Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 251–260
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 251–260
पृष्ठ 251
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उपनिषच्छब्द - ॥ माष्यभूमिका ब्राह्मण में उपनिषत् अग्नि आहवनीयाग्नि है । सूर्य्यविरुद्ध दिक् में प्रतिष्ठित भूपिण्ड गाईपत्यकुण्ड है । प्रातिस्त्रिक भू तत्व की प्रधानता से इसे वर्तुल वृत्त माना गया है । इस में प्रतिष्ठित पार्थित्र प्रातिस्विक अग्नि गार्हपत्याग्नि है । दक्षिणस्थ याम्याग्निमण्डल दक्षिणाग्निकुण्ड है, तत्र प्रतिष्ठित ऋताग्नि दक्षिणाग्नि, किंवा श्रपणाग्नि है । यह है हवियैज्ञसंस्था का संक्षिप्त निदर्शन, एवं हविर्वेदिका स्वरूप निदर्शन । इसी की प्रतिकृति पुरुष है । पुरुष का सर्वाङ्ग शरीर हविर्वेदि है । उधर सम्पूर्ण भूपिण्ड हविर्वेदि है । दोनों में श्राहवनीय - गार्हपत्य - दक्षिणाग्नि आदि की व्यवस्था समान है, जैसा कि पूर्व में विस्तार से बतलाया जा चुका है । " अग्निर्भूस्थानः ” ( या ० निरुक्त ) के अनुसार भूपिण्ड अग्निमय हैं, अग्निम-धान है । यह अग्निपदार्थ भूत एवं प्राण भेद से दो प्रकार का माना गया है । इन दोनों में भूताग्नि मरणधर्म्मा है, प्राणाग्नि अमृतभावापन्न है । भूताग्नि से भूपिण्ड का निर्माण हुआ है, एवं प्राणाग्नि से भूमहिमा का स्वरूप निष्पन्न हुआ है । भूपिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहने वाला प्राणाग्नि ही भूपिण्ड से बाहर निकल कर अपने विशकलन स्वभाव से भूपिण्ड से बड़ी दूर तक, भूपिण्ड के चारों ओर एक विस्तृत मण्डलरूप में परिणत होता है । जहां तक इस पार्थिव अमृताग्निरूपप्राणमण्डल की व्याप्ति रहती है, वहां तक महिमामय पृथिवीलोक की सत्ता मानी जाती है । सामरूप प्राणमण्डल की समाप्ति ही ऋगुरूपा भूपिण्ड की समाप्ति है । अत एव उक्त साममण्डल की अन्तिम सीमा को उचसाम एवं निधनसाम नामों से व्यवहृत किया गया है । वैज्ञानिक महर्षियों का यह पूर्णपरीक्षित सिद्धान्त है कि भूगर्भ से निकला हुआ पार्थिव प्राणाग्नि पृथिवी २१ वें अहर्गण पर स्थित सूर्य पर्यन्त अपनी व्याप्ति रखता है । वहीं तक अग्निप्रधाना पृथिवी की सत्ता मानी गई है । सूर्य देवता इस महिमामण्डल से संसृष्ट है । दूसरे शब्दों में पृथिवी ( प्राणमयी अमृतापृथिवी ) सूर्य के साथ संलग्न है । सप्तद्वीप विभाग क्रम के अनुसार महिमापृथिवी का अन्तिम भाग पारमेष्ठ्य आपोमय पुष्करपर्ण के सम्बन्ध से " पुष्करद्वीप " नाम से प्रसिद्ध है । पुराण के मतानुसार पृथिवी के इसी पुष्करद्वीप में सूर्य * पृथिवी के रात द्वीप, सात लोक, सात पाताल, सात समुद्र, सात वायु, सात अकाश ४२
पृष्ठ 252
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विज्ञानदृष्टि || भाष्यभूमिका || -ब्राह्मण में उपनिषत् भगवान् प्रतिष्ठित हैं । ' अत्र हवा ( पृथिव्यां असावग्र आदित्य आस " ( शत ०४ / २ / ४ / ५ / ८ ) यह श्रौत सिद्धान्त ही उक्त पुराणसिद्धान्त का मूल आधार है । पूर्व कथन से यह सिद्ध होजाता है कि पृथिवीविवत्ते भूपिण्ड एवं भूमण्डल भेद से दो भागो में विभक्त है । भूपिण्ड जहां हविर्वेदि है, वहां महिमामय भूमण्डल महावेदि है । पृथिवी वेदि है, महापृथिवी महावेदि है । हविर्वेदि में आहुति द्रव्य अन्न रूप हवि है, इस से हविर्यज्ञ संपन्न होता है 1 । महावेदि में आहुति द्रव्य सोमतत्व है, इस से सोमयाग निष्पन्न होता है । यही महावेदि स्तौम्यत्रिलोकी, उख्यात्रिलोकी, पुष्करपर्ण, यादि विविध नामों से व्यवहृत हुई है । इसी के लिए- “ यावती वै वेदिस्तावतीपृथिवी ” ( शत ० ३ | ७ | २ | १ | ) यह कहा गया है । इस महावेदिरूपा महापृथिवी में वषट्कारविज्ञान के अनुसार ३३ अहर्गण माने गये हैं । इन में आरम्भ के १६ अहूणपर्यन्त प्राणाग्नि की प्रधानता है, एवं १७ से ऊपर ३३ वें अहर्गणपर्यन्त अमृतसोम का साम्राज्य है । मध्य के १७ वें अहर्गण में अग्नि - सोम दोनों का समन्वय होता है । दूसरे शब्दों में सत्रहवें अहर्गण में स्थित पार्थिव अमृताग्नि में १७ से ऊपर रहने वाला सोम निरन्तर आहुत होता रहता है । इसी सोमाहुति के सम्बन्ध से यह सप्तदशस्थान - " आहवनीय " नाम से प्रसिद्ध है । इस दाह्यसोमाहुति के प्रभाव से ही दाहक पार्थिव अग्नि प्रज्ज्वलित होकर २१ अहर्गण पर्यन्त व्याप्त होजाता है । यही यज्ञमूर्त्ति वामनविष्णु का त्रिविक्रम है । जैसा कि शतपथ विज्ञानभाष्यादि में स्पष्ट कर दिया गया है । २१ वें अहर्गण पर्यन्त वितत उस महावेदि के गर्भ में १५ व अहर्गण से आरम्भ कर २१ वें अहर्गणपर्यन्त एक स्वतन्त्र स्थान माना गया है । इसी प्रदेश को “ उत्तरावेदि " कहा जाता है । महावेद्यन्तर्गत इस उत्तरावेदि का १७ हवां स्थान ही आहवनीयकुण्ड है । वेदि की अन्तिम सीमा पर प्रतिष्ठित अथर्ववेदीयस्कम्भ की प्रतिष्ठा रूप सूर्य्य इस प्राकृतिक सोमयाग का " यूप " है । यही सूर्य्यरूप खूप प्राकृतिकयज्ञ पुरुष की शिखा है । इसी उपनिषत् के आधार पर यज्ञप्रभव द्विजातिमात्र को अपने आप को यज्ञपुरुषरूप समझने की भावना दृढ करने के लिए शिखा रखने का आदेश है 1 कौन से हैं? वे इस भूपिण्ड पर ही हैं, अथवा अन्य किसी लोक में? इत्यादि प्रश्नों के समाधान के लिए— " पुरा रहस्य " नामक ग्रन्थ देखना चाहिए । ४३
पृष्ठ 253
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
• विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका । -ब्राह्मण में उपनिषत प्रकार का आन्तरिक्ष्यधिष्ण्य नि सप्तदशस्तोमावच्छिन्न आहवनीय से नीचे की ओर आठ भरा हुआ है । आकाशायतनरूप कलश में सोमरस ( नाक्षत्रिकाग्नि ) प्रतिष्ठित है । १७ से ऊपर के € से ऊपर १५ वें अहर्गण से नीचे, एवं वें अहर्गण यही इस नित्ययज्ञ का हविद्धानमण्डप है । को प्रतिष्ठा यही स्थान है । हुआ है । उक्त धिष्याग्नि के प्रदेश में बलप्रद वायुमूर्ति ऊकूंरस भरा । पूर्वोक्त सोमाहुति के अधिष्ठाता क्रमश: अग्निवायु-यही स्थान इस प्राकृतिक यज्ञ का सदोमण्डप है ही दिव्यदेवताओं का ( सौर हैं । पार्थिवाग्नि के द्वारा आदित्य - बृहस्पति नामक चार प्राणदेवता अत एव अग्नि को देवताओं का माह्नता ( आह्वान-प्राण का ) आहवनीय से सम्बन्ध होता है । के ऋत्विक है । 13151 ही इस यज्ञ के होता नाम कर्त्ता - बुलाने वाला ) माना गया है । आह्नाता अग्नि की प्रेरणा से ही का यजन होता है, वायु गतिधर्म्मी वायु के द्वारा ही सोमाहुति से प्राणदेवताओं के ( आहुति देनें वाले ) वायुदेवता इस नित्ययज्ञ सोम आहवनीय में आहुत होता है । इसीलिए में आहुतिसोम ज्योति-सौर दिव्यमाण ) द्वारा आहवनीय अध्वर्यु हैं । आदित्य ( इन्द्रनाम से प्रसिद्ध त्रैलोक्य में वितान होता है । वितान ही गान रूप में परिणत होकर इस ज्योतिर्भाग का संपूर्ण के उद्गाता माने गये हैं । आदित्यदेवता इस नित्य यज्ञ है । इसी आधार पर सामगान के प्रवर्तक है, अत एव बृहस्पति इस ऋत्विजों का सञ्चालन होता बृहस्पति नामक ब्रह्म के द्वारा उक्त सब यज्ञ के ब्रह्मा माने गये हैं हवियज्ञ संस्था सवात्मना प्रतिष्ठित है ) इस पूर्वोक्त भूपिण्ड ( जिस में कि अग्नित्रयोपेता अतएव सौर-में सूय्ये सम्मुख रहने वाला, महावेदि का गार्हपत्य बन जाता है । दूसरे शब्दों मान लिया जाता इस महावेदि का गार्हपत्य प्राण से युक्त भूपिण्ड का आहवनीयरूप अर्द्धभाग । यह तो हुई आधि-) का सञ्चालन हो रहा है है । इसी महायज्ञ से सम्पूर्णविश्व ( स्तौम्यत्रैलोक्य भी सामने रख लीजिए । आध्यात्मिक महायज्ञ को दैविकयज्ञसंस्था की निरुक्ति । अब क्रम प्राप्त हविर्यज्ञोपनिषत् के अनुसार पूर्व में बतलाया जा चुका है कि पुरुष का शिरोभाग एक नियत मार्ग में से आरम्भ कर सूर्यकेन्द्रपर्यन्त श्राहवनीय है । आहवनीयरूप शिरोभाग है, उतने समय में ( पलक ) में जितना समय लगता सौरप्राण की व्याप्ति रहती है । एक निमेष ४४
पृष्ठ 254
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विज्ञानदृि -- ॥ माध्य भूमिका -ब्राह्मण में उपनिषत् पुरुष का यह विद्युन्मूर्त्ति आयुस्वरूपरक्षक सौरप्राण अपने प्रभव सूर्यस्थान के साथ तीन बार सम्बन्ध करता है । पुरुष के ब्रह्मरन्ध्र से सूर्यरन्ध्र पर्यन्त एक नियत मार्ग बना हुआ है 1 इसी मार्ग को उपनिषदों ने " महापथ " नाम से व्यवहृत किया है । प्रत्येक पुरुष के स्वस्वस्तिक के साथ यह महापथ नियत, एवं सर्वथा विभक्त है । इस महापथ को ही श्राध्यात्मिक यज्ञ की महावेदि समझना चाहिए । साथ ही में इस में भी वह संस्था विभाग ठीक वैसा ही समझना चाहिए, जैसा कि महायज्ञ में था | सौरसंस्था में प्रतिष्ठित सोम इस में निरन्तर आहुत होता रहता है । इसी यज्ञ के प्रभाव से पुरुष का शिरोभागस्थित दिव्यप्राण महापथात्मिका महावेदि के द्वारा निरन्तर सूय्र्यकेन्द्र से बद्ध रहता हुआ, सूर्य में रहने वाले ग्रायुतत्व को प्राप्त करता हुआ जीवनधारण में समर्थ रहता है । श्रायुसूत्र विच्छेदक, अवसानलक्षणं याम्यवायु के आक्रमण से जिस दिन उक्त सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाता है, उसी क्षण आयुसूत्र के टूट जाने से पुरुष का श्रायुर्म्म आत्मा श्रध्या स्मसंस्था से उत्क्रान्त होजाता है, यही इस आध्यात्मिक यज्ञ का अवसान काल है । यह यज्ञ जीवनपर्यन्त निरन्तर होता रहता है, अतएव इसे " अहरहर्यज्ञ " कहा जाता है । इसीयज्ञ के प्रभाव से प्रत्येक पुरुष का इन्द्रप्राण स्वर्गोपलक्षित सूर्य के साथ प्रतिक्षण सम्बन्ध करता रहता है । इसी नित्य प्रतिष्ठित आयुर्मूलक अहरहर्यज्ञका स्वरूप निरूपण करती हुई वाजिश्रुति कहती है-" अहरहवां एप यज्ञस्तायते । अहरहः सन्तिष्ठते । अहरहनेनं 1 स्वर्गस्य लोकस्य गत्यै युङ्क्ते । अहर हरेनेन स्वर्ग लोकं गच्छति " ( शत ०६४ | ४ | १५ ) इति । श उक्त प्राकृतिक आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक यज्ञ के आधार पर ही हमारे इस आधिभौतिक वैध ज्योतिष्टोम का वितान होता है । यहां प्रकृतिवत् पहावेदि हविर्वेदि से संलग्न ही बनाई जाती है । महावेदि के गर्भ में ही उत्तरावेदि का निर्माण होता है । वहीं आहवनीय चनाया जाता है । प्रकृतिवत् यहां हविर्वेदि के ग्राहवनीय को इस महावेदि का गाईपत्य माना जाता है । यही याज्ञिक परिभाषा में " नूतनगार्हपत्य " नाम से प्रसिद्ध है । एवं हविर्वेदिका गाई-पप ‘ “ पुराणगाईपत्य " नाम से व्यवहृत किया जाता है । ऊर्कस्थान में यहाँ उदुम्बरी ( गूलर ४५
पृष्ठ 255
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विज्ञानदृष्टि -- || भाष्यभूमिका ॥ॐॐ ब्राह्मण में उपनिषत् सोम के स्थान की शाखा ) है । धिष्ण्याग्नि के स्थान में आठ धिष्ण्याग्निएं हैं । हविर्द्धानमण्डपस्थ सूर्य के स्थान में महावेदि अन्त में ( सर्वान्त में ) काष्ठ में सोमांशु ( सोमवल्ली के खण्ड ) हैं । , वेदत्रयीमय बृहस्पति का यूप है । ऋमय अनि, यजुर्मय वायु, साममय आदित्य उद्गाता, त्रैविद्यब्रह्मा के स्थान में यहां भी ऋग्वेदी होता, यजुर्वेदी अध्वर्यु, सामवेदी प्रजापति के स्थान में यज्ञफलभोक्ता नाम के यज्ञस्वरूप सम्पादक चार ऋत्विक् हैं । पार्थिव वहां है, ठीक वैसा ही यहां सपत्नीक यजमान है । कहने का तात्पर्य यही है कि जैसा जाता है? यूप सब है । इविर्वेदि का आहवनीय महावेदि संस्था में गाईपत्य क्यों मानलिया - श्रद्गात्रादि कर्म्म के अन्त में ही क्यों प्रतिष्ठित किया जाता है? हौत्र - आध्वर्यव की प्रतिष्ठा सदोमण्डप होता - अध्वर्यु - - उ उद्गाता द्वारा ही क्यों कराएं जाते हैं? धिष्ण्याग्नि है? इत्यादि सारे प्रश्नों का में ही क्यों की जाती है? यहीं उदुम्बरी क्यों खड़ी की जाती है । हम अपनी ओर से मनमाना एकमात्र समाधान वही पूर्वप्रतिपादिता नित्ययज्ञमूला यज्ञोपनिषत् यज्ञ में नित्य प्राणदेवता जैसा कुछ कुछ नहीं करते, श्रपितु प्रकृतिमण्डल में होने वाले नित्य करवाणि ” कर रहे हैं, अपने वैधयज्ञ में हम ठीक वैसा ही कर रहे हैं- " यद्वै देवा अकुस्तत् । जो महानुभाव उक्त ( शत ० ३ | १ | १ ) " देवानां वै विधामनु मनुष्याः ( शत ० ६ | | ७ ४ | १ ) पड़ कर पूर्वोक्त सिद्धान्त की उपनिषदूविज्ञान को समझने में असमर्थ रहते हुए, अभिनिवेश में करते हुए, यज्ञ को अवहेलना करते हुए श्रुतिस्मृति सम्मत प्राचीन पद्धतिपथ का तिरस्कार पद्धतिएं गढने का साहस एकमात्र हवा फिल्टर का ही साधक समझते हुए नवीन नवीन मनमानी कर बैठते हैं, उन उच्छृंखल पथभ्रष्ट यज्ञाभिमानियों का वह यज्ञ कर्म - " व्युद्धं वै तद्यज्ञस्य के समावेश से सर्वथा समृद्धि यन्मानुषम् ” ( शत ० { । ४ । १ । ३५ ) इस के अनुसार मानुषभाव बनजाता है । यज्ञ की रहित बनता हुआ इष्टजनकता के स्थान में प्रभ्युदय नाश का कारण प्रकृति से प्रत्येक इतिकर्तव्यता की उपनिषत् सुदृढ भित्ति पर प्रतिष्ठित है । उस से विरोध करना है कि कर्मकाण्ड प्रति-विरोध करना है । अस्तु उक्त सन्दर्भ से प्रकृत में हमें यही बतलाना का उल्लेख रहता है । पादक ब्राह्मणग्रन्थ में तत्तत्कम्मों के साथ साथ ही ' विज्ञानोपनिषत् ४६
पृष्ठ 256
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विज्ञानदृष्टि .. || भाष्यभूमिका ॥ ब्राह्मण में उपनिषत् प्रत्येक कर्म्म सोपपत्तिक ही निरूपित हुआ है । इन्हीं सब कारणों से विज्ञानानुमोदित, अत एव सत्यप्रतिपत्ति क हेतुभूत निश्चित सिद्धान्त को ही हम उपनिषत् पदार्थ का अवच्छे-दक मानने के लिए तय्यार हैं । साथ ही में इस उपनिषत् का कर्मकाण्ड प्रतिपादक के साथ घनिष्ट सम्बन्ध मानना न्यायसंगत हो जाता है । ब्राह्मण ग्रन्थ इति - ब्राह्मणग्रन्थेषु - उपनिषच्छब्दसमन्वयः १ ४७
पृष्ठ 257
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 258
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्रा ह्मणभाग से सम्बन्ध रखने वाले उपनिषत्तत्व का दिग्दर्शन कराया गया । अब क्रमप्राप्त आरण्यकग्रन्थ के साथ रहने वाले उपनिषत्तत्व के सम्बन्ध का संक्षेप से विवेचन किया जाता है । अध्यात्मविद्यात्व को ही उपनिषत् शब्द का अव-च्छेदक माननें वाले स्वयं प्राचीनों ने भी आरण्यक के साथ उपनिषत् शब्द का सम्बन्ध माना है । भगवान् शङ्कराचार्य ने वेदान्त भाष्य में एक स्थान पर - " अर-मियान्नपुनरेयात् इत्युपनिषत् " ( शा ० सू ० शां ० भाष्य.........•.... ) यह कहा है । ब्रह्मचर्य-गृहस्थ- वानप्रस्थ- सन्यास भेद से आश्रममर्यादा चार भागों में विभक्त है । “ सम्यग्रूप से ब्रह्मचर्याश्रम के अनुष्ठानानन्तर यथाकालमाप्त गृहस्थाश्रम का अनुष्ठान करने के पश्चात् एक गृहस्थी वानप्रस्थाश्रम के अनुष्ठान के लिए सर्वपरिग्रहों को छोड़कर जब एक बार आरण्यगामी बन जाय, ( जङ्गल में चला जाय तो फिर उसे ( अरण्य से ) वापस नहीं लौटना चाहिए " पूर्व वाक्य का यही फलितार्थ है । प्राचीनों के मतानुसार ब्राह्मणभाग का गृहस्थाश्रम से सम्बन्ध है, आरण्यक भाग का वानप्रस्थाश्रम से एवं उपनिषद्भाग का संन्यासाश्रम से सम्बन्ध है । परन्तु पूर्ववाक्य आरण्यक के साथ भी ( " इत्युपनिषत् " यह कहता हुआ ) उप-निषत् का सम्बन्ध बतलाता हुआ उन के स्वीकृत मत को छिन्न भिन्न कर डालता है । " एक बार जङ्गल में जाकर वापस लौटने से आत्मसंकल्प में शिथिलता आजाती है, आश्रममर्यादा भङ्ग हो -जाती है । वानप्रस्थाश्रम की उपनिषत् ( मौलिक सिद्धान्तभित्ति ) तो यही है कि एक बार चला गया सो चला गया । यदि वह पुनः वापस लौटता है तो वानप्रस्थ सम्बन्धी आरण्यकोपनिषत् के विरुद्ध जाता है । " उक्त वाक्य का यही तात्पय्यर्थ है । इस तात्पर्य्यार्थ से पाठकों को मान लेना पड़ेगा कि स्वयं प्राचीनों नें भी उपनिषत् शब्द का प्रयोग कई स्थानों में मौलिक विज्ञान सिद्धान्त के अभिप्राय से किया है । 1 अपिच पूर्वकथनानुसार - " नाना तु विद्या चाविद्या च । यदेव विद्यया करोति, श्रद्धया, उपनिषदो तदेव वीर्य्यवत्तरं भवति " इत्यादि रूप से स्थान स्थान पर श्रुतियों नें कर्म्ममात्र के साथ उपनिषत् का सम्बन्ध माना है 1 । कार्यकारण रहस्यज्ञान विद्या है, कार्य के साथ जिस अथव-४५
पृष्ठ 259
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका ॥ आरण्यक में उपनिषत् कार्य का फल के साथ सम्बन्ध सूत्रद्वारा आत्मा का सम्बन्ध होता है, वही श्रद्धा है, एवं तन्मूलभूत योगज सिद्धि इन तीनों के एकत्र संयम से जैसे परिज्ञाने ही उपनिषत् है । धारणा - ध्यान - समाधि के समन्वय से जो कर्म्म किया जाता प्राप्त होती है, इसी प्रकार विद्या श्रद्धा उपनिषत् इन तीनों । श्राप ( प्राचीन ) कहते हैं- " उपनिषत् है, वह वीर्यवत्तर बनता हुआ अवश्य ही सफल होता है ज्ञान साधारण में ही निरूढ है " '. - उधर श्रुति के कथनानुसार उपनिषत् का शब्द अध्यात्मविद्या उन प्रामाणिक माना जाय, इस का निर्णयभार के साथ सम्बन्ध है । दोनों में से किस का सिद्धान्त इस सम्बन्ध में यह कहने के लिए तय्यार प्राचीनों पर ही छोड़ा जाता है । हम तो निःसन्दिग्धरूप से साथ घनिष्ट सम्बन्ध रखता है । साधा-हैं कि उपनिषत् शब्द लोक - वेद सम्बन्धी सम्पूर्ण भावों के रखता है । पाश्चात्य भाषा में जिस रण से साधारण मनुष्य का कर्म्म भी कोई न कोई उपनिषत् जिस अर्थ में ' उसूल ' के लिए ' प्रिन्सिपिल ' ( Principle ) शब्द प्रयुक्त हुआ है, यावनीभाषा हुआ में " उपनिषत् " शब्द प्रयुक्त शब्द प्रयुक्त करती है, छन्दोभाषा ( वेदभाषा ) में उसी अर्थ होता है, उपनिषत् होती है । प्रिन्सि है । प्रत्येक कम्म का कोई न कोई प्रिन्सिपिल होता है, उसूल पर किया हुआ कर्म्म ही सुप्रतिष्ठित पिल के आधार पर किया हुआ कर्म्म, किंवा उसूल के आधार । बनता हुआ सफल होसकता है, यह कौन नहीं जानता ०: " - " अरण्य मियान्न-इसप्रकार - " यदेव विद्यया करोति, श्रद्धया उपनिषदा हमिति ” ( वृ ० प्रा ० उ ०६।५ । ) पुनरेयादित्युपनिषत् ” - “ तम्योपनिषदहरिति, तस्योपनिषद कर्मेति कर्त्तव्यताविशेषोपपा-इत्यादि श्रौतस्मार्त्त प्रमाणों के आधार पर प्रतिष्ठित - " तत्तत् से भली-है " यह सिद्धान्त पूर्व के सन्दर्भ दकविज्ञानसिद्धान्त में ही उपनिषत् शब्द निरूढ इस सम्बन्ध में एक आक्षेप और बच भांति सिद्ध होजाता है । यह सब कुछ होने पर भी अभी समाप्त किया जाता है । जाता है 1 । उस का निराकरण कर इस प्रकरण को इति - आरण्यकग्रन्थेषु - उपनिषच्छब्द समन्वयः ४६ 15815
पृष्ठ 260
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न्त्र - ब्राह्मणात्मक निगमशास्त्र के चिरकाल से १ -संहिता, २ - विधि, ३. आरण्यक ४- उपनिषत् यह चार विभाग चले आ रहे हैं । विज्ञान - स्तुति- इतिहास- प्रतिपादक " म संहिताभाग को छोड़ कर शेष तीनों क्रमशः कर्म्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञान-काण्ड के प्रतिपादक माने जाते हैं । उपनिषत् शब्द सदा सर्वदा से वेद के अन्तिम ' भाग में ही प्रयुक्त देखा एवं सुना जाता है । इसी आधार पर श्रौपनिषत् ज्ञान को वेदान्त दर्शन ने " वेदान्त " ( वेद का अन्त भाग ) नाम से व्यवहृत किया है । " सर्वे वेदान्तर व्याख्याताः ” इस सुप्रसिद्ध वाक्य का - " सर्वा उपनिषदो व्याख्याताः " यही अर्थ समभा जारहा है | व्याकरण, उपमान, कोश, माप्तवाक्य, लौकिकव्यवहार इन पांचों शक्ति-ग्राहकों में– “ शक्तिग्राहक शिरोमणे लोकव्यवहारस्य " इस सिद्धान्त के अनुसार वृद्धव्यवहार रूप लोकव्यवहार को ही शक्तिग्राहकता में विशेष महत्व दिया गया है । एवं उपनिषत् शब्द के सम्बन्ध में यह लौकिक वृद्धव्यवहार ज्ञानकाण्ड प्रतिपादिका अध्यात्मविद्या को ही एकमात्र उप-निषत् का अवच्छेदक बतला रहा है । ऐसी अवस्था में सर्वसम्मत, एवं सर्वमान्य उक्त लोकव्यवहार के सर्वथा विरुद्ध विज्ञानसिद्धान्त को उपनिषत् का अवच्छेदक बतलाना कैसे सङ्गत हो सकता है? फलतः उपनिषत् पदार्थ के अवच्छेदक के सम्बन्ध में बतलाया गया पूर्व का सन्दर्भ केवल कल्पना ही रह जाती है " पूर्व प्रतिपादित उपनिषदर्थ के सम्बन्ध में यही आक्षेप हमारे सामने उपस्थित होता है । आक्षेप यथार्थ है । यदि साधारण विषय होता तो ऐसी स्थूल अविद्या ( मोटी भूल ) को M स्थान ही नहीं मिलता । “ उपनिषत् वेद का चौथा भाग है, उपनिषद्ग्रन्थ वेदान्त नाम से प्रसिद्ध है । उपनिषच्छास्त्र अध्यात्मविद्या का प्रतिपादक है । इस सनातन व्यवहार का न तो आज तक किसी ने विरोध किया, न इस सिद्धान्त का आज ही विरोध हो रहा, न भविष्य में ही इस सर्वसम्मत वृद्धव्यवहार का विरोध करने का कोई साहस कर सकता । हम खयं उपनिषद्-ग्रन्थों को अध्यात्मविद्या का प्रतिपादक मान रहे हैं, जैसा कि पूर्व के मङ्गलरहस्य में विशद रूप से बतलाया जा चुका है - ( देखिए उ ० मा ० भू ० मं ० र ० प्र ० सं ० ३ ।... ) । साथ ही में पूर्व की विज्ञानदृष्टि में अब तक कहीं यह कहा भी नहीं है कि उपनिषद्ग्रन्थ अध्यात्मविद्या के ५०