Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 31–40
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 31–40
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किमपि प्रास्ताविकम् एवं उसी का नाम है - ' तत्त्वात्मक अपौरुषेय समझने मात्र के लिए उस सर्वादिभूत अव्यक्तभावापन्न वेद " । प्रथमा शब्द तन्मात्रा के सन्निकटवर्ती रहने से हम से समन्वित मान सकते हैं, जिस मौलिक ' - वेदात्मक - स्वयम्भूकारण को भी ' शब्दतन्मात्रा ' नाम पर - ' वेदशब्देभ्यः ' का तात्त्विक समन्वयार्थ मात्रारूप ' शब्द का तात्पर्य्यार्थ है - ' वाक् ' तत्त्व, जिसके श्राधार इत्यादि वचनान्तर से स्पष्ट प्रमाणित है । शब्द होगा- ' वेदवाग्भ्यः ' जैसाकि - वाग्विवृताश्च वेदाः ' है, जिससे सर्वप्रथम शब्द - स्पर्शादि - गुणभूत की जननी समुद्रात्मिका मनःप्राणगर्भिता वाग्देवी ही वह वेदतत्त्व शास्त्रात्मक वेद को ही अपौरुषेयवेद मान बैठने - लक्षणा पञ्चतन्मात्राओं की अभिव्यक्ति मानी है राजर्षिने । शब्द-जासकता कि, क्या ' अग्निमीले पुरोहितम् ' इत्यादि वाले विद्वन्मन्यों से प्रणतिपुरस्सर क्या यह प्रश्न नहीं किया वेदग्रन्थ से शब्द - स्पर्शरूप -- रसादि तन्मात्राएँ वर्णाक्षर शब्द पदवाक्य सन्दर्भादि की समष्टिरूप- शब्दरचनात्मक इस प्रश्न के समाधान का अन्वेषण प्रयास करें उत्पन्न होसकती है? । मुकुलितनयन बन कर स्वयं विद्वान् ही त्रिसहस्रवार्षिक व्यामोहन से आत्मपरित्राण के लिए , और राजर्षि की निम्नलिखित सूक्ति के माध्यम से अपने
सचेष्ट बने कि--शब्द- स्पर्शच - रूपं च - रसो- गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते - प्रश्वति - गुण - कर्म्मतः ॥
-मनु “ प्रचण्डज्योतिर्मय सूय्यबिम्ब महदुक्थरूप लात्मक - सौर - प्रकाशमण्डल - महाव्रतरूप साक्षात् साक्षात ऋग्वेद है, सहस्ररश्मिवितान - मण्ड-' पुरुष ' रूप साक्षात् यजुर्वेद है । तदित्थं - मण्डल सामवेद है, केन्द्र - प्राणाग्नि - सावित्राग्नि - तत्त्व मण्डल - ऋक् साम - यजुः - को साक्षात् प्रतिना - ( मूर्ति ) -महिमामण्डल - केन्द्रीय - पुरुष - रूपेण सौर-के तो ) सर्वसामान्य मादृश ग्रामीण अज ही प्रमाणित होरहा है । ( आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व रहा है, तीनों वेद ही तप रहे हैं " । जन भी इस तथ्य से सुपरिचित थे कि - " सूर्य्य क्या तप पुनः हम उन मान्य विद्वानों से विनय उक्तवाक्य - सन्दर्भ से अनुप्राणित ' सौरवेद ' ( पुरस्पर यह प्रश्न कर लेने की महती घृष्टता कर रहे हैं कि, क्या क्या सूर्य्यरूपेण शब्दात्मक वेदग्रन्थ तप रहे गायत्री हैं मात्रिकवेद ) वेद की पुस्तककी ओर सङ्कतग्रह करा रहा है? । महाभाग दृष्टिनिक्षेपानुग्रह करें, और तदनन्तर? । निम्नलिखिता शातपथी श्रुति के मूलाक्षरों पर विद्वान् व्यय करने में प्रवृत्त हों— ही वेद की पौरुषेयता अपौरुषेयता के सम्बन्ध में अपनी प्रज्ञा का यदेतन्मण्डलं तपति, तन्महदुक्थम् । ता ऋचः तन्महाव्रतम् । तानि सामानि । स साम्नां लोकः । स ऋचां लोकः । अथ यदेतदचिर्दीप्यते, सोऽग्निः, तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा । अथ त्रय्येव य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः, याहु: - त्रयी ' वा s पा विद्या तपति ' इति । विद्या तपति । तद्वै तत्--- शतपथब्राह्मण पाञ्चभौतिक - विश्व के सत्त्वात्मक भूत १० / ५ / २१,२, कं ० होता है, तो प्रत्येक भौतिक - पदार्थ में हमें वस्तुमूत्ति - भौतिक- पदार्थों के स्वरूप की ओर जब हमारा ध्यान याकर्षित , वस्तुमण्डल, एवं मूर्त्ति मण्डलान्तर्वर्त्ती - प्राणात्मक २८
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उपनिषद्भूमिका १ खण्ड होते हैं । जिस धामच्छद-गतिभाव ( गत्यागतिभावद्वय - निबन्धना गति ), ये तीन स्वतन्त्र भाव करते उपलब्ध हैं, वह स्पृश्य - धामच्छद - भूत ही-( नगँह रोकने वाले ) वस्तुभाव का हम हाथों से स्पर्श कर सकते हैं हैं,, किन्तु देख नहीं सकते । इस वस्तुपिण्ड ' वस्तुपिण्ड ' है, यही ' वस्तुमूर्त्ति ' है, जिसे हम ' छू ' भर सकते ( व्यासानुगत ) पार्श्वद्वयबिन्दु के उत्तरोत्तर अणुभाव ( स्पृश्या - मूर्ति ) को केन्द्र बना कर उत्तरोत्तर विष्कम्भानुगत बनाने वाला बहिर्म्मण्डल ही वह तेजो-में परिणत होने से वस्तुपिण्ड से उत्तरोत्तर छोटे श्राकार की मूर्तियाँ - श्राकार से समतुलित ही ) वस्तु का स्वरूप मण्डल है, जिसके चतुरिन्द्रियानुगत प्रतिफलन से ही हमें तत्रस्थ हैं, कदापि उसका स्पर्श सम्भव नहीं है । उक्त दिखलाई देता है । यही दृश्यमण्डल है । जिसे हम देख रहे - प्राणभाव ही दोनों की स्वरूप प्रतिष्ठा है । पिण्ड, एवं मण्डल में अवारपारीणरूपेण - परिव्याप्त - गत्यात्मक पृथक् भाव समन्वित होरहे हैं | और यों प्रत्येक वस्तुतत्त्व में ' मूर्त्ति - मण्डल - गति ' - रूपेण तीन मण्डलभाव तीन पृथक् का जनक तत्त्व ही ' सामवेद ' ' इन में मूर्त्तिभात्र का मूलजनक तत्त्व ही ' ऋग्वेद ' है, त्रयीब्रह्म ' ( वेदब्रह्म ) के द्वारा ही मूर्त्ति-है, एवं गतिभाव का जनक तत्त्व ही ' यजुर्वेद ' है । यों होरही है । क्या वेदग्रन्थों से मण्डल - गतिरूपेण सम्पूर्ण भूत - भौतिक पदार्थों की स्वरूपाभिव्यक्ति विवशतया यह स्वीकार का स्वरूपोदय हुआ १। मानना पड़ेगा, और पदार्थों के मूर्ति - मण्डल - गति - भावों इन शब्दात्मक वेदग्रन्थों से अवश्य कर ही लेना पड़ेगा कि, निम्नलिखित तैत्तिरीय - वचन से सङ्केतित है, वेदब्रह्म जिससे विश्व का स्वरूप निर्माण - ' धाता ही कोई विभिन्न तत्त्व है, एवं वही पौरुयेय नित्यकूटस्थ वेद यथापूर्वम्कल्पयत् ' रूपेण प्रक्रान्त है— ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहु: -सर्वा गतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्व तेजः सामरूपं ह शश्वत्--के सर्व हीदं ब्रह्मणा व सृष्टम् ॥ - तैत्तिरीयब्राह्मण होजाता है कि मन्त्रब्राह्मणात्मक लमतिपल्लवितेन । उक्त कतिपय- निदर्शनों से यह स्पष्टरूपेण प्रमाणित हुआ है, वह तत्त्वात्मक - वैज्ञानिक- वै नित्यकूटस्थ -शब्दात्मक - वेदशास्त्र में जिस वेदतत्त्व का स्वरूप - दिग्दर्शन के तारतम्य से चराचरप्रजा - से वेदतत्व ही अपौरुषेय - कूटस्थ - नित्यवेद है, जिसके द्वारा ही बलग्रन्थियों - अपौरुषेय- वेद के स्वरूप - दिग्दर्शन समन्वित विश्व का स्वरूप - निर्माण हुआ है । इसी तत्त्वात्मक - मौलिक से अनुप्राणिता- वैज्ञानिकी -के लिए प्रक्रान्त चतुर्थ - स्तम्भ में घ - वेद के तात्त्विक उदाहरणधिया स्वरूप की रूपरेखा निम्नलिखित अठारह ( १८ ) प्रकार की वेद - निरुक्ति ' नामक अवान्तर - प्रमुख प्रकरण में वैज्ञानिक - वेदु निरुक्तियों का समावेश हुआ है-१ – वेदप्रतिष्ठानुगता- श्रास्मस्त्ररूपनिरुक्तिः-२ – सच्चिदानन्दलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३ – अमृत - मृत्युमय - श्रात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः २६
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किमपि प्रास्ताविकम् ४ - मन: - प्राण- वाङमयी - त्रिकलवेदनिरुक्तिः ५ – उक्थ - ब्रह्म - साम - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः -आत्म - ज्योति - प्रतिष्ठा - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ७- उपलब्धिलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ८-- ब्रह्म ेन्द्र विष्णुसहकृता-- वेदनिरुक्तिः ६- प्राण - श्रापो वाक् - सहकृता वेदनिरुक्तिः १० - समष्टिरूपेण श्रात्मवेदनिरुक्तिः ११- ब्रह्म -- विद्या - वेद - भिन्ना - ज्ञानलक्षणा वेदनिरुक्तिः १२- वेदनिरुक्तौ १३ १६ १७ १८ " " ( १ ) - पर्ववेदनिरुक्तिः ( २ ) - भावनावेदनिरुक्तिः ( ३ ) - भाववेदनिरुक्तिः ( ४ ) - दिग्वेदनिरुक्तिः ( ५ ) देशवेदनिरुक्तिः ( ६ ) - कालवेदनिरुक्तिः ( ७ ) -वर्णवेदनिरुक्तिः तथानिर्द्दिष्टा वेदनिरुक्तियों के आधार पर तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित होगा ही अवश्य ही अमुक - सीमापर्य्यन्त वेदभक्त - विद्वानों का इस वेदग्रन्थों में उपवर्णित तत्त्वात्मक वेद तो सृष्टि कि, ' वेद ' केवल शब्दात्मक ग्रन्थ का नाम ही नहीं है । पितु सम्पूर्ण विश्व एवं विश्वप्रजा का स्वरूप- वितान का वह मौलिक आधारभूत तत्त्व है, जिस के आधार पर ही अपौरुषेय है । ऋषि उसके द्रष्टामात्र हैं, कर्त्ता नहीं हुआ है । तत्त्वात्मक वेद का वह मौलिक स्वरूप सर्वथा महर्षिगण द्रष्टा हैं, वहाँ मन्त्रब्राह्मणात्मक - । मन्त्रब्राह्मणात्मक अपौरुषेय तत्त्ववेद के जहाँ वैज्ञानिक- वेदनिरुक्ति का फलितार्थ और है, इसी पौरुषेय - शब्दवेद के महर्षिगण कर्त्ता हैं, एवं यही इस चतुर्थ - स्तम्भ - विराम के साथ प्रस्तुत - भूमिका - प्रथमखण्ड- माङ्गलिक - फलितार्थ पर ' क्या उपनिषत् वेद है? ' उपरत होरहा है । ४ उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - प्रथमखण्ड प्रधान- विषयों का संस्मरण -- उपरत के १ ३०
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उपनिषद्भूमिका १ खराए प्रमुख विषयों से अनुगत - उपनिषद्विज्ञान-तदित्थं - चार - प्रधान - स्तम्भों से समन्वित, एवं अवान्तर उपनिषत्प्रेमियों की आर्षप्रज्ञा के अनुरञ्जन के लिए भाष्यभूमिकानुगत - स्तम्भचतुष्टयात्मक - प्रथमखण्ड- - प्रथमखण्ड के अन्त के चतुर्थ - स्तम्भरूप - ' क्या उपनिषत् ही प्रवृत्त हुआ है । स्तम्भचतुष्टयात्मक - भूमिका वेद के सुविशद - तात्त्विक स्वरूप के उपबृ ंहण के बिना क्योंकि वेद है? ' इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का समाधान साङ्गोपाङ्ग - समाधान की दृष्टि से चतुर्थ - स्तम्भात्मक इस अपूर्ण ही बना रह जाता है । अतएव इस प्रश्न हमें के भूमिका के द्वितोय - तृतीय - दो खण्ड और लिपिबद्ध महान् प्रश्न की समाधान की पूर्ति के लिए ही तत्खण्डों में ही द्रष्टव्या है । प्रकृत में सन्दर्भ - सङ्गति -करने पड़े हैं, जिन के प्रतिपाद्य विषयों की रूपरेखा ही पर्याप्त मान लिया जायगा । मात्र के लिए २ - ३ खण्डों के प्रधान - स्तम्भों का नामरमरण 11-उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - द्वितीयखण्ड के प्रधान -- विषयों का संस्मरण २ में प्रथमखण्डोत्तरभावी - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - क्रमप्राप्त द्वितीयखण्ड विभाग " रूपेण ६ प्रधान - रूपेण निम्नलिखित पाँच प्रमुखस्तम्भ, एवं एक " परिशिष्ट सन्दर्भ समाविष्ट हैं— १-१ - वेद का मौलिक - स्वरूप --२ - तात्त्विकवेद, और प्रमाणवाद-३ - प्राजापत्य- वेदमहिमा-४ - अपौरुषेयवेद का तात्त्विक - इतिवृत्त--प्रथमस्तम्भ -द्वितीयस्तम्भ - तृतीयस्तम्भ -चतुर्थस्तम्भ ५- अग्निविकासरहस्य, और वेदशाखाविभाग- पञ्चमस्तम्भ * - परिशिष्ट - विभाग भी अवान्तर अनेक प्रमुख-प्रथमखण्डवत् द्वितीयखण्डानुगत उक्त स्तम्भपञ्चक के प्रत्येक स्तम्भ में को अवगत होगा । प्रकृत में विषयों का समाबेश हुआ है, जैसाकि तत्खण्ड की विषयसूची से पाठकों ३१
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किमपि प्रास्ताविकम् निदर्शनमात्र के लिए तदवान्तरविषयों में से कुछ एक प्रमुख विषयों होगा । का नाम स्मरण ही कर लेना पर्याप्त प्रथमखण्ड के चतुर्थस्तम्भात्मक ' क्या उपनिषत् वेद ( घ ) कार परिच्छेदात्मक वैज्ञानिक ' वेदनिरुक्ति ' नामक अवान्तर है? ' नामक चतुर्थ ( अन्तिम ) स्तम्भ के वेद के तत्त्वात्मक स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुए उपनिषत् प्रेमियों प्रमुख प्रकरण में अठारह प्रकार से करने का प्रयास हुआ है कि, “ वेदग्रन्थों में विद्यारूपेण प्रतिप्रादित का ध्यान इसी तथ्य की ओर आकर्षित श्राधार है, जिसे माध्यम बना कर ही सर्वज्ञ सर्ववित् प्रजापति वेदत्तत्त्व सृष्टि का वह मौलिक हैं ” । ऐसा यह वेदपदार्थ सच्चिदानन्दब्रह्म से अभिन्न है । अतएव सृष्टिनिर्माण में समर्थ बने हुए प्रथमखण्ड का ' आत्मवेदनिरुक्ति ' नामक इसे ' आत्मवेद ' कहा गया है ( देखिए ईश्वरप्रजापति ' वेदात्मा ' ' वेदमूर्त्ति - ' वेदैकत्रेद्य अवान्तर आदि प्रकरण उपाधियों ) । श्रतएव क्लेश - कर्म्म --विपाकाशयैरपरामृष्ट खण्डानुगता ‘ वैज्ञानिकवेदनिरुक्ति ' नामक अवान्तर प्रकरण में तत्त्वात्मक से समन्वित है । इसप्रकार प्रथम-से अभिन्न, अतएव अनन्तभावापन्न अपौरुषेय वेदतत्त्व के उस मौलिक नित्यकूटस्थ ' सत्यं ज्ञानमनन्त ब्रह्म ' ध्यान आकर्षित करने का यत् किञ्चत् प्रयास हुआ है, जो स्वरूप की ओर ही विज्ञ पाठकों का विस्मृतिगर्भ का ही पथानुवर्त्मा प्रमाणित होता आरहा है । तत्त्वात्मक स्वरूप विगत तीन सहस्राब्दियों से चिरकालानुगत विच्छेद से समन्वित अमुक दृढमूल संस्कार एकहेलयैव सकते । अतएव यह् सम्भव है कि, ' प्रथमखण्डानुता ' ' तत्त्ववेदनिरुक्ति ' से अभिभूत नहीं किए जा-तथाविध संस्कार अनुगता रूपरेखामात्र से तबतक बने, जबतक की प्रमाण - युक्ति -- तकं - इतिवृत्त माध्यम से तत्ववेद का मौलिक - तात्विक स्वरूप विस्तार से स्पष्ट नहीं कर दिया जाय - आदि । एकमात्र आदि साधनों के से भूमिका - द्वितीय, तथा तृतीय - खण्डों की अभिव्यक्ति हुई है । द्वितीयखण्ड इसी उद्देश्य मौलिक स्वरूप का ही स्वरूपोपबृंहण हुआ है, जिस की आधारभूमि है - ' महर्षि के भारद्वाज प्रथमस्तम्भ में वेद के ग्निमूलक अन्तवेद ', के सावित्रा-इस तथ्य के तिमूल, अवदुर्विशेयइतिवृत, अनन्ववेद आधार पर का ही विज्ञेय इस प्रथमस्तम्भ इतिहास, वेदविद्या में अनन्तवेद के का संस्थाविभाग विज्ञेय , सावित्राग्नि के स्वरूप - लक्षण, इत्यादि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों काविस्तार से स्पष्टीकरण - प्रयास हुआ है । जिसप्रकार वेदशास्त्र का तत्त्वात्मक ' वेद ' पदार्थ आज हमारे लिए वेदशास्त्र का ' ऋषि ' पदार्थ भी अपने तात्त्विक मौलिक स्वरूप से आज दुरधिगम्य बना हुआ है, तथैत्र सर्वथैव हमारी प्रज्ञा से तिरोहित प्रमाणित होचुका है । वसिष्ठ - अगस्त्य - कश्यप - भृगु - अङ्गिरा श्रत्रि - क्रतु- दक्ष जमदग्नि ऋष - नाम हम परम्परया सुनते, सुनाते आरहे हैं, उनके सम्बन्ध में अस्मदादि - भरद्वाज आदि आदि रूपेण जो तात्त्विक स्वरूप से तटस्थ बने रहने वाले विद्वानों की भी ऐसी सामान्य जनों की, और वेद के मानव ऋषियों के ही हैं । विरोध नहीं है इस मान्यता का । किन्तु मान्यता बन गई है कि, उक्त नाम अमुक अवसान मान बैठना वेद के ऋषिपदार्थ से उसीप्रकार अपने आपको इस मान्यता का मानव ऋषि पर ही वेदग्रन्थों को ही अपौरुषेय मान बैठने के दुष्परिणाम स्वरूप तत्त्वात्मक वेदपदार्थ पराङमुख बना लेना है, जैसेकि बन गया है । हमारी प्रज्ञा से परा: - परावत ३२
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उपनिषद्भूमिका १ खण्ड वस्तुस्थिति तो वास्तव में ऐसी है कि ऋषि, और वेद, दोनों अमुक तात्त्विक दृष्टिकोण से सर्वथा ही श्रभिन्न हैं, जैसाकि -'ऋषिर्वेदमन्त्रः ' इत्यादि से स्पष्ट प्रमाणित है । वसिष्ठ - अगस्त्यादिरूप - ऋषि शब्द तत्त्वविशेष के ही वाचक हैं प्रधानरूपेण । तात्पर्य्यं यही है कि, प्राणतत्त्व का ही नाम ' ऋषि ' है, जो यजुर्वेद का गतिप्रकृतिक ' यत् ' तत्त्व माना गया है, एवं जिस की व्याप्ति ' जू ' रूप अनन्ताकाश है । ' जू ' रूप अनन्ता-काश में अधामच्छदरूपेण व्याप्त, शब्द - स्पर्श - रूप - रस- गन्ध --- नाम की तन्मात्राओं से प्रतीत, गति-प्रकृतिक ' यत् ' रूप प्राणतत्त्व का नाम ही ' यज्जू: ' है, यही ऋक्सामरूप वयोनाधों से नद्व -- वयोरूप ' यजुः ' है, और यही यजुः प्राण है - ' ऋषितत्त्व ', जिसके प्राणजातिभेद से अगणित विवत होजाते हैं, जैसाकि - विरूपास-इऋषयः - त इद्गम्भीरवेपसः ' ( ऋक्सं ० ) इत्यादि ऋग्वर्णन से स्पष्ट है । यों ऋषि, और वेद, दोनों का श्रभेद भी स्वतः ही प्रक्रान्त दृष्टिकोण से स्पष्ट होजाता है । एकर्षि द्वयर्षि - त्र्यर्षि - सप्तर्षि - नवर्षि-दशर्षि -आदि रूपेण ऋषिप्राण के अनेक महिमामय विवर्त्तो का वेदशास्त्र में उपबृंहण हुआ है । वसिष्ठ-अगस्त्य - कश्यप - आदि प्राणात्मक इन ऋषियों के समावेश से ही भौतिक पदार्थ ' सद्भावापन्न ' बने हुए हैं । क्योंकि -- ' सामान्ये- सामान्याभाव: ' न्यायानुसार स्वयं प्राण में प्राण नहीं रहता । श्रतएव इस ऋषिप्राण की एक पारिभाषिकी संज्ञा - ' असत् ' भी होगई है, एवं ऋषिप्राणरूप यह वेदतत्त्व ही सृष्टि का मूल है, जिसके असन्नामक -- तत्त्वात्मक - चिरन्तन - शब्देतिवृत्त का विस्पष्ट शब्दों में दिगदर्शन कराते हुए भगवान याज्ञवल्क्य कह रहे हैं-असद्वा इदमग्र आसीत् । तदाहुः - किं तदसदामीदिति १, ऋषयो वाव तदग्रेऽ-सदासीत् । तदाहुः - के ते ऋषयः इति?, प्राणा वा ऋषयः । ते यत् अस्मात् - सर्वस्मात्-इदमिच्छन्तः श्रमेण तपसा अरिषन्, तस्माद्ऋषयः । - शतपथब्राह्मणे ६ । १ । १ । १ । वसिष्ठ - अगस्त्य - आदि नाम तत्त्वतः प्राणात्मक ऋषियों ही के निर्वचनार्थानुगत पारिभाषिक नाम हैं । जिस तपःपूत विद्वान् ने अपनी आर्ष - दृष्टि से जिस ऋषि - प्राण का सर्वप्रथम साक्षात्कार कर लिया, तद्युग की यशोनाम - प्रदान - मर्यादा के अनुबन्ध से वह प्राणपरीक्षक मानवश्रेष्ठ भी तऋषिप्राण के नाम से ही समन्वित होगया । और यों प्राणात्मक तत्त्वविशेष के बाचक ऋषिप्राणों के नाम हीं तद्रष्टा मानवश्र ेष्ठों के साथ भी समन्वित होगए । क्योंकि ऋषि, और वेद अभिन्न है । अतएव द्वितीय - खण्ड के प्रथम - स्तम्भानुगत-अवान्तर विषयों में अगत्या हमें—-वेद का ऋषि पदार्थ, सल्लतरण ऋषितत्त्व, रोचनालक्षण -- ऋषितत्त्व, द्रष्टृलक्षण ऋषितत्त्व, एवं वक्तृ लक्षण-- ऋषितत्त्व, नामक अवान्तर विषयों का समावेश कराना पड़ा । तदित्थं २३ ( तेईस ) प्रमुख श्रवान्तर - विषयों से समन्वित ' वेद का मौलिकस्वरूप ' नाम के प्रथमस्तम्भ में वेद के उस तात्त्विक-स्वरूप का ही विस्तार से यशोगान हुआ है, जिसके अनन्तर तत्त्वात्मक वेद, और ग्रन्थात्मक -- शब्दवेद, दोनों की विभिन्नता में यत्किञ्चित् भी तो सन्देह शेष नहीं रह जाता । ३३
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किमपि प्रास्ताविकम् दूसरे - ‘ तात्त्विकवेद, और प्रमाणवाद ' नामक प्रमाणों का सार्थ - संकलन हुआ है, जो विस्पष्ट शब्दो स्तम्भ में श्रुति स्मृति - पुराणादि में पठित उन तीसरे ' प्राजापत्येवदमद्दिमा ' नामक स्तम्भ में वेदमूर्ति में तत्त्वात्मक- वेद का ही स्वरूप अभिव्यक्त कर रहे हैं । से ४४ ( चैवालीस ) अवान्तर - प्रमुख - विषयों के द्वारा प्रजापति के महिमारूप वेद का प्रजापति के माध्यम की सपरिडता, अहोरात्रव्यूहन प्रक्रिया, वेदव्यूहून विस्तार से यशोगान हुआ है, जिस में से- श्रग्निवंश विशेषरूपेणैव संस्मरणीय माने जायँगे । चौथे - ' अपौरुषेयवेद - प्रक्रिया, और चयनयज्ञ, आदि अवान्तर विषय ५३ ( त्रेपन ) अवान्तर विषयों का पारिभाषिकी दृष्टि से का तात्त्विक इतिवृत्त ' नामक स्तम्भ में माध्यम से ऋक् -- यजुः -- साम -- त्रयी के वितानात्मक विस्तार समन्वय हुआ है । इकतीस -- परिलेखों ( चित्रों ) के के लिए विशेष रूपेणैव अनुरञ्जन का साधक का स्वरूपोपबृंहक यह चतुर्थस्तम्भ वेदप्रेमियों सन्निकट से बड़ी, दूर से उत्तरोत्तर छोटी- क्यों प्रमाणित - कैसे होगा, ऐसी हमारी दृढ़तमा श्रात्मनिष्ठा है । वस्तु समाधान ऋक् - यजुः – साम - नाम की तत्त्वत्रयी का वितान प्रतीत होती है?, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न का निश्चयेन तत्त्वात्मक वेद के सम्बन्ध में एक क्रान्तिकारी ही है । और इस दृष्टि से प्रस्तुत चतुर्थ -- स्तम्भ आस्था - श्रद्धा - समन्विता पावन प्रज्ञा में । परिवर्तन ही अभिव्यक्त कर देगा वेदभक्तों की पाँचवें ' अग्निविकासर हस्य, और वेदशाखा ( तेईस ) प्रमुख - विषयों का समावेश हुआ है । सचमुच - विभाग ' नामक पञ्चम - स्तम्भ में - श्रवान्तर २३ ब्राह्मणात्मक - तत्त्वरूप अपौरुषेय वेद के जो शाखा यह अत्यन्त आश्चर्य्योत्पादक साम्य है कि, मन्त्र-विभाग हैं, ठीक वे ही विभाग त्मक वेद के हैं । क्या मूल है इस साम्य का १, प्रस्तुत - मन्त्रब्राह्मणात्मक शब्दा-अनुप्राणित तत्त्वात्मक अपौरुषेयवेद के शास्त्रा - विभागों के पञ्चम स्तम्भ अग्नि के प्रकृतिसिद्ध सहन विकास से विभाग - साम्य का समन्वय करने के लिए प्रवृत्त हुआ अनुपात से ही शब्दात्मक - वेदशास्त्र के शाखा-शिष्टभाग से समन्वित द्वितीयखण्ड निष्कर्षतः वेद के तात्त्विक है । तदित्थं - प्रमुख पाँच - स्तम्भों से, तथा ६ ठे परि-चिरन्तन इतिवृत्त को स्पष्ट करता हुआ प्रथमखण्डानुगत अपौरुषेय -- स्वरूप के रहस्यपूर्ण पारिभाषिक--प्रक्रान्त प्रश्न का ही पूरक बन रहा है, और यही है द्वितीयखण्ड चतुर्थस्तम्भ के - ' क्या उपनिषत् - वेद है? इस दिग्दर्शन । की संक्षिप्ता रूपरेखा का संक्षिप्ततम -स्वरूप-उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - द्वितीय खण्ड के प्रधान - विषयों का संस्मरण - उपरत ३४
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उपनिषद् भूमिका १ खण्ड उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - तृतीयखण्ड के प्रधान - विषयों का संस्मरण द्वितीयखण्डोत्तरभावी - उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत - क्रमप्राप्त - तृतीयखण्ड में प्रधानरूपेण निम्न लिखित ७ ( सात ) प्रमुख स्तम्भों का समावेश हुआ है-१- पूर्वोत्तरमीमांसानुगता - पौरुषेय- अपौरुषेय - मोमांसा - प्रथमस्तम्भ २- उपनिषत्प्रतिपाद्य विषयदिग्दर्शन- -द्वितीयस्तम्भ ३ - उपनिषच्छिक्षास्वरूपदिग्दर्शन-४ - प्रौपनिषद - ज्ञानाधिकारि - स्वरूप - दिग्दर्शन - तृतीयस्तम्भ - चतुर्थस्तम्भ ५- ब्राह्मणारण्यकोपनिषत्सम्बन्धस्वरूपदिग्दर्शन --- पञ्चमस्तम्भ ६- ' श्र ति ' शब्द - मीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एकदृष्टि - षष्ठस्तम्भ ७ - औपनिषद ज्ञानप्रवर्त्तके - तिवृत्तदिग्दर्शन- -- सप्तमस्तम्भ ८ - उपनिषत् के साथ गीताशास्त्र का समतुलन-- उपनिषद्भाष्यभूमिकोपसंहार * -परिशिष्ट - संग्रह ( शास्त्रीयवचनात्तरार्थसमन्वय ) -- अष्टमस्तम्भ उक्त सातों स्तम्भों में ( प्रत्येक में संख्या क्रमानुपात से ) क्रमशः, ५ ६७ से चिदित इन अवान्तर - प्रमुख -- विषयात्मक परिच्छेदों का समावेश हुआ है, जैसा कि तृतीयखण्ड उक्त की आठों सूची स्तम्भों की होगा । प्रथमखण्डानुगता प्रस्तावना विस्तारपथानुमामिनी बनती जारही है । ऋतः अब खण्ड में समावेश रूपरेखा का उत्तरदायित्त्व तृतीयखण्ड पर ही छोड़ा जारहा है । जिन आठ स्तम्भों का तृतीय कर रहा हुआ है, उन का प्रथमस्तम्भ प्रधानरूप से उन मीमांसासूत्रों की वैज्ञानिकी व्याख्या का ही अनुगमन है । है, जिन वैज्ञानिकसूत्रों को व्याख्याताओंने अपने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से सर्वथैव अभिभूत कर लिया कि पाठक मीमांसासूत्र निर्भ्रान्तरूपेण तवात्मक मौलिक - वेद की अपौरुषेयता का ही समन्वय कर रहे हैं, जैसा समा ---तत्स्तम्भ में देखेंगे । एतदतिरिक्त उपनिषदों से अनुप्राणित निम्न लिखित सामयिक सात प्रश्नों का ३५.
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किमपि प्रास्ताविकम् धान ही शेष सात स्तम्भों में हुआ है, एवं तृतीयखण्ड के संस्मरणीय स्तम्भात्मक विषयों की सन्दर्भसङ्गति-समन्वयात्मिका संक्षिप्ततमा यही रूपरेखा है । “ १ - उपनिषदों में किन किन विद्याओं, विषयों का निरूपण हुआ है? ", प्रश्न के समाधान के लिए ही - ' उपनिषत्प्रतिपाद्य विषयदिग्दर्शन ' नामक ' द्वितीयस्तम्भ ' प्रवृत्त हुआ है । " २-- उपनिषदों को विद्याएँ, एवं विषय हमें क्या सिखा रहे हैं? ", प्रश्न के समाधान के लिए ही - ' उपनिषच्छिक्षा-स्वरूपदिग्दर्शन ' नामक ' तृतीयस्तम्भ ' प्रवृत्त हुआ है । " ३ औषनिषद- ज्ञान का अधिकारी कौन है? ” प्रश्न के समाधान के लिए ही- ' औपनिषद - ज्ञानाधिकारिकस्वरूप - दिग्दर्शन ' नामक ' चतुर्थस्तम्भ ' प्रवृत्त हुआ है । “ ४ ब्राह्मणवेद के ' विधि ' नामक ब्राह्मण - आरण्यक, एवं उपनिषद् - भागों में परस्पर क्या सम्बन्ध है? ” प्रश्न के समाधान के लिए ही - ' पञ्चमस्तम्भ ' प्रवृत्त हुआ है । " ५ क्या श्रुति शब्द का ‘ श्रवण ' से सम्बन्ध है?, एवं क्या एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति केवल उपनिषदों में ही हुई है? " प्रश्न के समाधान के लिए ही " श्रुति - शब्दमीमांसा, एवं एकेश्वरवाद पर एक दृष्टि " नामक ‘ षष्ठ - स्तम्भ ' प्रवृत्त हुआ है । “ ६- क्या औपनिषदज्ञान के प्रवर्त्तक क्षत्रिय ( राजर्षि ) थे? ", प्रश्न के समाधान के लिए ही - " औषनिषद - ज्ञानप्रवत्त केतिवृत्तदिग्दर्शन " नामक ‘ सप्तमस्तम्भ ’ प्रवृत्त हुआ है । एवं “ ७ - क्या गीताशास्त्र उपनिषदों के साथ समतुलित है? " प्रश्न के समाधान के लिए ही -- " उपनिषदों के साथ गीताशास्त्र का समतुलन ' नामक " अमस्तम्भ " प्रवृत्त हुआ है । उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिकानुगत- तृतीयखण्ड के प्रधान - विषयों का संस्मरण - उपरत को -3 -कानि-तदित्थं -- विषयसूची -- परिशिष्ट -- सन्दर्भादि --संकलन से उपनिषद्भूमिकानुगत तीनों खण्डों के पृष्ठों की समवेत -- संख्या अनुमानत: १८०० ( अठारहसौ ) पृष्ठों का ही अनुगमन कर रही है । प्रथमखण्डानुगत चार स्तम्भ, द्वितीयखण्डानुगत पाँचस्तम्भ, एवं तृतीयखण्डानुगत आठस्तम्भ, सम्भूय सत्रह - प्रमुख स्तम्भों से समन्वित, अनेक अवान्तर - परिच्छेदों से अनुगत, तथा सहस्रों वैज्ञानिकी परिभाषाओं से युक्त खण्डत्रयात्मक प्रस्तुत--' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' नामक निबन्ध उपनिषत् - प्रेमियों की तुष्टि - तृप्ति का ही कारण प्रमाणित होगा, एवं नद्द्द्वारा वेदशास्त्र के सम्बन्ध में अनेक उन भ्रान्ति -- परम्पराओं का भी स्वत: ही निराकरण होजायगा, जिस भ्रान्तिपरम्पराने ही वेद के तत्त्वार्थ यो सहस्राब्दियों से अभिभूत ही प्रमाणित कर रक्खा है । श्रार्धमानव अपनी इस मूलनिधि की अध्ययनाध्ययन -- परम्परा को पुनः प्रतिष्ठित करता हुआ ' उन्नति ' के व्यामोहन - पाश से श्रात्मपरित्राण कर अभ्युदय, तथा निःश्रेयसानुगत - श्रभ्युदय का भोक्ता बने, इसी मङ्गलकामना के साथ उपनिषद् भूमिकानुगत - प्रथमखण्ड से अनुगत यह ' किमपि प्रास्ताविकम् ' विश्राम-पथानुगामी बनने जारहा है । ३६
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किमपि प्रास्ताविकम् , सर्वान्ते च विदित -- वेदितव्य, श्रधिगतयाथातथ्य, विद्यावाचस्पति, समीक्षा चक्रवर्त्ती, प्रज्ञावदातश्रममूत्तिं है, जिनके कि श्रीश्रीश्राचार्य्यचरणों के प्रति श्रद्धाञ्जलि अर्पण करना भी हमारा आवश्यक कर्त्तव्य होजाता । यह स्पष्ट करने की कोई अव्यर्थ अनुग्रह से ही यह वैज्ञानिक साहित्य बाह्यजगत् की सम्पत्ति बन रहा कुछ है भी प्रकाशित होगा, वह आवश्यकता नहीं है कि, अबतक जो कुछ प्रकाशित हुआ है, एवं आगे जो बैठकर श्रध्ययनकाल में जो कुछ एकमात्र आचार्य्य -- चरणों का ही पवित्र प्रसाद है । उनके पावन चरणों में श्रुति ' को इस ' स्मृति ' रूप सुना गया, उस अनन्त श्रुति के जो कण स्थिर रह सके, उन्हीं के आधार पर उस ' समर्पये ' के अतिरिक्त इस में लिपिबद्ध किया गया । “ त्वदीयं वस्तु गोविन्द! ( मधुसूदन! ) तुभ्यमेव भेंट करे? । इसी आत्मसमर्पण के अकिञ्चन के प्रज्ञाकोश में और ऐसी कौनसी वस्तु है, जिसे वह श्रद्धाञ्जलि में है । द्वारा उस महापुरुष के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि समर्पित करते हुए यह प्रस्तावना उपरत होरही विजयदशमी श्रश्विन शुक्लपक्ष विधेयः-मोतीलालशम्र्मोपाह्वः- यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा श्राङ्गिरसो भारद्वाजः वि ० सं ० २०१६ BR - DIU यपत्तनामिजनः ३७