Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 281–290

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 281 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 282

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 282 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* श्रीः *

चत्वारि शृङ्गा भयो अस्य पादा द्वे शीष सप्त हस्तासो अस्य ।

त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मय आविवेश ॥

क्, यजुः, साम, अथर्व भेद से चार भागों में विभक्त ११३१ संहिताएं, विधि नाम से प्रसिद्ध इतने हीं ब्रह्मण, इतने हीं चार-रायक, इतनी ही उपनिषदें इन सब ग्रन्थों की समष्टि का नाम डी वेदशास्त्र है । दूसरे शब्दों में संहिता ब्राह्मण - आरगयक-उपनिषत इन चारों का ही नाम वेद है " यह है सनातनधर्मवलम्बी विद्वानों का चिरकालिक दृढ़ विश्वास | परन्तु - " क्या उपनिषत् वेद है? " इस प्रश्न के सम्बन्ध में चिरकाल से चली आने वाली विद्वानों की उक्त दृढ श्रद्धा के सर्वेथा विपरीत आज हम यह कहने का साहस करते हैं कि " उपलब्ध अनुपलब्ध संहिताग्रन्थ, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक ग्रन्थ, उपनिषद् ग्रन्थ यह चारों ही वेद नहीं हैं " । ऐसी अवस्था में प्रकृत प्रश्न के सम्बन्ध में भी हम निःसन्दिग्ध होकर कह सकते हैं कि- " उपनिषत् वेद नहीं है " । हमारा यह विश्वास है, विश्वास ही नहीं अपितु दृढ निश्रय है कि उक्त पक्किएं जब विद्वानों के कर्णकुहरों में प्रविष्ट होंगीं तो उस समय वे क्षुब्ध हो पड़ेंगे । आश्चर्य नहीं, क्षुब्ध होकर वे हमारे इस निबन्ध को देखना भी पाप समझने लगे । श्रतएव आरम्भ में ही उन नीरक्षीर विवेकी विद्वानों की सेवा में हम यह नम्र निवेदन कर देना चाहते हैं कि वे एक बार कृपा कर शान्तचित्त होकर आयोपान्त इस निबन्ध को पढ़ने का कष्ट करें । पढ़ने के अनन्तर इस सम्बन्ध में यदि उन्हें

पृष्ठ 283

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 283 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना .. || माध्य भूमिका जटिल समस्या कुछ सन्देह हो ( जिस का कि उन्हें अवसर ही नहीं मिल सकता ) तो पत्र द्वारा, अथवा साक्षात् मिल कर उसे दूर करने की चेष्टा करें । हमारा विश्वास है । हम जो कुछ लिख रहे हैं, शास्त्र-सम्मत एवं प्रमाणयुक्त होने से उस में अणुमात्र भी सन्देह का अवसर नहीं है । कुछ एक मनचले भारतीय विद्वम्मन्यों को छोड़ कर भारतवर्ष में, क्या विदेशों में आज-ऐसा एक भी संस्कृतज्ञ विद्वान् न होगा, जो कि उपर्युक्त संहिताब्राह्मणादि चारों भागों को वेद न मानता हो । उन सब की दृढ श्रद्धा के एकान्ततः विरुद्ध- - " संहितादि चारों ही वेद नहीं हैं " यह कथन कैसे प्रामाणिक माना जासकता है? इस औचित्य अनौचित्य के निर्णय का भार " वेद पौरुषेय हैं, अथवा अपौरुषेय "? इस प्रश्न की मीमांसा पर ही निर्भर है । जिस प्रश्न की आज हम मीमांसा करने चले हैं, वेद अपौरुषेय है, अथवा ऋषिकृत?, जिस इस प्रश्न के समाधान के लिए हम प्रवृत्त हुए हैं, यह हमारे लिए एक जटिल समस्या का विषय बन रहा है । उक्त प्रश्न का कोई उत्तर नहीं हो सकता, अथवा इस सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रमाणों का अभाव है, हमारी जटिल समस्या का यह कारण नहीं है । इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर भी मौजूद है, युक्ति, तर्क की भी कमी नहीं है । साथ ही में दृढतर प्रमाणों का भी प्राचुर्य है । फिर भी यह कहना ही पड़ता है कि वेद के पौरुषेयत्व पौरुषेयत्व पर कलम उठाना इस युग में अवश्य ही एक जटिल समस्या है । क्यों? सुनिए! वेदशास्त्र इतर शास्त्रों की अपेक्षा हम सनातनधर्मावलम्बियों के लिए ( आर्यसमाजियों के लिए भी ) एक निर्भ्रान्त शास्त्र है । आदि काल से यह शास्त्र हमारे लिए अन्यतम श्रद्धा का विषय । वेदशास्त्र बना हुआ है । वेद का अक्षर अक्षर बिना ऊहापोह के हमारे लिए सर्वथा मान्य है इस तरह स्वतःप्रमाण है । जिस प्रकार इतर शास्त्रों के लिए वेदप्रमाण की आवश्यकता होती है, ऐसे वेद की प्रामाणिकता के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । ऐसी परिस्थिति में निर्भ्रात, स्वतःप्रमाण, अपौरुषेय, परमश्रद्धास्पद वेद के सम्बन्ध में " वेद पौरुषेय है, अथवा ऋषिकृत "? इस प्रश्न की मीमांसा करने मात्र से भारतवर्ष के कुछ एक आस्तिक महानुभाव, साथ एक अक्षर भी ही में कुछ एक विद्वान् क्षुब्ध हो पड़ते हैं । वे अपनी चिरकालिक श्रद्धा के विपरीत

पृष्ठ 284

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 284 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना • ॥ भाष्यभूमिका ॥-जटिल समस्या सुनना पसन्द नहीं करते । वे नहीं चाहते कि उन के विचार मीमांसा की कसोटी पर कसे जांय । मनोविज्ञान सिद्धान्त के अनुसार यह एक मानी हुई बात है कि किसी भी विषय पर हम तर्क -युक्ति का श्राश्रय लेते हुए यदि मीमांसा करने लगते हैं तो एक बार हमारी जमी हुई श्रद्धा पर थोड़ी बहुत ठेस लगती है । चाहे वह विचारमीमांसा हमें अन्त में भले ही किसी सत्यनिर्णय पर पहुंचा दें, परन्तु प्रारम्भ में यह विचारधारा अवश्य ही हमारे क्षोभ का कारण बन जाती है । इसी एकमात्र भय की आशङ्का से कुछ एक भारतीय श्रद्धालु विद्वान् अपने श्रद्धेय सिद्धान्तों की मीमांसा करने के लिए प्रवृत्त नहीं होते । सौभाग्य से कहिए अथवा दुर्भाग्य से यदि हमारे जैसा व्यक्ति उन के सामने उन के श्रद्धेय विषयों की मीमांसा उपस्थित करता है तो वे उस मीमांसा को बिना सुने समझे उस मीमांसक को " नास्तिक " शब्द की उपाधि से अलङ्कृत करने से भी पीछे नहीं हटते । बस उक्त प्रश्न की मीमांसा के सम्बन्ध में यही हमारे लिए जटिल समस्या है । दूसरा कारण सुनिए! वर्त्तमान युग में यह देखा गया है कि कितने ही विषयों पर अपने अन्तःकरण से श्रद्धा न रखते हुए भी भारतीय विद्वान् स्वार्थसिद्धि के लिए, समाज के धनिक लोगों को प्रसन्न रखने के लिए, जनसाधारण के भय से, अथवा और किसी कारण विशेष से उन प्रश्रद्धेय विषयों के सम्बन्ध में हां में हां, ना में ना मिलाया करते हैं । हमें कितनें हीं ऐसे महानुभावों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ कि जो श्राद्ध, प्रतिमोपासन, ज्यौतिषशास्त्राभिमत फलादेश यदि पर खतः विश्वास न करते हुए भी जनश्रद्धा को महत्व देते हुए दिखाने के लिए स्वयं भी इन कम्मों में प्रवृत्त रहते हैं, एवं पर्याप्त दक्षिणा लेकर दूसरों की भी वञ्चना किया करते हैं । भक्त मण्डली में श्रीमद्भागवत की रासपञ्चाध्यायी के सम्बन्ध में कितनीं एक रोचक कथाओं का समावेश देखा जाता है । जनसाधारण के चित्ताकर्षण के लिए कथावाचक महोदय मनगढन्त कई एक रोचक व्याख्यानों का आश्रय लिया करते हैं । साधारण जनता इन आख्यानों को वेद से भी अधिक महत्व की वस्तु समझने लगती है । ऐसी दशा में यदि कोई विद्वान् इन सर्वथा असत्य कथाओं पर टीका टिप्पणी करने लगता है तो भक्तमण्डली, एवं मण्डली के सञ्चालक कथावाचक महोदय लोकवृत्त की रक्षा के लिए, साथ ही में अपनी आजीविका की रक्षा के लिए उस सत्यवक्ता

पृष्ठ 285

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 285 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना ॥ भाष्यभूमिका ॥ बुद्धिभेद प्रकार विद्वान् कहलाने वाले महा-को नास्तिक कह बैठने में कोई आपत्ति नहीं समझते । इस अश्रद्धा करते हुए असत्यमार्ग का अनुगमन नुभाव भी स्वयं अपने कल्पना साम्राज्य पर अन्तःकरण से व्यक्ति इस असत्यश्रद्धा के विप करने में अपना गौरव समझ रहे हैं । यदि उन से कोई सत्यनिष्ठ बचाव के लिए निम्न लिखित शास्त्रीय रीत कुछ कहने का साहस करता है तो वे महानुभाव अपने प्रमाण को आगे कर अपने कर्तव्य से छुट्टी पा लेते हैं— न बुद्धिभेदं जनयदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । ३।३६ ) | जोषयेत् सर्वकर्म्मणि विद्वान् युक्तः समाचरेत् ॥ ( गी अज्ञान-इस वचन का तात्पर्यार्थ समझते हुए आप कहते हैं कि - " अज्ञानी मनुष्य रहा है, उस को उस श्रद्धा से नहीं वश स्वश्रद्धा के अनुसार जिन कम्पों में प्रवृत्त हो में युक्त रहता हुआ अन्य व्यक्ति-हटाना चाहिए । विद्वान् का कर्तव्य है कि वह अपने कम्मों परिस्थिति में हमारा भी यह आवश्यक यों को उन के श्रद्धानुकूल कम्पों में प्रवृत्त रक्खे ” । ऐसी आने वाली - " वेद अपौरुषेय हैं " कर्त्तव्य हो जाता है कि जनसाधारण में चिरकाल से चली समस्या अक्षर भी न बोलें । यही हमारी जटिल इस श्रद्धा के विरुद्ध लोकवृत्त की रक्षा के लिए एक का दूसरा कारण है । उक्त अन्धश्रद्धा रूप लोकवृत्त अब हम अपने जिज्ञासु पाठकों से प्रश्न करते हैं कि क्या महोदय उत्तर में हां! कहेंगे तो हमें की रक्षा के बहाने हम भी मौन धारण करलें । यदि पाठक का प्रतिपादन करती है ) - " प्रकृति उसी गीता का ( जो कि “ न बुद्धिभेदं जनयेत् " इस सिद्धान्त सामने रखना पड़ेगा । जड़श्रद्धा यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ” यह सिद्धान्त उन के सकते । इस के सत्य विचार हम नहीं रोक के उपासक कुछ एक व्यक्तियों के भय से आत्मा सकती । लोकवृत्त बिगडे, विद्वान् सम्बन्ध में कोई भी शक्ति हमारी प्रकृति का निग्रह नहीं कर लें, भ्रूभंगी को और भी अधिक वक्र कर अप्रसन्न हों, हमें नास्तिक माना जाय, धनिकलोग अपनी सत्यं है । हमारे सामने तो " मानात् इन सब व्यर्थ के आडम्बरों का हमें अणुमात्र भी भय नहीं

पृष्ठ 286

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 286 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना • । भाष्यभूमिका ॥ अधिकारी विशिष्यते " - " सत्ये नास्ति कुतो भयम् " यह सर्वसम्मत सिद्धान्त उपस्थित हैं । सत्यत को अपना उपास्य बना कर हम अपने जो विचार प्रकट करने वाले हैं, यदि उन विचारों में सत्य विद्यमान है तो किसी की मिथ्या श्रद्धा के विनाश का हमें कोई भय नहीं है । हमारा, हमारा ही क्या सम्पूर्ण शास्त्रों का यह निश्चित मन्तव्य है कि मिथ्या श्रद्धा थोड़े समय के लिए भले ही लोकवृत्त की रक्षा करने में समर्थ हो जाय, परन्तु अन्ततोगत्वा वह समाज के विनाश का ही कारण बनती है । भारतवर्ष में द्रुतवेग से फैलती हुई यह मिथ्या श्रद्धा हमारे बचे खुचे वैभव को जब तक सर्वनाश में नहीं मिला देती है, उस से पहिले पहिले ही सत्यास्त्र- द्वारा इस पापिनी मिथ्या श्रद्धा का हमें समूल विनाश कर देना है । हां इस सम्बन्ध में हमें यह सर्वात्मना मान्य होगा कि यदि हमारे विचारों में विद्वानों को कहीं असत्य का गंध प्रतीत हो तो वे उस का प्रतीकार करें । हम विद्वानों के युक्ति-तर्क एवं प्रमाण संगत उस प्रतीकार को शिरोधार्य करते हुए अपनी भूल पर पश्चात्ताप करेंगे । इस पाप के लिए विद्वानों के निर्णयानुसार प्रायश्चित्त करेंगे । परन्तु बिना विचार परामर्श के किसी अन्ध-श्रद्धा का अनुगमन करते हुए मौन बैठे रहना हमारे लिए सर्वथा असम्भव है । लोग हमें नास्तिक कहेंगे, हमारे व्यक्तित्वपर श्रद्धा करेंगे, भोली जनता में हमारे विरुद्ध बुरे विचार फैलावेंगे, क्या इस भय का भी कुछ महत्त्व है! सर्वथा नहीं! क्यों! स्पष्ट है । शास्त्रों के प्रति श्रद्धा रखने वाला जन समाज यथार्थग्राही, शास्त्रग्राही कोमलश्रद्धगतानुगतिक भेद से तीन श्रेणियों में बांटा जासकता है । शास्त्रप्रतिपादित विषयों की अपनी दृष्टि से पूर्ण परीक्षा कर उनके अन्तस्तल पर पहुंचा हुआ, अथवा परीक्षाद्वारा उन विषयों के तथ्यांशोंपर पहुंचने की शक्ति रखने वाला वर्ग ही " यथार्थग्राही " कहा जायगा । शास्त्रीय वचनों पर पूर्ण श्रद्धा रखते हुए, शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर सत्यासत्य का निर्रणय करने वाला, तदनुसार ही कर्तव्याकर्त्तव्य का निश्चय करने वाला वर्ग " शास्त्रग्राही " नाम से सम्बोधित किया जायगा । सतत अर्थोपार्जन, सेवाधर्म्म ( नौकरी ) आदि में प्रवृत्त रहने के कारण जिसे शास्त्र के अध्ययन का अपने जीवन में अवसर ही नहीं मिलता, अतएव जो स्वयं शास्त्रीय सिद्धान्तों के निर्णय में असमर्थ रहता है, जो धार्मिक कर्तव्यों के सम्बन्ध में विद्वानों का ही आश्रय लेता है, जिस के कर्तव्य का मूल -

पृष्ठ 287

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 287 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना--- ॥ भाष्यभूमिका ॥ अधिकारी चाहे. स्तम्भ केवल सुनी सुनाई बातें हैं, जिसने केवल अपने श्रुत विषय को ही शास्त्रीय मान कर ( वह अशास्त्रीय ही क्यों न हो ) उस पर अपनी श्रद्धा कर रखखी है, ऐसा तृतीयव " कोमलश्र विद्वान् गतानुगतिक " कहा जायगा । इस वर्ग की श्रद्धा सचमुच बड़ी कोमल होती है । एक अन्य ने युक्तियों के द्वारा जो कुछ इसे समझा दिया, उसी पर यह श्रद्धा करने लगेगा । यदि किसी विद्वान् ने पहिले विद्वान् से अधिक प्रबलयुक्तिवाद का आश्रय लेते हुए उसी विषय का अन्यथा श्रद्धा करने प्रतिपादन किया तो वह पहिली श्रद्धा छोड़ता हुआ इस दूसरे विद्वान् के कथन पर लगेगा | उक्त तीनों वर्गों में से प्रथमवर्ग के सम्बन्ध में तो कुछ वक्तव्य हीं नहीं है । परीक्षा साधन करते, से वह स्वयं सत्यासत्य के निर्णय में समर्थ है । ऐसे यथार्थग्राही विद्वान् न किसी की निन्दा न स्तुति करते । न उन्हें लोकापवादों में अपना अमूल्य समय नष्ट करने को ही आवश्यकता होती । की दृष्टि में कोई दूसरा वर्ग अपनी आत्मतुष्टि के लिए प्रमाणों की अपेक्षा रखता है । यदि उस उसे स्वीकार कर-विषय युक्ति- तर्क सिद्ध हैं, साथ ही में दृढतम शास्त्रीय प्रमाणों से युक्त है तो वह विषयसिद्धि के लिए लेने में कोई आपत्ति नहीं करता । ऐसे शास्त्रग्राही वर्ग के लिए हम जब अपनी से भी हमें निन्दा - लोकापवा दि सयुक्तिक शास्त्रीय प्रमाणों का आश्रय लेते हैं तो इन विद्वानों की ओर । कोमल श्रद्ध शास्त्रमम्मीनभिज्ञः की कोई आशङ्का नहीं रह जाती । अब तीसरा वर्ग बच जाता है है, उन जिन अभिनिविष्टों नें सुनी सुनाई बातों को शास्त्रीय मान कर उन पर पूर्ण श्रद्धा कर रक्खी बड़े आवेश की इस कल्पित अशास्त्रीय श्रद्धा के विरुद्ध यदि कुछ बोला जाता है तो यह महानुभाव से प्राप्त प्रतिष्ठा के साथ मर्यादा का परित्याग करके मन माने उद्गार प्रकट करते हुए जनसाधारण लगते हैं । शास्त्रों के की रक्षा के लिए बितण्डावाद का आश्रय लेकर अपने आप को धन्य समझने को सर्वथा मर्म को न समझने के कारण उक्त महानुभाव शास्त्रीय समाधान करने में अपने आप अभि असमर्थ पाते हुए, छिद्रान्वेषण का समाश्रय लेते हुए अस्तव्यस्त वाणी द्वारा उत्तर देने का होगा मान करते हुए - ' " शेष कोपेन पृरयेत् " को अपनी आवासभूमि बनाते हैं । कहना नहीं कि- " मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति

पृष्ठ 288

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 288 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना ॥ भाष्यभूमिका ॥ मिथ्या श्रद्धा तत्त्वतः ” इस सिद्धान्त के अनुसार यथार्थग्राही एवं शास्त्रग्राही विद्वान् अत्यल्प संख्या में उपलब्ध होते हैं, एवं तृतीय वर्ग के महानुभाव संख्या में भी अधिक है, एवं इन की अनुयायिनी जनता भी अधिक है । यही महानुभात्र हमें नास्तिकता का भय दिखलाने के लिए आगे बढ़ते हैं । आपने इन की श्रद्धा के विपरीत कुछ कहा नहीं कि इन्होंने शरभदल ( टिड्डीदल ) की तरह उस सत्य विषय पर आक्रमण किया नहीं । क्या इन नगण्य जीवों के भय से इन्हीं के असत्यपथ का अनुगमन करना श्रेयस्कर है! कभी नहीं! सर्वथा नहीं!! नितान्त असम्भव!!! अन्धश्रद्धालुओं के निरर्थक भय से अपने आप को बचाने के लिए सत्य तत्व की हत्या करना एक बहुत बड़ा पाप है । इसी पाप ने आर्य जाति को, आर्यसंस्कृति को, आर्यसाहित्य को ध्याज विनाशोन्मुख बना रक्खा है । आज श्राव-श्यकता है सत्यनिष्ठ विद्वानों की, स्पष्टवक्ता उपदेशकों की, खरे निःस्वार्थी समालोचकों की । यदि अब भी हमने “ गतानुगतिको लोकः " का आश्रय लिया तो फिर आर्यसाहित्य का रक्षक भगवान् ही है । आप हम से प्रश्न करेंगे कि " जनता की श्रद्धा के विरुद्ध कुछ भी कहना - " न बुद्धि-भेदं जनयत् " इत्यादि ईश्वराज्ञा का विरोध करना होगा । ईश्वरावतार भगवान् कृष्ण जब हमें आदेश देते हैं " कि जनता जिस मार्ग से जारही है, उसे उसी मार्ग से जाने दो । बुद्धिभेद पैदा मत कसे, अन्यथा लोकसंग्रह बिगड़ जायगा । समाज तुम्हारा विरोधी बन बैठेगा । समाज की शान्ति नष्ट हो जायगी " । इस के उत्तर में हम अपने पाठकों से प्रतिप्रश्न करेंगे कि क्या लोकसंग्रह रक्षा के लिए भगवान् हमें मिथ्या बोलने के लिए बाध्य करते हैं? यदि हां तो फिर शास्त्रोपदेश की आवश्यकता ही क्या रह जाती है । फिर तो न शास्त्रों की आवश्यकता है, न कथा की अपेक्षा है, न उपदेशकों की ही आवश्यकता है । जो जिस मार्ग से जारहा है ( चाहे वह मार्ग विषम एवं पतन का कारण ही क्यों न हो ) उसे उसी मार्ग से जाने देना चाहिए । क्यों? क्या आप ऐसा होना ठीक समझते हैं? क्या सत्यकाम ईश्वर हमें सत्यतत्व को छिपाने की आज्ञा देता है! क्या ईश्वर हमें इस के लिए प्रोत्साहित करता है कि हम आगे होकर सत्य का गला घोटते हुए मिथ्या श्रद्धा का अनुगमन करें? बड़ा अज्ञान! बड़ी भूल!! महा विडम्बना!!!

पृष्ठ 289

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 289 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना - माध्य भूमिका सत्य भाषण हमारी दृष्टि में तो ईश्वर सदा सत्य का ही पक्षपाती रहा है । " सत्यं वद " - ' सत्यान्न-प्रमदितव्यम् " - " स वै सत्यमेव वदेव " - " नानृतं वदेव " - ईश्वरीय ज्ञानकोश ( वेद ) से निकले हुए इन आदेशों को देखते हुए क्या ईश्वर को कभी असत्यज्ञान का उत्तेजक माना जासकता है! कभी नहीं । “ न बुद्धिभेद जनयेत् " का तात्पर्य समझने की क्या आपने कभी चेष्टा की है? इस का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि यदि एक व्यक्ति उत्पथ मार्ग से जा रहा है तो एक विद्वान् खड़े खड़े तमाशा देखा करै, और उस में बुद्धिभेद पैदा न करें । आइए उक्त धात्रा के वास्तविक रहस्य की ओर आपको ले चलें । सनातनधर्म्म के गर्भ में वर्णप्राश्रम - जाति - देश - काल - पात्र - द्रव्य - श्रद्धा के तारतम्य से अधिकारी भेद से कर्म नियत हैं । कर्म्म भेद से धर्म्मभेद है । यह धर्म्मभेद ही सनातनधर्म्म का सब से बड़ा महत्व है । प्रत्येक व्यक्ति स्वस्वधर्म का अनुगमन करता हुआ ही अपने चरम लक्ष्य पर पहुंच सकता है । अज्ञानवश यदि कोई व्यक्ति अपने आधिकारिक कर्म की स्तुति, एवं अन्य व्यक्ति के आधिकारिक कर्म्म को निन्दा करता है तो वह लोकसंग्रह के नाश का कारण बनता इसी सम्बन्ध में भगवान् आज्ञा देते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह अप-ने स्वधर्म का यथाविधि पालन करता हुआ अन्यव्यक्ति के स्वधर्म की निन्दा न करता हुआ, उसे उसी पर आरूढ रखता हुआ बुद्धिभेद न होने दे । उदाहरण के लिए ईश्वरोपासना को ही लीजिए । आमा, सूय्य, अग्नि, इन्द्र, प्रणव, उद्गीथ, हिङ्कार, राम कृष्णादि अवतारों की प्रतिमाएं, शालग्राममतिमा, चित्रोपासना आदि भेद से उपासना अनेक भागों में विभक्त है । अब यदि कोई श्रात्मोपासक, किंवा प्रणवोपासक अपने मार्ग की श्रेष्ठता के अभिमान में पड़ कर रामकृष्ण | दिप्रति--मायों की उपासना की निन्दा करता है तो वह ईश्वराज्ञा का विरोध करता है । कारण अधिकारी की योग्यता की अपेक्षा से उपासना के सभी प्रकार शास्त्रसिद्ध हैं । इसी प्रकार श्रीशङ्कराभिमत अद्वैत पाग, श्रीरामानुजाभिमतः विशिष्टाद्वैतवाद, श्रीवल्लभाभिमत शुद्धाद्वैतवाद, श्रीनिम्बार्काभिमत * इस विषय का विशद विवेचन-- " वेदेषु धर्मभेदः " नाम के निबन्ध में देखना चाहिए ।

पृष्ठ 290

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 290 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना माष्यभूमिका1 श्रद्धा का तारतम्य द्वैताद्वैतवाद, श्रीमाध्यामिमत द्वैतवाद सभीवाद शास्त्रसिद्ध, अतएव आदरणीय हैं । अपनी अपनी निष्ठा का अनन्यभाव से पालन करते हुए सभी साम्प्रदायिक ठीक रास्ते चल रहे हैं । यदि यह आपस में अपनी संप्रदाय को सर्वोत्कृष्ट, एवं अन्य सम्प्रदायों की निन्दा करते हैं तो यह बुरा यही बुद्धिभेद है । भगवान् इसी की निन्दा कर रहे हैं । अपिच वर्णाश्रम मर्य्यादा के अनुसार हमारा कर्म्मकलाप ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - शुद्र भेद से चार वर्णों में, एवं ब्रह्मचर्य - गृहस्थ - नानप्रस्थ - सन्यास इन चार श्राश्रमों में अधिकारी भेद से सर्वथा विभक्त है । अब यदि एक ब्राह्मण अपने को सर्वोच्च वर्ण समझने का अभिमान करता हुआ इतर वर्षों को, एवं उन के कम्मों को नीची दृष्टि से देखता है तो वह लोकसंग्रह का विघातक बनता हुआ वास्तव में ईश्वराज्ञा का विरोधी है । एवमेव ज्ञाननिष्ठ, श्रतएव उत्तमाधिकारी एक सज्यासी ज्ञानगर्व से आक्रान्त बन कर कर्म्ममार्गानुयायी मध्यमाधिकारी गृहस्थी को यदि नीची दृष्टि से देखता है तो सचमुच वह ईश्वराज्ञा का विरोध करता हुआ प्रायश्चित्त का भांगी बन रहा है । सनातनधर्म्मरक्षक भगवान् कृष्ण हमें आदेश करते हैं कि-ए “ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥ सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ॥ सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ स्वमपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि " ॥ हमारे इन लोकसंग्रह मुलक प्रदेशों को लक्ष्य में रखते हुए विद्वान् ( समझदार - बुद्धिमान् ) मनुष्य का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह अपने आश्रमवरणानुकूल अधिकार सिद्ध कर्म का अनु-ष्ठान करता हुआ इतर उन व्यक्तियों को, जो कि ज्ञान की कमी के कारण अभी नीची श्रेणी के कर्मों की योग्यता रखते हुए उन में प्रवृत्त हैं, कभी उन के अधिकृत कर्म से ध्युत न करै । निष्कर्ष यह हुआ कि सनातनधर्म के अन्तर्भूत अधिकार सिद्ध उत्तम मध्यम प्रथम श्रेणि के जो