Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 211–220
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 211–220
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भूमिका ॥ मङ्गलरहस्य || s उपसंहार की भी मङ्गलकामना की गई है । अभिप्राय से अङ्गात्मक स्थूलशरीर, एवं इन्द्रियात्मक ( कारणशरीररूप सूक्ष्मशरीर आयुर्म्मय आत्मा ) मुझे न छोड़ बैठे " प्रधान लक्ष्य ज्ञानमूर्त्ति ब्रह्म ही है । " ब्रह्म की गई है । इत्यादिरूप से कारणशरीर की ही मंगलकामना होता है । एक गृहस्थी आत्मज्ञानोपयिक उपनिषत् - पाठ से सांसारिक है विभूति । इसके पर अतिरिक्त आघात प्रकरण के आरम्भ में के लिए अमङ्गल का यह पहिला, एवं मुख्य कारण अमङ्गल का आक्रमण बतलाए गए “ श्रेयांसि बहु विघ्नानि " इस स्वतः की सिद्ध अपेक्षा आसुरभावप्रधान औपनिषद ज्ञान के सम्बन्ध में दो दो होना दूसरा कारण है । इसप्रकार इतर शास्त्रों इस श्रमङ्गलद्वयी के निराकरण के लिए ही उपनिषदों श्रमङ्गलों का आक्रमण सिद्ध होजाता है । में जो माङ्गलिक मन्त्र उद्धृत हुए हैं, उनका विशद के आद्यन्त में मङ्गल का विधान हुआ है । पूर्व चाहिए । “ उपनिषदों के आद्यन्त में वैज्ञानिक अर्थ तत्तदुपनिषदों के भाष्य में ही देखना ऊत्तर है । मङ्गल क्यों किया जाता है?, इस प्रश्न का यही संक्षिप्त * इति - मंगलरहस्यम् * - * -p
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* श्रीः * तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि मयि सन्तु सन्तु F " ह में अमुक विषय नवीन प्रतीत होता है, हमनें तो आज तक ऐसा सुना ही नहीं था । हमनें सभी शास्त्र देखे हैं । आप्त ग्रन्थों पर प्राचार्यों में जो भाष्य किए हैं, वे भी हमारे दृष्टिपथ में आए हैं । परन्तु हमनें आज तक इस प्रकार के वैज्ञा-निक अर्थों का अवलोकन न किया । ऐसी स्थिति में इस नवीन शैली से • किए गए वेदार्थ को कैसे प्रामाणिक माना जा सकता है " यह है उन महा-पुरुषों के उद्गार, जो आज हमारे धार्मिक समाज के नेता बनने का दम भरते हैं । " हमनें नहीं सुना, एवं हमनें नहीं देखा " - हमारे इस वैज्ञानिक साहित्य की प्रामाणिकता में उन पुरुष-पुङ्गवों का एकमात्र यही हेत्वाभास है । ऐसा होना कोई नवीन घटना नहीं है । कालदोष से समय-समय पर जनता सत्य साहित्य से विमुख होती ही रहती है, एवं साथ ही में समय समय पर विलुप्त सत्यविद्या का प्रकाश भी होता ही रहता है । यह भी सच है कि जब जब सत्यविद्या का विकास होता है, तब तब ही अन्धप्रणाली के अनुगामी महानुभावों के अन्तस्तल में क्षोभ उत्पन्न होता है, एवं वे अपने इस क्षोभ को अप्रत्यक्षरूप से अपने अन्धभक्तों पर प्रकट कर उस सत्य-विद्या का परिहास करके किसी अंश में अपना क्षोभ शान्त हुआ समझलेने की विफल चेष्टा करते रहते हैं । मनोविज्ञान ( Cyclogie ) का यह एक स्वाभाविक नियम है कि अर्द्धदग्ध मनुष्य जिस विषय का ज्ञान नहीं रखता, उस विषय का प्रकाश यदि कोई अन्य व्यक्ति करता है तो उसे स्वीकार कर लेने में वह अपनी मानहानि समझता है । फलतः विषय की उपादेयता पर तो उस का लक्ष्य नहीं जाता, अपितु वह छिद्रान्वेषण में प्रवृत्त होजाता है । फिर उसे इस जघन्य कर्म में सफलता मिले, अथवा न मिले, यह दूसरा प्रश्न है । मनोविज्ञान का यह व्यापक सिद्धान्त अपवादरूप से
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उपनिषच्छब्द -. ॥ भाष्यभूमिका ॥ विषयोपक्रम , देखा गया है । महाभाष्यकार भगवान् पतञ्जलि श्राप्तपुरुषों में भी यत्र तत्र चरितार्थ होता हुआ घटित हुई है । यह घटना के सम्बन्ध में भी उक्त घटना एवं सुप्रसिद्ध वार्त्तिककार भगवान् वररुचि, अतः अप्रासङ्गिक होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है हमारे विलुप्तप्राय इस वैदिक साहित्य से श्रावश्यक समझते हैं । हम इसे प्रकृत में उद्धृत करना ५ की में ( १ | १ | १ | म ० भा ० ) शब्दनित्यत्वानित्यत्व महामुनि पतञ्जलि ने महाभाष्य के आरम्भ " ( व्याक-" शक्तिग्राहकशिरोमणेर्लोकव्यवहारस्य मीमांसा की है । इसी सम्बन्ध में आगे जाकर में से लोकव्यवहार ही शक्ति-इन शक्तिग्राहक पांच उपायों रण - उपमान - कोश प्राप्तवाक्य - व्यवहार - “ लोकतोऽर्थ प्रयुक्ते शब्द-को लक्ष्य में रखते हुए ग्राहकों में मुख्य है ) इस सर्वसम्मत सिद्धान्त रूप से पतञ्जलि ने लोक में प्रयुक्त म ० भा ० १।१।१ ) इत्यादि प्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः " ( पा ० में प्रमाण माना है । इसी प्रसङ्ग में ही शास्त्र को धर्मनिर्णय सार्थ शब्दप्रयोग को आधार मानते हुए इत्यादि शब्द लोक में है कि “ ऊष- तेर - चक्र - पेच श्यागे जाकर वररुचि का आक्षेप चलता नहीं देखा जाता " । इस आक्षेप शब्दों का प्रयोग अमयुक्त हैं । लौकिक व्यवहार में उक्त " अच्छा न सही उक्त शब्दों का प्रयोग लोक में, का समाधान करते हुए पतञ्जलि कहते हैं- हैं- " प्रयोग के आधार पर ही तो आप शब्दों इस से बिगड़ क्या गया " । वररुचि कहते अवस्था में ( प्रयोगवादी आप के मतानुसार ) जो की साधुता व्यवस्थित करते हैं । ऐसी । वररुचि के इस आक्षेप को असंगत बताते नहीं मानें जांयगे " शब्द अप्रयुक्त होंगे, वे साधु शब्द सर्वथा उलटा कह रहे हैं । आप कहते हैं- " अप्रयुक्त हुए पतञ्जलि कहते हैं— " यह आप तो इन के सम्बन्ध में " अम-है कि यदि शब्द हैं, तब शब्द हैं ” । इस पर हमारा यह कहना फिर यह हैं हीं नहीं । " हैं और शब्द अमयुक्त हैं तो युक्ताः " कहना ठीक नहीं, यदि यह ( " ऊष- तेर " इत्यादि रूप से ) स्वयं अपनें मुख से श्रमयुक्त " यह कहना विरुद्ध है । आप साथ ही में यह भी कहते जाते हैं कि यह शब्द अप-इन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, एवं इन की साधुता व्यव-का प्रयोग करता हुआ युक्त हैं । भला आप जैसा विद्वान् इन शब्दों ? " स्थित करनें वाला अन्य कौन होगा
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उपनिषच्छन्द .. || भाष्यभूमिका ॥6. विषयोपक्रम पतञ्जलि के इस उत्तर पर पुनः अपने आक्षेप को सुरक्षित रखते हुए वररुचि कहते हैं — आपने हमारे आक्षेप के प्रति जो “ विप्रतिषिद्धम् " कहा, यह ठीक नहीं हैं । शब्द हैं अवश्य, जब कि शास्त्रज्ञ लोग शास्त्रद्वारा इन का संस्कार करते हैं । हमारा तो कहना केवल यही है कि लोक में यह शब्द अमयुक्त हैं । आपने जो यह कहा कि " इन शब्दों के प्रयोग में तुमसे अधिक श्रेष्ठ और कौन होगा " । इस के उत्तर में हमें यह कहना है कि " हमारा यह अभिनाय नहीं है कि उक्त शब्द हम से अप्रयुक्त हैं, अपितु लोक में यह शब्द अप्रयुक्त है " । यदि आप यह कहें कि हम भी तो लोक में हीं हैं, " इस के उत्तर में हम यह कहेंगे कि हम लोक में अवश्य हैं, परन्तु हम ही तो लोक नहीं हैं । केवल एक व्यक्ति के प्रयोग से ही तो वह लौकिक प्रयोग नहीं माना जा सकता " । आगे जाकर वार्त्तिककार कहते हैं कि “ ऊष - तेर " इत्यादि शब्दों का प्रयोग ही न्याय प्राप्त है । कारण स्पष्ट है । जब कि इन्हीं शब्दों के स्थान में इन्हीं के शब्दान्तर ( विशेषरूप से अर्थ को स्पष्ट करने वाले ) उपलब्ध होते हैं तो फिर उन्मुग्ध भाव से अर्थ प्रकट करने वाले ऊष - तेर इत्यादि शब्दों के प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । देखिए ' ऊप ' के स्थान में “ क्व यूयमूषिताः ”, “ तेर ' के स्थान में " क्क यूयं तीर्णाः " " “ चक्र ” के स्थान में “ फ यूयं कृतवन्तः ”, ' पेच ' के स्थान में ' क्क यूयं पक्कवन्तः ' इत्यादि प्रयोग देखे जाते हैं । " अन्त में स्वपक्ष का पूर्ण समर्थन करते हुए भाष्यकार कहते हैं- " पूर्वोक्त सारे शब्द देशा-न्तरों में प्रयुक्त होते देखे जाते हैं " । आप कहें कि हमें तो उपलब्ध नहीं होते, हमनें तो इनका प्रयोग नहीं सुना ” तो इस के उत्तर में हम यही कहेंगे कि " आप उपलब्धि के लिए प्रयत्न कीजिए! शब्दशास्त्र महागम्भीर है । सातद्वीप वाली पृथिवी, तीनों लोक, चार वेद, अङ्गग्रन्थ - रहस्यग्रन्थयुक्त १०१ यजुर्वेद की शाखाएं, १००० सामशाखाएं, २१ ऋग्वेद शाखाएं, अथर्व शाखाएं, वाकोवाक्य, इतिहास, पुराण, वैद्यक आदि महाशब्द-
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उपनिषद्रव्द • || भाष्यभूमिका | विषयोपक्रम स्थल का अन्वेषण किए बिना ही शास्त्र प्रयोग के स्थल हैं । इतने महाविशाल प्रयोग साहसमात्र है ” । “ सन्त्यप्रयुक्ताः ” ( अमुक शब्द अप्रयुक्त हैं ) यह कह देना हैं, उनका भी अपिच “ जिन ऊष - तेर आदि शब्दों को आप अप्रयुक्त समझते “ यदो ' प्रयोग देखा जाता है । कहां? वेद में सुनिए! “ सप्तास्ये रेवतीरेवदूष ” यत्रा नश्चक्रा रेवती रेवत्यां तमूष ” “ यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र ” “ जरसं तनूनाम् ” * इति । ) " सन्ति वै शब्दश अप्रयुक्ताः । तद्यथा * ( आक्षेपवार्त्तिकम् ) — “ अस्त्यमयुक्तः " । ( भाष्यम् । भवान्ब्दानां साधुत्वमध्यवस्यति ऊष, तेर, चक्र, पेचेति । किमतों यत्सन्स्य प्रयुक्ताः? प्रयोगाद्धि ) - " इदं तावद्विप्रतिषिद्धम् - यदुच्यते-' य इदानीमप्रयुक्ता नामी साधवः स्युः " । ( आक्षेपासंगतिभाष्यम् नाप्रयुक्ताः, अथाप्रयुक्ता न सन्ति सन्ति चाप्र ' सन्ति वै शब्दा अप्रयुक्ता ' इति । यदि सन्ति भवानाह सन्ति शब्दा अप्रयुक्ता इति । कश्चेदानी--युक्ताश्चेति विप्रतिषिद्धम् । प्रयुञ्जान एवं खलु स्यात्? ” । ( आक्षेपासंगतिबाधकभाष्यम् ) - " नैतद्वि-. मन्यो भवज्जातीयकः पुरुषः शब्दानां प्रयोगे साधुः शास्त्रेणानुविदधते । श्रप्रयुक्ता इति ब्रूमः । प्रतिषिद्धम् । सन्तीति तावद्द्ब्रूमः । यदेताञ्छात्र विदः भवज्जातीयकः पुरुषः शब्दानां प्रयोगे साधुः यल्लोकेऽप्रयुक्ता इति । यदप्युच्यते- कश्चेदानीमन्यो? । लोकेऽप्रयुक्ता इति " । ( आक्षेपभाष्यम् ) —— स्यादिति । न ब्रूमोऽस्माभिरप्रयुक्ता इति । किं तहिं भाष्यम् ) - " अभ्यन्तरोऽहं लोके, न त्वहं लोकः " । " ननु च भवानप्यभ्यन्तगे लोके " । ( समाधान ” । ( आक्षेपबाधक वार्त्तिकम् ) — ‘ अस्त्यमयुक्त इति चेन्नार्थे शब्द प्रयोगात् कारणम्? । अर्थे शब्द प्रयोगात् । अर्थे ( भाप्यम् ) — “ अस्त्यप्रयुक्त इति चेत् । तन्न प्रयुज्यन्ते । किं " । शब्दाः प्रयुज्यन्ते । सन्ति चैषां शब्दानामर्था येष्वर्थेषु " | ( माध्यम ) " अप्रयोगः खल्व-( श्र | क्षेपसाधक वार्त्तिकम् ) – “ अप्रयोगः प्रयोगान्यत्वात् प्रयुञ्जते ॥ यदेषां शब्दानामर्थेऽन्याच्छन्दान् प्येषां शब्दानां न्याय्यः । कुतः? | प्रयोगान्यत्वात् क यूयं तीर्णाः चक्रेत्यस्यार्थे - क यूर्य तद्यथा - ऊपेत्यस्य शब्दस्यार्थे क यूयमूषिताः, तेरेत्यस्यार्थे । " । कृतवन्तः । पेचेत्यस्यार्थे व यूयं पक्ववन्त इति
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उपनिषच्छब्द || भाष्यभूमिका ॥ विषयोपक्रम उपर्युक्त निदर्शन से विज्ञ पाठकों को विदित हुआ होगा कि वररुचि जैसे महाविद्वान् को भी यह पता न था कि ऊष - तेर आदि शब्दों का प्रयोग वेद में होता है । साधारण लौकिक दृष्टि को लेकर ही उन्होंने यह हठ किया था कि उक्त शब्द प्रयुक्त हैं । अन्त में जब भगवान् पतञ्जलिने वेद में ऊष - तेर आदि का प्रयोग दिखलाया, तब कहीं उनका सन्देह दूर हुआ । इधर हमारे नौसिखिया विद्वान् कहते हैं कि हमने अमुक विषय उपलब्ध नहीं किया, इस लिए हम नहीं मानते । इस के उत्तर में हम ' उपलब्धौ यत्नः क्रियताम् ' । यही कहेंगे । हम जिन विषयों का निरूपण कर रहे हैं, उन की प्रामाणिकता स्वयं वेद पर निर्भर है । अब " शेष कोपेन पुरयेत् ” का युग नहीं है । अबतो " बाप बता नहीं श्राद्ध कर " के नियन्त्रण में चलना पड़ेगा । आज एक ऐसी ही जटिल समस्या हमारे सामने है । वह है- " उपनिषत् " शब्द । उपनिषदों के सम्बन्ध में “ उपनिषत् शब्द का क्या अर्थ है "? पहिले यही प्रश्न हमारे सामनें आता है । वैदिक तत्वों से अपरिचित भारतीय विद्वानों ने उक्त प्रश्न का जो समाधान किया है, सूचीकटाहन्याय से हम संक्षेप से पहिले उसी की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं । इति -- विषयोपक्रमः ( सिद्धान्तसमाधान वार्त्तिकम् ) – “ सर्वे देशान्तरे " । ( माप्यम् ) “ सर्वे खल्बप्येते शब्दादेशा-म्ऩरेषु प्रयुज्यन्ते ” । ( आक्षेपभाष्यम् – “ न चैवोपलभ्यन्ते । उपलब्धौ यत्नः क्रियताम् । महान् शब्दस्य प्रयोग विषयः । सप्तद्वीपा वसुमती, त्रयो लोकाः, चत्वारो वेदाः, साङ्गाः सरहस्या । बहुधा भिन्ना एकशतमध्वर्युशाखाः, सहस्रवत्र्मा सामवेदः, एकविंशतिधा बाहूवृच्यं, नवधाथर्वणे वेदः, वाकोवाक्यमितिहासः पुराणं वैद्यकमित्येतावाच्छन्दस्य प्रयोग विषयः । एतावन्तं शब्दस्य प्रयोगविषयममननुनिशम्य ' सन्त्य प्रयुक्ता ' इति वचनं केवलं साहसमात्रमेव + + + ये चाध्येते भवतोऽप्रयुक्ता श्रभिमताः शब्दा एतेषामपि प्रयोगो दृश्यते । क? । वेदे । तद्यथा - " सप्तास्य रेवतीरेवदूष, यद्वो रेवती रेवत्यां तमूष, यन्मे नरः श्रुत्यं ब्रह्म चक्र, यत्रानञ्चका जरसं तनूनाम् ” इति ॥ ६
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वि विध भावों से श्राक्रान्त स्थावर जङ्गमात्मक विश्व की ओर यदि हम दृष्टिपात करते हैं तो हमें वहां तीन भाव उपलब्ध होते हैं । प्रयास करने पर भी तीन से अतिरिक्त कोई चौथा वस्तुतत्व उपलब्ध नहीं होता । उपलब्ध होने वाली उक्त तीनों वस्तुओं को न्यून्याधिक सभी जानते हैं । सर्वविदित वे तीनों पदार्थ ज्ञान-क्रिया- अर्थ इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ज्ञायते, क्रियते, विद्यते तीन से अतिरिक्त चतुर्थतत्व का वास्तव में अत्यन्ता भाव है । जानना पहिला भाव है, करना दूसरा भाव है । जो जाना जाता है, एवं जिस के आधार पर कर्म किया जाता है, ज्ञान - क्रिया का अधिष्ठाता वह तीसरा अर्थतत्व है । यह अर्थतत्व ज्ञान - क्रिया से पृथक् है, अथवा क्रिया ही क्रमशः बल - शक्ति गुण रूप में परिणत होती हुई " गुण कूटो द्रव्यम् " इस आस्तिक सिद्धान्त के अनुसार, एवं " अर्थः क्रियाकारित्वं सत् " इस नास्तिक सिद्धान्त के अनुसार अर्थरूप में परिणत हुई है? यह विवादास्पद विषय है । इसे इस प्रकरण में विशेषस्थान नहीं दिया जा सकता । यहां अर्थ-तत्व को ज्ञान एवं क्रिया से पृथक् मानकर ही कुछ कहना है । सामान्यदृष्टि से विचार करने पर अर्थतत्व ज्ञान एवं क्रिया से सर्वथा विजातीय, अतएव भिन्नपदार्थ ही प्रतीत होता है । ज्ञानतत्व विषयरूप अर्थ को अपने उदर में लेकर ही प्रतीति का विषय बनता है । यही सविषयक ज्ञान सविकल्पक नाम से प्रसिद्ध है । यदि ज्ञान में से विषयों का सर्वथा बहिष्कार कर दिया जाता है तो वह ज्ञान निर्विकल्पक बनता हुआ प्रतीति जगत् से बहि-र्भूत होजाता है । ऐसी अवस्था में हम अर्थरूप विषय को ज्ञान से वास्तव में पृथकतत्व माननें के लिए तय्यार हैं । अपिच अर्थरूप विषय धामच्छद ( जगह रोकने वाला ) है, आवरक है, तमोमय है । इधर ज्ञान प्रकाशस्वरूप है, अधामच्छद है, अनावरक है । ज्ञानप्रकाश से तमोमय विषय प्रकाशित होता है, दूसरे शब्दों में विषय को अपने गर्भ में प्रतिष्ठित कर के ही ज्ञान स्वस्वरूप से विकसित होता है । यद्यपि ज्ञान स्वत एव विकसित है, परन्तु तमोमय विषय ही ज्ञान के उदय के परिचायक माने गये हैं । इन सब कारणों से भी हम ज्ञान को विषय से पृथक्तत्व मानने के लिए तय्यार हैं । 1
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उपनिषच्छब्द ०३ ॥ भाष्यभूमिका ॥ । द्रष्टा ज्ञान एक है, अपिच ज्ञान द्रष्टा ( देखने वाला ) है, विषय दृश्य ( दीखने की वस्तु ) है वाला एकरस ) है, दृश्य विषय मर्त्य दृश्य विषय नाना ( अनेक ) हैं । द्रष्टाज्ञान अमृत ( न बदलने माना जासकता । ( बदलने वाला ) है । इसलिए भी ज्ञान और अर्थ को एक वस्तु नहीं - पीना - हंसना -यही अवस्था कम ( क्रिया ) की है । सोना - जागना उठना - बैठना खाना अर्थतत्व ही है, अस्मत्संस्था चलना - बोलना आदि सब कर्म्म हैं । इन सब की आधारभूमि ), एवं परमात्मक भेद से दो भागों ( अध्यात्म जगत् ) में कर्म्मतत्व प्रत्यगात्मकर्म्म ( जीवात्मकर्म्म ह्रीं की ) स्वतन्त्रता है, एवं कितनें में विभक्त है । कितने हीं आध्यात्मिककम्मों में हमारी ( जीवात्मा हैं 1 । उदाहरणार्थ बोलना- हंसना-आध्यात्मिक कर्म्म हृदय में प्रतिष्ठित ईश्वर द्वारा सञ्चालित होते के कर्म्म हैं 1 । " मैं अमुक कर्म्म क्रोध करना - प्रसन्न होना आदि प्रातिस्त्रिक कर्म्म प्रत्यगात्मा प्रकार जिन कम्मों में इच्छास्वात-करना चाहता हूं, अमुक कर्म्म मैं नहीं करना चाहता " इस पशु - पक्षि- मनुष्यादि के त्र्य है, वे सब ऐच्छिक कर्म जीवात्मा के कर्म हैं । एवं कृमि - कीट- का जिस की इच्छा से शिर - ग्रीवा - हस्त - उदर - नासिक'- चतु मुख - कर्ण - पादादि शरीरावयवों - शुक्रादि शारीरधातुओं का निर्माण होता है, हम से सर्वथा प्रविज्ञातत्वङ् - मांस - मेद अस्थि - मज्जा है, वही इच्छा ईश्वरेच्छा है । अन्नाहुति से जिस की इच्छा से नियतरूप से निर्माण हुआ करता से कर्म्म ६ भागों में विभक्त है । जायते, अस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते, अपक्षीयते, नश्यति, भेद । यह कर्म्म सर्वथा नियत हैं । इन पद्मावविकारयुक्त यह कर्म ईश्वरेच्छा से ही सम्बन्ध रखता है में नियत प्राकृतिक कम्मों को लक्ष्य में हमारी इच्छा का यतुकिञ्चित् भी स्वातन्त्र्य नहीं हैं । इन्हीं रख कर स्मृति कहती है--न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्य्यतेह्यवशः कर्म्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ( गी ० ३।५ । ) । ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । | ) | भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ( गी ० १८ । ६ उक्त उभयविध कर्म्म नास्ति अस्ति नास्ति - लक्षण बनते हुए असल्लक्षण हैं, नास्ति-
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उपनिषद भाष्यभूमिका प्राचीनदृष्टि सार हैं । इधर हमारा अर्थ सल्लक्षण है । क्रियालक्षण कर्म्म प्रतिक्षण - विलक्षण है, अर्थ चिर-स्थायी है । नास्तिसार कर्म्म क्षणिक है, धारावलावच्छिन्न अर्थ अक्षण है । घटपटादि पदार्थों के कर्म्म परिवर्तनशील हैं, घटपटादि अर्थ कल भी थे, आज भी हैं, एवं चिरकाल पर्यन्त रहेंगे । त्रिक्षण कर्म का स्वरूप अनिरुक्त है, बहुक्षण अर्थ का स्वरूप निरुक्त है । कर्म को स्वप्रतिष्ठा के लिए अर्थ की अपेक्षा होती है, अर्थ स्वयं सत्तायुक्त है । इन्हीं सब कारणों से हम इस अर्थतत्व को भी ज्ञानवत, क्रियातः से पृथक्तत्व मानने के लिए तय्यार हैं । ऐसी दशा में प्रकरण के आरम्भ में प्रतिज्ञात ज्ञान - क्रिया अर्थ भेद भिन्न हमारा त्रित्ववाद सर्वथा अक्षुण्ण रह जाता है । विश्व में अनन्त ज्ञानधाराएं हैं, अनन्त कर्म्मधाराएं हैं, एवं अनन्त ही प्रथधाराएं है । इन अनन्त ज्ञान - क्रिया -अर्थों की समष्टिरूप विश्व भी अनन्त ही है । विश्व में जितने भी जड़ चेतनात्मक पदार्थ हैं, उन सब का ज्ञान परिमित एवं भिन्न २ है । सब के कर्म्म पृथक् पृथक् हैं । सब का स्वरूप ( अर्थ ) भिन्न २ है । उदाहरण के लिए मनुष्यजाति को ही लीजिए । मनुष्यों के ज्ञान - कर्म्म- अर्थ परस्पर में सर्वथा भिन्न हैं । जाति को छोड़िए, केवल व्यक्ति को लीजिए । इन्द्रियसम्बन्धी ज्ञान - क्रिया- अर्थ परस्पर में भिन्न हैं । चतुरिन्द्रिय का ज्ञान - कर्म - अर्थ भिन्न है, प्राण का भिन्न है, रसना का भिन्न है । इन सम्पूर्ण ज्ञानों का, सम्पूर्ण क्रियाओं का. सम्पूर्ण पथ का जो कोई एक मूलस्रोत है, उसे ही दार्शनिकों ने “ ईश्वर ” नाम से व्यवहृत किया है । अपने २ वैयक्तिक आयतन के अनुसार सत्र प्राणी उसी की ज्ञान - कर्म्म -- अर्थमात्रा को लेकर अपनी २ स्वरूपसत्ता को सुरक्षित रखने में समर्थ हो रहे हैं । वह सर्वज्ञानमय है, इसी लिए उसे सर्वज्ञ कहा जाता है । वह सर्वकर्म्ममय है, अतएव उसे सर्वशक्तिमान् कहा जाता है, वह सर्वार्थमय है, अतएव उसे सर्ववित कहा जाता है । विविधभावापन्न, एवं परस्पर अत्यन्त विरुद्ध यच्चयावत् ज्ञानमात्राओं का उस में समावेश है, अतएव वह सर्वज्ञ है 1 । शक्ति-रूप विविधभावापन्न सम्पूर्ण कर्म्ममात्राओं का वह आगार है, अतएव वह सर्वशक्तिमान् है । जगदीश्वर के इसी विश्वव्यापक ज्ञान - क्रिया - अर्थमय स्वरूप का निरूपण करती हुई उपनि-बच्छ्रुति कहती है--