Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 421–430
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430
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श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ- के सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्ति श्रारम्भ किया जाता है । सच्चि -श्रात्मदृष्टि से मूल वेद का विचार श्रात्मप्रकरण उपरत हुआ । अब है । यही दरवला से दानन्दघन श्रात्मा ही विश्व का मूलाधार विश्व बना हुआ है, अक्षरकला से विश्व-बना हुआ है । इस एवं अव्ययकला से विश्व का आलम्बन कर्त्ता [ विश्व का श्रात्मा ] बना हुआ मानी है, गई हैं । वे ही पाँचों कलाएँ क्रमशः आनन्द, विज्ञान, मन, श्रव्ययब्रह्म की अवान्तर पाँच कला की उन्मुग्धावस्था ही ' सत्ता ' में मन प्रारण वाक इन तीनों कलाओं में अन्तर्भाव प्राण, वाकू नाम से प्रसिद्ध हैं । इन प्रसिद्ध है । इसप्रकार पाँच कलाओं का तीन कलाओं है, विज्ञानभाव ' चित् ' है, एवं आनन्द होजाता है । ' कहा जाता है । भावा: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' उक्थ मूलप्रभवत्तत्त्व को - ' यत उतिष्ठन्ति सर्वे उक्थ है । प्रत्येक के आनन्दभाग से प्राणों का उत्थान हुआ विश्व में जितने पिण्ड हैं, सब एक एक को स्वतन्त्र संकेतभाषानुसार ' ऋक ' कहा जाता है । इन उक्थरूप यच्चायावत् करता है । इस चानन्दमय उक्थतत्त्व महदुक्थ, किंवा महोक्थ [ सब से बड़ा उक्थ ] कहा जाता है । ' ऋचाओं का जो मूलस्रोत है, उसे ही अन्तर्भूत हैं, अतएव इस महोक्थरूपा ऋक् को- ' ऋचां समुद्रः महोक्थ में उक्थरूप सम्पूर्ण ऋचाएँ है । ' आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, श्रानन्देन [ ऋचाओं का समुद्र ] कहा जाता ] इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार उक्थरूप प्रयन्त्यभिसंविशन्ति [ तै ० ० उ ० एवं यही जातानि जीवन्ति, आनन्द आनन्द ही है । श्रतः हम इसे अवश्य ही महोक्थ कह सकते हैं, सम्पूर्ण भौतिक प्रपञ्च का मूलप्रभव पहिला ‘ मूलऋग्वेद ' है । से व्याप्त है । रहता है । ' अस्ति ' प्रतीति सर्वत्र समानरूप विश्व का प्रत्येक पदार्थ सत्ताभाव के नित्य श्राक्रान्त अनुस्यूत है । उपाधिभेद से भावाभाव सर्वत्र सत्तारस भी अन्यसत्ता भाव भी है, अभाव भी है, इसप्रकार सत्ता रखता है । इसीलिए एक की सत्ता उच्छिन्न होजाने पर जबतक प्रत्येक पदार्थं अपनी अपनी स्वतन्त्र की अवसानभूमि है । अभिलषित पदार्थ । यह सत्ताभाव हमारे ज्ञान पदार्थ के प्राप्त का उच्छेद नहीं देखा जाता के क्षोभ का अनुभव किया करते हैं । अभिलषित हमें नहीं मिल जाता, तबतक हम एकप्रकार है, तद्विषयक निज्ञासाभाव उपरत होजाता है । विषयप्राप्ति ही श्रात्मवृत्ति हम होजाने पर वह क्षोभ शान्त होजाता साम है । क्योंकि अवसानप्रवर्त्तक विषय सत्तात्मक हैं, अतः ही सत्ताभाव की अवसानभूमि है, एवं अवसान ही ही ' साम ' कह सकते हैं । जितनी व्यक्तियाँ हैं, उतने सत्तात्मक इन पदार्थों को अवश्य १०५
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड सच्चिदानन्द वेदनिरुक्तिः हैं, फलत: उतने हीं सामों की सत्ता सिद्ध होजाती है । व्यक्तिभाव से सम्बन्ध रखने वाला यह सत्ताभाव विशेषभावापन्न बन रहा है । नाम - रूप - कम्मत्मिक विषयों के सम्बन्ध से वही व्यापक - सामान्य - सत्ताभाव विशेषभावों में परिणत होरहा है । इन सत्र विशेष सत्ताओं का मूल वही व्यापक आत्मसत्ता है । वह इन सब सामों की अन्तिम अवसानभूमि है । यही अवसानसामात्मक महा - सत्ताभाव ' महात्रत् ' नाम से प्रसिद्ध है । जिसप्रकार श्रात्मानन्द ऋचाओं का समुद्र कहलाता है, एवमेव यह आत्मसत्ता " साम्नां समुद्रः ” ( सामों का समुद्र ) नाम से प्रसिद्ध हैं, एवं यही दूसरा ' मूलसामवेद ' है । आनन्द उस ओर है, सत्ता इस ओर है, दोनों का संयोजक ज्ञानसूत्र है । हमारे आत्मानन्द के साथ सत्तात्मक विषयों का योग करा देना एकमात्र चिल्लक्षण विज्ञान का ही कार्य्य है- ' तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा: ' । विज्ञान से ही सत्ता की उपलब्धि होती है । सत्तोपलब्धि ही आनन्द का कारण है । संयोजक यह ज्ञानसूत्र ही आनन्दात्मा के साथ सत्ता का मेल कराने के कारण ' यजुः ' कहलाया है । व्यक्तिभेद से ज्ञानभेद हैं । ज्ञानभेद से यजुः भी भिन्न भिन्न हैं । ज्ञानात्मक संयोजक इन सत्र यजुत्रों का मूलस्रोत वही श्रात्मविज्ञान रूप पुरुष हैं । यह सब यजुओं का आलम्बन महायजुः है, अतएव इसे ' यजुषां समुद्रः ' ( यजुनों का समुद्र ) कहा जाता है, एवं यही तीसरा ' मूलयजुर्वेद ' है । निष्कर्ष यही हुआ कि, विश्व में जितने भी पदार्थ हैं- ' ईशावास्यमिदं सर्वम् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार वे सब सच्चिदानन्दघन ईश के प्रवर्ग्य - भाग बनते हुए सच्चिदानन्दात्मक ही हैं । पदार्थ अनन्त हैं । प्रत्येक पदार्थ अपने आनन्दभाग की अपेक्षा उक्थरूप ऋक् है, विज्ञानभाग की अपेक्षा अर्क ( सूत्र ) रूप यजु: है, एवं सत्तापेक्षया साम है । इन सबका मूलाधार वही ईश्वर - प्रजापति है । विश्वान्तर्गत जितने उक्थरूप आनन्द हैं, वे सब उसी महान् आत्मनन्द की मात्रा लेकर उपजीवित हैं । विश्वान्तर्गत यच्चयवात् ज्ञान उस ज्ञान की मात्राएँ हैं, विश्वान्तर्गत विशेषभावापन्न सभी सत्ताभाव उस मा आत्मसत्ता से सत् बन रहे हैं । ऐसी स्थिति में उस मूल सच्चिदानन्दवन आत्मा को अवश्य ही ऋक - यजुः सामों का समुद्र कहा जासकता है । विश्वान्तर्गत वैयक्तिक ऋक् - यजुः — साम जहाँ उक्थ - व्रत- अग्नि - नामों से व्यवहृत हुए वहाँ विश्वालम्बन उस सामान्य आत्मा के आत्मरूप तीन व्यापक वेद क्रमशः महोक्थ ( ऋक् ) महाव्रत ( सामा ) पुरुष ( यजुः ) इन नाम से प्रसिद्ध हैं । यही सर्वाधार पहिला आत्मवेद, किंवा मूलवेद है । आनन्द - चेतना - सत्ता ही ईश्वर है । श्रानन्द- चेतना - सत्ता ही क्रमश: ऋक् यजुः साम है । इसीलिए पुराणों में सच्चिदानन्दलक्षण ब्रह्म को— ' वेदमूर्त्ति ' नाम से व्यवहृत किया गया है । RF FES माग को लक्ष्य आत्मवेद के मौलिक विवत्त भाग को लक्ष्य में रखते हुए प्रकारान्तर से मूलवेद का विचार कीजिए । आत्मा को हमने सच्चिदानन्दघन बताया है । इस आत्मा के विश्व - विश्वात्मा - विश्वचर, मेद से तीन विवत हैं । ये ही तीनों विज्ञानभाषा में क्रमशः सृष्ट - प्रविष्ट - प्रविविक्त इन नामों से भीं व्यवहृत हुए हैं । आत्मा का जो अश भौतिक विषयरूप में परिणित होगया है, वही इस का सृष्टरूप कहलाया है, वही सृष्टरूप ' विश्व ' नाम से प्रसिद्ध होरहा है । ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत ' इस श्रौत निगमवचन के अनु-सार मायोपाधिक जो आत्मा एकांश से विश्व उत्पन्न कर शेषांश ( तीन अशों ) से विश्व में सर्वत्र प्रविष्ट होजाता है, वही विश्वाध्यक्ष विश्वेश्वर विश्वात्मा इत्यादि नामों से सम्बोधित हुआ है । आत्मा का जो विश्व बन गया है, आत्मा यदवच्छेदेन ( मायावच्छेदेन ) विश्वात्मा बन गया है, इन दोनों १०६
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका सच्चिदानन्दवेदनिरुक्तिः है । इसे ही ' विश्वातीत ' गया है, वही तीसरा प्रविविक्तभाग अविज्ञेय, से बहिर आत्मा का जो व्यापकरूप बच से व्यवहृत किया गया है । आत्मा के ये तीनों रूप क्रमशः ' परात्पर ' ' परमेश्वर ' इत्यादि नामों । तीनों ही सच्चिदानन्द के विवत हैं । फलतः तीनों में सत्ता - चेतना दुर्विज्ञेय, सुविज्ञेय, भी कहला सकते सिद्ध हैं होजाती है । परात्पर असीम होने से नित्य है । अतः हम इस के श्रानन्द, इन तीनों भावों की सत्ता, नित्यसत्ता, इन नामों से पुकारेंगे । इसी प्रारम्भिक सर्गमूल भावों को क्रमशः नित्यानन्द, नित्यविज्ञान कहती है- ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' । विश्वात्मा मर्त्य विश्व की परात्पर का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति अनित्यवत् है । इस के तीनों विभाग क्रमशः आत्मानन्द, आत्म-अपेक्षा से नित्य होता हुआ भी मायापेक्षया मर्त्य विश्व के तीनों विभाग क्रमशः विषयानन्द, विज्ञयज्ञान, ज्ञान, आत्मसत्ता, कहलावेंगे । एवं होंगे तीसरे । इसप्रकार तीन विवर्त्त - भेदों से सच्चिदानन्द ६ भागों में विभक्त विषयसत्ता, नामों से सम्बोधित होजाता है । - सत्ता लक्षणों के अनुसार ' आनन्द - " चेतना पूर्वोक्त ' ऋक् - ' साम - यजुः के पारिभाषिक पूर्वोक्त तीनों त्रयीवेदों का उपभोग सिद्ध होजाता तीनों वेदों में क्रमशः " नित्यज्ञान ' त्मक " ऋक् - ' यजुः - ' साम ' इन, " नित्यसत्ता ' ' २ सामवेद ' है, इन दोनों का संयोजक है । " नित्यानन्द ' ' ' ऋग्वेद ' है विभाग है । " आत्मानन्द ' ' ' ऋग्वेद ' है, ' श्रात्मसत्ता ' ' ३ यजुर्वेद ' है, एवं यही वेदत्रयी का " पहिला आत्मज्ञान ' ' यजुर्वेद ' है, एवं यही वेदत्रयी का दूसरा विभाग है । ‘ ३ सामवेद ' है, इन दोनों का संयोजक ' ' सामवेद ' है, दोनों का संयोजक " विषयज्ञान ' ' यजुर्वेद ' ' विषयानन्द ' 69 ' ऋग्वेद ' है, ' ' विषयसत्ता है । है, एवं यही वेदत्रयी का तीसरा विभाग का " नित्यानन्द ' ही नित्यसत्ता, तथा नित्यविज्ञान इस विभाग का मौलिक रहस्य यही है कि,, महदुक्थरूप इस नित्यानन्द को अवश्य उपक्रमस्थानीय, उक्थलक्षण पुरुषलक्षण मूलस्तम्भ ( उपक्रमस्थान ) है । श्रतएव नित्यसत्ता ' के आधार पर ही उक्थलक्षण नित्यानन्द, तथा ही ' ' ऋग्वेद ' कहा जासकता है । ' ) है 1 । अतएव अवसानस्थानीय व्रतलक्षण, महात्रतरूप इस नित्यविज्ञान का पर्य्यवसान ( अवसान, समाप्ति जासकता है । " नित्यविज्ञान ' ही उक्थलक्षण नित्यानन्द, तथा नित्यासत्ता को अवश्य ही ' सामवेद ' माना योजनाभाव की अपेक्षा से मध्यस्थानीय, अग्निलक्षण, पुरुषरूप इस नित्यसत्ता दोनों का संयोजक सूत्र है । इसी जासकता है । नित्यविज्ञान को अवश्य ही " यजुर्वेद ' कहा ' " ऋग्वेद ' है । का मुलउक्थ बनता हुआ " आत्मानन्द इसी प्रकार श्रात्मसत्ता, श्रात्मज्ञान, दोनों बनती हुई आत्मसत्ता ' ' सामवेद ' है । एवं श्रात्मानन्द श्रात्मानन्द तथा आत्मज्ञान, दोनों की अवसानभूमि हुआ ' आत्मज्ञान ' ' ३ यजुर्वेद ' है । इसी प्रकार विषयसत्ता, तथा तथा श्रात्मसत्ता, दोनों का संयोजक बनता ' ' ऋग्वेद ' है । विषयानन्द, तथा विषयज्ञान, दोनों हुआ " विषयानन्द, दोनों का विषयज्ञान, दोनों का मूल ' ' सामवेद ' है । एवं विषयानन्द, तथा विषयसत्ता की अवसानभूमि बनती हुई " विषयसत्ता यजुर्वेद ' है । तीनों संस्थाओं में सर्वत्र ऋग्वेद ' महोक्थ ' है, सामवेद संयोजक बनता हुआ 3 ' विषयज्ञान ' ' जैसाकि श्रागे के दोनों परिलेखों से स्पष्ट हो जाता है । ' महाव्रत ' है, एवं यजुर्वेद ' पुरुष ' है, २०७
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वेदनिरुक्त आत्मानुगत - त्रिवृद्वद परिलेख: -प्रथमखण्ड सच्चिदानन्दवेदनिरुक्तिः १- नित्यानन्दः - महोक्थम् ( आनन्द: - ऋक् ) १ २ - नित्यज्ञानम् --महाव्रतम् ( चेतना -यजुः ) ३ - नित्यसत्ता - पुरुषः ( सत्ता - साम ) -विश्वातीतः ( नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ) १ - श्रात्मानन्दः - महोक्थम् ( आनन्दः ऋक् ) २ २ - श्रात्मज्ञानम् - महाव्रतम् ( चेतना - यजुः ) ३- आत्मसत्ता पुरुषः ( सत्ता - साम ) - विश्वात्मा ( सत्यं ज्ञाननन्तं ब्रह्म ) १ - विषयानन्दः – महोक्थम् ( श्रानन्दः - ऋक् ) ३ २ - विषयज्ञानम् - महाव्रतम् ( चेतना — यजुः ) ३ - विषयसत्ता - पुरुषः ( सत्ता - साम ) विश्वम् -- नामरूपे सत्यम् उक्त विवर्त्त ' का दूसरी दृष्टि से विचार कीजिए । पहिला विवत ' ' आनन्द ' का है । ' नित्यानन्द ' ही आत्मानन्द, एव विषयानन्द का मूल है । इसी मूलभाव के कारण हम इस नित्यानन्द को ' महोक्थरूप - ऋक् ’ कह सकते हैं । विषयानन्द पर आनन्द का अवसान है । दूसरे शब्दों में विषय पर श्रानन्द का अवसान होजाता है । इसी अवसानभाग के कारण इस विषयानन्द को ' महाव्रतरूप -- साम ' कहा जासकता है । विषयानन्द को नित्यानन्दस्वरूप में परिणत करने वाला मध्यस्थ श्रात्मानन्द ही नित्यानन्दभावपरिणति का मुख्य द्वार है । दूसरे शब्दों में - विषयानन्द को विशुद्ध आनन्दरूप में परिणत कर, उसे नित्यानन्द के साथ [ अभेद सम्बन्ध से ] युक्त करा देने वाला यही मध्यस्थ आत्मानन्द है । इसी योगप्रवृत्ति के कारण इस श्रात्मानन्द को ' पुरुषरूप -- यजुः ' कहा जासकता है । इसप्रकार ' ऋक् ' - लक्षण केवल ' श्रानन्द ' में हीं ( ' ऋग्वेद ' में हीं ) -" नित्य- आत्मा - विषयानन्द " भेद से तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध होनाता है ॥१ ॥
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श्रानन्दः ऋक् ३ १ - नित्यानन्दः wwwwwwwww २ - श्रात्मानन्दः ३ – विषयानन्दः इमे श्रानन्दविवर्त्तभावाः Ho Ho Ho HoHo ब्रह्म वेदं सर्वम् सर्व खल्विदं ब्रह्म एकं वा इदं विबभूव सर्वम् चेतना यजुः १ - नित्यज्ञानम् २- श्रात्मज्ञानम् १३ - विषयज्ञानम् त इमे - चिद्विवर्त्तभावाः ब्रह्म HHHHH सत्ता साम ३ १ - नित्यसत्ता २ -- श्रात्मसत्ता ३ - विषयसत्ता www त इमे - सत्ताविबत्त ' भावाः
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वेदनिरुक्तो प्रथमखण्ड १ - श्रानन्दः २- चित् सच्चिदानन्दवेदनिरुक्तिः x ३ – सत्ता महोक्थम् ऋक् महानतम् पुरुषः यजुः साम ऋचां समुद्रः यजुषां समुद्रः साम्नां समुद्रः Ho Ho -Ho ... OooO °°°°°° 00000000000000000000000000000000000 सोऽयमानन्द - चित् - सत्ता-- लक्षणः, महोक्थ - महाव्रत - साममयो मूलवेदः आत्मवेदः mahithoni ११०
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वेदनिरुक्तौ उपनिषद्भूमिका सच्चिदानन्दवेदनिरुक्तिः विषयज्ञान की मूलप्रतिष्ठा है । दूसरा विवर्त्त है ' विज्ञान ' का । ' नित्यज्ञान ही श्रात्मज्ञान एवं ही ज्ञान - ऋक् ' कह सकते हैं 1 । विषयज्ञान पर इसी मूलभाव के कारण हम इस नित्यविज्ञान को ' महोक्थरूप के कारण इस अवसान होजाता है । इसी अवसानभाव का अवसान है । दूसरे शब्दों में- विषय पर श्रानन्द का को नित्यज्ञान स्वरूप में परिणत करने वाला विषयज्ञान को ' महाव्रतरूप - साम ' कहा जासकता है । विषयज्ञान में विषयज्ञान परिणति का मुख्य द्वार है । दूसरे शब्दों मध्यस्थ आत्मज्ञान ही है । श्रात्मज्ञान ही नित्यज्ञानभाव यही सम्बन्ध से ) युक्त करा देने वाला को विशुद्ध ज्ञानरूप में परिणत कर उसे नित्यज्ञान के साथ ( अभेद है । को ' पुरुषरूप - यजुः ' कहा जासकता मध्यस्थ आत्मज्ञान है । इसी योगप्रवृत्ति के कारण इस आत्मज्ञान ' भेद ' में हीं ) - नित्य- श्रात्म - विषयज्ञान इसप्रकार ‘ यजु ’ - र्लक्षण केवल ' ज्ञान ' ( चित् ) में हीं ( ' यजुर्वेद से तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध होजाता है ॥२ ॥
, एवं विषयसत्ता की मूल-तीसरा विवर्त्ती सत्ता का है । ' नित्यसत्ता ' ( परमसामान्य ) ही आत्मसत्ता - ऋक् ' कह सकते हैं । विषयसत्ता प्रतिष्ठा है । इसी मूलभाव के कारण हम इस नित्यसत्ता को ' महोक्थरूप होजाता है । इसी अवसानभाव पर ही नित्यसत्ता का अवसान है । दूसरे शब्दों में विषय पर सत्ता का अवसान में परिणत है । विषयसत्ता को नित्यसत्तारूप के कारण इस विषयसत्ता को ' महाव्रतरूप साम ' कहा जासकता का मुख्य द्वार है । दूसरे शब्दों करने वाली मध्यस्था आत्मसत्ता ही है । श्रात्मसत्ता ही नित्यसत्ताभावपरिणति ( अभेद सम्बन्ध से ) युक्त कस देने में विषयसत्ता को विशुद्ध सत्तारूप में परिणत कर, उसे नित्यसत्ता के साथ श्रात्मसत्ता को ' पुरुषरूप - यजुः ' कहा वाली यही मध्यस्था श्रात्मसत्ता है । इसी योगप्रवृत्ति के कारण इस - विषयसत्ता ' हीं ( ' सामवेद ' में हीं ) - नित्य श्रात्म जासकता है । इसप्रकार ‘ साम ' - लक्षणा केवल ' सत्ता ' में भेद से तीनों वेदों का उपभोग विद्ध होजाता है ॥ ३ ॥
करने के लिए शब्दरचना -* - श्रानन्द ही [ रस ही ] तीनों विवर्त्तभावों का मूलस्तम्भ है, । तथा यही सूचित सत्ताविवर्त्त में भी वही शब्दरचना-त्मक जो क्रम हमने आनन्द विवर्त का माना है, चेतना ( ज्ञान ) -विवर्त्त क्रम रक्खा गया है । की १११
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड...... आत्मविवर्त्तानुगतस्त्रिवृद्व दपरिलेखः -TOP १-१ - नित्यानन्दः —— महोक्थम् — ऋक् १२ - २ - श्रात्मानन्दः -- महाव्रतम् — साम ३ - ३ – विषयानन्दः -- पुरुषः -- यजुः ४—१— नित्यज्ञानम् — महोक्थम् — ऋक् २ ५ - २ - श्रात्मज्ञानम् --- महाव्रतम् - साम ६- ३ - विषयज्ञानम् - पुरुषः --- यजुः ७- १ - नित्यसत्ता - महोक्थम् — ऋक् ३८-२ - आत्मसत्ता - महाव्रतम् — साम ६- ३ - विषयसत्ता - पुरुषः यजुः -आनन्दः ( महोक्थं - ऋक् ) सच्चिदानन्दवेदनिरुक्तिः [ तदित्थं महोक्थलक्षणे, श्रानन्दमये, ऋग्वेदे नित्य श्रात्म -- विषयानन्दमेदाद्व दत्रयोपभोगः ] २ --चेतना ( पुरुषः - यजुः ) [ तदित्थं पुरुषलक्षणे, चिन्मये, यजुर्वेदे नित्य - आत्म - विषयचिद्भेदाद्व दत्रयोपभोगः ३ --- सत्ता ( महाव्रतं साम ) [ तदित्थं महात्रतलक्षणे, सन्मये, सामवेदे नित्य- श्रात्म - विषय सद्भेदाद्व ेदत्रयोपभोगः ] इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः २ ११२
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