Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 311–320

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 311–320

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विषयप्रवेश ॥ भाष्यभूमिका ॥०-दोषदर्शन काश नहीं मिलना चाहिए । अर्थात् हमारा प्रश्न ऐसा होना चाहिए कि फिर उस प्रश्न के प्रश्नत्व पर किसी प्रकार के आघात होने की संभावना ही न रहै । " भूल देखना भूल नहीं है, किन्तु भूल देखने में भूल नहीं होनी चाहिए " इस सिद्धान्त को सामने रखते हुए ही हमें किसी विषय के विचार में प्रवृत्त होना चाहिए । केवल जड़वाद को उत्तेजना देने वाली पश्चिमी शिक्षा के संसर्ग से आज हमारे भारतीय नवयुवकों के, तत् शिक्षकों के, एवं शिक्षाप्रवर्तक पश्चिमी विद्वानों के बौद्ध जगत् में स्थिरता लक्षण विचार परामर्श का प्रायः अभाव ही देखा जाता है । किसी भी विषय के सत्यासत्य निर्णय के सम्बन्ध में इन महानुभावों नें “ चट मंगनी पट व्याव " वाली किंवदन्ती अक्षरशः चरितार्थ कर रक्खा है । विषय के अन्तस्तल पर पहुंचने की न इन की वृत्ति है, न इस वृत्ति की यह आवश्यकता ही समझते हैं । आप किसी भी धार्मिक विषय के सम्बन्ध में इन से प्रश्न कीजिए, तत्काल श्राप को उत्तर मिल जायगा । जैसे इन का जीवन धर्मिक विचारों में, धर्म ग्रन्थों के अध्ययन में ही व्यतीतहुआ हो । वह उत्तर भी कैसा? - - " ' अन्धेर नगरी अबूझ राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा " इस लोकोक्ति को सर्वथा चरितार्थ करने वाला | सभी धार्मिक प्रश्नों के सम्बन्ध में अपनी विफल निर्दुष्ट देहेन्द्रियों से आपने - " सब व्यर्थ है, सब ढोंग है, सब स्वार्थियों की स्वार्थलीला है, ऐसे व्यर्थ के कार्यों में कभी समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. इन शास्त्रीय अड्डों का हमारे दैनिक जीवन में कोई उपयोग नहीं है, राष्ट्र की समुन्नति में इन धर्म्माज्ञाओं से कुछ भी उपकार संभव नहीं है " इत्यादि कतिपय समाधान वाक्य कण्ठस्थ कर रक्खे हैं । भूल देखना मात्र इन का कर्तव्य है, फिर चाहे इन के भूल देखने में असंख्य भूलें भरीं पड़ीं हों । आप के उक्त सदुत्तरों की मूल प्रतिष्ठा क्या है? यह भी जान लीजिए । “ हम भी मनुष्य हैं । हमनें भी चिरकाल पर्यन्त श्रम कर के शिक्षा प्राप्त की है । हमारे पास भी बुद्धि है । बस जो बात हमारी समझ में बेठे, जो विज्ञान ( जड़विज्ञान-भौतिकविज्ञान - क्षणिक विज्ञान ) से सिद्ध हो, वही बात माननी चाहिए । जो बात हमारी समझ में न बैठे, किंवा जो प्रकृति ( Nature ) के विरुद्ध हो, उसे नहीं मानना चाहिए " । २५

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विषयप्रवेष - भाष्यभूमिका 12 अपने इसी अभिनिवेश में पड़ कर वेद के सम्बन्ध में भी इन की ओर से यही विचार उपस्थित किए जाते हैं कि " वेद एक सामयिक साहित्य ग्रन्थ है । शब्दरचना मनुष्य का ही कमाना जा सकता है । फलतः यह वेद पौरूषेय हैं, ऋषिकृत हैं । जिस युग में यह वेद बने थे, उस युग में इन का भले ही कोई उपयोग हुआ होगा । परन्तु जब विज्ञान के प्रभाव से आज सर्वथा युगपरिवर्तन होगया है तो ऐसे वैज्ञानिक युग में उस सामयिक साहित्य की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती ” । इस प्रकार वेद के सम्बन्ध में उक्त विचार प्रकट करने वाले उन सभ्य महानुभावों से हम निवेदन करेंगे कि प्रकृति देवी का वास्तविक स्वरूप आपने जितना सुविज्ञेय समझ रक्खा है, वास्तव में वह उतना ही दुविज्ञेय है । आरम्भ के ब्राह्मण वचन के अनुसार वस्तु का स्वरूप रहता कुछ और ही है, दिखलाई देता कुछ और है । सहसा उस के याथातथ्य का निर्णय कर डालना बड़ी भारी भूल है । प्रत्येक पदार्थ को देखने के लिए हमारे पास विज्ञानदृष्टि, अन्तर्दृष्टि, बाह्य-दृष्टिभेद से तीन साधन हैं । प्रत्येक पदार्थ की स्वयं पूर्ण परीक्षा कर, उस के द्वारा किसी सत्य निर्णय पर पहुंचना विज्ञानदृष्टि है । इस के अनुयायी विद्वानों को हमने पूर्व में " यथार्थग्राही " शब्द से सम्बोधित किया है । जिन परीक्षकों नें, जिन साक्षात्कृतधमा महर्षियों ने शब्द द्वारा विज्ञानदृष्टि से परीक्षित पदार्थों का जो स्वरूप परिचय, हमारे सामने रक्खा है, वही शब्दराशि शास्त्र है । इस शास्त्रप्रमाण के आधार पर पूर्वापर का पूर्ण समन्वय करते हुए बुद्धिद्वारा वस्तु को देख कर, उस के सत्यखरूप को देखना ही अन्तर्दृष्टि है । इसी दृष्टि के अनुयायियों को हमनें “ शास्त्रग्राही " कहा है । एवं अपनी चर्म्मचक्षुत्रों से किसी पदार्थ का निर्णय कर डालना चाह्यदृष्टि है । ऐसे ही महानुभाव कोमलश्रद्ध कहे जाते हैं । इन तीनों दृष्टियों में से विज्ञानदृष्टि को थोड़ी देर के लिए हम छोड़ते हैं । केवल अन्तः - बहिर्दृष्टियों की ओर आप का ध्यान आकर्षित करते हैं । त्रांख - कान - नाक - जिह्वा - त्वचा आदि के आधार पर किसी विषय का परिज्ञान करना ऐन्द्रियक ज्ञान है, यही बाह्यदृष्टि है । साधारण जनसमाज अधिकांश में इसी दृष्टि का अनुगमन करता है । एवं अन्तःकरणावच्छिन्न ( मनोयुक्त ) बुद्धिपूर्वक उस पदार्थ को देखना अन्तर्दृष्टि है । R &

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विषयप्रवेश - माष्यभूमिका ॥ दृष्टिभेद विद्वत्समाज अधिकांश में इसी दृष्टि का पक्षपाती है । यह एक सिद्ध विषय है कि साधारण मनुष्य किसी पदार्थ का स्वयं जैसा स्वरूप मानता है, विचारशील विद्वान् की दृष्टि में वह खरूप सर्वथा अश्रद्धेय है । एवं एक विद्वान् किसी वस्तु का जैसा स्वरूप बतलाता है, उस पर जनसाधारण का विश्वास नहीं होता । फलत: विद्वानों की अन्तर्दृष्टि, एवं सामान्य जनों की बाह्यदृष्टि में प्रायः विरोध ही रहता है । इसी दृष्टिविरोधमूलक मतविरोध का दिग्दर्शन कराते हुए भगवान् कहते हैं-या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्त्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ( गी ० २०६६ | ) | उदाहरण के लिए जनसामान्य का यह विश्वास है कि " पृथिवी नीचे है, उस के ऊपर आकाश है, एवं वह आकाश नीला है, पृथिवी मटिया रंग की है । पृथिवी समतल है, किन्तु आकाश अर्द्धगोलाकार है । हमारे मस्तक से ऊपर की ओर का भाग ऊंचा है, पैरों के नीचे का भाग नीचा है " । उधर अन्तर्दृष्टि के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि ‘ आका-श के गर्भ में पृथिवी प्रतिष्ठित है, एवं पृथिवी के परमाणु - परमाणु में आकाश व्याप्त हो रहा है । न कोई किसी के ऊपर है, न कोई किसी के नीचे है । अथवा दोनों दोनों के नीचे हैं, एवं दोनों दोनों के ऊपर हैं । पृथिवी वर्तुलवृत्ता है, आकाश का कोई आकार नहीं है । श्रतएव उस का क्षेत्रमान भी अशुद्ध है । पृथिवी का अपना प्रातिस्त्रिक व ( रंग ) सर्वथा कृष्ण ( काला ) है । आकाश स्वच्छ है, नीरूप है । उत्तरध्रुवप्रदेश हमारे लिए ऊंचा स्थान है, दक्षिणध्रुव प्रदेश हमारे लिए नीचा स्थान है । ” उक्त दोनों दृष्टियों में से विद्वानों की अन्तर्दृष्टि ही सत्य मानी जायगी । यही अवस्था वेद के अपौरुषेयत्व की समझिए । बाह्यदृष्टि को प्रधानता देने वालों की समझ में भले ही अपौरुषेयत्व का रहस्य न घ्यावे, परन्तु अन्तर्दृष्टि के उपासक विद्वानों की दृष्टि में वेद की अपौरुषेयता पूर्णपरी-क्षित, अतएव सर्वथा सत्य है । वर्त्तमानयुग के विद्वान् भी तो दोनों दृष्टियों की तुलना में अन्त-दृष्टि को ही सत्य मानते हैं । जनसाधारण का विश्वास है कि पृथिवी स्थिर है, सूर्य एवं ग्रह पूर्व से ३०

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विषयप्रवेश .. । माध्य भूमिका ॥०-दृष्टिभेद पश्चिम की ओर जारहे हैं । परन्तु अन्तर्दृष्टि को सत्य मानने वाले पश्चिमी विद्वान् भी सूर्य की स्थिरता पर विश्वास करते हुए पृथिवी को चल मानते हैं, एवं ग्रहों का पश्चिम से पूर्व में जाना स्वीकार करते है । बतलाइए कौन सा पक्ष प्रबल रहा? 1 साथ ही में यह भी निर्विवाद है कि बाह्यदृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले पदार्थ बहुत ही कम संख्या में उपलब्ध होते हैं, एवं अन्तर्दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले पदार्थ अनन्त हैं । पदार्थों में भिन्न भिन्न शक्तिएं रहतीं हैं । उन शक्तियों की परीक्षा याप बहिर्दृष्टि से कभी नहीं कर सकते । परन्तु उन शक्तियों की सत्ता आप भी स्वीकार करते हैं । अपने विज्ञान भवन का ही निरीक्षण कीजिए । पोप के युग में बहिर्दृष्टि को ही प्रधानता दी जाती थी । केवल कल्पित मिथ्या श्रद्धा का ही साम्राज्य था । फलस्वरूप अन्तर्दृष्टि रखने वाले सैंकड़ों विद्वान् बलिदान की वेदि पर भेंट चढ़ा दिए गए थे । क्या उस युग की साधारण जनता उन विद्वानों की अन्तर्दृष्टि पर विश्वास करती थी? कभी नहीं । उस युग में कौन इस बात पर विश्वास कर सकता था कि बेतार के तार से ( Wireless Telegrafice ) हजारों कोसों पर बैठे हुए बात चीत की जासकती है । परन्तु आज वही जनता परीक्षा की कृपा से प्रत्यक्ष में इस घटना को देखती हुई विश्वास करने लग गई है । क्या वैज्ञानिक यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंनें सभी अतीन्द्रिय पदार्थों का प्रत्यक्ष कर लिया । नहीं तो फिर अतीन्द्रिय-विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले हमारे इस वेदापौरुषेयत्व पर बिना सोचे समझे क्यों आक्षेप किया जाता है । आप जिन पदार्थों की सत्यता बाह्यदृष्टि पर अवलम्बित मानते हैं, हमारे विचार से तो उन के लिए भी अन्तर्दृष्टि की आवश्यकता होती है । अन्तर्दृष्टि को एकान्ततः छोड़ देने पर विशुद्ध बाह्यदृष्टि तो भ्रमज्ञान की जननी बन जाती है । इस परिस्थिति से क्या आप यह मान लेने के लिए तय्यार नहीं हैं कि दोनों दृष्टियों में अन्तर्दृष्टि ही अधिक प्रभाव रखती है? इसी आधार पर हम यह सिद्धान्त स्थिर मान सकते सकते हैं कि एक ही पदार्थ अन्तर्दृष्टि, एवं बहिर्दृष्टि भेद से जहां दो प्रकार का दिखलाई दे, वहां अन्तर्दृष्टि से दृष्ट तत्व को सत्य मानना चाहिए, एवं बहिर्दृष्टि से दृष्ट स्वरूप को मिथ्या समझना चाहिए । कारण स्पष्टतम है । आत्मसत्य का बुद्धि द्वारा अन्तःकरण ३१

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विषयप्रवेश || माध्य भूमिका ॥ भेद के साथ सम्बन्ध होता है । अन्तःकरण ( मन ) का सत्य ही इन्द्रियों में आता है । इन्द्रियदृष्टि ही बहिर्दृष्टि है । इन्द्रियों की अपेक्षा हमारा मन आत्मसत्य के सन्निकट है । फलतः इस से देखा हुआ विषय इन्द्रियदृष्टि की अपेक्षा अवश्य ही निर्भ्रान्त होता है । बस इन्हीं सब कारणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि बहिर्दृष्टि से देखा गया वेद का पौरुषेयत्व सर्वथा मिथ्या है, एवं अन्तर्दृष्टि की कसोटी पर कसा हुआ वेद का अपौरुषेयत्व सर्वथा निभ्रान्त है । एक बात पर हम पाठकों का विशेष रूप से ध्यान याव षित करते हैं । वह यहीं है कि जिन सेन्द्रिय पदार्थों के सम्बन्ध से दोनों दृष्टिएं काम करतीं हैं, उन के सम्बन्ध में तो अन्तर्दष्टा विद्वानों का निर्णय प्रमाण बन जाता है । परन्तु कितनें हीं पदार्थ ऐसे हैं कि जिन में केवल अन्त-दृष्टि का ही अधिकार रहता है । अतीन्द्रिय सभी पदार्थ इस कोटि में अन्तर्भूत हैं । ऐसे विशुद्ध अतीन्द्रिय पदार्थों के सम्बन्ध में विद्वानों में भी परस्पर मत भेद होजाता है, जो कि मतभेद दारी-निक मय्यादा के अनुसार सर्वथा शास्त्रसिद्ध है । वेद का अपौरुषेयत्व भी अतीन्द्रियभाव से ही सम्बन्ध रखना है, फलतः इस के सम्बन्ध में भी यदि हमें मतभेद उपलब्ध होंगे, तो उन का हमें आदर करना पड़ेगा । पूर्व में हमने कहा है कि वस्तु ज्ञान के सम्बन्ध में विज्ञानदृष्टि, अन्तर्दृष्टि, बहिर्दृष्टि इन तीन दृष्टियों का उपयोग होता है । इन तीनों की मूलभित्ति श्रुति स्मृति - लोकवृत्त यह तीन विभाग हैं । प्रत्यक्ष परीक्षा विज्ञानदृष्टि है, यही श्रुति है । प्रत्यक्षदृष्टिरूप श्रुति का अनुगमन करने वाली दृष्टि स्मृति है, जैसा कि श्रागे के – ' श्रुतिशब्दमीमांसा " प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । तीसरी लौकिकदृष्टि है । जहां तक लौकिक दृष्टि से अन्तर्दृष्टि का विरोध न होता हो, वहां तक वह सत्य है, अन्यथा त्याज्य है । अन्तर्दृष्टि का दर्शन से सम्बन्ध है, विज्ञान-दृष्टि विज्ञान है । विज्ञान निर्भ्रान्त तत्व है । उस में " इदमित्थमेव " का साम्राज्य है । फलतः विज्ञान सिद्धान्तों में मतमेद का अवसर नहीं आता । विज्ञान का जहां सत्ता से सम्बन्ध है, वहां दर्शन का भाति से सम्बन्ध है 1 । दर्शन दर्शन है । यहां परीक्षा का अभाव है । द्रष्टा की योग्यतानुसार भाति · मूलक दर्शन में तारतम्य संभव है । फलतः दर्शन में मतभेद होना स्वाभाविक बन जाता है । इसी ३२

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विषयप्रवेश ॥ भाष्यभूमिका! दृष्टभेद आधार पर भारतीय दर्शन ६ भागों में विभक्त माने गए हैं, जैसा कि ईशोपनिषदादिभाष्यों में निरूपित है । यह ६ स्वतन्त्र मत हैं, परन्तु ६ यों का एकीकरण विज्ञान में होजाता है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक होजाता है कि सूचीकटाहन्याय का समादर करते हुए पहिले अन्तर्दृष्टि-मूलक वेदापौरुषेय सम्बन्धी दार्शनिकों के मत प्रस्तुत किए जांय, अनन्तर विज्ञानदृष्टि का आश्रय लेते हुए निश्चित सिद्धान्त की मीमांसा की जाय । यदि अस्मत् सदृश कोई व्यक्ति वेद की अपौरुषेयता पर कलम उठाता है तो सनातन-धर्मावलम्बी विद्वान् क्षुब्ध हो जाते हैं, और कहने लगते हैं कि यह व्यक्ति नास्तिकता का प्रचार कर रहा है । परन्तु इन कोमलश्रद्ध भोले बन्धुओं को यह पता नहीं है कि स्वयं उन्हीं के शास्त्रों में ( दर्शनों में ) इस प्रश्न पर पर्याप्त वादविवाद हुआ है । स्वयं दर्शनशास्त्र ह्रीं इस सम्बन्ध में अपना कोई निश्चित सिद्धान्त बतलाने में असमर्थ हैं । बोलिए! ऐसी विषम परिस्थिति में आप की श्रद्धा को अखण्ड रखने के लिए किस उपाय का अवलम्बन किया जाय? हम तो जब अपने शास्त्रों के मतों को उठा कर देखते हैं तो सहसा यह विचार करने लगते हैं कि ऐसे उलझन के विषय को सर्वथा छोड ही दिया जाय । वेद के जिस नित्यानित्य को लेकर दुर्धर्ष विद्वानों के परस्पर विरोधी बीसों मत जब हमारे सामने आते हैं, तो हमारे जैसे नगण्य इस सम्बन्ध में क्या निर्णय कर सकते हैं । फिर भी प्राप्तकाम ईश्वर भी जब सृष्टि करते करते नहीं थकता, तो सहज सिद्ध वाणी की गति कैसे रोकी जा सकती है । " ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः " इस सूक्ति के अनु-सार हम भी इस सन्बन्ध में अपने टूटे फूटे विचार क्यों न अपने सहयोगियों के समक्ष उपस्थित करें । " वेद ईश्वरकृत है, वेद ऋषियों की पवित्र वाणी है, वेद से ईश्वर का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, वेद अग्नि वायु आदित्य से उत्पन्न हुए हैं " इन सब प्रवादों को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए । पहिले इस बात पर विचार कीजिए कि भारतीय दार्शनिकों के वेदपौरुषेयत्वा पौरुषेयत्व के सम्बन्ध में क्या विचार हैं? ३३

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F वेद पौरुषेय हैं, अथवा पौरुषेय? आ इस सम्बन्ध में दार्शनिकों के विभिन्न- विचार TIPEE 6 I be --६ -ि ३

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* श्रीः दार्शनिक मत से सम्बन्ध रखने वाले ४० - ( चालीस ) - अवान्तर - मत १- पूर्वोत्तर - मीमांसामत - वेद अकृतक हैं, अपौरुषेय हैं, कूटस्थनित्य हैं । २- नव्यन्यायमत-- -- वेद ईश्वरकृत हैं, पौरुषेयापौरुषेय हैं, अनित्य हैं । ३ - प्राचीन न्यायमत ---- वेद ईश्वरावतारकृत हैं, पौरुषेय हैं, प्रवाहनित्य है । -- वेद प्राकृतिक हैं, अपौरुषेय हैं, अनित्य हैं । ४- सांख्यमत -५- वैशेषिकमत-६- नास्तिकमत -- - वेद महर्षिकृत हैं, पौरुषेय हैं, अनित्य हैं । --- वेद साधारण ग्रामीण मनुष्यों का व्यवस्थाशास्त्र है । १- मीमांसासामत में अवान्तर १३ मत । २ - नव्यन्यायमत में अवान्तर ७ मत । ३ - प्राचीन न्यायमत में अवान्तर ५ मत । ४ - सांख्यमत में अवान्तर ७ मत । ५ - वैशेषिकमत में अवान्तर ७ मत । ६ - नास्तिक मत १ मत । ४० मत ( चालीस अवान्तरमत ) प्रक्रान्त - उपनिषद्भूमिका - प्रथमखण्ड के सम्बन्ध में विशेष निवेदन-इस से पूर्व सम्पादक - की असावधानी से पृष्ठसंख्या में अनेक विपर्य्यय होगए हैं । अब इस ' मतवाद-स्वरूप - प्रकरण ' से हमनें पूर्व संख्याओं का अनुरोध न मानकर १ संख्या से ही संख्या का सन्निवेश कर दिया है, जो क्रम प्रस्तुत प्रथमखण्ड की समाप्ति पर्य्यन्त इसी क्रम से प्रक्रान्त रहेगा--

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श्रीः अथ त्रयोदश - [ १३ ] - अवान्तरमतयुक्तं-पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् १ [ कर्म्मप्रधान ब्राह्मणभाग की मीमांसा करने वाली पूर्वमीमांसा ( जैमिनिदर्शन ), ज्ञानप्रधान उपनिषद्भाग की मीमांसा करने वाली उत्तरमीमांसा ( व्यासदर्शन ), सांख्यदर्शन, प्राचीनन्यायदर्शन नव्यन्यायदर्शन, वैशेषिकदर्शन, नास्तिकदर्शन, इन ६ ओं दर्शनोंनें वेद की उत्पत्ति, वेद के अपौरुषेयत्व - पौरुषेयत्त्व के सम्बन्ध में अपने अपने भिन्न भिन्न विचार प्रकट के सम्बन्ध में, किंवा के सम्बन्ध में ६ प्रधान मत होजाते हैं । यदि इन के अधान्तर मतों का किए हैं । इसप्रकार वेदोत्पत्ति होजाते हैं 1 । इन्हीं मर्तों का संक्षेप से दिग्दर्शन कराना इस प्रकरण का मुख्य संग्रह किया जाता है, तो ४० मत लक्ष्य है ]