Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 301–310

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 301 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना || माध्यभूमिका । मिथ्या श्रद्धा पर अथवा वैज्ञानिक के विरोध करने पर समुचित उत्तर देने में आप असमर्थ रहेंगे तो जनसाधारण , यदि हम अपने धर्म की अवश्य ही इस का बुरा प्रभाव पड़ेगा । यदि हमें अपने धर्म से प्रेम है उन तटस्थ व्यक्तियों के हृदय भी धर्ममूलभूत वेदशास्त्र पर श्रद्धा उत्पन्न रक्षा चाहते हैं तो हमें वैदिक पदार्थों का करा?? पड़ेगी । यह तभी संभव है, जब कि श्राप युक्ति एवं तर्कसिद्ध परीक्षा द्वारा रहेंगे, जब तक हमें यह सत्य स्वरूप उन के सामने रख देंगे । जब तक हम परीक्षा से भय करते तक न तो आर डर रहेगा कि यदि परीक्षा की जायगी तो हमारी श्रद्धा विचलित होजायगी, तब को इस ओर आकर्षित कर सकेंगे । खयं इस वैदिक साहित्य से कुछ लाभ उठा सकेंगे, एवं न दूसरों यह भी मानते हैं कि हम मानते हैं कि विश्व के प्रत्येक पदार्थ में गुण - दोष दोनों हैं । हम इसी डर से दोषमीमांसा को प्रधानता देने से लोकसंग्रह पर आघात होता है । परन्तु क्या एकमात्र करने से हम केवल दोषों को ही परीक्षा का द्वार सदा के लिए बंद कर दिया जाय? क्या परीक्षा कसोटी गुणों की जननी नहीं है? हमारा तो फलस्वरूप अपने सामने देखते हैं? क्या परीक्षा की दृढ बन जाती है । क्या यह विश्वास है कि परीक्षा करने से उस पदार्थ की सत्यता और भी अधिक विद्वानों ने ( जो कि कुछ आप को यह पता नहीं है कि परीक्षा की कृपा से ही आज उन पश्चिमी थे ) वेद को विश्व का शताब्दियों पहिले वेद को केवल ग्राम्यगीत कह कर उस का उपहास करते जाचुका है । सर्वोच्च साहित्य मान लिया है, जैसा कि प्रारम्भिक निवेदन में विस्तार से बतलाया शवदाह प्रथा की यह परीक्षा का ही फल है कि हिन्दूजाति में अनादिकाल से प्रचलित से स्वीकार करली है । यह निन्दा करने वाली जातियों ने स्वयं इस प्रथा की उपादेयता मुक्तकण्ठ गङ्गातोय को सर्वोत्कृष्ट परीक्षा की ही महिमा है कि आज पश्चिमी विद्वान् इतर जलों की अपेक्षा को शान्त करने के लिए मानने लगे हैं 1 । पाठक शायद यह नहीं जानते होंगे कि माता के प्रकोप इस प्रथा को दूषित बिहारप्रान्त में चिरकाल से टीका लगाने की प्रथा प्रचलित थी । विरोधियों ने की । इस परीक्षा का परिणाम समझते हुए बलात्कार से उस का प्रतिषेध किया, एवं परीक्षा आरम्भ राजशासन द्वारा टीके यह हुआ कि श्याज भारतवर्ष के घर घर में टीका प्रथा प्रचलित है । बलपूर्वक हुए परीक्षा आरम्भ की । लगाए जाते हैं । आरम्भ में विदेशियों ने कीमियागीरों का नियन्त्रण करते १८

पृष्ठ 302

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 302 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना .. माध्य भूमिका श्रद्धात्रयी परिणाम यह हुआ है कि इसी परीक्षा के आधार पर उस अपूर्व केमेस्ट्री ( Kamistry ) विज्ञान का प्राविष्कार हुआ, जिस की तूती आज सम्पूर्ण भूमण्डल में बोल रही है । यह परीक्षा का ही चम-स्कार था, जिस के बल पर अत्रिमहर्षि ने सर्वप्रथम ग्रहणविज्ञान विश्व के सामने रक्खा । यह परीक्षा की ही कृपा थी, जिस से सुप्रसिद्ध यज्ञविद्या का आविष्कार हुआ । क्या इन सब परिस्थितियों को देखते हुए हम यह कहने का व्यर्थं साहस कर सकते हैं कि परीक्षा से श्रद्धा का विनाश होजाता है, लोकसंग्रह बिगड़ जाता है । परीक्ष्य पदार्थ यदि सत्य है तो परीक्षा उस की सत्यता में चार चांद लगा देगी । यदि सत्यांश नहीं है तो वही परीक्षा हमें मिथ्यादोष से बचा लेगी । ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि जो महानुभाव वेद के पौरुषेयत्व अपौरुषेयत्व पर विचार करने से हमें रोकते हैं, चे सचमुच वेद की अपौरुषेयता में सन्देह करते हैं । फलतः उन की यह श्रद्धा मिध्याश्रद्धा है, दूसरे शब्दों में श्रद्धा की भाड़ में घोरतम श्रद्धा है । त्रैगुण्यविज्ञान के अनुसार हम श्रद्धातत्व को सात्विकी, राजसी, तामसी इन तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं । साधारण दोषों के रहते हुए भी बलवान्, एवं संख्या में अधिक गुणों की सत्ता के कारण सत्यता को लिए हुए जो श्रद्धा होती है, वही सात्विकी श्रद्धा है । जहां दोष दोष न माने जाते हों, अथवा दोष गुणरूप से दिखलाई देते हों, वह दूसरी राज-सी श्रद्धा है । राजसी श्रद्धा में दोष दोषरूप से हमारे सामने नहीं श्राते, अपितु हम उन्हें गुण ही समझने लगते हैं 1 । तीसरी तामसी श्रद्धा बड़ी भयानक है । हम समझ रहे हैं कि अमुक व्यक्ति में प्रमुक दोष विद्यमान हैं । परन्तु हम समझते हुए भी उन्हें छिपाने की चेष्टा कर रहे हैं, मन में ग्लानि है परन्तु लोकप्रतिष्ठा के दबाव से बनावटी श्रद्धा दिखला रहे हैं, यही तामसी श्रद्धा है । इस के अनुयायी ही अपनी बनावटी श्रद्धा के नाश के भय से सत्यासत्य परीक्षा का विरोध किया करते हैं । सचमुच यह श्रद्धा के स्वरूप को कलङ्कित करने वाली मिध्या श्रद्धा है 1 । यह तामसी श्रद्धा नाना-रूप धारण कर हमारे सामने आती रहती है, एवं हमारी वञ्चना करती हुई हमें सत्यमार्ग से व्युत किया करती है । किसी वस्तु के कारण विशेष को समझे बिना ही जो उस पर हमारी श्रद्धा होजाती है, वह १६

पृष्ठ 303

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 303 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना ॥ भाष्यभूमिका श्रद्धात्रयी भी एक प्रकार की तामसी श्रद्धा ही कही जायगी । उदाहरण के लिए गङ्गा की धारा में सर्वसाधारण की पूर्ण श्रद्धा देखी जाती है । गङ्गा को श्रद्धालु लोग पूज्यदृष्टि से देखते हैं । क्या इस सम्बन्ध में हम यह प्रश्न नहीं कर सकते कि गंगा के पानी में हमारी ऐसी उत्कट श्रद्धा क्यों होगई? अन्य नदियों की अपेक्षा गङ्गा के जल में ही ऐसा क्या अलौकिक गुण है, जिससे हम उसे " ब्रह्मद्रवी " ( पिघला हुआ ब्रह्म ) कहने लग गये । आप कहेंगे, शास्त्रां ने ऐसा ही लिखा है, ऐसा ही माना है । शास्त्रो-प्रदेश से ही हम गङ्गा पर श्रद्धा करने लगे हैं । तो क्या शास्त्रकारों से उक्त प्रश्न नहीं किया जा-सकता? शास्त्रकारों नें इस में ऐसी कौन सी अलौकिकता देखो, जिस से वे इसे साक्षात् ब्रह्म का तरूप कहने लग गये । विश्व की परिक्रमा लगाने वाले, विदेशियों के ( कल्पित ) मतानुसार आदि-काल में सुमेरू की उपत्यकाओं में अपना आवासस्थान बनाने वाले उन श्रद्धय महर्षियों को क्या यह मालूम न था कि हिमालय से गल गल कर बहने वाला तुषार जल ही गङ्गा है? क्या उन्हें यह विदित न था कि ब्रह्म एक निराकार आत्मतत्व है । उस में त्रिकाल में भी कोई विकार नहीं होस-कता । फिर उन्होंने हठात् यह कैसे वह डाला कि ब्रह्म ही पिघल कर गंगाजल रूप में परिणत - हुआ है? गंगास्नान से बड़े बड़े अघ क्षणमात्र में नष्ट होजाते हैं, उन्होंने यह किस आधार पर कह डाला । इस प्रकार हमारे धार्मिक विश्वासों के प्रति उक्तरूप से नास्तिकों का तर्कजाल जब हमारे सामने आता है तो हमारे चित्त में एक प्रकार का होभ उत्पन्न हो जाता है । हम नहीं जानते कि गंगा वह गुण कौन सा है, जिस के आधार पर ऋषियों ने उस पर हमारी श्रद्धा उत्पन्न क दी । साथ ही में हम उन महामहर्षियों की वाणी पर भी अविश्वास नहीं कर सकते, जिन्होंने लोककल्याण के लिए ही अपना सारा जीवन व्यतीत कर दिया था । जिन महर्षियों ने अपने अन न्तकाल की तपश्चर्या से दिव्यदृष्टिद्वारा आत्म - परमात्म जैसे सुसूक्ष्म तत्वों का साक्षात् कार किया था, जिन ऋषियों की दिव्यवाणी आज भी हमें मन्त्रमुग्ध बना रही है, जिन ऋषियों की सत्य निष्ठा से सम्पूर्ण विश्व का मानव समाज चकित होरहा है, उन ऋषियों के " तुम गंगा को पापनाशिनी समझो, यह साक्षात् द्रुत ब्रह्म है " इस आदेश पर भी हम अविश्वास नहीं कर सकते । इस २०

पृष्ठ 304

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 304 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना ॥ भाष्यभूमिका 11 तामसी श्रद्धा प्रकार एक ओर ऋषियों को वाणी पर दृढ विश्वास, दूसरी ओर नास्तिकों का तर्कजाल । बतलाइए ऐसी परिस्थिति में क्या किया जाय । यदि त्रिना रहस्यज्ञान के यों ही श्रद्धा करते जाते हैं तो नास्तिक लोग और भी अधिक आक्रमण करने लगते हैं । भोली जनता में इन की घोर से यह विषम वातावरण उत्पन्न किया जाता है कि यह तो सनातनधर्मियों का केवल ढकोसला है । भला कहीं पानी में स्नान करने से भी पापों का क्षय हुआ है । यदि ऐसा हो, तब तो गंगा में रहने वाली सब मछलियों को सीधे परामुक्तिधाम में पहुंच जाना चाहिए । भला कौन बुद्धिमान ऐसी मिथ्या कल्प-नाओं पर विश्वास करेगा । कहना नहीं होगा कि ऐसे प्रचारों से आज दृढ श्रद्धालु भी धीरे धीरे श्रद्धा से च्युत होते जारहे हैं । इसी आधार पर क्या हम यह नहीं कह सकते कि बिना रहस्यज्ञान के केवल शब्द प्रमाण के आधार पर जो श्रद्धा उत्पन्न होती है, वह एक प्रकार से तामसी श्रद्धा ही है । यह ठीक है कि सर्वसाधारण अध्ययन द्वारा इन रहस्यों को नहीं जान सकते । परन्तु देश में ऐसे रहस्य वेत्ता विद्वानों का होना परम आवश्यक है, जो कथाद्वारा, व्याख्यानद्वारा, शिक्षा पद्धति के द्वारा, सामयिक भाषामय ग्रन्थ प्रचारद्वारा, उन रहस्यों से जनता को परिचित कराते हुए नास्तिकों के तर्कवाद का समूलविनाश करने के लिए सर्वदा कटिबद्ध रहैं । आज कोमल श्रद्ध, एवं इने गिने शास्त्रग्राही बिद्वान् भी इन रहस्यों से अपरिचित हैं । दुर्भाग्य से इन्हीं के हाथ में आज धर्म की बागडोर है । इस का क्या परिणाम होरहा है? किस प्रकार जनसाधारण धर्मश्रद्धा से विमुख होता जारहा है? किस जघन्यता के साथ बर्बरलोग धर्म्म पर एवं तत् प्रवर्तक ऋषियों की विमल कीर्त्ति पर आक्रमण कर रहे हैं, यह सब प्रकट है । नास्तिक वर्ग को थोड़ी देर के लिए छोड दीजिए, श्रास्तिक वर्ग का ही विचार कीजिए । संदेह होना मनुष्य का एक सहजसिद्ध धर्म है । “ ऐसा क्यों करें? ऐसा न करनें से क्या हानि है? शास्त्रों में अमुक तत्व को इतना महत्व क्यों दिया "? यह जिज्ञासा खाभाविकी है । जिज्ञासु नों की ओरसे धार्मिक आदेशों के प्रति जब क्यों? का प्रश्न उठाया जाता है तो हमारे कोमल श्रद्ध, एवं शास्त्रग्राही विद्वान् संतोषप्रद समाधान करने के स्थान में उस जिज्ञासु के प्रति क्रोध प्रकट करने लगते हैं, उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगते हैं । क्या यह उचित है? क्या इसी का नाम सभ्यता २१

पृष्ठ 305

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 305 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना - भाप्यभूमिका L.C तामसोद्धा रहस्यानमिज्ञ है? हमें यह कह लेने दीजिये कि पश्चिमी शिक्षा ने नास्तिकवाद नहीं फैलाया है, अपितु पश्चिमी शिक्षा के हमारे देश के विद्वान् ही इस नास्तिक भाव के मूल कारण हैं । विज्ञानप्रधाना संसर्ग से जिज्ञासा को प्रोत्साहन अधिक मिल रहा है, उधर विद्वान् समाधान करने के स्थान में विद्वानों की कृपा जिज्ञासुखों का तिरस्कार करने में ही अपनी विद्वत्ता की रक्षा समझ रहे हैं । इन्हीं रही है । से विज्ञानप्रधान वेदशास्त्र भारतीय नवयुवकों की दृष्टि में सर्वथा व्यर्थ की वस्तु वन धर्मादेश आज संदेह केवल गंगा ही क्या, श्राद्ध, अवतार, मूर्तिपूजन, संस्कार आदि सभी आप कब तक के स्थल बन रहे हैं । तामसी श्रद्धा के अनुयायी उन विद्वानों से हम पूंछते हैं कि में हमें उक्त इस मिथ्या श्रद्धा के बल पर अपने गन्धर्व नगर की रक्षा कर सकेंगे । अस्तु प्रकृतस्थल श्रद्धा उत्पन्न पङ्क्तियों से केवल यही कहना है कि रहस्यज्ञानात्मक मूल कारण को बिना जाने जो होजाती है, वह परिणाम में घातक बनती हुई एक प्रकार की तामसी श्रद्धा ही है । आशय तामसी श्रद्धा का एक यह भी रूप है कि ऋषियों ने कहा कुछ और है, उस का गई है । इस श्रद्धा के मूल में ओर ही कुछ समझ कर, उस स्वाभिमत आशय पर श्रद्धा करली लिया है । उसी का जन-अज्ञान है । शास्त्राध्ययन की कमी से हमनें ऋषि के आदेश को उलटा समझ बन गया है कि साधारण में प्रचार होगया है । अब वही मिथ्या विषय इस प्रकार श्रद्धा का विषय श्रद्धा अवश्य उस के विरुद्ध बोलना भाज नास्तिकता मानी जाने लगी है । सचमुच ऐसी विपरीत में ऋषि ने कहा ही तामसी श्रद्धा है । उदाहरण के लिए गया श्राद्ध को ही लीजिए । इस सम्बन्ध सर्वथा है कि " गयाश्राद्ध करन से प्रेतात्मा की मुक्ति होजाती है " । अवश्य ही यह आदेश उक्त आदेश का यह सत्य है । परन्तु श्रात्मविद्या से सर्वथा शून्य गया स्थान के कुल पुरोहितों ने करने की कोई तात्पर्य समझा है कि गया श्राद्ध करने के पश्चात् पार्वणश्राद्ध एवं वार्षिक श्राद्ध का यह विश्वास होगया है कि आवश्यकता नहीं रहती । इन के इस मिथ्या प्रचार से जनसाधारण । इन अन्धश्रद्धा-गया श्राद्ध करने के पश्चात् वार्षिक श्राद्धादि करने की कोई आवश्यकता नहीं है एवं पार्वण-लुओं को यह पता नहीं है कि गयाश्राद्ध किसी अन्य आत्मा के लिए किया जाता है, से प्रसिद्ध प्रेतात्मा वार्षिक श्राद्ध अन्य आरमा की तृप्ति का कारण है । गयाश्राद्ध से हंसात्मा नाम २२

पृष्ठ 306

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 306 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना ॐ भाष्यभूमिका ॥ तामसी श्रद्धा! की मुक्ति होती है, एवं पार्वण वार्षिक श्राद्ध से महानामा नाम से प्रसिद्ध प्रेतात्मा की तृप्ति होती है । * दोनों कर्म्म सर्वथा विभक्त हैं । परन्तु आज यह कहना अशास्त्रीय माना जारहा है । दूसरा उदाहरण वायु है । बाह्य एवं प्राभ्यन्तर भेद से वायु की दो अवस्थाएं मान गईं हैं । जिस वायु का स्वगिन्द्रिय से सर्शरूप प्रत्यक्ष होता है, जिस वायु के प्राघात से वृक्षादि कम्पित होते रहते हैं, जिस वायु से मेघखण्डों का इतस्ततः संचार होता है, जो वायु पुरोवात ( पुरवाई -पूर्वे की हवा ) रूप धारण कर पर्जन्य की सहायता से वृष्टि का कारण बनता है, वह बाह्य वायु है । इसी को सङ्केत भाषानुसार " वात " कहा गया है । दूसरा आभ्यन्तरवायु सूक्ष्म है, प्राणात्मक है । इसी प्राणवायु के आघात से श्वास - प्रश्वास का संचार होता है । उठना बैठना-चलना - फिरना - जंभाई लेना - उबासी थाना आदि शरीर की जितनीं भी चेष्टाएं हैं, उन सब की व्याधारभूमि यह प्राणवायु ही है । भगवान् कणादने इन दोनों वायुओं की पूर्ण परीक्षा की है । बाह्य वायु की परीक्षा समाप्त करने के अनन्तर श्राभ्यन्तर प्राणवायु की प्रामाणिकता सिद्ध करते हुए आचार्य कहते हैं— - " संज्ञाकम् त्वस्मद्विशिष्टानां लिङ्गमू " -- - " प्रत्यक्ष प्रवृत्तत्वात् संज्ञाकर्म्मणः " ( वै ० दर्शन २०११-२०१८-१६० ) इन सूत्रों का मीमांसा सम्मत तात्पर्य यही है कि - " प्रत्यक्षदृष्ट चेष्टाएं हीं आभ्यन्तर प्राणवायुओं को मानने में मुख्य कारण है । क्यों कि हम अपनी शारीर चेष्टाओं को प्रत्यक्ष में होते देख रहे हैं " । इसी शास्त्र सिद्ध अर्थ को लक्ष्य में रख कर आयुर्वेद ने भी चेष्टा-द्वारा प्राणवायु की सत्ता का ही अनुमान लगाया है, जैसा कि निम्न लिखित वचन से स्पष्ट हो-जाता है-" सर्वादिचेष्टा वातेन स माणः प्राणिनां स्मृतः ” ( सूत्रस्थान १७० | १३२ श्लो ० ) । परन्तु उक्त तामसी श्रद्धा की कृपा से आगे जाकर कैसा अर्थ का अनर्थ हुआ है, यह भी देखिए । यस विषयका विशद विवेचन श्राद्धविज्ञान में देखना चाहिए । २३

पृष्ठ 307

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 307 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना .. ॥ माध्य भूमिका ॥--तामसी श्रद्धा " संस्कृतभाषा में तत्तत् पदार्थों के घठ पट अ.दि जो संस्कृत नाम उपलब्ध होते हैं, उन्हीं से परमेश्वर की सिद्धि होती है । यह नाम ही परमेश्वर की सत्ता में प्रमाण हैं । क्योंकि ( हम तो इन नामों के रखने वाले हैं नहीं, एवं नाम उपलब्ध होते हैं फलतः ) इन नामों का कर्जा ईश्वर से अतिरिक्त और कोई नहीं होसकता । जब कि ईश्वर द्वारा रक्खे हुए सभी नाम संस्कृत भाषा में हैं, ( अन्य भाषाओं में नहीं ) तो यह सिद्ध होजाता है कि अर्थ समझने की शक्ति इन ( ईश्वरप्रणीत ) संस्कृत शब्दों में ही है, इतर भाषाशब्दों में नहीं । इतर भाषाओं में अर्थबोध कराने की शक्ति न रहने पर भी शक्तिभ्रम से लोग उन का अर्थ समझ लेते हैं " । इस प्रकार सहज सिद्ध वायुप्रकरण का गला घोंट कर व्याख्याताच्चों ने दोनों सूत्रों की उक्त व्याख्या करते हुए इन से ईश्वर सिद्धि की है । क्या ईश्वर सिद्धि के लिए अन्य साधन न थे? क्या संकेतमात्र से ईश्वर सिद्ध होगया? क्या इस विपरीत श्रद्धा को हम तामसी श्रद्धा नहीं कह सकते? इसी तामसी श्रद्धा का एक विवर्त्त और है । ऋषियों ने कोई बात अन्य अभिप्राय से कही है, परन्तु साधारण मनुष्यों में ऋषियों की उक्ति का ओर ही अभिप्राय समझ लिया हो, ऐसा भी देखा गया है । शब्द वहीं हों, अर्थ दूसरा लगा दिया हो - यह पूर्व की तामसी श्रद्धा थी । शब्द, वही हों, अभिप्राय उन का कुछ ओर हो, अभिप्राय समझ लिया गया हो कुछ ओर का ओर ही, यह प्रकृत की तामसी श्रद्धा है, जैसा कि निम्न लिखित उदाहरण से स्पष्ट होजायगा । वेद को ऋषियों ने अपौरुषेय कहा है, यह बात निर्विवाद है । इसी आधार पर जन-साधारण ने वेद की अपौरुषेयता पर श्रद्धा की है । वेद को अपौरुषेय मानना युक्ति सिद्ध है, तर्क-सिद्ध है, प्रमाणसिद्ध है, ऋषिसम्मत है । साथ ही में विश्व का कोई भी विचारशील विद्वान् परीक्षा करने के अनन्तर वेदतत्व के इस अपौरुषेयत्व का प्रतिवाद भी नही कर सकता । किसी भी प्रमाण, युक्ति, तर्क, परीक्षा से वेद का पौरुषेयत्व सिद्ध नहीं होता । साथ ही में वेद की अपौरुषेयता सिद्ध करने वाले प्रमाण परीक्षादि का मागे वेद प्रकरण में हम विस्तार से दिग्दर्शन भी कराने वाले हैं । २४

पृष्ठ 308

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 308 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना || भाष्यभूमिको ७०-यह सब कुछ मानते हुए भी हम यह कहने में कोई आपत्ति नहीं समझते कि सकल साधारण वेद की पौरुपेयता का जैसा स्वरूप समझ रक्खा है, अथवा " वेद अपौरूषेय है " इस आदेश वाक्य का ( वेदतत्व का स्वरूप न समझते हुए अपौरुषेयता का ) जो अभिप्राय मान रक्खा है, वह नितान्त अशुद्ध है । दूसरे शब्दों में वेद की अपौरुषेयता पर जो जनसाधारण की एक श्रद्धा देखी जाती है, वह निरी तामसी श्रद्धा ही है । आरम्भ में हमारे ऊपर जो यह आक्षेप लगाया गया था कि यदि तुम इस प्रश्न की मीमांसा करोगे तो लोकसंग्रह बिगड़ जायगा । इसी आक्षेप के प्रत्युत्तर के लिए तामसी श्रद्धा का स्वरूप पाठकों के समक्ष उपस्थित करना पड़ा । हम भी लोकसंग्रह के पक्षपाती हैं । परन्तु लोक-संग्रह की आड़ में जब हमारी मौलिकता नष्ट होरही है, जब मिथ्या श्रद्धा के नाते स्वार्थी लोग स्वार्थ सिद्धि में प्रवृत्त हो रहे हैं, धर्म की दुहाई देकर कतिपय नरराक्षस धर्म के नाम पर जब अधर्म का प्रचार कर रहे हैं तो ऐसी व्यवस्था में वह लोकसंग्रह हमारा क्या हित साधन कर सकता है । लोक कैसे हैं, उन का संग्रह कैसा भयावह है, क्या आप यह विचार करेंगे । कुछ कुचक्री / स्वार्थसिद्धि के लिए अपना एक गिरोह बना कर धर्म्म - शास्त्र - ईश्वर के नाम पर मन माना अत्याचार करते रहैं ।-इन अत्याचारियों के ताण्डव नृत्य से सनातन संस्कृति का मूलोच्छेद होता रहै, और फिर भी हम इस लुटेरी सम्प्रदाय को लोकसंग्रह जैसे पवित्र शब्द की उपाधि से विभूषित किए रहैं । असंभव कदापि नहीं । यदि इस नाशक पद्धति का ही नाम लोकसंग्रह है तो हम जल्दी से जल्दी इस का विनाश देखना चाहते हैं । एक बार लोकसंग्रह बिगड़ जाय, तब भी कोई चिन्ता नहीं । फिर नया संगठन होगा, फिर से धर्म का संस्कार होगा । लोग अपनी चिलुप्त प्राय संस्कृति का वास्तविक महत्व फिर से समझेंगे । सम्माननीय बन्धुओ! आज तामसी श्रद्धा ने हमारे वास्तविक स्वरूप को आवृत कर रक्खा है । इस श्रद्धा से क्या क्या अनर्थ हुए, होरहे, एवं होंगे, यह एक गम्भीर एवं विचारणीय विषय है । हम अन्य धम्मों की समालोचना करते रहैं, इस से पहिले हमें अपने घर की सफाई करनी होगी । हमें अपने धार्मिक विश्वासों को परीक्षा की कसोटी पर कसना होगा । हम जिस मार्ग पर श्रद्धा से चलते हैं, २५

पृष्ठ 309

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 309 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रस्तावना - भाष्यभूमिका ॥ मिथ्या श्रद्धा उस के सत्यासत्य का निर्णय करना होगा । परीक्षा द्वारा हमें यह देखना होगा कि हमारी श्रद्धा सत्य है, अथवा मिथ्या । यदि इस परीक्षा से हमारी श्रद्धा को विजयश्री मिली तो हमारा विश्वास ओर भी अधिक दृढमूल बन जायगा । इस परीक्षा में यदि हम किसी अंश में अनुत्तीर्ण होगए तो बिना अभिनिवेश के हमें वह अंश बाहर निकाल फेंकना पड़ेगा । हमें तो यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान युग में सनातनधर्म में कितनीं हीं असत्य श्रद्धाओं का समावेश होगया है । तभी तो अहोरात्र धर्म - धर्म - चिल्लाते हुए भी हम अवनति की ओर अग्रसर होरहे हैं । यदि ध " यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्म्मः " यह लक्षण है, यदि धर्म के सम्बन्ध में-" धम्र्मो रक्षति रक्षितः ” इस सिद्धान्त में कुछ भी सचाई है तो फिर क्यों हम धर्म की उपासना करते हुए भी गिरते जारहे हैं? अवश्य ही उस कारण का अन्वेषण करना पड़ेगा । उस का प्रधान साधन होगा विज्ञानदृष्टि से धामिकतत्त्वों का परीक्षण । इसी सदुद्देश्य को सामने रखते हुए आज हम अपने वेदशास्त्र की अपौरुषेयता- पौरुषेयता का विचार करने के लिए सन्नद्ध हुए हैं । हमें विश्वास है कि यह मीमांसा हमें तामसी श्रद्धा से निकालती हुई अवश्य ही अभ्युदय निःश्रेयसमूला सात्विकी श्रद्धा की ओर हमारे अन्तःकरणों को प्रवृत्त करेगी । का-.. "

पृष्ठ 310

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 310 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विषयप्रवेश रोत प्रिया इव हि देवाः, प्रत्यक्षद्विषः ” ( शत ० १४ । ६।११।२ ) इस श्रौत सिद्धा-" त के अनुसार प्रत्येक पदार्थ की स्थिति वास्तव में होती कुछ ओर ही है, एवं दीखती कुछ ओर ही है । यह न्याय वेद की इस अपौरुषेयता के सम्बन्ध में भी चरितार्थ होरहा है । प्रकरण के आरम्भ में उद्धृत वेद के चारों भाग सर्वथा अपौरुषेय हैं । जिस प्रकार पुराण, न्याय, पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा, योग, वैशेषिक, सांख्य, वेदाङ्ग, स्मृति, धर्म्मसूत्र आदि ग्रन्थ व्यास - गोतम - जैमिनि - व्यास - पतञ्जलि -कणाद - कपिल - पाणिनि - यास्क - मनु - याज्ञवल्क्य - वसिष्ठ - भरद्वाज आदि महापुरुषों द्वारा बनाए जाने के कारण ( पुरुषों से विरचित होने के कारण ) पौरुषेय नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार संहिता. ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषत् भेद से चार भागों में विभक्त वेदशास्त्र को किसी भी पुरुषविशेष ने नहीं बनाया है । वेद के बनाने वाले का नाम सर्वथा अज्ञात है । इसी आधार पर हम वेद को नित्य एवं अपौरुषेय मानने के लिए तय्यार हैं । यदि आप प्रश्न करें कि जिस प्रकार पुरुषों के बनाए हुए पुराण न्यायादि शास्त्रों में बुद्धिपूर्वक वाक्य रचना हुई है, तथैव वेद में भी हमें वाक्यरचना का सन्निवेश बुद्धिपूर्वक ही उप-लब्ध होता है । साथ ही में अन्य शास्त्रों के अनुसार वेद में भी बनाने वाले भृगु वसिष्ठ - शङ्गिरा-अत्रि- मरीचि आदि ऋषियों का नामोल्लेख देखते हैं । इस प्रकार इतर पौरुषेय शास्त्रों की तरंह समान धर्म रखने वाला यह वेद भी क्यों नहीं पौरुषेय ही मान लिया जाय । यह बात केसे मानी जासकती है कि एक लम्बा चौड़ा ग्रन्थ अपने आप बन कर हमारे सामने उपस्थित होगया । यदि पुरुषरचनानुकल सारे धर्मों के रहते हुए भी इसे अपौरुषेय माना जाता है, तो फिर अन्य पौरुषेय शास्त्रों नें क्या अपराध किया है? क्यों नहीं उन्हें भी अपौरुषेय मान लिया जाय? स्वागतम्!!! इन प्रश्नों की परीक्षा करने के लिए ही तो हम प्रवृत्त हुए हैं । प्रश्न करना उचित है, परन्तु वह प्रश्न कहीं प्रश्न की अपेक्षा न रखता हो । दूसरे शब्दों में यों कहिए कि प्रश्न करना बुरा नहीं है, परन्तु उस प्रश्न में प्रश्न की जिज्ञासा को अव-