Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 271–280
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 271–280
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विज्ञानदृष्टि भाष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् है, ऐन्द्र ज्योतिर्मयप्राण बुद्धिप्रद बनता हुआ देवता है । वषा में वरुण की कृपा से असुरों का साम्राज्य रहता है । देवताओं का बल अभिभूत रहता है । यही देवताओं का सोना है । इस काल में प्रजा जो ध्यन्न खाती है, वह भी वारुण श्रासुरप्राणप्रधान ही रहता है । इस अन्न की शरीराग्नि में आहुति होनें से अन्नरसमय पुरुष ( भूतात्मा ) दोषाक्रान्त हो जाता है । इन्द्रशचि नाम से प्रसिद्ध उत्साह बढ़ाने वाली ऊर्जाशक्ति ( Energy ) वरुण के आक्रमण से शिथिल होजाती है । इसी आधार पर " वर्षासु दोषा कुप्यन्ति " ( अष्टाङ्गहृदय ) यह प्रसिद्ध है । बर्साती अन्न, एवं बर्साती वायु शरीर को जकड़ देता है । यही वरुणपाश का बन्धन है । इसी को दूर करने के लिए, दूसरे शब्दों में अन्न में रहने वाले वारुणभाव को हटाने के लिए ही लिखित स्थलों में " वरुणप्रघासेष्टि ” की जाती है । ( देखिए -शत ०२ / ५ / २ ) । इसी प्रकार निम्न चातुर्मास्यादि कम्मों की उपनिषदों का भी ब्राह्मणभाग में ही निरूपण हुआ हैं । - " त्वष्टुई वै पुत्र त्रिशीर्षा षडक्ष आस ० +++ तावेनमुपावहतुः । सेवे देवाः प्रेयुः " सर्वा विद्याः सर्वे यशः, सर्वमन्नाद्यं, सर्वा श्रीः । तेनेष्ट्वा इन्द्र एतदभवद यदिदमिन्द्रः । एष उ पौर्णमासस्य बन्धुः । "
( शत ०११६।३ ॥
p २ - " इन्द्रो ह यत्र वृत्राय वज्रं प्रजहार, सोडवलीयान् मन्यमानो नास्तृषी-ती विभ्यन्निलयां चक्रे । +++ तेनैतां रात्रिं सहाजगाम । +++ तद्यदेष एतांरात्रिमिहामात्र सति, तस्मादमावास्या नाम " ( शत १ । ६ । ४ । ) । - " अक्षय्यं ह वै सुकृतं चातुर्मास्ययाजिनो भवन्ति । +++ । या वै देवानां श्रीरासीत् साकमेरीजानानां विजिग्यानानां तच्छुनं, अथ यः संवत्सरस्य प्रजितस्य रस आसीत्, तत् सीरम् ० " ( शत ० २२६ । ३ । ) । ४- " एष वै ग्रहो य एष तपति, येनेमाः सर्वाः प्रजा गृहीताः । तस्मादा-हुर्ब्रहान् गृह्णीम इति चरन्ति ग्रहगृहीताः सन्त इति । वागेव ग्रहः । नामैव ग्रहः । अन्नमेव ग्रहः " ( शत ० ४ । ६ । ५ । ) ।
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विज्ञानदृष्टि ... भाष्यभूमिका ॥ॐ उपनिषत् में उपनिषत् ५ – “ देवाश्च वाऽअसुराश्च उभये प्राजापत्राः पस्पृधिरे ० +++ । स वा एष ब्राह्मणस्यैव यज्ञः । बृहस्पति ब्रह्म । बाजपेयेनेष्ट्वा सम्राड् भवति । स इदं । तथैवादो वृहस्पतिः सवितारं प्रसवायोपाद्यावत् " ( शत ० ५।१।११ ) । ६ – “ राजा वै राजसूयेनेष्ट्वा भवति । अवरं वै राजसूयम् । ( श ०५।१।१ । ) 1 अरण्योरग्निसमारोह्य सेनान्यो गृहान् परेखानयेऽनीकवतेऽप्य कपालं पुरोडाशं निर्वपति 1 । अग्निर्वैदेवानामनीकम् ० ” ( शतः ५१३।१ - " अग्निरेषपुरस्ताच्चीयते संवत्सरे, उपरिष्टान्महदुक्थं शस्यते । प्रजापत विस्रस्तस्यानं रसोऽगच्छत् । स यः स प्रजापतिर्व्यस्वसत, संवत्सरः सः । अथ यान्यस्य तानि पर्व । णि ० " ( शत ० ९०।९ ।१ । ) । उक्त उपनिषदों का क्रमशः १ - पूर्णमास, २ - दर्श, ३ - चातुमास्य, ४- ग्रहयाग, R - वाजपेय, ६ - राजसूय, ७- चयन इन पुरुषार्थ कम्मों के साथ है । इस प्रकार ना रम्याधीत पुरुषार्थ कम्मों में से भी कितने ही कम्में की उपनिषदें ब्राह्मणभाग में तत्तत् कम्नी के साथ ही निरूपित हैं । श्रत. पूर्वोक्त तन्मध्यपतित न्याय से इन अनारम्याधीत पुरुषार्थ कर की उपनिषदों का भी ब्राह्मणभाग में अन्तभाव मानलिया जाता है । फलतः श्रारभ्याधीत विध्य-पनिषदों के समान ही इन उपनिषदों का भी उपनिषच्छन्द से व्यवहार करने का अवसर नहीं आता ।-अब शेष रह जाते हैं— महाविज्ञानसम्बन्धी कतिपय अनारम्याधीत पुरुषार्थकर्म्म, एवं साधारण कर्म्म । इन उभयविधकम्मों की उपनिषदों को पृथक् छांट कर इन का स्वतन्त्ररूप से निरूपण किया गया है । वही स्वतन्त्रविभाग श्याज दिन विद्वत् समाज में " उपनिषत् " नाम से प्रसिद्ध है । उदाहरणार्थ एकधनावरोध, देवस्मर आदि अनारभ्याधीत कम्मों की उपनिषत् का कौषीतकि उपनिषत् में निरूपण है- ( देखिए कौ ०३०२ । ३ | ४ | ) | “ सैषात्रयीविद्यायज्ञः " ( श०-१ | १ | ४ | ३ | ) के अनुसार ऋग्यजुः साम ही क्रमशः शस्त्र - ग्रह- स्तोत्र कर्म के प्रवर्तक बनते हुए
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विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका ॥ॐ॥ -३ उपनिषत् मे उपनिषत् करने वाली यज्ञकर्म के मूलाधार हैं । नित्य मौलिक एवं अपौरुषेय त्रयीवेद का खरूप प्रतिपादन कर्म्मद्वारा वैधयज्ञ की मन्त्रात्मिका शब्दराशिरूपा वेदत्रयी से ही क्रमशः हौत्र - प्राध्वर्यव - प्रौद्गात्र से सर्वथा स्वरूपनिष्पत्ति होती है । पूर्वकथनानुसार पुरुष अनृतसंहित है । श्रतएव चर्म्मचतुओं अपरोक्ष इस दिव्यकर्म्म में अनृतसंहित मनुष्य से भूल होजाना स्वाभाविक है । होता - अध्वर्यु - उद्गाता-होत्ररूप शस्त्र-ब्रह्मा - चारों ऋत्विक् यज्ञखरूपनिर्माता हैं । होता ऋक् का प्रवर्तक बनता हुआ का प्रत्र-कर्म्म का, अध्वर्यु यजु का प्रवर्तक बनता हुआ आध्वर्यवरूप ग्रहकर्म्म का, उद्वाता साम त्रयीविद्या का परिज्ञाता र्त्तक बनता हुआ औद्गात्ररूप स्तोत्रकर्म का सम्पादन करता है । एवं के दक्षिण क्रीत प्रतिनिधि हैं । ब्रह्मा निरीक्षण करता है । यह चारों ही ऋविक यज्ञकत्ती यजमान त्रुटि रहजाती है यदि प्रमादवश इन के कर्म्म में कोई अज्ञात, अथवा ज्ञात दोष होजाता है, कोई अतएव तो वितत यज्ञसूत्र विच्छिन्न होजाता है । ऋक् अग्निमय बनता हुआ भूलोक की वस्तु है, ब्रह्मा ॠग्वेदी होता से हौत्रकर्म में यदि कोई त्रुटि होजाती है तो प्रायश्चित्त कम्र्म के अधिष्ठाता हैं । यजुर्वेद वायु-“ भूः स्वाहा ” यह मन्त्र बोलते हुए भूलोक स्थानीय गाईपत्याग्नि में आहुति देते कर्म्म में यदि कोई त्रुटि मय होता हुआ भुवर्लोक की वस्तु है, अतएव यजुर्वेदी अध्वर्यु से आध्वर्यव में आहुति होजाती है तो ब्रह्मा - “ भुत्रः स्वाहा " यह बोलते हुए भुवर्लोकस्थानीय दक्षिणाग्नि के श्रद्वात्र देते हैं । सामवेद आदित्यमय होने से स्वर्लोक की वस्तु है, अतएव सामवेदी उद्गाता कर्म में यदि कोई त्रुटि होजाती है तो ब्रह्मा “ स्वः स्वाहा ” यह बोलते हुए वर्लोकस्थानीय ग्राह-होजाती है । नीयाग्नि में आहुति देते हैं । यदि स्वयं त्रैविद्य ब्रह्मा से अपने ब्रह्मकर्म में कोई भूल तो वह स्वयं अपनी त्रुटिपूर्त्ति के लिए " भूः स्वाहा भुत्रः स्वाहा - स्वः स्वाहा " यह बोलते हुए आहुति देते हैं । इस प्रकार इन आहुतियों से त्रैविद्य ब्रह्मा विरष्ट ( विनष्ट विच्छिन्न- त्रुटित ) यज्ञ का पुनः " नाम से सन्धान कर देते हैं । इसी उपनिषत् के आधार पर उक्तकर्म - " यज्ञविरष्टसन्धान का व्यवहृत होता है । इस कर्म की पद्धति का निरूपण ब्राह्मणभाग में हुआ है, एवं उपनिषत् प्रतिपादन छान्दोग्य उपनिषत् में हुआ है - ( देखिए छा ० उ ०४।०१७ खं ० ) । अब चलिए साधारण कर्मों की ओर । पुरुषार्थ क्रत्वर्थ भेद को छोड़ दीजिए । कम्म ६३.
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विज्ञानदृष्टे ०३. भाष्य भूमिका 11 उपनिषत् में उपनिषत् त्वेन कर्म्मसाधारण को लीजिए । कर्म किया ही क्यों जाता है! कर्म्म न करने से क्या हानि है? इस का उत्तर आत्मोपनिषत् है । आत्मा ज्ञान कर्म्ममय है । प्रयास करने पर भी ज्ञायते क्रियते इन दो भागों के अतिरिक्त तीसरा भाव उपलब्ध नहीं होसकता । श्रानन्द - विज्ञान मन इन तीनों कलायों की समष्टि आत्मा का ज्ञानभाग है, विद्याभाग है । यह अमृतधर्म्मा है, सत् है, नित्य प्रतिष्ठित है । मन प्रारण वाक् इन तीनों कालयों की समष्टि आत्मा का कर्म्म-भाग है । यह मय है, असत् है, अतएव अनित्य है, नित्यप्रतिष्ठित है, प्रतिक्षण परिव-तनशील है । " अमृतं चैव मृत्युश्च सदस चाह मर्जुन । " ( गी ० ६ * ६ ) । " अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ” ( शत ०१० । ४ । १ । ) । " उभयमु- एतत् प्रजापतिर्निरुक्तानिरुक्तश्च " ( शन ०६५।३।७ । ) इत्यादि श्रौतस्मार्त्त वचनों के अनुसार श्रात्मा सचमुच ज्ञान- कर्म्म दोनों की सर्मा है । कहना यही है कि ज्ञानवत् कर्म भी इस आत्मा का स्वरूप धर्म है । " ' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम् ” ( शत ०१०।५ २।१ । ) - " तदन्तरम्य सर्वस्य तदुसर्वस्य बाह्यतः " ( शत ० ब्रा ० ) - " कर्म्मण यकर्म्म यः पश्येदकर्म्मणि च कर्म्म यः ” ( पीता " **** ) इत्यादि के अनुसार दोनों परस्पर में अन्तरान्तरभावसम्बन्ध से श्रोतप्रोत हैं । बिना ज्ञान के कर्म्म स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकता, एवं बिना कर्म के ज्ञान का विकास नहीं हो सकता । यदि कर्म का परित्याग कर दिया जायगा तो आत्मा का स्वरूप ही नष्ट हो जायगा । इसी लिए ज्ञानवत् कर्म भी सर्वात्मना उपादेय एवं आदरणीय तत्व है । " कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म्म लिप्यते नरे || " ( ई ० उ ०२ मं ० ) " कुर्वमेवेह कर्माणि न करोति न लिप्यते " ( गीता G....... ) । " न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्म्मकृत् । ` कायते ह्यवशः कर्म्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ” ( गी ० ३।५ । )
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विज्ञानदृष्टि ० माध्य भूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् भलीभांति प्रकट कर रहे हैं । ज्ञानकर्म्म इत्यादि वचन कर्म की अवश्येतिकत्तव्यता को होनें से है । कभी आत्मा का अर्द्धमाग मय सम्पूर्ण वेदशास्त्र केवल अध्यात्मविद्याशास्त्र उपासना भी भी अध्यात्म विद्या है । संदंशपतिता अध्यात्मसंस्था के गर्भ में ही प्रविष्ट है । ज्ञान, सामान्य अनारभ्याधीत, आरभ्याधीत अध्यात्मविद्या है । ज्ञानकर्म्ममय इस आत्मा के कर्म की तीन से बतलाया जा चुका है । तीनों भेद से तीन भागों में विभक्त हैं जैसा कि पूर्व में विस्तार तो पूर्वकथनानुसार कम्मों की उपनिषदों का ही जाति की उपनिषदें हैं । इन में से दोनों है । अतः उनका ( ब्राह्मण-) ब्राह्मणग्रन्थ में ही अन्तभाव ( ब्राह्मणभाग में निरूपण होने के कारण । शेष बचते हैं सामान्य से व्यवहार नहीं किया गया भाग की प्रधानता के कारण ) उपनिषत् शब्द के कारण जानें पर समत्रलयरूण परामुक्ति कर्म्म । यह सामान्य कर्म्म निष्कामबुद्धि से किए हैं । अतएव तत्प्रति-करने में समर्थ होजाते बनते हुए अध्यात्म जगत् का वास्तविक उपकार नाम से प्रसिद्ध हो गया है । " यदि कर्म्म-पादक केवल उपनिषद्ग्रन्थ ही अध्यात्मविद्याशास्त्र का उपनिषत् नहीं ब्राह्मणग्रन्थगत उपनिषदों मय ब्राह्मणभाग में भी उपनिषद है तो क्यों । का यही संक्षिप्त उत्तर है शब्द से व्यवहार होता? " इस पूर्व प्रश्न का सम्बन्ध है तो लगत अब - " आरण्यक ग्रन्थ के साथ भी यदि उपनिषत् प्रश्न बच क्यों नहीं होता? ” एकमात्र यह उपनिषदों का उपनिषत् शब्द से व्यवहार वेद है? इस प्रश्न कुछ नहीं कहना । क्या उपनिषत् जाता है । इस प्रश्न के सम्बन्ध में अभी हमें हो जायगा । प्रकृत में इस सम्बन्ध में केवल की मीमांसा में उक्त प्रश्न का विशेषरूप से समाधान ' को तो ' बृहदारण्यकोपनिषत् यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि उपासना मूलक आरण्यकभाग एवं श्रारण्यक ग्रन्थों में के अन्तर्भूत मानलिया है । इत्यादिरूप से स्वयं प्राचीनों ने हीं उपनिषत् " ( ऐ ० आर ० ३ | २ | ५ | ) - इत्यादि रूप स्पष्टशब्दों में " अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् देखी जाती है 1 से अनेक स्थलों में उपनिषत् शब्द की प्रवृत्ति एक ही स्थान में समावेश कर दिया यदि पूर्वप्रतिपादित कर्म्मकलाप की उपनिषदों का महर्षियों का रह जाते । उन परमकारुणिक जाता तो हम कर्मस्वरूपविज्ञान से सर्वथा वचित
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विज्ञानदृष्टि || भाष्यभूमिका | उपनिषत् में उपनिषत् यह अनुग्रहथा, जिन्हों ने हमारे बोधसौकर्य के लिए कर्मत्रयी भेद से उपनिषदों को तीन स्थानों में विभक्त कर दिया । इन में ब्राह्मण भरण्यकभाग की उपनिषदों का तो ब्रा ० श्र ० की प्रधानता से ब्राह्मण - श्रारण्यकशब्द से ही ग्रहण हुआ, एवं अध्यात्म के चरमलक्ष्य पर पहुंचाने चाली कम्मोंपनिषत् का उपनिषत् की प्रधानता से " उपनिषत् " शब्द से व्यवहार हुआ । इसी आधार पर वेद का यह चतुर्थभाग ही उपनिषत् नाम का अधिकारी बनगया । इस प्रकार उपनिषत के पूर्वोक्त रहस्याथे को न समझकर केवल जाड्य श्रद्धा के आधार पर - " उपनिषत् शब्द केवल वेद के अन्तिमभाग में ही निरूढ है, एवं अध्यात्मविद्यात्व ही इस का प्रवच्छेदक है " यह मान बैठना निरी भ्रान्ति ही है । अपिच उपनिषत् शब्द को एकमात्र ईश - केन- कठादि के साथ ही नित्यसम्बद्ध माननें चाले महानुभावों से हम पूंछते हैं कि यदि आपका सिद्धान्त निद्दृष्ट है तो सुप्रसिद्ध गीताशास्त्र उपनिषत् नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ । भगवद्गीता आज सम्पूर्ण विश्व में " गीतोपनिषत् " नाम से प्रसिद्ध है । गीता के प्रत्येक अध्याय की समाप्ति में - " इति श्रीमद्भगवद्गीतासु-उपनिषत्सु " यह वाक्य उद्धृत रहता है साथ ही में यह भी विश्व विदित है कि गीता स्मृति-शास्त्र है । स्वयं प्राचीन भाष्यकारों में गीता को स्मृति शब्द से सम्बोधित किया है- देखिए शा ०. ( भाष्य........ ) । गीता को वेद का अन्तिम भाग मानने के लिए कोई सन्नद्ध नहीं होसकता । ऐसी अवस्था में हमारा यह दृढ़ निश्चय है कि विज्ञानसिद्धान्त को उपनिषत् शब्द का च्छेदक माने बिना प्रयत्नसहस्रों से भी आप गीतासम्बन्धिनी उक्त आपत्ति का निराकरण नहीं कर सकते । हमारे शास्त्रसिद्ध विचारों के प्रति आक्षेप प्रकट करते हुए जिस शक्तिग्राहक-शिरोमणिदृद्धव्यवहार को आपने हमारे सामनें रक्खा था, उस क्षेत्र का पूर्व सन्दर्भ से भली प्रकार निराकरण करते हुए गीता सम्बन्धी उसी वृद्धव्यवहार को आज हम आपके सामने रखते हैं, एवं श्राप से अनुरोध करते हैं कि विज्ञानसिद्धान्त को उपनिषत् पदार्थ का अवच्छेदक न मानते हुए आप अपने इस वृद्धव्यवहार एवं प्राचीनमर्यादा को सुरक्षित रखने वाले मार्ग का पहिले स्वयं अन्वेषण करें, यदि अवसर मिले III तो हमें भी उस शशशृङ्गतुल्य पथ से सूचित करने का कष्ट करें । ६६
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विज्ञानदृष्टि ॥ भाष्यभूमिका ॥६-उपनिषत् में उपनिषत् ब्राह्मणग्रन्थों में आरण्यक ग्रन्थों में स्थान स्थान पर " उपनिषत् " शब्द प्रयुक्त हुआ है । फिर समझ में न आया कि उपनिषत् का अत्रच्छेदक अध्यात्मविद्यात्व दी किस आधार पर मान लिया गया । यद्यपि पूर्व में उन वचनों का उल्लेख कर दिया है, परन्तु प्रकरण संगति के लिए यहां भी उन का संग्रह कर दिया । – “ तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेव – “ उपनिषत् ” ( शत ० ब्रा ० १० । ४ । ५ । ११ ) । २ - " प्रथादेशा “ उपनिषदम् ” ( शत ० त्रा ०१० । ४ । ५ । १ ) । ३– “ अथ खल्त्रियं सर्वस्यै वाच “ उपनिषत् ” ( ऐ ० आर ०३।२।५ ) । त्र्यपिच उपनिषत् - आरण्यक - ब्राह्मण तीनों विभाग एकमात्र आध्यात्मिक संस्था का ही निरूपण करते हुए समान विषयक हैं । अत एव एक भाग के सम्यक् परिज्ञान के लिए इतर दोनों भागों का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होजाता है । तीनों की इसी अभिन्नविषयता के कारण सुप्रसिद्ध शतपथब्राह्मण में तीनों का समावेश देखा जाता है । १०० अध्यायों में विभक्त अतएव शतपथ नाम से प्रसिद्ध इस ब्राह्मणग्रन्थ में १४ काण्ड हैं । इन में १० काण्डों में तो यज्ञकम्मों का निरूपण हुआ है । यही वास्तव में ब्राह्मणभाग है । चौदहवें काण्ड में आरण्यक एवं उपनिषत् का समावेश है । शतपथ ब्राह्मण का १४ वां काण्ड ही पृथक् रूप से बृहदारण्यकोपनिषत् नाम से प्रसिद्ध है । बस इन्हीं सब कारणों से हमनें विज्ञानसिद्धान्त को उपनिषत् का अवच्छेदक माना है । महाभारत के सुप्रसिद्ध व्याख्याता सर्वश्री नीलकण्ठ ने भी " एषा तेऽभिहिता सांख्ये " ( गीता ० २।३६ ) इस श्लोक की व्याख्या में उपनिषत् शब्द के उक्त विज्ञानसम्मत अर्थ में ही अपनी सम्मति प्रकट की है । जैसा कि निम्नलिखित व्याख्या वचन से स्पष्ट होजाता है । " सांख्ये सम्यक् ख्यायते प्रकथ्यते वस्तुतन्त्रमनयेति संख्या उपनिषत् । तत्र विदिते सांख्ये औपनिषदे ब्रह्मणि विषये ” ( गीताव्याख्या नीलकण्ठी २।३१ ) भगवान् व्यास ने तो एक स्थान पर स्पष्ट ही हमारी विज्ञानदृष्टि का पूर्णरूप से समर्थन कर डाला है । जैसा कि निम्नलिखित व्यास वचनों से स्पष्ट है— ६७
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विज्ञानदृष्टि .. भाष्यभूमिका ॥ उपनिषत् में उपनिषत् वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद्दमः ॥ दमस्योपनिषद्दानं, दानस्योपनिषत्तपः ॥ १ ॥
तपसोपनिषत्याग, स्त्यागस्योपनिषत सुखम् ॥ सुखस्योपनिषत् स्वर्गः, स्वर्गस्योपनिषच्छमः ॥ २ ॥
( महाभारत शान्ति मोक्ष • २५१०११-१२ श्लो ० ) व्यासदेव सत्य, दम, दान, तप, त्याग, सुख, स्वग, शम भावों को उपनिषत् शब्द से व्यवहृत करते हैं । यदि प्राचीनों के मतानुसार उपनिषत् शब्द को केवल ईश- केनादि का ही वाचक मान लिया जाय तो उक्त व्यासवचन का कोई मूल्य ही न रहै । ईश- केन - कठ - प्रश्नादि उपनिषदों में कर्म्मज्ञान का मौलिक रहस्य ही प्रधानतया निरूपित । अतएव यह वेदान्तराशि उपनिषत् शब्द से व्यवहृत हुई है । औपनिषत् ज्ञान से हम ज्ञान - कर्म का मौलिक स्वरूप यथावत् समझते हुए ऐहलौकिक अभ्युदय के साथ साथ निष्काम कर्मयोगद्वारा पारलौकिक निःश्रेय सफल प्राप्ति में समर्थ होते हुए जीवन को कृतकृत्य बना सकते हैं । उपनिषत् शब्द का क्या अर्थ है? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । इति - उपनिषच्छब्दार्थरहस्यम् ३
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क्या उपनिषत् वेद है?