द्रिय साक्षात् अग्निदेवता है । का निर्माण होता है । यही पांचों आध्यात्मिक देवता दिक्सोम श्रादित्यदेवता है । श्रोत्रेन्द्रिय का प्राणेन्द्रिय ( घ्राणेन्द्रिय ) वायुदेवता है । चतुरिन्द्रिय है । इसी इन्द्रियविज्ञान को लक्ष्य में रख कर से सम्बन्ध है । एवं मन की प्रतिष्ठा भास्वरसोम उपनिषच्छति कहती है— इस का मुख्य काम है । यज्ञोपवीत कान पर क्यों * दिक्सोम ही पवित्रसोम है, दूषितभाव को दूर करना पारमेष्ठय ब्रह्मणस्पति सोम है । दिक्सोम नाम का पवित्र चढाया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर यही २१

पृष्ठ 202

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भूमिका || भङ्गल रहस्य || २. - " अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् " । २ - " वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् " । ३ - " प्रादित्यश्चतुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् " । ४-- - " दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशत् " । ५ - " चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशव " । ( ऐ ० उ ०२ । ४ । ) । ऋत्विजः प्राकृतिक नित्य संवत्सर यज्ञ में अग्नि होता हैं, वायु अध्वर्यु हैं, आदित्य उद्गाता हैं, एवं सोम ( चन्द्रमा ) ब्रह्मा हैं । होता ऋङ्मूर्ध्नि है, वायु यजुर्मूर्त्ति है, उद्गाता साममूर्त्ति है । ब्रह्मा अथर्वमूर्ति है । होता शस्त्रकर्म्म का, अध्वर्यु ग्रहकम्में का, एवं उद्गाता स्तोत्रक का अधि-ष्ठाता है । यह तीन ही ऋत्विक् प्रधानरूप से यज्ञकर्म के सम्पादक हैं । चौथा अथर्वमूर्त्ति ब्रह्मा केवल निरीक्षण करते हैं । दूसरे शब्दों में ब्रह्मा यजन नहीं करते, अपितु वे तटस्थ देवता हैं । काम करने वाले केवल अग्नि वायु आदित्य देवता ही हैं । ऐसी अवस्था में हम मङ्गलमन्त्रोक्त यजत्रा शब्द से इन तीनों देवताओं का ही ग्रहण कर सकते हैं । यही अवस्था अध्यात्मिक यज्ञ की समझिए । अग्निमयी वाक् होता है, वायुमय प्राण अध्वर्यु है, आदित्यमय चक्षु उद्गाता है, सोममय मन ब्रह्मा है । दिक्सोम व्यापक है । इसी का प्रवर्ग्यभाग सायतन बन कर सौरप्रकाश से प्रकाशित होता हुआ भाम्वरसोम नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । ऐसी अवस्था में दिक्सोम से भाखरसोम का ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं की जा सकती । फलतः - ' भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ” इस मन्त्रभाग का - " हे सौम्य देवताओ! मैं कान से अच्छा सुनूं, एवं मन से शुभ-भावना करूं " यह अर्थ हो जाता है । आदित्य ज्ञानप्रधान है, वायु क्रियावधान है, अग्नि प्रधान है । ज्ञान पूर्वज है, अर्थ - क्रिया परज हैं । ज्ञान ही बलग्रन्थियों के तारतम्य से ज्ञान-क्रिया - अर्थरूप से तीन स्वरूप धारण कर लेता है । ऐसी अवस्था में ज्ञानमूर्त्ति आदित्यमय चक्षु से हम क्रियामूर्त्ति वायुमय प्राण एवं अर्थमूर्त्ति अग्निमयी वाक् इन दोनों का ग्रहण कर सकते हैं । वाक् अर्थप्रधाना है, प्राण क्रियाप्रधान है, चक्षु ज्ञानप्रधान है । चतु से पदार्थों का ज्ञान होता है । प्राणद्वारा श्वास - प्रश्वासरूपा क्रिया का सञ्चार होता है । वाक्द्वारा अन्न साधन से २२

पृष्ठ 203

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भूमिका ॥ मङ्गल रहस्य श्रवण - कथन अभीष्ट था, इसी लिए ' अनभिः ' कहा है । अर्थनिष्पत्ति होती है । ऋषि को इन तीनों का ग्रहण! मैं करनें वाले ( आग्नेय ) देवताओ “ भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः " का अर्थ है - " हे यजन से क्रियासञ्चालन में, एवं वाक् से ख से ठीक ठीक ज्ञान सम्पादन करने में, प्राण अर्थसंग्रह में समर्थ बनूं " । जब केनोपनिषदादि में ऋषियों उक्त अर्थ के सम्बन्ध में प्रश्न उपस्थित होता है कि में तो ऐसी अवस्था में यदि प्रकृत मङ्गलमन्त्र नें पांचों इन्द्रियों का पृथक् पृथक् निर्देश किया है थी? क्यों इस लाघव की क्या श्रावस्यकता भी उन्हें सभी इन्द्रियों का ग्रहण अभीप्सित था तो यथार्थ है । सभी इन्द्रियों के नामोल्लख नहीं उन्हों नें सभी इन्द्रियों का उल्लेख कर दिया? प्रश्न । ऐसा न से विषय समझ में आ सकता था में कोई हानि नहीं थी, अपितु लाभ था । सरलता उद्देश्य भी कुछ रहस्य है । ऋषि का प्रधान करके ऋषि ने जो द्रविड़ प्राणायाम किया है, इस मे अच्छा मे जो मनुष्य अच्छा देखता है, एवं मङ्गलकामना है, न कि इन्द्रियखरूपनिरूपण । संसार - सुनने अमङ्गल दोनों भाव प्रधानरूप से देखने सुनता है, उस का जीवन मंगलमय है । मंगल एवं " सम्बन्ध में कुछ सुनना ही चाहता पर निर्भर हैं । " न मैं उसे देखना चाहता, न उस के पाते हैं । श्रवण - दर्शन की ही प्रधानता इत्यादि शक्तिग्राद्दक शिरोमणि लौकिक व्यवहारों से हम का उल्लेख मङ्गल मन्त्र में केवल दो ही इन्द्रियों इसी सामान्य विज्ञान को लक्ष्य में रख कर उक्त अभीष्ट है पांचों का । वह काम - -'कर्णेभिः ' ’ - अक्षभिः ' किया गया है । परन्तु साथ ही में ग्रहण पूर्वार्द्धभाग प्राणरूप ( पश्चन्द्रिय प्राण-से हो जाता है । पञ्चेन्द्रिय की समष्टि ही सूक्ष्म शरीर है । रूप ) सूक्ष्मशरीर की ही मंगल कामना करता है 1 ही स्थूलशरीर की " स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः " यह मन्त्र भाग स्पष्टरूप से व्यशेम देवहितं यदायुः ” यह मङ्गल कामना की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । एवं- " इस मन्त्र से तीनों चतुर्थभाग आयुमय कारणशरीर की मंगल कामना कर रहा है । इस प्रकार, अथर्वशिर, की मंगलकामना सिद्ध हो जाती है । पिप्पलाद उपनिषत् की तरह मुण्डक, माण्डूक्य

पृष्ठ 204

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भूमिका --311 मङ्गल रहस्य प्रमाण अथर्वशिखा, बृहज्जाबाल, नृसिंहतापनी, नारद, परिव्राजक आदि अथर्ववेद की जितनीं भी उपनिषदें हैं, सब के श्रायन्त में उक्त मंगल मन्त्र की ही आराधना की गई है । पञ्चप्राणाः II भद्रं “ भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः " कर्णेमिः शृणुयाम देवाः ( १ - वाक् - अग्निः ( ऋङ्मयो ज्ञानमृत्तिः होता २- प्राणः - वायुः ( यजुर्मयः क्रियामूर्त्तिः ) - अध्वर्युः ( आग्नेया देवाः ३. चतुः - श्रादित्यः ( साममयोऽर्थमूर्त्तिः ) - उद्गाता ४ - श्रोत्रम - दिक्सोमः ( ५- मनः- भास्वर सोमः ! त्रयीमयः सर्वमूर्त्तिः - ब्रह्मा, } सौम्या देवा स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः — प्रङ्गयुक्तं वाङ्मयं व्यशेम देवहितं यदायुः ——— प्रयुयुक्तं – मनोमयं } -: ०: --- → स्थूलशरीरम् → कारणशरीरम सूक्ष्मशरीरम् J प्राणामयं त्रयीमूर्त्ति अथर्ववेद से सम्बन्ध रखने वालीं उपनिषदों के मंगल का विचार समाप्त हुआ । अब ऋग्वेद की उपनिषदों के मंगल का विचार प्रस्तुत है । ऋग्वेद अग्निप्रधान होता हुआ अर्थ-मुर्ति है, यही स्थूलशरीर का स्वरूप समर्पक है, जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा-चुका है । इस से यह मान लेना पड़ता है कि ऋग्वेद की जितनी भी उपनिषदें हैं, उन सब के अध्ययन से प्रधानरूप शे स्थूलशरीर पर ही याघात होता है । इस श्राघात से बचने के लिए ऋगुपनिषदों के प्राद्यश्त में मंगलद्वारा स्थूलशरीर की ही मङ्गल कामना की जाती है । ऐतरेय, कौषीतकि, नादविन्दु, आत्मनबोध, निर्वाण, मङ्गल, अक्षमालिका, त्रिपुरा, सौभाग्य नामों से प्रसिद्ध ऋग्वेद के १० सों उपनिषदों के मंगल का निम्न लिखित स्वरूप हमारे सामने आता है ।

पृष्ठ 205

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भूमिका || मङ्गल रहस्य || ---वाक्प्रणमनांसि

" वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् ।

विरावीर्म एधि ॥

वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।

अनेनाधीतेनाऽहोरत्रान् संदधामि ॥

ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि, तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु, अवतु मां, अवतु वक्तारं, अवतु वक्तारम् । * शान्तिः! शान्तिः!! शान्ति!!! ” प्रतिष्ठित रहै । “ ( मेरी ) वाक् मेरे मन में प्रतिष्ठित रहै, ( मेरा ) मन मेरी वाकू में का कारण यह दोनों ही ( मनो वाक् ) तत्व ( उत्तरोत्तर ) प्रकट रहते हुए मेरे लिए हुआ समृद्धि ( यह औषनिषद ) बनैं । वेद के सम्बन्ध में मन वाक् आणी स्थानीय वनैं । मेरा सुना को ( परस्पर में ) संहित विषय मुझे न छोड़े । इस अपने पढ़े हुए विषय से ) मैं बोलूंगा अहोरात्रों । ( इस प्रिय सत्य भाषण के करता रहूं ( मिलाता रहूं ) । मैं ऋत ( प्रकुटिल - प्रिय रक्षा करें मेरी, रक्षा करें वक्ता बल से ) वह देवता मेरी रक्षा करें, वक्ता की रक्षा । करें, G की, रक्षा करें वक्ता की " यह है मन्त्र का अक्षरार्थ दी गई है । यह पूर्व में इस मन्त्र के उपक्रम में एव उपसंहार में वाग्व्यापार को प्रधानता ही है । वाक् और विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि स्थूलशरीर की मूलप्रतिष्ठा वाक्तत्व व्यापार करने में असमर्थ मन दोनों या परस्पर में घनिष्ठ सम्बन्ध है । बिना मन के वाक् अपना को प्रकट करने असमर्थ ही रहता है, साथ ही में बिना वाक् को द्वार बनाए मन भी अपने भावों होकर ही अध्ययनकर्म्म सम्पादन है । इस प्रकार मन और वाक् दोनों एक दूसरे में प्रतिष्ठित में प्रतिष्ठित होकर ही विकसित करते हैं । अध्ययनकर्म्म प्राणप्रधान है । प्राण मनोवाक् की वर्तनी श्रुत इन तीन शब्दों से होता है । श्रुत विषय प्राणप्रधान है । इस प्रकार यद्यपि मन्त्र वाक्- मन-२५

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भूमिका || मङ्गल रहस्य ॥.. के आरम्भ में मन प्राण- वाकू तीनों की ही मंगल कामना करता हुआ प्रतीत होता है । तथापि मन्त्र भी “ वाङ्मे ० ” इत्यादि रूप से वाक् की ही प्रधानता है, एवं " अवतु वक्तारम् " इत्यादि रूप से उपसंहार में भी वाक् को ही प्रधानता दी गई है । मध्य में भी " अहोरात्रान् सन्दधामि " इत्यादिरूप है । अहोरात्र का से वाक् को ही मुख्य माना गया है । बाक् के परिप्लव को ही अहोरात्र कहा जाता वषट्कारः " वषट्कार के साथ ही सम्बन्ध है, एवं वाङ्मय मण्डल का ही नाम वषट्कार है । “ वाग्वै ) ( शत ०१।७।२।२१ । ) - “ वाग्रेतः, ऋतवो वै षट्, तदृतुष्वेवैतद्रेतः सिध्यते " ( श ० १।७।२।२१ " एते ह वै संवत्सरस्य चक्रे यदहोरात्रे " ( ऐ ब्रा ० ५। ३० ) इत्यादि श्रुतिएं संवत्सर के अवयव-रूप अहोरात्रों को बाग्रेतोमय ही बतला रहीं हैं । वैदिक विज्ञान हमें प्राप्त करना है । यह एक पड़ता है, प्रकार का रथ है । जिस प्रकार रथ पर चढ़ने के लिए * " प्राणी " का श्राश्रय लेना । इसीलिए एवमेव वैदिक विज्ञान को प्राप्त करने के लिए मन एवं वाक् का आश्रय लेना पड़ता है " वेदस्य म आणीस्थः " इत्यादिरूप से मन वाक् को वेद का आणी कहा गया है । “ जैसा बोलो वैसा करो " इस कर्मसत्य को " ऋत " कहा जाता है । एवं " जैसा करो वैसा बोलो ” इस वाणी-सत्य को " सत्य " कहा जाता है । कर्म्मसत्य का मन से सम्बन्ध है, वाणीसत्य का वाक् से सम्बन्ध है । चूंकि वेदाध्ययन में मन वाकू दोनों अपेक्षित हैं, अतएव - " ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदि-ष्यामि ” यह कहा है । दोनों में " वदिष्यामि " रूप से प्रधानता वागत्र्याणर की ही रक्खी गई है । क्योंकि प्रकृतमन्त्र का मुख्य लक्ष्य वाङ्मय स्थूलशरीर ही है । वाकूप्रधान ऋगुपनिषदों और वक्ता के अध्ययन से वाक् ( स्थूलशरीर ) पर श्याघात होता है । अतः सर्वान्त में श्रोता बाकू भाव की ही मंगल कामना की है । श्रोता की अपेक्षा वक्ता का वाकूभाग ही अधिक खर्च होता है अतएव उपसंहार में एवं उपक्रम में वक्ता की विशेषरूप से मंगल कामना की गई है । वाक्व्यापार ही है । का स्थूलशरीर से सम्बन्ध है, इस में प्रत्यक्ष प्रमाण शब्दोत्पत्तिविज्ञान आत्मा बुद्धयासमेत्यर्थान् मनो युद्धे विवक्षया । मनः कायाग्निमाहत्य स प्रेरयति मारुतम् ॥ ( पा ० शि ० ) * रथ के दोनों पहियों की धुरी के कीलक में दोनों ओर जो एक धनुषाकार लकड़ी लगी रहती है, जिस पर पैर रख कर रथ पर चढ़ा जाता है, उसी का नाम “ आणी ” है । २६

पृष्ठ 207

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भूमिका ॥ मङ्गल रहस्य || पूर्णमदः इत्यादि शिक्षाविज्ञान के अनुसार हृदयस्थ मन की प्रेरणा से शारीराग्नि पर श्राघात होता है । हत न ही वायुद्वारा धक्का खाकर मुख से निकलता हुआ शब्दरूप में परिणत होता है । इसी आधार पर " अग्निर्वागभूत्वा मुखं प्राविशत् " यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । अग्नि ऋङ्मय है, यही स्थूलशरीर की प्रतिष्ठा है, यही वाकू है । फलतः वाक् प्रपञ्च की मङ्गल कामना से स्थूलशरीर की मङ्गल कामना गतार्थ हो जाती है । ईशावास्य, बृहदारण्यक, जाबाल, हंस, परमहंस, सुबाल, मन्त्रिका आदि शुक्ल-यजुर्वेदीय जितनी भी उपनिषदें हैं, उन सब के अध्ययन से यजुः प्राणमय प्राणमात्रा प्रधान " मुक्ष्मशरीर " के ऊपर आघात होता है । इस आघात से रजोगुणप्रधान सूक्ष्मशरीर को बचाने के लिए इन यजुर्वेदीय उपनिषदों के प्रान्त में निम्न लिखित मङ्गलपाठ का विधान है । " पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ” ि मनोमय कारण शरीर पर अव्ययपुरुष का अनुग्रह है, प्राणमय सूक्ष्मशरीर पर अक्षर में ज्ञानघन पुरुष का, एवं वाङ्मय स्थूलशरीर पर क्षरपुरुष का अनुग्रह है । दूसरे शब्दों अव्ययपुरुषावच्छिन्न मन कारणशरीर की प्राणधन अक्षरपुरुषावच्छिन्न प्राण सूक्ष्मशरीर की, एवं अर्थघन क्षरपुरुषावच्छिन्ना वाक् स्थूलशरीर की मूलप्रतिष्ठा है । उस ओर मन है, इस ओर वाक् है, मध्य में प्राण है । उस ओर अव्यय है, इस ओर क्षर है, मध्य में अक्षर है । उस ओर ज्ञान है, इस ओर अर्थ है, मध्य में क्रिया है । उस ओर आदित्य है, इस ओर अग्नि है, मध्य में वायु है । उस ओर साम है, इस ओर ऋक है, मध्य में यजु है । " ऋकसामे यजुरपीतः " । उस ओर कारणशरीर है, इस ओर स्थूल शरीर है, मध्य में सूक्ष्मशरीर है । ज्ञानमय अव्यय, मन, आदित्य, साम, कारणशरीर सब निष्क्रिय हैं । अर्थमयी वाक्, अग्नि, ऋक, स्थूलशरीर सब जड़ हैं । मध्य-पर्तित क्रियामयं प्राण, वायु, यजु, कारणशरीर ही सर्वज्ञ सर्ववित्, सर्वशक्ति बनते हुए सर्वमूर्त्ति २७.

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• || मङ्गलरहस्य 110-पूर्ण मूर्त्तिक्षर हैं, पूर्णमूर्त्ति हैं ॥ मध्यस्थ अक्षर उस ओर से अव्यय के ज्ञान को लेकर सर्वज्ञ बनता है, इस श्रोर से क्षर के अर्थ को लेकर सर्ववित् बनता है, एवं अपने प्रातिस्त्रिक रूप से वह सर्वशक्तिमान् है । इस प्रकार मध्यस्थ अक्षर दोनों से सम्बन्ध करने के कारण त्रिपुरुषविभूतियुक्त बनता हुआ सच-मुच पूर्णमूर्ति बना हुआ है । अक्षरग्रहण से सब कुछ ग्रहीत है । अक्षर की इसी पूर्णता को लक्ष्य में रख कर कठश्रुति कहती है— * एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञाग्यो यदिच्छति तस्य तव । ( कठोपनिषत् ) अव्ययपुरुषः-- → अक्षरपुरुषः ← -: क्षरपुरुषः मनः-प्राणः बाकू ज्ञानम क्रिया ... अर्थः आदित्यः वायुः —अग्निः सामवेदः → यजुर्वेदः - ऋग्वेदः कारण शरीरम् सूक्ष्मशरीरम् स्थूलशरीरम उक्त परिलेख से पाठकों को यह मान लेना पड़ेगा कि मध्यपतित प्राणमूर्ति सूक्ष्मशरीर इधर उधर की दोनों सम्पत्तियों से संश्लिष्ट रहने के कारण अवश्य ही कारण स्थूलशरीरों की अपेक्षा सर्वमृत्ति बनता हुआ पूर्णमूर्ति है । इस पूर्णरूप सूक्ष्मशरीर को आधात से बचाने के * इस विषय का विशद विवेचन कठविज्ञानभाष्य में देखना चाहिए । १ - " ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् " के अनुसार ब्रह्मशब्द तर का वाचक है, पर शब्द अव्यय का वाचक है । अक्षर क्षर सम्बन्ध से ब्रह्म है, अव्यय सम्बन्ध से पर है । दोनों के कारण अक्षर ज्ञानक्रियार्थमात्त ' बनता हुआ सर्वमूर्ति बन रहा है, यही तात्पर्य है । २८

पृष्ठ 209

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भूमिक ॥ मङ्गल रहस्य | कृष्णयजुर्वेद लिए ऋषि प्रार्थना करते हैं कि - " वह ( ईश्वरीयमपञ्च ) पूर्ण है, यह ( जीवमपञ्च ) पूर्ण है । उस पूर्ण से यह पूर्ण उदक्त हुआ है । उस पूर्ण की पूर्ण विभूति को लेने से पूर्ण ही बचजाता है । " मंगल का तात्पर्य यही है कि सूक्ष्मशरीर उस पूर्ण की विभूति है । भला उस घूर्ण की इस पूर्ण विभूति का भी कभी अमंगल हुआ है । वह यदि पूर्ण होने से नित्य मंगलमूर्त्ति है तो यह भी पूर्ण होने से मङ्गलमूर्त्ति ही बना रहै । आकाश गत वायुतत्व का ही नाम यजु है । यह वायुतत्व अदिति - दिति भेद से दो भागों में विभक्त है । पृथिवी का वह भाग जो कि सूर्य की ओर रहता है, अदिति है । यह ज्योति-र्म्मय है । सूर्य्यविरोधी तमोमय पार्थिव श्रर्द्धमण्डल दितिमण्डल है । अदितिमण्डल में व्याप्त वायुमूर्त्ति ` यजु शुक्ल आादित्य के सम्बन्ध से शुक्लयजुर्वेद है । इसी के साथ स्तौम्यत्रिलोकी का सम्बन्ध है । अर्थ - क्रिया - ज्ञानमूर्त्ति अग्नि वायु - मादित्य की पूर्णविभूतियों का इसी साथ सम्बन्ध है । अतएव इस के सम्बन्ध में पूर्व प्रतिपादित - पूर्णता लक्षण मङ्गलपाठ किया जाता है । दितिमण्डल में व्याप्त वायुमूर्त्तियजु कृष्णा दिति के सम्बन्ध से " कृष्णयजुर्वेद " है, जैसा कि " क्या उपनिषत् वेद है "? इस प्रश्न की मीमांसा में विस्तार के साथ बतलाया जानेवाला है । यह वेद अपूर्ण है । कठ, तैत्ति-रीय, ब्रह्म, कैवल्य, श्वेताश्वतर, गर्भ, अमृतबिन्दु इत्यादि कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषदों के श्राद्य-त में तमोगुणप्रधान सूक्ष्मशरीर की मंगल कामना के लिए निम्न लिखित मङ्गलमन्त्र का विधान है ।

" श्रीं सहनाववतु, सहनौ भुनक्तु, सहवीर्यं करवावहै ।

तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥

ॐ श्री शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!! शरीर भोगायतन है, सूक्ष्मशरीर भोक्ता है । जिसके सूक्ष्मशरीर में पार्थिव तमोगुण की प्रधानता रहती है, उस का यह शरीर भोगलिप्सा में रत रहता है । ऋषि-आदेश करते हैं कि भोग भोगना हानिकर नहीं है, परन्तु स्वार्थपरायणता नाश का I

पृष्ठ 210

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भूमिका ॥ मङ्गलरहस्य || S श्रायुरक्षा कारण है तुम मिलजुज कर एक दूसरे का हितसाधन करते हुए भोग भोगो । एक दूसरे की रक्षा करो । संगठन द्वारा वीर्य्य का आधान करो । तेजस्वी बनो । आपस में द्वेष मत करो । ऐसा करने से तुम्हारा सूक्ष्मशरीर ( अन्तःकरण ) पवित्र होगा, सबल बनेगा । फलतः कृष्णोपनिषत् के अध्ययन से होने वाले श्रमङ्गल से तुम्हारी रक्षा होगी । केन, छान्दोग्य, मैत्रायणी, योगचूड़ामणि, जावाल आदि सामवेदीय उपनिषदों के अध्ययन से साममय कारणशरीर पर आघात होता है । इस आघात से बचने के लिए उक्त उपनिषदों के श्राद्यन्त में निम्न लिखित मङ्गलमन्त्र का स्मरण नितान्त अपेक्षित है-“ ओं आप्याययन्तु ममाङ्गानि- वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्व, ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्याम् । मा मा ब्रह्म निराकरोत् । अनिराकरणं मेऽस्तु, अनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । यों शान्तिः! शान्तिः!! शान्ति!!! ” “ मेरे अ ंग परिपूर्ण हों । वाक्, प्राण, चक्षुः, श्रोत्ररूप ज्ञानप्रधान इन्द्रियाँ मुख्य-प्राण सम्बन्धी बल, हस्तपादादि कम्र्मेन्द्रियाँ सब परिपूर्ण हों । ब्रह्म की सभी उपनिषदें परिपूर्ण हों । मैं ब्रह्मविभूति को न निकालदूं । ब्रह्म मुझे न छोड़ बैठे । मेरे लिए उक्त सब विभूतियों का अनिराकरण हो, अनिराकरण हो । श्रात्मचिन्तन करने में उपनिषदों में जो धर्म्म हैं, वे मुझ में प्रतिष्ठित हों, प्रतिष्ठित हों " । आयु की रक्षा उक्त सभी पर्वो की रक्षा पर निर्भर है । स्थूलशरीर - सूक्ष्मशरीर दोनों जब पूर्ण-रूप से सुरक्षित रहते हैं, तभी आयुर्लक्षण कारणशरीर स्व - स्वरूप से सुरक्षित रहता है । इसी ३०