Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 381–390

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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सांख्यदर्शन प्रथमखण्ड ६-७ - मत ६- तीनों प्राकृतिक लोकों से क्रमशः तीन वेद उत्पन्न हुए हैं । [ ३१ मत ] भूः भुवः स्वः नाम से प्रसिद्ध पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - नाम के तीन लोक हैं । इन से क्रमशः पृथिवी से ऋग्वेद, अन्तरिक्ष से यजुर्वेद, द्युलोक से सामवेद उत्पन्न हुआ है । ऐसा इसलिए मानना पड़ता है कि, तीनों वेदो में क्रमशः ऋग्वेद में प्रधानरूप से पार्थिव आग्नेय - पदार्थों का, यजुर्वेद में अान्तरिक्ष्य वायव्य-पदार्थों का, एवं सामवेद में दिव्य सौर पदार्थों का ही प्रतिपादन देखा जाता है । इसीलिए ऋग्वेद का आरम्भ-" अग्निमीले पुरोहितम् " इत्यादिरूप से पृथिवी के अधिष्ठाता अग्निदेवता को प्रधान मान कर ही हुआ है । ' पुरोहितम् ' शब्द ही पृथिवीलोक का परिचायक है । यजुर्वेद के आरम्भ में ' इषे त्बोर्जे त्वा वायवस्थ-देवः ” इत्यादिरूप से वायुदेवता को प्रधानता दी गई है । वायुदेवता अग्नि की ही तरलावस्था है । श्रतएव यजुर्वेदव्याख्यानभूत " शतपथ ' के आरम्भ में- ' अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि " इत्यादिरूप से अग्नि की स्तुति की गई है । एवमेव सामवेद का आरम्भ ' अग्न श्रायाहि वीतये ' इस मन्त्र से हुआ है । ' श्रयाहि ' शब्द द्युलोक का ही सग्राहक है । द्युस्थानस्थ अग्नि वास्तव में पृथिवी पर आता है । इसप्रकार हम तीनों लोकों से ही तीनों वेदों का विकास मान सकते हैं, जैसाकि श्रुति कहती है— ७-१ - प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् । तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयीविद्या संप्रात्रवत् । तामभ्यतपत् । तस्या अभितप्ताय । सश्या-स्रवन्त - भू, भुवः स्वरिति ( छ. उ. २।२३ । ) । ६ -तीन छन्दों, तीन सपनों, एवं स्तोमों से त्रयीवद उत्पन्न हुआ है । ( ३२ ) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, ये तीन लोक सुप्रसिद्ध हैं । इन तीनों के क्रमशः अष्टाक्षर गायत्रीछन्द, एकादशाक्षर त्रिष्टुप्छन्द, एवं द्वादशाक्षर जगतीछन्द, ये तीन छन्द हैं । तीनो के क्रमशः त्रिवृत्स्तोम ( ६ अहर्गणात्मक ) पञ्चदशस्तोम ( १५ अहर्गणात्मक ), एवं एकविंशस्तोम ( २१ अहर्गणात्मक ) ये तीन स्लोम हैं । एवं तीनों के अष्टवसुदेवतात्मक प्रातः सवन, एकादशरुद्रात्मक माध्यन्दिनसवन, तथा द्वादश-श्रादित्यात्मक सायंसवन भेद से तीन सवन हैं । प्रातः सवनात्मक, त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न, गायत्री छन्दोयुक्त पृथिवीलोक से ऋग्वेद उत्पन्न हुआ है । माध्यन्दिनसवनात्मक, पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न, त्रिष्टुप्छन्दोयुक्त अन्त-रिलोक से यजुर्वेद उत्पन्न हुआ है । एवं सायंसवनात्मक, एकविंशस्तोमावच्छिन्न, जगतीछन्दोयुक्त द्युलोक से सामवेद उत्पन्न हुआ है । इस मत की प्रामाणिकता भी यत्र तत्र ब्राह्मणग्रन्थों में स्फुट है । ७ १ -- प्रजापति ( त्रैलोक्यमूर्ति लोकात्मक प्रजापति ) ने अपने अवयवभूत तीनों लोकों को तपाया । तप्त इन तीनों लोकों से त्रयीविद्या का स्रोत निकला । पुनः त्रयीविद्या को तपाया । इस तप्त त्रयीविद्या से क्रमशः भूः – भुवः स्वः रूप तीन महाव्याहृतिएँ उत्पन्न हुई । ६४

पृष्ठ 382

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सांख्यदर्शन उपनिषद्भूमिका मतसमष्टि उक्त सातों मतों में " वेद प्राकृतिक हैं, कृतक हैं, अपौरुषेय हैं, अनित्य हैं " इस चौथे सांख्यमत की समानरूप से व्याप्ति है । अतएव इन सातों को हम सांख्यमत में अन्तर्भूत मान सकते हैं । ४ - वेद प्रकृतिसिद्ध हैं । अपौरुषेय हैं । अनित्य हैं । ( सांख्यमत ) १-२६- - यह वेद प्रकृतिसिद्ध अग्नि- वायु- सूर्य से अभिन्न है । २- २७ – यह वेद प्रकृतिसिद्ध सूर्य से अभिन्न है । ३ - २८ - यह वेद प्रकृतिसिद्ध यज्ञ से अभिन्न है । ४ - २६ – यह वेद प्रकृतिसिद्ध कालचक्र से उत्पन्न हुआ । ६-३०- यह वेद प्रकृति से स्वतः उत्पन्न हुआ है । ६- ३१ - यह वेद प्रकृतिसिद्ध तीनों लोकों से उत्पन्न हुआ है । ७-३२ – यह वेद प्रकृतिसिद्ध छन्द - स्तोम - सवनों से उत्पन्न हुआ 1 इति -सांख्यमतप्रदर्शनम् ४ ६५

पृष्ठ 383

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इति - सप्त- ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं प्राधानिकाभिमत- मतप्रदर्शनम् ४

पृष्ठ 384

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श्रीः अथ – सप्त - ( ७ ) – अवान्तरमतयुक्तं वैशेषिकदर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् ५

पृष्ठ 385

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पृष्ठ 386

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12 श्रीः अथ - सप्त- ( ७ ) -- अवान्तरमतयुक्तं वैशेषिकदर्शनाभिमत - मतप्रदर्शनम् वैशेषिकानुगत - दृष्टिकोण-५ महर्षि उलूक ( कणाद ) के मतानुसार वेद ( वेदग्रन्थ ) महर्षियों के बनाए हुए हैं, अतएव ये सर्वथा पौरुषेय ( मनुष्यकृत ) हैं, एवं सर्वथा अनित्य हैं । साथ ही में दृष्टिभेद से वेद प्रकृतक हैं, अपौरुषेय हैं, अतएव सर्वथा नित्य भी हैं । वेद शब्द शब्दराशिरूप वेदग्रन्थ ( वेद की पुस्तक ) में भी प्रयुक्त होता है, एवं शब्दप्रतिपाद्या वेदविद्या के साथ भी वेदशब्द का सम्बन्ध है । शब्दापेक्षया वेद पौरुषेय हैं, अनित्य हैं । एवं विद्यापेक्षया वेद अपौरुयेय हैं, नित्य हैं । लोक में जिन वेदों का पारायण होता है, वे वेद अनित्य हैं । एवं शब्दात्मक वेद से प्रतिपादित विद्यात्मक वेद नित्य हैं । दूसरे शब्दों में- वेदग्रन्थ अनित्य हैं, एवं वेदविद्या नित्या है । इस मत के समर्थक निम्नलिखित वचन हमारे सामने आते हैं-१ - ' बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ' ( ब ० द ० -'ब्राह्मणे संज्ञाकर्म्म सिद्धिलिङ्गम् ' ( ३ – ' आर्षं सिद्धदर्शनं च धर्मेभ्यः ' ( ६ | १ | १ | ) । ० ५० ६ | १ | २ | ) । ० ६।२।१३ । ) । इस सूत्र का तात्पर्य यही है कि, वाक्यरचना बुद्धिपूर्वक ही होती है । हम जब गद्यात्मिका अथवा पद्यात्मिका वाक्यरचना करते हैं, तो उसमें ' प्रज्ञान ' सहकृत ' विज्ञान ' ( मनोयोगपूर्विका बुद्धि ) की अपेक्षा रहती है । बिना बुद्धि के वाक्यरचना असम्भव है । इधर वेदशास्त्र वाक्यरचना का संग्रहमात्र है । यह बिना बुद्धि के व्यापार के सम्भव नहीं है । बुद्धि परिच्छिन्न तत्त्व है । बुद्धिव्यापार एकमात्र परिच्छिन्न पुरुष का ही धर्म्म है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि, वाक्यसंग्रहात्मक यह वेद विद्वान् महर्षियों की कृति है, अतएव यह पौरुषेय है ॥१ ॥

श्रपिच ' ब्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध वेदभाग में नामों का जो निर्वाचन हुआ है, उस से भी वेद का बुद्धिपूर्वकत्त्व ही निर्माण सिद्ध होता है । ' सोऽरोदीत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम् । रुद्रः किल रुरोद ' ( बह रोया इस लिए उस का नाम रुद्र होगया, रुद्र रोया ) इत्यादिरूप से तत्तन्नामों की व्युत्पत्ति ( निर्वचन ) की गई है । यह निर्वचन स्पष्ट ही बतला रहे हैं कि, वेदों की रचना पुरुषविशेषों के द्वारा बुद्धिपूर्वक ही हुई है । क्योंकि शब्दों का यथावत् ( व्याकरणानुसार ) निर्वचन करना मनुष्यबुद्धि का ही काम है ॥२ ॥

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पृष्ठ 387

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वैशेशिक दर्शन प्रथमखण्ड दृष्टिकोण उक्त दोनों सूत्र वेद की पौरुषेयता, एवं अनित्यता का निरूपण करते हैं, एवं तृतीय सूत्र आर्षज्ञान को लक्ष्य में रखता हुआ ( शब्दवेदप्रतिपाद्या वेदविद्या को लक्ष्य में रखता हुआ ) वेद की अपौरुषेयता, एवं नित्यता का प्रतिपादन करता है । नित्य वेदतत्त्व, किंवा वेदविद्या को ऋषियों ने अपनी आर्षदृष्टि से पहिचाना है । वह ज्ञान ( वेदविद्यारूप ज्ञान ) सर्वथा अपौरुषेय, एवं नित्य है । इस नित्यज्ञान ( नित्यवेद ) की प्राप्ति कर का उपाय एकमात्र धर्म्मबुद्धि ही है । इसप्रकार धर्म्मबुद्धि के द्वारा उस नित्य अपौरुषेय वेद को प्राप्त ऋषियोंने जिस शब्द - राशि के द्वारा उसे हमारे सामने रक्खा है, वही वेद पौरुषेय, एवं अनित्यशब्दमय होने से अनित्य है ॥ ३ ॥

यही मत सर्वमान्य कहा जासकता है । भगवान् पतञ्जलिने भी इसी वैशेषिक मत को प्रधानता दी है । एवं महाभाष्य के सुप्रसिद्ध टीकाकार कैय्यट एवं जयादित्यने भी इसी मत का समर्थन किया है, जैसाकि निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट होजाता है— १ - ' ननु चोक्त ' नहि छन्दांसि क्रियन्ते नित्यानि छन्दांसि - इति । यद्यप्यर्थो नित्यः । या त्वसौ वर्णानुपूर्वी. सा श्रनित्या । तद्भेदाच्चैतद्भवति - काठकम्, कापालम्, मौद्गलम्, पैप्पलादकम् ' -इति । २– ' शौनकादिभ्यश्छन्दसि ' ( ४ । ३ । १०३ । ) । शौनकेन प्रोक्तमधीयते शौनकिनः । वाजसनेयिनः । ' कठचरकाल्लुक ' ( ४।३।१०७ ) । कठाः, चरकाः - ( महा ० ४।३।१०६-१०७ ) इति । १३- ' महाप्रलयादिषु वर्णानुपूर्वीविनाशे पुनरुत्पाद्य ऋषयः संस्कारातिशयात् वेदार्थं स्मृत्वा शब्दरचनां विदधतीत्यर्थः ' ( कैय्यटः ४ । ३ । १०१ । ) । 8- - ' पुराणप्रोक्तषु ब्राह्मणकल्पेषु ' ( पा ० सू ० ४ ३।१०५ ) । पुराणप्रोक्तषु ब्राह्मण-प्रोक्तषु प्रतिषेधो वक्तव्यः - याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानि, सौलभानि इति । किंकारणं-तुल्यकालत्वात् । एतान्यपि तुल्यकालानि इति ' ( म ० भा ० ) । पुराणप्रोक्त ष्विति किम् । याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानि, आश्मरथ्यः, कल्पः । याज्ञवल्क्यादयोऽचिरकाला इत्याख्यानेषु वार्त्ता । तया व्यवहरति सूत्रकारः ' इति । ( जयादित्यः ) । ५. ' तेन दृष्ट ' साम ' ( पा ० सू ० ४/२/७ ) । वासिष्ठं, नैश्वामित्रं, कालेयम् । तस्य साम्नोर्विशिष्ट कार्यविषयोविनियोगो ज्ञानातिशयसम्पत्या कलिनाऽऽज्ञायि, तत् तेन दृष्टमित्युच्यते ' ( कैय्ट: ) । उक्त बचनों का अभिप्राय यही है कि, वेदपदार्थ यद्यपि नित्य है, इसीलिए छन्द को नित्य कहा जाता नित्य वेदार्थ है, परन्तु वर्णानुपूर्वीरूप शब्द सर्वथा अनित्य है । तत् समय में महर्षिगण उस अपौरुषेय हैं । यही मत ( वेदविद्या ) का स्मरण करके पौरुषेया अनित्या वर्णानुपूर्वी के द्वारा वेदार्थ को प्रकट किया करते सात भेद विज्ञान सम्मत है, जैसाकि आगे की ' विज्ञानवेदनिरुक्ति ' में स्पष्ट होजायगा । इस मत के श्रावान्तर होजाते हैं । उनका भी अत्र संक्षेप से दिग्दर्शन करा दिया जाता है । ७०

पृष्ठ 388

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वैशेषिकदर्शन उपनिषद्भूमिका १-२ मत १ – यह वेद अग्नि, वायु, सूर्य्य नाम के तीन देवर्षियों का वाक्य है । ( ३३ मत ) पुरायुग में ( जो कि युग पुराण- महाभारतादि में ' देवयुग ' नाम से प्रसिद्ध है ) इस पृथिवी पर ही प्रतिष्ठित ' भौमस्वर्ग ' में अग्नि वायु - सूर्य नाम की देवजातियाँ प्रतिमुप्रसिद्ध थीं । जिसप्रकार पृथिवी - लोक-स्थानीय भारतवर्ष में निवास करने वाले प्रत्यक्षदृष्टा पुरुष ऋषि एवं महर्षि कहलाते थे, एवमेव भौमस्वर्ग-निवासी मनुष्यविध भौमदेवताओं में जिन देवताओंने वेदतत्त्व का साक्षात् कर वेदमन्त्रों का निर्माण किया था, वे ' देवर्षि ' नाम से प्रसिद्ध थे । श्रग्नि- वायु - सूर्य्यं नाम की जातियों में से अग्नि - वायु - सूर्य्य नाम के व्यक्तिविशेषों ने ही मनुष्यों के ( भौमपृथिवीलोकनिवासी अस्मदादि मनुष्यों के ) लिए क्रमशः ऋग् - यजुः— साम- मन्त्रों का निर्माण किया है । प्राचीनन्यायमत के ३ मत विभाग में जिन अग्नि - वायु - सूर्य का उल्लेख किया गया है, वे नित्य अभिमानी पुरुषविध अपाद - देवता हैं । एवं प्रकृतमत के अग्न्यादि तीनों देवता अस्मच्छदृश सपाद मनुष्यदेवता हैं । एवं इस मत के देवताओं में यही विशेषता समझनी चाहिए । वे देवता देवता कहलाते हैं, एवं सृष्टि के प्रलयकाल पर्य्यन्तय उनकी प्रावाहिक - नित्यता अक्षुण्ण है । इधर वेद-साक्षात्कर्त्ता, तदनुसार वेदमन्त्र - निर्माता मनुष्यविध - देवता महर्षि, किंवा देवर्षि कहलाते थे । साथ ही में भौमस्वर्ग - व्यवस्था के उच्छेद के साथ साथ ही इन भौमदेवताओं का महाभारतकाल में ही उच्छेद हो गया है । इस मत का समर्थक निम्नलिखित सायणवचन ही पर्याप्त है । १ – ' जीवविशेषैरग्निवाय्वादित्यैर्वेदानामुत्पादितत्वात् ' ( ऋ ० उपोद्घात ) २ २ - यह वेद अपृष्णि नामक ऋषियों का वाक्य है । ( ३४ मत ) भौम पृथिवीलोक की प्रजा मनुष्य कहलाती थी । यह प्रजा चार वर्णों, एवं चार श्रवरवर्णों में विभक्त थी । वर्णप्रजा के चार विभाग क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नाम से, एवं श्रवरवर्णप्रजा के चार विभाग क्रमशः अन्त्यज, अन्त्यावसायी, दस्यु, म्लेच्छ इन नामों से प्रसिद्ध थे । इनमें वर्णप्रजा का ब्राह्मणवर्ग विद्यातारतम्य से ब्रह्मा ऋषि देव विप्र - ब्राह्मण इन पाँच भागों में विभक्त था । जो भारतीय ब्राह्मण वेदतत्व के द्रष्टा होते थे, उद्घो ही महर्षि, किंवा मनुष्यर्षि कहा जाता था । इह्रीं में अपृष्णि, सिकता-निवावरी, श्रकृष्टमाष, नाम के तीन प्रसिद्ध महर्षि होगए हैं । प्रकृत मतवादियों का कहना है कि, मनुष्यर्षि वर्ग में प्रसिद्ध पृष्णि नामक तपस्वियोंनें हीं वेदमन्त्रों का निर्माण किया है । इस मत का समर्थक निम्न लिखित श्रति वचन है-१ * अजान् ह वै पृष्णीन् – तपस्यमानान् ब्रह्म स्वयम्भू - भ्यानर्षत् । तद् ऋषयो अभवन् । त एतं ब्रह्मयज्ञमपश्यन् । १ - प्राचीन न्याय मत के ३ मत से गतार्थ । १ * -मीमांसामत के षष्ठ - मत से गतार्थ २ ७१

पृष्ठ 389

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वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड तृतीयमत ३– यह वेद अथर्वाङ्गिरा नामक ब्रह्मर्षि का वाक्य है । ( ३५ मत ) है । इसप्रकार एक ही अग्नि की घनावस्था श्रग्नि है, तरलावस्था वायु है, विरलावस्था में श्रादित्य घनाग्नि ( पार्थिव - अग्नि ) से अग्निरस तीन स्वरूप धारण कर लेता है- ( देखिए • शत ० १०/६/५ ) । ( दिव्य इन आदित्य ) से सामवेद का विकास ऋग्वेद का, तरलाग्नि ( अन्तरिक्ष्यवायु ) से यजुर्वेद का, एवं विरलाग्नि उक्त तीनों वेदों की समष्टि को - " अग्नि-हुआ है । ऐसी स्थिति में हम अग्नि की तीन अवस्थाओं से विकसित ( अग्निवेद ) का प्रादुर्भाव ब्रह्म " शब्द से व्यवहृत कर सकते हैं । सर्वप्रथम त्रयीरूप इसी अग्निब्रह्म श्रङ्गिरातत्व, इन दो तत्त्वों की, होता है, अतएव हम इसे ज्येष्ठब्रह्म कह सकते हैं । इसी प्रकार भृगुतत्त्व एवं किंवा दो वेदों की समष्टि सोमब्रह्म है । यही सुब्रह्म नाम से प्रसिद्ध है । जेष्ठब्रह्मलक्षण अग्नि तीन लोकों के भेद से तीन आयतनों में प्रतिष्ठित होता हुआ तीन " अग्निभू भागों में स्थान विभक्त ः " वायुरन्तरिक्षस्थानः, सूर्यो द्य स्थानः ” ( या ० निरुक्त ) इस नैगमिक सिद्धान्त देवता के विभक्त अनुसार हैं, एवं तीनों देवताओं होजाता है । अग्नित्रयी से तीन लोक विभक्त हैं, तीनों लोकों से तीन निगम सिद्धान्त के के भेद से तीन वेद विभक्त हैं । " अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः " ( शत स्नेह ० - तेजो ब्रा ० - लक्षण ) इस दो प्रकार का सोम अनुसार चौथा आपोलोक है । इस एक ही लोक में भृगु अङ्गिरा नामक यम- श्रादित्य इन तीनों की प्रतिष्ठित है । आपः वायु - सोम तीनों की समष्टि स्नेहमय भृगुसोम है । अग्नि में - प्रतिष्ठित है । इन ६ श्रों का समष्टि तेजोमय अङ्गिरासोम है । इसप्रकार यह षड्ब्रह्ममूर्ति सोम एक ही लोक वेद भी एक ही है । लोक एक है, अतएव इनका सोमदेवता भी एक ही माना जाता है । इसीलिए । इसप्रकार इसका तीन अग्निवेद, एक षड्ब्रह्ममय सोमावच्छिन्न वही वेद- " अथर्ववेद " नाम का चौथा वेद है आगे की विज्ञानवेदनिरुक्ति में सोमवेद, सम्भूय चार वेद होजाते हैं । इन सब विषयों का विशद निरूपण होने वाला है । उक्त चारों वेदों के प्रवर्त्त'क ( वक्ता - कर्त्ता ) चतुर्मुख ब्रह्मा हैं । जो व्यक्ति वेदशास्त्र है । का देवयुग मूलप्रवर्त्तक में भिन्न है, जिसे जगद्गुरु की उपाधि से विभूषित किया गया है, वही ब्रह्मा दिया नाम है से । चारों प्रसिद्ध में वेदप्रवत्त कत्त्व सामान्य भिन्न चार वैज्ञानिक श्राचार्योंनें भिन्न भिन्न चार वेदों का उपदेश सम्बन्ध रखता है । इसी है, अतएव व्यासज्यवृत्ति ( समुदायवृत्ति ) से ' ब्रह्मा ' शब्द चारों की समष्टि के साथ मान लिया गया है । प्रकारान्तर से यों समझिए कि प्रथम ब्रह्मा अभिप्राय से एक ही ब्रह्मा को चतुम्मुख स्त्रयम्भू नाम से प्रसिद्ध थे । इहें हीं आदिब्रह्मा कहा जाता था । भृगु, ब्रह्मपुत्र श्रङ्गिरा दोनों तीसरे ब्रह्मा अपान्तरतमा नाम से प्रसिद्ध प्राचीनगर्भ महर्षि थे, एवं वरुणपुत्र मिलकर अथर्वा नाम के चौथे ब्रह्मा थे । दूसरे ब्रह्मा हिरण्यगर्भ नाम से प्रसिद्ध थे । प्रवत ' के होने उक्त चारों ब्रह्माओं में स्वयम्भू ब्रह्मा पहिले ब्रह्मा थे, साथ ही में देवव्यवस्था के प्रथम ) नाम से ये प्रथमजदेव ( पहिले देव ) थे । पश्चिम भारतवर्ष आयोयण से ( ईरान प्रसिद्ध ) ) प्रान्त के तीर्थ में में बाल्हीक ये निवास ( बलख करते थे । की वरुणराजधानी के समीप पुष्कर नामक ( श्राजदिन बुखारा नाम ये वारुणि कहलाते थे । श्रारम्भ वाल्हीकनगरनिवासी वहाँ के सम्राट् वरुण के औरस पुत्र भृगु थे । अतएव अपना दत्तकपुत्र में ये बाल्हीक में ही रहते थे । परन्तु विद्योत्कर्ष के प्रभाव से आगे जाकर स्वयम्भू अङ्गिरा ने इङ्ख भी पुष्कराभिजन ही बना लिया । तब से इन का भी अभिजन ( स्वदेश ) पुष्कर ही होगया । ब्रह्मपुत्र ७२

पृष्ठ 390

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वैशेषिकदर्शन उपनिषद्भूमिका तृतीयमत थे । अपान्तरतमा नाम के प्राचीनगर्भ महर्षि ब्रह्मा के कृत्रिमपुत्र थे । ये सरस्वतीग्राम में निवास करते थे । वितस्ता ( झेलम ) और सिन्धु नद के सङ्गमस्थान के समीप पश्चिमभारत में सरस्वती नाम की नदी बहती है । इस सरस्वती नदी के सम्बन्ध से ही तत्प्रान्तस्थ ग्राम भी पुराणों में सरस्वतीग्राम् नाम से ही प्रसिद्ध हुआ है । यहीं सुप्रसिद्ध वरुण के अन्यतम सखा महर्षि वसिष्ठ का श्राश्रम था । यहीं महर्षि प्राचीन-गर्भ रहते थे । अतएव इहें पुराणों में " सारस्वतऋषि ” नाम से भी सम्बोधित किया गया है । इन चारों में आदिब्रह्मा स्वयम्भू, हिरण्यगर्भ, प्राचीनगर्भ, इन तीनों ब्रह्माओं ने स्वर्गभूमि नाम से प्रसिद्ध प्राग्मेरु ( पामीर ) प्रदेश में प्रतिष्ठित हिरण्यशृङ्ग नाम से प्रसिद्ध पर्वत के शिखर पर हिरण्यशृङ्ग से निकलने वाली ' यतु ' नदी के प्रवाह स्थान में विराजमान होकर त्रयीवेद का निर्माण किया था । इससे कुछ समय पीछे भृगु-अङ्गिरा नामक दोनों ब्रह्मानें ( जोकि अथर्वा नाम से प्रसिद्ध थे ) वाल्दीक प्रान्त में प्रतिष्ठित होते हुए अथर्व-वेद का निर्माण किया था । अर्वाक्कालीन होने से ही यह चतुर्थवेद - " अथ - अर्वाक् - सम्बभूव " इस निर्वचन से अथर्ववेद कहलाया । इन चारों में स्वयम्भू शेष तीनों के पिता थे । तीनों ब्रह्मा इनके मानसपुत्र थे । साथ ही में ये तीनों पर्षद्ब्रह्मा भी थे । इसप्रकार एक ही आदिब्रह्मा स्वयम्भूने - हिरण्यगर्भ - श्रपान्तरतमा भृग्वङ्गिरा - इन तीनों के संयोग से चारों वेर्दों को प्रवृत्त किया । इसी समष्टि के कारण स्वयम्भू चतुर्मुख ब्रह्मा कहलाए । इसी आधार पर - " चतुर्मुखब्रह्माने चारों वेद बनाए " यह किंवदन्ती प्रचलित हुई । कुछ भी हो, ये चारों ही चतुर्वेद के प्रवत्त के थे, यह निश्चित सिद्धान्त है । इस मत के समर्थक निम्न लिखित प्रमाण हैं-१- स्वयम्भूः- • - पुष्कराभिजनः २ – हिरण्यगर्भः ——– हिरण्यशृङ्गाभिजनः त्रयीवेदवक्तारः ३. - अपान्तरतमा -- सरस्वतीप्रामाभिजनः , १ वरुणपुत्रो भृगुः ४ - चतुमुखो ब्रह्मा २ ब्रह्मपुत्रोऽङ्गिराः । वाल्हीकाभिजनौ } अथर्ववेदद्वक्तारौ

१ - ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ।

ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्जेष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा, अथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् ।

स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥

- मुण्डकोपनिषत् ३ १ – इन दोनों मन्त्रों का अर्थ मीमासामतान्तर्गत ७ ( सप्तम ) मत के अर्थ से गतार्थ है । ७३