Upanishad Vijnana Bhashya Bhumika I — पृष्ठ 441–450
उपनिषद विज्ञान भाष्य भूमिका १ मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 441–450
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड १ – मनःप्राणवाङ मये मनसि त्रिवृद्भावाद्व त्रयोपभोगः १ - मनोमयं मनः --- -महोक्थम् ——- ऋक् २ - मनोममयः प्राणः पुरुषः यजुः ३- मनोमयी वाक् --- महाव्रतम्-* -साम २- मनःप्राणवाङमये प्राणे त्रिवृद्धावाद्व दत्रयोपभोगः १ - प्राणमयं मनः ---- महोक्थम् - --- ऋकू २- प्राणमयः प्राणः पुरुषः -- यजुः प्राण: -यजुर्वेदः ३ - प्राणमयी वाकू —महाव्रतम्---साम * ३ – मनःप्राणवाङ मय्यां वाचि त्रिवृद्भाद्वेदत्रयोपभोगः १ --- वाङमयं मनः ------ महोक्थम्--ऋक् वाक - सामवेद: २- वाङमयः प्राणः पुरुषः ------ यजुः ३ --- वाङ ्ममयी वाक् ------- महाव्रतम् ------ साम इति - वैज्ञानिवेदनिरुक्तौ मनःप्राणवाङ मयी- त्रिकलवेदनिरुक्तिः ४ १२४ त्रिकल वेदनिरुक्तिः क जी-S
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श्रीः इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ मनः - प्राण - वाङ - मयी - त्रिकलवेदनिरुक्तिः ४
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श्रीः थ - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म- साम - लक्षणा - वेदनिरुक्तिः ५
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कृ श्रीः यथ- वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ साम - - मयी मयी- - वेदनिरुक्तिः वेदनिरुक्तिः उक्थ - ब्रह्म - साम क अ कोई भी स्वरूप लक्षण नहीं होसकता । तथापि यद्यपि श्रात्मा का ( विशुद्ध - निर्धर्मक - सङ्ग श्रात्मा का का ) अवश्य ही स्वरूप लक्षण किया जासकता है । विश्वदृष्टि से सोपाधिक बने हुए सृष्टिमूलक आत्मा जो कारणभूत " इस श्रात्मलक्षण के अनुसार “ यस्य यदुक्थं सत्, ब्रह्म सत्, साम स्यात् स - तस्यात्मा साम होता है, उस कार्य्यं का वह उक्थ ब्रह्म साम - लक्षण मौलिकतत्त्व जिस कार्य्यभूत यौगिकतत्त्व का उक्थ - ब्रह्म में उक्थ कहा जाता है, प्रतिष्ठास्थान ब्रह्म नाम कारण श्रात्मा माना जाता है । प्रभवस्थान को वैदिकभाषा हुआ है । उदाहरण के लिए घट को ही लीजिए । से प्रसिद्ध है, एवं परायणस्थान मिट्टी है । मिट्टी से ही यच्चयावत् घट प्रसूत हुए साम नाम से व्यवहृत हैं । संसार में मृण्मय जितने भी घट हैं, इन सबका मूलप्रभव ) कह सकते हैं । मिट्टी से उत्पन्न घट, मिट्टी को अतः मिट्टी को हम सब घड़ों का उक्थ ( प्रभवस्थान नहीं रह सकते । मिट्टी ही सत्र घड़ों की प्रतिष्ठाभूमि है । छोड़ कर कभी स्व - स्वरूप से प्रतिष्ठित सकते हैं । घट परस्पर सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु मिट्टी सब मिट्टी को हम घड़ों का ब्रह्म ( प्रतिष्ठास्थान ) मान घड़ों का साम ( समरूपेण व्याप्त ) है । एवं अन्त में घड़ घड़ों के लिए समान है । इस दृष्टि से भी मिट्टी ही घड़ों की अवसानभूमि है । इस दृष्टि से भी मिट्टी मिट्टी में हीं लीन होजाते हैं । दूसरे शब्दों में मिट्टी घड़ों का उक्थ - ब्रह्म - साम है, इसलिए मिट्टी घड़ों का आत्मा घड़ों का साम ( परायणस्थान ) है । क्योंकि मिट्टी, वहीं आप आत्मशब्द का व्यवहार कर सकते हैं । इसी है । बस जहाँ उक्त लक्षण का समन्वय होजाय का उक्थ - ब्रह्म- साम - लक्षण सुवर्णं श्रात्मा कहलागा । प्रकार विविधप्रकार के यच्चयावत् सुवर्णमय आभूषणों कहलाएगा । ब्रह्म- सामलक्षण तन्तु श्रात्मा विविधप्रकार के यच्चयावत् सूत्रमय वस्त्रों का उक्थ साथ समन्वय कीजिए । विश्व में घट - पट - वन-इसी आत्मलक्षण का आधिभौतिकसंस्था के मूलजननी हैं, सब पाञ्चभौतिक हैं । पाँचों भूतों की पर्वत - सूर्य्य - चन्द्रमा श्रादि जितने भी है पदार्थ । यह वाङमय, किंवा वागूरूप मर्त्याकाश ही बलग्रन्थि के तारतम्य से वाक् है । वाकू को आकाश कहा जाता परिणित होरहा है । पाँचों भूत वाङमय हैं । वाक् । पाँचों भूतों पृथिवी - जल - तेज- वायु- श्राकाश - रूप में है । मनःप्राण को गर्भ में रखने वाक्तत्त्व प्राण और मन अविनाभूत की उक्थ ( मूलप्रभव ) है । यह से ही स्पष्ट है । जो तत्त्व अपनी स्वरूपरक्षा के लिए मनः प्राण वाला तत्त्व ही वाक है, जैसा कि बाकू नाम मर्त्यतत्व ही वाक् कहलाता है । शब्दब्रद्मविद्या के संकेतानुसार की याञ्चा करता है, अपेक्षा रखता है, वह ) अकार मन का वाचक है । स्पृष्टास्पृष्ट उकार प्राण शब्दसृष्टि में असंग ( कण्ठताल्वादि से असंस्पृष्ट १२६
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वेदनिरुक्तौ प्रथमखण्ड उक्थ - ब्रह्म- साम - वेदनिरुक्तिः का वाचक है । इस क्रम से ' अ उ अच ' यह स्थिति होजाती है । मन स्वयं निष्क्रिय है, क्रिया प्राण का धर्म्म है । प्राण के सञ्चालन से मन में क्रिया का सञ्चालन होता है । अतः मन की अपेक्षा प्राण का प्राथम्य सिद्ध होजाता है । ऐसी स्थिति में आप को " मनः प्राण " यह क्रम न रख कर " प्रारण मन " यह क्रम रखना पड़ेगा । फलत: ‘ अ- ( मन, -उ- ( प्राण - अच् ) इस क्रम के स्थान में “ उ- ( प्राण ) -अ- ( मन ) -श्रच् ” यह स्थिति होजाती है । ‘ उ - अ - अच् ” इस स्थिति में उकार को वकाररूप युवादेश शेजाता है । " व - अ - श्रचे ” यह स्थिति होजाती है । बकार अकार ने को मिलता है । बकर वकार के कार और च के अकार के आकाररूपा दीर्घसन्धि होजाती है । चकार को कुत्त्व होजाता है । इसप्रकार उ प्र अ च के यण- दीर्घ - कुत्व से " वाक् " शब्द निष्पन्न हो जाता है । इस का अर्थ होता है- प्रारण - मन की याञ्चा करने वाला तत्व । " उश्च अश्व इति वः, तमञ्चति, इति वाक " वाक् शब्द का यही निर्वाचन है । इससे प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, जिसे हम वाकू ' कहते हैं, वह मनः प्राण- वाक् की समष्टि । इन तीनों में से वाक्तत्र जहाँ पूर्वकथनानुसार सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों का उक्थ ( उत्पत्तिस्थान ) बनता है, वहाँ वागविनाभूत प्राणतत्व सब भूतों की प्रतिष्ठा बनता है । प्रत्यक्ष में देखा जाता है कि, जबतक वाङमय भूत में प्राण प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक वह भौतिक पदार्थ स्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । प्राण विधर्त्ता है । क्षरकूट को एकसूत्र में बद्ध रखना इसी विधर्ता प्राण का काम है । जब वस्तु जीर्ण - शीर्ण होजाती है, तो हम उस के लिए " अरे! इस में अब प्राण ( दम ) नहीं रहा " यह कहने लगते हैं । फलतः प्राण का प्रतिष्ठाभूमित्व सर्वात्मना सिद्ध होजाता है । तीसरा है मनस्तत्त्व | यह मन एक अखण्ड धरातल है, श्राकाशात्मा है- " मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यमाकाशात्मा ' । यही सब का अवसानस्थान है, परायणभूमि है । इस दृष्टि से भी इसे भौतिक पदार्थों का साम कहा जा सकता है । एवं यह आकाशवत् सत्र में समान है, इसलिए भी इसे साम माना जासकता है । यह है प्राकृतिक स्थिति । उक्थ ही महोक्थ है, यही ऋक् है । फलतः भूतोक्थमयी वाकू का ॠक्त्व सिद्ध होजाता है । ब्रह्म ही पुरुष है, यही यजुः है । फलतः भूतों के ब्रह्मरू प्राण का यजुष्ट व सिद्ध होजाता है । साम ही महाव्रत है, यही साम है फलतः भूतों के सामरूप मन का साममयत्त्व सिद्ध होजाता है । इन तीन विभागों से कहीं पृथक पृथक तीन आत्मा नहीं समझ लेने चाहिए । एक ही आत्मा के मनः प्राण वाक् ये तीन रूप हैं । दूसरे शब्दों में तीनों व्यास-ज्यत्रत्या एक आत्मा है – “ आत्मा उ एकः सन्न तत् त्रयं, त्र्यं सदेकमयमात्मा " । वही श्रात्मा वाग वच्छेदेन सम्पूर्ण भूर्ती का उक्थस्थान बनता हुआ ऋक् है । वही आत्मा प्राणावच्छेदेन सम्पूर्णं भूतों FIFT का ब्रह्मस्थान बनता हुआ यजुः है । एवं वही आत्मा मनोऽवच्छेदेन सम्पूर्ण भूतों का सामस्थान बनता हुआ साम है । वही उक्थ है, वही ब्रह्म है, वही साम है । उक्था सामल दरा, वाक् - प्राण - मनोमय, विश्वव्यापक, नित्यतत्त्व हो इन अनित्य भूतों का आत्मा है । TSPI १ – उक्थम् — वाक् — महोक्थम् --ऋक १ - २ - ब्रह्म — -- प्राणः - पुरुषः---यजुः २ - साम मनः महाव्रतम् साम -स एस वेदमूर्त्तिरात्मा सर्वेषां भूतानाम् । 2315 FIF १३०
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उपनिषद्भूमिका वेदनिरुक्तौ ** -१३१ उक्थ - ब्रह्म - साम - वेदनिरुक्तिः १ ( महदुक्थम् ) वाक - ऋक् हैं । एवं साममूर्ति साम मन, तीनों हीं त्रिवृद्भाषापन्न ऋङ मूर्त्ति उक्थ मन, यजुमूर्ति अमृतभावों ब्रह्म प्राण से क्रमशः रूप - कम - नाम, इन तीन त्रिवृद्धावापन्न आत्मा के इन है, त्रिवृत्प्राण कम्मों का प्रवर्तक है, एवं त्रिवृता वाक् नामों की उदय होता है । त्रिवृत् -- मन रूपों का कि प्रवर्त्तक उक्थ सदा बाक ही होती है, ब्र होता है, एवं साम अधिष्ठात्री है । इतना ध्यान रखिए पदार्थ का कोई न कोई नाम है, होता । प्रत्येक पदार्थ नाम - रूप - कर्म्म की समष्टि है । प्रत्येक कोई न कोई कर्म्म है । सदा मन ही और वर्णरूप ) है, एवं प्रत्येक पदार्थ का प्रत्येक पदार्थ का कोई न कोई रूप ( आकाररूप हि कश्चिन् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत " इस विज्ञानसिद्धान्त क्रियासञ्चार का ही नाम कर्म है । “ न किसी भी क्षण में निष्क्रिय नहीं है । परिवर्तनरूपा क्षणिक - क्रिया के अनुसार नामरूपात्मक कोई भी पदार्थ " जायते - अस्ति- विपरिणमते वर्द्धते - अपक्षीयते-- विनश्यति ” निरन्तर होती रहती है । इसी क्रिया के इस कम्र्मात्मिका क्रिया से ही तत्तत् पदार्थों की अव-ये ६ भावविकार माने जाते हैं । षड्भावविकारापन्ना स्थाओं में परिवर्तन हुआ करता है । ही है । केन्द्रस्थ मनःप्राणवाङमय अन्तर्य्यामी नामरूपकर्म्ममय मर्च्य पदार्थ की आधारभूमि प्रपञ्च है, एवं रूप एक स्वतन्त्र प्रपञ्च है । तीनों नाम एक स्वतन्त्र प्रपञ्च है, कर्म्म एक रखने स्वतन्त्र वाली वाकू नामप्रपञ्च की उक्थ - ब्रह्म - साम है, वाकू - मन अविनाभूत हैं । मनःप्राण को गर्भ में - ब्रह्म - साम है, एवं वाक् - प्राण को गर्भ में रखने वाला मन को गर्भ में रखने वाला प्राण कर्म्मप्रपञ्च का उक्थ मन उक्थ है, प्राणमय मन ब्रह्म साम है । जितने भी रूप उन सब का वाङमय रूपप्रपञ्च का उक्थ - ब्रह्म का उक्थ ब्रह्म - साम बनता हुआ रूपों का उक्थ - ब्रह्म-है, मनोमय मन साम है । इसप्रकार मन ही रूपों प्राण उक्थ है, प्राणमय प्राण ब्रह्म भी हैं,, उन उन सबका सबका वाङमय वाङमय प्राण उक साम - लक्षण साम बनता हुआ कम्मों का उक्थ - ब्रह्म-आत्मा है । जितने इतने भी कार्य हैं ही कम्मों का उक्थ - ब्रह्म -मनोमय प्राण साम है । इसप्रकार प्राण वाक् है, प्राणमयी वाक् ब्रह्म है, , उन सब का उक्थ वाङ्मयी साम - लक्षण आत्मा है । जितने भी नाम हैं नामों की उक्थन् ब्रह्म साम - लक्षण उक्थ ब्रह्म साम बनती हुई मनोमयी वाक् साम है । इसप्रकार वाक् हीं से ही आत्मा की तीनों कलाएँ है । वितानात्मक त्रिवृद्भाव आत्मा है । यह सब त्रिवृद्भाव का वितानमात्र जैसा कि निम्न लिखित परिलेख से वेदों से युक्त होजातीं हैं, त्रिवृता बनती हुई ( प्रत्येक कला ) तीनों स्पष्ट होजाता है— का उपभोग-१- मनःप्राणगर्भिता बाक में उक्थ - ब्रह्म - साम - भेद से तीनों वेदों यी बाकू - महदुक्थम् ऋक् १- वागेव वाग्भावेन नाम्नामुक्थम् ( वाक् ) - वाङ वाक् - पुरुषः --यजुः २- वागेव प्राणभावेन नाम्नां ब्रह्म ( प्राण: ) - प्राणमयी वाक्- महाव्रतम् - साम ३ - वागेव मनोभावेन नाम्नां साम ( मन ) - मनोमयी
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प्रथमखण्ड उक्थ - ब्रह्म - साम - वेदनिरुक्तिः २- मनोवाग्गर्भित प्राण में उक्थ ' ब्रह्म साम -- भेद से तीनों वेदों का उपभोग -१- प्राण एव वाभावेन कर्म्मणामुक्थम् ( वाक् ) - प्राणमयी वाक् - महदुक्थम् ऋक् २ - प्राण एव प्राणभागेन कर्मणां ब्रह्म ( प्राण: ) - प्राणमयः प्राणः - पुरुषः --- -यजुः ३ - प्राण एव मनोभावेन कर्मणां साम ( मन ) - प्राणमयं मनः- महाव्रतम् ---- साम २ ( पुरुषः ) प्राण: -- यजुः ३ - वाग्गर्भित मन में उक्थ - ब्रह्म - साम - भेद से तीनों वेदों का उपभोग-१ – मन एव वाग्भावेन रूपाणामुक्थम् ( वाक् ) – मनोमयी वाक् - महदुक्थम् - ऋक् २ - मन एव प्राणभागेन रूपाणां ब्रह्म ( प्राण: ) - मनोमयः प्राणः -- पुरुषः - यजुः ३ -- मन एव मनोभावेन रूपाणां साम ( मन: ) - मनोमयं मनः - महाव्रतम् -साम इति - वैज्ञानिकवेदनिरुक्तौ उक्थ - ब्रह्म- साम - मयी- वेदनिरुक्तिः ३ ( महाव्रतम् ) मनः-- साम १३२
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