Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 321–330

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 321 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रीः अथ त्रयोदश ( १३ ) - अवान्तरमतयुक्तं -पूर्वोत्तरमीमांसादर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् मीमांसानुगत - दृष्टिकोण-ब्राह्मणग्रन्थों में कम्र्मेतिकत्तव्यताप्रतिपादक जिन आदेशनावाक्यों में बाह्यदृष्टि से परस्पर विरोध प्रतीत होता है, उन का अन्तदृष्टि से समन्वय करने के लिए पूर्वमीमांसाशास्त्र प्रवृत्त हुआ है । इस के कर्त्ता भगवान् जैमिनि हैं । इसीप्रकार उपनिषद्वाक्यों के विरोध - समन्वय के लिए उत्तरमीमांसाशास्त्र प्रवृत्त हुआ है । इस के कर्त्ता महामुनि व्यास हैं । दोनों मिल कर एक मीमांसाशास्त्र है । इस मीमांसदर्शन के अनुसार " वेद सर्वथा अपौरुषेय हैं, अतएव सर्वथा नित्य हैं । वसिष्ठ, भारद्वाज, दीर्घतमा, हिरण्यगर्भ, बृहस्पति अङ्गिरा आदि महर्षिगण वेद के द्रष्टा हैं, न कि कर्त्ता । शब्दनित्यता हो शब्दात्मक वेद की नित्यता, एवं अपौरुषेयता में प्रमाण है । " इस मत के समर्थक निम्न लिखित मीमांसासूत्र हमारे सामने आते हैं ---१ - ' वेदांश्चैके सनिकर्षं पुरुषाख्याः ' ( पू ० मी ० १।१।२७ ) । २ – ' अनित्यदर्शनाच्च ' ( पू ० मी ० १।१।२८ ) । ३– ' उक्त ं तु शब्दपूर्ववम् ' ( पू ० मी ० १।२।२६ ) । ४ - परन्तु श्रतिसामान्यमात्रम् ( पू ० मी ० १।१।३१ ) । ५ --- - ' शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्, प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ' । ( उ ० मी १।३।३८ ) । ६ -- श्रतएव च नित्यत्वम् ' ( उ ० मी ० १।३।३६ ) । उक्त सूत्रों का तात्पर्य्यं यही है कि, कितने ही महानुभावों का वेद की अपौरुषेयता के प्रति यह श्राक्षेप है कि, वेद सर्वथा मनुष्यकृत हैं । कारण, काठकं कालापकं, पैप्पलादकं, मौग्दलं इत्यादि रूप से वेद का पुरुषविशेषों के साथ सम्बन्ध बतलाया गया है । इन समाख्यावचनों के आधार पर कह सकते हैं कि, वेद अनादि नहीं है, अपितु सृष्टिरचना के अनन्तर पुरुष - विशेषों के द्वारा बनाए हुए हैं । अपिच-' वबरः प्रावाहणरिकामयत " - " औद्दालकिरकामयत " इत्यादि वाक्यों के आधार पर भी वेद की अनित्यता ही सिद्ध है । प्रावाहरिण बबर था, वह एक ऐतिहासिक व्यक्ति था । इसीप्रकार उद्दालक का पुत्र औद्दालक भी एक ऐतिहासिक ही व्यक्ति था । हम देखते हैं कि, ' तेन प्रोक्तम् ' ( पाणि ० सू ० ४ | ३ | १०१० ) के अनुसार तद्धित प्रत्यय का सम्बन्ध प्रोक्तार्थ के साथ ही माना गया है । ऐसी अवस्था में— ' व्यासेन प्रोक्त वैय्यासिकं भारतम् ' इत्यादिवत् - ' कठेन प्रोक्त ' काठकम्'- ' कौथुमं ' - ' तैत्तिरीयकं ' इत्यादि

पृष्ठ 322

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 322 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका समाख्याओं के बल पर हम वेद को कृतक ( मनुष्वकृत ) ही कहेंगे । वाक्यत्वात्, कालिदासादिवाक्यवत् ' इस अनुमान के अनुसार इस कृतक ही मानेगे । " प्रथममत फलतः - ' विमतं वेदवाक्यं पौरुषेयं वेद को सर्वथा पौरुषेय, अनित्य, एवं उक्त आपेक्ष का समाधान करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि, समाख्यादोष का इस सम्बन्ध में कोई महत्त्व नहीं है । काठकं कापिलं आदि समाख्यावचनों का अध्ययन सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के साथ सम्बन्ध है । कठ - कापिलादि वेदाध्ययन के सम्प्रदायप्रवत्तक हुए हैं । इसी आधार पर काठकं कापिलं आदि समाख्याव्यवहार हमारे सामने आते हैं । अपिच बबरप्रावाहणि भी किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम नहीं है । अपितु यह चचर शब्द प्रवहणशील वायु का ही बोधक है । ऐसी अवस्था में अनित्यता का भी अवसर नहीं आता । अपिच - शब्द और अर्थ का परस्पर उत्पत्तिसृष्ट -- सम्बन्ध माना गया है । शब्द के साथ ही अर्थ का श्रादुर्भाव हुआ है, जैसा कि पूर्व के- " औत्पत्तिकस्तु शब्दस्थार्थेन सम्बन्धः, तस्य ज्ञानमुपदेशो ऽनुलपब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानप क्षेत्त्वात् ' ' ( पू ० मी ० १ | १ | ५ | ) इस सूत्रप्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । जब शब्द नित्य है, एवं उस का अर्थ नित्य है, तो नित्य शब्दार्थरूप वेद की अनित्यता का प्रश्न ही नहीं रहता । निष्कर्ष यही निकलता है कि, वेद सर्वथा अकतक हैं । इन को किसी ने उत्पन्न नहीं किया है । आप्तमहर्षि वेदमन्त्रों के द्रष्टामात्र हैं । वह स्वयं उत्पन्न हुआ हो, यह बात भी नहीं है, क्योंकि शब्द नित्य है । साथ ही में अनादि विश्व के अर्थ, एवं तद्वाचक शब्दों का सम्बन्ध भी अनादि ही है । इसके अतिरिक्त बहुत प्रयास करने पर भी हम इस के निर्माता का पता नहीं पाते । इसलिए भी इसे अपौरुषेय ही माना जासकता है । पूर्वप्रतिपादित मीमांसादर्शन - सम्मत मत के आधार पर, इसी मत को पुष्ट करने वाले अवान्तर १३ मत और होजाते हैं । उन्हीं का अत्र क्रमशः दिग्दर्शन कराया जाता है । १ – नित्यसिद्ध, अतएव कूटस्थ अपौरुषेय वेद ईश्वर से अभिन्न है-हमारा वेद शास्त्र विज्ञानमय है, विज्ञानघन है । उधर ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इस श्रीत-सिद्धान्त के अनुसार सच्चिदानन्दलक्षण ब्रह्म तत्त्व भी विज्ञानघन माना गया है । ऐसी स्थिति में वेद और ब्रह्म को हम एक ही वस्तु मान सकते हैं । इसीलिए श्रुति स्मृतियों में यत्र तत्र ' त्रयं ब्रह्म सनातनम् ' ' त्रयो वेदा: ' इत्यादिरूप से ब्रह्म ( ईश्वर ) और वेद का पर्य्याय - सम्बन्ध माना गया है । ब्रह्म यदि सूर्य्य है, तो वेद उस की रश्मियाँ हैं । ब्रह्म यदि उक्थ है, तो वेद उस उक्थ से निकलने वाले अर्क हैं । ब्रह्म मूल है, तो वेद उसी मूल का तूलरूप है । ब्रह्म यदि प्राण ( मुख्य - प्राण - श्रङ्गीप्राण ) है, तो वेद उस के प्राणाः [ अङ्गप्राण ] हैं । ब्रह्म यदि अवयवी है, तो वेद उस का अवयव है । उक्थ, मूल, प्राण, अवयवीरूप ब्रह्म से अर्क, तूल, प्रारणा: - अवयवरूप वेद को कथमपि पृथक् नहीं माना जासकता ।

पृष्ठ 323

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 323 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड प्रथममत प्ररणत्र है, तो वेट वाचक भी ' तस्य वाचक प्रणवः ' ( पा ० यो ० ११२७ ) के अनुसार यदि ब्रह्म का वाचक जाय । ' ब्रह्मैवेदं सर्वम् ' ओङ्कार ही है । यह तभी सम्भव है, जब कि वेद को ईश्वर से अभिन्न ' वेदशब्देभ्य मान लिया एवादौ पृथक् संस्थाश्च ब्रह्म से ही सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ' यह कहा जाता है, वहाँ उत्पत्ति बतलाई जारही है । फलतः निर्म्ममे ' [ मनु ० १।२१ ] इत्यादि रूप से वेद से भी सम्पूर्ण विश्व की ईश्वर नित्य है, तथैव सर्वसृष्टि-वेद की ईश्वर के साथ सर्वात्मना श्रभिन्नता सिद्ध होजाती है । जिसप्रकार में भी इस ईश्वर-प्रबत्तक, तद्रूप [ ईश्वररूप ] वेदतत्त्व भी सर्वथा नित्य, एवं अपौरुषेय ही है । महाप्रलय तो ईश्वर को वेदमूर्त्ति मूर्ति वेद का विनाश नहीं होसकता, खण्डप्रलयों की तो कथा ही क्या वेद है की । इसीलिए अपौरुषेयता का प्रतिपादन करते माना गया है । वेद ही ईश्वर है, ईश्वर ही वेद है । ईश्वरमूर्ति इसी इन प्रमाणों से प्रकृत प्रथम हुए निम्न लिखित प्रमाण हमारे सामने आते हैं । अपौरुषेयता के साथ साथ मत की [ वेद ईश्वर से अभिन्न है - इस मत की ] भी पुष्टि होती है । ११ - ' एप वेदो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ '

[ श्वेताश्वतरोपनिषत् ४।१७ । ] ।

२ - ' स्वयम्भूरेष भगवान् वेदो गीतस्त्वया पुरा ॥

शिवाद्या ऋषिपर्यन्ताः स्मर्त्तारोऽस्य न कारकाः ॥ ' ( श्रीमद्भागवत ) । ३ – ' वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुमः ' ॥ ( विष्णुस्मृति ) १- सम्पूर्ण विश्व का उत्पादक होने से विश्वकर्मा नाम से, एवं विश्व का व्यापक ( महा ) आत्मा होने से महात्मा नाम से, एवं स्वयमेव प्रकट होने के कारण स्वयम्भू नाम से मन प्रसिद्ध से ही यह वेदतव सदा प्राणियों के हृदय में प्रविष्ट रहता है । वह सुसूक्ष्मतत्त्व हृदयस्थ से सम्बन्ध रहता है । श्रन्तर्य्यामी, नियतिः सत्य, साक्षी, कूटस्थ इत्यादि विविध मन से नामों पहिचान प्रसिद्ध हृदयस्थ, अतएव मनोमय इस वेदसत्य को जो हृदयावच्छिन्न बुद्धियुक्त होजाते हैं । लेते हैं, निःसन्देह वे मृत्युपाश से विमुक्त होते हुए अमृतभाव को प्राप्त २ - यह वेदभगवान् अपने आप प्रकट होने वाला शाश्वत तत्त्व है । शिव से आरम्भ कर ऋषि पर्यन्त जितने भी आचार्य वेद के सम्बन्ध में विचार करने वाले हुए हैं, वे सब इस नित्य वेद के कर्त्ता नहीं हैं, अपितु स्मर्त्ता हैं । ३- हम ऋषिपरम्परा से यह सुनते आए हैं कि, वेद साक्षान नारायण ( ईश्वर ) स्वरूप है । साक्षात् स्वयम्भू ( स्वयंप्रकट ) है ।

पृष्ठ 324

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 324 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका प्रथममत

४ - ' आद्यं यत्र्यक्षरं ब्रह्मत्रयो यस्मिन् प्रतिष्ठिता ।

स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥

( मनु: १२।२६५ ) ५- ' ऋगभिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं स सामभिर्यत् कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं च ॥ [ प्रश्नोपनिषत् ५।७ । ] ६ – ग्रोमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपव्याख्यानं - भूतं भवद्, भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यचान्यत् त्रिकालातीतं तदपि श्रोङ्कारमेव ' । [ माण्डय क्योपनिषत् ] । आदिब्रह्म है, अकार, उकार, मकार के समन्वय से तीन अक्षर की समष्टिरूप जो को जो उसी में त्रयीत्रह्म ( त्रयीवेद ) प्रतिष्ठित है । इस ब्रह्ममूर्त्ति अत्यन्त गुप्त ( अतीन्द्रिय ) वेद जानता है, वही वेदवित् कहा जासकता है । ५- - ऋगुरूपा प्रथमामात्रा से इस मनुष्यलोक ( पृथिवी लोक ) को, यजुः स्वरूपा द्वितीया- मात्रा से सोमलोकरूप अन्तरिक्षलोक को, एवं सामरूपा तृतीया - मात्रा से उस लोक को, जो कि ब्रह्मलोक ( दिव्यलोक ) है, विद्वान् लोग प्राप्त कर लेते हैं । अर्थात् मर्त्यत्रिलोकी की प्राप्ति का उपाय वेदत्रयी रूप उस अवरत्र ही है । जैसे वह इस से उस अवरब्रह्म को प्राप्त करने में समर्थ होता है, एवमेब परब्रह्म को भी उसी उद्गीथ श्रोङ्कार से ही वह प्राप्त कर सकता है, जो कि परब्रह्म अव्यक्त, अक्षर, अव्यय, परात्पर की समष्टिरूप होने से शान्त, अजर, अमृत अभय, एवं पर है । ' ६- ऋगुरूप प्रकार, यजुरूप उकार, सामरूप मकार की समधिरूप ही विश्वरूप अक्षरात्मक में परिणत ' ओम् यह एकाक्षर ही यह सब कुछ ( विश्व ) है । अर्थात् वेदमूर्त्ति प्रणवब्रह्म होरहा है । इस ओङ्कार की महिमा का बखान इस से अधिक और क्या होसकता है कि, ) भूत-भविष्यत् - वर्त्तमान तीनों काल इसी के उपबृंहरण हैं । इन तीनों से जो कुछ ( त्रिकालातीत बचा हुआ है, वह भी यही श्रोङ्कार है । बाकी

पृष्ठ 325

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 325 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन ७ - ' ओमिति वै सर्वे वेदाः । प्रथमखण्ड ८- — ' तस्य वाचकः प्रणवः ' । [ पा ० यो ० सू ० ११२७ ] ६ - ' चातुर्वण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् । द्वितीयमत भूतं भव्यं भवच्चैव सर्वं वेदात् प्रसिद्धयति ' ॥ [ मनुः १२।६७ ] । १० - शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धश्च पञ्चमः । वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्म्मतः ॥ [ मनुः १२६८ ] । ७ - ‘ ओम् ' ही ऋक् - साम - यजुरूप सम्पूर्ण वेद हैं । ८- ईश्वरतत्त्व का वाचक प्रणव ( ओङ्कार ) ही है । ही ६- चारों वर्ण, तीनों लोक, चारों आश्रम, भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान सब कुछ वेद से निष्पन्न हुए हैं । , वैदिक - कर्म्म-१० - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नाम से प्रसिद्ध पाचों अन्यान्य तन्मात्राएँ सब पदार्थ वेद से ही निबन्धन सत्व रजः - तज नाम से तीनों गुण, एवं उत्पन्न होनेवाले उत्पन्न हुए हैं । २ - नित्यसिद्ध, अतएव कूटस्थ अपौरुषेय वेद ईश्वर के तुल्य है-वेद की अपौरुषेयता में दूसरा मत यह है कि, नित्यसिद्ध यह अपौरुषेय दोनों वेद समानधारा ईश्वर के से * प्रवाहित समकक्ष है । शब्द एवं पर भेद से ब्रह्म के दो विवर्त्त ' माने गए हैं । परब्रह्म - शब्दब्रह्म - विवर्त्त ' में यदि अव्यय-होरहे हैं । जैसा स्वरूप परब्रह्म का है, ठीक वैसा ही स्वरूप शब्दब्रह्म का है । परब्रह्म * सम्बत्सरप्रजापति ही त्रैलोक्याधिष्ठाता ईश्वर है । इस सम्वत्सरप्रजापति के १०८०० ( दस हजार -आठसौ ) मुहूर्त्त होते हैं । एवं इधर हमारी इस वेदत्रयी के भी १०८०० ही पंक्तियुग्म हैं । इसप्रकार स्वरूप " अथ सर्वाणि भूतानि प्रक्षत् स त्रय्यामेव विद्यायाम् ', ( शत १०।४।२।२२ के ) समकक्ष के अनुसार मान जो सकते हैं, सम्वत्सरप्रजापति का है, वही स्वरूप वेद का है । अतएव वेद को हम ईश्वर जैसा कि आगे के विज्ञानदृष्टिप्रकरण में स्पष्ट होजायगा ।

पृष्ठ 326

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 326 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन उपनिषद् भूमिका द्वितीयमत अक्षर - क्षर भेद से तीन विवर्त्त ' हैं, तो शब्दब्रह्मप्रपञ्च भी स्फोट - स्वर वर्ण इन तीन भागों में ही विभक्त है | परब्रह्म का अक्षरविवत ' यदि ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम इन पाँच भागों में विभक्त है, तो शब्दब्रह्म का अक्षरस्थानीय स्वरप्रपञ्च भी अ इ उ ऋ लृ इन पाँच भागों में ही विभक्त है । परब्रह्म का व्यय विव ' यदि अखण्ड- निर्विकार है, तो शब्दब्रह्म का अव्ययस्थानीय स्फोट भी अखण्ड निर्विकार ही है । वहाँ यदि क्षर का आलम्बन अक्षर, एवं सर्वालम्बन अव्यय है, तो यहाँ भी क्षरस्थानीय वर्ण का आलम्बन स्थानीय स्वर है, अव्ययस्थानीय स्फोट सर्वालम्बन है । इसप्रकार ईश्वर नाम से प्रसिद्ध परब्रह्म, एवं वेद नाम से प्रसिद्ध शब्दब्रह्म दोनों सर्वथा समतुलित हैं । दोनों तत्त्व सर्वथा अभिन्न हैं । दोनों ही नित्य, एवं स्वत: प्रमाण हैं । शब्द का अर्थ ही परब्रह्म है, वहीं प्रमेय है । प्रमाण एवं प्रमेय के अतिरिक्त तीसरी वस्तु का अभाव है । यद्यपि बाह्यदृष्टि से दोनों ही अनित्यवत् प्रतीत होते हैं, परन्तु अन्तदृष्टि से विचार करने पर दोनों की नित्यता भलीभाँति समझ में आ जाती है । साथ ही में यह भी एक सिद्ध विषय है कि, प्रत्येक दशा में प्रमाण ही प्रमेय की प्रतिष्ठा बनता है । प्रमाण के अभाव में प्रमेय को सिद्ध करना कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । प्रमेय परब्रह्म के प्रमाणभूत इसी अपौरुषेय ईश्वरसमकक्ष वेद से सम्पूर्ण सृष्टियाँ हुई हैं, होरही हैं, एवं होंगीं, जैसा कि पूर्वोपात्त प्रथम मत के ६-१० मनुवचनों से स्पष्ट है । इसी द्वितीय मत का दिग्दर्शन कराते हुए अभियुक्त कहते हैं-१ - ' ' ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ' ( उपनिषत् ) । २ - ' अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं निरञ्जनम् । विवत्त तेभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ' ॥ ( वाक्यपदी ) । ३ – ' वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ' ( गीता ) । १ - शब्दब्रह्म, एवं परब्रह्म भेद से ब्रह्म के दो विवर्त्त हैं । ( जो विद्वान इन दोनों के समत्व को समझता हुआ ) शब्दब्रह्म का साक्षात् परिज्ञान कर लेता है, वह ( इसी समता के प्रभाव से ) परब्रह्मपद को प्राप्त होजाता है. २- शब्दतत्त्व ( परब्रह्मवत् ) सर्वथा निरञ्जन है, अनादिनिधन ( नित्य ) है । इसी शब्दब्रह्म से अर्थ के द्वारा सम्पूर्ण विश्व का सचालन होरहा है । ३- मैं हीं ( परब्रह्म - अव्यय - नाम से प्रसिद्ध ईश्वररूप प्रमेय ) सम्पूर्ण वेदों से ( वेदरूप शब्द प्रमाणों से ) जानने योग्य हूँ । ( क्यों कि मेरे समकक्ष ) वेद ही मेरा वास्तविक स्वरूप बतला सकते हैं ।

पृष्ठ 327

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 327 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड तृतीयमत ४ । - े द्व विद्य े वेदितव्ये - इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति - परा चैव, अपरा च । तत्र अपरा ऋग्वेदो, यजुर्वेदः, सामवेदः अथ परा यया - तदक्षरमधिगम्यते । +++ तदव्ययं तद्भूत-योनिं परिपश्यन्ति धीराः । ( मुण्डक १।१।४-५-६- ) । ५ - ' एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः ' ( प्रश्नोपनिषत् ५। ) ( इस विश्व में ) परा और अपरा नाम की दो ४- ब्रह्मवेत्ता विद्वानों का कहना है कि । इन में विद्याएँ हीं जानने योग्य हैं । इन दोनों के परिज्ञान से सबकुछ परिज्ञात होजाता है, है जिससे कि साङ्गवेदविद्या ( शब्दब्रह्म ) का ही नाम अपराविद्या है । पराविद्या वह विद्या ( क्षर ) है । अक्षर का परिज्ञान किया जाता है । वह ( अक्षर ) ही अव्यय है, वही ब्रह्मतत्त्व भूतयोनि को धीर लोग ऐसे इस त्रिमूर्त्ति अव्ययाक्षरात्मक्षरमूर्त्ति आत्मविद्या नामक पराविद्यात्मक ( अपराविद्या के सहारे ज्ञान चक्षु का आश्रय लेते हुए ) देखा करते हैं । , जोकि ५ - हे सत्यकाम! यही पर ( ईश्वर ) एवं अपर ( बेद ) नाम का ब्रह्म है समष्टिरूप से ) श्रोङ्कार नान से ( उपनिषदों में ) प्रसिद्ध है । ( क ) ३ – नित्यसिद्ध कूटस्थ, अतएव अपौरुषेय यह वेद ईश्वर का निःश्वास है-का इस तृतीय मत का तात्पर्य यही है कि, अध्यात्मसंस्था में जो स्थिति निःश्वास की है, निःश्वास , अधिदैवतसंस्था में वही स्थिति वेद की वेद का एवं हमारा ( श्रात्मा का ) परस्पर जो सम्बन्ध है इस लोकव्यवहार के अनुसार और ईश्वर का परस्पर वहीं सम्बन्ध है । ' जबतक सांस, तबतक आस ' है, तभीतक ( इस शरीर-जबतक निःश्वास है, तभी तक हमारी सत्ता है । दूसरे शब्दों में जबतक ही ( निःश्वास उस अधिदैवतसंस्था में ) ईश्वरसत्ता संस्था में ) जीवात्मा स्वसत्ता से प्रतिष्ठित है । ठीक इसी प्रकार वेदसत्ता निःश्वासक्रिया का सञ्चालन करता का कारण है । वेद का अस्तित्त्व ही ईश्वर का अस्तित्त्व है । जिसप्रकार स्वयमेव संचालित वेद हुआ भी प्राणी निःश्वास का कर्त्ता ( उत्पादक ) नहीं है, एवमेव निश्वासवत् ईश्वर से अपौरुषेयत्व, अतएव को भी ईश्वर से निर्मित नहीं कहा जासकता । यही इस वेद का अकृतत्त्व, अतएव सिद्धान्त है । उसने वेद को नित्यकूटस्थत्व है । सुप्रसिद्ध शारीरकदर्शन ( वेदान्तदर्शन ) का यही हमारे मुख्य सामने आता है-ईश्वर का निःश्वास ही माना है । इस मत का समर्थक आगे का श्रौतप्रमाण १०

पृष्ठ 328

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 328 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका चतुर्थमत स यथा धाग्नेरभ्या हितात -- पृथग् धूमा विनिश्चरन्ति, एवं वा रेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि अस्यैवैतानि निःश्वसितानि ' - बृहदारण्यकोपनिषत् २ । ४ । १० । ४ - नित्यसिद्ध कूटस्थ , य,, अतएव अपौरुषेयवेद को ईश्वरानुग्रह से ब्रह्माने प्राप्त किया है-नित्यसिद्ध इस वेदतत्त्व को ईश्वर के अनुग्रह से आदिदेव ब्रह्माने प्राप्त किया है । सर्वसृष्टि-प्रवर्त्तक, सृष्टि के आदिभूत हिरण्यगर्भ - प्रजापति ही ब्रह्मा हैं । सब से पहिले इह्रीं के हृदय से वेदतत्त्व की अभिव्यक्ति हुई है । ब्रह्माने वेदरचना नहीं की, अपितु वेदमन्त्र जैसे जैसे इनके हृदय में ईश्वरीय प्रेरणा से उबुद्ध होते गए, वैसे वैसे ही इन के मुख से मन्त्र निकलते गए । प्रथम विकास के लिए ब्रह्मा का अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं था । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, वेद में जिन पदार्थों का निरूपण हुआ है, सृष्टि के आरम्भकाल में ( जब कि हिरण्यगर्भ वेदरचना के लिए सन्नद्ध हुए थे ) उन पदार्थों में से किसी एक की भी सत्ता न थी । ऐसी स्थिति में आदिकाल में क्योंकर वेदपदार्थ की वे इच्छा कर सकते थे? । बिना किसी सामग्री के, साधन के अपने आप ज्ञान का प्रादुर्भाव होना ईश्वरदत्त - विभूति नहीं है, तो और क्या है | किसी भी विषय के ज्ञान होजाने पर तो इस के लिए कोई भी प्रयत्न कर कर सकता है, परन्तु सर्वज्ञान से पहिले क्योंकर प्रयत्न किया जासकता है । * जिस प्रकार गीली लकडियों से प्रज्ज्वलित अग्नि से चारों ओर से ( चिस्फुलिंग एवं ) धूम निकलते हैं, हे मैत्रेयी! उस परमात्मरूप महाभूत का वह निःश्वासरूप ही है, जोकि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरा नाम से प्रसिद्ध अथर्ववेद, इतिहासात्मक ( वैज्ञानिक इतिहासरूप ) ब्राह्मण, पुराण, देवजन, परिमर, प्रवर्य्यादि विद्याएँ, उपनिषन्, निगदमन्त्र श्लोक, श्रात्मेत्येवोपासीत इत्यादि रूप सूत्रसंग्नह, मन्त्रविवरणात्मक अनुव्याख्यान, अर्थवादात्मक व्याख्यान इत्यादि नामों से प्रसिद्ध है । ये सब उसी के निःश्वास हैं ” । “ मन्त्रत्राह्मणयोर्वे दनामधेयम् " इत्यादि के अनुसार वेदतत्व मन्त्र - ब्राह्मण भेद से दो भागों में विभक्त है । इन में मन्त्रभाग ' ऋक्, यजुः साम, अथर्व मेद से चार भागों में विभक्त है । एवं ब्राह्मणभाग ' इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषत्, " श्लोक, सूत्र, अनुव्या-ख्यान, " व्याख्यान भेद से आठ भागों में विभक्त है । यह मन्त्रब्राह्मणात्मक अपौरुषेय वेद ईश्वर का निःश्वास है, यही तात्पर्य है । ११

पृष्ठ 329

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 329 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन प्रथमखण्ड चतुर्थमत है जैसी समझ वैसा, अपिच प्रत्येक व्यक्ति स्वबुद्धि की योग्यता के अनुसार ही कुछ कार्य्य ) पुरुष करता का व्यापार नहीं है, अपितु काम । इस से भी हम इसी आशय पर पहुँचते हैं कि, के समझ अनुसार ( ज्ञान विश्वसृष्टि के लिए भी ब्रह्मा की जैसी यह एकमात्र ईश्वर की ही देन है । इस सामान्य नियम में ( सृष्टय पादन हेतु भूत वेदज्ञान में ) ब्रह्मा समझ थी उसी का प्रयोग ब्रह्मा की ओर से हुआ । इस समझ इसे उत्पन्न नहीं किया है । ऐसी अवस्था में इस सर्वथा परतन्त्र थे । यह ब्रह्मा में प्रादुर्भूत हुई है, ब्रह्माने ही अपौरुषेय, एवं नित्य मान सकते हैं । ज्ञानराशिरूप वेद को ईश्वरप्रदत्त होने से हम अवश्य सामने आते हैं— इस मत के उपोलक निम्नलिखित प्रमाण हमारे १- “ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यश्चास्मै प्रहिणोति वेदम् " ( उपनिषत् ) । २ - यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ॥ । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये • श्वे ० उप ० ६।१८ । ३– “ चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठन् तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात् तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि सृष्टः सृष्ट ेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः, पश्चात्तदनुगतानर्थान् ससर्जेति गम्यते ” । - शावर भाष्य १ । ३ । ८ । : ४ है, जो कि इस ब्रह्मा के १ - जो ( सृष्टिकर्म के लिए सृष्टि के आरम्भकाल में ब्रह्मा को उत्पन्न करता लिए ( सृष्टिरचनार्थ ) वेद समर्पित करता है " । को प्रवृत्त करता है, २ - जो ईश्वर आरम्भ में ब्रह्मा को उत्पन्न करता है, जोकि ब्रह्मा के लिए में जाता वेदों हूँ । आत्मा ( कम्र्मात्मा ), एवं बुद्धि के प्रकाशक उसी देव ( ब्रह्म ) की मैं मुमुक्षु शरण से ३ – जो व्यक्ति किसी अर्थप्राप्ति की, किंवा अर्थनिर्माण की इच्छा करता है, इस अर्थेच्छा है, स्मृत शब्द पहिले ( अर्थेच्छा को पूर्ण करने वाले ) उस अर्थ के वाचक शब्द का है " पहिले यह स्थिति स्मरण हम करता सब के लिए प्रत्यक्ष के आधार पर वह अभीप्सित अर्थ सम्पादित करने में समर्थ होता की ही प्रधानता देखते हैं । है । अर्थात् लोक में हम वाच्य अर्थ की सिद्ध के लिए तद्वाचक सृष्टिनिर्मांणेच्छा शब्द की स्मृति ) रखने वाले प्रजापति के इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, सृष्टिरूप अर्थ की इच्छा ( ( ब्रह्मा ) ने स्मृत - वेदशब्दों के अनुकूल मन में भी सृष्टयथवाचक शब्द ही पहिले प्रादुर्भूत हुए । पीछे प्रजापति अर्थों को उत्पन्न किया " । १२

पृष्ठ 330

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मीमांसादर्शन उपनिषद्भूमिका पञ्चममत ५- - नित्यसिद्व कूटस्थ, अतएव अपौरुषेयवेद को ईश्वरानुग्रह से महर्षियोंनें प्राप्त किया है-नित्यसिद्ध इस वेद से अपने चिरकालिक तपोयोग से ऋषियोंनें अपने अन्तःकरण को सर्वथा निर्मल बनाया । इस निर्मल श्रन्तःकरण में श्रार्षदृष्टि के द्वारा ईश्वर के अनुग्रह से ऋषियोंने वेद प्राप्त किया । " अनन्ता वै वेदाः " ( तै ० ब्राह्मण ) के अनुसार वेद अनन्त हैं । सम्भव है, सृष्टि के आरम्भ में हिर-गर्भने अनन्त वेदों को प्रकट किया हो । परन्तु जो वेद आज दिन हमें उपलब्ध होरहे हैं, वे तो यज्ञात्मक हुए सर्वथा सीमित ही हैं । शाखा, मण्डल, सूक्त, ऋचा, पद, अक्षर, वर्ण पङ्क्तिएँ सब परिगणित पड़ता है । अतः इन उपलब्ध वेदों को कदापि अनन्त नहीं माना जासकता । ऐसी स्थिति में मानना कि, यह परिगणित वेद ऊर्ध्वरेता ऋषियों के हृदय में ईश्वर के अनुग्रह से स्वयं प्रकट हुए हैं । ऋषियों मात्र के हृदय में वेद प्रकट हुआ है, ऋषियोंनें वेद का निर्माण नहीं किया है । ऋषि मत के इनके समर्थक द्रष्टा, निम्नलिखित स्मर्त्ता हैं, ऐसा यह वेद अवश्य ही अपौरुषेय, कूटस्थ एवं नित्य कहलाने योग्य है । इस

प्रमाण हीं पर्याप्त हैं--१ - “ युगान्तेन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।

लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाता स्वयम्भुवा ॥

२- " ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः ।

शर्व्वर्य्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ” ॥

३ – “ ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः ” । ४ – “ साक्षात्कृतधर्म्माण ऋषयो बभूवुः " । ५ - * -) १ – युग युक के अन्त में ( ध्रुवपरिभ्रमण के तारतम्य से ) लुप्त होने वाले सेतिहास महर्षियोंनें ( सब्राह्मण प्राप्त वेदों को युग युग के आदि में अपने तपोचल के प्रभाव से ईश्वर से प्रेरित वेदों को किया । २ - वेद के सम्बन्ध में ऋषि के जो नाम सुने जाते हैं, इन ऋषियों का बेद सम्बन्धी जो दर्शन में ( दृष्टि, प्रत्यक्ष ) है, उन्हीं नामधेयों को ( तत्तन्नामवाले ऋषियों को ) विश्वप्रलयरूपा रात्रि के अवसान ( युगारम्भ में ) ईश्वर वेद प्रदान करता है । ३- महर्षिगण वेद के द्रष्टा हैं । ५ – जिन महापुरुषोंनें आर्षदृष्टि से वेदधर्म्म, किंवा वेदपदार्थ का साक्षात्कार कर लिया है, वे ही. " ऋषि " नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । १३