Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 241–250
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 241–250
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उप नष मध्य भूमिका । -ब्राह्मण में उपनिष प्रकार से क्यों किया जाता कर्म्मकलाप की इतिकर्तव्यता प्रतिष्ठित है । " अमुक अमुक कम्मों को उपनिषत है । है? " उत्तर वही विज्ञानसिद्धान्त है । वही तत्तत् यजतयः ” “ तिवृद्धोमा वषट्कार र दाना वाज्यापुरोऽनुवाक्यावन्तो ( का ० श्र ०१६ ) का ० श्र ० ११२ | ७ || " उपविष्टहोमा स्वाहाकारप्रदाना जुहोतयः ” ( इन्द्राय वौषट् इत्यादिरूप से ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार खड़े खड़े वषट्कार पूर्वक का क्या आहुतिदेना होपक है । इस भेद श्रातिदेना यागकर्म है, एवं बैठकर स्वाहापूर्वक । अग्न्यादि देवताओं के लिए मूल? क्या उपपत्ति? उत्तर वही औपनिषद विज्ञानसिद्धान्त पूर्वक, मनुष्यों पूर्वक, इन्द्र के लिए वौषट् स्वाहा पूर्वक, अग्निष्वासादि पितरों के लिए स्वधा वही उपनिषत । अमुक कर्म्म अमुक रूप के लिए नमः पूर्वक ही आहुति क्यों दी जाती है? उत्तर सब जिज्ञा-है, अन्यथा नहीं । क्यों? इत्यादि से ही करना चाहिए, तभी वह फलाद हो सकता क्यों? का एकमात्र से स्वभावतः निकलने वाले ' साथों को शान्त करने वाला, हमारे अन्तरात्मा हो तत्तत् विज्ञान सिद्धान्त के आधार पर समाधान वही विज्ञानसिद्धान्तरूप उपनिपत है । तत्तद् सिद्धान्त है, वही उस कर्म्म की उपनिषत् कर्मकलाप सुप्रतिष्ठित हैं । जिस कर्म का जो मुलभूत ही रहना चाहिए, ही करना चाहिए, पयोत्रती है । यज्ञकर्म में दीक्षित यजमान को सत्यभाषण में आग्नेय नाम की ज्योतिष्टोमसंस्था शकट से ही हविग्रहण करना चाहिए, अग्निष्टोम माकप्रवणा, मारण ) करना चाहिए, यज्ञशाला बास पशु का ही आलम्भन ( संज्ञपन शुद्ध से सम्भाषण नहीं करना , यज्ञकर्त्ता द्विजाति को अथवा उदकमवणा भूमि में ही होनी चाहिए सुव्यवस्थित वाला प्रकृतिसिद्ध, अतएव चाहिए, इत्यादि विषयों का समुचित समाधान करने में निरूढ है । स्वयं उप-है । उपनिषत् शब्द इसी अर्थ नित्यविज्ञान सिद्धान्तरूप उपनिषत् ही २ 3 का क्रमशः है । " उप - नि - पत् " इन तीनों विभागों मिषत् शब्द भी इसी अर्थ को प्रकट कर रहा 3 से उस कम्र्म में निश्वयभाव ( दृढविश्वास ) " उपपत्ति निश्चय - - स्थिति " यह अर्थ है । उपपत्तिज्ञान ३२
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उपनिषद ...। भाष्यभूमिका ॥-ब्राह्मण में उपनिषत् उत्पन्न होजाता है । तदनन्तर उस कर्म में स्थितिभाव ( तत्परता - कर्मप्रवणता ) का उदय होता है । उपनिषत् ज्ञान का उसे फल मिल जाता है । निष्कर्ष यही हुआ कि जिस उपपत्ति ज्ञान के प्रभाव से जो कर्तव्य कर्म्म कर्त्तव्यत्वेन मनुष्य के हृदय में दृढमूल होजाता है, वह उप-पनिज्ञान ही उस कर्त्तव्यकर्म की उपनिषत् है । " अर्थलोलुप पश्चिमीराष्ट्रों के प्रबल वेग से बढते हुए शस्त्रास्त्रीकरण से निकट भविष्य में ही महासमर छिड़ने वाला है. इस लिए अभी से सस्ते भाव में वस्तुएं खरी-दलो " इस उपनिषत् के आधार पर एक उपनिषद्वेत्ता व्यापारी वस्तुक्रय कर लेता है । एवं समर के समय उसे आशातीत सफलता मिलजाती है । " युद्ध के कारण तत्तदूराष्ट्रों के साथ होने वाला वस्तुओं का क्रय - विक्रय अवरुद्ध होजाता है, फलतः देशों का व्यापार शिथिल हो जाता है । इसी लिए वस्तुओं की महता ( महगांई ) अवश्य भाविनी है । अतएव लाभ होना स्वाभाविक है । ” युद्ध के समय क्यों लाभ होगा? इस की यही उपनिषत् है । इस उपपत्ति से दृढ़निश्चयी बन कर व्यापारी उस कर्म में स्थित होजाता है । इस औपनिषत् ज्ञान का फल उसे मिल जाता है 1 । जिस के कि प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे शेखावाटी के कलकत्ता - बम्बई निवासी मारवाड़ी श्रेष्ठ ( सेठ ) ही पर्याप्त हैं । उपपत्ति द्वारा जो विषय निश्चितरूप से आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है । उपपत्ति ( उप ) पूर्विका वह निश्चित ( नि ) प्रतिपत्ति ( पत् ), चित्त का " इदं कर्त्तव्यमेत्र " यह विश्वास ही उपनिषत है । ' उप ( उपपत्तिद्वारा ) नि ( नितरां निश्चयेन वा ) सीदति ( तत्र कर्म्मणि तत्परभावेन प्रतिष्ठितोभवति " बस उपनिषत् शब्द की यही यथार्थ व्युत्पत्ति है । उपनिषद्ज्ञानपूर्वक, विज्ञा नानुमोदित निश्चयज्ञानपूर्वक जो कर्म किया जाता है, उस में अधिक बल रहता है । ऐसे मनुष्या को विश्वास रहता है कि मैं अमुक कर्म व्यर्थ नहीं कर रहा, अपितु उपनिषत् से कर रहा हूं । ऐसे दृढ़निश्चयी का यह कर्म्म अवश्य ही बलवत्तर हो जाता है । उपनिषत् शब्द के इसी उक्तार्थ-विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है -
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उपनिषच्छब्द । माध्य भूमिका ब्राह्मण में उपनिष " नाना तु विद्या चाविद्या च । स यदेव विद्यया करोति, भवति ” श्रद्धया, उपनिषदा, तदेव वीर्यवत्तरं ( छा ० उप ० १११।१० ) इति । मुख्य एवं पहिला साधन तत्तत् कर्मविषयक पूर्णज्ञान " विद्या है । कर्म में प्रवृत्ति का में विद्या शब्द से अभिप्रेत है । एवं उस विद्या ही है । कर्म की इतिकर्तव्यता का ज्ञान ही प्रकृत है । " यदि विद्या-कर्म्म में श्रद्धाभाव की उत्पत्ति के लिए उपनिषद्ज्ञान ( उपपत्तिज्ञान अपेक्षित हो जाता है, दूसरे शब्दों में श्रद्धा उपनिषत् इन तीनों का एक कर्म में समन्वय ज्ञान ), श्रद्धा मनोयोग ) जो व्यक्ति विद्या ( कर्मेतिकर्त्तव्यता सम्पादक कर्म्म विषयक कर्म्म निःसन्देह वल-उपनिषत् ( उपपत्तिज्ञान ) पूर्वक कर्म करता है तो उस का वह है । उक्त छान्दोग्य श्रुति का यही तात्पर्य वृत्तर होता हुआ यथावत् संपन्न हो जाता है । " दूसरे शब्दों में ईश - केन- कठादि अध्यात्मविद्यात्व को ही उपनिषत् का यवच्छेदक माननें वाले, T महानुभावों से क्या हम यह पूंछ उपनिषदों को ही उपनिषत् शब्द का वाचक मानने वाले है? शब्द का क्या भवदभिमत अर्थ सकते हैं कि पूर्व की छान्दोग्य श्रुति में उपात्त उपनिषत् क्यों नहीं तो फिर किस आधार पर, एवं क्या वहां का उपनिषत् शब्द ईश- केनादि का वाचक है? से अधिक विस्तृत होता जारहा आपके मत का आदर किया जाय । अस्तु विषय आवश्यकता किया जाता है । है, अतः दो एक उदाहरण बतला कर इस प्रकरण को समाप्त का ही नाम 1 " यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म " ( शत ० १७/१५ ) के अनुसार यज्ञकाण्ड इसी प्रवृत्तिकर्म में अन्तर्भाव है । प्राण-विद्यासापेक्षमवृत्ति सत्कर्म्म है । दान एवं तप का भी के पश्चावयत्र सर्वहुतयज्ञ के आप- वाक् - अन्न अन्नाद् भेद भिन्न पंचप्रकृतिविशिष्ट यज्ञप्रजापति वाला यज्ञ ) भी " पाङ्कने वै यज्ञः " आधार पर वितत हमारा वैधयज्ञ ( मनुष्यों के द्वारा कियाजानें , पशुबंध, ज्योतिष्टोम इस्व श्रौत सिद्धान्त के अनुसार अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य ) ही क्यों है? इस भेद से पांच ही भागों में विभक्त है । हमारा वैधयज्ञ पाङ्क ( पञ्चावयव ३४
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उपनिषच्छन्द ... | भाष्यभूमिका -ब्राह्मण में उपनिषत् प्रश्न की उपनिषत् वही प्राकृतिक निस यज्ञ है । संवत्सराग्नि में पारमेष्ठ्य ऋतसोम की आहुति होती है । इसी से संवत्सरयज्ञ का खरूप निष्पन्न होता है । अहोरात्र पक्ष ऋतु प्रयन संवत्सर भेद से उस अग्नीत्रोमात्मक यज्ञ के पांच पर्व हो जाते हैं 1 । अहोरात्रयज्ञ ही " अग्नि-होत्र " है । पक्षयज्ञ ही दर्शपूर्णमास है । ऋतुयज्ञ ही चातुर्मास्य है । अयनयज्ञ ही पशुबन्ध है । एवं संवत्सरयज्ञ ही ज्योतिष्टोम किंवा सोमयाग है । प्राकृतिक श्राधिदैविक नित्य यज्ञ की यही पांच विधा है । " देवाननु विधा वै मनुष्याः, यद्वै देवा अकुर्वस्तत् करवाणि " इत्यादि निगम सिद्धान्त के अनुसार उसी प्राकृतिक नित्ययज्ञ की प्रतिकृति ( नवल ) हमारा यह वैधयज्ञ है । अतएव प्रकृतिवत् यह भी पाङ्कमर्यादा से ही सम्बन्ध रखता है । इस प्रकार हम क्यों पांच विधाओं का अनुगमन करें? इस प्रश्न की निवृत्ति उक्त नित्य यज्ञ की पाङ्गता से भलीभांति हो जाती है । पूर्वोक्त पांचों यज्ञों में संवत्सरयज्ञ ही प्रधान है । सूर्य भगवान् ही इस यज्ञ के प्रवर्तक हैं । मनोता विभाग के अनुसार सूर्य में ज्योति - गौ- प्रायु यह तीन मनोता हैं । तीनों से क्रमशः देवता, भूत - आत्मा का विकास होता है । सूर्य का ज्योतिभांग देवगण की प्रतिष्ठा है, गौभाग भूततत्व की प्रतिष्ठा है, एवं आयुभाग आत्मा की आलम्बन भूमि है । इन्हीं तीनों सौर मनोताओं से क्रमश: ज्योतिष्टोम - गोष्टोम - आयुष्टोम इन स्तोमयज्ञों की प्रवृत्ति होती है । इन तीनों में से प्रकृत में ज्योतिष्टोम की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । सूर्य में प्रधानरूप से सातरश्मियों का सम्बन्ध माना जाता है, जैसा कि निम्नलिखित श्रौत वचनों से स्पष्ट है । १ - " यः सप्तरश्मिषभस्तुविष्मानवासृजत् सर्त्तवे सप्तसिन्धून् । यो रौहिणमस्फुरद्वज्रबाहुद्यमारोहन्तं स जनास इन्द्रः ॥ ” ( ऋक्सं ० २।१२.१२ । ) । २ – “ यस्सप्तरश्मिरिति - सप्त होत आदित्यस्य रश्मयः " ( जै ० उ ० १२८ । ३ - " स एष ( आदित्य ) सप्तरश्मिर्ष्टषभस्तुविष्मान् " ( जै ० उ ०११२८ । २ । ) । श्रात्मगतिविद्या के अनुसार इन्हीं सात रश्मियों के कारण शनिकक्षा से सम्बन्ध रखने बाले यमलोक के सात भेद हो जाते हैं । यही सात नरक हैं । इन्हीं के लिए भगवान् बादरायण ३५.
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उपनिषच्छब्द ॥ भाष्यभूमिका ॥ ब्राह्मण में उपनिषत् के सम्बन्ध । ) यह कहा है । आगे जाकर २८ नक्षत्रों ने - " अपि च सप्त ” ( शा ० द ० ३।१।१५ बतलाना है कि सप्तरश्मियों के कारण में इस प्रपञ्च से यही से ७ के २८ नरक होजाते हैं । प्रकृत स्थिति में नित्य सौर ज्योतिष्टोम यज्ञ विभक्त होजाता है । ऐसी सौरज्योतिर्भाग भी सात ही भागों में यही सप्तसंस्थ नित्य ज्योतिष्टोम यज्ञ ज्योतिष्टोम की उपनिषत् सप्तसंस्थ बन जाता है । वैध सप्तसंस्थ सोम की आहुति होती रहती है, अतएव इन सातों है । इन सातों ही अग्निज्योतियों में पारमेष्ठ्य कहा जाता है । की समष्टिरूप ज्योतिष्टोम को सोमयाग - दर्शपूर्ण मास चातुर्मास्य में अन्न-पुरुषार्थकर्म्म ) रूप सोमयज्ञ के अङ्गभूत अग्निहोत्र अन्न को “ हवि " कहा जाता में यज्ञियमाहुतिद्रव्यरूप सोम की आहुति होती है 1 । यज्ञपरिभाषा से व्यवहृत किया जाता है । को ' हविर्यज्ञ " नाम है । अत एव उक्त तीनों यज्ञों की समष्टि इष्टि " शब्द से भी सम्बोधित किया ऋत्वर्थकर्म्म होने से " इसी को क्षुद्र ( छोटा ) यज्ञ होने से, एवं तत्प्रधान पशुबन्ध को भी हम सोममयी ही है । अतः जाता है । पशु की हृन्मेदरूपा वपा भी सोमवल्ली का सोमरस तो । एवं शुद्धरूप से उपलब्ध सोमयाग में अन्तर्भूत मान सकते हैं सोमयाग निष्पन्न होता है । इस प्रकार साक्षात् सोम ही है । इसी से ग्रहयज्ञापरपर्यीयक सोम भेद से तीन भागों में विभक्त हो ही सोमयज्ञ इष्टि - पशु -अन्नरस पावल्लीसोम भेद से एक मानलिए जाते हैं । इन तीनों वैधयज्ञों के भी यही तीन विभाग जाता है । इसी आधार पर वैधयज्ञ वैधयज्ञों के लिए भिन्न भिन्न वेदिएं बनाई यज्ञ हैं । इन तीनों की उपनिषत् वेही तीनों प्राकृतिक इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन - पाशुकवेदि - महावेदि जातीं हैं । वे तीनों वेदिएं क्रमशः हविर्वेदि और होता है । इस की प्रतिष्ठा शामित्रशाला है । इसी में मध्य की पाशुकवेदि में विहृताग्नि छोड़ दीजिए, हविर्वेदि एवं महावेदि को थोड़ी देर के लिए में पशु का परिपाक होता है । पाशुकवेदि । के स्वरूप पर दृष्टि डालिए , गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहव-हविर्यज्ञ में यज्ञखरूपसंपादक वेदि, आहवनीय, होता, अध्वर्यु, उद्गाता, यजमान, यजमानपत्नी नयागार, पत्नीशाला, गार्हपत्यागार, " में देखना चाहिए । " आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् * इस विषय का विशदविवेचन श्राद्धविज्ञानान्तर्गत ३६
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उपनिषच्छन्द .. || भाष्य भूमिका ॥ॐ ब्राह्मण में उपनिषत् ब्रह्मा, इध्म, बर्हि, पुरोडारा, धुत्रा, जुहू, उपभृत् इत्यादि सामग्रिएं होती हैं । इन्हीं सब के समन्वय से हविर्यज्ञ की इतिकर्तव्यता पूरी की जाती है । इन सत्र की उपनिषत् ( मौलिक उपपत्ति ) के लिए तो एक स्वतन्त्र ग्रन्थ अपेक्षित है । अतः प्रकृत में स्थाली पुलाकन्याय से एक दो विषयों. की उपनिषदों पर ही प्रकाश डालना पर्याप्त होगा । वैध हविर्वेदि की उपनिषत् क्या है? इस प्रश्न के समाधान से पहिले वेदिका स्वरूप समझतेना घ्यावश्यक होगा । हविर्वेदिका संक्षिप्त स्वरूप निम्न लिखित परिलेख से स्पष्ट हो जाता है । परिलेख से यह स्पष्ट होरहा है कि वेदि का अंत ( स्कन्ध ) रूप अग्रभाग संकुचित है, एवं श्रोणिस्थानीय पश्चिमभाग विस्तृत है । वेदि के पूर्वभाग में प्रतिष्ठित आहवनीयकुण्ड चतुष्कोण ( चौकोर ) है । पश्चिमभागस्थ गार्हपत्यकुण्ड गोलाकार है । दक्षिणभागस्थ दक्षिणाग्निकुण्ड अर्द्ध-चन्द्राकार है । प्रश्न उपस्थित होता है कि हविर्यज्ञसंस्था का ऐसा स्वरूप क्यों? इस का उत्तर है " पुरुषयज्ञ ” । पार्थित्र नित्य हविर्यज्ञ से पुरुषसृष्टि ( पार्थिवप्रजासृष्टि ) होती है । पुरुष साक्षात् यज्ञ है । अन्नाहुति से रेत उत्पन्न हुआ है, रेत की आहुति से पुरुष उत्पन्न हुआ है - ( देखिए तै ० उपनिषत् ) । इधर इस वैधयज्ञ द्वारा प्राकृतिक नित्ययज्ञवत् नवीन दिव्यपुरुष ( दैवात्मा ) उत्पन्न किया जाता है | नवीन दिव्यपुरुष ठीक पुरुष यज्ञ की प्रतिकृति है । अतएव जैसा स्वरूप इस यज्ञमूर्ति पुरुष का है, ठीक वैसा ही स्वरूप इस वैधयज्ञ का बनाया जाता है । पुरुषयज्ञसंस्था में शिरोभाग ( मस्तक ) आहवनीयकुण्ड है । सम्पूर्ण आध्यात्मिक प्राणदेवताओं के लिए इस आहवनीयाग्नि में सायं - प्रातः अन्नाहुति दी जाती है । दूसरे शब्दों में वाक् प्राण- वक्षु श्रोत्रादि इन्द्रिय सौर देवताओं के लिए शिरोरूप आहवनीयकुण्डस्थ मुखरूप आहवनीयाग्नि में ही अन्नरूप हवि की आहुति दी जाती है । आहुतिस्थान होने से ही पुरुष का शिरोभाग " आहूयते यत्रसोमः-( अन्न ) " इस निर्वचन के अनुसार ग्राहवनीय नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि श्रुति कहती है-" शिरो वै यज्ञस्याहवनीयः । पूर्वार्धो वै शिरः । पूर्वार्धमेवैतद्यज्ञस्य कल्पयति ” ( शत - १ । ३ । ३ । १.२ । ) C " मुखमेवास्य ( वैधयज्ञ य ) आहवनीयः ( अग्निः ) " ( शत ० ३।५।३।३ । ) । ३७
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उपनिषच्छन्द -० ॥ भाष्य भूमिका ॥ ब्रह्मण में उपनिषत् आहवनीयस्थानीय पुरुष का शिरोभाग वास्तव में चतुष्कोण है । ललाटपटल सामने का भाग है । दोनों कर्णपटिएं ( कनपटिएं ) पार्श्व के दो भाग हैं । एक पटल पृष्ठभाग में है । इस प्रकार मस्तक की चतुष्कोणता भलीभांति संपन्न होजाती हैं । यहां दिव्यसौर अग्नि ( प्राणाग्नि ) प्रतिष्ठित है । इसी उपनिषत् के आधार पर वैधयज्ञ में भी ग्राहवनीयकुण्ड शरीर ( धड़ ) रूप वेदि के पूर्व-भाग में चतुष्कोण ही बनाया जाता है । पार्थिव अग्नि की मूलप्रतिष्ठा मूलाधार ( मूलप्रन्थि ब्रह्मग्रन्थि ) है । यह कुण्डलिनी के सम्बन्ध से गोलाकार है । इसी में मलाधिष्ठाता पार्थिव अपानाग्नि प्रतिष्ठित है । यह अग्निकुंड शरीर के पश्चिम भाग में प्रतिष्ठित है । इसी उपनिषद के आधार पर पुरुषयज्ञ के प्रतिकृतिस्वरूप इस वैधयज्ञ में भी शरीररूप वेदि के पश्चिम भाग में गोलाकार ही गार्हपत्यकुण्ड बनाया जाता है पुरुष के दक्षिणपार्श्व में चतुर्विध अन्नों का परिपाक करने वाला वैश्वानर अग्नि प्रतिष्ठित है । यही स्थान आयुर्वेद में " आमाशय " नाम से प्रसिद्ध है । यहां प्रतिष्ठित रहने वाला अग्नि ही “ जाठराग्नि " कहलाता है । यह अर्द्धभाग में, अर्द्धचन्द्राकाराकारित स्थान में ही प्रति-ष्ठित है । दक्षिणाग्नि कुण्ड की यही उपनिषत् है । पुरुषप्रतिष्ठित जाठराग्निकुण्डवत् वैधयज्ञ में भी दक्षिणाग्निकुण्ड अर्द्धचन्द्राकार ही बनाया जाता है । पुरुषसंस्था में इस से अन्न का परिपाक किया होता है, अत एव तत् स्थानीय इस दक्षिणाग्नि में ही अन्नस्थानीय हविर्द्वत्र्य का परिपाक । जाता है । इसी परिपाक सम्बन्ध से यह दक्षिणाग्नि " श्रपणाग्नि " नाम से भी प्रसिद्ध है इस वैधयज्ञ से दैवात्मा की उत्पत्ति के लिए प्रजनन कर्म ही किया जाता है, जैसा कि पूर्व में कहा जाचुका है । प्रजननकर्म योषा वृषा के दाम्पत्यलक्षण मिथुनभात्र पर निर्भर है । इसी मिथुनसंपत्ति के लिए वेदि को योगा की प्रतिकृति मानागया है, एवं अग्नि को तृषा की प्रतिकृति माना गया है । योषाप्राणप्रधाना स्त्री वही उत्तम मानी जाती है, जिस का पश्चिम र्द्ध ( श्रोणी प्रदेश- नितम्बप्रदेश ) त्रिपुल हो, एवं पूर्वार्द्धभाग संकुचित हो । क्योंकि वेदि योत्रामिका स्त्री की प्रतिकृति है, अतएव वेदि का श्रोणिस्थानीय पश्चिम प्रदेश विपुल बनाया जाता है, पूर्व प्रदेश ३८
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उपनिषच्छन्द ॥ भाष्यभूमिका ॥--ब्राह्मण में उपनिषत् संकुचित बनाया जाता है 1 । वेदि खरूप की इसी उपनिषत् का प्रतिपादन करती हुई ब्राह्मण-श्रुति कहती है-" योषा नै वेदिर्ष्टषाग्निः । परिगृह्य वै योषा वृषाणं शेते । मिथुन -तत् प्रजननं क्रियते । तम्मादद्भितोऽग्निमंसा ऽउन्नयति । सा वै पश्चाद्वरी-यसी स्यात्, मध्ये संह्वारिता, पुनः पुरस्तादु । एवमित्र हि योषां प्रशंसन्ति- पृथुश्रोणिर्विमृष्टान्तरांसा, मध्य सङ्ग्राह्या इति ” ( शत ० २।२।३।१५-१६- ) । हमारे इस वैधयज्ञ की मूलभित्ति जहां पुरुष हैं, वहां पुरुषयज्ञ की उपनिषत् अधि दैविकयज्ञ है । आधिदैविक यज्ञ में भूपिण्ड गार्हपत्यकुण्ड है, इस में रहने वाला श्राङ्गिरस अग्नि ही गृहपति कहलाता है । दूसरे शब्दों में इस गृहपति अग्नि के सम्बन्ध से ही भूलोक गाई-पत्य कहलाता है । पुरुष की मूलग्रन्थि का इसी भूलोक से सम्बन्ध है । भूलोक वर्तुलवृत्तवत् है । अतश्व मूलाधार संस्था भी वर्तुलवृत्तत्रत् ही है । पुरुष का मुलाधार क्यों गाईपत्य कहलाता है? एवं वह वर्त्तुलवृत्तवत् क्यों है? इस की उपनिषत् यही भूलोक है । अन्तरिक्ष्य ऋताग्नि दक्षिणा दिक में प्रतिष्ठित है । यह श्रर्द्धभागावच्छिन्न होने से अर्द्ध-चन्द्राकाराकारित है । पार्थिव ओषधि वनस्पति का परिक्षक इसी ऋनात्मक दक्षिणाग्नि से होता है । पुरुष के दक्षिणभाग में उदररूप अन्तरिक्षलोक में यही अग्नि प्रतिष्ठित होता है । पुरुष का दक्षिणपार्श्वस्थ जाठराग्नि क्यों अर्द्धचन्द्राकाराकारित है? इसे श्राणाग्नि क्यों कहा जाता है? इस की उपनिषत् यही आन्तरिक्ष्य दक्षिणाग्नि है । द्युलोक आहवनीय है 1 । खगोलीय ४ स्वस्तिकों के सम्बन्ध से यह चतुष्कोण है । इस में सौरसावित्राग्नि प्रतिष्ठित है । पारमेष्टय सोम की इस में निरन्तर आहुति होती रहती है, अतएव इसे श्राहवनीयाग्नि कहा जाता है । पुरुष का शिरोभाग खस्वस्तिक भावयुक्त द्युलोक की प्रतिकृति होने से चतुष्कोण है, एवं इस में प्रतिष्ठित वही सौर अग्नि आहवनीयाग्नि है । पुरुष का मस्तक आहव-नीयकुण्ड क्यों कहलाता है? इस की उपनिषत् यही द्युलोक है । ३६
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उपनिषच्छब्द ॥ भाष्यभूमिका ॥ ब्राह्मण में उपनिषत् प्रकार सम्भूय आठ मस्तक में चार कपाल प्रधान हैं । प्रत्येक में दो दो कपाल हैं । इस ( भेजा ) रूप पुरोडाश प्रतिष्ठित रहता कपाल होजाते हैं । इन आठों कपालों के मध्य में मस्तिष्क की निरन्तर आहुति रहती है । इसी है । शिरोऽवस्थित प्राणदेवताओं में इस अष्टाकपाल पुरोडाश के ) आठकपालों में ही पुरोडाश का परि-उपनिषत् के आधार पर इस वैधयज्ञ में भी मृण्मय ( मिट्टी प्राणदेवताओं के लिए समन्त्रक पाक किया जाता है, एवं शिरः स्थानीय आहवनीय में ही प्राकृतिक इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर स्वाहा पूर्वक इस पुरोडाश की अध्वर्युद्वारा आहुति दी जाती है । श्रुति कहती है— शीर्ण: -" शिरो ह वाऽएतद्यज्ञस्य यव पुरोडाशः । स यान्येवेमानि । कपालानि, एतान्येवास्य कपालानि । मस्तिष्क एव पितानि करवावेति । तद्वाऽएतदेकपङ्गम् । एकं सह करवाव, समानं इति ॥ तस्माद्राऽएतदुभयं सह क्रियते ” ( शत ० १ | २ | ११२ ) ( पुरुषयज्ञ ) की उपनिषत है, इस प्रकार आधिदैविक ( प्राकृतिक ) यज्ञ श्राध्यात्मिक यज्ञ का वैधयज्ञ ) की उपनिषत् है । वैधयज्ञ एवं आध्यात्मिक यज्ञ आधिभौतिकयज्ञ ( मनुष्य कृत अमुक स्वरूप क्यों है? इस का उत्तर मुक स्वरूप क्यों है? इस का उत्तर पुरुष है, पुरुष का लक्ष्य में रखकर ही - " पुरुषो आधिदैविकयज्ञ है । इस यज्ञ एवं पुरुष यज्ञ की समता को कहा " ( शत ० ३ । १ । ४ । २३ ) इत्यादि वै यज्ञः ” ( शत ०१०।२।१ २ ) “ पुरुषसम्मितो यज्ञः जाता है । ही वह क्यों प्रतिष्ठित श्राहवनीय चतुष्कोण ही क्यों होता है? वेदि के पूर्वभाग में के पश्चिमभाग में ही इस का निर्माण किया जाता है? गार्हपत्य गोलाकार क्यों होता है? वेदि है । प्राकृतिक यज्ञविज्ञान क्यों होता है? इन सब प्रश्नों का उत्तर वही पूर्वोक्ता पुरुषयज्ञोपनिषत् । , एवं उसे चतुष्कोण ही रखना चाहिए हमें सिखलाता है कि आहवनीय पूर्व में ही बनाना चाहिए उपपत्ति होजायगी । इस प्रकार जब हम यदि इस से विपरीत किया जायगा तो यज्ञसंपत्ति विच्छिन्न यज्ञेति-रहस्य को जान लेते हैं तो द्वारा आध्यात्मिक एवं आधिदैविक यज्ञसंस्थाओं के वास्तविक ४०
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उपनिषच्छब्द ॥ भाष्यभूमिका । ॐ ब्राह्मण में उपनिषत कर्त्तव्यता प्रतिपादक तत्तद् विशेष धम्म पर हमारी दृढ आस्था होजाती है । प्राकृतिक नियमों के आधार पर व्यवस्थित विज्ञान सिद्धान्त हमें इन कर्म्म कला पेतिकर्तव्यता सम्बन्धी प्रकार विशेषों को नतमस्तक बनाकर माननें के लिए बाध्य कर देता है । जब हमें उपपत्ति ज्ञान होजाता है तो-" ऐसा ही क्यों करें, हम भी मनुष्य हैं, ईश्वर ने हमें भी बुद्धि प्रदान की है? हम क्यों नहीं बुध्यनुसार कर्म करें " इस प्रकार की प्रतिनिवेशरूपा बुद्धि का स्वत एव निराकरण होजाता है, एवं पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ हम उस कर्तव्य कर्म में जुट जाते हैं । यह तो हुआ हविर्वेदिका संक्षिप्त विवेचन । अब चलिए सोमयाग सम्पादिका महावेदि की ओर । " प्रकृतिसिद्ध नित्य हविर्यज्ञ से पुरुषयज्ञ का स्वरूप संपन्न हुआ है । एवं इस यज्ञमूर्ति पुरुष की प्रतिकृति ( नकल ) हमारा यह चैत्र यज्ञ है " यह कहा जाचुका है । इस प्रकृतिसिद्ध नित्य हविर्यज्ञ का भूपिण्ड से सम्बन्ध है । याम्योत्तर ( ध्रुवप्रोत दक्षिणोत्तर ) रेखा को मध्यस्थ बना कर भूपिण्ड के ठीक मध्य में से भूपिण्ड के दो विभाग कर डालिए । इस विभा-जन से भूपिण्ड का सूर्य्याभिमुख अर्द्धभाग सौस्तेज से अनुगृहीत हो जायगा, एवं विरुद्धदिक्स्थ आधाभाग तमः प्रधान रह जायगा । भूपिण्ड का जो अर्द्धभाग सूर्य की ओर रहता है, उस में सूर्य्य से आने वाला प्रवृक्त ( उच्छिष्ट ) सौर तेज प्रतिष्ठित हो जाता है । बलवत् सौरतेज के आगमन से तदेशावच्छिन्न पार्थिवमग्नेय तेज अपना स्वातन्त्र्य खो बैठता है । पृथिवी के प्राति-स्विक आग्नेयप्राण की स्वतन्त्र सत्ता तो सूर्य से विरुद्ध दिक् में रहने वाले अर्द्ध भूपिण्ड में ही रहती है । भूपिण्ड के दक्षिण भाग में अन्तरिक्ष्य वायव्य ऋताग्नि प्रतिष्ठित रहता है, जैसा कि पूर्व में कहा जाचुका है । इसी ऋताग्नि में उत्तरदिक्स्थ ऋतसोम की आहुति होनें से ऋतु का स्वरूप संपन्न होता है । इसी से ओषधि - वनस्पत्यादि अन्नों का परिपाक होता है । इस प्रकार भूपिण्ड भुक्त सौरप्राण, पार्थिव प्रातिविक आग्नेयप्राण, तिर्य्यक् बहने वाला दक्षिणस्थ याम्यमाण इस रूप से एक ही भूपिण्ड में तीन स्थितिएं हो जाती हैं । सम्पूर्ण भूपिण्ड हविर्वेदि है । सूर्य्याभिमुख रहने वाला सौरतेजोमय अर्द्ध भूपिण्ड आहवनी कुण्ड है । खस्तिक भावयुक्त सौरतेज के सम्बन्ध से इसे भी चतुष्कोण ही माना गया है । इस में प्रतिष्ठित सौर ४१