Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 431–440
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440
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श्रीः इति - वेदनिरुक्तौ सच्चिदानन्दात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः २
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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय - आत्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३ 10
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की श्री: अथ वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत- मृत्युमय- आत्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३ सच्चिदानन्दघन आत्मा के सृष्टिसाक्षी, मुक्तिसाक्षी - भेद से दो विवर्त्त माने जाते हैं । इन दोनों मनः का सम्बन्ध उसी पूर्वोक्त पञ्चकल अव्ययात्मा से है । आनन्द विज्ञानमनोमय वही अव्यय मुक्तिसाक्षी प्रधान है, एवं रहता है, प्राणवाङमय वही अव्यय सृष्टिसाक्षी है । ग्रन्थिविमोकलक्षणा मुक्ति में मुक्तिसाक्षी आत्मा रहता है, सृष्टिसाक्षी आत्मा सहकारी रहता है । एवं ग्रन्थिबन्धनलक्षणा सृष्टि में सृष्टिसाक्षी आत्मा प्रधान का [ अव्ययात्मा एवं मुक्तिसाक्षी सहकारी बना रहता है । श्रानन्द - विज्ञान- मनोमय आत्मा उस एक ही आत्मा में अमृतरस की का ] विद्या भाग है, मनःप्राणवाङमय आत्मा उसी आत्मा का कर्म्मभाग है । विद्याभाग की प्रधानता है, अतएव प्रधानता है, अतएव ज्ञानमूर्त्ति यह अव्यय ' निष्काम ' है । कर्म्मभाग में मृत्युरूप आत्मा बल ) है - " अमृतं चैत्र कर्म्ममूर्ति यह अव्यय ' सकाम ' है । अमृत - मृत्यु की समष्टि ही " अहम् " ( मृत्युश्च सदसच्चाईमजुन! " । १ - १ - श्रानन्दः ) २--२ -- विज्ञानम् - मुक्तिसाक्षी अव्ययात्मा- निष्कामः ( अमृतम् ) DALFPIPE १३- मनः १- मनः ' ४-- २ - प्राणः -सृष्टिसाक्षी श्रव्ययात्मा - सकाम: ( मृत्युः ) ५. —३— वाकू -आत्मा पूर्वप्रकरण में समष्टिरूप से मूलवेद का दिग्दर्शन कराया गया था । वहाँ बतलाया गया था कि, आनन्द आनन्द है, विज्ञान रचित है, मनः प्राण वाक् की समष्टि, यजुः सामवेद हैं । श्र " आनन्द- ' विज्ञान- ' मन ' का एक सत्ता है । ये ही तीनों क्रमशः ' ऋकू-स्वतन्त्र विभाग मान कर एवं ' मन: -" प्रारण- वाक का एक स्वतन्त्र विभाग मानकर अमृत - मृत्युभैद से मूलवेद का विचार किया जाता है । मुक्ति--११७
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प्रथमखण्ड अमृत - मृत्यु - वेदनिरुक्तिः ) का मूलाधार है । मूलप्रभव को साक्षी, अमृतप्रधान, विद्यात्मा का श्रानन्दभाग विज्ञान तथा मन ( अन्तर्मन ' है । ' श्वोवसीयस ' नाम से किंवा महोक्थ कहा जाता है । महोक्थरूप यह मूलानन्द ही ' ऋ ही उक्थ,, महाव्रतस्थानीय, इस अन्तर्मन को हम प्रसिद्ध मन पर आनन्द का अवसान है । अतएव श्रवसानलक्षण मध्यस्थ विज्ञान है । दूसरे शब्दों में “ साम " कह सकते हैं । मन और श्रानन्द का संयोजक ही है । इसी योगप्रवृत्ति के कारण पुरुष-अन्तर्मन को श्रानन्दरूप में परिणत करने वाला मध्यस्थ विज्ञान, अव्ययात्मा के तीनों वेद हैं । स्थानीय इस विज्ञानभाव को हम ' यजुः ' कहसकते हैं । ये ही मुक्तिसाक्षी, विद्यात्मक का प्रभव है - " काम-सृष्टिसाक्षी, कर्म्मप्रधान, अव्ययात्मा का मन ( बहिर्म्मन ) ही सम्पूर्ण कामनाओं ” । काममय यह मन प्राण तथा वाक का मूलाधार स्तदग्र े समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् का वाक् पर ही मन की कामना हैं । है । इसी मूलभाव के कारण हम इसे महोक्थस्थानीय ' ऋक ' कह को सकते मनोरूप में परिणत करने वाला मध्यस्थ अवसान है । फलतः अवसानलक्षणा महाव्रत - स्थानीया वाकू को हम ' यजुः ' कह सकते हैं । सृष्टिसाक्षी, प्राण ही है । इसी योगप्रवृत्ति के कारण पुरुषस्थानीय । इस प्राणभाव कर्म्मात्मक, श्रव्ययात्मा के ये ही तीनों वेद हैं १- मुक्तिसाक्षी आनन्दविज्ञानमनोमय विद्यात्मक आत्मा में-त्रयीवेदभुक्ति - श्रानन्दः -- महोक्थम् ऋग्वेदः २ - विज्ञानम् -- पुरुषः ——— यजुर्वेदः > विद्यात्म का स्त्रयोवेदाः ३ - मनः --- महाव्रतम् - सामवेदः २ -- सृष्टिसाक्षी मनःप्राणवाङमय कम्मत्मिक आत्मा में-मृत्युवेद : त्रयीवेदभुक्ति १ -- मनः - महोक्थम् - ऋग्वेदः २– प्राणः- पुरुषः -- यजुर्वेदः ३ - वाक् --- महाव्रतम् - सामवेदः | कर्मात्मकास्त्रयोवेदाः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्युमय - अमृतात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ए - * -११८
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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ अमृत - मृत्यु - मय - अमृतात्मलक्षणा - वेदनिरुक्तिः ३
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श्रीः अथ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ मनः - प्राण - वाङ 7 -मयी- त्रिकल वेदनिरुक्तिः ४
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श्रीः ४ -महोक्थम् --ऋक १ - ज्ञानशक्तिमयं मनः-२- क्रियाशक्तिमयः प्राण पुरुषः--यजुः ३ - अर्थशक्तिमयी बाबू ------- महाव्रतम् ---- साम १२३ ---–मूलवेदः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ मनःप्राणवाङ्मयी - त्रिकलवेदनिरुक्ति: ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमय: ' इस श्रुति के अनुसार आत्मा मनः - प्राण - वाङ वाक़ से श्रम का उदय होता है । मय है । इस त्रिकल आत्मा के मन से कामना का, प्राण से तप का, एवं श्रात्मा ने सम्पूर्ण विश्व का काम - तपः - श्रम -- रूप इन तीन सृष्टयनुबन्धों से उस सृष्टिसाक्षी मनः प्रारण वाङमय नित्यं श्राम्यति ” । निर्माण किया है । वह आत्मा " मनसा नित्यं कामयते, प्राणेन नित्यं तप्यते, वाचा है । ज्ञान - क्रिया अर्थ काममय मन ज्ञानशक्ति है, तपोमय प्राण क्रियाशक्ति है, श्रममयी वाक् अर्थशक्ति काममय मन ही रूप से वह मन. - प्राणवाङमय श्रात्मा सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होरहा है । ज्ञानशक्तिधन ' ऋक् ' है । श्रर्थमयी क्रिया - अर्थरूप तपःश्रममय प्राण, तथा वाक् की मूलप्रतिष्ठा है । यही मन महोक्थरूप वाक् मनः - प्राण की अवसानभूमि होने से ' साम ' है । संयोजक क्रियामय प्राण ही ' यजुः ' है । त्रिवृतकरण-( प्रत्येक ) त्रिवृद्भावं ये युक्त । मन भी मनःप्राणवाङ मय विज्ञान ' के अनुसार आत्मा की ये तीनों कलाएँ की तीनों कलाएँ मनोमयीं हैं, है, प्राण भी मनःप्राणवाङ मय है, एवं वाक् भी मनःप्राणवाङ् मयी है । मन कारया प्राण की तीनों कलाएँ प्राणमयीं हैं, एवं वाक् की तीनों कलाएँ वाङमयी हैं । इस त्रिवृद्भाव के उपभोग सिद्ध होजाता है । इसी ऋङमय केवल त्रिवृन्मन में भी मनः प्राण वाक् के भेद से तीनों वेदों का वाकू के भेद से तीनों त्रिवृद्भाव के कारण यजुर्म्मय त्रिवृत्प्राण, तथा सामययी त्रिवृता वाक् में भी मनःप्राण -है-वेदों का उपभोग सिद्ध हो जाता है, जैसा कि निम्नलिखित परिलेख से स्पष्ट होरहा