Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 411–420
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 411–420
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वेदनिरुक्तौ १ - परात्परब्रह्म - ' ब्रह्मवनम् ' २- पुरुषब्रह्म-क. १ - अव्ययानुग्राहकः परात्परः २ - पञ्चकलोऽव्ययः १३ - पञ्चकलोऽक्षरः ४ - पञ्चकलः क्षरः १- प्राण: २- श्रापः प्रथमखण्ड आत्मनिरुक्ति १ - " अमृतम् ” ३-- वाक् " ब्रह्म ' " ब्रह्म स वृक्ष आसीत् " ४- अन्नम् ५ - अन्नादः १ - वाक २- श्रापः " शुक्रम् " ३ - अग्निः १- परात्परः २ - श्रमृतम् - " चतुष्पाद्ब्रह्म- त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोस्येहाभवत् पुनः " ३- ब्रह्म ४ - शुक्रम् ६४
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका आत्मनिरुक्तिः को सच्चिदानन्दघन ' सत्यं ज्ञाननमनन्तं ब्रह्म ' - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इत्यादि श्रुतियाँ ब्रह्म श्रुतियाँ बतला रहीं हैं । साथ ही में ' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' - ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वम् यदिदं किञ्च ' इत्यादि विश्वमूलभूत ब्रह्म उसी ब्रह्म को विश्वरूप में परिणत मान रहीं हैं । इस से हमें मानना पड़ता है कि, भी सच्चिदानन्द ही है । पूर्व भी सच्चिदानन्द है, एवं इस मूलब्रह्म के अंशरूप से उत्पन्न विश्व परिणत हुआ है, एवं उस शुक्र के में बतलाया गया है कि, चतुष्पाद्ब्रह्म का शुक्रभाग ही विश्वरूप में है । ' वाग्विवृताश्च वेदाः ' के वाक् आपः - अग्नि ये तीन विवर्त्त ' हैं । इन तीनों में वाक् ही मूलशुक्र वेद को हम इस वेदप्रकरण में-अनुसार वेदतत्त्व इसी वाक्शुक्र का विवत ' है । इसी वाङ्मय सच्चिदानन्दलक्षण ‘ मूलवेद ’ कहेंगे । व्यापार करते इस मूलवेद के विकास के लिए ब्रह्मा - विष्णु - महेश, नामक तीन देवता । , जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा हैं । पुराण के मतानुसार तीनों वेदों के प्रवर्त्तक उक्त तीनों देवता ही हैं देवताओं के वीरण ( प्रतिस्पर्द्धा-निगमशास्त्र के मतानुसार वेद का प्रादुर्भाव ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र स्पष्ट इन है— तीन रूप उत्तेजना ) से हुआ है, जैसाकि निम्नलिखित मन्त्रवर्णन से
“ उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः ।
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वितदैरयेथाम् ॥
किं तत् सहस्रमिति! इसे लोकाः, इसे वेदाः, थो वाक् - इति ब्रूयात् " ( ऐ ० ब्रा ० ६।१५ ), ये दोनों किसी से भी " इन्द्र और विष्णु नाम के दोनों देवताओंनें सम्पूर्ण विश्व को जीत लिया परस्पर है में ) नहीं हारा है । पराजित नहीं होते हैं । साथ ही में इन दोनों में भी एक दूसरे से कभी कोई ( से तीन साहस्रियाँ इन्द्रा विष्णु दोनोंनें जब " अप् " तत्त्व पर स्पर्द्धा की, तो इन्होंनें अपने स्पर्द्धारूप वीरण तीन कौनसी हैं?, यदि कोई यह प्रश्न करे, तो उसे कहना चाहिए कि, ये ही तीन साहस्त्रियाँ हैं ” । उत्पन्न कर दीं । वे तीन साहस्त्रियाँ लोक, ये तीन वेद, और वाक्, ये विचार यह करना है कि, इन्द्र - विष्णु कौन हैं?, इन की स्पर्द्धा का क्या स्वरूप है?, जिस अपतत्त्व साहस्रियों का पर ये स्पर्द्धा करते हैं, वह अपतत्त्व क्या पदार्थ है?, एवं लोक, वेद, वाक् पड़ेगी , नाम । की ' स तीनों वा एष आत्मा क्या स्वरूप है १ । इन प्रश्नों की मीमांसा के लिए हमें श्रात्मसीमांसा करनी मनःप्रणवाङ् मय है । दूसरे वाङ्मयः प्राणमयो मनोमय: ' ( बृहदारण्यक ) इस सिद्धान्त के अनुसार होरहा है आत्मा । मनोमय आत्मा पहिला पर्न शब्दों में यों कहिए कि, एक ही आत्मा तीन स्वरूपों में परिणत कह सकते हैं । ज्ञान ही को विद्या है । मन ज्ञानशक्तिघन है, अतएव हम इस श्रात्मा को ज्ञानात्मा ' पर्व है । प्राण कहते हैं, अतएव यही ' विद्यामय - आत्मा ' कहलाने लगता है । प्राणमय । कर्म्म आत्मा ही दूसरा एक प्रकार का वीर्य्य क्रियाशक्तिघन है, क्रिया कर्म है, अतः हम इसे कम्र्मात्मा कह सकते हैं उसी श्रात्मा का तीसरा विवर्त्त ( शक्ति - बल ) है, अतएव इसे हम ' वीर्य्यमय आत्मा ' भी कह सकते हैं । इसे हम ' भूतात्मा ' कह सकते वाङ्मय है । वाक् अर्थशक्तिघन है । अर्थ को ही भूत कहते हैं, अतएव ईशभाष्य के ' मनः प्रारणवाक के है । मनःप्राणवाक्, तीनों त्रिवृद्भावापन्न रहते हैं, जिस त्रिवृद्भाव का कि देखिए, ई ० उ ० प्र ० खण्ड ) । त्रिवृद्भाव की व्यापकता ' प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है- ( हपू
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड आत्मनिरुक्तिः इस त्रिवृद्भाव का तात्पर्य्य पञ्चीकरण प्रक्रिया से गतार्थ है । श्रद्ध भाग में भन, श्रद्ध भाग में शेष प्राण- ही वाक्, इस त्रिवृत्करण में जो मनःप्रधान - ( प्राणवाग् गर्भित ) एक अपूर्ण स्वरूप उत्पन्न होता है, आत्मा उसे, हम यहाँ मनोमय श्रात्मा कहेंगे । इसी प्रकार प्रारणप्रधान ( मनो- वाग्गर्भित ) अपूर्णभाव को प्राणमय ज्ञानात्मा एवं वाक्प्रधान ( मनः प्राणगर्भित ) पूर्णभाव को वाङ्मय श्रात्मा कहा जायगा । मनोमय कम्र्मात्मा मनः प्राण से से भी युक्त है । एवमेत्र वाङमय ' युक्त वाक् - प्राण से युक्त होता हुआ ज्ञान- अर्थ हमें इमें निश्चय पर होता हुआ मनः- प्राण से युक्त होता हुआ ज्ञान - क्रिया से भी युक्त है । इस कथन से वह कर्म्म अर्थ का पहुँचना पड़ा कि, जिसे हम ज्ञानात्मा कहते हैं, वह केवल ज्ञानमय ही नहीं है, अपितु हैं, अपितु तीनों में भी सञ्चालक है । एवमेव कर्मात्मा एवं भूतात्मा भी विशुद्ध कर्म्म, एवं भूतमय ही नहीं के कारण ही तो तीनों शक्तियाँ विद्यमान हैं । हाँ, गौण - मुख्यभाव का अवश्य ही तारतम्य है । इस विशेषभाव से व्यवहृत किया ताच्छव्य न्याय के अनुसार इन्हें क्रमशः - ज्ञानात्मा - कम्र्मात्मा भूतात्मा, इन नामों जाता है । सर्वप्रथम मनःप्रधान ज्ञानात्मा की तीनों कलाओं का ही विचार कीजिए । इस पक्ष में रसतत्त्व को है । परन्तु असंग ही ज्ञान कहा जायगा । इस रस के साथ बल का सयोग होता है, बल की चिति श्रात्मा होती की वह अवस्था-रस की प्रधानता से इस आत्मा पर बल अपना पूर्ण प्रभाव नहीं जमा सकता । इस ज्ञान, जिस पर बलने कोई अधिकार नहीं जमाया है, बल सर्वात्मना जिसके गर्भ में विलीन है, ऐसे विशुद्ध का उपभोग किंवा विशुद्ध रसपर्व को ही ' आनन्द ' कहा जाना है- ' रसो ह्येव सः ' । यही पहिली ही मनःकला यह क्षोभ उत्पन्न कर है । आगे जाकर बल का कुछ विकास होता है । बल कुर्वद्रूप है । उदित होते ' नाम से प्रसिद्ध है । देता है । क्षुब्धबलावच्छिन्न रस की यह दूसरी ( आशिक ) कुर्वद्रूपावस्था है । ही तभी ' विज्ञान तो विज्ञान के सम्बन्ध में-विज्ञान में ज्ञान भी है, तो क्रियां का भी प्रशिक रूप से उदय होरहा बल कुछ मात्रा में ' विज्ञायते ' इस क्रियापद का प्रयोग होता है । यही दूसरी प्रारणकला का उपभोग है । श्रात्मा भूताविष्ट होजाता और चित होता है, कुछ स्थूलता आजाती है । यही स्थूलता भूतभाव है । इससे होने वह की योग्यता है । यही तीसरी है । वही इसका तीसरा ' मनो ' विभाग है । मन में भौतिक विषय का संसर्ग प्राण से विज्ञान का, एवं अर्थघना बाकूकला का उपभोग है । इसप्रकार ज्ञानघन मन से श्रानन्द का क्रियाघन की ही है । एव इसे हम मनोविवर्त्त ही बाकू से मन का उदय होजाता है । इन तीनों में प्रधानता मनोमय रस सर्वथा असंग है । द्वन्द्वभावों से कहेंगे, यही पहिला ज्ञानात्मक, किंवा आत्मा का त्रिकल विद्या - भाग है । यह इस श्रात्मविवर्त का कोई सम्बन्ध नहीं है । १ -- मनोमयो ज्ञानात्मा - विद्याविवर्त्तम्-विशुद्धरस: --श्रानन्दः- --मनोमयः १ - ज्ञानात्मा - बलोदयावच्छिन्न रसः ' - विज्ञानम् ----प्राणमयम् -मनोविवर्त्तम् बलव्यापारावच्छिन्नरसः - मन: ( अन्तर्मनः ` - वाङमयम् तदित्थं मनोमये ज्ञानात्मनि, आत्मनो विद्याविभागे वा मनसस्त्रिवृदभाणेन मनः- प्राण- वाचां सम्बन्धात् - कलोदयः । ६६
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उपनिषद्भूमिका आत्मनिरुक्तिः पूर्व में हमने बल से क्रिया-दूसरा प्राणप्रधान कम्र्मात्मा है । क्रियातत्त्व, क्रियाशक्ति ही प्राण है । ही का नाम क्रमशः बल-भाव का विकास वतलाया है । बात यर्थार्थ में यह है कि, बल की अवस्थाविशेषों तीनों का प्रत्यक्ष किया जासकता प्रारण क्रिया है । एक ही बल तीन अवस्थाओं में परिणत होरहा है । इन की शक्ति विद्यमान है । यही शक्ति-है । आप अपने हाथों से अभी कोई काम नहीं कर रहे, परन्तु काम करने वल को म बल शब्द से ही व्यवहृत रूप बल ' बल ' है । यह इसकी सुप्तावस्था है । इस अवस्था में इस गया । इसी अवस्था में यह करेंगे । आपने कार्य्य आरम्भ कर दिया, सुप्तबल्ल जाग्रत होगया, कुर्वद्रूप बन करेंगे कि, काम करते करते आपके हाथ थक जायँगे । आप अनुभव इसी आधार पर आपको मानना पड़ेगा कि, प्राणरूप में परिणत बल ' प्राण ' नाम से व्यवहृत होता है । मेरे हाथों की शक्ति निकल गई । है । इसी को वैज्ञानिक लोग चल खर्च होरहा है । यही बल की तीसरी निर्गच्छत् अवस्था उक्त तीनों अवस्थाओं के कारण " क्रिया " शब्द से व्यवहृत करते हैं । इसप्रकार वही मूलबल पर हमने प्राणप्रधान आत्मा को कम्र्मात्मा अन्त में “ कर्म्म ” रूप में परिणत होजाता है । इसी आधार । जितना रस, उतना बल, रस - बल नाम से सम्बोधित किया है । इस कर्म्मात्मा में भी बलचिति का तारतम्य है होता हुआ अन्तर्मन था, यह मन की यह साम्यवस्था ही पहिली मनःकला है । विद्यात्मक मन अन्तर्मुख कर्म्म, दोनों का समावेश है । बहिर्मुख बनता हुश्रा बहिर्मन है । मन रसात्मक ज्ञान, तथा बलात्मक होता है, वहाँ इसी सर्वेन्द्रिय मन से श्रतएव मन से जहाँ प्रज्ञामात्रा - प्रधान ज्ञानेन्द्रियों का सञ्चालन मनः " । यही त्रिवृदात्मा की मन: -प्रारणमात्रा - प्रधान कर्मेन्द्रियों का भी सञ्चालन होता है- “ उभयात्मक अवस्था को ही " प्रारण " कहा कला का उपभोग है । आगे जाकर बल क्रमशः बढ़ने लगता है । इस दूसरी अभिभूत जाता है, केवल बल की जाता है । बल की चिति और होती है । इस अन्तिम चिति से रसरूप ज्ञान का उपभोग है, वाक् में ही प्रधानता रहजाती है । इसी तृतीयावस्था का नाम ' वाकू ' है । प्राण में प्राणकला प्राण की है, अतएव इसे हम ' वाक्कला का उपभोग है । तीनों की समष्टि कर्मात्मा है । इसमें होजायगा प्रधानता । प्राणविवर्त्त ही कहेंगे । यह ससङ्गासङ्ग है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट -२ -- प्राणमयः कर्मात्मा - “ वीर्य्यविवर्त्तम् ” -रसन्त्रलयोः साम्यावस्था — मनः ( मनोमयम् ) रसगर्भितं बलम् ——प्राण: ( प्राणमयः ) २- कम्र्मात्मा-THE सुप्तरसगर्भितं बलम्- --- वाक् ( वाङमयी ) ----प्राणविवर्त्तम् तदित्थं प्राणमये कर्म्मात्मनि, आत्मनो वीर्य्यभागे वा प्राणस्य त्रिवृद्भावात् - मनः- प्राण - वायां सम्बन्धात्कलोदयः । की भी तीसरा है वाक्प्रधान भूतात्मा । अर्थतत्व, किंवा अर्थशक्ति ही वाक्तत्व समझिए है ॥ बलचिति इस वाकतत्त्व से यही वाक रस - बल के तारतम्य से तीन अवस्थाएँ होनातीं हैं । वाक् को रसप्रधान अप् तत्त्व आंशिकरूप से श्रं शात्मना अप् - रूप में परिणत होजाती है । बल की और चिति होती है । इससे ६७
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वेदन प्रथमखण्ड आत्मनिरुक्तिः अग्निरूप में परिणत होजाता है । इसप्रकार एक ही वाक्तत्व वाक् आपः अग्नि, इन तीन स्वरूपों में परिणत होजाता है । वाक में मनोकला का, आपः में प्रारणकला का, एवं अग्नि में वाककला का उपभोग है । इस तीसरे विवर्त में प्रधानता वाक रूप अन्न की ही है । अतएव हम इसे वाग्विवर्त्ती ही कहेंगे । वाकू आकाश है, आकाशात्मिका मर्त्या वाक् ही बल - ग्रन्थि - तारतम्या से क्रमशः वायु - तेज - जल - पृथिवी रूप में परिणत होती हुई पञ्चभूतमयी बन जाती है । पाञ्चभौतिकवर्ग ही अन्न है । श्रत्रात्मक भूत के सम्बन्ध से ही यह वाङमय आत्मा भूतात्मा कहलाया है । ३ - वाङमयी भूतात्मा - “ अन्नविवर्त्तम्-रसगर्भिता वाकू--- वाक् ( मनोमयी ) ३- भूतात्मा - सुप्तरसगर्भिता वाक् श्रापः ( प्राणमय्यः ) रसनिगलिता वाकू- ---- अग्निः ( वाङ मयः ) तदित्थं वाङमये भूतात्मनि, आत्मनोऽन्नभागे वा वाच-स्त्रिवृदभावात् मनः- प्राण - वाचां सम्बन्धात् कलोदयः । ४- त्रयाणां समष्टि: ---१ --- १- श्रानन्दः ( मनोमयं मनः ) २- २ - विज्ञानम् ( मनोमयः प्राणः ) ३-३- मनः ( मनोमयी बाकू ) - विद्या - त्रिवृन्मनः - ज्ञानात्मा ४- १ - मनः ( प्राणमयं मनः ) ५-२- प्राण: ( प्राणमयः प्राणः ) ६—३ — वाक् ( प्राणमयी वाकू ) - वीर्य्यम् — त्रिवृतः प्राणः- कर्मात्मा ७-१- वाक् ( वाङमयं मनः ) ८- २ - आपः ( वाङमयः प्राणः ) ६—३ — अग्निः ( वाङमयी वाक् ) -अन्नम् - त्रिवृता वाक् —— भूतात्मा हद आत्मा एष वा स " वाङ् प्राणमयो , मयः 1)-इत्याहुः " मनोमयः
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उपनिषद्भूमिका वेदनिरुक्तौ Εξ आत्मनिरुक्तिः --: - १ Meta ( उक्त तीनों आत्मविवर्त्तो में क्रमशः अव्यय, अक्षर, आत्मक्षर, ये तीनों पुरुषात्मा उपभुक्त हैं । त्रिपुरुषानुग्रहीत, ज्ञानात्मा श्रव्ययानुग्रहीत है, कर्मात्मा अक्षरानुग्रहीत है, एवं भूतात्मा क्षरानुग्रहीत है । - कर्मात्मा को त्रिफल आत्मा ही ईश्वर है, यही जीव है, यही जगत् है । आत्मक्षर - अक्षरानुग्रहीत, भूतात्मा भूतात्मा अपने गर्भ में रखने वाला, श्रव्ययानुग्रहीत ' ज्ञानात्मा ' ही ईश्वर है । अव्यय - क्षरानुग्रहीत, ज्ञानात्मा अक्षरानुग्रहीत ' कर्मात्मा ' जीव है । एवं अव्यय - अक्षरानुग्रहीत, को अपने गर्भ में रखने वाला, ही ज्ञानात्मा - कर्म्मामा को अपने गर्भ में रखने वाला, चरानुग्रहीत ' भूतात्मा ' ही जगत् शिवरूपा है । त्रिमूर्ति तीनों की का समष्टि विकास ' सर्वम् ” है । यही त्रिमूर्त्ति है । इस त्रिमूर्ति के आधार पर ही ब्रह्मा - विष्णु -हुआ है, एवं यही त्रिमूर्त्ति वेद की जननी है । जगत् है । ब्रह्मा ब्रह्मा की मूलप्रतिष्ठा ईश्वर है, विष्णु की मूलप्रतिष्ठा जीव है, एवं शिव की मूलप्रतिष्ठा होते हुए कर्म्मपति हैं, ज्ञानात्मा से अनुग्रहीत रहते हुए ज्ञानपति हैं, विष्णु कर्मात्मा से अनुग्रहीत तीन हैं । वस्तुतः एक ही मूर्त्ति एवं शिव भूतात्मा से श्रनुग्रहीत रहते हुए भूतपति हैं । तीनों कहने को की तीन विकासधाराएँ हैं— “ एका मूर्तिस्त्रयोदेवा ब्रह्म - विष्णु - महेश्वराः ” । त्रिवृद्भाव जिसप्रकार मनःप्राणवाङमय श्रात्मा त्रिवृद्भाव से नियुक्त - युक्त है, एवमेव उक्त त्रिदेवमूर्ति होरहा है । भी ज्ञानात्मसंस्था से नित्य युक्त है । प्रत्येक देवता में इतर दोनों देवताओं का गौणरूप से उपभोग है, एवं भूतात्मसंस्था में त्रिवृद्भावयुक्त ब्रह्मा का साम्राज्य है, कम्र्मात्मसंस्था में त्रिवृद्भावयुक्त शिव का होजाता साम्राज्य है । में त्रिवृद्भावयुक्त शिव का साम्राज्य है, जैसा कि आगे की तालिका से स्पष्ट
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ईश्वरनिवर्त्त--१-ब्रह्मा - ब्रह्ममयो श्रानन्दः १ -विष्णुः - ब्रह्ममयो विज्ञानम् २ -श्रव्ययसंस्था-१-शिवः ब्रह्ममयः ---- मनः ३ - ज्ञानपतिः ब्रह्मा ज्ञानात्मानुग्रहीतस्त्रिवृन्मूर्त्तिः- -जीवनिवर्त्त--२-ब्रह्मा विष्णुः शिवः - विष्णुमयो विष्णुमयो विष्णुमयः - - - ——— मनः प्राणः - वाक् - १ २ - ३ अक्षरसंस्था-२-- विश्वविवर्त्त--३ कर्म्मपतिः -विष्णुः स्त्रिवृन्मूर्त्तिः-कम्र्मात्मानुग्रहीत • ----वाक १-ब्रह्मा शिवमयो -क्षरसंस्था--३-विष्णुः शिवमयो --श्रापः - २ -----शिवः शिवमयः --अग्निः - ३ - भूतपतिः शिवः स्त्रिवृन्मूर्त्तिः-भूतात्मानुग्रहीत -वेदनिरुक् आत्मनिरुक्तिः प्रथमखण्ड
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका श्रात्मनिरुक्तिः ' बतलाया है । इन तीन मूलवेद का दिग्दर्शन कराते हुए हमने आत्मा, इन को ' तीन सच्चिदानन्दघन आत्मविवत्तों के साथ सम्बन्ध समझना श्रात्मकलाओं का क्रमशः ज्ञानात्मा - कम्र्मात्मा भूतात्मा का भी त्रिवृद्भाव अनिवार्य है । फलतः इन चाहिए । ज्ञान - कर्म्म - भूतवत् श्रानन्दादि तीनों कलाओं है, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट है । इस परिलेख तीनों में भी प्रत्येक में तीनों का उपभोग सिद्ध होजाता कि, एक ही श्रात्मा किस प्रकार त्रिवेद पर विश्राम का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने से पाठकों को विदित होगा विदित होंगे । परन्तु हम उन्हें विश्वास दिलाते कर रहा । यद्यपि ये सभी विवर्त्त ' पाठकों को अटपटे से ही में विविधभावाक्रान्त विश्व के मूलभूत हैं कि, अटपटे संसार का वास्तविक स्वरूप समझने के लिए, साथ यदि इसमें ऐसी ग्रन्थियाँ ही उपयोगी सिद्ध होगा । श्रात्मवेद की अपौरुषेयता समझने के लिए यह प्रपञ्च बड़ा अनेक मतवादों को प्रवेश करने का अवसर ही न होतीं, तो वेद की अपौरुषेयता, एवं पौरुषेयता के सम्बन्ध में नहीं मिलता । १ – आनन्दः - श्रानन्दमयः- आनन्दः ३ - विज्ञानम् --आनन्दमयं - विज्ञानम् श्रानन्द: -३ -- मन: - आनन्दमयं---- मनः -आनन्दघन: ज्ञानात्मा- ब्रह्मा १ - - मन: - चिन्मयं मनः २ -- प्राण: चिन्मयः - प्राणः ३ - वाक् – चिन्मयी वाक् -चित्-: कर्मात्मा - - विष्णुः - चिद्यन १ - - वाक – सन्मयी वाक् २ - श्रापः - सन्मय्य आपः - सत्--- सद्घनः — भूतात्मा —- शिवः ३ - अग्निः - सन्मयोऽग्निः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ--वेदप्रतिष्ठानुगता - श्रात्मस्वरूपनिरुक्तिः १
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1. लिक एक के नए के श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ वेदप्रतिष्ठानुगता - ग्रात्मस्वरूपनिरुक्तिः १ --- की ---
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श्री । अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ-सच्चिदानन्दात्मत्नक्षणा - वेदरुक्तिः २