Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 221–230
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 221–230
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उपनिषच्छन्द ॐ मध्य भूमिका ॥ तपः । * यः सर्वज्ञः सर्ववित् - यस्य ज्ञानमयं प्राचीन दृष्टि
जायते ॥ ( मुण्डक ० १ । १ । ६ ॥
तस्मादेतद् ब्रह्म, नामरूप, मन्नं च एके " | - " अशी नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत | ३ | ४३ | ) | ( शा ० सू ० २ " ( गी ० १५७ ) । - " ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः " ( कठ ० २/४ ) - " यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ” ( ई ० उ ० १। ) ४- - " पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ( जड़चेतनात्मक उभयविधपदार्थ ) इत्यादि श्रौतस्मार्त्त सिद्धान्तों के अनुसार प्राणिमात्र ज्ञान क्रिया अर्थ की सत्ता सिद्ध हो अंश हैं । फलतः प्राणिमात्र में ज्ञान- क्रिया - अर्थधन उसी ईश्वर के हैं, अल्पशक्तियुक्त हैं, के अंशभूत प्राणी अल्पज्ञ जाती है । उस व्यापक ज्ञान क्रियार्थघन ईश्वर में ईश्वर की अर्थशक्ति की नाम से प्रसिद्ध रत्नादि नियतार्थ हैं, नियतेन्द्रिय हैं । धातुजीव मूलजीव नाम से प्रसिद्ध प्रोषधि-असंज्ञ नाम से प्रसिद्ध है । प्रधानता है, अत एव यह जीवविभाग अतएव यह जीवविभाग अन्तः-की भी प्रधानता है । वनस्पत्यादि में अर्थ के साथ ही क्रियाशक्ति से प्रसिद्ध कृमिकीट- पशु - पक्षि- मनुष्य भेदभिन्न संज्ञ नाम से व्यवहृत होता है । जीव नाम हैं । इन में अर्थ - क्रिया के साथ " ससंज्ञ " नाम से प्रसिद्ध तिर्य्यक् नाम से प्रसिद्ध यह पांचों प्रजाएं नाम से प्रसिद्ध है । इन पांचों यह जीववर्ग ससंज्ञ साथ ज्ञानशक्ति का भी विकास है । अतएव है । यज्ञतत्व ही | १ | १ | ६ | ) के अनुसार प्रतिष्ठा तत्व ही ब्रह्म " ब्रह्म नै सर्वस्य प्रतिष्ठ । " शत ० १० । प्रतिष्ठा ज्योति यज्ञरूप से वह प्रविष्टब्रह्मसृष्टरूप अन्न है । नामरूप की समष्टि ही ज्योति है विषय का विशदविवेचन " मुण्डक विज्ञानभाष्य ” में में परिणत होकर सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । इस देखना चाहिए । में विस्तार से शतपथविज्ञानभाष्य १ वर्ष ११-१२ अङ्क " x इस चतुर्दशविद्या जीव सृष्टि का निरूपण वालों को वही प्रकरण देखना चाहिए । किया जा चुका है । विशेष जिज्ञासा रखने ११
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उपनिषच्छब्द ० ॥ भाध्य भूमिका ॥०-प्राचीनदृष्टि ससंज्ञ प्रजाओं में भी मनुष्य में ज्ञानशक्ति का पूर्ण विकास है, अतएव अर्वाचीन इतर जीवों की अपेक्षा पुरुष को ईश्वरप्रजापति के प्रतिसन्निकट माना जाता है । जैसा कि वाजसनेयश्रुति कहती है-" प्रजापति वा इदमग्र एक एवास । स ऐक्षत कथं नु-प्रजायेय - इति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । स प्रजा-सृजत । पुरुषो वै प्रजापतेर्नेदिष्ठम " ( शत ०२ | ५ | १ | १ ) इति यही कारण है कि मनुष्य प्रजा के द्वारा ही संसार में ज्ञान का प्रसार होता है । मनुष्य ही उस प्रजापति से साक्षात् रूप से सम्बन्ध करने में समर्थ होता है । अतएव शास्त्रोपदेश को सुनकर तदनुकूल चलने का अधिकार एकमात्र अधिकार मनुष्य को ही है । ज्ञानमात्रा की अल्पता, किंवा अपूर्णता के कारण पशु - पक्षि यदि शास्त्रमार्ग में सर्वथा अनधिकृत हैं । इस प्रकार पुरुष ईश्वर प्रजा-पति के समकक्ष है, समकक्ष ही क्यों वही है, उसी का अंश है । इतनी समता होने पर भी इसके एवं उस प्रजापति के मध्य में कुछ एक ऐसे प्रतिबन्धक रहे हैं, जिनके कारण यह अपने उस व्यापक स्वरूप को भूलता हुआ इतस्ततः भटक रहा है । वे प्रतिबन्धक अविद्या ( अज्ञानावृतज्ञान ), अस्मिता ( विकासाभाव ), रागद्वेष ( माशक्ति ), अभिनिवेश ( दुराग्रह ) इन नामों से प्रसिद्ध हैं । जीव और ईश्वर में यदि अन्तर है तो यही । वह प्रजापति - " क्लेशकम्प विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः " ( पा ० यो ० सूत्र ० ) के अनुसार क्लेशादि से रहित है, असंस्पृष्ट है । इधर जीवात्मा इन क्लेशादि से युक्त है । बस सम्पूर्ण उपनिषदे जीवात्मा को सम्पूर्ण क्लेशादि दोषों से विमुक्त कर उस ईश्वर प्रजापति के साथ अभिन्नभाव प्राप्त कर लेने का ही उपाय बतलातीं हैं । ' उपनिषदों में क्या है? " इस प्रश्न का यदि कोई सामान्य एवं संक्षिप्त उत्तर हो सकता है तो यही कि – “ जीवात्मा अमुक अमुक निर्दिष्ट उपायों से अपने अन्तःकरण में आए हुए अविद्या अस्मितादि दोषों को हटाकर -यथोदकं शुद्धे शुद्धं ताहगेव भवति । एवं मुनर्विजानत आत्मा भवति गोतम ॥ ( कड ० २४ ) के अनुसार
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उपनिषच्छन्द ॥ भाष्यभूमिका । -प्राचीनदृष्टि - सारूस्य - सायुज्यभाव को शुद्ध बनकर उस परतत्व के साथ सालोक्य - सामीप्य बतलाने वाला शास्त्रही माप्त कर संसार बंधन से विमुक्त होजाने का अन्यतम उपाय उपनिषच्छास्त्र है,, । का ही नाम उपनिषत् उपनिषत् वेदशास्त्र का एक अङ्ग है । वेद के अन्तिम भाग करना आवश्यक हैं । उपनिषत् शब्दार्थ परिज्ञान के लिए एक बार सम्पूर्ण वेदराशि का अवलोकन है । बाजकल प्रमादवश होगा । ऋक् - यजुः - साम - अथर्व - भेद से वेद संहिता चार भागों में विभक्त संहिताओं का ही नाम कुछ एक वेदभक्तों में यह भ्रम चलपड़ा है कि " वेद केवल उपलब्ध चार व्याख्यानग्रन्थमात्र हैं " है । शेष वेदशाखाएं इस मूल एवं वास्तविक वेद के ऋषिप्रणीत नहीं है । वेद वास्तव में चार ही कहना नहीं होगा कि इस कल्पना में यत् किञ्चित् भी तथ्यांश अनेक शाखाएं हैं । ऋग्वेद हैं, इस में सन्देह नहीं है । इन चारों में से प्रत्येक की अवान्तर की शाखाएं हैं की २१ शाखाएं हैं, सामवेद की १०००, यजुर्वेद की १०१, अथर्ववेद आर्य-) शाखाओं में विभक्त है । यह इस प्रकार सम्भूय मूलवेद ११३१ ( ग्यारहसौ इकतीस में से वर्तमान में ७-८ शाखाएं साहित्य का साथ ही में आर्यजाति का दुर्भाग्य है कि इन शाखाओं ' उपलब्ध ( वैदिकपन अजमेर में हीं उपलब्ध हैं । शेष शाखाएं स्मृतिगर्भ में विलीन हैं । अस्तु , आरण्यकग्रन्थ, उपनिषद-मुद्रित ) चार संहिताए हीं वेद हैं, इतर शाखाएं, ब्राह्मणग्रन्थ इस हम " क्या उपनिषत् वेद है "? ग्रन्थ वेद नहीं हैं,, इस कल्पित सिद्धान्त की आलोचना उठाकर इस । अतः इस विवाद को यहां न प्रश्न के समाधान में आगे विस्तार से करने वाले हैं शाखाएं, ब्राह्मण, आरण्यक, सम्बन्ध में प्रकृत में केवल यही बतला देना चाहते हैं कि " सभी ( वेद ) ब्रह्म ब्राह्मण भेद से दो उपनिषत् यह सब मिलकर वेदशास्त्र है " । निगमशास्त्र ब्रह्म ) इस श्रौतसिद्धान्त के अनुसार भागों में विभक्त है । ब्रह्म वै मन्त्रः " शत ० ७ १।१५ ) यह कहा आधार पर - - " मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् " ( कात्यायन ही मन्त्र है । इसी कि उपनिषद् अभिन्नार्थ के प्रतिपादक हैं, जैसा जाता है । मन्त्र - ब्रह्म - विद्या यह तीनों शब्द नयों में तत्तत् स्थलों में स्पष्ट कर दिया गया है । १३
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॥ भाष्यभूमिका । -प्राचीनदृष्टि " विभर्त्ति सर्वम् " इस निर्वचन के अनुसार सम्पूर्ण प्रपश्च को अपने ऊपर धारण करने बाला तत्व ही ब्रह्म है । ऐसा तत्र उपादान कारण ही हो सकता है । क्योंकि उपादान कारण ही स्त्रकार्य की प्रतिष्ठा बनता है । षोडशीपुरुष का अव्यय भाग सृष्टि का आलम्बन है, अक्षर भाग निमित्तकारण है, एवं आत्मक्षर भाग उपादान कारण, दूसरे शब्दों में समवायिकारण है । उपादान कारण ही अपने कार्य का प्रभव - प्रतिष्ठा परायण बनता है । सम्पूर्ण वैकारिक कार्य विश्व का उपादान यही क्षरभाग है । अतः उक्त व्युत्पत्ति के अनुसार इसे हम अवश्य ही विश्व का " ब्रह्म " कह सकते हैं 1 । विभति सर्वे के अनुसार यह क्षरतत्व " भर्मन् " है । निरुक्त विद्या के अनुसार भर्म्म शब्द में " ब् - ह् अ र् मू - अ- 59 इन वर्णों का समावेश है । प्रातिशाख्य सिद्धान्त के अनुसार हकार - रकार का विपर्य्यय हो जाता है । हकार रकार के स्थान में आ जाता है, रकार हकार के स्थान में आ जाता है । इस त्रिपयास से पूर्व वर्णस्थिति-“ बू - र् - अ - हू - म् - ग्र ' ' इस रूप में परिणत हो जाती है । पूर्व वर्णों का सम्मिलित रूप “ भर्म्म ” था, इस दूसरी परिस्थिति का रूप " ब्रह्म " है । " ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् " ( गी ० ३।१५ । ) के अनुसार इस क्षरब्रह्म का विकासस्थान अव्ययानुगृहीत अक्षर ही है । इस से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि ब्रह्म शब्द कुछ एक विशेष स्थलों को छोड़ वर सर्वत्र उपादान कारणता से ही सम्बन्ध रखता है. I उपर्युक्त क्षर - ब्रह्म की प्राण- आप- वाक्- अन्न अन्नाद यह पांच कलाएं सुप्रसिद्ध हैं । इन में प्राण नाम की सर्वमुख्या पहिली कला ही सृष्टयुन्मुख बनती हुई वेदखरूप में परिणत होती है । यही क्षररूपा वेदकला सृष्टि का पहिला उपादान है । संसार में जो वस्तु जन्म लेती है, पहिले उसका वेद उत्पन्न होता है । प्राधानिक दर्शन ( सांख्य ) के अनुसार शब्दादि पंच तन्मात्राएं हीं विश्व को प्रभव प्रतिष्ठा -परायणरूपा हैं । इन पांचों तन्मात्राओं में भी प्रथमज, अत एत्र मुख्य तन्मात्रा शब्द तन्मात्रा ही है । यही शब्द तन्मात्रा अनादिनिधना, प्राणमृत्तिस्त्र-यम्भू मुख से विनिर्गता, नित्या वेदवाकू है । यही ब्रह्म है । इसी के लिए - " ब्रह्म वै सर्वस्य प्रथमजमू " ( शत ० ६ । १ । १ ६ ) " ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा " ( शत ० ६।१।११७१ ) यह १४
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उपनिषच्छन्द || माध्य भूमिका | प्राचीनदृष्टि है, दो भागों में विभक्त है । अमृतावाक् आलग्बन कहा गया है । अमृत - मर्त्य भेद से वाक्तत्व इसी से सृष्टि होती है । है, यही वेदवाक् है, मर्त्यावाक् उपादान है । मर्त्याबाक् ही शब्दतन्मात्रा मनु कहते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् सर्वेषां तु सनामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । १।२२४ । ) । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक संस्थाश्च निर्ममे । ( मनुः अग्नि ? इस प्रश्न का उत्तर है अग्नि - सोम । शब्दतन्मात्रारूप वेदब्रह्म है क्या वस्तु ब्रह्म है । यही संसार का है । दोनों मिलकर एक एवं सोम का मिथुनभाव ही विश्व का उपादान के " स पर्यगाच्छुक्रम " हिन्दीविज्ञानभाष्य " उत्पादक शुक्र है, जैसा कि “ ईशोपनिषत् । पूर्व में हमनें क्षरब्रह्म की प्राण-स्पष्ट कर दिया गया है ( ई ० उ ० मं ० ) इत्यादि मन्त्र व्याख्यान में बतलाया जारहा है । इस - सोम की समष्टि को वेद कला को वेदब्रह्म कहा था, एवं यहां अग्नि है, वह अग्नि है । है कि वेदत्रयो का जो यजुर्भाग में विरोध नहीं समझना चाहिए । कारण यही होने वाला अपूतत्व ही सोम है । इसी का नाम एवं यजुर्वेद के स्थिति प्रकृतिक जू भाग से उत्पन्न एवं सोमवेद, योषाप्राणप्रधान होता हुआ पुरुष है, अथर्व है । ब्रह्माग्निवेद, वृषामाणप्रधान वेदमूर्त्ति वह एक ही प्रजापति के काम - तप - श्रम से बनता हुआ स्त्री है । सृष्टिकामुक प्रजापति शब्दों में ब्रह्माग्नि में सोम की । दोनों के मिथुन से, दूसरे पूर्वोक्त दो स्वरूपों में परिणत होजाता है यज्ञ से सम्पूर्ण सृष्टिएं है । एवं इसी अग्नीषोमात्मक श्राहुति होने से यज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होता हम अभिलषित पदार्थ प्राप्त कर सकते हैं । यज्ञ हमारे होतीं हैं । आज भी इस यज्ञविद्या द्वारा, श्रग्नीषोमात्मक इसी यज्ञ-फल देने वाला ) है । सृष्टिमुलक लिए इष्टकामधुक् ( यथेच्छ अभिलषित कहते हैं-विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् प्रजापतिः । सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच | १०६ ) । अनेन प्रसविष्यध्वमेवस्त्विष्टकामधुक् ॥ ( गी ०३ यह तीन अवस्थाएं हैं । यही तीन अवस्थाएं पूर्वोक्त ब्रह्माग्नि की घन - तरल- विरल - यजुर्मय -साममय: । यही तीनों क्रमशः ऋङ्मय क्रमशः श्रग्नि वायु आदित्य नाम से प्रसिद्ध हैं १५
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उपनिषच्छब्द ॥ माष्यभूमिका ॥--प्राचीन दृष्टि हैं । संसार में जितनी भी मूर्तिएं हैं, उन सब का निर्माण अग्निमय ऋग्वेद से होता है । गति-तत्व का विकास गतिधर्म्मा वायुरूप यजुर्वेद से होता है, एवं वषट्कार नाम से प्रसिद्ध महिमारूप तेजोमण्डल का सम्बन्ध आदित्यात्मक सामवेद के साथ है । इन तीनों भावों को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखने वाला, च्प्रतएव सर्वप्रभव चौथा ब्रह्मवेद ( अथर्ववेद ) है । इसी वेदविज्ञान को लक्ष्य में रख कर कृष्णश्रुति कहती है-चत्वारो वेदाः - -ॠग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः ऋकू २ - सर्वागतिर्याजुषी हैव शश्वत्यजुः ३ – सर्व तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् → साम ( ४ — सर्व हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ————- अथर्वः } →अग्नित्रयीवृषा → सोमः - योषा ( तै ० ना०१२।२-३ ) इति । " द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति, अत्ता चैवाद्यं च । तद्यदोभयं समागच्छति अतैवा-ख्यायते नाद्यम् " ( शत ० १० ६ २ २ ) इस श्रीतसिद्धान्त के अनुसार भत्ता जब अन्न को अपने गर्भ में प्रविष्ट कर लेता है तो अन्न की स्वतन्त्रसत्ता उच्छिन्न होजाती है । केवल अत्ता की सत्ता ही अवशिष्ट रह जाती है । बात यथार्थ है । जब तक हम ( भोक्तात्मा ) अन्न नहीं खाते, तभी तक वह अन्न अन्न नाम से व्यवहृत होता है । उदर में भुक्त होने के अनन्तर आत्मसात् बना हुआ वही अन्न अपने अन्न नाम को छोड़ता हुआ अत्ता ( भोक्ता ) स्वरूप में ही परिणत होजाता है । इसी सामान्य सिद्धान्त के अनुसार अथर्वा सोमरूप अन्न अग्नित्रयीरूप अन्नाद के गर्भ में प्रविष्ट होता हुआ अपनी स्वतन्त्र सत्ता खो देता है । अग्नि अता है, इसी का विकास त्रयीवेद है । सोम आद्य है । इसी का विकास अथर्ववेद है । वह वेदसोम वेदाग्निगर्भ में जाकर वास्तव में अपने स्वातन्त्र्य से च्युत होजाता है । अतएव वेदशब्द से विद्वत्समाज में प्रायः वेदत्रयी ही प्रसिद्ध है । अन्न अन्नाद की विभक्त मर्यादा को लक्ष्य में रख कर जहां " चत्वारो वेदाः " यह कहा जाता है, १६
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उपनिषच्छन्द भाष्यभूमिका ॥ प्राचीन दृष्टि " " त्रयी वहीं उक्त अन्न - अन्नाद की अभिन्नमर्यादा को लक्ष्य में रख कर - " त्रयं ब्रह्म सनातनम् प्रचलित हैं । ऐसी स्थिति में वा एषा विद्या तपति ” " सैषा त्रयीविद्या यज्ञः " इत्यादि व्यवहार ने उक्त चारों वेदों के अन्न अन्नादरहस्यानभिज्ञ जिन कुछ एक कल्पनारसिक पश्चिमी विद्वानों सम्बन्ध में जो अपनें– “ पहिले तीन वेद बने थे इसलिए त्रयीवेद व्यवहार स्वतन्त्र रहा, " तीनों वेदों के पीछे अथर्ववेद बना था, इसलिए इस की त्रयीवेद से पृथक गणना की गई जाता । पूर्व यह विचार प्रकट करते हैं, उन के इन विचारों की निःसारता में कोई सन्देह नहीं रह पहिले ब्रह्म-में वेदशास्त्र के ब्रह्म - ब्राह्मण नाम के जिन दो विभागों का उल्लेख किया था, उन में से की समष्टि भाग का यही संक्षिप्त परिचय है । अथर्व गर्भिता वेदत्रयी, किंवा ऋकृ - यजुः साम- अथर्व ६ी ब्रह्म है । अर्थप्रधान इस ब्रह्म का उपबृंहित रूप ही ब्राह्मण है । ब्रह्म का ऋङ्मय अग्निभाग है, जैसा कि पूर्व के है, यजुर्मय वायुभाग क्रियाप्रधान है, एवं साममय श्रादित्यभाग ज्ञानप्रधान ' मङ्गलरहस्य, में विस्तार से बतलाया जा चुका है 1 । अर्थतत्व स्थूल है, क्रियातत्व स्थूलसूक्ष्म है, स्थूलसूक्ष्मजगत् ज्ञानकर्ममय है, सूक्ष्म-है, ज्ञानतत्व सुमुक्ष्म है । स्थूलजगत कर्म्मप्रधान की मूलप्रतिष्ठा हैं । कम्म जगत् ज्ञानप्रधान है । तीनों क्रमशः कर्म्मयोग भक्तियोग - ज्ञानयोग का तारतम्य है । भक्ति ( उपासना ) - ज्ञान तीनों परस्पर में ओतप्रोत हैं । केवल प्रधानता अप्रधानता पूर्वोक्त जैसे ब्रह्म भाग ऋक् - यजुः - साम नामों से प्रसिद्ध हैं, एवमेव ब्रह्म का विवर्तभूत का विधिभाग ब्रह्म ब्राह्मणभाग विधि - आरण्यक उपनिषत् नामों से व्यवहृत हुआ है । ब्राह्मण ब्रह्म के क्रिया के अर्थप्रधान स्थू जलगन्मूत्तिं कर्म्मकाण्ड से सम्बन्ध रखता है । आरण्यकभाग उपनिषद्भाग प्रधान स्थूलसूक्ष्मजगन्मूर्ति उपासनाकाण्ड से सम्बन्ध रखता है । एवं का उपबृंहितरूप ब्रह्म के ज्ञानप्रधान सूक्ष्मजगन्मूर्त्ति ज्ञानकाण्ड से सम्बन्ध रखता है । अर्थतन्त्र विधिभाग है, क्रियातत्व का उपबृंहितरूप आरण्यकभाग है, एवं ज्ञानतत्व का उपबृंहित-रूप उपनिषद् भाग है । विधिभाग अर्थमूत्ति है, आरण्यकभाग क्रियामूर्ति है, उपनिषद्भाग ज्ञानमूर्त्ति है । जिस प्रकार अग्नि वायु प्रादित्यात्मक ऋक् यजुः साम रूप ब्रह्मभाग सर्वथा १७
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उपनिषच्छन्द -- || भाष्यभूमिका ॥ प्राचीन दृष्टि अपौरुषेय है, एवमेव इसी ब्रह्म का उपबृंहणरूप अर्थ - क्रियाज्ञान- ज्ञान खरूप विधि - आरण्यक उपनिषद् रूप ब्राह्मणभाग भी सर्वथा अपौरुषेय ही है । ब्रह्म ब्राह्मण की समष्टि ही ग्रपौ-रुषेय नित्य वेद है । सम्पूर्ण विश्व में इसी का साम्राज्य है, दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण विश्व यही है । सामान्य पुरुष तो क्या, स्वयं ईश्वर पुरुष भी इस के निर्माण में असमर्थ है । वह स्वयं भी इसी मौलिक वेद के आधार पर ही सृष्टि करने में समर्थ होता है । उपर्युक्त ब्रह्म ब्राह्मणात्मक इस मौलिक अपौरुषेय वेदतत्व का रहस्य समझाने के लिए ऋषियों ने जो ग्रन्थ बनाए हैं, वे भी " तात्स्य्यात्ताच्छन्द्यम् " इस न्याय से इन्हीं नामों से प्रसिद्ध हैं । यहां भी वह विभाग ज्यों का त्यों विद्यमान है, जैसा कि " क्या उपनिषत् वेद है? इस प्रकरण में विस्तार से बतलाया जानेवाला है । अग्नित्रयीमयी मौलिक वेदत्रयी के निरूपण करने वाले शब्दराशिभूत त्रयीवेद का अग्नि से ही आरम्भ हुआ । है । अग्निं नाम से प्रसिद्ध पार्थिवाग्नि ऋग्वेदमूर्ति है । हम पार्थित्र मनुष्यों के लिए वह अतिसन्निकट है, सामने ही अवस्थित है । अतएव इस पार्थिव अग्नि को हम " पुरोहित " कह सकते हैं 1 । पार्थित्र अग्नि के इसी पौरोहित्य धर्म को समझाने के लिए, ऋक्तत्व प्रतिपादिका पार्थिवाग्निमयी ऋक्संहिता का आरम्भ - " अग्निमीळे पुरोहितम् " इस रूप से हुआ है । वायु नाम से प्रसिद्ध आन्तरिक्ष्य अग्नि यजुर्वेदमूर्ति है 1 । इसी के आधार पर हम अपने व्रतों को ( नियमित संकल्पों को ) पूर्ण करने में समर्थ बनते हैं । जब तक शरीर में रक्तादि का सञ्चार होता है, तभी तक शरीर स्वस्थ एवं सुदृढ़ रहता है । स्वस्थ मनुष्य ही कर्म में सफलता से प्रवृत्त हो सकता है, एवं कर्म्म को यथावत् पूरी करने में समर्थ होता है । यह स्वस्थता शरीरगत धातु-सञ्चार पर ही निर्भर है । यह धातु सञ्चार प्रान्तरिक्ष्य वायुरूप यजुरग्नि के ही आधीन है । याज्ञिक परिभाषानुसार * ' व्रत ' नाम से प्रसिद्ध गतिधग्मी सारे कर्म " सर्वागतिर्याजुषी हैव शश्वत् " * " प्रथा वयमादित्य व्रते तव " । व्रतमिति कर्म्म नाम, वृणोतीति सतः । " ( या ० नि ० नै ० का ०२।१३ । = l ) इति 1 । “ अपः व्रतम् ० " इति षड्विंशतिः कर्म्म नामा ने ” ( या ० नि ० १ | ३ | २ | २ | | { I
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उपनिषच्छन्द - भाष्यभूमिका -प्राचीनदृष्टि अग्निपर निर्भर है । सम्पूर्ण व्रतों ( कम्मों ) का इस पूर्वोक्त सिद्धान्त के अनुसार इसी यजु व्रतपति " कह सकते हैं । तत्व को अवश्य ही “ पति यही है । ऐसी दशा में हम इस आन्तरिक्ष्य संहिता का , यजुस्तत्वप्रतिपादिका यजुः इसी रहस्य को समझाने के लिए यान्तरिक्ष्याग्निमयी आदित्य नाम से प्रसिद्ध इत्यादि रूप से हुआ है । च्यारम्भ - " अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि " 3 से बहुत दूर है इस दिव्याग्नि का पार्थि लोकस्थ अग्नि सामवेदमूर्ति है । द्युलोक पृथिवी दी जाती है । होता नाम का समिन्धन करके ही आहुति प्रधान यजमान के आध्यात्मिक अग्नि में कराता है । जो हमारे पार्थिव अग्नि के साथ सम्बन्ध ऋत्विक् ही मन्त्र द्वारा इस दिव्याग्नि का वैध है । इसी त्रिज्ञान " ( घ्यावो ) पद प्रयुक्त होता से विप्रकृष्ट ( दूर ) होता है, उसी के लिए " आयाहि सामसंहिता का आरम्भ - " अग्न को समझाने के लिए दिव्याग्निमयी, सामतत्वप्रतिपादिका इत्यादि रूप हुआ है । श्रायाहि वीतये " त्वोर्जेत्वा " यह मन्त्र देखा जाता है । यद्यपि प्रस्तुत यजुर्वेद संहिता के आरम्भ में " इषे " इसी मन्त्र से समझना व्रतपते व्रतं चरिष्यामि परन्तु वास्तव में संहिता का आरम्भ - " अग्ने ) संपादन किया जाता है । सान्नाय्य सम्पाद-चाहिए । दर्शपूर्णमास में इन्द्र के लिए सान्नाय्य ( दधि होता है । इस विशेष मन्त्रप्रयोग करते हुए गोदोहन नार्थ इष्टि के पूर्व दिन " इत्वोर्जेत्वा " इत्यादि का सन्निवेश कर “ इषेत्वोजत्वा " इत्यादि मन्त्र कर्म्म के सम्बन्ध बतलाने के लिए ही प्रारम्भ में मन्त्र ही है । इस के लिए " अग्ने व्रतपते ० " इत्यादि दिया गया है । वस्तुतः संहिता का आरम्भमन्त्र संहिता का मानागया है ॥ यह ब्राह्मण उक्त शुक्लयजुर्वेद सब से बड़ा प्रमाण शतपथ ब्राह्मण है का आरम्भ -आगे चलता है । शतपथ ठीक संहिता मन्त्रों के अनुसार शतपथ का कर्म्मकलाप से हुआ है । तिष्ठन्नप उपस्पृशति " इस रूप " व्रतमुपैष्यन्नन्तरेण गार्हपत्य चाहवनीयं च प्राङ् ) वादिते जन्मनि त्रते - कर्म्मणी " या ० नि ० १११२३-१ " दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते ० " - " दक्षस्य, व्रत कर्म्म " ( या नि १० । ३२।१ ) । " प्रत्नो अभिरक्षति व्रतम् " - " प्रत्नः पुराणोऽभिरक्षति गया है । इत्यादि स्थलों में शब्द को कर्म परक ही माना ११
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उपनिषच्छब्द -०१ । माष्यभूमिका प्राचीनदृष्टि अस्तु इस विषय को अधिक बढ़ाना प्रकृत से दूर जाना है । ऋग्वेद की २१ शाखाएं ही क्यों होतीं हैं? यजु साम- अथर्व के क्रमशः १०१, १०००, ८, इतने ही अवान्तर भेद क्यों माने गए हैं? इत्यादि प्रश्नों के समाधान में निगूढतत्व छिपा हुआ है । प्राकृतिक नित्य वेद का जैसा स्वरूप है, ठीक वैसा ही स्वरूप इस शब्दात्मक पौरुषेयवेद का है । इन सब विषयों का विशदी करण यथासम्भव अगले प्रकरण में करने की चेष्टा की जायगी । अभी हमें अपने पाठकों को ग्रन्थ-बिभाग, एवं तत्प्रतिपादित विषयों की ओर ही लेजाना है । " अथर्वब्रह्म गर्भित त्रयीब्रह्म ब्रह्म है " यह पूर्व में बतलाया जाचुका है ।इस ब्रह्म विभाग में विज्ञान - स्तुति- इतिहास इन तीन विषयों का निरूपण हुआ है । प्रत्येक संहिता के कुछ एक मन्त्र विज्ञानतत्व का निरूपण करते हैं । कुछ एक मन्त्र तत्तदेवताओं की स्तुति करते हुए उन का स्वरूप परिचय कराते हैं । एवं कुछ एक सूक्त इतिहास ( मनुष्य चरित्र ) की छोर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं । इन तीनों ह्रीं निरूपणीय विषयों में परस्पर सङ्करता है । वैज्ञानिक मन्त्र गौणरूप से स्तुति - इतिहासमर्यादा का, स्तुतिपरकमन्त्र गौणरूप से विज्ञान - इतिहास का, एवं ऐतिह्यमन्त्र गौणरूप से विज्ञान स्तुतिमर्यादा संरक्षण करते हुए ही आगे चलते हैं । वैदिकज्ञान को अनादिज्ञान मानने वाले श्रद्धालु इतिहास शब्द से भयभीत होजाते हैं । उन का विश्वास है कि यदि वेदों में इतिहास मान लिया जायगा तो वेदों का अनादित्व नष्ट हो-जायगा । थोड़ी देर के लिए अभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए हम भी यह मान लेते हैं कि वेदों में इतिहास नहीं है । परन्तु एतावता भी वैदिकज्ञान का अनादित्वाप कथमपि सिद्ध नहीं कर सकते । वेदों में सूर्य्य - चन्द्र - पृथिवी विद्युत् श्रग्निवायु- इन्द्र - वरुण - मरुत् - आदि प्राकृतिक देव-ताओं ( पदार्थों ) का इतिहास तो आप भी मानते ही हैं । इन सब की उत्पत्ति - स्थिति आदि का क्रम वेदसंहिताओं में बड़े विस्तार के साथ सुनिरूपित है, यह निर्विवाद एवं सर्वसम्मत पक्ष है । आप को यह मानना पड़ेगा कि अनादि ईश्वरीय ज्ञान की अपेक्षा सूर्य - चन्द्रादि सभी देवता सादि हैं । ऐसी व्यवस्था में यदि इन सादि पदार्थतत्वों के निरूपण से वेद का अनादित्व नष्ट नहीं होता तो मनुष्यचरित्र से ही यह आपत्ति कैसे उठाई जा सकती है । त्रैकालज्ञ ईश्वर के लिए सब कुछ २०