Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 401–410

उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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नास्तिकदर्शन प्रथमखण्ड प्रथममत मत का अनुगमन करने वाले चार्वाकों का कहना है कि- ' पृथिवी, जल, तेज- वायु - भेद से चार तत्त्व हैं । इन चारों भूर्ती के समन्वयविशेष से शरीर में अपने आप चेतना का उदय होजाता है । शरीरनाश के साथ साथ ही चेतना भी नष्ट होजाती है । चैतन्यविशिष्ट शरीर ही आत्मा है । शरीर से अतिरिक्त कोई नित्य- श्रात्मा नहीं है । तीनों वेद, एवं तत् प्रतिपादित कर्म्मकलाप धूत्तों का प्रलापमात्र है । शरीख्याधि ही नरक है, शरीरस्वास्थ्य ही स्वर्ग है । प्रजा को सुखी रखने वाला राजा ही परमेश्वर है । देह का विनाश ही मोक्ष है । सम्पूर्ण जगत् अपने आप स्वभाव से ही उत्पन्न, एवं नष्ट होता रहता है, जैसा कि आचार्य

कहते हैं-अग्निरुपणे जलं शीतं शीतस्पर्शस्तथानिलः ।

केनेदं चित्रितं तमात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिः ॥

इस नास्तिक मत के अनुसार वेद स्वार्थलोलुप, अवैज्ञानिक, ग्रामीण मनुष्यों की रचनामात्र है । इस मत के भी यद्यपि अनेक अवान्तर विभेद श्रुतोपश्रुत हैं । किन्तु श्रप्रमाणात्मक'उन काल्पनिक - नास्तिक - मत -विभागों का केवल एक मतप्रदर्शन के द्वारा ही अत्र उपसंहार कर दिया जाता है । १ - यह वेद स्वार्थी मनुष्यों के स्वार्थसिद्धि का द्वारभूत वाक्यसंग्रहमात्र है । ( ४० मत ) चार्वाक शिरोमणि बृहस्पति का कहना है कि, पुरायुग में अपनी तीक्ष्णबुद्धि के प्रभाव से तत्कालीन मानवसमाज में अपने आप को सर्वश्रेष्ठ, ईश्वर के मुख से उत्पन्न कहने वाले ब्राह्मणवर्गने संसार को धोका देने के लिए तद्युगया ग्राम्यभाषा में अपने अपने नामों से वाक्य बनाकर, उन्हें ईश्वर का सन्देश कहते हुए सर्वथा कल्पित स्वर्गादि की विभीषिका उपस्थित की है । इन धूर्तों का वह स्वार्थसाधक ग्राम्यभाषामय श्रसत् साहित्य ही वेद है । इस मत के उपोद्बलक निम्नलिखित वचन है— -न स्वर्गो नापवर्गो या नैवात्मा पारलौकिकः ॥ नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥ १ ॥

अग्निहोत्रं त्रयोवेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् ॥ प्रज्ञापौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ॥२ ॥

१ - न स्वर्ग नाम का का कोई श्रभ्युदयसाधक परलोक है, न अपवर्ग नाम का निःश्रेयसंसाधक कोई मुक्तिधाम है । न ( श्रनित्य शरीर से अतिरिक्त ) परलोकगामी कोई ( नित्य ) आत्मा । एवं न वर्णाश्रमधर्मानुकूल धर्मकर्म्म किसी उत्कृष्ट फल के देने वाले हैं ॥ १ ॥

प्रातः सायं किया जाने वाला, जरामर्यसत्र नाम से प्रसिद्ध ( वेदप्रतिपादित ) अग्निहोत्र, ऋग्-यजुः साम भेद भिन्न तीनों वेद, आध्यात्मिक - आधिभौतिक- आधिदैविक भेदभिन्न तीनों दण्ड, अथवा कायिक- वाचिक - मानसिक पाप के फलरूप तीनों दण्ड, अथवा त्रिवर्ण के सन्यासियों के लिए विहित तीन दण्ड, अथवा वाक् - धिक - पौरुषदण्ड, ललाट पर भस्मावलेप, ये सब प्रपञ्च बुद्धि, एवं पुरुषार्थशून्य अकर्मण्य मनुष्यों की जीविका के साधन हैं । २ । ८४

पृष्ठ 402

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नास्तिकदर्शन उपनिषद्भूमिका २ - पशुश्च निहतः स्वर्ग ज्योतिष्टोमे गमिष्यति ॥ स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ॥ ३ ॥

मृतानामपि जन्तूनां श्राद्ध ' चेत् तृप्तिकारणम् ॥ गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेय कल्पना ॥४ ॥

यदि गच्छेत् पर लोकं देहादेष विनिर्गतः 11

कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः ॥

मृतानां प्रेतकार्य्याणि न त्वन्यद् विद्यते क्वचित् ॥

३- त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भएड- - धूर्च - निशाचराः ।

जीवहिंसां प्रशंसन्ति यज्ञे मांसाशनेच्छया ॥ ६ ॥

दर्शयन्ति च देहान्ते स्वर्गसौख्यप्रलोभनम् ।

देवदुवरितं चाहुर्मनोरञ्जनहेतवः ॥ ७ ॥

प्रथममत यह वेदवचन २ - ‘ ज्योतिष्टोम नाम से प्रसिद्ध सोमयाग में मारा गया पशु स्वर्ग में जायगा ' यदि डालता? । भला अपने पिता को सत्य है, तो फिर यजमान अपने पिता का ही ( यज्ञ में ) वध क्यों नहीं कर स्वर्ग कौन नहीं पहुँचाना चाहेगा । ३ । जाते हुए यात्री मृतप्राणियों के लिए यदि श्राद्ध का अन्न तृप्ति का कारण बनता है, तो फिर विदेश प्राणी को न पहुँचा को पाथेय ( मार्गभोजन ) देना व्यर्थ है । जिस मार्ग से परलोक जैसे विदूर लोकस्थ १ | ४ | दिया जाता है, क्या उसी मार्ग से इसी लोक में पाथेय नहीं पहुँचाया जासकता चला जाता है, तो वह क्यों यदि श्रात्मा नाम का [ कल्पित ] जीब इस शरीर को छोड़कर परलोक करता | ५ | नहीं अपने बन्धुओं के स्नेह से श्राकर्षित होकर कभी कभी उन से मिल जाया मृतमनुष्यों के [ सिवाय जलाने के ] और कोई प्रतकार्य्यं बाकी नहीं बचता है । खाने की इच्छा से यज्ञ में ३- माँड - धूर्त्त - निशाचर ये तीन हीं वेद के रचयिता हैं । ये लोग माँस पशुवध की प्रशंसा करते हैं । ५ । हैं कि, यज्ञकर्ता भी इस साथ ही में शरीर के मरने पर स्वर्गसुख का प्रलोभन देते हैं । अर्थात् कहते अत्मा स्वर्ग जायगा । जिन शरीर से पृथक होने पर स्वर्ग जायगा, साथ में यज्ञ में मारे हुए पशु का भी - विष्णु का मोहिनी रूप मनुष्यों को इन्होंनें देवता मान रक्खा है, उनके दुश्चरित्रों को [ इन्द्र का जारत्व धारण - आदि को ] ] ये देवताओं का मनोविनोद बतलाते हैं । ७ । ८५

पृष्ठ 403

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नास्तिकदर्शन प्रथमखण्ड

४ - श्रसार सर्वमत्रोक्त न किश्चित्वमस्ति हि ।

नास्तीश्वरस्तत्माद्भयं मिथ्या प्रदर्श्यते ॥ ८ ॥

यावञ्जीवेत् सुखं जीवेद् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत् ।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ ६ ॥

प्रथममत ४ - वस्तुतः वेदों में जो कुछ कहा गया है, वह सर्वथा निःसार है । इनमें एवं इनके अनुयायी ब्राह्मणों के कथन में कुछ भी तत्त्व नहीं है । ईश्वर नाम को कोई पदार्थ नहीं है । ये धूर्त्तं ईश्वर के नाम से जनता को झूठा भय दिखलाते रहते हैं ॥ मनुष्य को चाहिए कि, वह जबतक जीवे, सुख से जीवे । कर्ज करके घृतपान करे । भला खाक में मिला पुतला भी कहीं फिर कर्ज चुकाने वापस आया है ॥ इति - नास्तिकदर्शनाभिमत- मतप्रदर्शनम् ६ क ( ) ह क ८६ लिए एक

पृष्ठ 404

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IIII

पृष्ठ 405

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श्रीः इति - वेदापौरुषेयत्त्व - पौरुषयेत्त्वसम्बन्धे-" दार्शनिकविचार - प्रसंगः ” उपरतः

पृष्ठ 406

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श्रीः वेद के तात्त्विक स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणिता " वैज्ञानिक- वेद - निरुक्तिः ”

पृष्ठ 407

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पृष्ठ 408

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* श्रीः * वेद के तात्त्विक स्वरूप की रूपरेखा से अनुप्राणिता " वैज्ञानिक- वेद - निरुक्तिः ” विषयोपक्रम -, गोतम, कपिल, कणाद, आदि एक ही वेदपदार्थ के सम्बन्ध में जैमिनि व्यास, उदयनाचार्य्य की यह विचारधारा ३६ भागों में विभक्त दार्शनिकों के भिन्न भिन्न विचार हैं । श्रागे जाकर श्रास्तिकवर्ग ज्ञानं संशयः " इस लक्षण के होजाती है । ऐसी दशा में- “ एकस्मिन् धर्म्मणि विरुद्धनानाकोटयवगाहि में परस्पर सर्वथा विरुद्ध अनेक मतवादों के उप-अनुसार एक ही वेदापौरुषेयत्व - पौरुषेयत्व के सम्बन्ध होना सर्वथा अनिवार्य है । इन सन्देहों की स्थित होने से एक तटस्थ जिज्ञासु के हृदय में सन्देह का प्रादुर्भूत परिचय प्राप्त करना । वेद का वैज्ञानिक स्वरूप निवृत्ति का एकमात्र उपाय है - वैज्ञानिक वेद का स्वरूप यथावत् समन्वय होजाता है । वेद का वैज्ञानिक स्वरूप समझ लेने के अनन्तर पूर्वप्रतिपादित सभी मतवादों का ' भी कह सकते हैं । ' ईश्वरकृत ' भी मान समझ लेने के पश्चात् आप वेदों को ' नित्यकूटस्थ अपौरुषेय ' भी मान सकते हैं । एवं ' महर्षिकृत ' भी कह सकते हैं । ‘ ईश्वरावतारकृत ' भी मान सकते हैं । ' प्राकृतिक सभी दार्शनिक मत प्रतिष्ठित हैं । अपनी अपनी दृष्टि से सकते है । अवारपारीण एक ही विज्ञानधरातल पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । सभी मत सत्य हैं 1 । सत्याधार उसी वैज्ञानिक - वेद की ओर विज्ञ अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ वेदप्रतिष्ठानुगता -- आत्मस्वरूपनिरुक्तिः १ , मूर्त्त - अमूर्त्त, श्रहः - रात्रि, राग - द्व ेष, पाप - पुण्य, सुख - दुःख, सत् - असत् - विनाश , निरुक्त , आगति - अमिरुक्त - गति, अग्नि - सोम, शीत-शुक्ल - कृष्ण, विद्या अविद्या, सर्ग - प्रलय, उत्पत्ति, पिता - पुत्र, स्वामी - सेवक, आदि आदि ग्रीष्म, पति - पत्नी, पुरुष - प्रकृति, राजा प्रजा, गुरु - शिष्य , स्थावरजङ्गमात्मक इस मायामय विश्व का मूल असंख्य द्वन्द्वभावों से नित्य समाकुलित, विविधभावाक्रान्त पर यह विश्व प्रतिष्ठित है?, इत्यादि प्रश्नों की क्या है?, किससे यह विश्व उत्पन्न हुआ है?, किस आधार का सम्यक समाधान करती हुई श्रुति कहती है -अपनी ओर से उत्थानिका करती हुई, साथ ही में इन प्रश्नों ६१

पृष्ठ 409

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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड ( प्रश्नश्रुतिः ) १ – किंस्विद्वनं क उ स वृक्ष श्रासीत्, यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । आत्मनिरुक्ति कीममनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तत्, न || १ || १ यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ( उत्तरश्रुतिः ) २ -- ब्रह्मवनं ब्रह्म स वृक्ष श्रासीत्, यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वः, ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥२ ॥

- तै ० ना ० २८६६-७ इति । PRET १ - " वह कौनसा वन ( जङ्गल ) था, उस वन में वह कौनसा वृक्ष था जिसे काट - छाँट कर पृथिवी- करते द्य - अन्तरिक्ष रूप त्रैलोक्य बना दिया गया? । हे विद्वानों! अपने मन से उक्त दोनों प्रश्नों का विचार हुए सृष्टिविद्या के प्राचाय्यों से उक्त प्रश्नों का उत्तर पूँछो । साथ ही में उन्हीं श्राचाय्यों से यह भी पूछो कि- बन जिस तत्वने इन सातों भुवनों को अपने ऊपर धारण कर रक्खा है, साथ ही में जो तत्त्व सातों का नियन्ता रहा है, वह कारणब्रह्म कौन है? " २ ( आचार्य उत्तर देते हैं ) - " ब्रह्म ही वह वन था, उस वन में ब्रह्म हो वृक्ष था, जिस ब्रह्म वृक्ष को काट - छाँट कर त्रैलोक्य बना दिया गया । हे प्रश्नकर्त्ता विद्वानों! मैं पूर्ण अन्वेषण करने के पश्चात् अन्तः-करण से तुम्हें बतलाता हूँ कि, ब्रह्म ने हीं सम्पूर्ण भुवनों को धारण कर रक्खा है, एवं ब्रह्म ही भुवनों का अध्यक्ष है? " ब्रह्म श्रुति के उक्त प्रश्न, एवं समाधान को सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकते । " ब्रह्म ही वन था, जन अपनी ही वृक्ष था । उस वृक्ष से त्रैलोक्य बन गया " केवल इन अक्षरों से अस्मदादि साधारण जिज्ञासा शान्त नहीं कर सकते । सृष्टिविषयक सभी प्रश्नों का विशद वैज्ञानिक समाधन ईशोपनिषद् विज्ञान-भाष्य में किया जाचुका । यदि प्रकृत में भी उसका पिष्टपेषण किया जायगा, तो आवश्यकता से अधिक विस्तार और भी अधिक विस्तृत होजायगा । फलतः प्रतिपाद्य विषय में संकोच करना पड़ेगा । इसलिए यहाँ इस सम्बन्ध में हम केवल यही कह देना पर्याप्त समझते हैं कि, जिस ब्रह्म को श्रु तिने वन बतलाया है, वह परात्पर ब्रह्म है । सर्ववलविशिष्ट रस ही का नाम परात्पर है । यही परमेश्वर है । परात्पर परमेश्वर निःसीम है, व्यापक है । दिग्देशकाल से अनवच्छिन्न है । जिसप्रकार एक अरण्य की इयत्ता अननुमेया होती है, उसी प्रकार असीम परात्पर की भी इयत्ता नहीं की जासकती । इसी अांशिक सादृश्य को लेकर श्रु तिने परात्पर-ब्रह्म की वन के साथ तुलना की है- ( देखिए ई ० वि ० भा ० प्र ० ख ० प्राकथन १८ पृष्ठ से पृष्ठ २७ पर्यन्त ) । ६२

पृष्ठ 410

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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका श्रात्मनिरुक्तिः हैं । अमित को मित ( सीमित ) बना उस व्यापक परात्पर में ससीम असंख्य मायाबल बल विशेष ही " माया " नाम से व्यवहृत देने वाला सर्वचलकोशाधिष्ठाता ज्येष्ठ, एवं श्रेष्ठ प्रदेश में उदय होता के जिस जिस । मायाबलों का परात्पर- धरातल हुआ है इन सीमित होता हुआ ' पुरुष ' नाम धारण कर लेता है । मायाचल क्योंकि है, वह परात्पर प्रदेश मायारूप पुर से मायी पुरुष उस व्यापक परात्पर धरातल पर उदित होजाते असंख्य हैं. अतएव मायाबलावच्छिन्न असंख्य ही अधिक अधिक अन्तर पर अनन्त वृक्ष प्ररोहित रहते हैं, हैं । जिसप्रकार एक महा अरण्य में थोड़े थोड़े, अथवा में वृक्षस्थानीय असंख्य मायीपुरुष प्रतिष्ठित ठीक इसीप्रकार महाअरण्यस्थानीय इस व्यापक परात्परप्रदेश है । प्रत्येक ईश्वर का एक एक स्वतन्त्र विश्व है । परात्पर रहते हैं । प्रत्येक मायीपुरुष एक एक स्वतन्त्र ईश्वर इन ईश्वरों की अपेक्षा परमेश्वर कहलाता है । परमेश्वर में ऐसे असंख्य ईश्वर, किंवा विश्वेश्वर हैं, अतएव वह है, परन्तु उसमें वृक्ष अनेक होते हैं । ( देखिए ई ० वि ० जहाँ एक है, वहाँ ईश्वर असंख्य हैं । जङ्गल एक होता पृ ० पर्यन्त ) । भा ० प्र ० पुरुष - निरुक्तिप्रकरण २६५ पृष्ठ से २८३ नाम से सम्बोधित हुआ है । इस वृक्षरूप पुरुष उपनिषत् एवं गीताशास्त्र में अश्वत्थवृक्ष क्षुद्र विश्व है । प्रत्येक विश्व में । प्रत्येक शाखा एक एक अश्वत्थवृक्ष की एकसहस्र शाखाएँ मानी गई हैं । सप्तवितस्तिकायात्मक शाखेश्वर ही उपे-ये सात सात लोक हैं भूः भुवः स्वः - महः - जनत् - तपः - सत्यम् हैं । सहस्रों- उपेश्वरों को अपने गर्भ में रखने वाला अश्व-श्वर है । ईश्वर के गर्भ में ऐसे सहस्र उपेश्वर विश्वात्मक भुवनों का अन्यतम अध्यक्ष है, जैसाकि निम्न त्थेश्वर वृक्षवत् स्तब्ध खड़ा है । यही ईश्वरवृक्ष लिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट है -कश्चित् । यस्मात् पर ं नापरमस्ति किश्चिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्गम् ॥ विवत हैं । तीनों में क्रमश: ३-५-३ ये इस अश्वत्थेश्वर पूर्णपुरुष के अमृत ब्रह्म - शुक्र ये तीन प्राण - आपः - वाक् - अन्न-समष्टि " अमृतम् " है । अश्वान्तर विभाग हैं | अव्यय - अक्षर आत्मक्षर की समष्टि " शुक्रम् " है । इन तीनों से अतिरिक्त उस अन्नाद की समष्टि ब्रह्म है । वाक् आपः अग्नि तुरीयपद की है । इसप्रकार पुरुषब्रह्म चतुष्पाद होजाता है । इन व्यापक परात्पर का भी इसमें समावेश है । वही रहते हैं, शेष चौथा शुक्रपाद विश्वरूप में परिणत चारों में परात्पर - अमृत - ब्रह्म ये तीन पाद तो अक्षुण्ण से “ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादो स्येहाभवत् पुनः ” होता है— ( देखिए ई ० शुक्रनिरुक्ति ) । इसी अभिप्राय, अपितु उसका एक भाग ही विश्व बना है, यही बात यह कहा जाता है 1 । सम्पूर्ण वृक्षब्रह्म विश्व नहीं बनता बनाए हैं " यह कहा है । परात्परावच्छिन्न अव्यय बतलाने के लिए पूर्व श्रु तिने " वृक्ष को काट कर भुवन है, ब्रह्म उपादानारम्भण है, शुक्र उपादान हैं, स्वयं विश्व का आलम्बन है, अक्षर कर्त्ता है, क्षर उपादानमूल विवर्त्त हैं । वही ब्रह्म मायावच्छेदेन वृक्षब्रह्म बना है । वही विश्व कार्य है । ये सब एक ही परात्परब्रह्म के ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते " | वही लोकात्मक है, वही योगमायावच्छेदेन विश्व बना है - " तदेव शुक्र ं ( तद् श्र ० ४ । ४ । १३ ) । इसी श्रात्माद्वै तसिद्धान्त को लक्ष्य में लोक है- ' तस्य लोकाः, स उ लोक एव ' ३० " शब्द का ही व्यवहार किया है । रखकर पूर्व की प्रश्नोत्तर - श्रुतियोंनें सर्वत्र " ब्रह्म ६३