Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 231–240

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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उपनिषच्छब्द माध्य भूमिका प्राचीन दृष्टि पहिले से ही विदित है | इसी आधार पर आप का “ धाता यथापूर्वमकल्पयत् " यह वचन चरि-तार्थ होता है । यदि ईश्वरीय ज्ञान भविष्य में होने वाले सूर्य - चन्द्रादि का इतिहास बतलासकता कठिन नहीं है । है तो भविष्य में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों का इतिहास बतला देना भी उस के लिए हैं । भविष्य भृगुसंहिता - रुद्र संहिता - सत्यसहिता तीन ग्रन्थ फलित सम्बन्ध में पूर्व माने जाते में होने वाले मनुष्यों के तीन तीन जन्मों का इतिहास पहिले से ही इन संहिताओं में उद्धृत रहता सर्व वेदात् है । क्या वेदशास्त्र इन संहिताओं से कम महत्व रखता है? क्या " भूतं भव्यं भवचैव प्रसिद्ध्यति " इस मानव सिद्धान्त का कोई मूल्य नहीं है? फलतः उक्त में इतिहास मानलेने पर भी कोई महत्व नहीं रह जाता । हमारी दृष्टि १. उक्त व्याशङ्का का है, विज्ञान वस्तुतस्तु याज के विद्वानों ने जिस ग्रन्थ को अपौरुषेय नित्य वेद मान रक्खा इतिहास है । दृष्टि में वह वेद नहीं, अपितु वेदतत्वप्रतिपादक पौरुषेय ग्रन्थ है, उस में अवश्य ही कोई सम्बन्ध हां मौलिक सर्व जगन्मूलभूत अग्नीषोममय पौरुषेय वेद में अवश्य ही इतिहासमर्य्यादा का इतिहास नहीं है । अस्तु प्रकृत में कहना यही है कि निगमशास्त्र के ब्रह्मभाग में विज्ञान स्तुति-इन तीन विषयों का ही प्रधानरूप से निरूपण हुआ है । यह तो हुई ब्रह्मभाग के विषयों की चर्चा । शेष रहता है ब्राह्मणभाग । पूर्व में कहा जा उसे निर्धूतपाप्मा बनाते चुका है कि सम्पूर्ण उपनिषदे विद्यादिदोषों से जीवात्मा को पृथक् कर है । इधर तदंशभूत हुए ईश्वर के साथ उस का योग करवा देतीं हैं । ईश्वरत्व ज्ञान - कर्म - अर्थमय - अर्थ इन तीन द्वारों जीव भी ज्ञानकर्म्मार्थमय ही है । ऐसी दशा में इस का उसके साथ ज्ञान क्रिया कर्म्मयोग है । इस कर्मतत्व से ही योग कराया जासकता है । अर्थद्वारा उसके साथ योग होना । ज्ञानगर्भिता क्रिया द्वारा योग का प्रतिपादन कराने वाला ब्राह्मणभाग विधि नाम से प्रसिद्ध है इन चारों योगों का इसी होना उपासनायोग है । यही भक्तियोग है । मन्त्र -राज - लय- हठ भक्तियोग में अन्तभाव है । इस उपासनायोग का प्रतिपादन करने वाला ब्राह्मणभाग आरण्यक साथ योग कराना नाम से प्रसिद्ध है । अपने आध्यात्मिक ज्ञान का उस ईश्वरीय ज्ञान के से प्रसिद्ध है । ज्ञानयोग है । इस का स्वरूप बतलाने वाला ब्राह्मणभाग उपनिषत् नाम २१

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-० ॥ भाष्यभूमिका ॥ प्राचीन दृष्टि प्रकारान्तर से देखिए । ईश्वर की अर्थकला आधिभौतिकविश्व की जननी है, क्रियाकला आध्यात्मिक जगत् की प्रतिष्ठा है । एवं ज्ञानकला आधिदैविकविश्व की सञ्चालिका है । आधि-भौतिक पदार्थों को साधन बना कर अपने आत्मा को आधिभौतिकफल का भागी बनांना कर्मयोग है । आधिभौतिक पदार्थ साधनों द्वारा आधिदैविक फल प्राप्त करना उपासनायोग है । एवं आधि-दैविक साधनों द्वारा आधिदैविक ही फल प्राप्त करना ज्ञानयोग है । इन तीनों में कर्म्मप्रधान ब्राह्मण ( विधि ) भाग पूर्वकाण्ड है, ज्ञानप्रधान उपनिषद्विभाग उत्तरकाण्ड है, एवं मध्यपतित ज्ञानकर्ममय आरण्यक विभाग मध्यमकाण्ड है । अर्थतत्व शुद्ध कर्म्मरूप होने से कर्म्मयोग है, मध्यपतिता, अतएव उभयात्मिका ऋिण भक्तियोग है । ज्ञानतत्र शुद्ध ज्ञानरूप होने से ज्ञानयोग है 1 ।. गीताविज्ञान से पहिले दो ही निष्ठाएं ( ज्ञाननिष्ठा एवं कर्म्मनिष्ठा ) भारतवर्ष में प्रचलित थीं । इन्हीं के लिए गीता ने सांख्यनिष्ठा, योगनिष्ठा यह शब्द व्यवहृत किए हैं । जैसा कि निग्न लिखित वचन से स्पष्ट होजाता है -लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । * ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्म्मयोगेन योगिनाम ॥ ( गी ० ३।३ । ) । मध्यपतिता उपासना में ज्ञान - कर्म्म दोनों का समावेश है । अत एव उपासनाकर्म में · मनोयोग रूप ज्ञानयोग को भी अपनाना पड़ता है, एवं कर्मरूप षोडशोपचार आदि का भी • समावेश करना पड़ता है । वस्तुतस्तु उभयस्वरूप उपासना तत्त्रप्रतिपादक इस आरण्यक भाग उपनिषद में ही अन्तभीव मान लिया जाता है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । 1 उक्त तीनों काण्डों की मीमांसा करने वाले खनामधन्य प्रातःस्मरणीय जैमिनि - शाण्डिल्य वेदव्यास नाम के आचार्य हैं । पूर्वकाण्डरूप विधिभाग की मीमांसा करने वाला भाग पूर्वमीमांसा नाम से प्रसिद्ध है 1 । जैमिनि इस के प्रवर्तक हैं । अत एव यह पूर्वमीमांसा दर्शन जैमिनिदर्शन नाम से भी प्रसिद्ध है । मध्यस्थ आरण्यक भाग की मीमांसा करने वाला दर्शन आचार्य नाम की प्रधानता से शाण्डिल्यदर्शन नाम से प्रसिद्ध है । एवं उत्तरकाण्डरूप उपनिषत् भाग की मीमांसा करने वाला भाग उत्तरमीमांसा नाम से प्रसिद्ध है । महामुनि व्यास इस के प्रवर्तक हैं । त

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उपनिषद भाष्यभूमिका | प्राचीन टष्टे किया जाता है । उपनिषत् वेद का अन्तिम एव यह दर्शन व्यासदर्शन नाम से भी व्यवहृत व्यासदर्शन कहा जाता है । अतएव तत्प्रतिपादक भाग है, अतएव उपनिषत् शास्त्र को वेदान्त को वेदान्तदर्शन नाम से व्यवहृत किया गया है - पारण वाकू इन तीन कलाओं ज्ञान- क्रिया- अर्थ इन तीनों का अध्यात्मसंस्था की मन वाक्तत्व , प्राण क्रियाशक्तिमय है, एवं के साथ क्रमिक सम्बन्ध है । मन ज्ञानशक्तिमय है ) हैं, वाक् प्राण इस उक्थ के अर्क ( रश्मिएं अर्थशक्तिमय है । मन उक्थ ( प्रभवस्थान ) है, का भोग किया रश्मियों के द्वारा वाङ्मय अन्न अशिति ( अन्न ) है 1 । हृदयस्थित मन प्राणात्मिका नामों से क्रमशः पशुपति -पाश - पशु इन करता है । तन्त्रशास्त्र में यही तीनों नैगमिक कलाएं है, पशु अर्थमय । पाश क्रियामय है, प्राणमय प्रसिद्ध हैं । पशुपति ज्ञानमय है, मनोमय है है, प्राणभाग देवप्रधान है, वाङ्मय की है । तीनों की समष्टि “ सर्वम् " है । वाक्भाग भूतप्रधान पश्चिमहाभौतिक स्थूलशरीर है, मनोभाग आत्मप्रधान है । भूतमय वाग्भाग भूतमात्राप्रधान सूक्ष्मशरीर का प्रवर्तक है, एवं आत्ममय अधिष्ठानभूमि है, देवमय प्राणभाग प्राणमात्राप्रधान देवता भूतमय, श्रालम्बन है । इस प्रकार आत्मा मनोभाग प्रज्ञामात्राप्रधान कारणशरीर का आत्मा अध्यात्मसंस्था है, प्राणप्रधान मन - प्राण - वाक् ही “ सर्वम् " है । इन तीनों में मनप्रधान अधिभूतसंस्था है । अधिभूतसंस्था देवमण्डल अधिदैवतसंस्था है, एवं वाक्प्रधान भूतमण्डल से ही नेदिष्ठ सम्बन्ध है, कर्मभाग का भूत का कर्मकाण्ड प्रतिपादक विधिभाग से सम्बन्ध, उपासना आरण्यकभाग से सम्बन्ध है है । अधिदैवतसंस्था का उपासनाकाण्ड प्रतिपादक एवं अध्यात्मसंस्था का ज्ञान ही होसकता है । देवता की ही हो सकती है । आत्मा का केवल है । ज्ञानकाण्डप्रतिपादक उपनिषद् भाग से सम्बन्ध नें विधि- आरण्यक उपनिषत इसी पूर्वोक्त स्थितिक्रम का समादर करते हुए प्राचीनों मान रक्खे - अध्यात्मविद्यास यह यवच्छेदक इन तीनों के क्रमशः कर्मयोग - भक्ति योगस्व ही रहता है । उपासना साथ अभिन्न बनने में असमर्थ हैं । कर्म्म- एवं उपासना से जीवात्मा ईश्वर के तो ज्ञानयोगापर-सायुज्य, किंवा निर्वाणभाव से केवल सामीप्यभाव की प्राप्ति होसकती है ।

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उपनिषच्छब्द भाष्यभूमिका 11 प्राचीन दृष्टि पर्य्यायक औपनिषद्ज्ञान पर ही निर्भर है । इसी सायुज्यभाव को प्रकट करने के लिए वेद के इस अन्तिमभाग का नाम “ उपनिषत् " रक्खा गया है । उपासना में केवल " उप - ग्रासन " ( समीप बैठना - ईश्वर के समीप पहुंचना ) है । इधर उपनिषत् में " नि " और विशेष है । ' उप ' का अर्थ है “ समीप ”, “ नि ” का अर्थ है " नितराम् ” । “ पत् " का अर्थ है “ बैठना " । जिस ( आत्म औप- -निषत् ) विद्या के द्वारा जीवात्मा अपने प्रभव ईश्वर में सर्वात्मना ( अभिन्नभाव से ) प्रतिष्ठित होजाता है, दूसरे शब्दों में तादात्म्यभावापन्न होजाता है, वही विद्याविभाग " उपनिषीदन्ति यया " इस निर्वचन के अनुसार ' उपनिषद " नाम से प्रसिद्ध होता है । इस प्रकार प्राचीन श्राचार्यों ने उक्त विभाग प्रदर्शन द्वारा उपनिषद शब्द से वेद के चौथे भाग का ही ग्रहण किया है । उन का विश्वास है कि अध्यात्मविद्याप्रतिपादक ईश केन- कट - प्रश्न आदि नामों से प्रसिद्ध वेद के अन्तिम भागों के लिए ही उपनिषत् शब्द प्रयुक्त हुआ है उपनिषत् शब्द एकमात्र सुप्रसिद्ध ईश - केनादि उपनिषदों के लिए ही प्रयुक्त हुआ है । यह है उपनिषत् शब्द सम्बन्धिनी प्राचीन मत मीमांसा । इस मीमांसा के सम्बन्ध में जिन ज्ञान - क्रिया-अर्थविवत्तों का दिग्दर्शन कराया गया है, निम्नलिखित परिलेखों से उन सब का स्पष्टीकरण हो-जाता है । - ऋग्वेदः -२१ – शाखाभेदभिन्नः? २ - यजुर्वेदः-- १०१ - शाखाभेदभिन्नः " ब्रह्मवेदः ३ - सामवेद: -- १००० - शाखाभेदभिन्नः ४ - प्रथर्ववेद: --- → ----शाखाभेदभिन्नः । ९१३१- वेदशाखाविभागः

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उपनिषच्छन्द || माध्य भूमिका । ॐ प्राचीनदृष्टि ( ऋग्वेदः अर्थपधानः ( अर्थ ) अग्निमयः → यजुर्वेदः-> क्रियाप्रधानः ( क्रिया ) वायुमयः - त्रयीवेदः सामवेद: -(: ज्ञानप्रधानः ( ज्ञानम् ) श्रादित्यमयः } १ – विधिभागः अर्थप्रधानः-> कर्मकाण्ड २ - प्रारण्यकभागः क्रियाप्रधानः उपासनाकाण्डम् > ब्राह्मणा वेदः ३ - उपनिषद्भागः → ज्ञानप्रधानः- - ज्ञानकाण्डम् १ – १ – विज्ञानकाण्डम २–२ ~~~ स्तुतिकाण्डम् ३३- इतिहासकाण्डम् ४ - ४ – १ – कपकाण्डम् ) ५- २ – उपासनाकाण्डम् ६- ३ - ज्ञानकाण्डम् ब्रह्मवेदस्य निरूपणीयविषयाः ब्राह्मणवेदस्य निरूपणीयविषयाः १ - मनः- - ज्ञानबू - उक्थम् --५- २ – प्राणः– क्रिया - अर्काः -पशुपतिः - श्रात्मग्रामः } पाशः -- देवग्रामः ३- वाक् — अर्थ ः - अशिवयः -- पशुः -11:11 -भूतग्रामः # " सर्वम् "

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पनिषच्छब्दार्थ के सम्बन्ध में प्राचीन व्याख्याताओं के जो विचार हैं, उन का हम विरोध नहीं करते । साधारण मनुष्यों के लिए यह प्राचीनदृष्टि आदरणीया होसकती है । परन्तु एक वैज्ञानिक मनुष्य इतने से ही सन्तुष्ट नहीं होसकता । उस की दृष्टि में उपनिषत् शब्द का वाच्यार्थ कुछ और ही है । उपनिषत् शब्द का सम्बन्ध एकमात्र ज्ञानकाण्ड प्रधान अध्यात्मविद्याशास्त्र के साथ ही नहीं है । अपितु ज्ञान-कर्म्म - उपासना तीनों के साथ उपनिषत् शब्द का घनिष्ठ सम्बन्ध है । हमारा तो यह भी विश्वास है कि उपनिषत् शब्द की व्याप्ति ( दौड़ ) शास्त्रमर्थ्यादा तक ही सीमित नहीं है, अपितु सांसारिक लौकिक कम्मों में भी उक्त शब्द की पूर्ण व्याप्ति है । जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । प्रत्येक शब्द का एक अवच्छेदक हुआ करता है । अन्य धम्मों से उस पदार्थ को पृथक् करके बतलाने वाला, एवं साथ ही में उस पदार्थ को खखरूप में प्रतिष्ठित रखने वाला जो धर्म्म है, वही कथाशास्त्र ( न्यायशास्त्र ) में अवच्छेदक नाम से व्यवहृत हुआ है । घट पदार्थ पटादि इतर यच्चयावत् पदार्थों से पट पदार्थ घटादि इतर यच्चयावत् पदार्थों से भिन्न है । इसी प्रकार मनुष्य, पशु, पक्षि, कृमि, कीट, ओषधि, वनस्पति आदि सब पदार्थ परस्पर में एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं । सब के नाम - रूप - कर्म्म पृथक् पृथक् हैं । यह पार्थक्य एकमात्र उस मबच्छे -दक तत्व पर ही निर्भर है । " एकं वा इदं विवभू सर्वम् " ( ऋ ० ६ | ४ | २१ | ) के अनुसार सम्पूर्ण प्रपञ्च का मूल कोई एक ही तत्व है । इस प्रकार एक ही तत्व से उत्पन्न होने पर भी केवल अवच्छेदक भेद से ही सब पदार्थ भिन्न भिन्न स्वरूपों में परिणत हो रहे हैं । प्रत्येक शब्द की यत् किञ्चित् पदार्थतावच्छेदकावच्छिन में ही शक्ति रहती है । शब्द किसी न किसी अर्थ का वाचक है । वह अवश्य ही किसी न किसी अवच्छेदकावच्छिन्न पदार्थ से सम्बन्ध रखता है । सर्वव्यापक ईश्वरतत्व का कोई व्यवच्छेदक नहीं है । अवच्छिन्न सभी पदार्थों का उस में समावेश है । सर्वधर्मोपपन्न उस अनवच्छिन्न का कोई धर्म्म व्यावर्तक नहीं बन सकता । ऐसी अवस्था में अवच्छेदकावच्छिन्न पदार्थ के वाचक किसी भी शब्द की वहां दौड़ संभव नहीं है । इसी आधार पर उस के लिए श्रुति कहती है-२७

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उपनिषच्छन्द ॥ भाष्यभूमिका । -विज्ञानदृष्टि । संविदन्ति न ये वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । जितने छोड़कर उस के उदररूप विश्व में और परन्तु सर्वधग्र्मोपपन्न उस एक तत्व को है । उसी व्यावर्त्तक को व्यावर्तक अवश्य ही रहता भी पदार्थ हैं, उन सब का कोई न कोई पदार्थ को इतर पदार्थों से भिन्न है । यह अवच्छेदक उस न्यायभाषा में अवच्छेदक कहा जाता द्वारा इतर पदार्थों से पृथग्-कहा जाता है । प्रवच्छेदक करवाता है, अतएव इसे “ भेदक " भी द्वारा भिद्यमान पदार्थ ही अवच्छिन्न है । इसी भूत पदार्थ अवच्छिन्न कहलाता है । भेदक परिभाषा में " छन्द " कहा जाता है । प्रत्येक अवच्छेदक, किंवा भेदक तत्व को याज्ञिक वस्तु छन्द से छन्दित इस वाक्य का हम " प्रत्येक वस्तु अवच्छेदक से अवच्छिन्न रहती है, वच्छेदक विज्ञान भाषा में हैं । यही छन्द, किंवा रहती है ” इस रूप से अभिनय कर सकते है । वयरूप पदार्थ को सीमित " वय " पदार्थ का वाचक " वयोनाथ " नाम से व्यवहृत हुआ है । " है । एक ही अग्नि वयो-वाला तत्व ही " वयोनाघ बना कर उसे इतर पदार्थों से पृथक् करने - वसु - रुद्र आदित्यादि भेद से ३३ नाधापरपर्य्यायक इस छन्दोभेद से ही अग्नि वायु इन्द्र से ही समुद्र - सरोवर-) केवल इस छन्द की कृपा रूप धारण करलेता है । एक ही अपतत्व ( पानी प्रकार के छन्द हैं, कर लेता है । संसार में जितने नद नदी वापी कूप आदि अनेक नाम धारण । पृथिवी अन्तरिक्ष-से यजुर्वेद संहिता कर दी गई है उन सब की गणना संग्रहरूप है । इसी आधार पर - ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' द्यौ दिक् इन चार विभागों में सब कुछ समाविष्ट ( कौ ० ब्र " का छन्द " मा " है, अन्तरिक्ष का " माइन्द [ ० ब्रा ० २।१ । ) यह वचन प्रसिद्ध है । पृथिवी ' है । आयतन का नाम ही छन्द है । है लोक का " प्रतिमाछन्द " है, दिक् का ' अस्रीविछन्द है । अवच्छेदक । यही अवच्छेद किंवा भेदक सीमाभाव ही छन्द है । आकृति ही छन्द है समानार्थक है । एवमेत्र छंद -आदि सब शब्द प्रायः परिमाण - आयतन - भेदक- सीमाभाव वयोनाघ-में देखना हिन्दी - विज्ञानभाष्य प्रथम वर्ष ६-७ अंकों * इस विषय का विशद विवेचन शतपथ चाहिए । २८

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उपनिषच्छब्द -- || भाष्यभूमिका ॥७ विज्ञानदृष्टि अवच्छिन्न- परिमित - भिन्न सीमित - वय - कन्न यादि सब शब्द प्रायः समानार्थक हैं । अवच्छिन्न स्वरूप सम्पादन करने वाला अवच्छेदक तत्व संस्कृतसाहित्य में ' त्व ' नाम से व्यवहृत हुआ है । जिसे लोक भाषा में ( अपना ) - ' पना ' कहते हैं, उसी के लिए भारती भाषा में स्व शब्द प्रयुक्त हुआ है । घट पदार्थ में कम्बुग्रीवादिमत्व रूप जो एक घटना है- ( जिस घटपने से घट पदार्थ स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित हो रहा है ) वही पना घट का घटत्व है । घटत्व ही घट का प्रवच्छेदक है । घटत्वावच्छेदकावच्छिन्नतया घट इतर पदार्थों से पृथकू रहा है । संसार में जितने भी पदार्थ हैं, उन सब में यह सामान्य व्यवस्था समझनी चाहिए । यही अवच्छेदक दार्शनिकभाषा में जाति नाम से प्रसिद्ध है । घटमात्र में ( सम्पूर्ण घड़ों में ) घटत्ववच्छेदक समानरूप से विद्यमान है । अत एव जाति को सामान्य कहा जाता है । " जातिजातं च सामान्यं व्यक्तिस्तु पृथगात्मता " के अनुसार जाति सामान्या है । व्यक्तिका सम्बन्ध पृथगात्मता से है । इस प्रकार जब यह सिद्ध होजाता है कि प्रत्येक शब्द की यत्-किञ्चित् पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न में शक्ति है तो प्रकृतस्थल के ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषत् इन तीनों शब्दों के सम्बन्ध में भी वही न्याय घटित होना चाहिए । उक्त तीनों शब्दों के अवच्छेदक कौन? इस प्रश्न का उत्तर प्राचीनों की ओर से कर्मयोगत्व - उपासनायोगत्व - ग्रात्मविद्यात्व इन अवच्छेदकों द्वारा मिलता है, जैसा कि पूर्व की प्राचीनदृष्टि में विस्तार से बतलाया जाचुका है । ब्राह्मण एवं प्रारण्यक के अवच्छेदकों के विषय में प्रकृत में विशेष वक्तव्य नहीं है । कहना है केवल उपनिषत् शब्द सम्बन्धी अवच्छेदक के विषय में । हमारे विचार से “ अध्याविद्यात्व, ही उपनिषंतूशास्त्र का प्रवच्छेदक नहीं होसकता । यदि उपनिषत् द्वारा केवल आत्मविद्या का ही निरूपण होता, तब तो प्राचीनों का मत ठीक था, परन्तु ऐसा नहीं है । कर्म्मप्रतिपादक ब्राह्मणग्रन्थों में, एवं उपासना प्रतिपादक आरण्यकग्रन्थों में भी उपनिषत् शब्द की प्रवृत्ति देखी जाती है, जब कि प्राचीनों के मतानुसार ब्रा ० आर ० दोनों ही ग्रन्थ अध्यात्मविद्या की मर्यादा से सर्वथा बहिर्भूत है । ऐसी स्थिति में अध्यात्मविद्यात्व २६

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उपनिषच्छब्द भाष्यभूमिका -विज्ञानदृष्टि बन सकता । उपनिषत् पदार्थ के यथार्थ स्वरूप कथमपि उपनिषत् पदार्थ का अवच्छेदक नहीं अपनाना पड़ेगा । परिचय के लिए ही निम्न लिखित लक्षण को ही “ तत्तत् कर्मकलापेतिकर्त्तव्यताप्रकारविशेषोपपादकत्वेन-कर्म्मण उपनिषत् " व्यवस्थितो यो विज्ञान सिद्धान्तः - सा तत्तत् ( श्रीगुरुप्रणीत - ब्रह्मविज्ञान ) इति । के आधार पर व्यवस्थित " उन उन कर्मों की इतिकर्त्तव्यताओं की उपपत्ति इस लक्षण की उस कर्म की उपनिषत् है " जो ( मौलिक ) विज्ञानसिद्धान्त है, वही उस सङ्गति हो सकती है । पदार्थ के अच्छेदक की प्रामाणिकता पर विश्वास करने से ही उपनिषत्

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ज्ञा नकाण्डवत् कम् एवं उपासनाकाण्ड में भी उपनिषत् शब्द की प्रवृत्ति देखी जाती है । उदाहरणार्थ पहिले कर्मकाण्ड सम्बन्धी दो एक निदर्शन पाटकों के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं । सम्पूर्ण कर्म्मकलार पुरुषार्थ - क्रत्वर्थ भेद से दो भागों में विभक्त है । जिन कर्मों के फलों का पुरुष ( कर्म्म कर्त्ता व्यक्त ) के साथ साक्षात् सम्बन्ध है, वे कर्म्म पुरुष की प्रातिस्त्रिक सम्पत्ति बनते हुए, दूसरे शब्दों में पुरुष के लिए नियत श बनते हुए - - ' " पुरुषार्थक " नाम से प्रसिद्ध होते हैं । अग्निष्टोम, प्रत्यग्निष्टोम, क्य्यस्तोन, पोडशी स्तोम, वाजपेयस्तोम, अतिरात्रस्तोम, अप्तोर्यामस्तोम भेदभिन्न सप्त-संस्थ ज्योतिष्टोमयाग ( सोमयाग ), राजसूय -- वाजपेय -अश्वमेध चयन -- शिरोयाग-गवामयन- अङ्गिरसामयन - आदित्यानामयन आदि यज्ञकर्म्म स्वतन्त्र रूप से स्वर्गादि फल प्राप्ति के साधन बनते हुए - " पुरुषार्थ " कर्म हैं । इन कम्मों से यज्ञकत्ती पुरुष की अर्थसिद्धि अभीष्ट ( फलावाप्ति ) होती है । एवं ग्रग्न्याधान, भग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास, चातुर्मास्य, पशुवध विष्णुक्रम, वात्सम, वसिष्ठयाग, पिण्डपितृयज्ञ आदि अवान्तरकर्म त्यर्थकर्म हैं । पुरु-पार्थ कर्म्म को " ऋतु " कहा जाता है । उक्त अत्रान्तरङ्गकम्मों से इन पुरुषार्थरूपों का स्वरूपसंपन्न होता है, दूसरे शब्दों में अग्न्याधानादि अङ्गकर्म ऋतु के लिए हैं, इन का साक्षात् सम्बन्ध यज्ञकर्त्ता पुरुष के साथ न होकर ऋतु के साथ होता है, अतएव इन अङ्गकम्मों को कम ( तुरूप पुरुषार्थ कर्म्म के स्वरूप संपादन करने वाले कर्न ) कहना न्याय संगत होता है । पुरुषार्थ कम्र्मों की इतिकर्तव्यता भिन्न है, क्रसर्थ कम्मों की इतिकर्तव्यता पृथक् है । दर्शपूर्णमास एक ऋत्वर्थ कर्म्म है । इस की स्वरूपनिष्पत्ति के लिए भी व्रतग्रहण, अपप्रणयनं, इध्मसंनहन, पुरोडाशसम्पादन पात्रासादन, पात्र पतपन, पात्रमोक्षण, " हविग्रहण, ब्रह्म-वरण, आदि अवान्तर अनेक कर्म्म करने पड़ते हैं । इन अवान्तर अनेक कम्मों से एक क्रत्वर्थ-कम्प का स्वरूप निष्पन्न होता है । एवं ऐसे ऐसे अनेक क्रत्वर्थकम्मों से एक पुरुषाथकर्म की सिद्धि होती है । इन सब कम्मों की इतिकर्तव्यता का पार्थक्य तो इन कम्मों के भेद से ही सिद्ध है । इस भिन्नता का कारण वही उपनिषद है । नियत विज्ञान सिद्धान्त की भित्ति पर ही तत्तत् ३ ९.