Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 261–270

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 261 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका ॥-उपनिषत् में उपनिषत् अध्यात्मविद्यात्व को हीं उप-प्रतिपादक नहीं हैं । हैं - और अवश्य हैं । हमारा विरोध तो केवल है, यह दोनों को ' निषत् का पदार्थतावच्छेदक माननें साथ है । उपनिषदों में अध्यात्मविद्या ही उपनि-सम्मत है T । विरोध केवल आंशिकरूप से है । आप के विचारानुसार अध्यात्मविद्या हैं । पूर्व कथना-पत्र है, हम अध्यात्मविद्या के साथ भी उपनिषत् शब्द का सम्बन्ध मानते शब्द से व्यवहृत किया जा नुसार विज्ञानशास्त्र की सम्मति से विज्ञानसिद्धान्त को ही उपनिषत् का मुलाधार हो, अथवा सकता है । चाहे वह विज्ञान सिद्धान्त आत्मविद्या सम्बन्धी हो, अर्थ विद्या ही प्रवृत्ति है तो कर्म्मविद्या की प्रतिष्ठा हो । “ यदि उपनिषत् शब्द की विज्ञानसाधारण में से क्यों व्यवहृत फिर अध्यात्मविद्याप्रतिपादक वेद का चौथा भाग ही उपनिषत शब्द, एवं हुआ, विज्ञान सिद्धान्त से प्रतिपद पर सम्बन्ध रखने वाला वेद का ब्राह्मणभाग ? बस इस सम्बन्ध में अब आरण्यक भाग उपनिषत् शब्द से क्यों व्यवहृत नहीं हुआ " निम्न लिखित पङ्कियों पर ध्यान एकमात्र यही प्रश्न शेष रह जाता है । इस के समाधान के लिए देना आवश्यक होगा । - उपनिषत् यह तीन मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के ब्राह्मणभाग के विधि - आरण्यक जाचुका है । इन तीनों प्रसिद्ध विभाग हैं, जैसा कि पूर्व की प्राचीनदृष्टि में विस्तार से बतलाया " नाम से प्रसिद्ध है । में जो पहिला विधि भाग है, वही आज दिन विद्वत् समाज में ' ब्राह्मण ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत ", विधि आज्ञाभात्र है । " ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत " - " वसन्ते , अतएव इसे " विधि ” नाम से इत्यादि रूप से ब्राह्मणभाग में अनुज्ञाधारा प्रवाहित रहती है , अनारभ्याधीता, सामा-व्यवहृत करना न्यायसङ्गत होता है । यह विधिश्रुतिएं प्रारभ्याधीता न्या भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । है । यज्ञकम्म सम्पूर्ण कर्म्मकलाप क्रत्वर्थ एवं पुरुषार्थ भेद से दो भागों में विभक्त हैं 1 । ऋत्वर्थकम्मों से प्रधान कर्म्म पुरुषार्थकर्म्म है, यज्ञखरूपसंपादक यज्ञार्थक ऋत्वर्थक होती है । यह प्रधान कर्म्म यज्ञकर्त्ता सुसंपन्न होता है । प्रधान कर्म से स्वर्गीदि फलों की प्राप्ति, अत है, अभीष्टार्थ को संपन्न करता है यजमान पुरुष का वर्गीदि फलों के साथ सम्बन्ध कराता ५१

पृष्ठ 262

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 262 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ..। भाष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् एव यह कर्म्म पुरुषार्थ कहलाता है । प्रधान कर्म्मरूप इस पुरुषार्थकर्म का आदेश करने वाली श्रुति ही " अनारभ्याधीता " नाम से व्यवहृत होती है । एवं ऋत्वर्थकर्म का आदेश करने वाले विधिवचन “ आरभ्याधीन " नाम से प्रसिद्ध हैं । एक में स्वर्ग इष्ट है, दूसरे में लिडर्थ इष्ट है । किसी कर्म के आरम्भक्रम के ( सिलसिले के ) बिना जो विधि हमारे सामने आती है, वह स्वतन्त्र-रूप से विहित होती हुई “ अनारभ्याधीता " कहलाती है । उदाहरणार्थ - " दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत " - " ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत " - " अहरहः सन्ध्यामुपासीत " इत्यादि विधिश्रुतिएं किसी कर्म्म के अङ्गों की परम्परा से कोई सम्बन्ध नहीं रखतीं । श्रपितु यह दर्शपूर्ण-मास - ज्योतिष्टोम - सन्ध्योपासन आदि खतन्त्र ( अङ्गीकर्म्म ) कम्मों का आदेश करतीं हैं । ऐसे विधिवचन किसी अन्य कर्म के भङ्गभाव का प्रतिपादन नहीं करते, अपितु प्रधान कर्म्मखरूप पुरुषार्थ का ही निरूपण करते हैं । यजमान जिस इष्ट ( अभिलतिफल ) की प्राप्ति के लिए यज्ञ करता है, उक्त श्रुतियों का उसी इष्ट के साथ सम्बन्ध है । उपर्युक्त अनारभ्याधीत विधिवाक्यों के प्रकरण में ( अनारम्याधीत विधि कम्मों के खरूप संपादक ) मध्य मध्य में ओर ओर जो विधिवाक्य आजाते हैं, वे सब ' आरभ्याधीत ' नाम से प्रसिद्ध हैं । अनारभ्याधीत विधिवाक्यों के आरम्भ होजानें पर इन के मध्य मध्य में यथावसर अवान्तर कर्मद्योतक इन विधि वाक्यों का आरम्भ होता है, अत एव अङ्गकर्म्म सूचक यह अवान्तर मध्यपतित विधिवचन ' आरभ्याधीत ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । दूसरे शब्दों में प्रधानकर्म्म के आरम्भ में पढ़ेजाने के कारण भी इन वचनों को यारभ्याधीत कहा जासकता है । उदाहरणार्थ " दध्ना जुहोति " - " अपउपस्पृशति ” - “ अपः प्रणयति " - प्रवराय श्राश्रावयति " - " - " गाई-पत्ये हवींषि श्रपयन्ति " - " पवित्रे करोति " - " स्रुचौ सम्मार्ष्टि " वषट्कृते जुहोति'- ' सान्त-पनेभ्यो मरुद्भ्यः सप्तकरालं पुरोडाशं निर्वपति " यह सब आरभ्याधीत विधिवचन हैं । इन सब से दर्शपूर्ण मासादिरूप अनारभ्याधीत कम्मों का स्वरूप निष्पन्न होता है । ऐसी अवस्था में हम इन आरभ्यातीत कम्मों को अवश्य ही ऋत्वर्थकर्म्म कह सकते हैं । “ दर्शपूर्ण मासाभ्यां स्वर्ग-कामो यजेत " इस वाक्य में जो लिडर्थ है, उसकी इतिकर्तव्यता पूरी करने के लिए ही उक्त ५२

पृष्ठ 263

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 263 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानष्ट ..। भाष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् , गाई-से आचमन करना, अपां प्रणयन करना श्रारभ्याधीत विधिवचन प्रवृत्त होते हैं । पानी सब अङ्गकर्म हैं । इन के संपन्न पानी में कुशा डालना, यह पत्य में हवि का परिपाक करना, नहीं हो सकता । स्वरूप कथमपि संपन्न हुए बिना अङ्गीभूत दर्शपूर्णमास का । " कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं-तीसरा विभाग है सामान्यविधियों का या प्रमद " - " अहरहर्भूतेभ्यो समाः - " स्वाध्यायान् माममद " - " देवपितृकायाभ्यां " " सत्यं वद " -" - " अनृतं मा ब्रूयाः बलिं दद्यात् " - " मा हिंस्यात् सव भूतानि कोटि में प्रविष्ट हैं । किसी फल की आकांक्षा न करते हुए " धर्म्यं चर ” इत्यादि वचन सामान्यविधि करो, कभी मिथ्याभाषण न करो, ही जीवित रहने की इच्छा यावज्जीवन निष्काम कर्म्म करते हुए का उपदेश देनें वाले उक्त रखने वाले सामान्य कम्मों इत्यादि रूप से मनुष्यमात्र से सम्बन्ध हैं । में माने जासकते वचन अवश्य ही सामान्यविधि कोटि के , सामान्याधीत भेद से विधि वचनों इस प्रकार अनारभ्याधीत, प्रारभ्याधीत ( मौलिकविज्ञान सिद्धान्त, हीं विधियों की उपनिषत् तीन व्यवस्थित विभाग होजाते हैं । इन तीनों है? सन्ध्या का क्या से स्वर्ग कैसे मिलता उपपत्ति, उसूल ) भिन्न भिन्न हैं । दर्शपूर्णमास दर्शेष्टि में इन्द्र के लिए मान्नाय फल है? इत्यादि पुरुषार्थ कम्र्मों की उपनिषत् भिन्न हैं । अपां प्रणयन से क्या क्यों किया जाता है? की ही आहुति क्यों दी जाती है? आचमन क्रत्वर्थ कम्र्मों की उपनिषत् भिन्न हैं । एवं जाते हैं? इत्यादि लाभ है? पानी में दर्भ क्यों डाले अतिथियज्ञ इत्यादि सामान्य कम्म , भूतयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, सत्यभाषण, अहिंसा, सर्वभूतरति विधिएं असंख्य हैं 1 । प्रत्येक का स्वरूप विधियों में आरभ्याचीत की उपनिषत् पृथक् हैं । इन तीनों के लिए उन व्यारभ्याधीत कम्मो की हैं । अतएव बोधसौकर्य बतलाने वाली उपनिषदें भी अनन्त जाता है । अपप्रणयन, साथ ही प्रतिपादन कर दिया उपनिषदों का तत्तत् ऋत्वर्थ कम्मों के, पात्रांसादन, पात्रप्रतपन, हविर्ग्रहण, आचमन, प्रोक्षण, पुरोडाशश्रपण, पवित्रीकरण , पुरोडाशसम्पादन, श्राज्यविलापन, गोदोहन, इध्मसन्नहन, अग्निसमिन्धन, होतृपवरण आदि आदि जितने भी कर्म हैं, उन सब की वेदसम्पादन, अग्निमन्धनं, दक्षिणादान ५३

पृष्ठ 264

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 264 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ॥ माष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् उपनिषदें उन उन कम्मों की इतिकर्तव्यता के साथ साथ ही ( ब्राह्मणग्रन्थों में ) प्रतिपादित हैं । इन सब के खरूपज्ञान के लिए तो ब्राह्मणग्रन्थों का पर्य्यालोडन ही अपेक्षित है । प्रकृत में उदाहरण के लिए केवल अप उपस्पर्श ( आचमन ) कर्म की इतिकर्तव्यता, एवं इस की उपनिषद् का संक्षेप से दिग्दर्शन करा दिया जाता है । पूर्णिमातिथि ( पूर्णिमोत्तर प्रतिपत् ) में पौरखमासेष्टि होती है, एवं अमोत्तर प्रतिपत् में दर्शष्टि की जाती है । यह दोनों ही एक प्रकार से पुरुषार्थक हैं । अनारम्याधीत विधि से सम्बन्ध रखने वाले हैं । दर्शेष्टि में इन्द्र के लिए सन्नाय्य दिया जाता है । इस सन्नाय द्रव्य सम्पा-दन के लिए प्रथम दिन में “ इषे त्वोर्जेत्वा वायवस्थ देवो वः सबितामायतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे " ( यजु ० सं ० १ । १ ) इत्यादि मन्त्र से पलाशशाखा द्वारा वत्स ( गोवत्स ) निवारण पूर्वक गोदोहन कम किया जाता है । दूसरे दिन प्रतिपद को प्रातःकाल ही यज्ञकत्ती यजमान सब से पहिले व्रतो-पायन कर्म करता है । आहवनीयकुण्ड एवं गार्हपत्यकुण्ड दोनों के मध्य में खड़ा होकर यजमान - " अग्ने! व्रतपते! व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् " ( यजुः सं ० २।५३ ) यह मन्त्र बोलता हुआ दोनों अग्नियों की साक्षी में व्रत ग्रहण करता है । गार्हपत्याग्नि पार्थिव-अग्निस्थानीय हैं, एवं आहवनीय अनि सौरदिव्याग्निस्थानीय है । इन दोनों के मध्य में खड़े होने की उपनिषत् यही है कि यज्ञद्वारा खर्गलोकावाति साधक नया दैवात्मा उत्पन्न किया जाता है । इस के ग्रन्थिबन्धन से बद्ध यज्ञकर्त्ता यजमान का कम्मैभोक्ता मानुषात्मा इस शरीर के छूट जाने पर सप्तदशस्थानीय नाचिकेतस्वर्ग में प्रतिष्ठित होजाता है । अभी प्राप्तत्रायुभोग पर्यन्त यज-मान को पृथिवीलोक में रहना है, साथ ही में खर्ग्याग्निरूप आहवनीय के साथ भी सम्बन्ध जोड़ना आवश्यक है । इन दोनों फलों की सिद्धि के लिए दोनों अग्नियों के मध्य में खड़े होकर ही व्रत ग्रहण करना उचित है । पिच व्रतपति अग्नि आन्तरिक्ष्य है, जैसा कि ई ० उ ० मा ० द्वि०-खण्ड के त्रयीवेद प्रकरण में बतलाया गया है । इस यान्तरिक्ष्य व्रतपति अग्नि की सम्पत्ति प्राप्ति के लिए भी, दूसरे शब्दों में व्रतपति अग्नि की साक्षी में व्रतग्रहण करने के अभिप्राय से भी गाई-पत्यरूप पृथिवी, आहवनीयरूप द्युलोक के मध्यरूप अन्तरिक्ष में खड़े होकर व्रतग्रहण करना

पृष्ठ 265

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 265 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि माष्यभूमिका उपनिषत् में उपनिषत् उचित होता है । उक्त मन्त्र बोलता हुआ यजमान पानी का आचमन करता है । आचमन करना ही व्रतोपायन कर्म है । अग्नि के मध्य में खड़े होकर क्यों अप उपस्पर्श ( श्राचमन ) रूप व्रतोपायना कर्म किया जाता है? इस की उपनिषत् बतलाती हुई ब्राह्मणश्रुति कहती है-“ व्रतमुपैष्यन् – अन्तरेणाहवनीयं च गार्हपत्यं च प्रातिष्ठत्रप--उपस्पृशति । तद्यदप उपस्पृशति - ( तदुच्यते ) - श्रमेध्यो के पुरुषो यदनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः । मेध्या वाऽआपः । मेध्यो-भूत्वा व्रतमुपायानि इति । पवित्रं वाऽआपः पवित्रपूतो व्रत-मुपायानि - इति । तस्माद्वा अप उपस्पृशति " ( इत्युपनिषत् ) ”

( शत ० १।१।२ । १ । ) इति ॥

“ स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ” ( वृ ० या ० उपनिषत् ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार हमारा आत्मा मन प्राण वाङ्मय है । मनप्राणवाङ्मय आत्मा के काम व्यापार यत्न - शप यह तीन धर्म्म हैं । कामना मन का व्यापार है, यत्न ( कृति चेष्टा ) प्राण का यही तीन है, श्रम वाग्र्यापार है । सृष्टिसाक्षी मनप्राणवाङ्मय प्रजापति की सृष्टि के मुलाधार व्यापार हैं । अतएव इन्हें सृष्टि के सामान्य अनुबन्ध माना जाता है । परस्पर में सर्वथा विभिन्न सभी सृष्टियों में उक्त तीनों व्यापारों का समन्वय नितान्त अपेक्षित है । अत एव सृष्टिकर्म्मप्रति-पादिका सभी श्रुतियों के आरम्भ - " प्रजापतिर्वा इदमग्र एक एवास । सोऽकामयत बहु-का ही स्याम, प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत, सोऽश्राम्यत् " इत्यादिरूप से काम - तप- श्रम भावों के सम्पूर्ण कर्म्म निर्देश रहता है । यही कारण है कि ईश्वर प्रजापति के अंशभूत जीवप्रजापति कामना के उक्त तीनों व्यापारों के आधार पर ही प्रतिष्ठित हैं । हम सर्वप्रथम कामना करते हैं, इन्द्रियों का व्यापार श्रनन्तर तदनुकूला चेष्टा होती है, यह चेष्टा ही प्राणव्यापार है । हस्तादि बहव्यापार है, यही श्रम है । लकवे का रोगी उठने का यत्न करता है । उस में प्राणव्यापार होता है, परन्तु हाथ पैर काम नहीं देते । इस में श्रम का अभाव है । कामना उक्त तीनों व्यापारों का यदि एक ही कर्म से सम्बन्ध होता है, दूसरे शब्दों में ५५

पृष्ठ 266

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 266 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि || भाष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् का जैसा खरूप होता है, तदनुरूप ही यदि तप एवं श्रम होता है तो उस कर्म्म में पूर्ण सफलता मिलती है । तीनों को एक मार्ग में रखने से आत्मा का धरातल अविच्छिन्न रहता है । तीनों एकरूप से काम करते हैं, यही आत्मा का ऋजुभाव ( सीधापना समानधरातलता ) है । इन तीनों में मन प्रधान है । यदि मनोमूला कामना की अपेक्षा से प्राणमूल तप, एवं वाङ्मूल श्रम विभिन्न मार्ग में चले जाते हैं तो मन क्षुब्ध होता हुआ चञ्चल बन जाता है । चञ्चल, अतएव अस्थिर मन में सौरप्राणदेवसमष्टिरूप विज्ञान ( बुद्धि ) तत्व का प्रतिबिम्ब यथावत् प्रतिष्ठित नहीं होता । कारण-स्पष्ट है । पानी का पात्र यदि हिलता रहता है तो उस पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पूर्णरूप से विकसित नहीं होता । यदि श्रादर्श ( काच ) वत् पात्र स्थिर रहता है तो उस में सूर्य प्रतिबिम्ब का पूर्ण विकास हो जाता है । ऐसे पूर्ण प्रतिबिम्ब भात्र के लिए आधारपात्र की स्थिरता, समानधरातलता, एवं एकरूपता सर्वथा अपेक्षित है । आत्मसंस्था में ऐसा होना तभी सम्भव है, जब कि मन - प्राण-वाकू इन तीनों श्यात्मकलाच्चों को समानमार्ग की अनुगामिनिएं बनाया जाय । ऐसा अकुटिल श्रात्मा विज्ञान प्रतिबिम्ब की पूर्णता से पूर्ण ज्योतिर्म्मय रहता है, अत एव ऐसे पुरुषधौरेय ' महात्मा ' नाम से पुकारे जाते हैं । ठीक इस के विपरीत जो पुरुष कामना ओर रखते हैं, करते कुछ र हैं, कहते कुछ और ही हैं, उनके आत्मा के मन - प्राण - वाक् यह तीनों अवयव सर्वथा विरुद्ध दिशाओं में जाते हुए आत्मखरूप को कुटिल बना देते हैं । तीनों अश्वों के विरुद्धगामी होजानें से मनोमय श्रादर्श क्षुब्ध होजाता है । ऐसे कुटिल - विषमधरातलयुक्त आत्मा पर विज्ञान का विकास नहीं होने पाता । उन का आत्मा दुष्ट है । अतएव ऐसे अन्यथागामियों को " दुरात्मा ” कहा जाता है । इसी आत्मविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रभियुक्त कहते हैं-मनस्येकं वचस्येकं कर्म्मण्येकं महात्मनाम् । मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कम्मरायद् दुरात्मनाम् ॥ आत्मा में कुछ चोर है, कहते कुछ ओर हैं, करते कुछ ओर हैं, यही अनृतभाव है । ऋजु सत्यमार्ग है, सत्यभाव ही ऋत है । ऋतभावशून्य ( सत्यभावशून्य ) आत्मा अनृत है । अनृत-तत्व ही वाक् का मूल है । जिस प्रकार मूल ( जड़ ) के व्यक्त हो जाने पर ( उसके भूगर्भ से बाहर ५६

पृष्ठ 267

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 267 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ॥ मान्यभूमिका । उपनिषत् में उपनिषत निकल जाने पर ) वृक्ष सूख जाता है, एवमेव अनृतरूप वाङ्मुल के व्यक्त होजाने से ( अनृत-भाषण से ) आत्मरस सूख जाता है । इसी अनृतविज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है— १ – “ अथ योऽनृतं वदति, यथाग्नि समिद्धं तमुदकेनाभिषिञ्चत् - एवं हैनं स जासयति । तस्य कनीयः कनीय एव तेजो भवति, श्वः श्वः पापीयान् भवति । तस्मात् सत्यमेव वदेत् ” ( शत ० २२ २।१६ ) ०६ ) २ - * " समूलो वा एष परिशुष्यति, योऽनृतमभिवदति " ( प्र ० उ " तदेतत् पुष्पं फलं वाचो यत् सयम् । स हेश्वरो यशस्वी कल्याण कीर्त्तिर्भवितोः । पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति । अथैतन्मूलं एवमेवा-वाचो यदनृतं । तद्यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति, स उद्रर्त्तत, नृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति, स शुष्यति, स उद्वर्त्तते । तस्माद-नृतं न वदेतृ, दयेत त्वेतेन " इति । ( ऐ ० आ ०२ | ३ | ६ ) । होजाता है । एवं साथ ही यह अनृतभाग श्रविद्यारूप पाप्मा है । इस से आत्मा अपवित्र नहीं होता । + " सत्य-में विजातीय आवरण के कारण इस पर दिव्य संस्कारों का भी आधान के अनुसार संहिता वै देवाः - प्रनृत संहिता मनुष्याः ” ( शत ० १ । १ । ३ । ) इस श्रौतसिद्धान्त की सृष्टयुन्मुख तीनों कलाओं में ऋततत्व का प्रथमज मनुष्य अवश्य ही अनृतसंहित है । श्रात्मा श्राघात होता है । मिथ्याभाषण से मनः कला सर्वान्तरतम है । अनृतभाषण से इसी कला पर विशेष में रखकर— से विचार दूषित होजाते हैं, भावना कलुषित होजाती है । इसी रहस्य को लक्ष्य ) मनुष्य इसी " तेन पूतिरन्तरतः " यह कहा गया है । अनृतसंहित ( झूठ बोलने का अभ्यासी दिव्य संस्कार का मन अनृतभाव के कारण अमेध्य एवं अपवित्र बना रहता है । किसी दूसरे का समावेश होजाना ही के साथ संगम न होना ही मन की अमेध्यता है । एवं कलुषितभावों , एवं अपवित्रभाव हैं । अपवित्रता है । संस्कारग्रहणायोग्यता, एवं विचारकालुष्य हो क्रमशः श्रमेध्य में देखना चाहिए । * इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन प्रश्नोपनिषद् हिन्दी विज्ञानभाष्य चुका है । + इस निगमश्रुति का विशद विवेचन शतपथइन्दोविज्ञानभाष्य में निकल ५७

पृष्ठ 268

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 268 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि - 2011 माष्यभूमिका उपनिषत् में उपनिषत् यज्ञकती यजमान वैध यज्ञद्वारा दिव्यलोकस्थ सौर देवताओं का अपने आत्मा के साथ सम्बन्ध कराना चाहता है । परन्तु अनृतमूलक प्रमेध्य एवं अपवित्र भाव के कारण उन देवताओं का संस्काराधान नहीं होता । इस दोष को हटाने के लिए ही मन्त्रपूत पानी का याचमन किया जाता है । पानी में दोनों गुण हैं । वस्त्र चिकना है, अतएव वह श्रमेध्य एवं अपवित्र है । पानी चिकना-दूर कर वस्त्र को पवित्र बना देता है । वस्त्र पवित्र होगया, परन्तु अभी मेध्य नहीं बना । टको अभी इसमें वर्ण ( रंग ) संस्कारग्रहणयोग्यता का समावेश नहीं हुआ । इसके लिए भी पानी का ही च्याश्रय लेना पड़ेगा । वस्त्र को पानी में डाल दीजिए, उसी समय वह मेध्य ( संगमनीय ) होता हुआ, रंगसंस्कार का अपने ऊपर आधान कर लेगा । दोषमार्जन करने के कारण पवित्र, एवं संस्का-राधानयोग्यता सम्पादन करने के कारण मेध्य गुण से युक्त पानी के प्राचमन से ( मन्त्रशक्ति के सहयोग से ) आत्मा अवश्य ही मेध्य एवं पवित्र हो जायगा । ध्यान रहै, साधारण व्यज्ञिय अमन्त्रक पानी में उक्त अतिशय कदापि नहीं है । है परन्तु अत्यल्पमात्रा में । मन्त्रचाकू ही इस अतिशय को विकसित करने में समर्थ है । देवता त्रिसत्य हैं । अतएव उपस्पर्श भी तीन ही बार किया जाता है । व्रतोपायन कर्म्म को यही संक्षिप्त उपनिषत् है । इसी प्रकार " श्रभिवी इदं सर्वमाप्तम् । तत् प्रथमेनैतत् कर्म्मणा सर्वमाप्नोति । यद्रवास्य होता वा नाभ्यापर्याति, तदेवास्यैतेन सर्वमासे भवति " ( शत ०६।१।१।१० । " पानी से सब कुछ व्याप्त है । ( अपणियन करता हुआ यजमान ) इस प्रथम क से ही सब कुछ प्राप्त करलेता है । अपि च यजमान के यज्ञस्वरूप सम्पादक होता, अध्वर्यु आदि ऋत्विक मनुष्यसुलभदोष से यदि किसी यज्ञफल को प्राप्त करने में अस-मर्थ रहजाते हैं, तो वह भी इस अपणियन कर्म से सब कुछ प्राप्त होजाता है " अयन कर्म की यही उपनिषत् है । इसी प्रकार पूर्व में जिन कुछ एक ऋत्वर्थ कम्मों का K5

पृष्ठ 269

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 269 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ॥ माष्यभूमिका ॥--उपनिषत् में उपनिषत् निम्नलिखितरूप से तत्तत् कर्म्मपद्धति के साथ दिग्दर्शन कराया गया है, उन सब की उपनिषदें ही निरूपित हैं । द्यावापृथिवी ” ( श ० १३११२ | ४ | ४ १ - " वृत्रो ह वा इदं सर्वं कृत्वा शिष्ये यदिदमन्तरेण, देवो ह्येषः " ( शत ० ११२/२ | १४ | ) । २ – “ तं श्रपयति । न वाऽपतस्य मनुष्यः श्रपयिता ) । " ( शत ० २१३३३१-२-३ – “ पवित्रे करोति । अयं वै पवित्रो योऽयं पवते वै मिथुनम् ” ( शत ० १११।१।२२ । ) । ४- - " द्वन्द्वं पात्राण्युदाहरति द्वन्द्वं वै वीर्य, द्वन्द्वं श्रासङ्गाद ० " ( शत ० १ | १ | २ | ३ || -५ - " देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुररक्षसेभ्य १ | १ | २ | ७ | ) | । तस्मादनस एव ० " ( शत ० ६ - " यज्ञो वा अनः । भुमा वा अनः । ++ नाम " ( शत ० ११३।२।१ । ) । ७ ——— समिन्धे सामिधेनीभिर्होता । तस्मात् सामिधेन्यो ० ” ( शत ० ११४ २२३-४५ ) । ८- - " अथार्षेयं वृणीते । परस्तादर्वाक् प्रवृणीते । परस्ताद्भय । ) । वा एतद्यज्ञस्य ० " ( शत ० १३२।१।१ ९- " स वै कपालान्येवान्यतर उपदधाति ० शिरो So " ( शत ० १।६।५ । ) । १० - " यत्र वै गायत्री सोममच्छापतत् - तदस्या आहरन्त्या” ( शत ० १२२ । ५ । ) । ११ – “ ते होचुः - इन्तेमां पृथिवीं विभजामहै । तां विभज्य ० " ( शत ०२ | ८ | ४ | ) | १२ - " तद्धैकेऽनुदिते ० अर्वै देवाः ० यशोह भवति ० " ( शत ० २।२।२ ॥ १३- " स एष यज्ञो हतो न ददक्षे, तं देवादक्षिणाभिरदक्षयन् , २- पुरोडाशश्रपण, ३-उक्त उपनिषत् ( मौलिक उपपत्तिएं ) क्रमशः १ - प्रोक्षण, ८ - होतृ-, ६- हविग्रहण, ७- अग्निमन्थन पवित्रीकरण, ४ - पात्रासादन, ५- पात्रप्रतपन, ११ - गोदोहन, १२ - वेदिसम्पादन, प्रवरण, र्ट- पुरोडाशसम्पादन, १० - आाज्यविलापन रखतीं हैं । इन सब का कम्र्मों के साथ सम्बन्ध - १३ - अग्निमन्थन, १४ - दक्षिणादान इन यही है कि अङ्गभूत प्रकरण से बतलाना हमें विशद विवेचन शतपथभाष्य में द्रष्टव्य है । पूर्व हैं । इन ऋत्वर्थकम्मों-उन कम्मों के साथ ही उपात्त आरभ्याधीत ऋत्वर्थ कम्मों की उपनिषदें उन गृह्य-" यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन पनिषदों का ब्राह्मणभाग में ही अन्तर्भाव है । अतरत्र - कर लिया जाता का ब्राह्मणशब्द से ही ग्रहण न्ते " इस सर्वसम्मत न्याय के अनुसार इन उपनिषदों ५६

पृष्ठ 270

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 270 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका । ॐ उपनिषत् में उपनिषत् है । कर्म्मकाण्ड प्रतिपादक ब्राह्मण ग्रन्थ के साथ उपनिषत् है अवश्य, परन्तु कर्म्मप्रधानता के कारण तदूवाद न्यायानुसार उन्हें- ' उपनिषत् ' शब्द से व्यवहृत करने का अवसर ही नहीं आता । ब्राह्मणभाग सम्बन्धिनी उपनिषदों का उपनिषत् शब्द से ग्रहण क्यों नहीं हुआ! ब्राह्मणभाग इन उपनिषदों के सम्बन्ध से ब्राह्मणशब्द व्यवहार उपनिषत् शब्द से व्यवहृत क्यों नहीं हुआ! इस का यही उक्त समाधान है । विशाल यह तो हुई श्रारभ्याधीत क्रत्वर्थ कम्मों की उपनिषदों की व्यवस्था । अब क्रमप्राप्त अनारभ्याधीत पुरुषार्थकर्म्मसम्बन्धिनी उपनिषदों का विचार कीजिए । दर्शपूर्णमास, चातु-र्मास्य, ग्रहयाग, राजसूय, वाजपेय, चयन आदि यज्ञकर्म्म पुरुषार्थ कर्म हैं । इन की उपनिषदें महाविज्ञान से सम्बन्ध रखतीं हैं । अतएव इनमें से कुछ एक कम्मों की उपनिषदों का ( जिन की कि उपनिषत् प्रधान रूप से कर्म्म की ओर झुकी हुई हैं ) तो निरूपण स्वयं ब्राह्मणभाग में ही कर दिया गया है । उदाहरणार्थ वरुणमघासेष्टि नाम के पुरुषार्थ कर्म्म को ही लीजिए । ८ १२ आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति, वषट्कार यह ३३ दिव्यप्रजा हिरण्यगर्भ प्रजापति ( सूर्य ) से उत्पन्न हुई । उत्पन्न होते ही वह प्रजा वरुण देवता के पाश में बद्ध होगई । वरुण पानी के देवता हैं । पानी भूतभाग है, प्राण देवभाग है । प्राणरूप देवता भूत के साथ नित्य सम्बद्ध हैं । इन अनेक विध प्राणों में से आध्य प्राण ( अब्भूत में रहने वाले प्राण ) का ही नाम वरुण है वर्षाऋतु में ( जब कि सम्पूर्ण भूमण्डल प्रापोमय पारमेष्ठ्य समुद्र के गर्भ में प्रविष्ट रहता है ) सजातीय सम्बन्ध के कारण प्रकृतिमण्डल में वरुण देवता ( प्यप्राण का साम्राज्य रहता है । वर्षाकाल में उत्पन्न श्रोषधि वनस्पतियों में वरुण प्रारण व्याप्त रहता है । वर्षा-ऋतु में ( आषाढ शुक्ल एकादशी से आरम्भ कर कार्त्तिक शुक्ल एकादशी पर्यंन्त ) भूमण्डल वरुणगृह ( आप्यमण्डल ) में निवास करता है । इतने कालतक श्राग्नेय इन्द्रप्रधान ज्योतिर्मय प्राणदेवताश्चों की सुषुप्ति मानी जाती है । देवता सौरहैं, सूर्य इन्द्र प्रधान है, इन्द्रज्योतितत्व है । इस ज्योतिर्घनइन्द्र एवं वरुण में परस्पर में अश्वमाहिष्य ( सहजवैर ) है । इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल हैं, वरुण पश्चिम दिशा के दिक्पाल हैं । वारुण आव्यप्राण बलप्रद होता हुआ अमुर