Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 291–300
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 291–300
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प्रस्तावना माध्य भूमिका गुण - दोषभाव कर्म्म अधिकारी भेद से विभक्त हैं, उन कम्पों में प्रवृत्त तत्तदधिकारी परस्पर में सहयोग रखते हुए, भग एक दूसरे की निन्दा से सर्वथा पराङ्मुख रहते हुए अपने अपने कर्म्म का पालन करें । यदि । एक व्यक्ति वान् का यह अभिप्राय नहीं माना जायमा तो फिर विधर्म कोई वस्तु ही न रहैगी बुद्धिभेद न ईसाई बनता है, बनने दीजिए । एक व्यक्ति मद्यपान करता है, करने दीजिए । क्या लक्ष्य पैदा करने का यही तात्पर्य हैं । ऐसी दशा में यदि कोई व्यक्ति मिध्याश्रद्धा में पड़ कर सत्य । हम तो समझते हैं से च्युत हो रहा है तो क्या उसे उसी अज्ञानान्धकार में पड़े रहने दिया जाय के विरुद्ध नहीं, अपितु कि सत्यश्रद्धा के बल पर उस की मिथ्या श्रद्धा को दूर करना ईश्वराक्षा अनुकूल । क्या वेद की अपौरुषेयता के सत्यासत्य की मीमांसा आरम्भ करें नहीं ठहर जाइए कीजिए । वह विप्रतिपत्ति अभी इस सम्बन्ध में एक विप्रतिपत्ति और है, हिले उस का निराकरण हम सनातनधर्मियों दृष्टि में समान आदर और भी जटिल समस्या है । वेद और ईश्वर का पर कसना उस के महत्क है । ईश्वरक्त् वेद हमारा परम आराध्य देव है । उसे विचार की कसौटी को कम करना है ।
सवथा दृश्यते किञ्चिन्न निर्दोष न निर्गुणम् ।
गुणदोषमयं सर्व स्रष्टा सृजति कौतुकी ॥
दोनों इस सर्वसम्मत सिद्धान्त के अनुसार विश्व में जितने भी पदार्थ हैं, वे गुण एवं दोष चुका है । धम्म से मित्य यात्रान्त हैं, जैसा कि पूर्व के मङ्गल रहस्य में विस्तार से बतलाया जा विशुद्ध दोषमय ही भाप को विश्व में कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं मिलेगा, जो विशुद्धगुणमूर्ति, किंवा हैं, वहाँ दोषदृष्टि से हो । ऐसी दशा में प्रत्येक वस्तु की गुणदृष्टि से जहां हम प्रशंसा कर सकते विश्वगुणादर्शचम्पू उसी वस्तु की हम भरपेट निन्दा भी कर सकते हैं । संस्कृत साहित्य में सुप्रसिद्ध अमृतमय है, सन्निपात नामक ग्रन्थ इस के लिए पर्याप्त प्रमाण है । खस्थदशा में वही भोजन का बीज दशा में वहीं विषमय है । मृत्युदोष से विमुक्त करने वाले अमृत ने ही देवासुरसंग्राम पर जीवन सत्ता बंपम किया था । प्राणघातक विष ( संखिया ) भी कभी कभी मात्रा से उपयुक्त होने
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प्रस्तावना .. माध्य भूमिका ॥--गुण - दोषपरीक्षा का कारण देखा गया है । इस प्रकार इन दोनों विरुद्ध धम्म के एकत्र समन्वय से हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि यदि बिना किसी पक्षपात के व्यापक दृष्टि से हम पदार्थों को परीक्षा की कसोटी पर कसेंगे तो गुणभाव के कारण न वह हमारे लिए एकान्ततः अश्रद्धा का विषय रहेगा, एवं दोषभाव के कारण न वह हमारे लिए सर्वथा श्रद्धा का ही विषय रहैगा । " अमुक वस्तु आराध्य है, अमुक हेय है " यह भेद व्यवहार विचारधारा का प्रबल विरोधी माना गया है । पिच " यह हम से बड़ा है, यह हम से छोटा है । यह गुणवान है, यह मूर्ख है " इस प्रकार का साधारण जनता में प्रचलित व्यावहारिक भेद भी उक्त परीक्षा से छिन्नभिन्न देखा गया है । विचार करने पर हम इस परिणाम पर पहुंचते हैं कि एक विद्वान् भी कई ऐसे महादोषों से आक्रान्त है, जिन के स्मरणमात्र से भी हृत्कम्प होता है । उधर जिसे हम मूर्ख समझते हैं, विचार के पश्चात् उसी में हमें किसी अलौकिक दिव्यज्योति के दर्शन होजाते हैं । शास्त्रीयमार्ग, किंवा शास्त्रीयदृष्टि एक भिन्न पथ है, एवं सामाजिक मार्ग, किंवा व्यान-हारिकदृष्टि एक भिन्न पथ है । कुछ अंशों में समानता होते हुए भी इन दोनों दृष्टियों में अधिकांश में विषमता ही देखी जाती है । व्यवहारदृष्टि के अनुसार पत्नी - माता - भगिनी - पुत्र- पिता अनुचर-सखा आदि के स्थान सर्वथा विभिन्न हैं । उधर दार्शनिक दृष्टि के अनुसार ( आत्मदृष्टषा ) सब एक ही स्थान के अधिकारी हैं । दार्शनिकदृष्टि परमार्थदृष्टि है । इस का एकमात्र लक्ष्य तत्तत् पदार्थों का वास्त-विक स्वरूपज्ञान है । उधर व्यावहारिक दृष्टि का प्रधान लक्ष्य समाज का सुचारुरूप से सञ्चालन है । यदि सामाजिक व्यवहारों के साथ आप उस परमार्थदृष्टि का सम्बन्ध जोड़ देंगे तो किसी भी व्यव-हार का आप विशुद्धभाव से निर्वाह नहीं कर सकेंगे । फलतः समाजव्यवस्था उच्छिन्न होजायगी । ऐसी स्थिति में हमारा यह श्रावश्यक कर्त्तव्य होजाता है कि जिन पदार्थों पर, एवं जिन व्यक्तियों ( गुरुयों ) पर हमारी अनादि काल से श्रद्धा चली यारही है, उन को विचार परीक्षा की कसोटी पर बिना कसे समाजसंग्रह के लिए " महाजनो येन गतः स पन्थाः " इस आभाणक को अपना मूल लक्ष्य मानते हुए अपने कर्तव्य कर्म्म पर दृढ रहें 1 । भगवान् शङ्कराचार्य ने धर्म्मस्थापना की । अपने इस सिद्धान्त को चिरकाल के लिए प्रतिष्ठित रखने के लिए चारों दिशाश्मों में चार मठ स्थापित
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प्रस्तावना || माष्यभूमिका | समालोचना कर उन गद्दियों पर अपने सुयोग्य पद्मपादाचार्य, सुरेश्वराचार्य, त्रोटकाचार्य, हस्तामलका -चार्य इन चारों शिष्यों को स्थापित किया । आज तक वही आचार्यपरम्परा चली आ रही है । राज-शासन के दोष से यद्यपि वर्तमान में शङ्करमठाधीश लक्ष्य च्युत होरहे हैं । यदि वर्तमान आचार्यो की गुणदोष की हम मीमांसा करने बैठें तो न मालूम हमारा अन्तरात्मा किस भीषण परिणाम पर पहुंचे । यह सब कुछ समझते हुए भी लोकवृत्त की रक्षा के लिए उन श्राचार्यों के सामने बिना किसी परीक्षा के हमें अपना मस्तक झुका देना चाहिए । इसी प्रकार - पिता, गुरू, ज्येष्ठभ्राता, धर्मोपदेशक आदि के गुणदोषों की यदि हम परीक्षा करने बैठेंगे तो हमारी सारी श्रद्धा गायब हो जायगी । ऐसी अवस्था में हमारा एकमात्र यही कर्त्तव्य होना चाहिए कि कौतुकी प्रजापति के कौतुक-रूप गुणदोष दोनों विभूतियों का आदर करते हुए " यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयो-पास्यानि नो इतराणि ” इस श्रौत आदेश को शिरोधार्य कर पिता गुरू आदि में गुणदृष्ट्या वही -श्रद्धा रखते हुए जीवनयात्रा का निर्वाह करते चले जां । हमारा एवं हमारे समाज का इसी में कल्याण है । हमें दोष देखने के सभी द्वार बन्द कर देने चाहिएं । तभी व्यवहारप्रधान समाज में शान्ति रह सकती है । यदि अज्ञानवश कोई साहसिक उन दोनों की मीमांसा करने के लिए आगे बढ़े तो बलात्कार से हमें उस का मुख बंद कर देना चाहिए । ठीक यही परिस्थिति गुण--भाव की होनी चाहिए । " अमुक व्यक्ति में अमुक गुण इतना विकसित है, अमुक में इतना? इस प्रकार की गुणपरीक्षा भी सीमा का अतिक्रमण करती हुई कभी कभी लोकवृत्त की विरोधिनी बन जाती है । यदि आप किसी पदार्थ के, अथवा व्यक्ति के गुणों का अतिशय बखान करने लगेंगे तो प्रकृतिसिद्ध असुरभाव प्रधान समाज के कितने ही व्यक्ति उस गुणातिशय क सहने में असमर्थ होते हुए उसे निन्दा का रूप देदेने में जरा भी संकोच नहीं करेंगे । ऐसा होने से श्राप का वह मान्य पदार्थ, किंवा पूज्य व्यक्ति लोकसंग्रह के भेद से श्रद्धा के स्थान में अश्रद्धा का भाजन बन जायगा । फलतः गुण दोष दोनों की परीक्षा से तटस्थ रहते हुए ऋजुभाव से केवल गुणों का अनुगमन करते हुए हमें अपने कर्तव्य पर दृढ रहना चाहिए । समालोचना करना इस युग का एक स्वाभाविक धर्म बन गया है । सभी शिक्षित अपने १२
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प्रस्तावना ॥ भाष्यभूमिका का ॥ परीक्षा बुद्धि आप को खरे खोटे के पूर्ण परीक्षक होने का दम भर रहे हैं । हिन्दूसमाज में जितनी भी रीतिएं प्रचलित हैं, जो भी संस्कार विद्यमान हैं, उन सब में आज यह महानुभाव परीक्षा के गर्व में पड़ कर अपने आप को सत्योपासक समझने का दावा करते हुए बुद्धिभेद पैदा कर रहे हैं । हमारी सम्प्रदाएं बुरीं, आचार्य निकृष्ट, मन्दिर अनाचार के अड्डे, उपदेशक स्वार्थी, पण्डित रूढियों के गुलाम इसप्रकार इन अदग्धों को सर्वत्र दोष ही दोष दिखल ई दे रहे हैं । यद्यपि हम मानते हैं कि व्यवश्य ही हिन्दूसमाज उक्त दोषों का विशेष रूप से उपासक बन रहा है । फिर भी इस संबन्ध में हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि आज भी हिन्दूजाति का आदर्श इतर सभ्य जातियों से कहीं बढ़ चढ़ कर है । हमें अपने दोषों को हटाने के लिए अपने घर में सहयोग का आश्रय लेना पड़ेगा । एक दूसरे के छिद्रान्वेषण से हमारा कोई उपकार नहीं होसकता । हां अपकार अवश्य होरहा है । यदि आप दोषों का अन्वेषण करने चलेंगे तो आप का भी संसार में रहना कठिन हो ' जायगा । आखिर समाज तो वही रहेगा । कहीं से व्यक्ति तो कर्ज में आप नहीं मंगा लगे । दोषों के डिण्डिमघोष से यदि आप ने जनसाधारण के श्रद्धेय प्रमुख व्यक्तियों का सहयोग खोदिया तो याद रखिए आप का समाज सर्वात्मना जीर्ण शीर्ण होता हुआ अपना अस्तित्व ही खो बैठेगा । इसलिए जनता की श्रद्धा का श्रादर करते हुए, उपलालनों का आश्रय लेते हुए, जनता का पूर्ण सहयोग प्राप्त करते हुए ही हमें परीक्षा में प्रवृत्त होना चाहिए । प्राचीन आचार्योंनें श्रद्धा का - - " " दोषदर्शनानुकूलवृत्तिप्रतिबन्धकवृत्तिधारण श्रद्धा ” यह लक्षण किया है । किसी भी पदार्थ के दोषों को देखने की जो एक मनोवृत्ति है, उस वृत्ति को रोक देने वाली जो वृत्ति है, उस वृत्ति से अपने अन्तःकरण को युक्त रखना ही श्रद्धा है । दोषों की ओर हमारा मन आकर्षित ही नहो, इसी वृत्ति का नाम श्रद्धा है । इसी वृत्ति के प्रभाव से जिस की जिस व्यक्ति पर श्रद्धा हो जाती है, वह व्यक्ति उस श्रद्धेय व्यक्ति के दोषों की ओर भूल कर भी दृक्पात नहीं करता । यही नहीं, यदि अन्य तटस्थ व्यक्ति उस व्यक्ति के श्रद्धेय व्यक्ति के किसी दोष का उद्घाटन करता है तो वह श्रद्धालु उस दोष को गुणभाव में परिणत करने की ही चेष्टा करता है । इसी श्रद्धाभाव पर समाज की सत्ता सुरक्षित है । इसी श्रद्धा के बल पर चिरकाल से १३
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प्रस्तावना ..या भाष्यभूमिका ॥ परीक्षाबुद्धि तक जीवित रह सकी । ठीक इस के प्रबल आक्रमणों को सहती हुई भी हिन्दूजाति आज विपरीत बुद्धिभेदक अश्रद्धाभाव मूलक परोक्षा ने आज उन असंख्य जातियों को स्मृतिगर्भ में विलीन कर दिया है, जो किसी समय साम्राज्य के उच्च सिंहासन पर विराजमान थीं ॥ हम मानते हैं कि वेद में आप दोष नहीं मानते । फिर भी आप यदि परीक्षा करना चाहते हैं, परीक्षा द्वारा गुणदोष की मीमांसा करना चाहते हैं तो हमें कहना पड़ेगा कि थाप वेद पर श्रद्धा नहीं करते । अपौरुषेय " भाव ही एक ऐसा हेतु है, जिस के प्रभाव से वेद पर चयसंतान की अप्रतिम श्रद्धां अनादि काल से चली आ रही है । ऐसी स्थिति में श्रद्धा के मूलस्तम्भरूप अपौ-रुषेय भाव पर विचार उठाना अवश्य ही आयेजाति की चिरकालिक श्रद्धा पर आघात पहुंचाना है । इसलिए अब तक वेद के अपौरुषेयत्व के सम्बन्ध में जैसा माना जारहा है, उसे नतमस्तक होकर मानते रहने में ही हमारा कल्याण है । फलतः " वेद अपौरुषेय हैं, अथवा ऋषिकृत ”? इस प्रश्नमीमांसा की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । करते सर्वसाधारण की इस वेदश्रद्धा का एक वेदभक्त के नाते हम हृदय से अभिनन्दन पारसी, हैं । आप तो हिन्दू जाति पर विश्राम कर लेते हैं । हमारा तो यह भी दृढतम विश्वास है कि वैज्ञानिक दृष्टि से, यहूदी, अंग्रेज, मुसलमान कोई भी व्यक्ति ऐतिहासिक दृष्टि को छोड़ कर तो उसे नत मस्तक द्वेषभावना रखता हुआ, खण्डनबुद्धि से भी यदि इस वैदिक साहित्य को देखेगा आपत्ति न होगी होकर इस के प्रति अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करनी पड़ेगीं । उसे यह मानने में कोई कि- " वेद वास्तव में ईश्वरीय ज्ञान है । यह मनुष्य के मस्तिष्क की उपज नहीं है, अपितु शाश्वतब्रह्म की शाश्वतवाणी हैं । विश्वसाम्राज्य का सञ्चाल करने वाली ईश्वर की दराड-नीति है " । " अपौरुषेय तत्व की मीमांसा से श्रद्धा पर आघात होगा " यह बात भारतीय से साहित्य, विशेषतः वैदिकसाहित्य के सम्बन्ध में लेशमात्र भी घटित नहीं होती । वैदिकधर्म्म श्वतिरिक्त ओर ओर जितने भी मत हैं, उन के लिए भले ही उक्त सिद्धान्त का कुछ महत्व हो । सकते हैं परन्तु वैदिकधर्म्म प्रतिपादक वैदिकसाहित्य के सम्बन्ध में हम यह दावे के साथ कह १४
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प्रस्तावना ३। भाष्यभूमिका ॥ कारणवाद कि विज्ञान का अभिमान करने वाले वैज्ञानिक ज्यों ज्यों वैदिक पदार्थों को विज्ञान की कसोटी पर कसते जांपगे, त्यों त्यों उन्हें सत्यतथ्य का साक्षात्कार होता जायगा । परीक्षा से भय उसे हो सकता है, जिस की जड़ें खोखलीं हों । परीक्षा से वह डर सकता है, जिसे अपने सिद्धान्त की सत्यता में सन्देह हो । तर्कवाद से वह मुंह मोड़ सकता है, जिस का साहित्य केवल कल्पना का साम्राज्य हो । यहां तो - " यस्तर्केणानुसंधते स धर्म्य वेद नेतरः " यह घन्टाघोष है । परीक्षा के लिए ही " मीमांसा " नाम के एक स्वतन्त्र शास्त्र का प्राविभाव हुआ है । नव्यन्याय, प्राचीनन्यायादि कथा-शास्त्र एक स्वतन्त्र तर्कशास्त्र ( Logic ) है, जिस का एकमात्र कर्म सत्यासत्य की परीक्षा करना ही है । यह ठीक है कि जनसाधारण के लिए यह परीक्षा उपयोगिनी नहीं बन सकती 1 । फिर जी वस्तुतस्व के निर्णय के लिए विचार ही न किया जाय, यह आर्यसाहित्य कथमपि स्वीकार नहीं कर सकता । यही नहीं, अपितु श्राप्तपुरुषों का तो यह भी कहना है कि धर्मशास्त्र का कोई भी विधान बिना कारण के नहीं है । हमारा बहुलाभ तभी संभव है, जब कि हम धर्म के उस मौलिक रहस्य को जान कर ही उस में प्रवृत्त हों । इसी आशय को जाजलि के प्रति प्रकट करते हुए भग-बान् दाशरथि कहते हैं. 1 नाकारणं हि शास्त्रेऽस्ति धर्म्मः सूक्ष्मोऽपि जाजले! कारणाद्धर्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान् ॥ ( वा ० रा ० ) इसी प्रकार भगवान् व्यास ने भी - " कारणाद्धमन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत् " ( म.शा.मो ० २६२ अ ० ५३ श्लोक ) इन स्पष्ट शब्दों में हमें यह आदेश दिया है कि तुम धर्म के सम्बन्ध में उस के कारण को पहिचानो । केवल लोकचरित पर विश्वास मत करो । सुना सुनाया लोकवृत्त, किंवा लोकश्रद्धा धर्म में प्रमाण नहीं मानी जासकती । " इतर शास्त्रों की अपेक्षा वेद अपौरुषेय है " क्या केवल इस श्रद्धा पर ही वेद का महत्व बलम्बित है? क्या एकमात्र अपौरुषेयता ही वेद की मलौकिकता में प्रमाण है? यदि आप का यही विश्वास है तो हमें कहना पड़ेगा कि आप भूल कर रहे हैं । वेद में जिन लौ-किक तत्वों का निरूपण हुआ है, वेद जिन अपूर्व गुणों का घ्याविष्कारक है, वे वैदिकतत्व, किंवा
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प्रस्तावना || मान्यमूमिका कारणवाद गुण ही वेद की पौरुषेयता के सूचक हैं । अपनी इन लोकोत्तर वैज्ञानिक विभूतियों के कारण ही वेद ने अपौरुषेयता की उपाधि प्राप्त की है । दूसरे शब्दों में यों समझिए कि वेद अपौरुषेय है, इस-लिए वह च्यादरणीय, किंवा श्रद्धा का भाजन नहीं है, अतितुं वेद गहनतम विज्ञान का कोश है, इसलिए वह हमारा श्रद्धेय है, एवं इसीलिए वह अपौरुषेय कहलाया है । प्रमाण के लिए अवतार-बाद को अपने सामने रखिए । भगवान् कृष्ण ने प्रकृति के नियमानुसार कंस के कारागृह में देवकी के गर्भ से जन्म लिया । आगे जाकर इन्होंने लोकोत्तर गुणों का प्रदर्शन किया । इन्हीं विभूतियो के आधार पर विश्व ने उन्हें भगवान् का अवतार माना । कृष्ण ईश्वर के अवतार थे, इसलिए उन पर श्रद्धा नहीं की गई, अपितु उन्होंने लोकोत्तर ईश्वर सदृश विभूतियों का चमत्कार दिखाया, दुष्टों का दमन किया, गीता द्वारा ज्ञान - विज्ञान का प्रसार किया । इन गुणों के कारण वे हमारे आराध्य देव बनें, एवं इन्हीं गुणों से प्रभावित होकर हमनें उन्हें ईश्वर का साक्षात् पूर्णावतार माना । हमारी क्या कथा है, आरम्भ में कृष्ण की ईश्वरता में सन्देह करने वाले ब्रह्मा इन्द्रादि देवताओं ने भी कृष्ण की उन ईश्वरीय विभूतियों का साक्षात् करने के अनन्तर ही कृष्ण को अवतार माना था । बात वास्तव में यथार्थ है । यों तो सभी मनुष्य ( किंश पदार्थमात्र ) " ब्रह्मैवेदं सर्वम् " " ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः " इत्यादि श्रौतस्मात्तं सिद्धान्तों के अनुसार ईश्वर के अवतार हैं । परन्तु आप को, हम को कौन अवतार मानता है । यही अवस्था वेद के सम्बन्ध में समझिए । वैय्या-करणों के मतानुसार शब्द सर्वथा नित्य है, साथ ही में शब्दार्थ का सम्बन्ध भी अनादि है, जैसा कि आगे वेद प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । भारतीय ग्रन्थकारों ने नवीन कुछ नहीं बनाया है । अपितु नित्यसिद्ध ज्ञान को नित्यसिद्ध शब्दों द्वारा प्रकट किया है । ऐसी अवस्था में सभी शास्त्र तो अपौरुषेय मानें जासकते हैं । परन्तु ऐसा माना क्यों नहीं गया? क्यों एकमात्र वेदशास्त्र ही अपौरुषेय कहलाया? उत्तर वही आलोकिक विद्याभाव, किंवा गुणभाव है । सभी तो ईश्वर की सन्तानें हैं । फिर क्या कारण है कि उन में से कुछ को तो संसार महापुरुष कह कर उन की वन्दना करता है, कुछ के साथ सम्भाषण करने में भी अपनी मानहानि समझता है । इस महा पुरुषता का परिचायक विभूतिगुण नहीं है तो और क्या है । अभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुए । १६.
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ताना -21 भाष्यभूमिका ॥ॐ मिथ्या श्रद्धा थोड़ी देर के लिए यदि हम वेद को पौरुषेय भी मान लें, तब भी हमारी श्रद्धा में अन्तर नहीं -सकता । यह पौरुषेय होता हुआ भी जिन गूढ विद्याओं का विरूपण करता है, हमारी, हमारी ही नहीं विश्व की श्रद्धा का वह अवश्य ही प्रधान चालम्बन है । कुछ महानुभावों का कहना है कि यदि वेद को पौरुषेय ( ऋषिकृत ) मान लिया जायगा तो वेदज्ञान भ्रान्त बन जायगा । कारण मनुष्य बहुत सावधानी रखता हुआ भी भूल से नहीं बच सकता । हमारी दृष्टि में इस युक्ति का भी कोई मूल्य नहीं है, जैसा कि आगे विस्तार से बतलाया जाने वाला है । वेद पौरुषेय है, अथवा अपौरुषेय, थोड़ी देर के लिए इस झगड़े को सर्वथा दूर रखते हुए हम मान लेते हैं कि वेद हमारा परम श्रद्धेय शास्त्र है । जिस पर हमारी पूर्ण श्रद्धा है, उस की र्म मांसा ही न की जाय, उसे परीक्षा से सर्वथा पृथक् रक्खा जाय, यह कौन सी बुद्धिमानी है । मन पर हमारी पूर्ण श्रद्धा है, वह हमारी जीवन सत्ता का कारण है तो क्या अन्न की परीक्षा न की जाय । की जाय, और अवश्य की जाय । यदि परीक्षा करने मात्र से ही हमारी श्रद्धा का उच्छेद होजाता है तो अवश्य ही वह मिथ्या श्रद्धा है, एवं ऐसी स्थिति में उसे छोड़ देने में ही हमारा कल्याण है । यदि वह श्रद्धा परीक्षा करने पर खरी उतरती है तो वह और भी दृढमूल बन जाती है । पूर्ण परीक्षा करने के पश्चात् जिस सत्य श्रद्धा का आप के अन्तःकरण में उदय होगा, उस से आप को कितना आनन्द मिलेगा, यह अनुभवरसिक परीक्षक ही जान सकते हैं । इस परीक्षित श्रद्धा के बल पर न केवल अपने धर्म्मीनुयायियों की श्रद्धा को ही आप दृढ बनायेंगे, अपितु विध-र्मियों को भी आप की सत्यश्रद्धा का अनुगमन करना पड़ेगा । प्राचीन संस्कारों के वश आप अपने घर में वेदशास्त्र पर पूर्व श्रद्धा रखते हैं, साथ ही में, अपनी सीमा के भीतर ही आपने इसे अपौरुषेय भी मान रक्खा है । परन्तु परीक्षाशून्य, अतएव दृढ विश्वास विरहित अपनी इस कल्पित श्रद्धा के बल पर भाप उन व्यक्तियों की ( जो कि वेद को सारशून्य ग्रन्थ समझते हैं ) वेद पर न तो श्राप श्रद्धा ही उत्पन्न करा सकते हैं, एवं न वे आप के कथनमात्र से वेद को अपौरुषेय ही मान सकते हैं । आप को यह स्मरण रखना चाहिए कि केवल व्यक्तिगत विश्वास के बल पर ही धर्म्मरक्षा सर्वथा असम्भव है । किसी बलवान् सामाजिक के,
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प्रस्तावना •.॥ माष्यभूमिका मिथ्यावद्धा देने में आप असमर्थ रहेंगे तो जनसाधारण पर अथवा वैज्ञानिक के विरोध करने पर समुचित उत्तर है, यदि हम अपने धर्म की हमें अपने धर्म से प्रेम 9 अवश्य ही इस का बुरा प्रभाव पड़ेगा । यदि पर श्रद्धा उत्पन्न हृदय में भी धर्ममूलभूत वेदशास्त्र रक्षा चाहते हैं तो हमें उन तटस्थ व्यक्तियों के द्वारा वैदिक पदार्थों का श्राप युक्ति एवं तर्कसिद्ध परीक्षा कराळी पड़ेगी । यह तभी संभव है, जब कि रहेंगे, जब तक हमें यह तक हम परीक्षा से भय करते 9 सत्य स्वरूप उन के सामने रख देंगे । जब, तब तक न तो आप हमारी श्रद्धा विचलित होजायगी डर रहेगा कि यदि परीक्षा की जायगी तो ओर आकर्षित कर सकेंगे । सकेंगे, एवं न दूसरों को इस खयं इस वैदिक साहित्य से कुछ लाभ उठा हैं कि गुण - दोष दोनों हैं । हम यह भी मानते हम मानते हैं कि विश्व के प्रत्येक पदार्थ में एकमात्र इसी डर से पर आघात होता है । परन्तु क्या दोषमीमांसा को प्रधानता देने से लोकसंग्रह से हम केवल दोषों को ही दिया जाय? क्या परीक्षा करने परीक्षा का द्वार सदा के लिए बंद कर नहीं है? हमारा तो की कसोटी गुणों की जननी फलस्वरूप अपने सामने देखते हैं? क्या परीक्षा भी अधिक दृढ बन जाती है । क्या पदार्थ की सत्यता और यह विश्वास है कि परीक्षा करने से उस विद्वानों ने ( जो कि कुछ कृपा से ही आज उन पश्चिमी आप को यह पता नहीं है कि परीक्षा की करते थे ) वेद को विश्व क. कह कर उस का उपहास शताब्दियों पहिले वेद को केवल ग्राम्यगीत जाचुका है । निवेदन में विस्तार से बतलाया सर्वोच्च साहित्य मान लिया है, जैसा कि प्रारम्भिक प्रथा की में अनादिकाल से प्रचलित शवदाह यह परीक्षा का ही फल है कि हिन्दूजाति करली है । यह की उपादेयता मुक्तकण्ठ से स्वीकार निन्दा करने वाली जातियों ने स्वयं इस प्रथा गङ्गातोय को सर्वोत्कृष्ट विद्वान् इतर जलों की अपेक्षा परीक्षा की ही महिमा है कि आज पश्चिमी प्रकोप को शान्त करने के लिए जानते होंगे कि माता के मानने लगे हैं । पाठक शायद यह नहीं ने इस प्रथा को दूषित प्रथा प्रचलित थी । विरोधियों विहारप्रान्त में चिरकाल से टीका लगाने की । इस परीक्षा का परिणाम किया, एवं परीक्षा आरम्भ की समझते हुए बलात्कार से उस का प्रतिषेध । बलपूर्वक राजशासन द्वारा टीके में टीका प्रथा प्रचलित है यह हुआ कि आज भारतवर्ष के घर घर परीक्षा आरम्भ की । का नियन्त्रण करते हुए लगाए जाते हैं । आरम्भ में विदेशियों ने कीमियागीरों १५
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प्रस्तावना • | माध्यभूमिका श्रद्धात्रय परिणाम यह हुआ है कि इसी परीक्षा के आधार पर उस अपूर्व केमेस्ट्री ( Kamistry ) विज्ञान का च्याविष्कार हुआ, जिस की तूती आज सम्पूर्ण भूमण्डल में बोल रही है । यह परीक्षा का ही चम-स्कार था, जिस के बल पर अत्रिमहर्षि ने सर्वप्रथम प्रहरणविज्ञान विश्व के सामने रक्खा । यह परीक्षा की ही कृपा थी, जिस से सुप्रसिद्ध यज्ञविद्या का व्याविष्कार हुआ । क्या इन सब परिस्थितियों को देखते हुए हम यह कहने का व्यर्थ साहस कर सकते हैं कि परीक्षा से श्रद्धा का विनाश होजाता है, लोकसंग्रह बिगड़ जाता है । परीक्ष्य पदार्थ यदि सत्य है तो परीक्षा उस की सत्यता में चार चांद लगा देगी । यदि सत्यांश नहीं है तो वही परीक्षा हमें मिध्यादोष से बचा लेगी । ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि जो महानुभाव बेद के पौरुषेयत्व अपौरुषेयत्व पर विचार करने से हमें रोकते हैं, चे सचमुच वेद की अपौरुषेयता में सन्देह करते हैं । फलतः उन की यह श्रद्धा मिध्याश्रद्धा है, दूसरे शब्दों में श्रद्धा की आड़ में घोरतम श्रद्धा है । त्रैगुण्यविज्ञान के अनुसार हम श्रद्धातत्व को सात्विकी, राजसी, तामसी इन तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं । साधारण दोषों के रहते हुए भी बलवान्, एवं संख्या में अधिक गुणों की सत्ता के कारण सत्यता को लिए हुए जो श्रद्धा होती है, वही सात्विकी श्रद्धा है । जहां दोष दोष न माने जाते हों, अथवा दोष गुणरूप से दिखलाई देते हों, वह दूसरी राज-सी श्रद्धा है । राजसी श्रद्धा में दोष दोषरूप से हमारे सामने नहीं आते, अपितु हम उन्हें गुण ही समझने लगते हैं । तीसरी तामसी श्रद्धा बड़ी भयानक है । हम समझ रहे हैं कि अमुक व्यक्ति में प्रमुक दोष विद्यमान हैं । परन्तु हम समझते हुए भी उन्हें छिपाने की चेष्टा कर रहे हैं, मन में ग्लानि है परन्तु लोकप्रतिष्ठा के दबाव से बनावटी श्रद्धा दिखला रहे हैं, यही तामसी श्रद्धा है । इस के अनुयायी ही अपनी बनावटी श्रद्धा के नाश के भय से सत्यासत्य परीक्षा का विरोध किया करते हैं । सचमुच यह श्रद्धा के स्वरूप को कलङ्कित करने वाली मिथ्या श्रद्धा है । यह तामसी श्रद्धा नाना-रूप धारण कर हमारे सामने आती रहती है, एवं हमारी वञ्चना करती हुई हमें सत्यमार्ग से व्युत किया करती है । किसी वस्तु के कारण विशेष को समझे बिना ही जो उस पर हमारी श्रद्धा होजाती है, वह १६