Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 391–400
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400
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वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड ४-५ मत ४ – यह वेद श्रपान्तरतमा ऋषि का वाक्य है । ( ३६ मत ) सुप्रसिद्ध “ अपान्तरतमा " नाम के महर्षि ने वेद का प्रवचन किया है । यह महर्षि श्रादिब्रह्मा भगवान् स्वयम्भू के मानसपुत्र थे । सुप्रसिद्ध वेदवक्ता कृष्णद्वैपायन इह्रीं श्रपान्तरतमा के अवतार माने गए हैं । महाभारतादि में ये ही प्राचीनगर्भ नाम से भी व्यवहृत हुए हैं । कहीं कहीं इन्हीं को " सारस्वत ऋषि " नाम भी सुना जाता है । इस मत का समर्थक निम्न लिखित वचन है ।
अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ।
प्राचीनगर्भ तमृषिं प्रवदन्तीह केचन ॥
-म ० भा ० शा ० मोक्षधर्म्म ० । ४ - * ------५ - यह वेद ऊर्ध्वरेता अनेक ऋषियों का वाक्य है । ( ३७ मत ) गुहानिहित, अलौकिक, आश्चर्य्यमयी, तत्तद् विश्वविद्याओं का साक्षात्कार करने वाले महामर्षियों के मुख से निकली हुई शब्दराशि ही वेद है । जिस समय विश्व की उन्नति अवनति से सम्बन्ध रखने वाला, २५ हजार वर्ष में " नाक " नाम से प्रसिद्ध कदम्बवृत्तापरपर्य्यायक विष्णुपद की परिक्रमा करने वाला सुप्रसिद्ध धवनक्षत्र वेदविद्याप्रवत्तक अभिजिनक्षत्र पर विद्यमान था, उस समय भौमत्रैलोक्य में वेदविद्यापारङ्गत गृहस्थ ऋषियों की ही संख्या ५-००० ( पचास हजार ) अनेक महर्षि विचरण करते थे । तत् कालीन केवल थी । इनके अतिरिक्त आबालब्रह्मचारी वीतराग महर्षियों की संख्या ८८००० ( श्रहासी हजार ) थी । ये ब्रह्मचारी विद्या के अभ्युदय के लिए सांसारिक स्त्रीपुत्रादि साधारण सुख - सामग्री का एकान्तः ( जन्म से ही ) परित्याग करते हुए विश्व के तत्वानुसंधान में प्रवृत्त रहते थे । ये ही महर्षि ऊर्ध्वरेता कहलाते थे । उन्हीं महा-महर्षियों की प्रतिभा, कार्य्यकुशलता, सत्यप्रवणता, एवं परिपूर्ण गवेषणा ( खोज ) का यह फल है कि, आज हम वेदशास्त्र नाम से सुप्रसिद्ध उस दिव्यविभूति के अधिपति बन रहे हैं, जिसके कि सामने वर्त्तमान युग का सुसमृद्ध वैज्ञानिक जगत् भी श्रद्धा से अपना मस्तक नत किए हुए है, एवं जिस योग्यता का ग्रन्थ संस्कृत साहित्य की कौन कहै, समस्त भूमण्डल के साहित्य में उपलब्ध नहीं हो सकता । अस्तु, कहना यही है कि, उर्ध्वरेता इनमहर्षियोंनें ही वेदग्रन्थों का निर्माण किया है । इस मत के उपोद्बलक निम्न लिखित प्रमाण-द्रष्टव्य हैं-१- श्रष्टाशीति - सहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् । प्रजावतां च पञ्चाशद्ऋषीणामपि पाण्डव! । ( म. भा. सभा १ ९ अ ० । ) १ । १ - हे पागडुपुत्र युधिष्ठिर । उर्ध्वरेता महर्षि संख्या में ८८००० हैं, एवं प्रजायुक्त गृहमेधी ( गृहस्थ ) महर्षि ५०००० हैं | १ | ७४
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वैशेषिकदर्शन उपनिषद्भूमिका
२ - ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन् ब्रह्मर्षीणां! समागमे ।
लोकसम्भवसन्देहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥ २ ।
तेऽतिष्ठन् ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः ।
त्यक्ताहाराः पवनुपा दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ॥ ३ ॥
तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागता ।
दिव्या सरस्वती तत्र स्वं बभ्रुव नभस्तलात् ॥ ४ ॥
३- यो वै ज्ञातोऽनूचानः स ऋषिरार्षेयः । ( शत ० वा ० ) । १ । पञ्चममत एष वै ऋषियो यः शुश्रुवान् । ( ११ ) ।२ । तस्मादेतद् ऋषिणाभ्यनूक्तम् । ) । ३ । 181 तदेतद् ऋषिः पश्यन्नभ्युवाच । ये ते न ऋषयः पूर्वे प्रतास्ते कवयः । तानेव तदभ्यतिवदति । "... 19 ... ( तै ० या ० ६।४ ) | ५ | ४ - नमा ऋषिभ्यो मन्त्रकृदभ्यो मन्त्रविद्भ्यो मन्त्रषतिभ्यः । मामा ऋषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहुर्देवीं वाचमुद्यसम् | ( मै ० श्रुतिः प्रसिद्ध है, ब्रह्मज्ञर्षियों के समागम २- हे ब्रह्मन्! पुरायुग ( देवयुग ) में, जो कि युग ब्रह्मकल्प नाम से हुश्रा । में उन महात्मा महर्षियों के हृदय में लोक की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न का आश्रय इस सन्देह की निवृत्ति के लिए ( विश्वोत्पत्तिविज्ञानार्थ ) इन महर्षियोंनें ध्यानयोग का एकान्तत: परि-लेते हुए, मौनव्रतधारण करते हुए सर्वथा निश्चलभाव से प्रतिष्ठित होते हुए तक, तप अन्नाहार किया | ३ | त्यागकरते हुए, केवल वायु पर अवलम्बित रहते हुए एकसहस्र दिव्यवर्षो लोगों नें सुनी । वह इस तप के प्रभाव से उत्पन्न उन महर्षियों की दिव्यवाणी ( वेदवाणी ) सब दिव्या सरस्वती उन के खथ से अपने आकाशमार्ग से प्रकट हुई । ४ । ३ – वेदसाक्षात्कर्त्ता, एवं वेदवक्ता ऋषि ही धैय ( ऋषिगोत्रप्रवत्त क ) हैं । १ । वही ऋषि आर्षेय है, जो कि वेदों को यथावत् सुन चुका है ।२ । इसी अभिप्राय से ऋषिने यह कहा है । ३ । इस सम्पूर्णं वैज्ञानिक रहस्य का साक्षात्कार करके ऋषि कहते हैं । ४ । है | ५ | जो ऋषि हमारे पूर्वज थे, वे ही ( वेदमन्त्रों के निर्माता ) कवि थे, उन्हीं को यह कह रहा है । मुझे उन मन्त्रकृत् ४- मन्त्र बनाने वाले, मन्त्र जानने वाले मन्त्रपति उन ऋषियों को नमस्कार को न भूलूँ । मन्त्रवित् - ऋषियोंर्ने देवीबाणी का उपदेश दिया है । मैं यावज्जीवन उस उपदेश ७५
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वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड षष्ठ - मत
५ - यामृषयो मन्त्रकृतो मनीषिण अन्वच्छन् देवा तपसा श्रमेण ।
तां देवीं वाचं हविषा यजामहे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके ॥
६ - ऋषिवचनाच्च । ऋषिवचनं वेदः । यथा किश्चिदिज्यार्थं श्राहरेत् । इति । ५ ( सुश्रूतसूत्रस्थान अ ० ४० ) ६ - यह वेद वसिष्ठादि ७ महर्षियों का वाक्य है । ( ३८ मत ) यह शब्दात्मक वेद वसिष्ठादि सात महर्षियों का बाक्य है । आसाहित्य में यद्यपि सप्तर्षिवर्ग अनेक भागों में विभक्त देखा जाता है, परन्तु इन में वेदप्रर्वतक सप्तर्षि, गोत्रप्रवर्त्तक सप्तर्षि, एवं सृष्टिप्रवर्त्तक सप्तर्षि ये तीन वर्ग ही मुख्य माने जाते हैं । सृष्टिप्रर्त्तक ऋषिवर्ग में एकर्षिवर्ग सप्तर्षिवर्ग भेद से दो वर्गं हैं । यद्यपि ' विरूपास- इद्दषयस्तइद् गम्भीरवेपसः " ( ऋकसंहिता ) के अनुसार सृष्टिप्रवत्त के ऋषि असंख्य हैं, तथापि ' चार श्रात्मा, दो पक्ष, १ पुच्छप्रतिष्ठा, भेद से सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति से उत्पन्न होने वाली सप्तावयवभूता प्राजापत्यसृष्टि के सम्बन्ध से सबका सप्तसंख्या में ही अन्तर्भाव मान लिया जाता है । इन प्राणात्मक सृष्टिकर्त्ता ऋषियों के सर्वप्रथम द्रष्टा मनुष्य ऋषि भी उन्हीं प्राणऋषियों के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । जिस विद्वान ने सर्वप्रथम भृगुप्राण का साक्षात्कार किया - वह, एवं तद्वंशधर भृगु नाम से ही प्रसिद्ध हुए । एवमेव वसिष्ठ - विश्वामित्र अङ्गिरा- कश्यप यादि तत्तत् प्राणों के परीक्षक तत्तद्- विद्वान् भी वसिष्ठ-विश्वामित्र श्रङ्गिरा- कश्यप आदि नामों से ही प्रसिद्ध हुए । जिसप्रकार प्राणात्मक ऋषि सृष्टिप्रवत्त के माने जाते हैं, एवमेव प्राणीरूप सात मनुष्य महर्षि गोत्रप्रवर्त्तक माने गए हैं । धर्म्मसूत्र के अनुसार आजदिन भारतवर्ष में सभी ब्राह्मण सप्तगोत्रों के मूलप्रवर्त्तक, सप्तर्षियों के ही वंशधर माने जाते हैं । तीसरा विभाग वेदप्रर्वत्तक - सप्तर्षियों का है । ये प्राणविध प्राणीविध, भेद से दो भागों में विभक्त हैं । शब्दात्मक वाङमय शास्त्र नामक वेद के प्रर्वतक प्राणीविध ( मनुष्यविध ) महर्षि हैं, एवं श्रग्निलक्षण वाङमय ब्रह्मसंज्ञक वेद के प्रवर्त्तके प्रागविध नित्य ऋषि हैं । इन दोनों के ही— १- भृगु, २- अङ्गिरा, ३ - अत्रि, ४ - मारीच - ( मरीचिपुत्र ) कश्यप, ५- मत्स्य, ६ - वशिष्ठ, ७- अगस्त्य, ८- कौशिक विश्वामित्र, ६- पुलस्त्य, १०- पुलह, ११- क्रतु, १२ - प्राचेतस दक्ष इत्यादि नाम सुने जाते हैं । सर्वप्रथम वेदकर्त्ता महर्षियों की १- मत्स्य, २- वसिष्ठ, ३- अगस्त्य ४ - भृगु, ५ - अङ्गिरा, ६ अत्रि, ७- कश्यप, ८ - भरद्वाज, भेद से आठ संख्याएँ उपलब्ध होतीं हैं । इन में से मत्स्य ऋषि को छोड़ कर शेष सातों गोत्रप्रवर्त्तक, एवं शाखाप्रवर्त्तक माने जाते हैं । इन्ही सात गोत्रों में वेदों का संतनन विशेषरूप ५- जिस दिव्य वेदवाक् का देवतुल्य मन्त्र - निर्माता महर्षियोंनें तप एवं श्रम से अन्वेषण किया है, उस वाग्देवी का में हविद्रव्य से यजन करता हूँ । वह मेरे आत्मा को पुण्यलोकों में प्रतिष्ठित करै । ६ - ऋषिवचन से भी यही सिद्ध है । वेद ऋषियों का वाक्य है + X + । ७६
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वैशेषिकदर्शन उपनिषद्भूमिका षष्ठ - मत मुख्य श्राचार्य्यं मानना से रहा । वास्तव में इन्हीं सातों को, एवं सातों के वेदद्रष्टा वंशधरों को वेदों के हैं प्रवर्त्तके । वसिष्ठ अगस्त्य - अत्रि तीनों चाहिए | इन में से किसी गोत्र के तो मूलपुरुष ही विशेषयोग्यताशाली हुए नहीं की । किन्तु विश्वामित्रगोत्री मूलपुरुष इसी कोटि में हैं । इन के वंशधरोंनें इन के समान प्रतिष्ठा प्राप्त में भी इनके वंशधरोंनें मूल-मधुच्छन्दा मूलपुरुष से भी आगे बढगए । एवमेव भृगु तथा श्रतिरागोत्र भार्गव गृत्समद की देखी जाती है, वैसी पुरुषों से कहीं अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त की । ऋग्वेद में जैसी प्रसिद्धि, एवं बृहस्पति ने, पात्रों की भृगु की भी नहीं । इसी प्रकार अङ्गिरागोत्र में पुत्रों की श्र ेणि में अथर्वाने वामदेव और कक्षीवान् ने जो प्रतिष्ठा श्रेणि में गोतम - भरद्वाज - कण्व प्रगाथ ने, प्रपौत्रों की श्रेणि में । श्रङ्गिरावंशज तत्काल में प्राप्त की है; वह सौभाग्य मूलपुरुषभूत स्वयं श्रङ्गिरा को भी प्राप्त नहीं तक हुआ बढी कि, इन को सप्तर्षिगणना नगद्गुरु एवं सर्वश्रेष्ठ माने जाते थे । आगे जाकर इन की महत्ता यहाँ, ३ - गोतम, ४- अत्रि, ५- विश्वा-में सम्मिलित कर लिया गया । यही दूसरा सप्तक १ -- भरद्वाज, २- कश्यप उल्लेख ऋग्वेदानुक्रम-मित्र ६- जमदग्नि, ७– वसिष्ठ इस नाम से प्रसिद्ध हुआ । इन सब का क्रमबद्ध रिका के मण्डल के ६७ वें सूक्त में द्रष्टव्य है । १- गोत्रप्रवर्त्तकाः सप्तर्षयः--१- भरद्वाजः । २- कश्यपः ६ - जमदग्निः । ७- वसिष्ठः । २- वेदप्रवर्त्तकाः सप्तर्षयः-। ३ - गोतमः । ४ - अत्रिः । ५ - विश्वामित्रः । १- वसिष्ठः । २ - अगस्त्यः । ३ - भृगुः । ४ - अङ्गिराः । ५ - श्रत्रिः । ६- पुलहः । ७ - भरद्वाजः । ३- सृष्टिप्रवर्त्तकाः सप्तर्षयः-१- मरीचिः । २- - अङ्गिराः । ३ - अत्रिः । ४- वसिष्ठः । ५ - पुलस्त्यः । ६ - पुलहः । ७ - क्रतुः । उपलब्ध होते हैं, वे उक्त प्रपञ्च से प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि, वेद में जितने भी मन्त्र बृहद्देवता सब उक्त सात वेदप्रवत्त'क महर्षियों, एवं तद्गंशधरों के ही कहे हुए हैं । अनुक्रमणिका, इसी मत का समर्थन सम्पूर्ण ऋग्वेद - सायणभाष्य, इतिहास ( महाभारत ), पुराण सब में विशेषरूप से हुआ है । श्रागे का मन्त्र भी यही कह रहा है— ७७
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वैशेषिकदर्शन प्रथमखण्ड १ - यज्ञेन वाचः पदवीयमायंस्तामन्वविन्दन् ऋषिषु प्रवष्टिम् तामाभृत्या व्यदधुः पुरुत्रा तां सप्तरेभा अभिसन्नवन्ते ॥ — ऋकं ० २२ | ३ | ३ | सप्तममत ७- यह वेद आम्नायवचनों से संगृहीत है । ( ३६ मत ) लोकपरम्परा से जनश्रुति के आधार पर जो वाक्य चिरकाल से चले आते हैं, जिन के मूलप्रवत ' क का पता नहीं हैं, ऐसे वाक्यों को ही ' आम्नायवचन ' कहा जाता | जबतक इन किंवदन्तीरूप आम्नाय -वचनों का पूर्णपरीक्षा के द्वारा मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होजाता, जबतक ऐतिहासिक प्रमाणों की भाँति आम्नायवचनों को भी प्रमाणभूत ही माना जाता है । सम्भवतः देवयुग से ही सृष्टिविद्या के सम्बन्ध में अज्ञातनामा तत्त-द्विद्वानों का जो अन्वेषण हुआ, एवं उस अन्वेषण के आधार पर वे धर्म - विज्ञानतत्त्व जिन अज्ञात - विद्वानों द्वारा शब्द के द्वारा प्रयुक्त हुआ, चिरकाल से चले आने वाले वे श्राम्नायवचन जहाँ जिस रूप से सुने गए, अपान्तरतमा महर्षि के अवतार कृष्णद्वैपायन ने उन उन प्रवादवाक्यों को उन उन ऋषिसम्प्रदायों से पूर्ण अनुसन्धान के द्वारा संगृहीत कर उनका एक स्वतन्त्र ग्रन्थ बना डाला । वही आम्नायवचनसंग्रह - ' मन्त्रसंहिता ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी संहितानिर्माण के कारण कृष्ण द्वैपायन वेदे व्यासङ्गो यस्य ' इस निर्वचन के अनुसार वेदव्यास नाम से प्रसिद्ध हुए । D प्रकाशन्तर से देखिए । जो कथा लोकपरम्परा से चिरकाल से व्यवहार में चली आ रही हो, किन्तु जिस कथा के सम्बन्ध में ' प्रथमप्रवर्त्तक अमुक व्यक्ति था ' यह पता न चले, जो केबल अतिपरम्परा से ( कानों कान ) सदैव सुनी जाती हो, साथ ही में शिष्टविद्वान् जिसे प्रमाणभूत मानते हुए तदनुकूल व्यवहार में लारहे हों, ऐसी प्रामाणिक, शिष्टानुग्रहीत कथा को ' आम्नायवचन ' कहा जाता है । यह आम्नायवचन स्वतः प्रमाण होते हुए सर्वथा सत्य होते हैं । इसी सनातन विश्वास के अनुसार धर्म्म, एवं विज्ञान के सम्बन्ध में जो जो कथारूप ( सूक्तरूप ) वाक्य ( मन्त्र ) जिन जिन ऋषियों के घरानों में विशेषरूप से सुने जारहे थे, जिन जिन वाक्यों ( मन्त्रों ) के अनुसार उन उन ऋषिसम्प्रदायों में चिरकाल से यज्ञादि धर्म्मक्रियाओं का अनुवर्त्तन चला रहा था, उन सब वाक्यरूप मन्त्रों, किंवा मन्त्ररूप वाक्यों का महाभारतकाल में भगवान् वेदव्यास ने बड़ी सावधानी से संग्रह कर उन्हें चार भागों में विभक्त किया । प्रत्येक विभाग के क्रमशः २१-१०१-१०००-६ इतने संग्रहग्रन्थ हुए । ये ही वेदसंहिताएँ कहलाई । स्वयं व्यास ने इसी मत का समर्थन किया है, जैसाकि निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट होजाता है— - श्राम्नायवचननं सत्यमित्ययं लोकसंग्रहः । आम्नायेभ्यः पुनर्वेदाः प्रसूताः सर्वतोमुखाः । ७८ -म ० शा ० १६१ अ ० २५६ अ ० ।
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वैशेषिकदर्शन उपनिषद्भूमिका
२ - आम्नायमार्षं पश्यामि यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः ।
तं विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ब्राह्मणस्यानुदर्शनात् ॥
७ मतसमष्टि के साथ उक्तसातों मतों का - -'वेद ' महर्षिकृत हैं, पौरुषेय हैं, अनित्य हैं ' इस ५ वें वैशेषिकमत मान लिया है । समन्वय है । अतएव इन सातों को हमने वैशेषिकमत में अन्तर्भूत ५ - वेद महर्षिकृत हैं, पौरुषेय हैं, अनित्य हैं । ( वैशेषिक - मत ) । १- ३३ - यह वेद देवर्षियों का वाक्य है । २- ३४- यह वेद अपृष्णि का वाक्य है । ३ - ३५ - यह वेद ब्रह्मर्षि का वाक्य है । ४—३६ – यह वेद अपान्तरतमा का वाक्य है । ५–३७ – यह वेद ऊरिता ऋषियों का वाक्य है । ६–३७ - यह वेद सप्तर्षियों का वाक्य है । हैं । ७-३६- यह वेद श्राम्नायवचनों से संगृहीत वाक्यग्रन्थ इति -- वैशेषिकमतप्रदर्शनम् । ७६
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श्रीः इति - सप्त- ( ७ ) - अवान्तरमतयुक्तं-वैशेषिकदर्शनाभिमत -- प्रदर्शनम् ५
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श्रीः अथ - युगधर्मानुगत - कलिवात्याहित-विभिन्न - काल्पनिक - मतप्रदर्शनम् तदनु- नास्तिकदर्शनाभिमत - मतप्रदर्शनश्च
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मह श्रीः मतभासात्मक - काल्पनिक - मत “ मन्त्रब्राह्मणोर्वेदनामधेयम् ' ( का ० ) इस श्रौतसूत्रसिद्धान्त के अनुसार यद्यपि वेदग्रन्थ विद्वत्समाज ही ( इन में मन्त्र- ब्राह्मण - भेद से दो भागों में विभक्त माने जाते हैं । परन्तु इन दोनों में संहिता । क्योंकि को ये चारों भी उपलब्ध- वैदिकप्र ेस अजमेर में मुद्रित चार संहिताओं को ही ) वेद कहना चाहिए शुद्ध संहिताएँ ही ईश्वरप्रोक्त हैं । शेष शाखारूप संहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषत् आदि भाग है । वे पौरुषेय हैं, ईश्वरप्रोक्त नहीं । भिन्न भिन्न ऋषियोंने भिन्न भिन्न काल में इन का निर्माण किया शाङ्खायन ब्राह्मणग्रन्थ आजदिन उन के कर्त्ता ऋषियों के नाम से ही पैजन्य, कौषीतकि, ऐतरेय, तैत्तिरीय, से ही स्पष्ट इत्यादि रूप से प्रसिद्ध हैं । कौन ब्राह्मण किस ऋषि की कृति है?, यह तत्तद्ब्राह्मणग्रन्थों को देखने होजाता है । " ' कहा है । यह मत उक्त मत ' मत ' नहीं, अपितु कल्पनामात्र है । इसीलिए हमने इसे ' मताभास उपोद्बलक सर्वथा अवैज्ञानिक है, वेदतत्त्वानभिज्ञ सामान्य मनुष्य की कपोल कल्पनामात्र है । अतएव इस मत का कोई शास्त्रीय वचन नहीं है । ६ – नास्तिकदर्शनाभिमत - मतप्रदर्शनम् इस मत के सम्बन्धमें हमें कुछ भी वक्तव्य नहीं है । कारण स्पष्ट है । नास्तिकदर्शन की मूलभित्ति अभिनिवेश ( हठ - दुराग्रह - मात्र ) है । एवं श्रभिनिविष्ट का सन्तोष करना सर्वथा असम्भव है - ' नतु प्रतिनिविष्ट-मूर्खजनचित्तमाराधयेत् ' । नास्तिकों का स्वरूप बतलाते हुए अभियुक्त कहते हैं-नास्ति वेदोदितो लोक इति येषां मतिः स्थिरा । नास्तिकास्ते ' ॥१ ॥
अवैदिकप्रमाणानां सिद्धान्तानां प्रदर्शकाः ।
चार्वाकाद्याः षड्विधास्ते ख्याता लोकेषु नास्तिकाः ॥ २ ॥
जो अवैज्ञानिक मनुष्य विज्ञानधन वैदिक - तत्त्वों को समझने में असमर्थ होते हुए वेदप्रतिपादित के सम्बन्ध परलोक - श्रात्मा - परमात्मा - आत्मगति - श्राद्ध - अवतार - मूर्तिपूजन - वर्णाश्रम व्यवस्था आदि ही व्यक्ति में अपने अभिनिवेश से- ' यह सब कुछ मिथ्या है ' यह दृढ निश्चय रखते हैं, अतिवादशून्य वे से सामान्य नास्तिक कहलाते हैं । ये लोग वेदविरुद्ध, स्वकपोलकल्पित, सर्वथा नवीन, नितान्त भ्रान्त सिद्वान्तों ये ६ भेद जनता को मोह में डाला करते । इनके चार्वाक, योगाचार, सौत्रान्तिक, वैभाषिक माने, गए आईत हैं । बृहस्पति हैं । सभी वेदमार्ग के विरुद्ध जाने वाले हैं । इनमें नास्तिकों के शिरोमणि बृहस्पति ८३